Sunday, July 12, 2026

मनुष्य और समाज की बेहतरी का ज्ञान-विज्ञान - शिवप्रसाद जोशी


(विज्ञान में विचार के नये आयाम)

समीक्षा पुस्तकः ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाजः आम ज़बान में कुछ बातें 

लेखकः लाल्टू

प्रकाशकः एकलव्य

मूल्यः 200 रुपये


हिंदी कवि और प्रशिक्षण और पेशे से वैज्ञानिक लाल्टू की नयी किताबः ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाजः आम ज़बान में कुछ बातें - विज्ञान की बुनियादी संरचना, उसके दार्शनिक पहलुओं और उससे जुड़ी बहसों और प्रौद्योगिकी से जुड़ी सीमाओं और कमज़ोरियों पर विस्तृत चर्चा करती है और चार्वाक और प्रोमेथियस का झंडा बुलन्द रखने वालों को समर्पित की गई है. एक भौतिकवादी,  बेबाक सवाल करती, नास्तिकता की दार्शनिक आवाज़  है तो दूसरा यूनानी मिथकों का नायक जिसने देवताओं के राजा ज्यूस से, आग चुराई और इंसानों को सौंप दी. वो आग ज्ञान और तकनीक की थी.

यह किताब विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं या वैज्ञानिकों तक सीमित विषय न मानकर उसे समाज, राजनीति, संस्कृति और आम आदमी के जीवन से जोड़कर देखने की कोशिश करते हुए विज्ञान को केवल सूचनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि सोचने की पद्धति के रूप में प्रस्तुत करती है. लाल्टू का मकसद यह दिखाना है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) और समाज बेशक अलग-अलग संरचनाएं हैं लेकिन वे परस्पर गहराई से जुड़ी हुई हैं. किताब ज्ञान-विज्ञान-टेक्नोलॉजी-मानविकी-एआई-भाषा का एक सिलेसिलेवार और समग्र अध्ययन करते हुए आम लोगों में वैज्ञानिक सोच यानी साइंटिफिक टेंपर को बढ़ावा देने पर जोर देती है और वैज्ञानिक अवधारणाओं और निष्कर्षों को आम ज़बान में प्रस्तुत करना जरूरी मानती है. 

ज्ञान-विज्ञान के नये आयामों की तलाश

भूमिका में लाल्टू ने बता दिया है कि किताब का मकसद सूचना देना नहीं बल्कि सोचने का तरीका बदलना है. किताब दो भागों में बंटी हुई है. ‘ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाज’ नाम से पहले भाग के अंतर्गत चार अध्याय हैं और पहले भाग के अंत में चारों अध्यायों का निचोड़, उपसंहार के रूप में दिया गया है. इस तरह यह किताब एक तरह से नये पाठकों और नये संचार माध्यमों पर पठनीयता को सहज बनाने के लिहाज से भी तैयार की गई है. 223 पृष्ठों की किताब के 182 पन्ने पहले भाग में ही है, जिनमें लाल्टू ने चारों अध्यायों के तहत विज्ञान और धर्म, विज्ञान और दर्शन, विज्ञान और मार्क्सवाद, मिथक और विज्ञान, उत्तरआधुनिकता, स्त्री विमर्श, ईश्वरीय मान्यताएं और वैज्ञानिक प्रस्थापनाएं जैसे बहुत सारे अंतर्निहित प्रश्नों को समेटा है. और उनके कुछ जवाब देने की कोशिश की है. 

किताब के पहले अध्याय,  ‘ज्ञान की ज़मीन और ज़मीनी ज्ञान’ में लाल्टू बताते हैं कि ज्ञान सिर्फ किताबों से नहीं बल्कि अनुभव, परंपरा और जमीनी यथार्थ से भी बनता है. लेकिन चाहे लोक-ज्ञान हो या वैज्ञानिक ज्ञान, उन्हें सवालों और सबूतों से परखा ही जाता है. अध्याय में बताया गया है कि ज्ञान क्या है और विज्ञान क्या, टेक्नोलॉजी से क्या आशय हैं और विज्ञान और समाज का आपसी रिश्ता क्या है. क्यों विज्ञान समाज से अलग नहीं है और सामाजिक जरूरतें कैसे विज्ञान के विकास को प्रभावित करती हैं. लेखक के मुताबिक विज्ञान का उद्देश्य तथ्यों का एकत्रीकरण नहीं बल्कि प्रकृति को समझना उसकी व्याख्या करने का है. वह एक पद्धति है जो पूछने, प्रमाण हासिल करने और निष्कर्षों की जांच पर निर्भर रहती है. लाल्टू बताते हैं कि तर्क और प्रमाण आधारित सोच लोकतांत्रिक समाज के लिए महत्वपूर्ण है. वो अंधविश्वास, मिथक और खोखले दावों पर सवाल उठाते रहने की जिम्मेदारी की याद भी दिलाते चलते हैं. दूसरा अध्याय है- ‘विज्ञान – कुदरत पर इंसान की पकड़’-  जिसमें बताया गया है कि विज्ञान प्रकृति को समझने की एक प्रणाली है और सच को जानने की प्रक्रिया है. उसका फोकस सही जवाब से ज्यादा बेहतर सवाल पर होता है और वो स्थिर नहीं निरंतर परिवर्तनशील है क्योंकि विज्ञान एक विधि है विषय नहीं.

तीसरा अध्याय ‘विज्ञान और टेक्नोलॉजी- दो हमसाए और समाज’ में लाल्टू बताते हैं कि अक्सर विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक ही बात मान लिया जाता है. विज्ञान समझ है और प्रौद्योगिकी, एप्लीकेशन है यानी विज्ञान को लागू करने का अभ्यास. टेक्नोलॉजी के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए वे उसे अन्य परिघटनाओं के साथ भी जोड़कर अपने आख्यान को विस्तार देते हैं. जैसे टेक्नोलॉजी और तर्कशीलता का सह-संबंध है और जेंडर और टेक्नोलॉजी को लेकर भी एक बहस है. इसमें अपने ढंग का पहला विश्लेषण हमें देखने को मिलता है जिसके तहत लेखक बताते हैं कि इन्सान टेक्नोलॉजी के साथा कैसे जुड़ता है इसमें जेंजर की विचारधारा भी काम करती है. 

आमतौर पर टेक्नोलॉजी के बारे में यह समझ है कि यह औरतों का काम नहीं है. इस सोच पर सवाल किया जाना चाहिए. अगर हम पुरुषों और स्त्रियों के काम की तालिका बनाए तो देखेंगे कि जेंडर पहचान और विचारधारा टेक्नोलॉजी का स्वरूप तय करती हैं...कुछ तकनीकें ऐसी हैं जिसमें मुख्यतः पुरुष काम कर रहे हैं पर स्त्रियों ने भी टेक्नोलॉजी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. इसकी सबसे अच्छी मिसाल डिजिटल कम्प्यूटर का इतिहास है. आम तौर पर यह सोचा जाता है कि डिजिटल कम्प्यूटर ज्यादा तर्कशील पुरुष इंजीनियरों, गणितज्ञों, वैज्ञानिकों और टेक्नीशियनों का खित्ता है. सच यह है कि जब कम्प्यूटरों की पहली पीढ़ी आई तो बहुत सारी प्रोग्रामर स्त्रियां थीं.

लाल्टू 


एआई और उसके औजारों के साए में हमारा समय

लाल्टू याद दिलाते हैं कि सिर्फ तकनीकी पहलुओं के आधार पर टेक्नोलॉजी पर राय नहीं बनानी चाहिए. सामाजिक नतीजों के बारे में सोचना जरूरी है. लाल्टू का तर्क है कि टेक्नोलॉजी पर हमारी राय अक्सर समझ से ज़्यादा आस्था पर टिकी होती है, हम अपने इर्द-गिर्द की मशीनों में से किसी एक को भी ठीक से नहीं समझते. चौथे अध्याय में लाल्टू विज्ञान और मानविकी की बहस में अपनी बात जोड़ते हुए बताते हुए कहते हैं कि समाज को समझने के लिए मानविकी का महत्व है और विज्ञान समाज को समझे बिना अधूरा है. इस पर आगे और चर्चा करने से पहले बता दें कि ‘एआई और अन्य सवाल’ किताब का दूसरा भाग है और उसके तहत भी चार अध्याय हैं. ये चार अध्याय मूल रूप से लाल्टू के विभिन्न विज्ञान जर्नलों, पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशित निबंध हैं जिनमें एआई और उसके तानेबाने को समझने में मदद मिलती है. 

