Friday, September 18, 2026

अशोक वाजपेयी को संस्कृति का मसीहा कोई मूर्ख ही कहेगा - भैरव प्रसाद गुप्त

भैरव प्रसाद गुप्त (वर्तमान साहित्य, अगस्त-90)

(सुप्रसिद्ध कथाकार भैरव प्रसाद गुप्त से विद्याधर शुक्ल की बातचीत)

भोपाल का भारत भवन अपने जन्म के साथ तमाम तरह के विवादों से ग्रस्त रहा। फोर्ड फाउंडेशन से अपने सम्बन्धों तथा मार्क्सवाद के प्रखर विरोध के कारण वाम से जुड़े लेखक काफी हद तक इससे कतराते रहे। हालांकि यह भी सच्चाई रही है कि बहुत से वामपंथी लेखक चाहे, वे जनवादी लेखक संघ के सदस्य हों अथवा प्रगतिशील लेखक संघ के, अपने व्यक्तिगत नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए अशोक वाजपेयी और भारत भवन के नजदीक या दूर आते-जाते रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने मार्क्सवाद के प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छिपाया, लेकिन उनसे और भारत भवन से जुड़ने पर जो फायदे मिलते, उनके कारण नयी-पुरानी पीढ़ी के तमाम मार्क्सवादी लेखक उनके करीब आने के बहाने ढूंढ़ते रहे हैं। हाल में मध्यप्रदेश में हुए सत्ता-परिवर्तन के बाद यह लगभग तय हो गया है कि अशोक वाजपेयी अब भारत भवन को निजी जागीर के रूप में नहीं चला पायेंगे। यद्यपि परिवर्तन की इस स्थिति में कई और भयंकर खतरे निहित हैं। इस बात की पूरी सम्भावना उत्पन्न हो गयी है कि हिन्दू पुनरुत्थानवादी फासिस्ट शक्तियां भारत भवन पर काबिज हो जायेंगी। अशोक वाजपेयी ने इस स्थिति का चालाकी के साथ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अपने निष्कासन को वे शहीदाना स्तर पर ले जाना चाहते हैं। स्वामीनाथन, त्रिलोचन या हुसेन जैसे लोगों से अपने पक्ष में इस्तीफे दिलाकर वे स्वयं को संस्कृति की रक्षा में धराशायी योद्धा का दर्जा दिलाना चाहते हैं। अभी हाल में अशोक वाजपेयी इलाहाबाद आये थे। यहाँ जिस तरह दूधनाथ और मार्कण्डेय जैसे जनवादी लेखक संघ के लोगों ने भक्तिभाव से उनकी सेवा की, उससे कई दिलचस्प सवाल पैदा हुए। ये सवाल मार्क्सवाद, अशोक वाजपेयी, भारत भवन और जनवादी लेखक संघ के रिश्तों की मनोरंजक पड़ताल करते हैं। इन्हीं सवालों पर भैरवप्रसाद गुप्त से व. सा. ने बात-चीत की जो इस अंक में दी जा रही है। अशोक वाजपेयी से भी इलाहाबाद के कुछ लेखकों ने बात-चीत की, वह भी इसी अंक में पढ़ें। इसके अतिरिक्त भारत भवन के बारे में अन्य सामग्री भी हम इस अंक में उपलब्ध करा रहे हैं—सम्पादक, `वर्तमान साहित्य`। विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी के इस बयान (संडे आब्जर्वर 20. 5. 90) पर आप क्या कहना चाहेंगे? - 'यह देखकर हैरानी होती है कि पिछले दिनों के उथल-पुथल के बाद हमारे यहाँ उन बौद्धिक-साहित्यिक हलकों में जहाँ सारा जीवनाधार ही प्रगतिशीलता और जनवादिता है, किसी तरह की बौद्धिक बेचैनी नजर नहीं आती, बल्कि कहा तो यह जा सकता है कि जिस अनुपात में यूरोप और ऐसे बुद्धिजीवियों के पितृदेश सोवियत रूस में खुलापन और बहुलता आयी है, उसी अनुपात में हिन्दी में कट्टरता और अन्य-आग्रह बढ़े हैं - ये लोग अपनी विचारधारा के बाड़े में कैद और सुरक्षित हैं।' भैरव प्रसाद गुप्त : मुझे लगता है कि पूर्वी यूरोप में और रूस में जो घटनायें घट रही हैं, उनसे जिस प्रकार बहुत जल्दबाजी में पूँजीवादी, साम्राज्यवादी हलके अति उत्साह में आ गये हैं और तरह-तरह की बातें करते जा रहे हैं, जैसे कि साम्यवाद समाप्त हो गया, मार्क्सवाद-लेनिनवाद समाप्त हो गया... पूँजीवाद की विजय हो गयी आदि आदि। उसी प्रकार हमारे देश में भी अशोक वाजपेयी जैसे कुछ बुद्धिजीवी हैं, जो अति उत्साह में इसी तरह की बातें करने लगे हैं। पहली बात जो मैं उनकी बातों के सम्बन्ध में कहना चाहता हूँ, वह यह कि हम प्रगतिशील अथवा जनवादी कट्टर नहीं हैं और हमारा यह संकल्प भी है कि हम कट्टर नहीं होंगे। सही मार्क्सवादी कभी भी कट्टर नहीं होता। अपने सिद्धान्तों के प्रति आस्थावान बनना, दृढ़ रहना कट्टरवाद नहीं होता। कट्टरवाद वहाँ होता है, जहाँ आदमी अपने सिद्धान्तों को मार्गदर्शक सिद्धान्त न समझकर उन्हें लेकर या उसकी पूँछ पकड़कर बैठ जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह केवल अपने सिद्धान्त को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि अपने को भी नष्ट कर देता है। अशोक वाजपेयी को यह जानना चाहिए कि प्रगतिवाद अथवा जनवाद कोई आज की चीज़ नहीं है, अशोक वाजपेयी को यह भी जानना चाहिए कि जनवाद का सच्चा पाठ साम्यवादी आंदोलनों ने ही पढ़ाया है। उनका जनवाद और हमारा जनवाद अलग अलग है, इसमें कोई संदेह नहीं है। बड़े-बड़े विचारकों ने, पूँजीवादी विचारकों ने भी स्वीकार किया है कि उन्होंने या पूँजीवादी व्यवस्था ने साम्यवादी विचारधारा से बहुत कुछ सीखा और लिया है। उदाहरण के लिए एक लोक कल्याण की ही बात लीजिए, लोक-कल्याण के लिए समाजवादी व्यवस्था जैसे काम करती है, उसी प्रकार आज पूँजीवादी व्यवस्था भी करने की घोषणा करती है। मैं जानता हूँ और अशोक वाजपेयी भी यह जानते होंगे कि पूँजीवादी व्यवस्था किस रूप में और कैसे समाजवादी व्यवस्था को प्रभावित करती है?

जब तक विश्व में एक साथ समाजवादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था अस्तित्व में रहेंगी, तब तक वे एक दूसरे को प्रभावित करती रहेंगी, एक दूसरे पर क्रियाशील रहेंगी। यदि पूँजीवादी देश समाजवाद से प्रेरणा लेकर लोक-कल्याण की बात करते हैं और इसी प्रकार कुछ समाजवादी देश पूँजीवाद से प्रेरणा लेकर बाजार से सम्बद्ध आर्थिक नीति की बातें करने लगते हैं तो इसमें बेचैन होने की कौन सी बात है! कुछ समाजवादी देश ऐसी बातें करने लगे हैं इसलिए इस परिणाम पर पहुँचना कि साम्यवाद का अंत हो गया, मार्क्सवाद लेनिनवाद का अंत हो गया, क्या सरासर मूर्खतापूर्ण बात नहीं है? आखिर किस बात की बेचैनी? उन देशों में उथल-पुथल मच रहा है, इस बात की बेचैनी? वहाँ परिवर्तन आ रहे हैं, इस बात की बेचैनी? परिवर्तन तो हमारा नारा है। परिवर्तन तो मार्क्सवाद का मूल नारा है। परिवर्तन का सिद्धान्त मार्क्सवाद ने प्रतिष्ठित किया और मार्क्सवादी परिवर्तन के लिए आये तथा समाजवादी व्यवस्था परिवर्तन के लिये आयी। हम इस बात से बेचैनी का अहसास नहीं करते कि किस देश में क्या हो रहा है बल्कि हम उसको ठंडे दिमाग से समझने का प्रयत्न करते हैं कि क्या हो रहा है, हम इन्तज़ार करते हैं कि देखा जाय ऊँट किस करवट बैठता है। अभी इसी बीच जो कुछ पोलैंड में हुआ है, चैकोस्लोवाकिया में हुआ है या रूमानिया या अल्बानिया में हुआ है, क्या अशोक वाजपेयी इन चीज़ों को देख रहे हैं? वहाँ के परिवर्तनों को, वहाँ के चुनावों के नतीजों को उन्होंने देखा है। भाई, ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद एक दिन में आ गया और एक दिन में चला जायेगा।

मार्क्सवाद एक सतत् विकासशील प्रगतिशील सिद्धान्त है। मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धान्त नहीं है, मार्क्सवाद कोई जड़ आदर्श नहीं है, ऐसा दर्शन नहीं है जो एक दिन में आये और दूसरे दिन चला जाय। दुनिया में और कोई वाद है, और कोई दर्शन है, और कोई विचारधारा है जिसने इस तरह तेजी से विकास किया हो और सारी दुनिया में फैल गया हो। मार्क्स और एंगेल्स ने जो सिद्धान्त निरूपित किये थे, विकास के सिद्धान्त, सामाजिक विकास के सिद्धान्त, राजनीतिक विकास के सिद्धान्त, क्या वे आज उसी रूप में हैं? क्या लेनिन ने कुछ नहीं किया? क्या स्टालिन ने कुछ नहीं किया? क्या माओ ने कुछ नहीं किया? क्या होचीमिन्ह ने कुछ नहीं किया? क्या फिदेल कास्त्रो ने कुछ नहीं किया? अशोक वाजपेयी को कुछ पढ़ना चाहिए, कुछ समझना चाहिए। राजनीति मज़ाक नहीं है। इस तरह अशोक वाजपेयी जैसे बुद्धिजीवियों को बुलबुल नहीं उड़ाना चाहिए। उनको इस बात को समझना चाहिए और समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। हम इस बात का दावा नहीं करते कि समाजवादी व्यवस्था हमेशा सही काम ही करेगी। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह ग़लती भी करता है। पार्टियों का स्वभाव भी ऐसा ही होता है। वे भी ग़लतियां करती हैं। हम अपने को सदा सही काम करने वाला नहीं मानते। हमसे भी ग़लतियां होती हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि अगर ग़लतियां करते हो और गलतियां सामने आ जाती हैं तो उसको समझो, उसको ठीक करो और यह ध्यान रखो कि आगे वे ग़लतियां न हों। क्या और भी ऐसी कोई पार्टी है, कम्युनिस्ट पार्टी के अलावे, जो यह काम करती हो?

आज ही देख लें, अपने देश में देख लें। राजीव गांधी क्या कर रहे हैं? कांग्रेस क्या कर रही है? सब उन्हीं लोगों का किया-दिया है, देश का सारा नाश उन्हीं लोगों ने किया है, लेकिन आज ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं कि नयी सरकार देश को कमज़ोर कर रही है, नई सरकार देश की समस्याएं हल नहीं कर पा रही है, पंजाब, कश्मीर की समस्या हल नहीं कर पा रही है। क्या कोई उनसे पूछने वाला है कि तुम लोगों ने क्या किया? क्या तुम लोगों ने हल कर दिया था? हल कर देते तो काहे को यह संकट आता, काहे को यह तक़लीफे़ं होतीं। लेकिन नहीं, हमारे यहां मुसीबत यही है कि जहां कहीं कुछ होता है, देश में या बाहर तो उसे लेकर ढपली बजाने लगते हैं और इस तरह की बातें करते हैं कि हम बेचैन क्यों नहीं होते। अरे भाई, हम जानते हैं, हम समाजशास्त्र के नियमों और सिद्धांतों को कुछ समझते हैं। परिवर्तन से हमें कोई घबराहट नहीं होती। लेकिन हमें एक बात का पूरा विश्वास है और अशोक वाजपेयी को यह जान लेना चाहिए कि वह विश्वास ही प्रमुख वस्तु है, क्योंकि इस विश्वास का आधार इतिहास है, इतिहास का आधार समाज का विकास है, मनुष्य का विकास है, मनुष्य के विवेक का विकास है, समझ का विकास है, उसके ज्ञान तथा चेतना का विकास है, कि परिवर्तन अवश्यंभावी है। कभी यह परिवर्तन ग़लत भी हो सकता है और कभी सही भी हो सकता है। अगर ग़लत है तो उसको सही करना चाहिए और अगर सही है तो उसको आगे बढ़ाना चाहिए। यह हम जानते हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी से मेरा नम्र निवेदन यह है कि वह ऐसी जल्दबाजी न करें और हमें बेचैन होने का सबक न सिखाएं। बेचैनी दरअसल उन्हें होगी, क्योंकि वे जानते हैं कि यह जो कुछ हो रहा है, वह कुछ दिनों की बात है, क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा, समाजवादी सिद्धांत, मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत यों ही हवा से उतरकर नहीं आये हैं, मार्क्सवाद-लेनिनवादी सिद्धांत वे ठोस ज़मीन से, समाज-विकास के नियमों के एक वैज्ञानिक तरीके़ से निकाले गये हैं और लगातार आज तक विकसित होते गये हैं। क्या कोई ऐसा वाद है इस दुनिया में, जिसने इस तरह से अपना विकास-विस्तार किया हो, इतनी व्याप्ति से दुनिया के देश-देश में पहुँचा हो, इतना वेग से जनमानस को उद्वेलित किया हो, इतनी ही गहराई से लोगों को संघर्ष के लिए उत्प्रेरित किया हो, इतनी शिद्दत से बौद्धिकों को आंदोलित किया हो? मार्क्सवाद एक सर्वाधिक सशक्त विचारधारा के रूप में आज भी है और मैं यह कहना चाहता हूँ कि वह अंततः विकसित होता रहेगा। लेकिन मार्क्सवाद को उसी रूप में जो लोग आज भी देखते हैं, जिस रूप में उसका सूत्रपात हुआ था, वे बड़ी ग़लती करते हैं। मार्क्सवाद आज बहुत अधिक विकसित हो गया है और आगे बढ़ गया है। उसे समग्र रूप में समझना चाहिए, उसके भविष्य के रूपों की कल्पना करना चाहिए।

अशोक वाजपेयी से मैं यह पूछना चाहूँगा कि उनके पास जनता की ग़रीबी का क्या हल है? उनके पास मज़दूरों की बदहाली का क्या हल है? उनके पास बेकारों की समस्या का क्या हल है? क्या पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर सकता है? अगर कर सकता है तो अमरीका में बेकारी क्यों है, इंग्लैण्ड में बेकारी क्यों है, पश्चिमी जर्मनी में बेकारी क्यों है, खु़द हमारे हिन्दुस्तान में इतनी बड़ी बेकारी क्यों है? 48 साल से हम आज़ाद हैं। क्या हमने इन समस्याओं को हल कर लिया? हमें कर लेना चाहिए था। अशोक वाजपेयी बतायें कि ये समस्याएँ क्यों दिन प्रतिदिन और विकराल होती चली जा रही हैं? क्या रूस में भी ऐसी ही समस्याएँ हैं? क्या चीन में भी ऐसी बेकारी है? क्या क्यूबा में भी ऐसी ही ग़रीबी है? क्या वियतनाम में भी ऐसी ही बदहाली है? हमें तो ख़ुशी होगी अगर पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर दे। जनता की भलाई और सुख-शांति के लिए काम करने लगे। तब क्या मुझे उसमें बेचैनी होगी कि अरे, यह पूँजीवाद क्या करने लगा? लेकिन नहीं, पूँजीवाद के बस की यह बात है ही नहीं। अशोक वाजपेयी जैसे लोग आज भी उसका पूँछल्ला बनकर उसका गीत गाये जा रहे हैं। पूर्वी यूरोप में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर उनका ख्याल है कि पूँजीवाद की विजय हो रही है। इस खु़शफ़हमी में वे जश्न मनायें, जैसे उन्होंने गैस-त्रासदी के दौरान भारत-भवन में मनाया था। जनता के सुख-दुःख से उन्हें क्या लेना? कुलीन संस्कृति वालों का नाच-गान चलता रहे, देव जावे भाड़ में।

विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी की बात चली तो इन्हीं से संदर्भित एक और प्रश्न। विगत दिनों इलाहाबाद में जनवादी लेखक संघ के तीन पदाधिकारियों-मार्कडेय, शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह ने भारत भवन के सिरमौर अशोक वाजपेयी के सम्मान में 'कथा' की ओर से काव्य संध्या (18.4.90) का आयोजन किया। 'संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा' के रूप में उनका परिचय दिया गया। ज्ञातव्य है कि जलेस के ही रमेश कुंतल मेघ का विगत दिनों `पूर्वग्रह` में अशोक वाजपेयी के नाम लिखा गया एक पत्र छपा था, जिसका आशय यह था कि भारत-भवन के आयोजन में अवश्य आता (पूर्व स्वीकारोक्ति भी भेज चुका था) लेकिन 'जलेस' की अनुमति न होने के कारण मैं नहीं आ पाऊँगा। क्या भारत भवन के जलसों में शरीक न होने हेतु जलेस का कोई ऐसा निर्देश था? यदि था तो क्या अब उस पर से पाबन्दी हटा ली गयी है?

