Wednesday, September 30, 2026

दिनमान ने क्या नहीं छापा था जेएनयू की दलितों-पिछड़ों की हत्यारी प्रवेश-नीति पर असरार खाँ का लेख

Asrar Khan


(असरार खान से परिचय फेसबुक के ज़रिये था और उनकी मौत की ख़बर भी आज सुबह फेसबुक से ही मिली। उनकी वॉल पर लाइक-कमेंट के लिहाज़ से रिश्ता नहीं के बराबर था लेकिन उनकी पोस्ट देखता था। वे हमेशा ज़ेहन में भी रहते थे। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से निकले पत्रकार और आख़िरश सुल्तानपुर जिले के किसान असरार खान सेकुलर इंसान थे। धार्मिक रूढ़ियों से टकराते रहने वाले और इस्लाम को लेकर भी कड़े आलोचनात्मक रुख वाले लेकिन ऐसे नहीं कि इस्लामोफ़ोबिक तत्वों को रास आएं। मुसलमानों से नफ़रत को आधार बनाकर देश में परवान चढ़ी हिन्दुत्ववादी सियासत के मुखर आलोचक और जन-संघर्षों के पैरोकार। कॉमरेड लेकिन ऐसे कि जेएनयू में इंदिरा गाँधी के ज़माने में विपिन चंद्रा के ज़रिये लाई गई नयी प्रवेश नीति जो एससी-एसटी, ओबीसी तबकों का गला घोंटती थी को लेकर वामपंथियों के रुख के भी मुखर आलोचक। उस समय यह मसला उन्होंने ही ज़ोर-शोर से उठाया था जिसे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री चौ. ब्रह्मप्रकाश ने अपनी पत्रिका में छापा था। लेकिन, दिनमान ने उसे दबा लिया था। यह लेख इसी बारे में है जो फेसबुक पर उनकी `पत्रकार होने का धर्म` शीर्षक से आईं पोस्ट्स के हिस्से हैं।-धीरेश सैनी)


एक साल के लिए नए दाख़लों पर रोक के बाद जब 1984 में जेएनयू दुबारा खुला तो वहां दाख़लों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जातियों को मिल रही सारी रियायतों को ख़त्म करके नई प्रवेश नीति को लागू कर दिया गया जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आधुनिक इतिहास के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा से तैयार कराया था। शोषित पीड़ित समाज विरोधी इस कार्य के लिए इंदिरा गांधी ने विपिन चंद्रा को कांग्रेस का इतिहास लिखने के लिए 1 लाख रुपए में अनुबंधित किया था।

जब मैं जेएनयू के एडमीशन सेल में नए दाख़लों का ब्यौरा मांगने पहुंचा तो मुझे पब्लिक रिलेशन आफीसर के पास भेज दिया गया। पीआरओ साहब कश्मीर से ताल्लुक़ रखते थे। वे बड़े ही सज्जन व्यक्ति प्रतीत हो रहे थे लेकिन मुझे कोई आंकड़ा नहीं देना चाहते थे। मैंने कहा, सर आप अगर आंकड़ा नहीं देंगे तो कहीं न कहीं से मुझे आंकड़ा तो मिल ही जाएगा और तब आपकी पोजीशन ख़राब होगी। उन्होंने कहा एक दिन का समय दीजिए।

दूसरे दिन `मिड डे` की एक ख]बर लिखकर दोपहर को जेएनयू पहुंच गया। पीआरओ साहब ने अपनी एक सहायिका को बुलाया और कहा कि आप एडमीशन का सारा आंकड़ा इन्हें दे दीजिए। मिस्टर खान एक पत्रकार हैं लेकिन जेएनयू के पूर्व छात्र हैं जो उचित समझेंगे लिखेंगे।


मैडम ने मुझे 1 घन्टे के भीतर सारे आंकड़े दे दिए जिसे देखकर मैं बेचैन हो उठा।

मुझे लगा कि इतना बड़ा इंजस्टिस कैसे हो सकता है। कई-कई सेंटरों में एक भी दलित और आदिवासी को दाख़ला नहीं मिल पाया था और यही सुलूक पिछड़ी जाति के छात्रों के साथ भी हुआ था। ग्रामीण पृष्ठिभूमि के छात्र भी एडमीशन पाने से वंचित रह गए थे। यह सब जानने के बाद मैं वहां से गुस्से में कांपता हुआ निकला और निश्चय किया कि कल ही इस घोर अन्याय के ख़िलाफ़ विस्तारपूर्वक लिखूंगा।



जेएनयू के नए दाख़लों पर लेख लिखने में मुझे एक हफ़्ता लग गया। उसको लिखने में मित्र शम्भूनाथ सिंह से भी भाषा- शैली संबंधी मदद ली जो उन दिनों माकपा के मुखपत्र लोकलहर को एडिट करने का काम करते थे। खै़र एक छोटी ख़बर बनाकर मैंने `मिड डे` को दे दी, वह उसी दिन छप गई। इसके बाद नई प्रवेश नीति के जरिए अनुसूचित जाति- जनजाति पिछड़ों और ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफ़ी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई।

