समीक्षा निबंध: प्रसांता चक्रवर्ती
रॉक्सेन एल. यूबेन. ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स.
(प्रिंसटन और ऑक्सफ़र्ड: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2025.)
क्या अपमान और यातना के स्तर पर हम सब एक समान हैं: उस स्थिति में जब "सम्मानीय व्यक्ति के साथ चोर जैसा व्यवहार होता है और चोर को एक महानायक की तरह पेश किया जाता है", और इस बीच हम तानाशाहों की अत्याचारियों से अदला-बदली करते रहते हैं? व्यक्ति और उसके साथ ही एक पूरी की पूरी "क़ौम" को समानता के ज़रिए परिभाषित किया जा सकता है- अपमान में, महत्वहीनता और साझी क़िस्मत के मामले में. या क्या हम किसी तरह अपमान का मुक़ाबला करने के बारे में सोच सकते हैं, ताकि उल्टे अपमान की प्रक्रिया का सहारा लेने के बजाय हम इससे निपटने के दूसरे रास्ते खोजें और फिर भी प्रतिक्रिया न तो नीरस रहे और न बहुत जज़्बाती?
हाल ही में छपी सूक्ष्म विश्लेषण और गहन शोध पर आधारित किताब में रॉक्सेन एल. यूबेन हमें बताती हैं कि अपमान का मूल शारीरिक पीड़ा में उतना
नहीं होता, जितना एक ख़ास क़िस्म के मानसिक आघात में ज़्यादा होता है, जो केवल असहायता
के अनुभवों में नहीं बल्कि जबरन किसी ऐसी चीज़ या व्यक्ति में ढाल
दिए जाने में होता है, जिसे अब हम नहीं पहचानते. हम जो हैं और हमें जो बनाया जाता
है, अपमान उसमें एक विच्छेद लाता है.
अपनी यात्रा की शुरुआत में ही यूबेन हमें बता देती हैं कि
शायद हम अपमानित होने के असल अभ्यास और इसे अंजाम देने के अलग-अलग तरीक़ों पर
ध्यान देकर ही किसी तरह की धारणात्मक स्पष्टता तक पहुँच सकते हैं: “अपमान आलंकारिक
तौर पर हर जगह मौजूद है और राजनीतिक तौर पर प्रबल है, लेकिन धारणा के बतौर यह हमारी
पकड़ से फिसल जाता है.”
असल में, अपमान में नीचे की ओर एक झुकाव होता है, ज़मीन में गाड़ देने का, असल में “मिट्टी चटवाने”
के लिए मजबूर
करने का अनुभव. इस किताब में अपमान के लिए जो दो सबसे ज़्यादा बार इस्तेमाल किए गए
शब्द हैं, वो हैं ढल और इहाना. ये मूल शब्द अरबी में गंदगी और धरती
के लिए इस्तेमाल होते हैं, यानी गंदगी या धूल से ढक देना, मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मजबूर
और विवश किया जाना और नीचा दिखाना. या एक और पुराने मुहावरेदार वाक्यांश अर्घमा अनफ़ाहू का शाब्दिक अर्थ है “नाक को ज़मीन से रगड़ देना.”
इसी तरह अंग्रेज़ी शब्द ह्यूमिलिएशन की उत्पत्ति लैटिन ह्यूमस यानी “पृथ्वी”
या “ज़मीन” में खोजी जा
सकती है और कुछ ऐसा ही जर्मन और बाइबिल के ज़माने की हिब्रू दोनों
में मिलता है. आपकी दुनिया पर दूसरे का कब्ज़ा हो जाता है: “आप जो कुछ भी कभी थे,
वह सब उस चीज़
से ओझल हो जाता है जो अपमान करने वाले ने आपको बना दिया है.”
अपमान का एक अहम पहलू है, इसका सार्वजनिक चरित्र- मसलन घटना के बाद
उसका बखान अपमान का महज़ ज़िक्र नहीं है, उसी का एक विस्तार है, जो इसके प्रभावी
होने के लिए ज़रूरी है. अपमान एक तमाशा है. दूसरा इससे जुड़ा पहलू है, गवाह की मौजूदगी,
जो एक संरचना
का हिस्सा है: अपमान करने वाला, अपमानित और गवाह. गवाह में सब कुछ
देख रहे भगवान से लेकर असल में इकट्ठा हुई भीड़ तक शामिल हैं या फिर वह मीडिया की
बनाई दुनिया का हिस्सा बन सकता है. “अगर अपमान अन्यायपूर्ण ढंग से थोपी गई लाचारी और
वैध दर्जे के बीच विच्छेद में बसता है, तो इसका बार-बार दोहराया जाना उस विच्छेद का फिर
से अभिनय है, जो उस अनुभव को फिर से ज़िंदा करने में सक्षम है.” अपमान करने वाले का सुख उसके
फिर से शक्ति हासिल करने, विच्छेद को फिर से दिखाने और अपमानित के अनुभव को फिर से ज़िंदा
करने में निहित होता है.