भैरव प्रसाद गुप्त : रमेश कुंतल मेघ ने जो बात लिखी थी, वो सही है। जलेस की कार्यकारिणी की एक बैठक में भारत भवन की गतिविधियों के सम्बन्ध में चर्चा हुई थी और यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या जलेस के सदस्य उसके समारोहों में सम्मिलित हों? काफी बहस-मुबाहिसे के बाद यह तय हुआ था कि भारत भवन की गतिविधियां, भारत भवन का फोर्ड फाउंडेशन के साथ सम्बन्धित होना और स्वयं अशोक वाजपेयी की विचारधारा ऐसी है, जिससे हमारा कोई भी सहयोग नहीं हो सकता। अगर उनसे हमारा कोई सम्बन्ध हो सकता है तो वह विरोध का ही हो सकता है। ऐसी स्थिति में जलेस के सदस्यों को उसके समारोहों से या उन्हें किसी भी प्रकार का सहयोग देने से बचना चाहिए। इलाहाबाद में 'कथा' की ओर से अशोक वाजपेयी के लिए जो जलसा किया गया, उसके सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि 'कथा' जलेस की पत्रिका नहीं है। हाँ, उसके सम्पादक मार्कण्डेय और जलसे के आयोजकों में शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह जलेस के पदाधिकारी हैं। इन लोगों ने 'कथा' की ओर से जो जलसा किया, मेरा ख्याल है, कि यह समझकर किया होगा कि वे लोग अपनी व्यक्तिगत हैसियत से यह काम कर रहे हैं। उसका सम्बन्ध जलेस से कुछ भी नहीं है। फिर भी इस सम्बन्ध में यह कहना चाहूँगा कि जलेस के जिम्मेदार सदस्यों को, विशेषकर उसके पदाधिकारियों को, ऐसा काम नहीं करना चाहिए था। मुझे यह सुनकर, अन्य लोगों से जिन लोगों ने शिरकत की थी जलसे में, बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ कि इस तरह की बातें जैसी कि आपने अपने प्रश्न में की है, कैसे कहीं गयीं? क्या कोई यह मानने को तैयार होगा कि अशोक वाजपेयी संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा है? संस्कृति का भी क्या कोई समय होता है, जिसे कोई एक लाता हो? संस्कृति को कोई सम्पन्न कर सकता है, संस्कृति का कोई उन्नयन कर सकता है, संस्कृति के प्रति कोई जनता को जागरूक बना सकता है, यह सब तो सही है। क्या अशोक वाजपेयी ने इन कामों में से कोई काम किया? तथाकथित कुलीन संस्कृति का पोषण वे जनता के धन से कर रहे हैं, उससे कुछ कलाकारों का पोषण भले हो, जनता की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा है?

अगर ऐसा कहने का उद्देश्य अशोक वाजपेयी को मस्का लगाना हो, तो मेरा दुःख और भी बढ़ जायेगा। इस तरह की ग़लत और ऊल-जलूल बातें करना ठीक नहीं है। और जलेस के अधिकारियों को तो इस तरह की बातें करनी ही नहीं चाहिए।

अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से, 'पूर्वग्रह' के माध्यम से जो कुछ कर रहे हैं, उन्होंने आज तक जो कुछ किया है और आगे, अगर वे बने रहे तो, जो कुछ करेंगे, हम जानते हैं। बड़े-बड़े जलसे सरकारी पैसे से (म० प्र० सरकार भारत- भवन को पचास लाख रुपये प्रति वर्ष देती है) कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। करोड़ों रुपये खर्च कर इतना बड़ा 'अपना उत्सव' राजीव गांधी ने किया था, उसका क्या परिणाम हुआ? क्या उससे हमारी लोक-संस्कृति का कोई विकास हो गया? क्या उससे दुनिया को मालूम हो गया कि हमारी लोक-संस्कृति क्या है? नहीं भाई, इस तरह संस्कृति के साथ खेलवाड़ पूंजीवादी ही करते हैं। उनके पास धन है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उनके पास साधन है, जितना चाहें प्रचार कर सकते हैं। किन्तु हम तो देखेंगे कि उसका परिणाम क्या होता है? यह सही है कि अशोक वाजपेयी ने कुछ लेखकों को, कुछ चित्रकारों को, कुछ अभिनेताओं गायकों को अपने आस-पास इकट्ठा कर लिया है। लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अशोक वाजपेयी के पास जो शक्ति है, वह तंत्र की शक्ति है, धन की शक्ति है, जिसके बल पर लेखकों को चित्रकारों और गायकों को उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जमा कर रखा है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत भवन लाखों रुपये इन जलसों पर, कलाकारों पर खर्च करता है और यह जानकर कि ये रुपये केवल सही मार्ग से नहीं आते हैं, ग़लत मार्ग से भी आते हैं, फोर्ड फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं से आते हैं, कोई मार्क्सवादी, प्रगतिशील या जनवादी चित्रकार अथवा कलाकार कैसे इनसे सहयोग करेगा? हमें यह देखना चाहिए और समझना चाहिए कि अशोक वाजपेयी क्या कर रहे हैं, अशोक वाजपेयी कोई भारत कला भवन के निर्माता रायकृष्ण दास नहीं हैं, जिन्होंने भारत कला भवन के निर्माण में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। अशोक वाजपेयी एक बड़े नौकरशाह हैं, बहुत मोटी तनख्वाह पाते हैं और भारत-भवन के पदाधिकारी तथा उससे जुड़े लेखक, चित्रकार तथा गायक भी काफी मोटी तनख्वाहें अथवा सुविधा पाते हैं। ये लोग कला तथा संस्कृति की सेवा के नाम पर क्या कर रहे हैं? उनके कामों का जनता के सांस्कृतिक जीवन पर क्या असर पड़ रहा है? हमें यह भी देखना चाहिए कि उन लोगों की इन कामों के पीछे मंशा क्या है, वे किस प्रकार के साहित्य, कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं?

वाजपेयी बार-बार मार्क्सवाद पर आक्रमण करते हैं, साम्यवाद पर आक्रमण करते हैं, प्रगतिवादियों और जनवादियों से हमेशा खार खाये रहते हैं। ऐसे अशोक वाजपेयी को संस्कृति का समय लाने वाला मसीहा, मेरा ख्याल है, कोई प्रगतिवादी या जनवादी तो नहीं कह सकता। ऐसा वही आदमी कह सकता है, जिसका स्वार्थ किसी न किसी रूप में अशोक वाजपेयी से जुड़ा हो, जुड़ने वाला हो या जो चाहता हो कि जुड़े। अशोक वाजपेयी के पास लाभ पहुँचाने के बहुत से साधन हैं। वे लेखकों को, कलाकारों को हवाई जहाज का किराया देकर बुलाते हैं और उनके आतिथ्य में लाखों रुपये खर्च करते हैं। जो इन सब सुविधाओं का भोग करना चाहते हैं, वे निश्चित रूप से उनके पास जायेंगे। उनके लिए अशोक वाजपेयी संस्कृति के मसीहा हो सकते हैं।अशोक वाजपेयी से या किसी से भी हमारी कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। लड़ाई तो उनकी तथा हमारी विचारधारा के बीच है। वे अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं और हम अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं। विचारधाराओं के बीच यह संघर्ष जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। हमारी विचारधारा के मसीहा तो मार्क्स हैं, उनकी विचारधारा के मसीहा कौन हैं, लोगों को साफ़-साफ़ बतायें तो? यदि वे स्वयं मसीहा हैं, तो यही कहें।

विद्याधर शुक्ल : `भारत-भवन के पीछे फोर्ड फाउन्डेशन का भी हाथ है। भारत भवन के क्रिया-कलापों में जनता के पैसे का दुरुपयोग किया जाता रहा है।' इस प्रकार की बातें प्रारम्भ से ही सुनने को मिलती रही हैं। फोर्ड फाउन्डेशन आखिर भारत भवन पर ही क्यों मेहरबान हुआ? भारत भवन के कार्य-कलापों से जन साधारण को क्या लाभ हुआ है? अशोक वाजपेयी भारत भवन, संस्कृति विभाग म० प्र० के अब तक के कार्य-कलापों के बारे में आपकी क्या राय है?

भैरव प्रसाद गुप्त : फोर्ड फाउन्डेशन के साथ भारत भवन का सम्बन्ध स्थापित करने में कृष्ण बलदेव वैद का हाथ होगा। वैद कई वर्षों से भारतीय साहित्य के सम्बन्ध में अमेरिका के सलाहकार थे। मेरा ख्याल है कि उन्हीं के माध्यम से अशोक वाजपेयी का सम्बन्ध फोर्ड फाउन्डेशन से बना होगा, यह सन्देह मुझे इसलिए हो रहा है कि जैसे ही कृष्ण बलदेव वैद अमेरिका की सेवा से मुक्त होकर भारत आये, उन्हें अशोक वाजपेयी ने अपने यहाँ एक बहुत बड़ी जगह दे दी, जहाँ वे अब भी हैं। फोर्ड फाउन्डेशन हमेशा ऐसी संस्थाओं की खोज में रहता है जिनके माध्यम से वह अमेरिकी संस्कृति का प्रचार और समाजवादी संस्कृति का विरोध कर सके। 'इनकाउन्टर' पत्रिका इसका एक उदाहरण है। 'इनकाउन्टर' के सम्पादक को कई वर्षों तक यह पता ही नहीं चला कि 'इनकाउन्टर' किसके पैसे से चल रहा है। 'इनकाउन्टर' लगातार निकलता रहा और रूस का, सोवियत साहित्य का सदा विरोध करता रहा, मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र का विरोध करता रहा, लेकिन सम्पादक को यह पता ही नहीं था कि यह सब कौन करा रहा है। कई वर्षों बाद उसे मालूम हुआ कि 'इनकाउन्टर' सी. आई. ए. के पैसे से चल रहा है। सी. आई. ए. का पैसा हो या फोर्ड फाउन्डेशन का पैसा हो या और भी किसी पूँजीवादी देश या समाजवादी देश का पैसा हो, यह यूँ ही किसी को नहीं दिया जाता। यह पैसा उन संस्थाओं और व्यक्तियों को दिया जाता है जो समाजवाद विरोध का कार्य करते हैं। अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से सच कहा जाय तो समाजवादी विचारधारा का लगातार विरोध ही कर रहे थे। ऐसी संस्था फोर्ड फाउन्डेशन को बहुत उपयोगी लगी होगी और उसने खु़शी से उन्हें धन दिया होगा ताकि वह अपना काम आगे बढ़ा सकें। मैं तो नहीं जानता कि भारत भवन के क्रिया-कलापों से मध्य प्रदेश के जन साधारण को कोई लाभ पहुँचा। भारत भवन में जो कुछ होता है, उससे चंद लोगों को कुछ लाभ भले ही हुआ हो, वहाँ की जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है। भारत भवन का जिस रूप में प्रचार हुआ है, वैसा भारत भवन है नहीं। भारत भवन जैसी ही या उससे बड़ी कई सांस्कृतिक संस्थाएं भारतवर्ष में काम कर रही हैं और भारत भवन से कहीं अधिक लाभकारी काम कर रही हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में इस तरह की तेरह संस्थाएं हैं। उत्तर प्रदेश में भारत कला भवन ही है। भारत भवन को लेकर जितना शोर किया गया सच पूछिये तो उतना काम नहीं हुआ। काम बहुत थोड़ा हुआ है। कुछ संग्रह किये गये हैं वहाँ कुछ कला-चित्रों के, कुछ मूर्तियों के और कुछ काव्य ग्रंथों के। संग्रह से हो सकता है कि वहाँ के जो लोग मूर्तिकार हैं, उनको कुछ लाभ हुआ हो या कला-दीर्घा के चित्रों से हो सकता है कुछ कलाकारों को कुछ लाभ हुआ हो। यह भी हो सकता है कि भारत भवन के प्रचार से प्रभावित होकर कुछ लोग भारत भवन देखने जाते हों लेकिन सचमुच भारत भवन के क्रिया-कलापों से म. प्र. के आम लोगों को कुछ लाभ हुआ हो या उनका सांस्कृतिक जीवन किसी भी रूप में बेहतर हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता। यूँ भी सामान्य लोगों की दिलचस्पी भारत-भवन में केवल इसलिए हो सकती है कि चलो यह भी एक देखने की जगह है, इससे अधिक कुछ नहीं।

अशोक वाजपेयी ने जिस तरह भारत भवन या म. प्र. सरकार के संस्कृति विभाग का कार्य चलाया है, मेरा ख्याल है कि उन्होंने अपनी मर्जी से, अपनी समझ के अनुसार एक विशिष्ट विचारधारा के अन्तर्गत चलाया है। सरकार और फोर्ड-फाउंडेशन का, और सम्भव है कि कुछ अन्य माध्यमों से भी भारत भवन को धन मिलता हो, से जिस तरह के कार्य उन्होंने किये है और जिस तरह के जश्न उन्होंने मनाये है, उनमें अकूत धन खर्च हुआ है। मुझे नहीं मालूम और मैंने देखा भी नहीं है अभी तक, भारत भवन के आय-व्यय के विवरण का लेखा-जोखा अगर वह सामने आये तो मालूम होगा कि उन्होंने इन वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं। यहाँ इतने भारी खर्चे से उन्होंने म. प्र. के सांस्कृतिक जीवन में कौन सा परिवर्तन किया है, यह समझ में आने वाली बात नहीं है। भारत-भवन के माध्यम से उन्होंने कुछ संस्कृति-कर्मियों को इकट्ठा किया है, उनमें प्रमुख स्वामीनाथन हैं। उन्हें उन्होंने आजीवन ट्रस्टी बनाया था और कला दीर्घा का निदेशक भी। भारत भवन से सम्बद्ध होने से पहले स्वामीनाथन दिल्ली की सड़कों पर घूमते नजर आते थे। स्वामीनाथन, निर्मल वर्मा और कभी-कभी श्रीकांत वर्मा नाम को वहाँ किसी होटल में एक साथ दिखाई पड़ते थे, स्वामीनाथन का हाल यह था कि वह दिन में कहीं न कहीं कोई काम करके विशेषकर लिंक हाउस में 'लिंक' का आवरण बनाकर कुछ पैसा बनाकर लाते थे और उसे शाम को वे खर्च कर देते थे, लेकिन जब से भारत भवन के साथ उनका सम्बन्ध हुआ, उनका जीवन ही बदल गया, उनकी कला के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह असामाजिक है, उनका कोई भी कार्य मैंने नहीं देखा जिसका कोई मतलब हो, यों भी उनकी मान्यता है कि एक चित्रकार को कुछ सोचकर चित्रकारी नहीं करनी चाहिए बल्कि ब्रश उठाना चाहिए और उसे कैनवस पर चला देना चाहिए। जो चित्र बनेगा वही चित्र होगा, वे बोहेमियन हैं और ऐसा एक बोहेमियन चित्रकार कलादीर्घा में क्या कर सकता था, उसका नमूना भारत भवन की कला दीर्घा है, इसी तरह कई लेखक और रंग-कर्मी भारत भवन से सम्बद्ध हुए जैसे निर्मल वर्मा हैं, पहले नामवर सिंह का भी सम्बन्ध भारत भवन से बना था जो काफी दिन तक चला। नेमिचंद जैन तो लिखित रूप से किसी रूप में भारत भवन से संबद्ध नहीं थे लेकिन प्रायः वे भारत भवन के कार्यक्रमों में भाग लेने जाते रहे, अब इधर नामवर सिंह का सम्बन्ध टूटा है, रघुवीर सहाय को तो अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन में हिन्दी का प्रतिनिधि कवि बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, जो हो, कुछ न कुछ लेखक सदा भारत भवन की ओर जाते रहे हैं और इस तरह से भारत भवन का काम चलता रहा।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी, जैसा आपने कहा कि ये लोग लाभ उठाते हैं लेकिन लाभ उठाने वालों में आपने मार्क्सवादी लोगों का नाम नहीं लिया जैसे त्रिलोचन जी, शमशेर बहादुर जी पीठ पर बैठे। इन लोगों में दो दूसरे तरह के लोग हैं, जैसे- नरेश मेहता, निर्मल वर्मा हैं, जिक्र तो ऐसे लोगों का करना है जो लोग अपने को वामपंथी तेवर का लेखक कहते हैं और उसकी भुनाते हैं। असल में मैं इन्हीं मुद्दों पर आपसे कुछ जानना चाहता हूँ।