जब मैं लेख लिखकर चौधरी ब्रह्मप्रकाश जी के पास वंदना हाउस पहुंचा तो उन्होंने कहा एक दो पैराग्राफ मैं पढ़ लूं फिर आपको हिंदी वाली मैगज़ीन के सम्पादक से मिलाता हूँ लेकिन चौधरी जी लेख को पूरा ही पढ़ गए जो मेरे हाथ से 10 पेज में लिखा हुआ था।

उन्होंने लेख को पढ़ने के बाद हिंदी के सम्पादक को अपने चैंबर में बुलाया।

नाटे से कद के धोती कुर्ता पहने हुए बुढ़ापे और अधेड़ आयु के बीच वाली उम्र में भी वे अपने हाव-भाव से एकदम जवान दिख रहे थे। बड़ी ही कड़क आवाज़ थी। चौधरी जी ने उनसे मेरा परिचय कराते हुए बताया कि जेएनयू को तो इंदिरा गांधी ने खुद ही ख़त्म कर दिया। देखिए असरार जी की  रिपोर्ट आप पढ़िए और इसे अगले अंक में मुख्य लेख बनाकर छापिए।

उन्होंने बताया ये नंद किशोर जी हैं पुराने समाजवादी फिर दाख़लों पर आते हुए बोले देखिए इसमें एससी\एसटी और पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों की बुरी तरह छंटनी की गई है। इस मामले को लेकर तो लड़ना होगा। बहुत ग़लत काम हुआ है। इंदिरा गांधी ने यह सब क्यों किया मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ।

चाय आ गई तो चाय पीते हुए चौधरी जी ने नंद किशोर जी के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने बताया कि नंद किशोर जी 1957 में राय बरेली लोकसभा क्षेत्र से फ़िरोज़ गांधी के ख़िलाफ़ प्रजा सोसलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े थे। हार तो गए थे लेकिन बहुत वोट पाए थे।

इसके बाद नंद किशोर जी मुझे अपने कमरे में लेकर ले कर चले गए।


नंद किशोर जी ने मुझसे मेरे बारे में खू़ब जानकारी लिया और कहने लगे आप इस मैगज़ीन से जुड़ जाइए लेकिन लिखने का कोई पैसा नहीं मिल पाएगा क्योंकि यह मैगज़ीन चंदे से चल रही है। इसमें कोई विज्ञापन वगैरह नहीं छापा जाता।

मैंने बताया कि मुझे पैसों की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए यह मैगज़ीन बहुत मत्वपूर्ण है। मैं हर अंक में एक लेख  लिखा करूंगा। उन्होंने मुझसे कहा कि आप इसे अंग्रेजी में भी लिख डालिए। मैंने कहा ठीक है। उन्होंने चिश्ती साहब के कमरे में जाकर अंग्रेजी वाले अंक में भी इस लेख को प्रकाशित करने के बारे में बोल दिया। चिश्ती साहब ने लेख को ले लिया और पढ़ने लगे। नंद किशोर जी फिर अपने छोटे से कमरे में आकर बैठ गए तभी चौधरी जी उनके कमरे में आ गए और बोले, आप इस लेख को सभी पत्र पत्रिकाओं में छपने के लिए दीजिए इसे तो बड़ा मुद्दा बनाना पड़ेगा। मैं इंदिरा जी को ख़त भी लिखूंगा और चंद्रजीत यादव, केएन सिंह और चौधरी चरण सिंह से भी मिलकर इस पर बात करूंगा।

तभी मेरे मुँह से निकला सर चंद्रजीत यादव और चौधरी चरण सिंह के पास तो हम और विद्रोही जी उसी समय गए थे जब इंदिरा गाँधी ने पुरानी प्रवेश नीति को ख़त्म करने के लिए नई प्रवेश नीति को बनाने के लिए प्रोफे़सर विपिन चंद्रा कमेटी का गठन किया था।

`उन लोगों ने क्या कहा था और आप लोग हमारे पास क्यों नहीं आए`, चौधरी जी ने पूछा।

मैंने बताया कि चौधरी चरण सिंह मिले और पूरी बात भी सुने लेकिन इसमें कोई मदद करने से इनकार कर दिए। उनके बाद हम दोनों हुमायूं रोड स्थित पूर्व केंद्रीय ऊर्जा एवं स्पात मंत्री चंद्रजीत यादव जी के घर गए। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद कहा कि मुझे भी ऐसा लग रहा है कि इंदिरा जी जेएनयू की वर्तमान प्रवेश नीति को बदलने का मन बना चुकी हैं। वे प्रधानमंत्री भी हैं और यूनिवर्सिटी की चांसलर भी हैं। मुझे लगता है कि वे 1980 में कैम्पस के अंदर हुए अपने अपमान को भूल नहीं पा रही हैं। आप लोगों ने उन्हें कैम्पस में घुसने नहीं दिया था। असली वजह यही है।

चंद्रजीत यादव ने कहा मैं खु़द लड़ तो नहीं सकता लेकिन आप को अपने घर से काम करने के लिए कुछ जगह दे सकता हूँ। ऐसा कीजिए कि एक संगठन बना लीजिए जिसमें एससी\एसटी, बैकवर्ड कास्ट और अल्पसंख्यकों को शामिल कीजिए। उस पर आप मेरी कोठी का पता दे दीजिए।

उन्होंने मुझसे पूछा था कि एसएफआई का स्टैंड क्या है ?