इस भाग का पहला और किताब का पांचवा अध्याय कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर केंद्रित है. लाल्टू ए-आई की कहानी कारेल चापेक के 1920 के नाटक ‘आर.यू.आर’ से शुरू करते हैं, वही नाटक जहाँ से ‘रोबोट’ शब्द दुनिया में आया. अध्याय में बताया गया है कि एआई क्या है और वो कैसे काम करता है, कि वो सोचता नहीं पैटर्न पहचान कर जवाब तैयार करता है. उनका कहना है कि ए-आई का बुनियादी सवाल यह नहीं है कि मशीन इन्सानी इल्म कैसे पाए, बल्कि यह है कि इन्सान को मशीन की तरह कैसे समझा जाए.  छठा अध्याय भी एआई की बहस को आगे ले जाता हुआ उसमें इंसानों जैसी चेतना से जुड़े मुद्दों पर विचार करता है. चेतना को एक गहन दार्शनिक प्रश्न बताते हुए लाल्टू कहते हैं कि “कम्प्यूटर वैज्ञानिकों, तंत्रिका-विज्ञानियों (न्यूरोसाइंटिस्टों) और दार्शनिकों के एक समूह ने चेतना की विशेषताओं की एक लंबी जांच सूची बनाई है जिसमें शोधकर्ताओँ ने मानव चेतना के 14 मानदंड रखे हैं और वे उन्हें मौजूदा एआई संरचना पर लागू करते हैं, जिसमे चैट-जीपीटी को चलाने वाले मॉडल भी शामिल हैं. लेकिन ये कह पाना अब भी नामुमकिन है कि कोई मशीन वाकई चेतन है या नहीं.” 

इसी कड़ी में सातवां अध्याय एआई से ही निकले चैट-जीपीटी के औजार की छानबीन करता है. और लेखक पूछते हैं कि क्या यह इंसानी अजूबा है या धोखेबाज औजार. एआई की दौड़ में उसे मील का पत्थर बताते हुए लाल्टू न्यूरॉन तंत्र से प्रेरित इस जटिल सॉफ्टवेयर की बारीकियों को आमफहम भाषा में पाठकों को समझाते हैं कि यह मशीन लर्निंग उपयोगी भी है और नुकसानदायक भी. वे उसके सही, नैतिक, सुचिंतित इस्तेमाल पर जोर दिए जाने की वकालत करते हैं. अकादमिक और शोध जगत में चैट-जीपीटी और उस जैसे अन्य औजार क्या ‘धमाल’ मचा रहे हैं, ये किसी से छिपा नहीं है. डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उसकी भूमिका और भी बढ़ गई है और रोजगार और छंटनी जैसे गंभीर नाजुक मुद्दे एक बार फिर चर्चा और चिंता के दायरे में आ गए हैं. किताब का आखिरी और आठवां अध्याय, लेखक का जनसत्ता में प्रकाशित एक लेख है- ‘हिंदी में वैज्ञानिक शब्दावली – बेहतर या षड्यंत्र.’ इस लेख के जरिए हिंदी में विज्ञान संबंधी सूचनाओं और नवोन्मेष को लेकर भाषा व्यवहार के बारे में चर्चा की गई है. 

ज्ञान-विज्ञान की भाषा और भाषा का ज्ञान-विज्ञान 

लाल्टू का कहना है कि 'विपथन', 'उत्क्रमणीय', 'अनुदैर्घ्य' जैसे संस्कृतनिष्ठ गढ़े गए शब्द ख़ुद हिन्दी अध्यापकों की पहुंच से बाहर हैं, जबकि उनके अंग्रेज़ी पर्याय किसी भी हाईस्कूल छात्र की समझ में आ जाते हैं और 'कीमिया' और 'कीमियागर' जैसे प्रचलित शब्द सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज कर दिए गए कि वे उर्दू में भी चलते हैं. लाल्टू इसे हिन्दी-भाषियों के ख़िलाफ़ एक "षड़यंत्र" कहने से नहीं हिचकते, और इसमें जाति की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं. उनके मुताबिक यह वही चिंता है जिसे सत्येंद्रनाथ बोस जैसे वैज्ञानिक ने भारतीय भाषाओं में विज्ञान-लेखन पर ज़ोर देकर बहुत पहले सामने रखा था. लाल्टू जिद की तरह मानते हैं कि वैज्ञानिक शब्दावली को हिंदी में फैले सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद से मुक्ति दिलाना अनिवार्य है वरना विज्ञान इस भाषा में सिसकता रहेगा. और उसे सीखने पढ़ने वाले विद्यार्थी, शिक्षार्थी, शोधकर्ता भी हैरान परेशान होते रहेंगे. लाल्टू यह भी बताते हैं कि विज्ञान क्योंकि अंधविश्वासों, मिथकों और मान्यताओं का एक नया पाठ पेश करता है, बाजदफा उन्हें चुनौती देता है और पुराने रूढ़िवादी मूल्यों से टकराता भी है तो ऐसे में उसका दर्शन, उन शक्तियों के लिए चुनौती भी बनता है जो किसी न किसी रूप से सांस्कृतिक वर्चस्व के ऊपरी पायदानों पर हैं. 

“चूंकि हिंदी क्षेत्र में गरीबी, भुखमरी और बुनियादी इंसानी हुकूक जैसे मुद्दे अभी भी ज्वलंत हैं, विज्ञान और भाषा के इन सवालों पर जमीनी कार्यकर्ताओँ का ध्यान जाता भी है तो वह महत्वपूर्ण नहीं बन पाए हैं. हिंदी में विज्ञान कथाओं और विज्ञान लेखन के अभाव (कुछेक अपवादों को छोड़कर) के समाजशास्त्रीय कारणों को ढूंढा जाए तो भाषा के सवालों से हम बच नहीं पाएंगे.” 


लाल्टू ने हल्के हाथों से इस किताब को लिखा है. सरल, सहज, संवादात्मक और तकनीकी शब्दों की क्लीषे विहीन व्याख्या पेश की है. और यह बात भी ध्यान खींचती है कि अंततः लाल्टू विज्ञान को सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए अपनी प्रस्थापनाएं देते हैं. सामान्य या लोक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान, विज्ञान की प्रकृति, तकनीक का विकास, विज्ञान और लोकतंत्र, विज्ञान और सामाजिक असमानता, वैज्ञानिक नज़रिया और शिक्षा के बारे में बताते हुए वे यही कहते हैं कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय नहीं, बल्कि समाज को समझने और बेहतर बनाने का एक साधन भी है. तकनीकी या प्रौद्योगिकी अपने-आप में न तो पूरी तरह अच्छी होती है न बुरी, उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज उसका उपयोग किस प्रकार करता है. वैज्ञानिक वैचारिकी वाली यह किताब पाठकों के एक हिस्से को शायद बोझिल लगे लेकिन किताब का मकसद ही है आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करना, विज्ञान को आम लोगों की समझ से जोड़ना, उसे पठनीय और सहज बनाना और पेचीदा तथ्यों को स्पष्ट और सहज कर पाना. और ऐसा करते हुए लाल्टू ने मूल पाठ को सरलीकृत होने से बचाए रखा है.

ज्ञान सवालों से बनता है, और विज्ञान सामान्य समझ को जांचकर उसे व्यवस्थित बनाता है, लेकिन दोनों ही पूरी तरह पूर्ण या अंतिम नहीं हैं. ज्ञान क्या अनिवार्य तौर पर निश्चित होता है, इस गूढ़ सवाल के अर्थ खोलते हुए लाल्टू प्रसिद्ध दार्शनिक, गणितज्ञ और साहित्यकार बर्ट्रेंड रसेल को याद करते हैं, जिन्हें 1950 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला था, उन्होंने कहा है- “दरअसल हम लोग ज्ञान नहीं, निश्चितता चाहते हैं.” रसेल के कई साल बाद 2020 में साहित्य का नोबेल जीतने वाली अमेरिकी कवि लुईस ग्लिक ने एक आख्यान में कहाः “मुझे निश्चितता में धकेला जाना नापसंद है.” ज्ञान के दार्शनिक पहलुओँ की छानबीन करते हुए लाल्टू बड़े ही दिलचस्प अंदाज में, मशहूर कार्टून केल्विन एंड हॉब्स में पिता पुत्र के संवाद से संदेश उठाते हुए अनुभूति के भ्रम तक जाते हैं. इस संदर्भ में भी वे एक चर्चित कार्टून/स्केच पेश करते हैं. दो व्यक्तियों के बीच लकड़ी के ब्लॉक इस तरह रखे हैं कि बांयी तरफ वाले व्यक्ति उनकी संख्या चार बताता है और दांयी ओर खड़े व्यक्ति को तीन ब्लॉक दिखते हैं. कौन सही है? क्या हम मानेंगे कि उनमें से एक सही है, या ये मान लेंगे कि दोनों सही हैं?  