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं इस बात पर आना ही चाहता था। यह अच्छा हुआ कि आपने मुझे टोक दिया। अशोक वाजपेयी एक तपे हुए नौकरशाह है। वे अपना काम किस तरह करें, उन्हें मालूम है। वे प्रत्यक्ष रूप से यह प्रगट करना कभी भी नहीं चाहेंगे कि दरअसल वे क्या करना चाहते हैं। वे बहुत ही गोपनीय या यों कहिए कि छद्म रूप से अपना काम करते हैं। वे यह कभी प्रगट करना नहीं चाहते हैं कि वे किसी विशिष्ट धारा के मानने वाले और पोषक हैं। वे प्रगट यह करना चाहते हैं कि वे सभी विचारधाराओं के लेखकों और कलाकारों को भारत-भवन से सम्बद्ध करना चाहते हैं। जाहिर है कि एक बहुत ही चतुर नौकरशाह यह काम कर सकता है और बखू़बी निभा सकता है। बहुत दिनों तक वाजपेयी ने यह मुखौटा धारण किया और इसी के तहत उन्होंने कुछ प्रगतशिलों को, जैसे विशेषकर नामवर सिंह को, हरिशंकर परसाई को तथा अन्य लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। हम लोगों को स्वयं बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि क्या बात है, क्योंकि नामवर जी को मैं किसी भी रूप में ऐसे मार्क्सवादी के रूप में स्वीकार नहीं करता कि वह कोई भी काम ऐसा करें जो उनकी विचारधारा के विरुद्ध हो। लेकिन वह बार-बार उनके जंजालों में जाते थे। उसी तरह हरिशंकर परसाई हैं, वे भी अपने को मार्क्सवादी और शायद कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी कहते थे, कैसे वे उनके जाल में फँस जायेंगे। लेकिन ये चीजें चलती रही। ये एक नौकरशाह के काम करने का अपना तरीका था। वह यह दिखलावा लोगों के सामने करता था कि उसका कोई विशिष्ट विचार नहीं है। वह सभी लोगों को आमंत्रित करता है। वह मार्क्सवादियों को आमंत्रित करता है, वह गैर मार्क्सवादियों को भी आमंत्रित करता है और उसकी कोशिश यह है कि सब लोग मिलकर किसी विशिष्ट विषय पर बात करें और लोगों का यह सोचने का मौका दे कि क्या सही है और क्या गलत है, दरअसल अशोक वाजपेयी जो काम करते थे, उसमें चाहे परचाई हो या नामवर हो या इनके जैसे और कोई म. प्र. के लोग हों, वे देखें और समझें कि अशोक वाजपेयी किसी विशेष विचारधारा के साथ पक्षपात नहीं कर रहे हैं लेकिन अशोक वाजपेयी इस परदे के पीछे अपना काम सही रूप में कर रहे थे। इनके जश्न की जो रिपोर्ट आती थी, उससे स्पष्ट होता था कि किस विचारधारा का पलड़ा भारी रहता था। नामवर सिंह ने अपने भाषणों में, जहाँ तक मैंने पढ़ा है, सुनने का तो मुझे कोई अवसर नहीं मिला। क्योंकि मैं भारत भवन तक तो नहीं गया। मैं बार-बार जश्न का नाम ले रहा, इसलिये कि मैं समझता हूँ कि वो जश्न ही थे। इस माने में जश्न थे कि जैसे दरबारों में पहले कभी हुआ करते थे, जहाँ राजाओं के, नवाबों के दरबारी इकट्ठा होते थे उसी तरह से अशोक वाजपेयी के दरबार में ये लेखक, चित्रकार गायक, अभिनेता, रंगकर्मी एकत्रित होते थे और अपनी बातें करते थे। मेरे कहने का मतलब यह है कि अशोक वाजपेयी ने कभी भी एक क्षण के लिए यह नहीं सोचा कि संस्कृति का कोई संबंध जनता से भी है। वे हमेशा सफेदपोशों के बीच घिरे रहे या यों कहना चाहिये कि अपने चारों ओर सफेद पोश कलाकारों को एकत्रित करते रहे। जैसा कि मैंने पहले कहा कि नामवर जी के भागीदारी के सम्बन्ध में हम लोगों को बराबर आश्चर्य होता रहता कि ये क्यों जाते हैं। ये क्यों भारत भवन के आयोजनों में हिस्सा लेते हैं जब कि ये जानते हैं कि अशोक वाजपेयी की विचारधारा क्या है और वे भारत-भवन द्वारा कौन सा काम करना चाहते हैं, फिर भी क्यों जाते हैं, आखिर वो दिन आया जब कि नामवर सिंह ने अपना सम्बन्ध पूर्णरूप से विच्छेद कर लिया और वहाँ जाना-आना बन्द कर दिया। जहाँ तक निर्मल वर्मा और रघुवीर सहाय का सम्बन्ध है या विजय मोहन सिंह का सम्बन्ध है—ये लोग तो सचमुच अशोक वाजपेयी की विचारधारा के ही लोग हैं। इन लोगों का वहाँ बने रहना या जब तक अशोक वाजपेयी वहाँ रहेंगे, उस वक्त तक बने रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जहाँ तक कि शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन शास्त्री का सवाल है—शमशेर बहादुर सिंह आजीवन बहुत ही दुखी और परेशान व्यक्ति रहे हैं। शमशेर बहादुर सिंह से मेरा सम्बन्ध बहुत पुराना और बहुत दिनों का है। उन्होंने मेरे सहयोगी के रूप में जिसे अब वे स्वीकार करने के लिए कहीं भी किसी भी रूप में तैयार नहीं हैं, कई वर्षों तक काम किया। उनके काम करने का ढंग और काम करने की समझ के बारे में मैं जानता हूँ और मैं यह कह सकता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह कवि चाहे जैसे हों जहाँ तक काम का सम्बन्ध है, वे बिल्कुल बेकार के आदमी हैं।

अशोक वाजपेयी को ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी जो परेशान हों। हमारे त्रिलोचन शास्त्री भी उसी तरह एक परेशान व्यक्ति हैं। बिहार की किसी पत्रिका में यह पढ़कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और दुख भी। दुख इसलिये कि त्रिलोचन शास्त्री को मैं एक स्वाभिमानी कवि के रूप में देखता और समझता था। केदारनाथ सिंह किसी गोष्ठी में जिसकी रिपोर्ट बिहार की एक पत्रिका में छपी थी, उसमें यह कहा कि एक दिन मैं त्रिलोचन शास्त्री के यहाँ सुबह-सुबह पहुँचा तो देखा कि त्रिलोचन सूखी रोटी गुड़ के साथ खा रहे हैं। मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ। जाहिर है कि केदार सिंह को तो दुख होता है क्योंकि......

विद्याधर शुक्ल : क्योंकि सामंत किस्म के आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : वे जवाहर लाल नेहरू वि. वि. में प्राध्यापक हैं।

विद्याधर शुक्ल : और घर के भी सम्पन्न आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : घर के सम्पन्न आदमी हैं। जमींदार किस्म के परिवार के रहने वाले हैं। उनको तो दुख होता ही क्योंकि रोटी के साथ गुड़ तो आमतौर पर आम लोगों के जलपान की चीज़ है लेकिन उन्हें दुख हुआ क्योंकि वे समझते थे कि त्रिलोचन शास्त्री जैसा महान कवि यह क्या यह नाश्ता कर रहा है। इसे तो ऐसा नाश्ता करना चाहिए जो कि केदारनाथ स्वयं अपने घर में करते हैं। केदारनाथ सिंह का कहना यह था कि मैंने तुरन्त अशोक वाजपेयी को पत्र लिखा कि—हे अशोक वाजपेयी, एक महान कवि जिसका नाम त्रिलोचन शास्त्री है, वह इस परिस्थिति में पड़ा हुआ है कि वह रोटी गुड़ का जलपान करता है फिर उन्होंने कहा कि अशोक वाजपेयी इतने उदार हैं, इतने महान हैं कि उन्होंने त्रिलोचन को एक पीठ पर आसीन कर दिया। वैसे ही शमशेर बहादुर सिंह को भी एक पीठ पर अशोक वाजपेयी ने आसीन किया था। शमशेर बहादुर भी त्रिलोचन शास्त्री से कहीं अधिक परेशान थे। इलाहाबाद में जो उनकी स्थिति थी, हम लोग अच्छी तरह से जानते हैं फिर वे दिल्ली गये। दिल्ली में भी उनकी हालत बदतर रही। मतलब ये कि शमशेर बहादुर सिंह हमेशा दूसरों की सहायता, दूसरों की मदद, दूसरों की कृपा पर अपना जीवन व्यतीत करते रहे। मैं कहूँगा कि उनमें स्वयं ऐसी योग्यता नहीं थी कि वे अपनी कमाई अपनी योग्यता की या अपने काम की कमाई खा सकते। कभी प्रभाकर माचवे ने कृपा कर दी, कही कोई काम दिला दिया, कभी मैंने कृपा कर दी, उन्हें अपने पास रख लिया। इसी प्रकार कभी अज्ञेय ने कृपा कर दी, कुछ रुपये दे दिये। मतलब, इसी तरह से उनका जीवन निर्वाह होता रहा। लेकिन अशोक वाजपेयी ने उन्हें एक पीठ पर आसीन करके उन्हें कुछ वर्षों के लिये स्थायी जगह दे दी। फिर तो साहब कमाल ही हो गया। कमाल ये हो गया कि उन्हें दो-दो बड़े पुरस्कार अशोक वाजपेयी ने दिया और उनके बुढ़ापे का पूरा इन्तजाम कर दिया। इतना ही करते तो कोई बात नहीं, उन्होंने यहभी सिद्ध कर दिया कि वे भारतवर्ष के सबसे महान कवि हैं। मुझे आश्चर्य होता है, एक पुरस्कार 51 हजार का पहले दिया,जो बाद में त्रिलोचन को भी मिला, फिर कबीर पुरस्कार। खैर! पुरस्कार उनके पास पैसा है, किसी को भी दें। मैं तोहमेशा यह कहता हूँ कि कोई मालिक अपने गधे को मलीदा खिलाये तो हमको क्या आपत्ति हो सकती है, बहुत अच्छा है। कम से कम गधे को मलीदा खाने को तो मिल रहा है। लेकिन मुझे आश्चर्य उस सम्बन्ध में होता कि पुरस्कार समिति के बहुत सारे अहिन्दी भाषा-भाषी कवियों और लेखकों की रिपोर्टों में कहा गया कि उन सबों ने यह भी स्वीकार किया कि शमशेर बहादुर भारत के सबसे महान कवि हैं। मुझे नहीं मालूम कि इन प्रादेशिक भाषाओं के कवियों ने शमशेर बहादुर सिंह की एक पंक्ति भी पढ़ी है या नहीं।

शमशेर बहादुर सिंह अपने बारे में जब कुछ लिखते हैं तो बहुत सारी झूठी बातें लिखते हैं यहाँ से वहाँ तक। वे भैरवप्रसाद गुप्त को नहीं याद करते हैं क्योंकि भैरव प्रसाद गुप्त तो हमेशा प्रगतिशील रहा है और हमेशा रहेगा। इसी सन्दर्भ में, मैं शमशेर बहादुर सिंह के सम्बन्ध में एक बात और कह देना जरूरी समझता हूँ। शायद यही कारण हो जिससे शमशेर बहादुर सिंह ने अशोक वाजपेयी जैसे मार्क्सवाद विरोधीसे सम्पर्क किया। मेरे साथ उन्होंने कई वर्षों तक काम किया। वे लिखते हैं कि माया का मैं सहायक-सम्पादक था। असल में सहायक सम्पादक नहीं, उप सम्पादक थे। मैंने उन्हें यह काम दिया था कि वे कहानियाँ पढ़ें और कहानियों के बारे में अपनी नोटिंग दें। आज मैं बता रहा हूँ और आपको सुनकर आश्चर्यहोगा कि जिन कहानियों पर शमशेर बहादुर सिंह 'एवन' की नोटिंग करते थे, उन कहानियों को भी मैं कभी नहीं छाप सका। खैर शमशेर काम करते रहे, तनख्वाह लेते रहे लेकिन मालिक तो काम देखते हैं, लेकिन मेरी आदत शुरू से है कि मैं अपने मातहतों के विरुद्ध मालिक को कोई रिपोर्ट नहीं देता था कभी भी। जब मालिक कभी पूछते थे तो मैं कह देता था ठीक है, काम चल रहा है, कोई परेशानी की बात नहीं। लेकिन मालिक की एक नजर होती है। वह देखता रहता है। मैंने बता दिया था कि मेरे पास 'कहानी' में सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। पर शमशेर बहादुर सिंह माया प्रेस से निकाल दिये गये। फिर वे जैसे रहते थे, रहने लगे। काफी परेशानी में वे बेचारे। क्योंकि उनकी कुछ आदतें ऐसी थी, कुछ शौक ऐसे थे कि वे हमेशा परेशानी में रहते थे। आमदनी नहीं देखते थे, खर्चा करते जाते थे।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी असली सवाल पर आवें। शमशेर बहादुर सिंह तो कवियों के कवि हैं जैसा कि बहुत से लोग और मैं भी मानता हूँ। मैं आप से पूछ सकता हूँ कि क्या शमशेर बहादुर सिंह की कोई कविता या उसके कुछ अंश भी आपको याद हैं या अन्य किसी कवि-लेखक की कोई कविता याद है? नागार्जुन की कविताएँ लोगों की जुबान पर हैं कुछ अंशों तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ लोगों के याद हैं, सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने किस तर्क पर उन्हें सबसे बड़ा कवि मान लिया। उन्हें जनकवि तो कहा नहीं जा सकता। विगत वर्षों में प्रगतिशीलों ने और अशोक वाजपेयी ने केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह को और मजबूरन नागार्जुन को माना लेकिन इन तीनों की श्रेणी में शमशेर बहादुर सिंह कहाँ आते हैं। सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने ऐसे कवि को सबसे महान कवि घोषित किया, अशोक वाजपेयी के इस गैर साहित्यिक रवैये पर आप का कहना चाहेंगे?

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं कहना यह चाहता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह एक कवि के रूप में मध्य प्रदेश में ही प्रतिष्ठित रहे हैं जबसे उनका सम्बन्ध अशोक वाजपेयी से बना, पूर्वग्रह और 'साक्षात्कार' में जिस रूप में शमशेर पर प्रचार किया गया, वह निश्चय ही शमशेर बहादुर सिंह के सही रूप में कवि की हैसियत नहीं थी। उसके पीछे अशोक वाजपेयी के कुछ अपने मन्तव्य थे, कुछ लक्ष्य थे जिसके अनुसार उन्होंने शमशेर बहादुर के साथ व्यवहार किया और शमशेर को चूँकि जीवन में एक तरह से पहला अवसर मिला आराम का, जब कि वे आराम से रह सकते थे,उन्होंने इसे स्वीकार किया था और अब भी स्वीकार करते हैं और अब उसी को भोग रहे हैं। मैं जो कहने जा रहा था आपके उसी प्रश्न के सन्दर्भ में है। जब वे माया प्रेस छोड़कर फिर उसी बेकारी के जीवन में आ गये। बेकारी का जीवन यानी परेशानी का जीवन। जैसे एक बोहेमियन होता है जिसको कोई भी परवाह नहीं होती, क्या आमदनी है, क्या खर्चा है? वे जीवन को व्यवस्थित ढंग से चलाने की कोई परवाह या प्रयास भी नहीं करते। कर्ज हो जाय या कोई परेशानी हो जाय, वे उसकी परवाह नहीं करते। जैसे चल रहा है, जीवन चल रहा है, चलने दो। जैसे वह चले, चलेगा। उन्हीं दिनों एक दिन अचानक मुझसे शमशेर बहादुर सिंह की इलाहाबाद चौक में नीम तले मुलाकात हो गयी। नमस्कार के बाद बिना किसी अन्य बातचीत के उन्होंने कहा—'कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर अगर मैं बना रहता तो मेरा कवि मर जाता। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर मैंने अपने कवि को बचा लिया।' अचानक उन्होंने ये बात कही। जवाब में मेरे मुँह से निकल गया कि मैं देखूँगा कि आप कैसे कवि बनते हैं। आप इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि अब तक आप जिस कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुये हैं, उसका बहुत सारा श्रेय कम्युनिस्ट पार्टी को है। आपके बम्बई के जीवन को है, इलाहाबाद के जीवन को है। उसके बाद हमारी कोई बातचीत नहीं हुई। वे अपनी राह चले गये, मैं अपनी राह। बाद में जो भी बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं। मैं उनमें नहीं जाना चाहता। वे मध्य प्रदेश पहुँचे, अशोक वाजपेयी की उन पर कृपा हुई। उनके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था हो गई। अशोक वाजपेयी को ऐसे लोगों की तलाश रहती है, किसी जमाने में अज्ञेय को भी ऐसे कवियों, ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी। ऐसे कवियों की सहायता करने के लिये वे तैयार रहते थे। जैसे रघुवीर सहाय हैं, अब भूल गये होगें, अज्ञेय ने उनकी मदद की। खैर, इस प्रकरण में मैं नहीं जाना चाहता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। मुझे इन लोगों का बड़ा अनुभव रहा है। यह सब मैं कहने लगूँ तो लम्बा प्रसंग हो जायगा। मेरे कहने का लब्बो-लबाब यह है कि ये लोग कभी भी नहीं सोच सकते कि संस्कृति का सम्बन्ध जनता से होता है। अशोक वाजपेयी ने सफेदपोशों को ही संस्कृति का कर्ता-धर्ता मान लिया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि संस्कृति के सारे स्रोत आम जनता से ही निकलते हैं।

(जनवादी लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष भैरव प्रसाद गुप्त का यह साक्षात्कार वर्तमान साहित्य के अगस्त 1990 अंक से साभार।)




Tuesday, September 8, 2026

नामवर सिंह पर उर्मिलेश का ऐतिहासिक लेख

जेएनयू में नामवर सिंहः जैसा देखा, जैसा पाया

-उर्मिलेश

(समयांतर के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)



 पिछले दिनों एक किताब आई है-‘जेएनयू में नामवर सिंह।’ इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। संपादन किया है- जेएनयू की पूर्व छात्रा सुमन केशरी ने, जो अब एक वरिष्ठ अधिकारी व कवयित्री हैं। किताब की योजना जब बन रही थी तो राजकमल प्रकाशन के संचालक अशोक माहेश्वरी और सुमन ने इस किताब के लिए मुझसे भी लेख मांगा। उस वक्त, मैं लिख नहीं सका। नामवर जी के संदर्भ में जेएनयू दिनों के अनुभवों को मैं लिखना तो चाहता था पर मुझे लगा, यह एक अभिनंदनात्मक ग्रंथ होगा और उसमें लेख देकर मैं अपने अनुभवों की प्रस्तुति के साथ शायद न्याय नहीं कर सकूंगा। हालांकि किताब छपकर आई तो मुझे अच्छा लगा कि सुमन का संचयन कुल मिलाकर ठीक-ठाक है, उसमें सिर्फ अभिनंदन ही नहीं है।


निस्संदेह, डा. नामवर सिंह एक प्रभावशाली वक्ता और समकालीन हिन्दी समाज एवं उसकी सांस्कृतिक राजनीति में दबदबा रखने वाले प्रतिभाशाली बौद्धिक व्यक्तित्व हैं। वह समय-समय पर अपनी टिप्पणियों और फैसलों से विवाद भी पैदा करते रहते हैं। जैसे हाल ही में उन्होंने आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ टिप्पणी करके सबको स्तब्ध कर दिया। प्रगतिशील लेखक संघ की 75वीं वर्षगांठ पर लखनऊ में आयोजित एक विशेष समारोह में 8 अक्तूबर, 2011 को उन्होंने कहा, ‘आरक्षण के चलते दलित तो हैसियतदार हो गए हैं लेकिन बाम्हन-ठाकुर के लड़कों की भीख मांगने की नौबत आ गई है।‘(दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, 9 और 10 अक्तूबर, 2011, लखनऊ संस्करण)।
अपने समय के एक बड़े ‘प्रगतिशील’ लेखक-आलोचक-शिक्षक की इस टिप्पणी पर समारोह में बैठे लेखक-प्रतिनिधि हैरत में रह गए। कइयों ने लिखकर इसका प्रतिवाद किया। (‘शुक्रवार’, 28 अक्तूबर-3 नवम्बर, 2011 अंक, दिल्ली)।

पुस्तक में नामवर जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को कमोबेश कवर किया गया है। पर कुछेक पहलू छूट गए हैं। उनके एक छात्र (अयोग्य ही सही) और हिन्दी का एक अदना सा पत्रकार होने के नाते मेरे मन में हमेशा एक सवाल कुलबुलाता रहा है, ‘नामवर सिंह ने इतने लंबे समय तक देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्षता की, उसका मार्गदर्शन किया, इसके बावजूद यह केंद्र (उनके कार्यकाल के दौर में) देश में भारतीय भाषाओं के साहित्य व भाषा के अध्ययन-अध्यापन और शोध क्षेत्र में कोई वैसा बड़ा योगदान क्यों नहीं कर सका, जिसकी इससे अपेक्षा की गई थी!