मैंने बताया कि ऐसा लगता है कि एसएफआई इस मसले को निर्णायक लड़ाई नहीं बनाना चाहता। इसीलिए सीताराम यचूरी ने पुरानी प्रवेश नीति में कुछ मॉडिफिकेशन को स्वीकार कर लिया है।

मैंने बताया कि प्रवेश नीति को लेकर स्टूडेंट्स यूनियन ने एक आमसभा बुलाकर उसमें थोड़े बहुत सुधार की अनुमति दे दी है लेकिन मौलिक बदलाव के खिलाफ एसएफआई समेत सभी छात्र संगठन हैं। फ्रीथिंकर्स वाले खुलकर अपने स्टैंड को क्लियर नहीं कर रहे हैं। मूलतः वे एलीट कल्चर की सोच वाले हैं इसलिए उनके बारे में बात करने का कोई फ़ायदा नहीं।


ब्रह्म प्रकाश जी इतना लंबी बात खड़े खड़े सुनते रहे।


मेरी बात ख़त्म हुई तो लंबी सांस लेते हुए कहा, अच्छा! आपने तो बहुत मेहनत भी किया है।

चौधरी जी ने पूछा, आप किधर रहते हैं। मैंने बताया, मालवीय नगर में रहता हूँ। उन्होंने कहा, आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको वहां छोड़ दूँगा। आज मुझे एक शादी में मालवीय नगर जाना है।

कुछ देर बाद, ऑफिस के सभी लोग एक साथ बाहर निकले। चिश्ती साहब स्कूटर से चलते थे। नंद किशोर जी पैदल और डीटीसी की बसों में।

Ch Brahmprakash 


चौधरी साहब एक फिएट कार के पास जाकर खु़द ही उसे खोलने लगे तो मैंने सोचा कि शायद कोई ड्राइवर होगा जो उनकी गाड़ी को चलाता होगा। लेकिन, ऐसी कोई बात नहीं थी। उन्होंने मुझे बगल में बैठने के लिए इशारा किया और गाड़ी को स्टार्ट करके खु़द ही ड्राइव करते हुए चल पड़े।


मुझे यह देखकर अजीब सा लग रहा था कि दिल्ली के जाने माने लैंडलॉर्ड, पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कृषि मंत्री -  इनके पास एक ड्राइवर भी नहीं है। आख़िर बात क्या है! मैं कुछ कुछ सहमा हुआ उनके बगल में बैठा हुआ था और दिल्ली का शेर कार चला रहा था।

10 किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद चौधरी साहब वसंत विहार की एक भव्य कोठी पर पहुंचे। गाड़ी को गैराज में लगाने के बाद मुझे साथ लेकर प्रथम तल पर पहुंचे तो वहां भी ताला खोलकर अंदर प्रवेश किए। तब मुझे लगा कि शायद अकेले ही रहते हों।

कुछ ही देर बाद एक औरत आई और बर्तन वगैरह साफ़ करके चली गई। फिर चौधरी साहब ने खु़द चाय बनाई और चाय पीने के बाद जब चलने के लिए तय्यार हुए तब तक एक हिमाचली लड़का अंदर आया और गाड़ी की चाभी मांगकर ले गया।

वह लड़का मुझे ड्राइवर जैसा लगा। मेरा अनुमान सही था।


29 नम्बर की फिएट में वे खुद आगे ही बैठे। मुझे पीछे बैठा दिया। शादी में पहुंचे तो देखा कि बहुत सारे लोग चौधरी जी के स्वागत में दौड़ पड़े। वे वीवीआईपी की तरह गाड़ी से उतरे और जिसकी बेटी की शादी थी उनसे मुझे भी मिलवाया। वे चौधरी साहब के पूर्व सरकारी अतिरिक्त निजी सचिव थे। मुझसे कहा कि आप खाना खाकर जाइएगा।


`बुनियादी संघर्ष` के हिंदी-अंग्रेजी दोनों अंकों में एक साथ जेएनयू की नई प्रवेश नीति के तहद हुए दाख़लों में जिस तरह से ग्रामीण इलाकों और दलित एवं पिछड़ों को अर्स से फ़र्श पर बैठा दिया गया था वह एक दम से साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा था।