ज्ञान की निश्चितता से जुड़े विरोधाभासों और द्वंद्वों के समांतर ही किताब में एक और दिलचस्प प्रश्न भाषा या शब्द या कथन की अस्पष्टता और अनेकार्थकता के जरिए भी आया है. अस्पष्टता क्या समस्या होती है या वो एक खासियत होती है, इस संदर्भ में लाल्टू “सपना” शब्द के उदाहरण से दिखाते हैं कि एक ही शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं, जैसे सपना शब्द का आशय, नींद में आने वाले दृश्य, कल्पना, उम्मीद, लक्ष्य, या भावनात्मक स्थिति से हो सकता है. लाल्टू चुनिंदा हिंदी कवियों की कविताओं को याद करते हुए स्पष्ट करते हैं कि हर कवि के यहां सपना अलग-अलग आशयों में प्रयुक्त हुआ है. “गोरख पांडे की ‘सपन मनभावन’ – सखियों की बातचीत, ऐसा सपना जिसमे इंकलाब है, पाश की ‘सबसे खतरनाक’ – सपनों की मौत को सबसे खतरनाक कहना, और कुमार विकल की ‘स्वप्न घर’ - ऐसे घर का तसव्वुर जहां कोई हिंसा न हो, इन कविताओं में इस शब्द का उपयोग देखें. लैग्स्टन ह्यूज़ की प्रसिद्ध कविता ‘हार्लेम’ में हर पंक्ति में सपना अलग अर्थ लिए आता है – दौड़ता, किसमिस सा सूखता सड़े मांस की बदबू निकालत, भीग कर बोझिल हो चुका और आखिर में विस्फोट बन फूटता सपना. ऐसा कहा जा सकता है कि अस्पष्ट और अनेकार्थी होने की वजह से ही हम इन कविताओं में से उन सभी सामाजिक राजनैतिक-ऐतिहासिक बातों को जान पाते हैं जिनके लिए ये कविताएं जानी जाती हैं.” 

कहने का तात्पर्य यह है कि हर शब्द का सिर्फ एक ही मतलब नहीं हो सकता वरना कविता और साहित्य बहुत सीमित हो जाएगा, अस्पष्ट रहना भी जरूरी है क्योंकि उसकी वजह से ही मौलिक भावनाओं का पता चलता है, वे उद्घाटित होती हैं, बहुअर्थी ध्वन्यात्मकता बनती और समाज और राजनीति के कुछ पर्दे उठते हैं. इस तरह अस्पष्टता कमजोरी नहीं शक्ति है. मानविकी में ऐसी अस्पष्टताएं जरूरी हैं. लेकिन विज्ञान स्पष्टता चाहता है, वहां अर्थबाहुल्य की गुंजायश नहीं है, वहां परिणाम-बाहुल्य बेशक दृष्टव्य है.

विज्ञान के संशय और अनुतरित प्रश्न

लाल्टू की किताब अपनी मूल प्रस्थापना के एक अहम बिंदु के जरिए हमें आगाह भी कराती है और जिसका थोड़ा सा जिक्र इस लेख में पहले भी किया गया है कि ज्ञान कभी भी केवल सत्य नहीं होता, वो हमेशा उस भाषा और संस्थागत सत्ता का उत्पाद होता है जो यह तय करती है कि कौन बोल सकता है और कौन समझने के लिए बाध्य है. भाषा और ज्ञान की यह हेजेमनी, हिंदी में भी उसी तरह सक्रिय है जैसे कि अंग्रेजी में. फिर बात विज्ञान को हिंदी पट्टी में आमफहम बनाने के लिए उसे हिंदी में ही उतार देने से पूरी नहीं होती, उसके नये औजार देखने होंगे, नये तरीके आजमाने होंगे, एक ऐसी भाषा बनानी होगी जो दुराग्रहों से मुक्त हो और तमाम वर्चस्वों को मिटाती चले. 

लाल्टू अपनी किताब में कुछ बुनियादी दार्शनिक सवाल लगातार उठाते चलते हैं जैसे विज्ञान और धर्म पर, मार्क्सवाद के वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य पर, विज्ञान को सीधे-सीधे वरदान या अभिशाप कह देने या न कह पाने की मुश्किल या दुविधा पर. लेखक के मुताबिक हम अक्सर मान लेते हैं कि जो दिखता है वही सच है लेकिन यह बात अधूरी है क्योंकि कई चीज़ें तुरंत नहीं दिखतीं और आगे चलकर नयी जानकारी पुराने सच को बदल सकती है यानी ज्ञान स्थिर नहीं परिवर्तनशील होता है. इस तरह विज्ञान उसे ही सच मानता है जिसे बार-बार परखा, जांचा, तौला जा सके. लेकिन क्या हर चीज जांची-परखी तौली जा सकती है? क्या हर चीज प्रयोगशाल या गणितीय सूत्रों या वैज्ञानिक फार्मूलों में निबद्ध हो सकती है? शायद नहीं, क्योंकि कुछ विषय ऐसे हैं जो विज्ञान के इतर अपनी प्रक्रिया बुनते रहते हैं जैसे कला, कविता और संगीत, आस्था, चेतना, भविष्य.

कला विधाएं वैज्ञानिक संरचना के बने-बनाए स्थापित ढांचों और उसूलों के बाहर जाकर भी इंसान को चौंकाती रहती हैं. बेशक मस्तिष्क और चेतना और शारीरिक और मानसिक सक्रियता और बौद्धिक कवायद से जुड़े प्रश्न भी अंतत विज्ञान के ही प्रश्न हैं, लेकिन कुछ अवर्णनीय क्षण होते हैं जिनमें कोई सीधा स्पष्ट जवाब हमें नहीं मिलता, अधिकांश चीजें विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अनुकूलित या संचालित या प्रभावित हैं लेकिन अधिकांश ही, सब नहीं. इस तरह एक विराट विज्ञान-ब्रह्मांड में कुछ अनदेखे अनसुलझे कोने तैरते रहते हैं, जहां स्थापित दर्शन और सिद्धांत और मान्यताएं दखल नहीं देतीं. अपने अपने विवेक के आधार पर लोग तय करेंगे कि वहां उनका ईश्वर निवास करता है या उनकी आस्था या उनका विज्ञान या वहां कविता का निवास है.

एक समावेशी निरंतरता का विज्ञान लेखन

लोकप्रिय शैली में लिखी गई विज्ञान पुस्तकों की बेशक कमी है लेकिन ऐसी पुस्तकें भी आई हैं जिन्होंने एक बड़े पाठक वर्ग को वैज्ञानिक चेतना से समृद्ध किया है. इस कड़ी में एक नाम प्रसिद्ध विज्ञान लेखक गुणाकर मुळे की लोकप्रिय किताब ‘तारों भरा आकाश’ का है. ‘चाय की केतली में पहेली,’ ‘दुनिया जब नई नई थी’ जैसी अंग्रेजी से अनूदित किताबों के अलावा रादुगा प्रकाशन से 20वीं सदी के 1980 के दशक में आई, रूसी से हिंदी में अनूदित दो भागों वाली किताब ‘मनोरंजक भौतिकी’ हो या ‘स्रोत,’ ‘विज्ञान प्रगति’ और ‘साइकिल’ जैसी पत्रिकाएं या हाल में कवि-वैज्ञानिक गौहर रजा की किताब ‘मिथकों से विज्ञान तक’, काव्यांश प्रकाशन से आइवर युशएल की हिंदी में अनूदित किताब ‘बाल विज्ञान लोकप्रियकरणः एक दृष्टिकोण’ जैसे कुछेक उदाहरण हैं. हो सकता है इनमें कई महत्वपूर्ण नाम छूट रहे हों. हिंदी में अपने स्तर पर काम हो रहे हैं, हुए हैं. लेकिन कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हिन्दी में विज्ञान पर पढ़ने को इधर कम ही मिलता है, और विज्ञान, तकनीक तथा समाज के आपसी रिश्ते पर संजीदा लेखन तो लगभग नहीं दिख रहा है. 

