Friday, February 17, 2017

रोहित के बिना एक वर्ष : राजा चैतन्यकुमार वेमुला






(हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला (28) को आरएसएस की विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), वीसी और केंद्र की बीजेपी सरकार की क्रूरता ने 17 जनवरी, 2016 को आत्महत्या की खाई में धकेल दिया था। दोषियों पर एक्शन के बजाय रोहित और उनके परिवार को ही कठघरे में खड़े करने की सरकार की बेशर्मी जारी है। सरकार का सारा जोर यह साबित करने पर है कि रोहित दलित नहीं पिछड़ी जाति से था। लेकिन, रोहित अगर सवर्ण भी होता तो भी हत्यारों को हत्यारा ही कहा जाएगा। हम देख  रहे हैं कि जनता और विद्यार्थियों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे जेएनयू के छात्र कन्हैया और उनके साथियों को किस तरह प्रताड़ित किया गया, नजीब को गायब कर दिया जिसके जीवित होने की उम्मीद भी दम तोड़ने लगी है और तमाम दूसरे विश्वविद्यालयों में भी इसी तरह के दमन जारी हैं। लेकिन, संघर्ष भी जारी हैं। रोहित के भाई राजा को पढ़ते हुए हम पाते हैं कि निराशा की स्थितियों के बावजूद रोहित के परिवार ने देशभर में सामाजिक न्याय के चल रहे संघर्षों में भागीदारी की है।)
     
मैं उस बुनियादी स्वतंत्रता से शुरुआत करना चाहूंगा, जो मेरे भाई रोहित को नहीं दी गई- सम्मान के साथ जीने की आज़ादी। - राजा वेमुला
 
मेरे भाई रोहित वेमुला को हमसे जुदा हुए एक वर्ष हो गया है। इस एक लर्ष के दौरान हम बहुत ही तकलीफों से गुजरे हैं और हमने बहुत सारे अन्यायों का अनुभव किया है। न्याय के लिए संघर्ष बहुत ही लंबा व मुश्किल भरा है और हम इसके लिए तैयार हैं। मेरे भाई को न्याय नहीं मिला, मात्र इतना ही नहीं है, अब तो यह कोशिश की जा रही है कि किसी प्रकार यह साबित कर दिया जाए कि हम दलित नहीं अपितु पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन हमें भरोसा है कि अंतत: सचाई की जीत होगी और जो लोग मेरे भाई की मौत के जिम्मेदार हैं, उन्हें सजा मिलेगी।

मेरे भाई की मौत के बाद से मेरी मां राधिका वेमुला बीमार रहती हैं। अभी हाल ही में वह अपनी सिलाई के काम पर लौटी हैं। इतनी मुश्किलात का सामना करने के बावजूद मेरी मां जातीय नफ़रत और भेदभाव के शिकार लोगों से मिलने देशभर में घूमीं। हम ऊना, जेएनयू, केरल के पेरुमबावूर में मार दी गई कानून की छात्रा जिशा की मां से मिलने और अन्य जगहों पर भी गए। संत्रास से भरी हुई उनकी कहानियों से गुजरते हुए हमने अपने दुखों का अनुभव किया। हाशिये पर धकेल दिए गए समुदायों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ इस संघर्ष को हम आगे बढ़ाएंगे, जितने लंबे समय तक भी हम कर सकते हैं। दलित एकता के ध्येय के लिए हम पूरे देश में बहुत सारे प्रदर्शनों और बैठकों में हिस्सा लेते रहे हैं।

रोहित अब नहीं रहा, इस सचाई को हम अभी तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं। परिवार में वह प्रेरणा का शक्तिपुंज था। उसके पास बहुत से विचार थे जो वह हमारे साथ बांटता था। एक स्थान जो हमारे लिए उसकी पहचान है, वह है हैदराबाद विश्वविद्यालय। हमें जब से वहां बिना अनुमति जाने से रोक दिया गया है तब से वह हमारी सीमा से बाहर हो गया है। हमें रोहित की आवक्ष मूर्ति, जिसे विद्यार्थियों ने परिसर में खड़ा किया था, के पास नहीं जाने दिया गया।
जब पिछली जनवरी (2016) को रोहित ने आत्महत्या की थी, मैं हैदराबाद में नैशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में एक प्रोजेक्ट फैलो के रूप में काम कर रहा था। मैंने अंतत: उन्हें सूचित किया कि मैं पुन: काम पर आने में असमर्थ हूं। हर जगह प्रदर्शन हो रहे थे और मैं उनमें शामिल होना चाहता था, लोगों के बीच जाना चाहता था, ताकि ज्यादा से ज्यादा समर्थन प्राप्त कर सकूं और न्याय सुनिश्चित कर पाऊं। एक वर्ष बाद हमें यह अहसास हुआ कि कुछ भी तो नहीं बदला। हर जगह जातीय भेदभाव लगातार हो रहे हैं। लेकिन हम संघर्ष करेंगे। हमारी लड़ाई आज़ादी, न्याय और सामाजिक बराबरी के लिए है। जब कांग्रेस में हर कोई उत्साहित था कि भारत को अंतत: आज़ादी मिलेगी, तब डॉ. भीमराव रामजी आंबोडकर ने यह पूछने का साहस किया था कि यह किस तरह की आज़ादी होगी। स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी बाबा साहेब का यह प्रश्न लगातार गूंज रहा है। क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं? या ऊंची जाति के भारतीय उपनिवेशवादियों ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की जगह ले ली? मैं सैकड़ों आज़ादियों को गिना सकता हूं जिनके लिए मेरे जैसे दलित तरस रहे हैं लेकिन मैं उस बुनियादी स्वतंत्रता से शुरुआत करना चाहूंगा, जो मेरे भाई रोहित को नहीं दी गई- सम्मान के साथ जीने की आज़ादी। यह बुनियादी आज़ादी, जिसे हर कोई जीवित प्राणी किसी भी चीज़ से ज्यादा पाना चाहता है, और जो इस तथाकथित स्वतंत्र देश में मेरे भाई को नहीं दी गई। उस आज़ादी तो मांगने में ग़लत क्या है जो सबको प्राप्त है?