उस छपे हुए लेख को पढ़कर खुद मुझे भरोसा होने लगा कि जेएनयू अब आम आदमी के लिए नहीं रह गया बल्कि पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले आभिजात्य वर्ग के लोगों तक सीमित कर दिया गया है। मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथी  संगठनों पर आता था जो लोग भूगोल के विख्यात प्रोफ़ेसर मुनीस रज़ा, इतिहास के प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा, हिंदी के विश्वविख्यात प्रोफ़ेसर नामवर सिंह, राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर सीपी भांवरी, इतिहास के प्रोफेसर हरबंश मुखिया, इतिहास की विश्वविख्यात प्रोफेसर रोमिला थापर जैसे इस कैम्पस के शिक्षकों का गुणगान करते थे।


वामपंथी प्रगतिशील और सामाजिक न्याय के ये शिक्षक योद्धा चूहों की तरह किन बिलों में घुस गए थे, पता ही नहीं चला और अरावली की पथरीली पहाड़ियां एक झटके में ही शर्मिंदा होकर इस कदर ज़मीदोज़ हो गईं जितना हज़ारों साल में नहीं धंसी रही होंगी। कभी वहां से हिमालय दिखता था लेकिन 84 में वहां से दिल्ली का धौलाकुआं भी नहीं देखा जा सकता था।


प्रोफ़ेसर विपिन चंद्रा ने प्रवेशनीति में किए गए बदलाव के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया था कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने स्टूडेंट्स की अंग्रेजी अच्छी नहीं होती इसलिए जेएनयू अपने लक्ष्य को हासिल करने में बाधा महसूस कर रहा है।

उनके इस कुतर्क को ख़ारिज करने के लिए जब मैं बेचैन होकर घूम रहा था तभी मुझे पीएचडी का एक छात्र मिला उसे मेरे लिखने के बारे में जानकारी थी, बहुत खु़श था डूइंग वेल असरार, कहते हुए गंगा हॉस्टल के बस स्टैंड पर बैठकर कहने लगा कि तुम ज़ाकिर हुसैन सेंटर के मिस्टर पटनायक को जानते हो। हाँ जानता हूँ। बहरहाल, जब मैं पटनायक से मिला तो उन्होंने मुझे चौंकाने वाला आंकड़ा दिखाया। उन्होंने पब्लिक एंड नान पब्लिक स्कूलिंग बैकग्राउंड के स्टूडेंट्स पर यह अध्ययन किया था कि रूरल अर्बन डायकोटोमी की वर्तमान स्थिति में किन स्टूडेंट्स ने बेहतर  परिणाम दिया है और नेहरू जी इस तरह की यूनिवर्सिटी को क्यों खोलने का सपना देख रहे थे जिसे उनकी पुत्री ने प्रधानमंत्री बनने के बाद खोला।


पटनायक ने अपने मास्टर आफ फिलॉसफी (M Phil) के डिजरटेसन में इस धारणा को ख़ारिज कर दिया था कि पब्लिक स्कूलों से आकर पढ़ने वाले, ग्रामीण इलाकों से आने वाले स्टूडेंट्स से बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

उन्होंने भारत के विकास संबंधी रिसर्च के साथ साथ आइएएस (IAS जैसी कथित प्रतिष्ठित नौकरशाही की सबसे बड़ी नौकरियों में क़ामयाबी की जो तुलना किया था उसमें ग्रामीण स्टूडेंट्स, शहरी पब्लिक स्कूल के शहरी स्टूडेंट्स से कोसों आगे थे।


यह लेख छप गया तो एक दिन शाम को जब मैं वंदना भवन की आठवीं मंज़िल तक सीढ़ियों से ही चढ़ता जा रहा था तो उधर से एक बहुत खू़बसूरत युवा लीडर अपने ढेर सारे समर्थकों के साथ सीढ़ियों से नीचे आ रहे थे। मैंने उनको देखा तो देखता ही रह गया। कुछ ही माह पहले राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन दोनों की जोड़ी बहुत मशहूर हो गई थी। देखने में दोनों सगे भाई जैसे लगते थे उतना ही आकर्षक शारीरिक बनावट ऊपर से मुस्कुराता हुवा विनम्र चेहरा... योग्यता भी उसी अनुपात में हो तो सहज ही कोई भी कह सकता था ऐसे व्यक्तित्व दीन दुखियों के ही नहीं अमीरों के भी रहनुमा बन जाएं तो हर कोई सहर्ष स्वीकार कर लेगा।

ललित माकन ट्रेड यूनियन के उभरते नेता थे जो उन  वामपंथी और सोसलिस्ट ट्रेड यूनियनों के लिए नई चुनौती बनते जा रहे थे जिन्होंने कामरेड बीटीआर और जार्ज जैसे शीर्ष ट्रेड यूनियन लीडरों को दिया था। दुर्भाग्य से ललित माकन की उनके घर पर सुबह सुबह हत्या हो गई जिससे दिल्ली दहल गई थी। उन्हीं की बहन अंजली दूरदर्शन पर ख़बरें पड़ती थीं और बहुत लोकप्रिय थीं। उनके भतीजे अजय माकन दिल्ली छात्र संघ का अध्यक्ष पद का चुनाव जीते और बाद में केंद्रीय मंत्री भी बने।