लाल्टू अपनी नई किताब की भूमिका में इसी ख़ालीपन को विज्ञान और भाषा, दोनों का एक जातिगत संकट कहते हैं, और साफ़ करते हैं कि यही फ़िक्र उन्हें इस किताब तक ले आई- अंग्रेज़ी में पोषित एक वैज्ञानिक चेतना को आम हिन्दी ज़बान में उतार देने की कोशिश. विज्ञान पर बच्चों और बड़ों, सभी के लिए जो भी किताबें आती हैं उन्हें व्यापक चर्चा में लाना चाहिए और उनमें साइंस के नये आयाम नये विषय भी सम्मिलित होने चाहिए. जैसे महाराष्ट्र में विज्ञानपरक सामाजिक आंदोलन हुए हैं वैसे आंदोलनों-अभियानों-कार्यक्रमों की जरूरत और निरंतरता हिंदी पट्टी में इधर और तीव्रता से महसूस होती है. 

लाल्टू की किताब ऐसी ही समावेशी निरंतरता में एक मेहनतकश, सजग और जिम्मेदार प्रयत्न है. किताब में अगर किसी पाठक को बिखराव सा नज़र आता है तो वह अस्वाभाविक नहीं. लाल्टू ख़ुद मानते हैं कि इन विषयों पर उनकी पढ़ाई पूरी तरह अंग्रेज़ी में हुई और समाज-विज्ञान में हस्तक्षेप का दावा वे नहीं करते. जो पाठक और गहराई चाहेंगे उन्हें किताब में दिए सन्दर्भों की ओर जाना होगा जो किताब में भरपूर हैं. उपसंहार में लाल्टू आगाह करते हैं कि “फ़ासीवाद हर स्तर पर ज्ञान पर हमला बोलता है. किताबें जलाई जाती हैं, इंसान और इंसान के बीच भावनात्मक दरार पैदा की जाती है, एहसास कुन्द किए जाते हैं, युक्ति का क़त्ल होता है. इसलिए ज्ञान और सच पर बुनियादी तरीके से सोचना और इस बारे में हर किसी को सचेत करना ही किसी भी तरक़्क़ीपसंद इन्सान का सबसे बड़ा धर्म है.”

शिव प्रसाद जोशी 


(शिव प्रसाद जोशी का यह समीक्षा लेख 'समयांतर' पत्रिका के जुलाई 2026 अंक से साभार लिया गया है।)

Monday, June 8, 2026

क्या अपमान से निपटने के लिए उग्रता के अलावा कोई रास्ता है?

समीक्षा निबंध: प्रसांता चक्रवर्ती

रॉक्सेन एल. यूबेन. ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स. 

(प्रिंसटन और ऑक्सफ़र्ड: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2025.)

क्या अपमान और यातना के स्तर पर हम सब एक समान हैं: उस स्थिति में जब "सम्मानीय व्यक्ति के साथ चोर जैसा व्यवहार होता है और चोर को एक महानायक की तरह पेश किया जाता है", और इस बीच हम तानाशाहों की अत्याचारियों से अदला-बदली करते रहते हैं? व्यक्ति और उसके साथ ही एक पूरी की पूरी "क़ौम" को समानता के ज़रिए परिभाषित किया जा सकता है- अपमान में, महत्वहीनता और साझी क़िस्मत के मामले में. या क्या हम किसी तरह अपमान का मुक़ाबला करने के बारे में सोच सकते हैं, ताकि उल्टे अपमान की प्रक्रिया का सहारा लेने के बजाय हम इससे निपटने के दूसरे रास्ते खोजें और फिर भी प्रतिक्रिया न तो नीरस रहे और न बहुत जज़्बाती?

हाल ही में छपी सूक्ष्म विश्लेषण और गहन शोध पर आधारित किताब में रॉक्सेन एल. यूबेन हमें बताती हैं कि अपमान का मूल शारीरिक पीड़ा में उतना नहीं होता, जितना एक ख़ास क़िस्म के मानसिक आघात में ज़्यादा होता है, जो केवल असहायता के अनुभवों में नहीं बल्कि जबरन किसी ऐसी चीज़ या व्यक्ति में ढाल दिए जाने में होता है, जिसे अब हम नहीं पहचानते. हम जो हैं और हमें जो बनाया जाता है, अपमान उसमें एक विच्छेद लाता है.

अपनी यात्रा की शुरुआत में ही यूबेन हमें बता देती हैं कि शायद हम अपमानित होने के असल अभ्यास और इसे अंजाम देने के अलग-अलग तरीक़ों पर ध्यान देकर ही किसी तरह की धारणात्मक स्पष्टता तक पहुँच सकते हैं: अपमान आलंकारिक तौर पर हर जगह मौजूद है और राजनीतिक तौर पर प्रबल है, लेकिन धारणा के बतौर यह हमारी पकड़ से फिसल जाता है.

असल में, अपमान में नीचे की ओर एक झुकाव होता है, ज़मीन में गाड़ देने का, असल में मिट्टी चटवानेके लिए मजबूर करने का अनुभव. इस किताब में अपमान के लिए जो दो सबसे ज़्यादा बार इस्तेमाल किए गए शब्द हैं, वो हैं ढल और इहाना. ये मूल शब्द अरबी में गंदगी और धरती के लिए इस्तेमाल होते हैं, यानी गंदगी या धूल से ढक देना, मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मजबूर और विवश किया जाना और नीचा दिखाना. या एक और पुराने मुहावरेदार वाक्यांश अर्घमा अनफ़ाहू का शाब्दिक अर्थ है नाक को ज़मीन से रगड़ देना.इसी तरह अंग्रेज़ी शब्द ह्यूमिलिएशन की उत्पत्ति लैटिन ह्यूमस यानी पृथ्वीया ज़मीनमें खोजी जा सकती है और कुछ ऐसा ही जर्मन और बाइबिल के ज़माने की हिब्रू दोनों में मिलता है. आपकी दुनिया पर दूसरे का कब्ज़ा हो जाता है: आप जो कुछ भी कभी थे, वह सब उस चीज़ से ओझल हो जाता है जो अपमान करने वाले ने आपको बना दिया है.

अपमान का एक अहम पहलू है, इसका सार्वजनिक चरित्र- मसलन घटना के बाद उसका बखान अपमान का महज़ ज़िक्र नहीं है, उसी का एक विस्तार है, जो इसके प्रभावी होने के लिए ज़रूरी है. अपमान एक तमाशा है. दूसरा इससे जुड़ा पहलू है, गवाह की मौजूदगी, जो एक संरचना का हिस्सा है: अपमान करने वाला, अपमानित और गवाह. गवाह में सब कुछ देख रहे भगवान से लेकर असल में इकट्ठा हुई भीड़ तक शामिल हैं या फिर वह मीडिया की बनाई दुनिया का हिस्सा बन सकता है. अगर अपमान अन्यायपूर्ण ढंग से थोपी गई लाचारी और वैध दर्जे के बीच विच्छेद में बसता है, तो इसका बार-बार दोहराया जाना उस विच्छेद का फिर से अभिनय है, जो उस अनुभव को फिर से ज़िंदा करने में सक्षम है.अपमान करने वाले का सुख उसके फिर से शक्ति हासिल करने, विच्छेद को फिर से दिखाने और अपमानित के अनुभव को फिर से ज़िंदा करने में निहित होता है.

यूबेन के प्रमुख स्रोत एक पूरी सभ्यता को अपमानित करने के पश्चिमी मॉडल को इस्लामी प्रतिक्रियाओं और मिस्र में हुए अरब स्प्रिंग पर आधारित हैं. एक जवाब यह है कि इस्लाम के दुश्मनों ने मुसलमानों को अपमानित करने के लिए बेइंतहा ताक़त का इस्तेमाल और मुस्लिमों की यह पहचानने में नाकामी कि इस्लाम की श्रेष्ठता के प्रतिनिधि और उसकी सेवक उम्मत (अदल्ला अल-उम्मा) के अस्तित्व के लिए सत्ता के उस पदानुक्रम को उलटने के लिए संघर्ष की ज़रूरत है, जो अपमान से जन्मता है. अपमान का यह ढाँचा कैसे आकार लेता है, जिसमें ये घटक एक साझा ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में गढ़े गए प्रतीकों, छवियों, रूपकों और कोड वाली शब्दावली के एक ख़ास संग्रह के ज़रिए कई जगहों पर कैसे बनते हैं? यूबेन बयानबाज़ी को एक उपकरण के तौर पर ठीक ही काफ़ी अहमियत देती हैं (शुरुआती बयानबाज़ी के तरीक़े हैं- मौखिक, दिखावटी और देहगत). शुरुआत में वह अपमान के फ़ौरी समाधान की माँग के औज़ार के बतौर तफ़सीर और फ़तवा की अहमियत पर विचार करती हैं. इसके अलावा वह विज्ञप्तियों, लंबे-चौड़े साक्षात्कारों, धुंधले पड़ चुके शौकिया वीडियो, हाई-प्रोडक्शन छोटी फ़िल्मों, पत्रिका लेखों, रेडियो प्रसारणों, प्रेस विज्ञप्तियों, विस्तृत भाषणों को बारीक़ी से जाँचती हैं- जो टेप कसेट से लेकर इंटरनेट तक कई तकनीकों के ज़रिए फैलाए गए हैं. ये प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रकृति में प्रतिशोधात्मक हैं. यह अपने अपमान करने वाले को सचमुच या प्रतीकात्मक रूप से मिट्टी में मिला देने की भावना ही है, जो 'बदले में अपमान' को पैदा करती है, जो तुरंत लाचारी के साये को छिन्न-भिन्न कर देती है. लेकिन असल में यह सिर्फ़ अपमान के ईश्वरीय न्याय का औचित्य है. इसका यह दावा होता है कि जिन्होंने इस्लाम को अपमानित किया है, उन पर लाचारी थोपना सत्ता संबंधों का एक शाब्दिक और प्रतीकात्मक उलटफेर है, जो बुरी तरह से अस्त-व्यस्त दुनिया में व्यवस्था और समझ बहाल करता है. बदले में अपमान ईश्वर की ओर से नियत सामाजिक व्यवस्था के प्रति समर्पण का एक सर्वोच्च प्रमाण बन जाता है. और विरोधाभास यह है कि ईश्वर के प्रति विनम्रता के मायने हैं अपमान करने की दिव्य शक्ति को हथिया लेना.