दलितों को एक दिन बराबरी का सम्मान मिलेगा, क्या यह सपना देखना भी ग़लत है? मेरा सपना है कि एक दिन हम दलितों के पास अपना मनपसंद भोजन खाने की स्वतंत्रता होगी। हम जो चाहे वो खा सकेंगे चाहे वो बीफ हो। मेरा सपना है कि एक दिन हमारे पास किस से भी प्यार करने की आज़ादी होगी। मेरा सपना है कि एक दिन हमारे पास इनकार करने की आज़ादी होगी जब कोई भी हमसे जबरन टॉयलेट साफ करवाएगा या मरी हुई गाय को उठाने के लिए कहेगा। । मेरा सपना है कि एक दिन हमारे पास अपना ख़ुद का रास्ता चुनने की आज़ादी होगी, चाहे वह मंदिर की ओर जाता हो या विश्वविद्यालय की ओर।

हमारे लिए आज़ादी का अर्थ – जाति व्यवस्था से आज़ादी, संविधान जो अपने नागरिकों को देता है, उन सभी अधिकारों की पूर्णत: गारंटी। आज़ादी का अर्थ है, वह जीवन जो बाबा साबेब आंबेडकर चाहते थे कि हम जीएं; एक जीवन जिसका मानवता में विश्वास हो न कि किसी अनजान ईश्वर में; एक जीवन जिसका आधार अपने साथी मनुष्यों के लिए करुणा और सम्मान हो; आत्मसम्मान और गरिमा से भरा जीवन; हिंदू जाति व्यवस्था के बाहर एक जीवन; रोजमर्रा की शर्म और बेइज़ज़्ती से आज़ादी; उसी ईश्वर की पूजा करने की ग्लानि से मुक्त एक जीवन जिसके नाम पर हमारे लोगों को सदियों से प्रताड़ित किया जा रहा है; स्कूल और विश्वविद्यालयों में भेदभाव से आज़ादी; दलितों के प्रति ब्राह्मणों के व्यवहार और रवैये से आज़ादी; इसका अर्थ है कि ghettos (घुटन भरी मलिन बस्तियों) में फेंक दिए जाने से आज़ादी; हम कैसे रहें और कहां रहें, यह चुनने की आज़ादी। आज़ादी यानी अन्य जातियों के लोग हमारी क्षमता और काबिलियत को स्वीकारना शुरू करें और हमसे बराबरी का व्यवहार करें।
मेरे कुछ इससे छोटे सपने भी हैं।
रोहित की मां और उन्हें संभालता रोहित का भाई
मेरा सपना है कि मेरी मां को यह आज़ादी मिले कि वह हैदाराबाद विश्वविद्यालय के परिसर में प्रवेश कर सके, जहां उसके बेटे ने अपना जीवन बलिदान किया था। किसी भी आज़ादी का क्या महत्व जबकि एक मां को वहां जाने की आज़ादी नहीं, जहां उसके बेटे की मृत्यु हुई? कुछ ऐसे भारतीय भी हैं जो मेरे सपनों की इन छोटी आज़ादियों से बहुत ज्यादा आज़ादियों का आनंद ले रहे हैं। उनके लिए यह देश अवसरों और समृद्धि से भरा स्थान है। कुछ के पास बिना डरे किसी को भी मार देने की आज़ादी है। उनमें से कुछ के पास आज़ादी है कि वे देश पर पैसे और बाहुबल के बल पर शासन करें। आज़ादी के सत्तर सालों के बाद भी बहुत सारों के पास या आज़ादी है कि वे उनको प्रताड़ित करें जिनके पास जन्म से ही कोई अधिकार नहीं है।
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(रोहित के भाई राजा की Sreenivas Janyala से यह बातचीत इंडियन एक्सप्रेस में January 19, 2017 को छपी थी जिसका कृष्ण सिंह द्वारा किया गया यह हिंदी अनुवाद समयांतर में प्रकाशित हुआ।)


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