अपने लंबे कार्यकाल के बावजूद वह इसे सही अर्थों में भारतीय भाषाओं का केंद्र क्यों नहीं बना सके?’ चूंकि इस विषय पर मेरा कोई विशद अध्ययन और शोध नहीं है, इसलिए सवाल का कोई ठोस जवाब भी नहीं दे सकता। लेकिन केंद्र के छात्र के तौर पर तक़रीबन चार-सवा चार साल जेएनयू में रहने का मौक़ा मिला, उसके नाते यहां सिर्फ़ अपने कुछ अनुभव बांट सकता हूं।

आज इस लेख के ज़रिए मैं जेएनयू में अपने जीवन के भी सबसे अहम और निर्णायक समय को याद कर रहा हूँ। लेकिन यह कोई मेरी निजी कहानी नहीं है। भारत के शैक्षणिक जगत, खासकर उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी असंख्य कहानियाँ भरी पड़ी हैं। मेरे विश्लेषण से किसी को असहमति हो सकती है पर तथ्यों और उससे जुड़े घटनाक्रमों से नहीं। यह सिर्फ़ मेरा, नामवर जी या जेएनयू के ‘प्रगतिकामी’ हिन्दी प्राध्यापकों-प्रोफे़सरों का ही सच नहीं है, सम्पूर्ण हिन्दी क्षेत्र में व्याप्त बड़े बौद्धिक सांस्कृतिक संकट, कथनी-करनी के भेद, हमारे शैक्षणिक जीवन, खासकर विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के हिन्दी विभागों की बौद्धिक-वैचारिक दरिद्रता का भी सच है। कुछेक को मेरी यह टिप्पणी गै़र-ज़रूरी या अप्रिय भी लग सकती है। ऐसे लोगों से मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। पर मुझे लगा, हिन्दी विभागों, हिन्दी विद्वानों और हम जैसे छात्रों का यह सच सामने आना चाहिए।

शुरुआत जेएनयू में अपने एडमिशन से करता हूं। बात सन 1978 की है। मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए (अंतिम वर्ष) की परीक्षा दी। प्रथम वर्ष में प्रथम श्रेणी के नंबर थे। फाइनल में भी प्रथम श्रेणी आने की उम्मीद तो थी पर अपनी पोजिशन को लेकर आश्वस्त नहीं था। अपने विश्वविद्यालय में उन दिनों पीएच.डी. के लिए सिर्फ एक ही यूजीसी फेलोशिप थी। पहली पोजिशन वाले को ही फेलोशिप मिल सकती थी। डा. रघुवंश के रिटायर होने के बाद विभाग में डा. जगदीश गुप्त का ‘राज’ चल रहा था। वह मुझे पसंद नहीं करते थे। शायद मेरी दो बातें उन्हें नागवार गुजरती रही हों-एक, विश्वविद्यालय की वामपंथी छात्र-राजनीति में मेरी सक्रियता और दूसरी, डा. रघुवंश और दूधनाथ सिंह आदि जैसे शिक्षकों से मेरी बौद्धिक-वैचारिक निकटता।

फेलोशिप के बगैर पीएच.डी. करना मेरे लिए बिल्कुल संभव नहीं था। मेरी पारिवारिक स्थिति बहुत ख़राब थी। ऐसे में मित्रों ने सलाह दी कि इलाहाबाद के अलावा मुझे जेएनयू में भी एडमिशन की कोशिश करनी चाहिए। वहां फेलोशिप भी ज्यादा हैं, इसलिए एडमिशन मिल गया तो फेलोशिप पाने की संभावना भी ज़्यादा रहेगी। मित्रों की सलाह पर जेएनयू में एडमिशन के लिए ‘आल इंडिया टेस्ट’ में बैठा। रिजल्ट आया तो पता चला, मैंने सन 1978 बैच में टॉप किया है। यूजीसी फेलोशिप मिलना तय। लेकिन अभी तक एमए अंतिम वर्ष का मेरा रिजल्ट नहीं आया था।

सन 1975-77 के दौर में इमर्जेन्सी-विरोधी आंदोलनों का हमारे कैम्पस पर भी प्रभाव पड़ा था। परीक्षाएं विलम्ब से हुई थीं, इसलिए रिजल्ट में भी देरी हो रही थी। जेएनयू प्रवेश परीक्षा नियमावली के तहत एमए फाइनल का रिजल्ट आए बगैर भी कोई अभ्यर्थी प्रवेश पा सकता था। लेकिन एडमिशन के बाद एक निश्चित अवधि के अंदर उसे अपना रिजल्ट जमा करना होता था। जेएनयू में एम.फिल. की पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई। मेरे नाम यूजीसी की फेलोशिप भी घोषित हो चुकी थी। भारतीय भाषा केंद्र के उस बैच में जिन अन्य लोगों को फेलोशिप मिली, उनमें रवि श्रीवास्तव, अरुण प्रकाश मिश्र आदि प्रमुख थे। यह सभी मित्र आज किसी न किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष हैं।

दर्शनशास्त्र में शोध कर रहे गोरख पांडे का कमरा (संभवतः 356, झेलम होस्टल) मेरा पहला पड़ाव बना। अभी होस्टल नहीं मिला था। वह जितने तेजस्वी दार्शनिक थे, उतने ही सृजनशील कवि और गीतकार थे। फ़कीराना ढंग से रहते थे। किसी बात की परवाह नहीं करते थे। पूरे जेएनयू में अपने कि़स्म के अकेले छात्र थे, बिल्कुल फ़कीर-वामपंथी। उनकी सारी ‘प्राइवेट-प्रापर्टी’ छोटे से तख्त पर बिछे मैले गद्दे के नीचे फैली रहती थी। चाय पीने या कहीं बाहर जाना होता था तो वह गद्दा हटाते और तख्त पर बिखरे रुपयों में कुछ रकम निकाल कर चल देते थे। पांडे जी के जरिए ही जेएनयू स्थित रेडिकल स्टूडेंड्स सेंटर (आरएससी) के छात्रों-कार्यकर्ताओं से परिचय हुआ। आरएससी एक ढीला-ढाला संगठन था, उसमे कार्यकर्ता कम, बुद्दिजीवी ज्यादा थे। पर काफी पढ़े लिखे थे।

उनके कमरों में मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे और कास्ट्रो के अलावा क्रिस्टोफर काडवेल, रेमंड विलियम्स, राल फाक्स, गुन्नार मिरडल, ज्यां पाल सात्र, सिमोन, राल्फ मिलीबैंड, समीर अमीन, रजनी पामदत्त, रोमिला थाफर और इरफान हबीब आदि की किताबें भरी रहती थीं। इनमें कुछ हमारे सीनियर थे और कुछ समकक्ष। जल्दी ही इनसे मैत्री हो गई। इनमें ज्यादातर को मेरे बारे में मालूम था कि इलाहाबाद में मैं एसएफआई से और बाद के दिनों में पीएसए नामक स्वतंत्र किस्म के वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा था। बाद के दिनों में यही पीएसए प्रगतिशील छात्र संगठन (पीएसओ) बना। इलाहाबाद के अलावा जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी यह सक्रिय रहा। पीएसओ से मेरी सम्बद्धता के बावजूद जेएनयू स्थित एसएफआई के दो-तीन नेताओं से मेरा सम्बन्धी अपेक्षाकृत ठीकठाक था।
इनमें प्रवीर पुरकायस्थ प्रमुख थे। वह अपने इलाहाबाद के ‘सीनियर’ थे। अपना कमरा मिलने के बाद मैं गोरख के झेलम वाले कमरे से ब्रह्मपुत्र (पूर्वांचल) होस्टल चला गया। लेकिन मुलाक़ात हमेशा होती रहती थीं। कैम्पस में वह मेरे लिए एक बड़े भाई की तरह थे। पर उनकी कुछ समस्याएं भी थीं। निशात कैसर उनके समकक्ष और मैं बहुत जूनियर था। पर कैंपस में सिर्फ़ हम दोनों ही किसी बात पर उन्हें डांट-फटकार सकते थे। अनेक मौकों पर वह हमारी बात मान भी जाते थे।

केंद्र में एमफिल कक्षाओं और सेमिनार पेपर आदि का दौर शुरू हो चुका था। डा. नामवर सिंह को केंद्र का चेयरमैन पाकर हम जैसे दूर-दराज से आए छात्र गौरवान्वित महसूस करते थे। उन्हें पहले भी (इलाहाबाद और बनारस में) देखा-सुना था। पर यहां तो वह साक्षात् हमारे प्रोफेसर के रूप में सामने थे। निस्संदेह, वह बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। साहित्यिक आलोचना और साहित्येतिहास जैसे विषयों पर उन्हें सुनना एक अनुभव था। इलाहाबाद में मेरे लिए सबसे आदरणीय अध्यापक डा. रघुवंश थे और सबसे अच्छे व दोस्ताना अध्यापक दूधनाथ सिंह। मेरी नजर में पहला एक आदर्शवादी-मानववादी था तो दूसरा सृजनशील यथार्थवादी। पर जेएनयू में डा. नामवर सिंह को सुनने के बाद लगा कि हिन्दी और साहित्येतिहास के मामले में वह ज्ञान के सागर हैं। यूरोपीय साहित्य आदि की भी उनकी जानकारी बहुत पुख्ता है। पर उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मुझे बहुत परेशान करता था। वह रहन-सहन और आचरण-व्यवहार में किसी सामंत (फ्यूडल) की तरह नजर आते थे।

केंद्र के कुछेक छात्र उनका पैर छूते थे। कुछ छात्र तो उनके घर के रोजमर्रे के कामकाज में जुटे रहते थे। वह जब चलते, कुछ छात्र और नए शिक्षक उनके पीछे-पीछे चलने लगते। कुछ लोग उनकी बिगड़ी चीजें बनवाने में लगते तो कुछेक ऐसे भी थे, जो नियमित रूप से कैम्पस स्थित उनके फ्लैट जाकर गुरुवर का आशीर्वाद ले आया करते थे। हमारे एक मित्र सुरेश शर्मा ने तो बाकायदा लेख लिखकर बताया है कि नामवर जी की एक खास घड़ी जब खराब हुई तो उसे बनवाने में उन्होंने दिल्ली की खाक छान मारी पर नामवर जी ने सुयोग्य होने के बावजूद जामिया सहित कई जगहों पर हुई नियुक्तियों में उनकी कोई मदद नहीं की। उनसे काफी जूनियर और योग्यता में नीचे के लोगों की नियुक्तियां करा दीं (अभी कुछ ही दिनों पहले पता चला कि उक्त लेख के छपने के कुछ समय बाद सुरेश जी (इस समय उनकी उम्र 57-58 से कम नहीं होगी) वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो गए। संयोगवश, नामवर जी ही विश्वविद्यालय के चांसलर हैं। अगर उनकी पहल पर सुरेश जी नियुक्त हुए तो इसे ‘गुरुवर’ का प्रशंसनीय प्रायश्चित कहा जा सकता है। लेकिन विश्वविद्यालय के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक उनकी नियुक्ति की पहल कुलपति वीएन राय की ओर से हुई।

अपने नामवर जी की तरह इलाहाबाद के डा. रघुवंश ‘मार्क्सवादी’ नहीं, पर छात्रों-शिक्षकों के प्रति नजरिए में वह ज्यादा सहज और लोकतांत्रिक थे। दूधनाथ सिंह तो खैर वामपंथी रहे हैं। दिल्ली के नामीगिरामी मार्क्सवादी (हिन्दी) आलोचकों-शिक्षकों के मुकाबले निजी और प्रोफेशनल जीवन में वह भी ज्यादा सुसंगत और लोकतांत्रिक नजर आते थे। मुझे आज भी याद है। उन दिनों मेरा एक छोटा सा सर्जिकल-आपरेशन हुआ था और मैं डायमंड जुबिली होस्टल के कमरा नंबर 38 में लेटा रहता था। एक दिन अचानक देखा, दूधनाथ और डा. मालती तिवारी मुझे देखने मेरे कमरे में आ गए।

ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं था, दूसरे छात्रों के साथ भी रघुवंश, दूथनाथ या मालती तिवारी जैसे शिक्षकों का व्यवहार आमतौर पर ज्यादा मानवीय और उदार था। कम से कम वे ‘साइकोफैंसी’ को रिश्तों का आधार नहीं बनाते थे। मेरा उनसे विधिवत परिचय एमए प्रथम वर्ष के परीक्षाफल आने के बाद ही हुआ। इसके पहले वह मुझे ठीक से जानते भी नहीं थे। प्रथम वर्ष में जो पेपर वह पढ़ाते थे, उसमें मुझे सर्वोच्च अंक मिले थे। फिर उनसे क्लास के बाहर भी संवाद का सिलसिला बन गया। पर जेएनयू के जनवादी माहौल के बावजूद मुझे कम से कम भारतीय भाषा केंद्र में इस तरह के माहौल का अभाव दिखा।

नामवर जी अपने कुछ ‘खास शिष्यों’ से ही ज्यादा संवाद करते थे। ऐसे लोगों ने गुरुदेव की सेवा का मेवा खूब खाया। इनमें कुछ नामी विश्वविद्यालयों-संस्थानों में हैं तो कुछेक सरकारी सेवा में भी। लेकिन हमारे सीनियर्स में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें प्रतिभाशाली माना जाता था, पर गुरूदेव का शायद उन्हें उतना समर्थन-सहयोग नहीं मिला। इनमें एक, मनमोहन को रोहतक में अध्यापकी से संतोष करना करना पड़ा। उदय प्रकाश ने कुछ समय पूर्वोत्तर में अध्यापकी की, फिर दिल्ली लौट आए। स्वतंत्र लेखन, पत्रकारिता और फिल्मनिर्माण के जरिए उन्होंने हिन्दी रचना जगत में अपनी खास पहचान बनाई। सुभाष यादव को बिहार के किसी कालेज में जगह मिली।


राजेंद्र शर्मा माकपा के अखबार ‘लोकलहर’ के संपादकीय विभाग से जुड़ गए। सुरेश शर्मा ने मेरी तरह पत्रकारिता का रास्ता चुना। विजय चौधरी सृजनशील थे और एक समय नामवर जी के करीबी भी पर बाद में पता नहीं क्या हुआ? जेएनयू से बाहर आकर वह वृत्तचित्र निर्माण से जुड़े। चमनलाल को भी जेएनयू आने के लिए बरसों इंतजार करना पड़ा। संभवतः वह नामवर जी के निष्प्रभावी होने के बाद ही जेएनयू में नियुक्ति पा सके। लंबे समय तक वह पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में पढ़ाते रहे। शुरुआती दिनों में उन्होंने बैंक की नौकरी और फिर जनसत्ता की उप संपादकी की। हमारे समकालीन या बाद के छात्रों में जो केंद्र में समझदार या संभावनाशील समझे जाते थे, उनमें कुलदीप कुमार, नागेश्वर यादव, मदन राय, जगदीश्वर चतुर्वेदी, संजय चौहान, सुधीर रंजन, अजय ब्रह्मात्मज जैसे कई लोग थे। पर इनमें ज्यादातर शायद गुरुदेव को पसंद नहीं थे।

भारतीय भाषा केंद्र में हमारे दूसरे प्रतिभाशाली अध्यापक थे-डा. मैनेजर पांडे। क्लासरूम में ‘चिचिया’ कर पढ़ाने के उनके अंदाज का हम लोग खूब मजा लेते थे। अपने लेखन और अध्यापन के लिए वह मेहनत करते थे। डा. केदारनाथ सिंह काव्य साहित्य ठीकठाक पढ़ाते थे। नामवर जी उन्हें पूर्वी उत्तरप्रदेश के पडरौना के एक डिग्री कालेज से सीधे जेएनयू ले आए थे। दोनों सिंह-बंधु बाद में समधी बने। हमारी एक अध्यापिका थीं-डा. सावित्री चंद्र शोभा। वह नामवर सिंह की अध्यक्षता वाले भारतीय भाषा केंद्र की वाकई शोभा थीं। देश के हिन्दी विभागों के चेहरे का वह प्रतिनिधित्व करती थीं। अगर आपका रसूख वाले लोगों से संपर्क है तो रचनात्मकता, समझ और ज्ञान के बगैर हिन्दी विभागों में नियुक्त होना कितना आसान है, शोभा जी इसका साक्षात उदाहरण थीं। जेएनयू में सभी बताते थे कि शोभा जी को नामवर सिंह ने ही नियुक्त कराया। उनके पति जाने-माने इतिहासकार और यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन डा. सतीश चंद्र के नामवर पर कई तरह के एहसान थे। स्वयं नामवर जी ने इस बारे में अपने एक इंटरव्यू में आधा-अधूरा इसका खुलासा किया है—“मुझे ठीक से याद नहीं है, हिन्दी की नियुक्ति (शोभा जी और सुधेश जी की) मेरे सेंटर में आने के बाद हुई थी या फिर मैं विशेषज्ञ के रूप में आया था। क्योंकि जो चयन समिति हुई थी, संभवतः मेरे आने के बाद हुई थी क्योंकि डा. नगेंद्र विशेषज्ञ थे, एक विशेषज्ञ देवेंद्र नाथ शर्मा थे और मैं अध्यक्ष था।