क्या अपमान से निपटने के लिए साहस, उग्रता और ताक़त की जवाबी बयानबाज़ी या इसका उलटा इस्तेमाल करने के अलावा कोई और तरीक़ा है: कांट की नैतिक स्वायत्तता और मानवीय गरिमा की भाषा के अलावा? शानदार स्रोतों के साथ ही इस किताब का सबसे अहम योगदान असल में अपमान से निपटने के लिए एक तीसरी संभावना पेश करना है. पहली बात तो यह समझना है कि भले ही कांट के नैतिक ढांचे का इस्तेमाल करना जवाब न हो पर अपमान और करामा (या "गरिमा") असल में एक-दूसरे के विरोधी होने के बजाय एक-दूसरे के पूरक हैं. पूरी कौम गरिमा चाहती है और ज़रूरी नहीं कि हमेशा सामाजिक न्याय या आज़ादी की बात ही करे- क्योंकि घोर लाचारी की भावना का आख़िर समाधान होना चाहिए (अपमान आख़िर में दैहिक और प्रतीकात्मक होता है: झुका हुआ सिर और चेहरे पर थप्पड़; या ज़मीन पर गिराए जाने की मजबूरी). ऐसे में करामा में पहचान का एक अनुभूत क्षण है- जो सामूहिक दृढ़ता का नतीजा है.

और यहाँ यूबेन नुक़सान की भरपाई के मेलियन तरीक़े की याद दिलाती हैं. "मेलियन" का संदर्भ थ्यूसीडाइड्स की किताब हिस्ट्री ऑफ़ पेलोपोनेशियन वॉर में मेलोस के निवासियों से है, जिन्होंने विनाश और गुलामी की धमकी दिए जाने के बावजूद एथेंस के साम्राज्य के सामने झुकने से इनकार कर दिया था. मेलियन लोगों ने उन्हें जीतने को तैयार सेना की ओर से भेजे गए एथेंस के दूतों से कहा था, "आत्मसमर्पण का मतलब है खुद को निराशा के हवाले करना. जबकि कार्रवाई से हमें अभी भी उम्मीद है कि हम सीधे खड़े हो पाएँगे" (स्टेनाई ऑर्थोस, जिसका अर्थ है सीधा रहना या खड़ा होना). एथेंस की चेतावनियों के सामने डटकर खड़े रहना ख़ुद में ही एक तरह की जीत है.

अपनी बात रखने के लिए यूबेन स्टोइक्स और अर्नेस्ट ब्लॉक के सीधे खड़े होने के ख़याल ऑर्थोस का ज़िक्र करती हैं: गरिमा "सीधे खड़े होने का ऑर्थोपीडिया" है. करामा को कांट के बजाय मेलियन के रूप में बताना उसे दृढ़ता से खड़े होने के प्रतीक और प्रदर्शन के रूप में दिखाना है, जहाँ "खड़े होने" को शाब्दिक और रूपक दोनों तरह से समझा जाता है. अपमान विरोध में नहीं, बल्कि एक मंज़ूरशुदा ईमानदारी या क़द के संदर्भ में आकार लेता है, और यह अपमान ही है जो उस ईमानदारी या क़द पर छा जाता है और जिसे फिर से बहाल किया जाना चाहिए. चूँकि "अपमान और गरिमा/करामा का क्या मतलब है और वे क्या करते हैं, यह एक ही जगह और शरीर पर और उसके ज़रिए दिखाया जाता है, इसलिए एक के बिना दूसरे की सत्ता-मीमांसा और राजनीति को पकड़ पाना असंभव है." यह नैतिक स्वायत्तता के मानदंडों या हिंसा के फ़ैसलों के बारे में कम है, बल्कि यह समझने को लेकर है कि गरिमा भी अपमान की तरह ही एक देहगत अभ्यास है, जिसकी यह किताब प्रशंसा करती है. दृढ़ता से खड़े रहना अपने जीवन की कहानी को आकार देने की शक्ति पर क्रियात्मक ढंग से दावा करना है, जो अपमान के केंद्र में मौजूद `नपुंसकता` की पकड़ को ढीला करता है. गरिमा की बहाली धीरे-धीरे होती है और यह फैलती जाती है. इंसान खड़ा होना शुरू करता है. और जब पूरा समाज इनकार के ज़रिए अपना सिर उठाता है- तो यह "निर्विवाद रूप से ज़ाहिर" हो जाता है: दूसरों को, पर साथ ही ख़ुद को भी.

आलोचना के हवाले से एक बात. भले ही किताब अपमान के प्रति दो तरह की प्रतिक्रियाओं के बीच अंतर करने की कोशिश करती है: बदले में अपमान और अपमान करने वाले के सामने खड़ा होना, यह पूरी तरह से आश्वस्त नहीं कर पाती कि मिस्र का प्रतिरोध सही रास्ते पर था और इस्लामिस्ट प्रतिक्रियावादी थे. यह अंतर कुछ ज़्यादा ही साफ़-सुथरा है और हमें एक बाइनरी में बाँधता है, जबकि इतिहास कहीं ज़्यादा उलझावभरा होता है. इसके अलावा, लेखिका इस बात पर ध्यान नहीं देतीं कि अगर अपमान राजनीतिक क़दमों और रणनीतियों के मूल्यांकन का आधार होता है तो पहचान/राष्ट्र/कौमों पर आधारित राजनीति में हमेशा प्रतिक्रियावादी बनने की संभावना होती है, ख़ासकर तब जब आलोचनात्मक विवेक को एक तरफ़ रख दिया जाता है और संकट के समय शिकायत-आधारित भावनाएँ हावी हो जाती हैं. तो एक अहम सवाल जो पूछा जाएगा: गरिमा या 'सीधी खड़े होने की भंगिमा' आख़िर किसके भरोसे टिकी होगी? शिकायत-आधारित सत्ता-मीमांसा का तर्क न तो प्रगतिशील है और न ही इसमें कोई परिवर्तनकारी हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य है. अहम बात यह देखना है कि गरिमा से जुड़ी गर्व की भावना को एक न्यायपूर्ण समाज की तरफ़ रचनात्मक दिशा कैसे दी जा सकती है.

 (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: अजय शर्मा)

Prasanta Chakravarty
 प्रसांता चक्रवर्ती साहित्य, संगीत और विविध कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले विरल बौद्धिक शख़्स हैं। वे कवि-गद्यकार हैं, सहृदय आलोचक हैं, गीतकार हैं, संगीतकार हैं, कैमरामैन हैं और प्रतिबद्ध पाठक हैं। सबसे बढ़कर ग़ालिब के वो दुश्वार आदमी हैं जिसने इंसां होना मयस्सर किया है। पेशे से विश्वविद्यालय में अंग्रेजी अध्यापक प्रसांता की बांग्ला, अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य में उसी तरह आवाजाही रहती है जैसे विभिन्न कला-रूपों में। हिन्दी कविताओं से उन्हे प्यार है और वे हिन्दी कविताओं पर अपनी पसंद के आधार पर अंग्रेजी में लिखते रहे हैं। 

रॉक्सेन एल. यूबेन की किताब ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स पर यह लेख उन्होंने समयांतर पत्रिका के अनुरोध पर लिखा था। वहीं से साभार।


Friday, June 5, 2026

मोहन मुक्त की कविताएँ

कवि मोहन मुक्त



मेरा पहाड़ ?????