`बुनियादी संघर्ष` के ऑफिस में पहुंचा तो वहां केवल चिश्ती साहब ही मिले। उन्होंने कहा, आप मेरे साथ चलिएगा मैं ग्रीनपार्क में रहता हूँ। आपको मालवीय नगर छोड़ दूंगा।

उन्होंने बताया कि जेएनयू वाले लेख को देश की अनेकों क्षेत्रीय भाषाओं में छपने के लिए भेजा जा रहा है। पंजाबी के एक अख़बार में तो जालंधर से आज छप भी गया है। उसकी कॉपी आएगी तो आपको दूंगा, देखिएगा।


चिश्ती साहब स्कूटर पर बैठाकर मुझे हौजख़ास के कोने पर इसेक्स फार्म की दुकान के अंदर ले गए और वहां चिकन ख़रीदे, कुछ प्रॉसेस्ड क़बाब भी। कहने लगे, जनाब, आज मेरे घर चलिए और खाना खा कर जाइएगा। मैं उनके साथ जब उनके निवास पर पहुंचा जो एक शानदार कोठी थी जिसके आधे भाग में वे परिवार सहित रहते थे, बाकी आधे में नर्सेज की यूनिनन का कार्यालय था जिसमें रहने के लिए भी कुछ कमरे थे।


चिश्ती साहब के साथ उनके बड़े से ड्राइंग रूम में बैठकर बातें शुरू हो गईं। नर्सों की समस्याओं के बारे में 1 घन्टे तक बातें होती रहीं। तब तक खाना भी तैयार हो गया। उनकी पत्नी आईं और उन्होंने हम लोगों से डायनिंग टेबल पर आने के लिए कहा। चिश्ती साहब ने बताया कि ये मेरी पत्नी हैं सुमित्रा जी। वे मुस्कुराईं और मुझसे मेरा परिचय पूछने लगीं ।बड़ी ढीट थीं। मैं तो उनकी प्रतिभा से बिल्कुल अनभिज्ञ था। चिश्ती साहब ने यह भी नहीं बताया कि उनकी वाइफ साउथ इंडियन हिन्दू हैं और जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफ़ेसर और सेंटर फॉर डिसआर्मामेंट की चेयरमैन हैं। यह सब मुझे तब पता चला जब वे बड़ी बेबाकी से मेरा परिचय पूछ रही थीं तो मैंने भी उचित समझा कि खुद ही पूछ लूं मैडम क्या करती हैं।


जेएनयू की बात उठी मैंने खू़ब आलोचना की। वे मेरी बात को बड़ी गंभीता से सुनती रहीं। धीरे-धीरे डिनर शुरू हो रहा था। सूप की बारी थी उसे ख़त्म किया तब तक पहली मंजि़ल से बड़ी तेज़ी से एक लड़की को उतरते देखा। उनकी चप्पलों की तेज़ आवाज़ ने एकदम ने उनकी तरफ़ देखने को विवश कर दिया।

लड़की आई और डायनिंग टेबल पर बैठ गई। चिश्ती साहब ने परिचय कराया, ये सीमा हैं, 12वीं की स्टूडेंट हैं। उनसे मिलने के बाद मैंने सोचा, हो सकता है परिवार में और भी कोई हो। लेकिन, बस यही 3 लोगों का परिवार था और सभी अपने अपने में बहुत खु़श नज़र आ रहे थे। मैंने सीमा से पूछा कि इंटर के बाद आप किस क्षेत्र में जाएंगी। उन्होंने कहा, मैं जर्नलिस्ट बनूंगी।


काफ़ी दिनों के बाद एक दिन सुबह-सुबह जैसे ही मैंने `टाइम्स ऑफ इंडिया` को पढ़ने के लिए उठाया तो पहले ही पेज पर एक लड़की की तस्वीर को देखकर सोचने लगा कि इसको तो मैंने पहले भी कहीं देखा है। कटे हुए घुंघराले बाल, चेहरा भरा हुआ और रोबीला, कहीं कोई गहना गुरिया का नामो निशान नहीं, न नाक में, न कान में, एकदम आधुनिक लड़की। कैप्शन में लिखा था सीबीएसई (CBSE) टॉपर सीमा चिश्ती। मैं ख़बर पढ़ने लगा। पहले ही पैराग्राफ में लिखा था - सीमा चिश्ती अपने पत्रकार पिता मिस्टर अनीस चिश्ती साहब को अपना आदर्श मानती हैं और आगे चलकर वे एक पत्रकार बनना चाहती हैं।.


