एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
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अविनाश मिश्र
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Thursday, March 6, 2014
अविनाश मिश्र की चार कविताएं
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सफदर हाशमी से निर्मल वर्मा में तब्दील होते हुए मैं थक गया हूं यह नाटक करते-करते रवींद्र भवन से लेकर भारत भवन तक एक भीड़ के...
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