मुंडा कोल
गोंड नाग

बौद्ध द्रविड़
या हडप्पन बाद के
जो कोई भी थे मेरे पुरखे
उन्होंने कभी नहीं कहा ....'मेरा पहाड़'
कम से कम रिकॉर्ड तो यही बताते हैं
अगर कहा भी हो
तो कैसे जानें
उनकी तो बची नहीं भाषा भी कोई
जो कुछ बच गया
उनकी भाषा का
वो गाली बन गया
भाषाविद कहते हैं
कि 'डूम' शब्द आर्य भाषा का नहीं है
खशो ने बनाया 'खशदेश'
उन्होंने जरूर कहा ....'मेरा पहाड़'
गुप्तों के अधीन कत्यूरियों ने कहा....'मेरा पहाड़'
आर्यों ने कहा गंगा मेरी तो..... 'मेरा पहाड़'
नीलगिरी पर कब्ज़ा छोड़े बिना
विंध्य को लांघकर
सारी बुद्ध प्रतिमाओं को
शिव बनाकर
शंकराचार्य ने कहा .....'मेरा पहाड़'
मैदानी चन्दो ने कत्यूरियों को कहा खदेड़कर अब ...
.....'मेरा पहाड़'
नेपाली गोरखाओं ने चंदों से छीनकर कर कहा गरजते हुए
.......'मेरा पहाड़'
काली के इस तरफ़ ना आना
सागौली में अंग्रेज ने धमकाकर कहा गोरखों से.... 'मेरा पहाड़'
मल्ल पंवार कहते रहे ......'मेरा पहाड़'
गंगोली मड़कोटी राजा ने भी कहा... 'मेरा पहाड़
राजा का राजपुरोहित
उप्रेती भी कहता रहा... 'मेरा पहाड़'
कहा जाता है कि उसने मार दिया था राजा
उसकी जगह बैठाए
गुमानी के मराठी पुरखे भी बोले ...'मेरा पहाड़'
नेपाल के ज्योतिष
जिन्हें राजा ने दी
पोखरी की जागीर
वो कहने लगे.... 'मेरा पहाड़'
महाराष्ट्र से आये डबराल ने तो
अपना नाम ही रखा हिमाल के डाबर गांव पर
और कहा .......'मेरा पहाड़'
थानेश्वर कुरुक्षेत्र से आये
जनार्दन शर्मा के वंशज
मंदिर में पाठ करने के चलते कहलाये पाठक
वो सगर्व और साधिकार कहते हैं ...'मेरा पहाड़'
जो भी कहता है 'मेरा पहाड़'
वो प्यार नहीं करता
वो जताता है दावा
जीती गई
लूटी गई
छीनी गयी
कब्जाई गयी
और बांटी गयी
ज़मीनों पर
जागीरों पर
बर्फ जंगल पानी और बुग्याल
किसी के हो कैसे सकते हैं भला
सारे कवि जो मुग्ध हैं पहाड़ों के सौंदर्य पर
जो पहाड़ों को ऊंचाई और मजबूती का रूपक बताते हैं
वो बेईमान हैं
वो शिकार में मारे गए बाघ की लाश पर
उसकी ताक़त का बखान कर
दरअसल गा रहे हैं हत्यारे की प्रशस्ति
सारे राजा
सारे विजेता
सारे हत्यारे
सारे लुटेरे
सारे ज्योतिष
सारे पुरोहित
सारे गुमानी
सारे धर्माधिकारी
और सब के सब कवि एक साथ भी कहें अगर ...
.....'मेरा पहाड़'
तो भी मैं नहीं कहूंगा
मैं नहीं कहूंगा ....'मेरा पहाड़'
मैं कह ही नहीं सकता कभी....'मेरा पहाड़'
दो वजहों के चलते
एक तो ...'मेरा पहाड़' ...ये भाषा नही मेरी
और ज़्यादा मजबूत वज़ह
मैं ही पहाड़ हूँ...................
***

मेरी विचारधारा...

मुझे किसी संस्कृति से प्यार नहीं
मुझे किसी सभ्यता से प्यार नहीं
मुझे किसी गांव से प्यार नहीं
मुझे किसी क्षेत्र से प्यार नहीं
मुझे किसी प्रदेश से प्यार नहीं
मुझे किसी देश से प्यार नहीं
मुझे किसी धर्म से प्यार नहीं
मुझे किसी जाति से प्यार नही
मुझे किसी भाषा से प्यार नहीं
मुझे किसी 'परिभाषा' से प्यार नहीं
मैं ख़ुद को और ख़ुद जैसे दूसरे सभी इंसानों को किसी तारे की धूल के अलावा कुछ नहीं मानता
वो इसके अलावा कुछ हो भी नहीं सकते
यही अब तक जाना पहचाना गया वस्तुगत, गतिमान,वैज्ञानिक और गरिमापूर्ण सच है
मैं इंसानों से प्यार करता हूँ और डूबकर करता हूँ,
जिन्हें प्यार किया है और करता हूँ वो जानते हैं कि मैं कैसा प्यार करता हूँ
लेकिन मैं केवल प्यार नहीं करता मैं घृणा भी करता हूँ
हर उस संकीर्ण विचार से घृणा करता हूँ जो तारे की एक मुट्ठी धूल को दूसरी मुट्ठी धूल से बेहतर या बद्तर मानता है
यही प्यार और घृणा मेरा बोध अस्तित्व और चरित्र है
यही मेरा सब कुछ है

केवल यही मेरी विचारधारा है...... और कुछ नहीं... 

***

मोहन मुक्त



जादू

अकारण ही की जानी वाली नफ़रत
बस यूँ ही बिचकाए गए चेहरे
एक अजीब सी अलग सी दुर्लभ सी
लेकिन रोज़ ही दिखने वाली मुस्कुराहट
जिससे धक्क होती है
सायास बनाया गया फ़ासला
कभी उल्टी किये गए शब्द
और कभी घोड़े की नाल की तरह
मुंह मे ठोकी गई बुदबुदाहट
मुझे देखते ही मुँह और नाक पर रख लिए गए अदृश्य रुमाल
और ख़ामोश लेकिन घृणा से लबरेज निगाहें
क्या क्या नहीं देखा है मैंने
लेकिन सच कहता हूँ
इतनी बारीक लेकिन साफ़ साफ़ चीज़ों को देखने बाद
हर बार मैंने अपने चेहरे को आईने में देखा है
अपने गालों को कोमलता से छुआ है
जीवन और जिजीविषा से भरी अपनी आँखों को चूमा है
ख़ुद को भर लिया है
अपनी स्नेहिल बाहों में
बहुत बहुत देर तक
सहलाया है अपना माथा
अपने आलिंगन को ख़ुद में पैवस्त कर
मैं थोड़ा सुबकता हूँ
घृणा के हर तमाचे के बाद
मैं छोटे बच्चे सा ख़ुद के पास आता हूँ
लिपट जाता हूँ ख़ुद से माँ की तरह
कहता हूँ ख़ुद से
तुम नायाब हो
बेमिसाल हो
मेरे हाथ मुझे छूते हैं ...त्वचा के पर्दे के पार
कहते हैं मेरे चेहरे से
तुम सबसे ख़ूबसूरत हो
और मेरा चेहरा मेरे हाथों से बोलता है
तुम कोई जादू हो क्या ???
***
('हम ख़त्म करेंगे' कविता संग्रह से)


चयन

या तो धीरे धीरे सिको
धीमी धीमी आंच पर देर तक 'कालजयी' महाकाव्य जैसे
बनो सुगंधित स्वादिष्ट प्रशंसनीय और सुपाच्य
या रह जाओ अनगढ़ शब्द
जैसा कौंधा था ख़याल आदिम
उमड़ी थी नफ़रत
उबला था दिल
कंकड़ की तरह गड़ जाओ
जबड़ों में
आंखों में
और ज़ेहन में तुरंत
छील डालो मसूड़े ...
बहाओ खून...
रंग को कर दो भंग
हो जाओ अवांछित
तुम्हें खाया जाना तय हो चुका है
अब तुम चुनो अपनी भूमिका
कि तुम्हें तारीफ़ के साथ पचाया जायेगा
या थूक दिया जाएगा
गाली और ख़ून एक साथ उगलते हुए...
***

लोक संस्कृति

मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी भी
बजाते थे गज़ब का हुड़का
सच में.... वो शानदार हुड़का बजाते थे
जिस दिन आप कह दोगे
कि मोहन उप्रेती
गिरीश तिवारी
और नारायण दत्त तिवारी
तीनों बेमिसाल हुड़क्या थे
उस दिन से मैं भी लोकसंस्कृति का संरक्षण करूंगा.....
*हुड़का =प्रसिद्ध वाद्य जो ख़ास तौर पर कुमाऊं हिमालय के कई हिस्सों में बजाया जाता है और सामान्यतया मृत जानवर की खाल से तैयार किया जाता है
*हुड़क्या = वंशानुगत तौर पर हुड़का बनाने और बजाने वाली दलित जाति
***

पुष्प की अभिलाषा...