जएएनयू वाले प्रकाशित लेख में कुछ और सुधार करते हुए मैंने उसे दिनमान में दे दिया जो उन दिनों हिंदी का नम्बर-1 साप्ताहिक हुआ करता था। रघुवीर सहाय जैसे साहित्यकार और पत्रकार इसी मैगजीन के संपादक रह चुके थे अर्थात इसकी प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं थी। लेख को देने से पहले मैंने इसके सम्पादक सतीश झा से बात की थी। उन्होंने कहा था, विस्तार से लिखिए इसे छपना चाहिए।


`टाइम्स ऑफ इंडिया` ग्रुप की यह मैगज़ीन दरियागंज से निकलती थी। इसका मुख्यालय `टाइम्स ऑफ इंडिया` की बहादुर शाह जफ़र रोड वाली काले शीशे की भव्य बिल्डिंग थी। हिंदी का `नवभारत टाइम्स` यहीं से निकलता था।

लेख के बारे में जानने के लिए मैंने एक दिन दिनमान के ऑफिस फोन किया। संयोग से फोन उठाने वाला मेरा यार जसविंदर सिंह था। उसने कहा, अरे असरार भाई! कहां हो आओ, तुम्हें ठर्रा पिलाऊंगा। मैं दूसरे दिन दरियागंज गया तो जसविंदर ने मेरे लेख के बारे में पहले से ही इकट्ठा की गई जानकारी दी, बताया कि बस अगले किसी भी अंक में छपने वाला है, चूंकि लेख काफी बड़ा है इसलिए देरी हुई है।


दो दिन बाद दिनमान का नया अंक मिला तो उसके कवर पेज पर ही मेरे लेख के अगले अंक में छपने का विज्ञापन था। मुझे बहुत खु़शी हुई इसलिए भी क्योंकि अब यह लेख भारत के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले देशव्यापी साप्ताहिक में छपने वाला था जिसके बाद मुझे किसी को बताना नहीं पड़ता कि जेएनयू में क्या हुआ।

हिंदी के सबसे बड़े आलोचक नामवर सिंह,  प्रोफ़ेसर केदार नाथ सिंह, मैनेजर पांडेय ये सभी वामपंथी सियासत से जुड़े हुए लोग थे।


अगले अंक का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से कर रहा था लेकिन  आने वाले अंक में लेख नहीं छपा। मैंने फिर जसविंदर को फोन किया। उसने कहा, पता करता हूँ क्या बात है। कुछ देर बाद बोला, अगले कुछ हफ़तों में छप जाएगा। इसी तरह हफ़्ते गुज़रते गए लेकिन लेख नहीं छपा। एक दिन जसविंदर से बात करते करते पता चला कि लेख को प्रकाशित नहीं किया जाएगा। मैंने पूछा, क्यों भाई ऐसी क्या बात हो गई जो अनाउंस करने के बाद भी रोक लिया गया।

जसविंदर नया नया पत्रकार बन रहा था। वह भी चाहता था कि लेख छपे लेकिन उसने बताया कि लेख को उदय प्रकाश ने रोक दिया है। फि़लहाल वही इंचार्ज हैं मैं क्या करूँ यार?

Jasvinder Singh


जसविंदर बहुत लड़ाका लड़का था 1978 में मैंने जब उसे पहली बार एडुकेशन मिनिस्ट्री का घेराव करते हुए एसएफआई के प्रदर्शन में देखा था तभी से मैं उसका बहुत सम्मान करता था। तब वह दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में वामपंथी इतिहासकार प्रोफे़सर इरफ़ान हबीब के खि़लाफ़ की गई युनिवर्सिटी अथॉरिटी की तानाशाही के विरोध में प्रदर्शन का मौक़ा था। उन दिनों इरफ़ानुल्लाह छात्र संघ के अध्यक्ष थे उनके खि़लाफ़ भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ऑथॉरिटी ने कार्रवाई कर दी थी। उनके लिए कुछ स्लोगन लगाए जा रहे थे। बाद में वही इरफ़ानुल्लाह जनता दल और सबसे आखि़र में ओखला से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार थे लेकिन वे चुनाव हार गए। केजरीवाल ने उनकी जगह पर अमानतुल्लाह खान को टिकट देने का फै़सला किया और वह 60 हजार से भी अधिक वोटों से `आप` के विधायक बने लेकिन उससे पहले वाला चुनाव अमानतुल्लाह खान, पासवान की लोजपा से लड़े थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। शिक्षा मंत्रालय पर प्रदर्शन के समय मैं जेएनयू का छात्र नहीं था लेकिन उस समय जेएनयू आया हुआ था तो प्रदर्शन में मैं भी चला गया था।


मेरे लेख के बारे नकारात्मक ख़बर देते वक़्त जसविंदर बहुत दुःखी था। मैंने कहा कि मैं सतीश जी से बात करूं तो उसने बताया कि वह तो अमेरिका गए हुए हैं, छुट्टी पर हैं, यही उदय प्रकाश इस समय मालिक है।