रीडर और लेक्चरर की दो नियुक्तियां हुईं, जिसमें सुधेश जी और शोभा जी आए।...शोभा जी चूंकि यूजीसी चेयरमैन की पत्नी थीं तो लगभग तय सा था...विनय राय से मैंने कहा कि भाई, मुसीबत में फंस गया हूं। उन्होंने कहा, यूजीसी रुपया देती है, चेयरमैन की बीवी को नहीं रखेंगे तो किसको रखेंगे? किसी तरह निभाइए---बीएम चिंतामणि के पिता जी और हमारे नागचौधरी साहब के पिता जी मित्र थे, पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस नाते नागचौधरी जी (जेएनयू के तत्कालीन कुलपति) ने मुझे बुलाकर चिंतामणि जी को टेम्पोरेरी रखने की बात की। द्विवेदी जी के नाते भी चिंतामणि जी को मैंने ले लिया।” (जेएनयू में नामवर सिंहः संपादक-सुमन केशरी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 26-27 और 31)।

जिन लोगों ने उस दौर में जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में अध्ययन-अध्यापन किया या विभाग के बारे में जिनकी तनिक भी जानकारी है, वे आज भी बता सकते हैं कि चिंतामणि जी और शोभा जी की कक्षाओं में जाना या अध्ययन से जुड़े किसी विषय पर उनसे बातचीत करना किस तरह एक दुर्दांत-दुष्कर यात्रा करने जैसा था। ...इस तरह नामवर जी ने जेएनयू जैसे एकेडेमिक एक्सीलेंस वाले संस्थान में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की आधारशिला रखी। हाँ, मैनेजर पांडे के आने के बाद हालात जरूर बदले। वह योग्य-समर्थ शिक्षक साबित हुए। जब मैने एडमिशन लिया तो हिन्दी में नामवर जी, पांडे जी और केदार जी ही केंद्र के तीन स्तम्भ थे। नामवर जी के सुयोग्य-संरक्षण में शोभा-चिंतामणि जी जैसी नियुक्तियां आखिरी नहीं साबित हुईं। डीयू, जेएनयू, जामिया और इग्नू सहित भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अगर आज शोभा-चिंतामणि जी जैसी प्रतिभाएं हिन्दी विभागों की शोभा बढ़ा रही हैं तो इसमें हिन्दी के अन्य करतबी मठाधीशों के साथ अपने आदरणीय गुरुदेव का भी कम योगदान नहीं है।

जेएनयू में मेरा सब कुछ ठीक चल रहा था। शुरुआती झिझक के बाद मुझे अच्छा लगने लगा। वहां का माहौल, समृद्ध पुस्तकालय, सीनियर छात्रों की बौद्धिक तेजस्विता, बहस-मुबाहिसे का उच्च स्तर, बड़े कुलीन या उच्च मध्यवर्गीय घरों से आए सोशस साइसेंज या इंटरनेशनल स्टडीज के प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियों के बीच पिछड़े इलाकों से आए दलित व पिछड़े वर्ग के अपेक्षाकृत अभावग्रस्त जीवन के आदी रहे प्रखर छात्रों की अच्छी-खासी संख्या, अपेक्षाकृत सहिष्णु माहौल, सस्ता बढ़िया खाना, सात या बारह रुपये में महीने भर का डीटीसी की बसों का रियायती पास, हर रोज तीनमूर्ति होते हुए सप्रू हाउस (मंडी हाउस) जाने वाली जेएनयू की मुफ्त बससेवा, झेलम लान और गोदावरी के पास वाले टी-स्टाल की शामें, रात को होने वाली छात्र-सभाएं, संगोष्ठियां और बहस-मुबाहिसे, सबकुछ मुझे अच्छा लगने लगा। अलग-अलग होस्टल में होने के बावजूद पांडे जी, निशात कैसर, चमनलाल, मदन राय, आनंद कुशवाहा, कोदंड रामा रेड्डी, अशोक टंकशाला, वी मोहन रेड्डी, जे मनोहर राव, डी रविकांत और ए चंद्रशेखर जैसे समान सोच के मित्रों से अक्सर ही मुलाकात होती रहती थी। थोड़ी-बहुत छात्र-राजनीति की गतिविधियां भी शुरू हो गईं।

हमारे केंद्र में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई थी। एम फिल के शुरुआती दिनों में कक्षाएं भी चलती हैं। फिर सभी छात्र सेमिनार पेपर-टर्म पेपर की तैयारी में जुट जाते हैं और अंत में डिसर्टेशन पर काम शुरू करते हैं। मैं नामवर जी, केदार जी और पांडे जी की कक्षाएं या सेमिनार आदि कभी नहीं छोड़ता था। लेकिन नामवर जी के मुकाबले पांडे जी से मेरी निकटता बढ़ रही थी। डा. शोभा की क्लास में जाना और लगातार बैठे रहना दर्द के दरिया से गुजरने जैसा था। एक दिन मैं किसी क्लास से निकलकर जा रहा था कि चेयरमैन आफिस के एक क्लर्क ने आकर कहा कि डा. नामवर सिंह आपको चैम्बर में बुला रहे हैं। मैं अंदर दाखिल हुआ तो देखा कि नामवर जी के साथ केदार जी भी वहां बैठे हुए हैं। नामवर जी ने बड़े प्यार से बैठने को कहा। पहले थोड़ी बहुत भूमिका बांधी, ‘ आप तो स्वयं वामपंथी हो और यह जानते हैं कि आप और हमारे जैसे लोगों के लिए जाति-बिरादरी के कोई मायने नहीं होते। पर भारतीय समाज में सब किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। आप तो ठाकुर हो न?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ एक शब्द का मेरा जवाब सुनकर नामवर जी और केदार जी शांत नहीं हुए। अगला सवाल था, ‘फिर क्या जाति है आपकी, हम यूं ही पूछे रहे हैं, इसका कोई मतलब नहीं है।’
मैंने कहा, मैं एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुआ हूं। पर दोनों को इससे संतोष नहीं हुआ तो मुझे अंततः अपने किसान परिवार की जाति बतानी पड़ी। आखिर गुरुओं को कब तक चकमा देता! जाति-पड़ताल में सफल होने के बाद नामवर जी ने कहा, ‘ अच्छा, अच्छा, कोई बात नहीं। जाइए, अपना काम करिए।’ बीच में केदार जी ने भी कुछ कहा, जो इस वक्त वह मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। ऐसा लगा कि दोनों गुरुदेवों का जिज्ञासु मन शांत हो चुका है। इस घटनाक्रम से मैं स्तब्ध था। जेएनयू में अब तक किसी ने भी मेरी जाति नहीं पूछी थी। अपने बचपन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में लोगों को किसी अपरिचित से उसका नाम, गांव और जाति आदि पूछते देखा-सुना था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी जाति पूछकर या जानकारी लेकर किसी को क्या मिल जाएगा या उसका कोई क्या उपयोग कर सकेगा? मैं चकित था कि जेएनयू के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों की अचानक मेरी जाति जानने में ऐसी क्या दिलचस्पी हो गई!


मैं इस वाकये को भुलाने की कोशिश करता रहा। दूसरे या तीसरे दिन गोरख पांडे से जिक्र किया तो किसी विस्मय के बगैर उन्होंने कहा, ‘अरे भाई, इसे लेकर आप इतना परेशान क्यों हैं? नामवर जी को लेकर कोई भ्रम मत पालिए। वह ऐसे ही हैं।‘ पर मुझे लगा----और आज भी लगता है कि नामवर जी निजी स्वार्थवादी और गुटबाज ज्यादा हैं। जहां तक जाति-निरपेक्षता का सवाल है, हिन्दी क्षेत्र के अनेक ‘प्रगतिकामियों’ की तरह उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाय! पिछले दिनों, लखनऊ और दिल्ली में उन्होंने दलित-पिछड़ा आरक्षण के खिलाफ जिस तरह की टिप्पणियां कीं, उससे भी उनके मिजाज का खुलासा होता है। लेकिन जेएनयू में एआईएसएफ वाले उन्हें अपना ‘फ्रेंड-फिलास्फर-गाइड’ मानते थे। जेएनयू की छात्र-राजनीति में एआईएसएफ वालों की हालत आज बहुत पतली है। एक छात्र के तौर पर मैं नामवर जी को जितना समझ पाया, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उन्हें दो तरह के लोग पसंद हैं—वे, जो किसी विचार के हों या न हों, उनके चाटुकार हों, उनका निजी कामकाज कर दें और जरूरी चीजें लाते रहें और दूसरे, वे जो कुछ पढ़े-लिखे हों, जो उनका गुणगान करें या उनके बौद्धिक-साहित्यिक प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ अपने लेखन या संगोष्ठी-सेमिनार आदि में तलवारें भांज सकें।

चूंकि, मैं उनके ‘गुट’ का कभी हिस्सा नहीं था और इन दोनों श्रेणिय़ों में फिट नहीं बैठता था, इसलिए शायद उन्होंने मेरी जाति जानने में दिलचस्पी दिखाई होगी। वह स्वयं भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही तो हैं, जहां गांव-कस्बों में किसी की जाति पूछना सामान्य सी बात मानी जाती रही है। अगर नामवर जी सिर्फ भाकपावादी होते तो प्रतिबद्ध और ईमानदार भाकपाई और समर्थ कवि डा. रामकृष्ण पांडे को जेएनयू में लेक्चरशिप मिल जानी चाहिए थी। पर पांडे जी को वहां नौकरी नहीं मिली, उन्होंने ताउम्र न्यूज एजेंसी ‘वार्ता’ में डेस्क पर काम किया और असमय ही दिवंगत हो गए। कई अन्य छात्र, जो एआईएसएफ से सम्बद्ध थे, ठीकठाक होने के बावजूद जेएनयू में नौकरी नहीं पा सके। सिर्फ उन्हीं भाकपाई-छात्रों को उन्होंने दिल्ली या बाहर के विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में नौकरियां दिलवाईं, जो थोड़े-बहुत प्रभावशाली या उनके किसी काम के थे या फिर ‘चंगू-मंगू’ की तरह उनके आगे-पीछे लगे रहते थे।

केंद्र की ‘एडमिशन-लिस्ट’ देखकर भी उनकी पसंद को समझा जा सकता है। एक उदाहरण देखिए, सन 1980 की एम फिल एडमिशन-लिस्ट में पहली से पाचवीं पोजिशन पर एक से बढ़कर एक आए। पर कुलदीप कुमार को कुल 20 छात्रों की सूची में 14वीं पोजिशन पर रखा गया ताकि उन्हें फेलोशिप कभी न मिल सके। वह सृजनशील थे। अंततः उन्हें जेएनयू छोड़कर जाना पड़ा। कई साल वह जर्मन रेडियो मे रहे। अब वह ‘द हिन्दू’ सहित देश के कई प्रमुख अखबारों में सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर स्तम्भ लिखते हैं।

यह बताना यहां जरूरी है कि मैंने अपना लेखन ‘उर्मिलेश’ नाम से शुरू किया पर स्कूल रजिस्टर में मेरा नाम ‘उर्मिलेश सिंह’ था, जो विश्वविद्यालय के समय तक हर आधिकारिक रिकार्ड में बना रहा। मेरे पासपोर्ट में भी यही नाम रहा है। पर मुझे विश्वविद्यालय या बाहर, हर कोई उर्मिलेश नाम से ही पुकारता रहा है, कोई उर्मिलेश सिंह या मिस्टर सिंह नहीं कहता रहा है। सरनेम के तौर पर यह ‘सिंह’ मेरे नाम के साथ कैसे आ चिपका, इसकी भी एक कहानी है। गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिले के वक्त पिता जी मुझे स्कूल लेकर गए थे। वह अद्भुत व्यक्ति थे, गरीब, निरक्षर पर ज्ञानवान। स्कूल के हेडमास्टर संभवतः उन दिनों ताड़ीघाट के पास के गांव मेदिनीपुर के मिसिर जी थे। वह हमारे गांव के पिछड़े समुदाय के लोगों से बहुत चिढ़ते थे। कहा भी करते थे, ‘अबे, अहीर-गड़ेरी पढ़ाई करके क्या करेंगे, जाकर भैंस, गाय, भेड़ चराएं!’ लेकिन गरीब किसान होने के बावजूद मेरे पिता और मेरे परिवार की आसपास के इलाके में प्रतिष्ठा थी। पिता जी राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय थे, गांव के दलितों-पिछड़ों के बीच उनकी अच्छी पकड़ थी।

बड़े भाई पढ़ने में तेज थे और पूरे क्षेत्र में हाकी के जाने-माने खिलाड़ी भी। मिसिर जी हमारे परिवार वालों को बाकी यादवों से ज्यादा ‘सभ्य’ समझते थे। शायद , कुछ अलगाने के लिए ही उन्होंने मेरे नाम में ‘सिंह’ सरनेम जोड़ दिया। पिता जी को भी नहीं बताया, उनसे सिर्फ यही पूछा कि बच्चे का क्या नाम रखा है, पिता जी ने कहा, उर्मिलेश। सिर्फ मेरे नाम के साथ ही उन्होंने खेल नहीं किया, मेरे पिता का नाम था-सरजू सिंह यादव तो उन्होंने लिख दिया-सूर्य सिंह। नामों का संस्कृतीकरण! मेरा उर्मिलेश नामकरण भी दिलचस्प ढंग से हुआ था। मेरे बड़े भाई जब ग्यारहवीं या बारहवीं में पढ़ते थे तो मेरा जन्म हुआ। वह मां-पिता की पहली संतान थे और मैं आखिरी। बीच में मेरे दो-तीन भाई-बहन हुए पर वे जिंदा नहीं रह सके। कुछ तो पैदाइश के वक्त ही मरे थे। मेरी पैदाइश से पहले एक भाई, जिसका नाम मुसाफिर था, कुछ बड़ा होकर मरा। उन दिनों गांव में डाक्टर या अस्पताल आदि की सुविधा नहीं थी। उससे भी बड़ी समस्या परिवार की गरीबी थी।

मैं जब पैदा हुआ तो बचने की उम्मीद कम थी। मां ने बचपन में बताया था कि मेरा वजन बहुत कम था, जो भी देखता, कहता, यह भी शायद ही बचे। पर मैं बच गया। उधर, मेरे बड़े भाई साहब, इस बार बहन पाने की उम्मीद लगाए थे पर मिल गया भाई। उन्होंने अपनी संभावित बहन का नाम भी तय कर रखा था-उर्मिला। वह साहित्य खूब पढ़ते थे। उन दिनों मैथिलीशरण गुप्त की किताब ‘साकेत’ पढ़ रहे थे, जिसमें उर्मिला का चरित्र बहुत उभरकर सामने आता है। जब भाई पैदा हुआ तो उन्होंने नाम रख दिया-उर्मिलेश। स्कूल में नामांकन के वक्त हेडमास्टर मिसिर जी की कृपा से मैं उर्मिलेश सिंह हो गया। नामांकन के वक्त पिता जी के साथ भाई साहब होते तो शायद मिसिर जी को मेरे और पिता जी के नाम के साथ मनमानी करने का मौका नहीं मिला होता। मेदिनीपुर वाले मिसिर जी की यही खुराफात शायद वर्षों बाद डा. नामवर सिंह जैसे ‘दिग्गज मार्क्सवादी आलोचक’ के ‘कन्फ्यूजन’ का कारण बनी।

जेएनयू मे दाखिले के कुछ ही समय बाद, मुझे बैरंग इलाहाबाद लौटना पड़ा, जहां मित्रों के सहयोग से मैंने सत्र के शेष दिन बिताए। मेरा ज्यादा वक्त अपनी निजी पढ़ाई-लिखाई और पीएसओ की गतिविधियों को समर्पित रहा। दाखिला रद्द होने की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं। पहले वाकये की तरह, एक दिन अचानक नामवर जी ने मुझे अपने चैम्बर में बुलवाया। इस बार वह अकेले थे। मैं डरते-डरते गया, इस बार पता नहीं क्या पूछेंगे? चैम्बर में दाखिल होते ही उन्होंने पूछा, उर्मिलेश जी, आपका एमए फाइनल का रिजल्ट अभी आया कि नहीं? मैंने कहा, नहीं सर। बस आने वाला है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन छात्रों की सूची मांगी है, जिन्होंने अब तक अपना फाइनल रिजल्ट नहीं जमा किया है। भारतीय भाषा केंद्र से उसमें आपका नाम जा रहा है। नियमानुसार, आपका एडमिशन रद्द हो जाएगा।

मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। उनके चैम्बर से उदास मन लौटा। कुछ दिनों पहले, नामवर जी से उनके चैम्बर में हुई पिछली मुलाकात याद आने लगी। उस दिन मैं बेहद परेशान रहा। उन दिनों बाहर से फोन आदि करके सारी जानकारी ले पाना कठिन था, इसलिए मैं अगले ही दिन मैं अपर इंडिया एक्सप्रेस से इलाहाबाद के लिए रवाना हो गया। विभाग में सबसे मिला। रजिस्ट्रार से भी बातचीत हुई। सबने कहा, रिजल्ट जल्दी ही आ जाएगा। मैंने विभाग से एक परिपत्र भी ले लिया, जिसमें लिखा था कि उर्मिलेश सिंह फाइनल के छात्र हैं और इनका परीक्षाफल आने वाला है। कृपया इन्हें अपेक्षित सहयोग और मोहलत दी जाय। लेकिन दिल्ली में नामवर सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने मेरे एडमिशन को रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू करा दी। केंद्र की स्टूडेंट्स फैक्वल्टी कमेटी (एसएफसी) के कुछ छात्र-सदस्य भी चाहते थे कि मेरा एडमिशन जल्दी रद्द हो जाय। इसके दो फायदे थे। एडमिशन के लिए ‘वेटिंग’ में पड़े किसी एक छात्र का एडमिशन हो जाता और किसी एक एडमिशन ले चुके छात्र को मेरी वाली यूजीसी फेलोशिप मिल जाती।