जो अभिलाषा बताई गई
वो चतुर्वेदी की अभिलाषा थी
वो फूल की अभिलाषा नहीं थी
फूल की कोई चाह नहीं थी
उसे तो खिलना था
महकना था
बिखर जाना था
इच्छा क्या होती है
फूल नहीं जानता
जाना हुआ या जानने लायक
कोई उद्देश्य नहीं होता
फूल की ज़िंदगी का ...फूल के लिए
काश कि मैं भी फूल होता
मुझे बहुत अफ़सोस है
कि मैं फूल नहीं हूं
लेकिन फिर भी मेरी ज़िंदगी का एक हासिल है
मैं मुतमईन हूँ
कि मेरी अभिलाषा तय नहीं कर पाएगा
कोई 'माखन'... 'लाल' ...'चतुर्वेदी'...
***
('हिमालय दलित है' संग्रह से।)

लेकिन...

दासों ने
विद्रोह किया
वो लड़े.......
वो हार गये
पकड़ लिये गये
उन्हें खम्बों पर लटकाया गया
वो धीरे धीरे मरे...
तो क्या विद्रोह असफल हो गया
नहीं...
विद्रोह और प्रेम...
कभी असफल नहीं होते
जिस समय
वो मर रहे थे
उस समय
वो दास नहीं रह गये थे...
***

प्रिय कवि के लिये

1
प्रिय कवि... किताब मिली...
गुलदस्ते जैसी...
प्रिय कवि मुझे गले लगा लो
चलो हम दोनों रोयें... फूलों की मौत पर...
मेरे प्रिय कवि
2
प्रिय कवि... उस मंच पर मत जाओ
वहाँ तुम अपनी सबसे प्रिय कविता नहीं पढ़ पाओगे
... वो मेरी भी सबसे प्रिय कविता है
उसे एक बार मेरे मुँह से सुनो
मेरे प्रिय कवि
3
प्रिय कवि
... आपकी ज़बान में शहद है
उन चीटियों को देखो... जो चाशनी में डूबी हुई हैं
त्वचा से सांस लो...
मेरे प्रिय कवि...
4
प्रिय कवि
... पुल मत बनाओ...
मैं नदी के पास पानी पीने आया हूँ
मेरे प्रिय कवि..
5
प्रिय कवि
... मौन मत रहो कभी...
अकेले रहा करो अक्सर
मेरे प्रिय कवि...
***


सुखना लेक पर चाँद

सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी
उदास और भारी मन ही रहता है
मेरे सबसे क़रीब
मैं क्या करूं
मैं आपके किसी जश्न में शामिल नहीं हूं
जब देश गर्व में डूब जाते हैं
उस समय मैं देखना चाहता हूं
एक कोलाहल से भरे तट वाली झील में
जीते जा चुके चांद का डूबा हुआ प्रतिबिम्ब
या आदिम चुम्बनों को साझा करते बेपरवाह प्रेमियों के साए जिनकी कोई पहचान ना होती हो
लेकिन वो नहीं हैं वहाँ
जब झंडों की संख्या इंसानों से ज़्यादा हो
जब झंडे होंठो के बीच खड़े हो जाएं... दीवार की तरह
बन जाएं पर्दे,
हो जाएं नक़ाब
जब झंडे निर्वात में लहराएं
जब झंडे आदिम ज़ि स्मों की खाल बन जाने पर उतारू हो जाएं
जब झंडे पृथ्वी के साथ चाँद को भी लपेटकर सूदखोर का बही खाता हो जाना चाहें
तो वेग से नीचे की ओर बहते हुए गर्व के ताक़तवर सैलाब के बीच मेरा भारी मन अपनी गहरी उदासी के साथ टिका हुआ है, झील के बीचों बीच
सबसे ख़ूबसूरत जगहों पर भी मेरा मन उदास बना रहता है
शायद यही एक बात है जिसके लिए मुझे ख़ुश होना चाहिए...
(24/8/2023, सुखना लेक,चंडीगढ़)
***

साफ़ नज़र और बेबाक बयान वाले कवि मोहन मुक्त के दो संग्रह `हिमालय दलित है` और `हम ख़त्म करेंगे` प्रकाशित हो चुके हैं। वे ऐसे कवि हैं जो संग्रहों के आने से पहले और साहित्य की मुख्यधारा में प्रकाशित-स्वीकृत होने से पहले या इनके बावजूद पाठकों के बीच गहरा प्यार हासिल कर चुके थे। कविता उनके लिए वर्चस्व के विरुद्ध एक सांस्कृतिक-वैचारिक माध्यम रही और किसी प्रचलित-स्वीकृत मापदंड की उन्होंने परवाह भी नहीं की। बल्कि, उन्होंने वर्चस्ववादी पैमानों को ब्राह्मणवादी कहकर चुनौती दी और उसके बरअक्स कभी तीखी-तेज़ प्रवाह वालीं और कभी लम्बे संवाद वालीं कविताओं के ज़रिये वंचित तबकों के दिलों से वाबस्ता नया बौद्धिक सौंदर्य गढ़ा और गहरा असर छोड़ा है।

Thursday, May 21, 2026

`किसी अनजान ढाणी` से एक खरी-बेचैन आवाज़


`बौने प्रहसन और अन्य कविताएं`
कविता संग्रह
प्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन


``एक आवाज़ आई ये देश महान है
मैंने ग़ौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक ग़ौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।``

कपिल भारद्वाज का संग्रह `बौने प्रहसन और अन्य कविताएं` आज सुबह का हासिल है। किताब को व्यवस्थित ढंग से पढ़ने के बजाय आदतन एक ख़राब पाठक की तरह यहाँ-वहाँ से पढ़ता रहा। कभी कोई पन्ना, कभी कोई लाइन। कविता `राजा नंगा है` की इन लाइनों पर ठहर गया। यह कपिल का देखने का तरीक़ा ही है जो उसकी कविता में असर पैदा करता है। `सदियों से रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ` जैसी कोई बात अचानक उसकी साधारण सी लगने वाली किसी भी कविता में आती है और उसे अलग बना देती है। बक़ौल कवि मोहन मुक्त, देवताओं की जगह ईश्वर लिख कर कवि आसान रास्ता निकाल सकता था लेकिन तब बात बदल जाती। कपिल की इस कविता की आख़िरी पंक्ति है- `...ग़ौर से देखना कैसे छोड़ दूं`।

ज़ाहिर है कि कपिल भारद्वाज की बड़ी ताक़त देखने की ईमानदारी है। आँखों के साथ बाँधी गईं अपने परिवेश की पट्टियों (blinders) को हटाकर ब्राह्मणवाद को देख पाना सबको नसीब नहीं हो पाता। बल्कि, देखकर भी उसे धर्म या ईश्वर जैसे शब्दों की ओट में छुपा लेने की अक़्लमंदी से बचने का हौसला हर कोई नहीं करता। देखने के ख़तरे कवि जानता है।

बहरहाल कपिल की यह कविता पढ़ते हैं-

।।राजा नंगा है।।

एक आवाज आई ये राजा रंगबिरंगा है
मैंने गौर से देखा तो रंग बिरंगी पेंट से अधेड़
लेकिन चिकने चूतड़ नजर आए।

एक आवाज आई सब मजे में जी रहे हैं
मैंने गौर से देखा तो जेल में बंद कभी आनन्द तेलतुमबड़े
तो कभी सुधा भारद्वाज दिखाई दिए।

एक आवाज आई ये देश महान है
मैंने गौर से देखा तो सदियों से
रक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवाय
कुछ दिखाई नहीं दिया।
बेशक गौर से देखना किसी दिन
भेंट चढ़ा देगा मुझे
या तो राजा की या फिर देवताओं की।

फिर भी गौर से देखना कैसे छोड़ दूं!
--

कपिल की कविताओं के पन्ने जल्दी-जल्दी उलटते-पलटते हुए समझ में आया कि उसकी बेबाकी के पीछे उसकी नज़र के साथ जो एक और ताक़त है, वह है मुसलसल बेचैनी। साफ़ नज़र और बेकली से पैदा होने वाली उसकी समझ उसकी कविता को अच्छी-सिद्ध कविता होने के ख़तरे से बचाए रखती है और इस तरह कवि और उसकी कविता हर तरह के संस्थानों-अनुशासनों-प्रशिक्षणों और संरक्षणों से निरापद हैं। `निरापद रहो!` उसकी एक कविता भी है-

निरापद रहो!