लेख नहीं छपा कोई बात नहीं लेकिन एकसाथ तीनों पत्रकार जेएनयू के ही छात्र रहे थे, फिर भी ऐसा क्यों हुआ? सतीश जी सिर्फ जेएनयू से ही नहीं जाने जाते थे बल्कि जनसत्ता के को-फाउंडर भी थे। मैं इस प्रकरण की गहराई में जाने लगा तो मुझे पता चला कि उदय प्रकाश ने लेख को छपने से इसलिए रोक दिया क्योंकि वे हिन्दी के जिस एलीट समाज में बैठते थे उन्हें यह जानने नहीं देना चाहते थे कि जेएनयू के दाख़लों में गाँव व क़स्बों से आने वाले सवर्ण लड़के-लड़कियों को भी कुछ अतिरिक्त पॉइंट्स मिल जाते हैं जैसे पिछड़े जिले का आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के सर्टिफ़िकेट से अर्थात सभी लोग तहसील से ऐसा आय प्रमाण पत्र बनवा लेते थे कि मेरिट - कम मीन्स एवं प्रथम ग्रेजुएट के फलस्वरूप दाख़ला भी हो जाता था और स्कालरशिप भी मिल जाती थी। बहुत से लोग इसी लिए जेएनयू में पढ़कर प्रोफ़ेसर साहित्यकार और नौकरशाह बन गए। उन दिनों 5 साल की MA जो विदेशी भाषाओं में होती था उन्हें 110 रुपये जबकि एमए 2 साल वालों को 125 रुपया मिलता था फ़ीस और हॉस्टल फ़ीस दोनों माफ़ हो जाती थी और मेस बिल 90 रुपए के अंदर ही आया करता था।


तब मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि कुछ लोग अपनी झूठी  प्रतिष्ठा के लिए कितना बड़ी बड़ी सम्भावनाओं की हत्या कर देते हैं। वर्तमान की खू़बियों के साथ साथ उसके काले धब्बे को भी सामने नहीं आने देते।


मैंने उदय प्रकाश को फोन किया और खू़ब सुनाया। मैंने कहा मेरे लेख को वापस कर दीजिए। फिर अगले दिन अपने छोटे भाई शकील और उनके एक मित्र विद्यार्थी जी को दरियागंज भेज कर लेख को वापस मंगा लिया।


जसविंदर ऐसे माहौल में टिक नहीं सकता था। उसे हिंदी, इंग्लिश, पंजाबी और स्पेनिश भाषा का बड़ा अच्छा ज्ञान था। जल्द ही उसका सेलेक्शन बीबीसी रेडियो की हिंदी सेवा में हो गया। उसकी आवाज़ हिंदी के पितामह कमेंटेटर जसदेव सिंह से मिलता थी। देखते ही देखते जसविंदर सिंह पूरे एशिया का, साथ ही अंग्रेजी सेवा का भी इंचार्ज हो गया। इस होनहार पत्रकार से मेरी अंतिम मुलाक़ात 1993 में बसपा के केंद्रीय कार्यालय, दिल्ली के रकाबगंज में हुई थी। उस रोज़ सपा-बसपा की सरकार के गठन की बात चल रही थी और 425 में से दोनों पार्टियों को 175 सीटें मिली थी। बाबरी मस्जिद को ढहाने के बाद भी भाजपा को बहुमत नहीं मिला था। उसने जोड़-तोड़ करने की कोशिश भी नहीं की। रास्ता बिल्कुल साफ़ नहीं था लेकिन जनता दल के पास 25 विधायक थे और 4 सीट माकपा-भाकपा ने भी जीत ली थीं।

बसपा सुप्रीमो के केंद्रीय कार्यालय पर दर्जन भर से ज़्यादा पत्रकार इकठ्ठा थे लेकिन कांशीराम जी किसी को भी मिलने का समय नहीं दे रहे थे। हाथ मे एक छोटा टेपरिकार्डर लिए जसविंदर भी बाहर खड़े थे। हमारे बीच दुआ-सलाम हुई। मैं सीधा कोठी के अंदर घुसने लगा। स्वागत के अंदाज़ में मुझे एक लड़का अंदर ले गया और मुझे सीधा कांशीराम जी के पास बैठा दिया।


कांशीराम मुझे देखते ही मुस्कुराए और बोले देखिए क्या हो गया। मैंने कहा, सर मुबारक हो। मैंने कहा, बाहर बहुत पत्रकार खड़े हैं। उनसे बात कर लीजिए। उन्होंने कहा, नहीं मैं किसी से नहीं मिलूंगा। आप जाइए और आज मेरी तरफ़ से जो छापना चाहते हैं, छाप दीजिए। मैंने कहा, सर बाहर बीबीसी का संवाददाता भी खड़ा है। उन्होंने कहा, बुलवा लेता हूँ। जसविंदर आया तो चढ़ कर बात करने लगा। कांशीराम जी उसे भी थोड़ा बहुत व्यक्तिगत तौर पर जानते थे। कांशीराम ने कहा आप को बताने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है। मैंने तो विदेशी मीडिया के नाते इनके कहने पर आप को बुला लिया। जसविंदर ने कहा, मुझे यह बताने की इच्छा हो रही है कि असरार आपके साथ है तो इससे बड़ा असेट आप के पास और कुछ नहीं है। कांशीराम ने मुझसे कहा कि मध्यप्रदेश में भी मेरे 13 विधायक हैं। मेरा अध्यक्ष और कुछ विधायक अंदर बैठे हैं। मैं उन्हें आपसे मिलाना चाहता हूँ।