इनमें कुछेक एसएफसी सदस्य नामवर जी के पटु शिष्य थे। कोशिश की गई कि मेरे एडमिशन रद्द किए जाने के मामले में छात्र संघ (एसएफआई-एएसएफआई नियंत्रित) की तरफ से कोई पंगा न हो। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि सितम्बर के अंतिम सप्ताह से ही मेरे एडमिशन पर खतरे के बादल मंडराने लगे। कुछ छात्र नेताओं ने प्रवीर दा के कहने पर मेरे मामले में विश्वविद्यालय-उच्चाधिकारियों से बातचीत भी की। कुछ दिनों की मोहलत मिली लेकिन मेरा रिजल्ट उस वक्त तक नहीं आया और जहां तक मुझे याद आ रहा है, अंततः अक्तूबर में मुझे केंद्र से बोरिया-बिस्तर बांधने को कह दिया गया। हालांकि एडमिशन रद्द करने सम्बन्धी औपचारिक परिपत्र नवम्बर,1978 में जारी किया गया। बाद में पता चला कि जेएनयू के कुछ अन्य केंद्रों में भी ऐसे मामले सामने आए। रूसी अध्ययन केंद्र में कम से कम दो छात्रों को, जिनका रिजल्ट मेरी तरह लंबित था, उन्हें जनवरी, 79 के पहले सप्ताह तक की मोहलत दी गई। केंद्र के छात्र रह चुके डा. कैसर शमीम ने बाद के दिनों में इस बात की पुष्टि की। वह उन दिनों केंद्र और भाषा संकाय की कई शैक्षणिक-प्रशासनिक इकाइयों में छात्र-प्रतिनिधि के तौर पर शामिल थे। जिनको मोहलत मिली, वे भाग्यशाली रहे। उनका मेरी तरह एक साल बर्बाद नहीं हुआ। पर इसके लिए मैं नामवर जी पर कोई दोषारोपण नहीं कर रहा हूं।

उन्होंने तो बस ‘नियमों का पालन करते हुए’ मेरा एडमिशन रद्द करा दिया। ...और मोहलत पाने की उनसे अपेक्षा भी नहीं थी। कुछ ही दिनों बाद, मैं इलाहाबाद लौट आया। छात्र-राजनीति में सक्रियता के अलावा ‘वर्तमान’ नाम से हम लोगों ने एक पत्रिका भी निकाली थी। इसके संपादक मंडल में मेरे अलावा रामजी राय और राजेंद्र मंगज थे। कृष्ण प्रताप सिंह (दिवंगत केपी सिंह) और विभूति नारायण राय (तब तक आईपीएस हो चुके थे) पर्दे के पीछे से हमारी पत्रिका के प्रमुख संसाधक थे। पत्रिका का दफ्तर मेरे कमरे से चलता था। इसके अलावा एक स्टडी सर्किल भी हम लोग चलाते थे, जिसमें विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों के अलावा बीच-बीच में कुछ तरक्कीपसंद वकील, पत्रकार, कवि-लेखक और अन्य प्रोफेशनल्स भी आते रहते थे। इसके कुछेक हिस्सेदार आज देश के जाने-माने न्यायविद्, नौकरशाह, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक-कवि हैं।
अगले साल, यानी 1979 में जेएनयू में एम.फिल्.-पीएचडी के दाखिले के लिए फिर से फार्म भरा।

परीक्षाफल आया तो ज्यादा निराशा नहीं हुई। मेरा एडमिशन हो गया, इस बार कुल 20 छात्रों की सूची में तीसरी पोजिशन थी। फेलोशिप मिलना तयशुदा था। उन दिनों भारतीय भाषा केंद्र में कम से कम तीन या चार फेलोशिप आसानी से मिल जाती थीं। शुरू में लगा था कि पता नहीं, इस बार मेरा एडमिशन होगा कि नहीं, पर कई लोगों ने सही ही कहा कि पिछले साल के अपने टापर को केंद्र एडमिशन से वंचित कैसे रखता? मेरा पेपर और इंटरव्यू भी अच्छे हुए थे। एमए फाइनल का परीक्षाफल भी आ चुका था, 65.5 फीसदी अंकों के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने विभाग में मेरी दूसरी पोजिशन थी। इधर, जेएनयू में तीसरी पोजिशन मिली। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि पहली पोजिशन इस बार पुरुषोत्तम अग्रवाल की थी। दूसरे स्थान पर संभवतः पटना विश्वविद्यालय से आए रामानुज शर्मा रहे। पुरुषोत्तम ने जेएनयू से ही एमए किया था और नामवर जी के प्रिय शिष्य के अलावा एएसएफआई के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। पढ़ने-लिखने और बोलने में भी तेजतर्रार थे। पुरुषोत्तम पहले डीयू और फिर जेएनयू में कई साल शिक्षण कर
ने के बाद संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य बने। उन्होंने कबीर पर अच्छा काम किया। नामवर जी के प्रिय और समझदार शिष्यों में उनके अलावा कुछ और नाम याद करना चाहें तो वीरभारत तलवार का नाम लिया जा सकता है।
वीरभारत अच्छे रिसर्चर रहे लेकिन व्यक्ति, शिक्षक-प्रशासक, दोनों स्तर पर उन्होंने जेएनयू को निराश ही किया। रामानुज जी मितभाषी थे और नंद किशोर नवल के करीबी थे, बातचीत में अक्सर उनका उल्लेख किया करते थे। नवल जी संगठन और विचार के स्तर पर नामवर जी के सहयोगी और बहुत करीबी रहे। रामानुज और मुझे एक ही होस्टल में आसपास कमरा मिला था। बाद में मुझे महानदी (मैरिड होस्टल) मिल गया तो पत्नी के साथ रहने लगा। इसी होस्टल में दिग्विजय सिंह (अब दिवंगत), बाबूराम भट्टराई (नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री) और हिसिला यमी, विमल और सुखदेव थोरट भी रहा करते थे। बहरहाल, नए सत्र में मैंने एमफिल डिसर्टेशन के लिए राहुल सांकृत्यायन पर काम करने का फैसला किया। मेरे गाइड थे-डा. मैनेजर पांडे। फरवरी, 1982 में मुझे एमफिल एवार्ड हो गई। पीएचडी के लिए डा पांडे के ही निर्देशन में ‘प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में वैचारिक संघर्ष (सन 1946-54)’ विषय पर काम शुरू कर दिया था।

फेलोशिप के पैसों से हम लोगों का काम यहां आराम से चल जाता था। कभी-कभी मां को भी मनीआर्डर से पैसे गांव भेजा करता था। पढ़ाई के साथ छात्र-राजनीति में भी मेरी सक्रियता बढ़ चुकी थी। जेएनयू में पीएसओ का मैं संयोजक या सचिव भी रहा। कुछ समय के लिए पीएसओ की दिल्ली राज्य कमेटी का भी पदाधिकारी था। सन 80 या 81 में मैंने डीएसएफ (पीएसओ-आरएसएफआई का मोर्चा) के बैनर तले जेएनयू छात्रसंघ के महासचिव पद का चुनाव भी लड़ा। एसएफआई-एआईएसएफ गठबंधन की नमिता सिन्हा से चुनाव तो मैं हार गया पर एक नया रिकार्ड भी बना। नौ सौ या एक हजार की छात्र संख्या वाले जेएनयू में संभवतः मुझे 289 वोट मिले। सीपीआई-सीपीएम धारा से बाहर के स्वतंत्र वामपंथी खेमे के किसी उम्मीदवार को जेएनयू में अब तक इतना वोट कभी नहीं मिला था।

सन 1983 की गर्मियों में जेएनयू की पहाडियां नारों से गूंजने लगीं। डाऊन से अप कैम्पस तक, पूरा विश्वविद्यालय पोस्टरों-बैनरों से पट चुका था। केंद्र सरकार के दबाव में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जेएनयू की प्रगतिशील और सामाजिक न्याय-पक्षी प्रवेश नीति को बदलने का एलान कर दिया। छात्रों की तरफ से इसकी जबर्दस्त मुखालफत हुई। छात्रसंघ के नेतृत्व ने शुरू में थोड़ी ना-नुकूर की पर बड़ा आंदोलन छेड़ने की छात्रों की भावना को देखते हुए वह भी समर्थन में आ गया। जेएनयू के इतिहास में वैसा आंदोलन न पहले कभी हुआ और न आज तक देखा गया। इसमें तीन सौ से ज्यादा छात्र तिहाड़ जेल भेज दिए गए। इनमें नब्बे फीसदी देश के विभिन्न राज्यों से आकर जेएनयू में पढ़ रहे प्रथम श्रेणी के प्रतिभाशाली छात्र थे। इनमें कइयों ने तो आईएएस जैसी सिविल सर्विस परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर ली थीं।

राजनीतिक हस्तक्षेप और बहुदलीय दबाव के बाद प्रशासन ने छात्रों पर लंबित मामलों को बिना शर्त वापस कर लिया पर आंदोलन की नेतृत्वकारी टीम के संभवतः 17 छात्रों को कुछ समय के लिए (एक साल से तीन साल) के लिए कैम्पस से बाहर कर दिया गया। इनमें मैं भी शामिल था। आंदोलन छिड़ने से पहले मैं अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करने की तैयारी कर रहा था। एनसीईआरटी के पास एक टाइपिस्ट से शोध-प्रबंध के अध्यायों को क्रमवार टाइप करने को लेकर बात भी हो चुकी थी। अब पीएचडी भी लटक गई। खाने-पीने और रहने के लाले पड़ गए। फेलोशिप से वंचित हो चुके थे। पत्नी घर चली गईं। कुछ दिनों बाद मैं भी घर गया। लेकिन वहां क्या करता, जल्दी ही दिल्ली लौट आया। विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने हम जैसों के हालात पर चिंता जताई। सहयोग का आमंत्रण भी दिया। लेकिन इस घटना के बाद गुरुदेव नामवर ने मुझसे कभी नहीं पूछा कि तुम क्या कर रहे हो या आगे की जिन्दगी के लिए क्या योजना है? जेएनयू के डाउन कैम्पस के एक कर्मचारी फ्लैट में ईश, शशिभूषण और राहुल जैसे कुछ दोस्त रह रहे थे। मैंने भी वहीं डेरा डाला।

एक दिन अचानक विश्वविद्यालय के एक शीर्ष अधिकारी की तरफ से मुझे उनके एक परिजन ने संदेश दिया कि आप अगर एक पंक्ति में लिख कर दे दें कि ‘9 मई, 83 को जो कुछ हुआ, उसके लिए मुझे खेद है’ तो आपको फिर से कैम्पस में इंट्री मिल जाएगी, फेलोशिप जारी रहेगी और आप अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करा सकेंगे। जिन सज्जन ने मुझे यह संदेश दिया, वह उन दिनों राजस्थान में काम करते थे। मैंने विनम्रतापूर्वक कहा कि ऐसा मैं नहीं कर सकता। हम लोगों ने अन्याय के विरोध में आंदोलन किया था, उस पर खेद प्रकट करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर विश्वविद्यालय प्रशासन मेरे परिवार की खराब आर्थिक स्थिति और मेरे कथित उज्ज्वल एकेडेमिक भविष्य के प्रति इतना संवेदनशील है तो उसे इस तरह की कोई शर्त ही नहीं रखनी चाहिए।

कुछ समय बाद, मैं दिल्ली में सामाजिक-राजनीतिक कामकाज करते हुए लेखन-अनुवाद आदि से अपनी आर्थिक जरुरतें पूरा करने में जुट गया। लेकिन यह आसान नहीं था। मैं किसी पार्टी का होलटाइमर तो था नहीं। आय या गुजारे का कोई और स्रोत भी नहीं दिख रहा था। घर चलाने के लिए जितनी जरूरत थी, वह हिन्दी में फ्रीलांसिंग से संभव नहीं दिख रही थी। मई, 83 के ‘भूचाल’ से पहले भी मैं लेक्चरशिप पाने की कोशिश करता आ रहा था, सन 81-82 से ही लगातार रिक्तियां देखकर आवेदन कर देता। पर कभी इंटरव्यू में छंट जाता तो कभी काल-लेटर ही नहीं आता। जहां तक मुझे याद आ रहा है, तब मैं जेएनयू में पीएचडी कर रहा था और एमफिल एवार्ड हो चुकी थी। एक दिन मैनेजर पांडे डाउन कैम्पस बस स्टैंड पर मिल गए। उन्होंने पूछा, ‘ अरे भाई, आपने कुमायूं विश्वविद्यालय में अप्लाई किया है न!’ मैंने कहा, ‘किया है सर।’ उन्होंने बताया कि ‘डा. नामवर सिंह ही वहां एक्सपर्ट के रूप में जा रहे हैं।

मैने उनसे काफी कहा है कि आपको नौकरी की बहुत जरूरत हो। शुरू में तो उन्होंने ज्यादा रूचि नहीं दिखाई पर मेरे जोर देने के बाद अब वह तैयार हो गए हैं। आप जरूर जाइए वहां, इस बार आपकी नौकरी हो जाएगी।‘ नैनीताल आने-जाने और रहने के खर्च आदि का इंतजाम कर मैं इंटरव्यू देने नैनीताल चला गया। वहां गिर्दा, पीसी तिवाड़ी और प्रदीप टाम्टा जैसे मित्रों के सहयोग से एक यूथ होस्टल में कमरा भी मिल गया था। इंटरव्यू शानदार हुआ। नामवर जी के अलावा दक्षिण के किसी विश्वविद्यालय से कोई पांडे या शर्मा जी वहां एक्सपर्ट बनकर आए थे। आधुनिक साहित्य में विशेषज्ञता वाले अभ्यर्थी के लिए यह पद था। इस नाते भी मेरा पलड़ा भारी दिख रहा था। पर सारा अंदाज गलत साबित हुआ। कुछ दिनों बाद पता चला कि कुंमायूं में भी मेरा नहीं हुआ। किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हुई, जिसका काम मध्यकालीन साहित्य पर था। इसके बाद मैं बेहद दुखी और निराश हो गया।

सन 83 की घटना के बाद लेक्चरशिप पाने की कोशिश एक बार फिर शुरू की। मेरे साथ के कई मित्रों को लेक्चरशिप मिल गई थी। उनमें कई मेरिट के हिसाब से मुझसे नीचे थे। उनमें कइयों के अंदर शिक्षक बनने की कोई बलवती इच्छा भी नहीं दिखती थी, जबकि मेरे अंदर इलाहाबाद के दिनों से ही एक समर्थ शिक्षक बनने का सपना पलता आ रहा था। इसी सपने के चलते मैंने सिविल सर्विसेज(आईएएस-आईपीएस) की परीक्षा में बैठने की अपने बड़े भाई की सलाह मानने से इंकार कर उनकी नाराजगी मोल ली थी। वैसे भी मेरे वाम मन-मानस को सरकारी सेवा में जाना गवारा नहीं था। विश्वविद्यालय से निकलने के बाद भी मुझे कुछ समय तक लगता था कि कहीं न कहीं मुझे लेक्चरशिप मिल जाएगी। नामवर जी की ताकत से मैं वाकिफ था। विश्वास था कि मैनेजर पांडे जरूर उन पर दबाव बनाएंगे। दिल्ली के हर कालेज, विश्वविद्यालय, यहां तक कि बाहर के संस्थानों के हिन्दी विभागों में स्थानीय प्रबंधन, सत्तारूढ़ राजनेताओं या नामवर जी की मंडली के प्रोफेसरों का ही दबदबा था। मैं चारों तरफ से गोल था। सिर्फ मैनेजर पांडे ही एक थे, जो जमा-जुबानी समर्थन करते थे। मेरे सामने अस्तित्व का संकट था। एक बच्चा भी अब परिवार से जुड़ चुका था। डाउन कैम्पस के उस कर्मचारी फ्लैट से हटने के बाद विकासपुरी के ए ब्लाक में एक कमरे का एक सेट किराए पर लिया। गांव से परिवार भी ले आया।

सन 1985 आते-आते मुझे लगने लगा कि अब लेक्चरशिप के लिए ज्यादा इंतजार ठीक नहीं। मुझे विकल्प तलाशने होंगे। नियमित रोजगार के नाम पर कुछ ठोस नहीं दिखा तो जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, प्रतिपक्ष, युवकधारा, शान-ए-सहारा, अमर उजाला, और अमृत प्रभात जैसे पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित ढंग से लिखना शुरू कर दिया। जनसत्ता, नभाटा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमृत प्रभात आदि के काम से घर के किराए की राशि निकालने की कोशिश करता, जबकि प्रतिपक्ष के नियमित भुगतान से महीने भर के दूध का भुगतान हो जाया करता था। उन दिनों प्रतिपक्ष के संपादक विनोद प्रसाद सिंह थे और उसका दफ्तर था, तुगलक क्रीसेंट स्थित जार्ज फर्नांडीस का सरकारी बंगला। विनोद बाबू से मेरी मुलाकात संभवतः जेएनयू के एक मेरे मित्र अजय कुमार ने कराई थी, जो आजकल बड़े आयकर अधिकारी हैं। प्रतिपक्ष के आखिरी पेज पर एक कालम छपता था, फू-नुआर का बैंड। वह खाली हो गया था।

उसके लेखक शायद पत्रिका से अलग हो गए थे। उसके बाद लगभग दो साल मैंने वह कालम लिखा, जिसका मुझे नियमित भुगतान मिल जाता था। इस दौर में जनसत्ता के मैगजीन संपादक मंगलेश डबराल, पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता आनंदस्वरूप वर्मा, प्रख्यात कवि व पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रो. डी प्रेमपति, सुरेश सलिल और विनोद प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ लोगों से मुझे सहयोग-समर्थन मिला। जनसत्ता में लगातार लिखने के बावजूद प्रभाष जोशी ने मुझे वहां नौकरी नहीं दी। शायद, उन्हें मेरे बारे में जो सूचनाएं मिली होंगी, उससे उन्होंने मुझे जनसत्ता में नौकरी के लायक नहीं समझा होगा। मेरी अर्जी खारिज हो गई पर उन्हें मेरे वहां छपने से शायद कोई एतराज नहीं था। ‘खोज खबर’, ‘खास खबर’ और ‘रविवारी जनसत्ता’ के लिए लगातार लिखा। मेरे घर में पहला ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी सेट ‘जनसत्ता’ के पारिश्रमिक के पैसे से ही आया।