यूबेन के प्रमुख स्रोत एक पूरी सभ्यता को अपमानित करने के पश्चिमी मॉडल को
इस्लामी प्रतिक्रियाओं और मिस्र में हुए अरब स्प्रिंग पर आधारित हैं. एक जवाब यह
है कि इस्लाम के दुश्मनों ने मुसलमानों को अपमानित करने के लिए बेइंतहा ताक़त का
इस्तेमाल और मुस्लिमों की यह पहचानने में नाकामी कि इस्लाम की श्रेष्ठता के
प्रतिनिधि और उसकी सेवक उम्मत (अदल्ला अल-उम्मा) के अस्तित्व के लिए सत्ता के उस
पदानुक्रम को उलटने के लिए संघर्ष की ज़रूरत है, जो अपमान से जन्मता है. अपमान का यह
ढाँचा कैसे आकार लेता है, जिसमें ये घटक एक साझा ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में
गढ़े गए प्रतीकों, छवियों, रूपकों और कोड वाली शब्दावली के एक ख़ास संग्रह के ज़रिए कई
जगहों पर कैसे बनते हैं? यूबेन बयानबाज़ी को एक उपकरण के तौर पर ठीक ही काफ़ी अहमियत
देती हैं (शुरुआती बयानबाज़ी के तरीक़े हैं- मौखिक, दिखावटी और देहगत). शुरुआत
में वह अपमान के फ़ौरी समाधान की माँग के औज़ार के बतौर तफ़सीर
और फ़तवा की अहमियत पर विचार करती हैं. इसके अलावा वह विज्ञप्तियों,
लंबे-चौड़े
साक्षात्कारों, धुंधले पड़ चुके शौकिया वीडियो, हाई-प्रोडक्शन छोटी
फ़िल्मों, पत्रिका लेखों, रेडियो प्रसारणों, प्रेस विज्ञप्तियों, विस्तृत भाषणों को बारीक़ी
से जाँचती हैं- जो टेप कसेट से लेकर इंटरनेट तक कई तकनीकों के ज़रिए फैलाए गए हैं.
ये प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रकृति में प्रतिशोधात्मक हैं. यह अपने अपमान करने वाले को सचमुच या प्रतीकात्मक रूप से मिट्टी में मिला देने की
भावना ही है, जो 'बदले में अपमान' को पैदा करती है, जो तुरंत लाचारी के साये को
छिन्न-भिन्न कर देती है. लेकिन असल में यह सिर्फ़
अपमान के ईश्वरीय न्याय का औचित्य है. इसका यह दावा होता है कि जिन्होंने इस्लाम
को अपमानित किया है, उन पर लाचारी थोपना सत्ता संबंधों का एक शाब्दिक और
प्रतीकात्मक उलटफेर है, जो बुरी तरह से अस्त-व्यस्त दुनिया में व्यवस्था और समझ
बहाल करता है. बदले में अपमान ईश्वर की ओर से नियत सामाजिक व्यवस्था के प्रति
समर्पण का एक सर्वोच्च प्रमाण बन जाता है. और विरोधाभास यह है कि ईश्वर के प्रति विनम्रता के मायने हैं अपमान करने की दिव्य शक्ति को हथिया
लेना.
क्या अपमान से निपटने के लिए साहस, उग्रता और ताक़त की जवाबी बयानबाज़ी या इसका उलटा
इस्तेमाल करने के अलावा कोई और तरीक़ा है: कांट की नैतिक स्वायत्तता और मानवीय
गरिमा की भाषा के अलावा? शानदार स्रोतों के साथ ही इस किताब का सबसे अहम योगदान असल
में अपमान से निपटने के लिए एक तीसरी संभावना पेश करना है. पहली बात तो यह समझना है
कि भले ही कांट के नैतिक ढांचे का इस्तेमाल करना जवाब न हो पर अपमान और करामा
(या "गरिमा") असल में एक-दूसरे के विरोधी होने के बजाय एक-दूसरे के पूरक
हैं. पूरी कौम गरिमा चाहती है और ज़रूरी नहीं कि हमेशा सामाजिक न्याय या आज़ादी की
बात ही करे- क्योंकि घोर लाचारी की भावना का आख़िर समाधान होना चाहिए (अपमान आख़िर
में दैहिक और प्रतीकात्मक होता है: झुका हुआ सिर और चेहरे पर थप्पड़; या ज़मीन पर
गिराए जाने की मजबूरी). ऐसे में करामा में पहचान का
एक अनुभूत क्षण है- जो सामूहिक दृढ़ता का नतीजा है.