मुझसे कहा जाता है
निरापद रहो
किसी न किसी दिन एक सन्देश आयेगा
और तुम जेल में सड़ते रहोगे बरसों या मारे भी जा सकते हो।

सांप के जैसी चिकनी त्वचा वाले
अक्सर मुझे यही कहते रहते हैं
निरापद रहो वरना...।
--

कपिल के यहाँ एक तरह की आवारगी की गंध है या एक सुव्यवस्थित जीवन से बचने की; पंजाब के कवियों के राग-विराग की और बग़ावत की। वह शिवकुमार बटालवी (जो उसकी एक कविता में भी आया है) की तरह दु:ख के रूमान को गाकर काम चला सकता था, इसकी गुंजाइश उसके भावनात्मक ढांचे में झलकती भी है लेकिन समाज के दु:खों से उसका रिश्ता इतना गहरा है कि वह ऐसे किसी मर्ज़ में तबाह होने से बचा रहता है। वह सचेत है- `दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है`।

कविता `दु:ख - 1` में कपिल अपने मिज़ाज के विपरीत पंक्ति दर पंक्ति सधी हुई लय में बहता है और अंतत: इस नतीज़े पर पहुँचता है कि ``दु:ख व्यक्तिगत कम राजनैतिक और सामाजिक ज़्यादा है``। तो उसकी कविता के सरोकार सामाजिक हैं, उसकी नज़र बार-बार वहीं लौटती है:

।।मंच का जादूगर कवि।।

कौन सी भाषा में बिलखता है बच्चा
जब उसकी मृत माँ की चूचियों से दूध नहीं आता?

मैंने पूछा एक मंच के जादूगर कवि से
जो टेलीविजन में आँखें गड़ाकर देख रहा था
व गदगद हो रहा था
एक मरी हुई माँ की छाती पर रोते बच्चे वाले दृश्य को देखकर।

बमों और गोलियों की आवाज़ों से अपनी पांडुलिपि रंगने वाले
उस कवि ने मुझे ऐसी नज़रों से देखा
जैसे बम गिराने वाले ने मरने वालों को देखा होगा।
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कपिल की कविता के सरोकार समाज में हैं तो उसकी कविता बार-बार राजनीति की बात करती है। साफ़ बात जिसमें दो अर्थ की गुंजाइश या अमूर्तन की हुनरमंदी नहीं है। दुतरफ़ापन से, दुचित्तेपन से उसे चिढ़ है और इस कसौटी को वह कवियों-लेखकों के लिए भी दोहराता रहता है। उसकी कविता में आत्मुग्ध मसखरे, होर्डिंग या तानाशाह को ठीक-ठीक पहचाना जा सकता है।

कपिल कई बार तंज़ के ज़रिये भी इस फ़ासिस्ट दौर की विडम्बनाओं और कारगुज़ारियों को बख़ूबी निशाना बनाते हैं। उनकी यह कविता ``लोकतंत्र में वेज बिरयानी`` पढ़िए:

पहाड़ की चोटी पर बने होटल के बाहर लगी थी एक तख्ती
जिस पर लिखा था 'यहाँ प्योर वेज बिरयानी मिलती है'।
दरभंगा से आए मजदूर के बेटे ने पढ़ा तख्ती को
और अपने पिताजी से पूछा 'वेज बिरयानी' का अर्थ तो
मजदूर ने कहा 'आहिस्ता बोलो बेटे'।

कथावाचक ने माइक से कहा -
'माँस खाने वाले राक्षस होते हैं'
(लाखों भूखे लोग सिहर उठे)
कथावाचक के हारमोनियम वाले ने जोर से झटका
हारमोनियम का तार और मन ही मन मुस्कुराया
मानो कह रहा हो 'वेज बिरयानी तो फेवरेट है मेरी'।

टेलीविजन स्क्रीन पर एक संभ्रांत महिला पत्रकार ने
चीखते हुए दोहराया कि 'माँस खाने वाले लोग हिंसावादी होते हैं'
और कैमरा ऑफ होते ही मँगवाई एक वेज बिरयानी की प्लेट।

चिकन बिरयानी छोड़ो और वेज बिरयानी खाओ
मुर्गियों को दाना डालते हुए कह रहा था एक अभिनेता।

लोकतंत्र है और वेज बिरयानी का विज्ञापन है
बाकी सब असत्य है इस महादेश में
चूल्हे, चूल्हे में पड़ी राख, पेट और पेट में जलती आग
सब असत्य है सिवाय वेज बिरयानी के।
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यह कवि अपनी कविताओं के सम्पादन से लेकर उन्हें क़द्रदानों की निगाह में लाने जैसे हर काम में बेपरवाह लगता है। गो कि कविताओं को लेकर उससे और संज़ीदगी की अपेक्षा ज़रूरी है लेकिन क़द्रदानों के प्रति उसका रवैया वाजिब है और उसके खरा बने रहने की उम्मीद बढ़ाता है- ``कविता के क़द्रदानो\तुम सब रंगे हुए सियार हो``।

कवि पर हिन्दी साहित्य उद्योग की मेहरबानियों का बोझ नहीं है तो यह उसकी पेश-आगाही ही है-

जब तस्कर बन जाएं समीक्षक
तो कवि को रहना पड़ेगा उनसे दूर
खेतों में बनी किसी अनजान ढाणी* में।
(कविता के नकली क़द्रदान)

हिन्दी कविता के सितारों के चमकीले मेकअप वाले मृत वाक्य उनकी कविताओं को तमाम चर्चाओं के बावजूद जान नहीं बख़्श पाते। लेकिन, कपिल की संवेदनाओं और सरोकारों का खरापन उसकी कविताओं में अचानक किसी पंक्ति में, किसी बिम्ब में, कन्ट्रास्ट दिखा देने वाले किसी दृश्य विधान में कौंद जाता है:

क्या मालूम कल को रोटी सिर्फ़
दो-चार प्लेटों में ही रह जाएं और बाकी लोग
गेहूँ की खाली बोरी को ओढ़कर
बरसते बादलों के बीच से गुज़र जाएं।
(एक विकृत चेहरा)

किताब की भूमिका में अशोक भाटिया लिखते हैं - ``...टकराहट, विक्षोभ और आक्रोश में कवि कई बार बात के खरेपन को कविताई पर तरजीह देता है। कुछ पंक्तियाँ देखें-
1. हमारी सांस्कृतिक लड़ाई को एक दिमाग़ नियंत्रित कर रहा है।
2. ईश्वर को, धर्म को और आस्था को डाल रखा है ऑनलाइन वेबसाइट पर।
3. हिन्दू देश की गलियों में फिरती गायें\सुअरों के साथ सेंकती हैं अपनी देह धूप में।``

गोकि खरेपन को तरजीह ही सच्ची कविता की सबसे बड़ी ज़रूरत है और इस दौर की कविताओं में प्राय: इसी का अभाव है। कपिल के यहाँ बाज़ दफ़ा अखरने वाले प्रतीक आते हैं तो भी उनकी ईमानदारी पर शक नहीं होता जबकि बड़े चौकन्ने रहकर पॉलिटिकली करेक्ट दिखने की कोशिश करते रहने वाले बहुत से कवियों की सेंसेबिलिटी संदिग्ध बनी रहती है।

कपिल भारद्वाज की जिस नज़र की बात इस टिप्पणी के ठीक आरम्भ में उनकी कविता के टुकड़े से की थी, समापन भी उनकी ऐसी ही एक कविता `मुक्ति` से कर रहा हूँ:

``कृष्ण का रथ ज़रूर देखिए``
ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार पर खड़े हुए
एक सौम्य मुख के स्वामी व टीकाधारी कह रहे हैं
ऐसा रथ है कि देखने भर से
मुक्ति पा जाए आदमी।

ब्रह्मसरोवर के दूसरे द्वार पर भीख मांग रही
एक भिखारिन ने दूसरी भिखारिन से कहा - ऐ बहन
सुबह से न भात न चावल
लगता है मुक्ति हो जाएगी शाम तक
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-धीरेश सैनी

कपिल भारद्वाज हरियाणा में रहते हैं। उनका पहला कविता संग्रह `फिर देवता आ गए` 2021 में प्रकाशित हुआ था।

*ढाणी - गाँव से दूर खेतों में बसे कुछेक घरों का समूह।