कुछ समय मैं पीयूसीएल की दिल्ली कमेटी में भी सक्रिय रहा। तब इंदर मोहन उसके महासचिव थे। राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष वी एम तारकुंडे थे। बाद में गोबिन्द मुखौटी की अगुवाई में पीयूडीआर बना। बेरोजगारी और फ्रीलांसिंग के शुरुआती दिनों में मैं विकासपुरी के बाद पुष्प विहार और लोधी रोड कांप्लेक्स के सरकारी आवासों में किराए पर रहा। फ्रीलांसिंग के इस दौर में भी जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, वाराणसी, इलाहाबाद, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर या जामिया जैसे विश्वविद्यालयों या सम्बद्ध कालेजों के हिन्दी विभागों में नियुक्तियों की कहानियां सुनता रहता था। मुझे लगता है, नामवर सिंह ने यूरोपीय और अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों के तर्ज पर योग्य छात्रों को आगे कर जेएनयू या अपने प्रभाव के अन्य संस्थानों में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन को सुदृढ़ आधार देने की कोशिश की होती तो हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान हो सकता था।

पत्रकारिता की उबड़खाबड़ जमीन पर पांव बढ़ाते हुए सन 1986 के मार्च महीने में मेरी नियुक्ति टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप के हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स में हो गई। इसके लिए अखिल भारतीय लिखित परीक्षा हुई थी। बहुत सारे युवक-युवतियां उसमें शामिल हुए थे। बताया गया कि उस लिखित परीक्षा में मुझे दूसरा स्थान मिला। वहां किसी ने मुझसे जाति आदि के बारे में पूछताछ नहीं की। अखबार के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पटना संस्करण में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी। 1 अप्रैल को दिल्ली से पटना के लिए रवाना हो गया। तब तक एसपी सिंह भी मुंबई से दिल्ली नभाटा में कार्यकारी संपादक बनकर आ चुके थे। शुरू में ही उन्होंने नभाटा के संपादकीय पृष्ठ पर ‘बिहार के कृषि संकट’ पर दो किस्तों का लेख छापकर मेरा उत्साहवर्धन किया। लेकिन बाद के दिनों में उनका मुझे ज्यादा समर्थन नहीं मिला। मेरी पहली किताब ‘बिहार का सच’ सन 1991 में छपी। पुस्तक का बिहार और बाहर भी स्वागत हुआ।

एसपी ने भी पसंद किया। उन्होंने नभाटा में तुरंत समीक्षा छपवाई। कई प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएं आईं। एक दिन टीवी(दूरदर्शन) देख रहा था। पहले से मुझे कत्तई नहीं मालूम था। अचानक, देखा दूरदर्शन पर मेरी किताब की चर्चा चल रही थी। बाद में पता चला कि इस कार्यक्रम का निर्माण दूरदर्शन के जाने-माने प्रोड्यूसर कुबेर दत्त(अब दिवंगत) ने किया था। सन 1993 में मुझे मीडिया जगत में (उन दिनों की) प्रतिष्ठित ‘टाइम्स फेलोशिप’ मिली। इसके इंटरव्यू बोर्ड में उस समय के बड़े संपादक और विचारक निखिल चक्रवर्ती, योजना आयोग के सदस्य पी एन धर, टी एन चतुर्वेदी, टाइम्स के तत्कालीन संपादक दिलीप पडगांवकर और टाइम्स ग्रुप के चेयरमैन अशोक जैन सहित कई गणमान्य लोग बैठे थे। शोध के मेरे प्रस्तावित विषय पर कई सवाल पूछे गए। किसी ने मुझसे मेरी जाति आदि के बारे में नहीं पूछा। कुछ ही दिनों बाद परिणाम निकला, पता चला किश्वर अहलूवालिया, मारूफ रजा, शैलजा वाजपेयी और मुझे इस फेलोशिप के लिए चुना गया है। बीते साल यह फेलोशिप जेएनयू के ही एक पूर्व छात्र पी. साईनाथ को मिली थी। टाइम्स आफ इंडिया सहित ग्रुप के सभी अखबारों में हम लोगों के चित्र के साथ फेलोशिप की उद्धोषणा हुई थी। इस फेलोशिप के तहत मैंने झारखंड के संदर्भ में क्षेत्रीय विषमता पर काम किया, जो सन 1999 में ‘झारखंडः जादुई जमीन का अंधेरा’ नाम से पुस्तकाकार छपा। शोध-लेखन के लिए बाद में कुछ और फेलोशिप भी मिलीं।

नामवर जी, केदार जी और पांडे जी के जेएनयू स्थित ‘हिन्दी के दिव्यलोक’ से पत्रकारिता की उबड़खाबड़ दुनिया मुझे बेहतर लगने लगी। लेकिन पत्रकारिता में 26 साल से ज्यादा के अपने अनुभव के बाद जब पेशे में ‘ऊपर की दुनिया’ के करीब आया तो पता चला कि यहां का अंदरुनी सच भी कुछ कम विकराल नहीं है। नामवर जी से भी ज्यादा महाबलियों की इसमें भरमार है। ज्यादा पेंचदार लोग हैं। जात-गोत्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक सोच के अलावा बड़े राजनेताओं, कारपोरेट-कप्तानों से किसके कितने रिश्ते हैं, आज के मीडिया में ऊंचे पदों तक पहुंचने में इन चीजों का खासा महत्व हो गया है। भारत में पत्रकारिता वाकई चौथा स्तम्भ है पर हमारे समाज और लोकतंत्र का नहीं, राजव्यवस्था का चौथा स्तम्भ बनती गई है।

हम लोग जिस समय पत्रकारिता में दाखिल हुए, वह इमर्जेन्सी के बाद का जमाना था और प्रोफेशन में जबर्दस्त उथलपुथल थी। हिन्दी में पहली बार नए ढंग के प्रयोग हो रहे थे और नए सोच को जगह मिल रही थी। जनपक्षी सोच के ढेर सारे नौजवान पत्रकारिता में दाखिल हुए थे। लेकिन कुछ ही बरस बाद चीजें तेजी से बदलती नजर आईं। सन 95-97 के आसपास पत्रकारिता पर आर्थिक सुधार और उदारीकरण की प्रक्रिया का असर साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सन 2000 के बाद उसने ठोस रूप ले लिया। अब पत्रकारिता का चेहरा बिल्कुल बदल चुका है। बड़े मीडिया संस्थानों के मालिक आज खुलेआम कहते हैं कि वे खबर के नहीं, विज्ञापन के धंधे में हैं। मुख्यधारा की हिन्दी पत्रकारिता तो और पिचक रही है। वह कूपमंडूकता, सरोकारहीनता, समाचार-विचार की दरिद्रता, चाटुकारिता, जातिवाद और गुटबाजी से बेहाल है। बेहतर की बात कौन करे, राहुल बारपुते, रघुवीर सहाय और राजेद्र माथुर के जमाने की पत्रकारिता के निशान भी मिट रहे हैं। पत्रकारिता के इस मौजूदा सच से जब टकराता हूं तो छात्रजीवन के दौरान देखा एक सजग-समर्थ शिक्षक बनने का सपना याद आता है। फिर देखता हूं, मेरे सच और सपने के ठीक बीच में खड़े हैं-हिन्दी के महाबली डा. नामवर सिंह।

आशा-निराशा और सफलता-असफलता भरी दिल्ली से पटना, पटना से दिल्ली वाया चंडीगढ़ की 26 साल लंबी अपनी यात्रा पर नजर डालता हूं तो कुल-मिलाकर अच्छा लगता है। इस पेशे में आने का अफसोस नहीं होता। हिन्दी क्या, संपूर्ण शैक्षणिक जगत के बड़े-बड़े महाबलियों को जो लोग इधर से उधर पदारूढ़ करते-कराते हैं, बड़े ओहदे या सम्मान देते-दिलाते हैं, एक पत्रकार के रूप में उन लोगों को भी बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला। कैसे अचानक अपने बीच से ही कोई जुगाड़ और रिश्तों के सहारे बड़ा ओहदेदार, वाइसचांसलर, निदेशक या सीधे प्रोफेसर बन जाता है! कैसे कोई रातोंरात चैनल हेड, प्रधान संपादक, किसी कारपोरेट संस्थान में उपाध्यक्ष या कारपोरेरट-कम्युनिकेशन का चीफ, कहीं निजी या सरकारी क्षेत्र में बड़ा अधिकारी, सलाहकार या विदेश में कोई अच्छी सरकारी पोस्टिंग पा लेता है! पत्रकारिता के इस दिलचस्प-रोमांचक रास्ते का हरेक सच मुझे उन वजहों से रू-ब-रू कराता है कि बड़ी संभावनाओं और प्रतिभाओं के बावजूद हमारा समाज क्यों दुनिया के नक्शे पर आज तक इतना फिसड्डी बना हुआ है! प्रतिभा-पलायन क्यों हो रहा है या कि एक खास मुकाम के बाद प्रतिभा-विकास का रास्ता अवरुद्ध क्यों हो जाता है! सचमुच हम ‘अतुल्य भारत’ हैं!
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Sunday, July 12, 2026

मनुष्य और समाज की बेहतरी का ज्ञान-विज्ञान - शिवप्रसाद जोशी


(विज्ञान में विचार के नये आयाम)

समीक्षा पुस्तकः ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाजः आम ज़बान में कुछ बातें 

लेखकः लाल्टू

प्रकाशकः एकलव्य

मूल्यः 200 रुपये


हिंदी कवि और प्रशिक्षण और पेशे से वैज्ञानिक लाल्टू की नयी किताबः ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाजः आम ज़बान में कुछ बातें - विज्ञान की बुनियादी संरचना, उसके दार्शनिक पहलुओं और उससे जुड़ी बहसों और प्रौद्योगिकी से जुड़ी सीमाओं और कमज़ोरियों पर विस्तृत चर्चा करती है और चार्वाक और प्रोमेथियस का झंडा बुलन्द रखने वालों को समर्पित की गई है. एक भौतिकवादी,  बेबाक सवाल करती, नास्तिकता की दार्शनिक आवाज़  है तो दूसरा यूनानी मिथकों का नायक जिसने देवताओं के राजा ज्यूस से, आग चुराई और इंसानों को सौंप दी. वो आग ज्ञान और तकनीक की थी.

यह किताब विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं या वैज्ञानिकों तक सीमित विषय न मानकर उसे समाज, राजनीति, संस्कृति और आम आदमी के जीवन से जोड़कर देखने की कोशिश करते हुए विज्ञान को केवल सूचनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि सोचने की पद्धति के रूप में प्रस्तुत करती है. लाल्टू का मकसद यह दिखाना है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) और समाज बेशक अलग-अलग संरचनाएं हैं लेकिन वे परस्पर गहराई से जुड़ी हुई हैं. किताब ज्ञान-विज्ञान-टेक्नोलॉजी-मानविकी-एआई-भाषा का एक सिलेसिलेवार और समग्र अध्ययन करते हुए आम लोगों में वैज्ञानिक सोच यानी साइंटिफिक टेंपर को बढ़ावा देने पर जोर देती है और वैज्ञानिक अवधारणाओं और निष्कर्षों को आम ज़बान में प्रस्तुत करना जरूरी मानती है. 

ज्ञान-विज्ञान के नये आयामों की तलाश

भूमिका में लाल्टू ने बता दिया है कि किताब का मकसद सूचना देना नहीं बल्कि सोचने का तरीका बदलना है. किताब दो भागों में बंटी हुई है. ‘ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाज’ नाम से पहले भाग के अंतर्गत चार अध्याय हैं और पहले भाग के अंत में चारों अध्यायों का निचोड़, उपसंहार के रूप में दिया गया है. इस तरह यह किताब एक तरह से नये पाठकों और नये संचार माध्यमों पर पठनीयता को सहज बनाने के लिहाज से भी तैयार की गई है. 223 पृष्ठों की किताब के 182 पन्ने पहले भाग में ही है, जिनमें लाल्टू ने चारों अध्यायों के तहत विज्ञान और धर्म, विज्ञान और दर्शन, विज्ञान और मार्क्सवाद, मिथक और विज्ञान, उत्तरआधुनिकता, स्त्री विमर्श, ईश्वरीय मान्यताएं और वैज्ञानिक प्रस्थापनाएं जैसे बहुत सारे अंतर्निहित प्रश्नों को समेटा है. और उनके कुछ जवाब देने की कोशिश की है. 

किताब के पहले अध्याय,  ‘ज्ञान की ज़मीन और ज़मीनी ज्ञान’ में लाल्टू बताते हैं कि ज्ञान सिर्फ किताबों से नहीं बल्कि अनुभव, परंपरा और जमीनी यथार्थ से भी बनता है. लेकिन चाहे लोक-ज्ञान हो या वैज्ञानिक ज्ञान, उन्हें सवालों और सबूतों से परखा ही जाता है. अध्याय में बताया गया है कि ज्ञान क्या है और विज्ञान क्या, टेक्नोलॉजी से क्या आशय हैं और विज्ञान और समाज का आपसी रिश्ता क्या है. क्यों विज्ञान समाज से अलग नहीं है और सामाजिक जरूरतें कैसे विज्ञान के विकास को प्रभावित करती हैं. लेखक के मुताबिक विज्ञान का उद्देश्य तथ्यों का एकत्रीकरण नहीं बल्कि प्रकृति को समझना उसकी व्याख्या करने का है. वह एक पद्धति है जो पूछने, प्रमाण हासिल करने और निष्कर्षों की जांच पर निर्भर रहती है. लाल्टू बताते हैं कि तर्क और प्रमाण आधारित सोच लोकतांत्रिक समाज के लिए महत्वपूर्ण है. वो अंधविश्वास, मिथक और खोखले दावों पर सवाल उठाते रहने की जिम्मेदारी की याद भी दिलाते चलते हैं. दूसरा अध्याय है- ‘विज्ञान – कुदरत पर इंसान की पकड़’-  जिसमें बताया गया है कि विज्ञान प्रकृति को समझने की एक प्रणाली है और सच को जानने की प्रक्रिया है. उसका फोकस सही जवाब से ज्यादा बेहतर सवाल पर होता है और वो स्थिर नहीं निरंतर परिवर्तनशील है क्योंकि विज्ञान एक विधि है विषय नहीं.

तीसरा अध्याय ‘विज्ञान और टेक्नोलॉजी- दो हमसाए और समाज’ में लाल्टू बताते हैं कि अक्सर विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक ही बात मान लिया जाता है. विज्ञान समझ है और प्रौद्योगिकी, एप्लीकेशन है यानी विज्ञान को लागू करने का अभ्यास. टेक्नोलॉजी के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए वे उसे अन्य परिघटनाओं के साथ भी जोड़कर अपने आख्यान को विस्तार देते हैं. जैसे टेक्नोलॉजी और तर्कशीलता का सह-संबंध है और जेंडर और टेक्नोलॉजी को लेकर भी एक बहस है. इसमें अपने ढंग का पहला विश्लेषण हमें देखने को मिलता है जिसके तहत लेखक बताते हैं कि इन्सान टेक्नोलॉजी के साथा कैसे जुड़ता है इसमें जेंजर की विचारधारा भी काम करती है. 

आमतौर पर टेक्नोलॉजी के बारे में यह समझ है कि यह औरतों का काम नहीं है. इस सोच पर सवाल किया जाना चाहिए. अगर हम पुरुषों और स्त्रियों के काम की तालिका बनाए तो देखेंगे कि जेंडर पहचान और विचारधारा टेक्नोलॉजी का स्वरूप तय करती हैं...कुछ तकनीकें ऐसी हैं जिसमें मुख्यतः पुरुष काम कर रहे हैं पर स्त्रियों ने भी टेक्नोलॉजी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. इसकी सबसे अच्छी मिसाल डिजिटल कम्प्यूटर का इतिहास है. आम तौर पर यह सोचा जाता है कि डिजिटल कम्प्यूटर ज्यादा तर्कशील पुरुष इंजीनियरों, गणितज्ञों, वैज्ञानिकों और टेक्नीशियनों का खित्ता है. सच यह है कि जब कम्प्यूटरों की पहली पीढ़ी आई तो बहुत सारी प्रोग्रामर स्त्रियां थीं.

लाल्टू 


एआई और उसके औजारों के साए में हमारा समय

लाल्टू याद दिलाते हैं कि सिर्फ तकनीकी पहलुओं के आधार पर टेक्नोलॉजी पर राय नहीं बनानी चाहिए. सामाजिक नतीजों के बारे में सोचना जरूरी है. लाल्टू का तर्क है कि टेक्नोलॉजी पर हमारी राय अक्सर समझ से ज़्यादा आस्था पर टिकी होती है, हम अपने इर्द-गिर्द की मशीनों में से किसी एक को भी ठीक से नहीं समझते. चौथे अध्याय में लाल्टू विज्ञान और मानविकी की बहस में अपनी बात जोड़ते हुए बताते हुए कहते हैं कि समाज को समझने के लिए मानविकी का महत्व है और विज्ञान समाज को समझे बिना अधूरा है. इस पर आगे और चर्चा करने से पहले बता दें कि ‘एआई और अन्य सवाल’ किताब का दूसरा भाग है और उसके तहत भी चार अध्याय हैं. ये चार अध्याय मूल रूप से लाल्टू के विभिन्न विज्ञान जर्नलों, पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशित निबंध हैं जिनमें एआई और उसके तानेबाने को समझने में मदद मिलती है. 

इस भाग का पहला और किताब का पांचवा अध्याय कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर केंद्रित है. लाल्टू ए-आई की कहानी कारेल चापेक के 1920 के नाटक ‘आर.यू.आर’ से शुरू करते हैं, वही नाटक जहाँ से ‘रोबोट’ शब्द दुनिया में आया. अध्याय में बताया गया है कि एआई क्या है और वो कैसे काम करता है, कि वो सोचता नहीं पैटर्न पहचान कर जवाब तैयार करता है. उनका कहना है कि ए-आई का बुनियादी सवाल यह नहीं है कि मशीन इन्सानी इल्म कैसे पाए, बल्कि यह है कि इन्सान को मशीन की तरह कैसे समझा जाए.  छठा अध्याय भी एआई की बहस को आगे ले जाता हुआ उसमें इंसानों जैसी चेतना से जुड़े मुद्दों पर विचार करता है. चेतना को एक गहन दार्शनिक प्रश्न बताते हुए लाल्टू कहते हैं कि “कम्प्यूटर वैज्ञानिकों, तंत्रिका-विज्ञानियों (न्यूरोसाइंटिस्टों) और दार्शनिकों के एक समूह ने चेतना की विशेषताओं की एक लंबी जांच सूची बनाई है जिसमें शोधकर्ताओँ ने मानव चेतना के 14 मानदंड रखे हैं और वे उन्हें मौजूदा एआई संरचना पर लागू करते हैं, जिसमे चैट-जीपीटी को चलाने वाले मॉडल भी शामिल हैं. लेकिन ये कह पाना अब भी नामुमकिन है कि कोई मशीन वाकई चेतन है या नहीं.” 