और यहाँ यूबेन नुक़सान की भरपाई के मेलियन तरीक़े की याद दिलाती
हैं. "मेलियन" का संदर्भ थ्यूसीडाइड्स की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ पेलोपोनेशियन वॉर’ में मेलोस के निवासियों से
है, जिन्होंने विनाश और गुलामी की धमकी दिए जाने के बावजूद एथेंस के साम्राज्य के
सामने झुकने से इनकार कर दिया था. मेलियन लोगों ने उन्हें जीतने को तैयार सेना की
ओर से भेजे गए एथेंस के दूतों से कहा था, "आत्मसमर्पण का मतलब है खुद को निराशा के
हवाले करना. जबकि कार्रवाई से हमें अभी भी उम्मीद है कि हम सीधे खड़े हो पाएँगे"
(स्टेनाई ऑर्थोस, जिसका अर्थ है सीधा रहना या खड़ा होना). एथेंस की
चेतावनियों के सामने डटकर खड़े रहना ख़ुद में ही एक तरह की जीत है.
अपनी बात रखने के लिए यूबेन स्टोइक्स और अर्नेस्ट ब्लॉक के सीधे खड़े होने के ख़याल ऑर्थोस का ज़िक्र करती हैं: गरिमा "सीधे खड़े होने का ऑर्थोपीडिया"
है. करामा को कांट के बजाय मेलियन के रूप में बताना उसे दृढ़ता से खड़े
होने के प्रतीक और प्रदर्शन के रूप में दिखाना है, जहाँ "खड़े होने"
को शाब्दिक और रूपक दोनों तरह से समझा जाता है. अपमान विरोध में नहीं, बल्कि एक मंज़ूरशुदा
ईमानदारी या क़द के संदर्भ में आकार लेता है, और यह अपमान ही है जो उस
ईमानदारी या क़द पर छा जाता है और जिसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए. चूँकि
"अपमान और गरिमा/करामा का क्या मतलब है और वे क्या करते हैं, यह एक ही जगह
और शरीर पर और उसके ज़रिए दिखाया जाता है, इसलिए एक के बिना दूसरे की सत्ता-मीमांसा और
राजनीति को पकड़ पाना असंभव है." यह नैतिक स्वायत्तता के मानदंडों या हिंसा
के फ़ैसलों के बारे में कम है, बल्कि यह समझने को लेकर है कि गरिमा भी अपमान की तरह ही एक देहगत अभ्यास है, जिसकी यह किताब प्रशंसा करती है. दृढ़ता से खड़े रहना अपने
जीवन की कहानी को आकार देने की शक्ति पर क्रियात्मक ढंग से दावा करना है, जो अपमान के
केंद्र में मौजूद `नपुंसकता` की पकड़ को ढीला करता है. गरिमा की बहाली धीरे-धीरे
होती है और यह फैलती जाती है. इंसान खड़ा होना शुरू करता है. और जब
पूरा समाज इनकार के ज़रिए अपना सिर उठाता है- तो यह "निर्विवाद रूप से ज़ाहिर"
हो जाता है: दूसरों को, पर साथ ही ख़ुद को भी.
आलोचना के हवाले से एक बात. भले ही किताब अपमान
के प्रति दो तरह की प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर करने की कोशिश करती है: बदले में
अपमान और अपमान करने वाले के सामने खड़ा होना, यह पूरी तरह से आश्वस्त
नहीं कर पाती कि मिस्र का प्रतिरोध सही रास्ते पर था और इस्लामिस्ट
प्रतिक्रियावादी थे. यह अंतर कुछ ज़्यादा ही साफ़-सुथरा है और हमें एक बाइनरी में
बाँधता है, जबकि इतिहास कहीं ज़्यादा उलझावभरा होता है. इसके अलावा, लेखिका इस बात
पर ध्यान नहीं देतीं कि अगर अपमान राजनीतिक क़दमों और रणनीतियों के मूल्यांकन का
आधार होता है तो पहचान/राष्ट्र/कौमों पर आधारित राजनीति में हमेशा प्रतिक्रियावादी
बनने की संभावना होती है, ख़ासकर तब जब आलोचनात्मक विवेक को एक तरफ़ रख दिया जाता है
और संकट के समय शिकायत-आधारित भावनाएँ हावी हो जाती हैं. तो एक अहम सवाल जो पूछा
जाएगा: गरिमा या 'सीधी खड़े होने की भंगिमा' आख़िर किसके भरोसे टिकी होगी?
शिकायत-आधारित सत्ता-मीमांसा
का तर्क न तो प्रगतिशील है और न ही इसमें कोई परिवर्तनकारी हस्तक्षेप करने की सामर्थ्य
है. अहम बात यह देखना है कि गरिमा से जुड़ी गर्व की भावना को एक न्यायपूर्ण समाज
की तरफ़ रचनात्मक दिशा कैसे दी जा सकती है.
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| Prasanta Chakravarty |
रॉक्सेन एल. यूबेन की किताब ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स पर यह लेख उन्होंने समयांतर पत्रिका के अनुरोध पर लिखा था। वहीं से साभार।