इसी कड़ी में सातवां अध्याय एआई से ही निकले चैट-जीपीटी के औजार की छानबीन करता है. और लेखक पूछते हैं कि क्या यह इंसानी अजूबा है या धोखेबाज औजार. एआई की दौड़ में उसे मील का पत्थर बताते हुए लाल्टू न्यूरॉन तंत्र से प्रेरित इस जटिल सॉफ्टवेयर की बारीकियों को आमफहम भाषा में पाठकों को समझाते हैं कि यह मशीन लर्निंग उपयोगी भी है और नुकसानदायक भी. वे उसके सही, नैतिक, सुचिंतित इस्तेमाल पर जोर दिए जाने की वकालत करते हैं. अकादमिक और शोध जगत में चैट-जीपीटी और उस जैसे अन्य औजार क्या ‘धमाल’ मचा रहे हैं, ये किसी से छिपा नहीं है. डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उसकी भूमिका और भी बढ़ गई है और रोजगार और छंटनी जैसे गंभीर नाजुक मुद्दे एक बार फिर चर्चा और चिंता के दायरे में आ गए हैं. किताब का आखिरी और आठवां अध्याय, लेखक का जनसत्ता में प्रकाशित एक लेख है- ‘हिंदी में वैज्ञानिक शब्दावली – बेहतर या षड्यंत्र.’ इस लेख के जरिए हिंदी में विज्ञान संबंधी सूचनाओं और नवोन्मेष को लेकर भाषा व्यवहार के बारे में चर्चा की गई है. 

ज्ञान-विज्ञान की भाषा और भाषा का ज्ञान-विज्ञान 

लाल्टू का कहना है कि 'विपथन', 'उत्क्रमणीय', 'अनुदैर्घ्य' जैसे संस्कृतनिष्ठ गढ़े गए शब्द ख़ुद हिन्दी अध्यापकों की पहुंच से बाहर हैं, जबकि उनके अंग्रेज़ी पर्याय किसी भी हाईस्कूल छात्र की समझ में आ जाते हैं और 'कीमिया' और 'कीमियागर' जैसे प्रचलित शब्द सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज कर दिए गए कि वे उर्दू में भी चलते हैं. लाल्टू इसे हिन्दी-भाषियों के ख़िलाफ़ एक "षड़यंत्र" कहने से नहीं हिचकते, और इसमें जाति की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं. उनके मुताबिक यह वही चिंता है जिसे सत्येंद्रनाथ बोस जैसे वैज्ञानिक ने भारतीय भाषाओं में विज्ञान-लेखन पर ज़ोर देकर बहुत पहले सामने रखा था. लाल्टू जिद की तरह मानते हैं कि वैज्ञानिक शब्दावली को हिंदी में फैले सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद से मुक्ति दिलाना अनिवार्य है वरना विज्ञान इस भाषा में सिसकता रहेगा. और उसे सीखने पढ़ने वाले विद्यार्थी, शिक्षार्थी, शोधकर्ता भी हैरान परेशान होते रहेंगे. लाल्टू यह भी बताते हैं कि विज्ञान क्योंकि अंधविश्वासों, मिथकों और मान्यताओं का एक नया पाठ पेश करता है, बाजदफा उन्हें चुनौती देता है और पुराने रूढ़िवादी मूल्यों से टकराता भी है तो ऐसे में उसका दर्शन, उन शक्तियों के लिए चुनौती भी बनता है जो किसी न किसी रूप से सांस्कृतिक वर्चस्व के ऊपरी पायदानों पर हैं. 

“चूंकि हिंदी क्षेत्र में गरीबी, भुखमरी और बुनियादी इंसानी हुकूक जैसे मुद्दे अभी भी ज्वलंत हैं, विज्ञान और भाषा के इन सवालों पर जमीनी कार्यकर्ताओँ का ध्यान जाता भी है तो वह महत्वपूर्ण नहीं बन पाए हैं. हिंदी में विज्ञान कथाओं और विज्ञान लेखन के अभाव (कुछेक अपवादों को छोड़कर) के समाजशास्त्रीय कारणों को ढूंढा जाए तो भाषा के सवालों से हम बच नहीं पाएंगे.” 


लाल्टू ने हल्के हाथों से इस किताब को लिखा है. सरल, सहज, संवादात्मक और तकनीकी शब्दों की क्लीषे विहीन व्याख्या पेश की है. और यह बात भी ध्यान खींचती है कि अंततः लाल्टू विज्ञान को सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए अपनी प्रस्थापनाएं देते हैं. सामान्य या लोक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान, विज्ञान की प्रकृति, तकनीक का विकास, विज्ञान और लोकतंत्र, विज्ञान और सामाजिक असमानता, वैज्ञानिक नज़रिया और शिक्षा के बारे में बताते हुए वे यही कहते हैं कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय नहीं, बल्कि समाज को समझने और बेहतर बनाने का एक साधन भी है. तकनीकी या प्रौद्योगिकी अपने-आप में न तो पूरी तरह अच्छी होती है न बुरी, उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसका उपयोग किस प्रकार करता है. वैज्ञानिक वैचारिकी वाली यह किताब पाठकों के एक हिस्से को शायद बोझिल लगे लेकिन किताब का मकसद ही है आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करना, विज्ञान को आम लोगों की समझ से जोड़ना, उसे पठनीय और सहज बनाना और पेचीदा तथ्यों को स्पष्ट और सहज कर पाना. और ऐसा करते हुए लाल्टू ने मूल पाठ को सरलीकृत होने से बचाए रखा है.

ज्ञान सवालों से बनता है, और विज्ञान सामान्य समझ को जांचकर उसे व्यवस्थित बनाता है, लेकिन दोनों ही पूरी तरह पूर्ण या अंतिम नहीं हैं. ज्ञान क्या अनिवार्य तौर पर निश्चित होता है, इस गूढ़ सवाल के अर्थ खोलते हुए लाल्टू प्रसिद्ध दार्शनिक, गणितज्ञ और साहित्यकार बर्ट्रेंड रसेल को याद करते हैं, जिन्हें 1950 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला था, उन्होंने कहा है- “दरअसल हम लोग ज्ञान नहीं, निश्चितता चाहते हैं.” रसेल के कई साल बाद 2020 में साहित्य का नोबेल जीतने वाली अमेरिकी कवि लुईस ग्लिक ने एक आख्यान में कहाः “मुझे निश्चितता में धकेला जाना नापसंद है.” ज्ञान के दार्शनिक पहलुओँ की छानबीन करते हुए लाल्टू बड़े ही दिलचस्प अंदाज में, मशहूर कार्टून केल्विन एंड हॉब्स में पिता पुत्र के संवाद से संदेश उठाते हुए अनुभूति के भ्रम तक जाते हैं. इस संदर्भ में भी वे एक चर्चित कार्टून/स्केच पेश करते हैं. दो व्यक्तियों के बीच लकड़ी के ब्लॉक इस तरह रखे हैं कि बांयी तरफ वाले व्यक्ति उनकी संख्या चार बताता है और दांयी ओर खड़े व्यक्ति को तीन ब्लॉक दिखते हैं. कौन सही है? क्या हम मानेंगे कि उनमें से एक सही है, या ये मान लेंगे कि दोनों सही हैं?  

ज्ञान की निश्चितता से जुड़े विरोधाभासों और द्वंद्वों के समांतर ही किताब में एक और दिलचस्प प्रश्न भाषा या शब्द या कथन की अस्पष्टता और अनेकार्थकता के जरिए भी आया है. अस्पष्टता क्या समस्या होती है या वो एक खासियत होती है, इस संदर्भ में लाल्टू “सपना” शब्द के उदाहरण से दिखाते हैं कि एक ही शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं, जैसे सपना शब्द का आशय, नींद में आने वाले दृश्य, कल्पना, उम्मीद, लक्ष्य, या भावनात्मक स्थिति से हो सकता है. लाल्टू चुनिंदा हिंदी कवियों की कविताओं को याद करते हुए स्पष्ट करते हैं कि हर कवि के यहां सपना अलग-अलग आशयों में प्रयुक्त हुआ है. “गोरख पांडे की ‘सपन मनभावन’ – सखियों की बातचीत, ऐसा सपना जिसमे इंकलाब है, पाश की ‘सबसे खतरनाक’ – सपनों की मौत को सबसे खतरनाक कहना, और कुमार विकल की ‘स्वप्न घर’ - ऐसे घर का तसव्वुर जहां कोई हिंसा न हो, इन कविताओं में इस शब्द का उपयोग देखें. लैग्स्टन ह्यूज़ की प्रसिद्ध कविता ‘हार्लेम’ में हर पंक्ति में सपना अलग अर्थ लिए आता है – दौड़ता, किसमिस सा सूखता सड़े मांस की बदबू निकालत, भीग कर बोझिल हो चुका और आखिर में विस्फोट बन फूटता सपना. ऐसा कहा जा सकता है कि अस्पष्ट और अनेकार्थी होने की वजह से ही हम इन कविताओं में से उन सभी सामाजिक राजनैतिक-ऐतिहासिक बातों को जान पाते हैं जिनके लिए ये कविताएं जानी जाती हैं.” 

कहने का तात्पर्य यह है कि हर शब्द का सिर्फ एक ही मतलब नहीं हो सकता वरना कविता और साहित्य बहुत सीमित हो जाएगा, अस्पष्ट रहना भी जरूरी है क्योंकि उसकी वजह से ही मौलिक भावनाओं का पता चलता है, वे उद्घाटित होती हैं, बहुअर्थी ध्वन्यात्मकता बनती और समाज और राजनीति के कुछ पर्दे उठते हैं. इस तरह अस्पष्टता कमजोरी नहीं शक्ति है. मानविकी में ऐसी अस्पष्टताएं जरूरी हैं. लेकिन विज्ञान स्पष्टता चाहता है, वहां अर्थबाहुल्य की गुंजायश नहीं है, वहां परिणाम-बाहुल्य बेशक दृष्टव्य है.

विज्ञान के संशय और अनुतरित प्रश्न

लाल्टू की किताब अपनी मूल प्रस्थापना के एक अहम बिंदु के जरिए हमें आगाह भी कराती है और जिसका थोड़ा सा जिक्र इस लेख में पहले भी किया गया है कि ज्ञान कभी भी केवल सत्य नहीं होता, वो हमेशा उस भाषा और संस्थागत सत्ता का उत्पाद होता है जो यह तय करती है कि कौन बोल सकता है और कौन समझने के लिए बाध्य है. भाषा और ज्ञान की यह हेजेमनी, हिंदी में भी उसी तरह सक्रिय है जैसे कि अंग्रेजी में. फिर बात विज्ञान को हिंदी पट्टी में आमफहम बनाने के लिए उसे हिंदी में ही उतार देने से पूरी नहीं होती, उसके नये औजार देखने होंगे, नये तरीके आजमाने होंगे, एक ऐसी भाषा बनानी होगी जो दुराग्रहों से मुक्त हो और तमाम वर्चस्वों को मिटाती चले. 

लाल्टू अपनी किताब में कुछ बुनियादी दार्शनिक सवाल लगातार उठाते चलते हैं जैसे विज्ञान और धर्म पर, मार्क्सवाद के वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य पर, विज्ञान को सीधे-सीधे वरदान या अभिशाप कह देने या न कह पाने की मुश्किल या दुविधा पर. लेखक के मुताबिक हम अक्सर मान लेते हैं कि जो दिखता है वही सच है लेकिन यह बात अधूरी है क्योंकि कई चीज़ें तुरंत नहीं दिखतीं और आगे चलकर नयी जानकारी पुराने सच को बदल सकती है यानी ज्ञान स्थिर नहीं परिवर्तनशील होता है. इस तरह विज्ञान उसे ही सच मानता है जिसे बार-बार परखा, जांचा, तौला जा सके. लेकिन क्या हर चीज जांची-परखी तौली जा सकती है? क्या हर चीज प्रयोगशाल या गणितीय सूत्रों या वैज्ञानिक फार्मूलों में निबद्ध हो सकती है? शायद नहीं, क्योंकि कुछ विषय ऐसे हैं जो विज्ञान के इतर अपनी प्रक्रिया बुनते रहते हैं जैसे कला, कविता और संगीत, आस्था, चेतना, भविष्य.

कला विधाएं वैज्ञानिक संरचना के बने-बनाए स्थापित ढांचों और उसूलों के बाहर जाकर भी इंसान को चौंकाती रहती हैं. बेशक मस्तिष्क और चेतना और शारीरिक और मानसिक सक्रियता और बौद्धिक कवायद से जुड़े प्रश्न भी अंतत विज्ञान के ही प्रश्न हैं, लेकिन कुछ अवर्णनीय क्षण होते हैं जिनमें कोई सीधा स्पष्ट जवाब हमें नहीं मिलता, अधिकांश चीजें विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अनुकूलित या संचालित या प्रभावित हैं लेकिन अधिकांश ही, सब नहीं. इस तरह एक विराट विज्ञान-ब्रह्मांड में कुछ अनदेखे अनसुलझे कोने तैरते रहते हैं, जहां स्थापित दर्शन और सिद्धांत और मान्यताएं दखल नहीं देतीं. अपने अपने विवेक के आधार पर लोग तय करेंगे कि वहां उनका ईश्वर निवास करता है या उनकी आस्था या उनका विज्ञान या वहां कविता का निवास है.

एक समावेशी निरंतरता का विज्ञान लेखन

लोकप्रिय शैली में लिखी गई विज्ञान पुस्तकों की बेशक कमी है लेकिन ऐसी पुस्तकें भी आई हैं जिन्होंने एक बड़े पाठक वर्ग को वैज्ञानिक चेतना से समृद्ध किया है. इस कड़ी में एक नाम प्रसिद्ध विज्ञान लेखक गुणाकर मुळे की लोकप्रिय किताब ‘तारों भरा आकाश’ का है. ‘चाय की केतली में पहेली,’ ‘दुनिया जब नई नई थी’ जैसी अंग्रेजी से अनूदित किताबों के अलावा रादुगा प्रकाशन से 20वीं सदी के 1980 के दशक में आई, रूसी से हिंदी में अनूदित दो भागों वाली किताब ‘मनोरंजक भौतिकी’ हो या ‘स्रोत,’ ‘विज्ञान प्रगति’ और ‘साइकिल’ जैसी पत्रिकाएं या हाल में कवि-वैज्ञानिक गौहर रजा की किताब ‘मिथकों से विज्ञान तक’, काव्यांश प्रकाशन से आइवर युशएल की हिंदी में अनूदित किताब ‘बाल विज्ञान लोकप्रियकरणः एक दृष्टिकोण’ जैसे कुछेक उदाहरण हैं. हो सकता है इनमें कई महत्वपूर्ण नाम छूट रहे हों. हिंदी में अपने स्तर पर काम हो रहे हैं, हुए हैं. लेकिन कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हिन्दी में विज्ञान पर पढ़ने को इधर कम ही मिलता है, और विज्ञान, तकनीक तथा समाज के आपसी रिश्ते पर संजीदा लेखन तो लगभग नहीं दिख रहा है. 

लाल्टू अपनी नई किताब की भूमिका में इसी ख़ालीपन को विज्ञान और भाषा, दोनों का एक जातिगत संकट कहते हैं, और साफ़ करते हैं कि यही फ़िक्र उन्हें इस किताब तक ले आई- अंग्रेज़ी में पोषित एक वैज्ञानिक चेतना को आम हिन्दी ज़बान में उतार देने की कोशिश. विज्ञान पर बच्चों और बड़ों, सभी के लिए जो भी किताबें आती हैं उन्हें व्यापक चर्चा में लाना चाहिए और उनमें साइंस के नये आयाम नये विषय भी सम्मिलित होने चाहिए. जैसे महाराष्ट्र में विज्ञानपरक सामाजिक आंदोलन हुए हैं वैसे आंदोलनों-अभियानों-कार्यक्रमों की जरूरत और निरंतरता हिंदी पट्टी में इधर और तीव्रता से महसूस होती है. 

लाल्टू की किताब ऐसी ही समावेशी निरंतरता में एक मेहनतकश, सजग और जिम्मेदार प्रयत्न है. किताब में अगर किसी पाठक को बिखराव सा नज़र आता है तो वह अस्वाभाविक नहीं. लाल्टू ख़ुद मानते हैं कि इन विषयों पर उनकी पढ़ाई पूरी तरह अंग्रेज़ी में हुई और समाज-विज्ञान में हस्तक्षेप का दावा वे नहीं करते. जो पाठक और गहराई चाहेंगे उन्हें किताब में दिए सन्दर्भों की ओर जाना होगा जो किताब में भरपूर हैं. उपसंहार में लाल्टू आगाह करते हैं कि “फ़ासीवाद हर स्तर पर ज्ञान पर हमला बोलता है. किताबें जलाई जाती हैं, इंसान और इंसान के बीच भावनात्मक दरार पैदा की जाती है, एहसास कुन्द किए जाते हैं, युक्ति का क़त्ल होता है. इसलिए ज्ञान और सच पर बुनियादी तरीके से सोचना और इस बारे में हर किसी को सचेत करना ही किसी भी तरक़्क़ीपसंद इन्सान का सबसे बड़ा धर्म है.”

शिव प्रसाद जोशी 


(शिव प्रसाद जोशी का यह समीक्षा लेख 'समयांतर' पत्रिका के जुलाई 2026 अंक से साभार लिया गया है।)