अंदर जाते-जाते मैंने कहा सर कम्युनिस्ट पार्टियां बिना मांगे ही आप की बनने वाली सरकार को समर्थन दे रही हैं, उनको धन्यवाद दे दीजिए। लेकिन, कांशीराम मेरी इस बात पर कुछ नहीं बोले।


कुछ साल बाद मेरा दोस्त जसविंदर गोवा में समुद्र के अंदर डूब कर हमेशा के लिए दुनिया को छोड़ गया। कई लोगों का कहना था कि जसविंदर ने बहुत ज़्यादा पी रखी थी। सुध-बुध खो बैठा और डूब गया।

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Tuesday, September 29, 2026

ऐसे बयान से क्या फ़ायदा



आलोक धन्वा कविता पढ़ने के लिए मंच पर आए तो उन्होंने शुरुआत वीरेन डंगवाल की इस कार्यक्रम में ग़ैर-मौज़ूदगी के ज़िक्र से की। जादुई अंदाज़-ओ-अदा से श्रोताओं को गिरफ़्त में ले लेने वाले आलोक ने कहा कि वीरेन अपने पिता के अचानक बीमार हो जाने के कारण नहीं आ पाया लेकिन उसने मुझे और मंगलेश को भेजा है। इस तरह वीरेन यहाँ है। मैं, मंगलेश और वीरेन; हम तीनों एक ही माँ के गर्भ में पले सगे भाइयों की तरह है। और फिर उन्होंने वीरेन की कविताएँ सुनानी शुरू कीं। मंगलेश उनके सामने अगली पंक्ति में बैठे हुए थे।


इस तरह, आलोक धन्वा और मंगलेश डबराल दोनों से मेरा पहला सीधा परिचय उस दिन वीरेन डंगवाल की बदौलत हुआ था। दरअसल, 14 जुलाई 2002 को करनाल के पंचायत भवन के उस कार्यक्रम की योजना वीरेन डंगवाल को बुलाने की बात से शुरू हुई थी। मंगलेश व आलोक को वीरेन ने ही यहाँ पहुँचने के लिए कहा था। पत्रकार दोस्त सुधाकर भट्ट इन दोनों को लाने के लिए कार लेकर दिल्ली गए थे। मनमोहन रोहतक से रेल में बैठकर आ गए थे। ओमप्रकाश ग्रेवाल, स्वेदश दीपक, चमन लाल, सत्यपाल सहगल, अरुण आदित्य, प्रदीप कासनी और कई दूसरे साहित्यकार ख़ुद अलग-अलग ज़रियों से यहाँ पहुँचे थे। फ़िलहाल, यह सब याद करने का मक़्सद आलोक के इस `एक गर्भ में पले भाइयों जैसे` वाक्य को याद करना है। साहित्य और संबंधों की दुनिया में लाख पेंच होते होंगे लेकिन मंगलेश और वीरेन को मैं हमेशा इसी तरह के दोस्तों के रूप में देखता रहा। `लेखक की रोटी` में वीरेन पर मंगलेश की एक पंक्ति और शायद `समकालीन जनमत` में छपा वीरेन के कविता संग्रह पर मंगलेश का लेख वैसे ही दिल में रहा करते थे।

हाँ, बहुत सारी यादों की उमड़-घुमड़ में से कुछ का उल्लेख रात में जाने क्यों देख ली गई उस तस्वीर के मद्देनज़र जिसमें वीरेन डंगवाल अपनी बीमार-कमज़ोर देह के साथ मंच पर बैठे दिखाई दे रहे हैं। इस हाल में कवि की छवि चली आती है तो सुधीश पचौरी का घिनौनापन भी याद आता है। वीरेन के सम्मान में उन्हें चाहने वालों ने दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया था जो सुधीश पचौरी को बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने 6 अक्तूबर 2013 को हिन्दुस्तान अख़बार में इस बारे में घिनौनी टिप्पणी की। उसने कवि के बीमार होने का मज़ाक उड़ाया था जिसे हिन्दी के बड़े अख़बार ने छापा था। सत्ता-संबंधों पर टिकी हिन्दी की दुनिया ने इसका कोई विरोध किया हो, याद नहीं। हाँ, समयांतर पत्रिका (नवंबर 2013 अंक) ने `शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता` शीर्षक से सुधीश पचौरी और हिन्दुस्तान अख़बार की इस बेशर्मी को रेखांकित करते हुए तीखा विरोध जताया था।

पंकज बिष्ट चाहते थे कि सुधीश पचौरी की टिप्पणी के विरोध में एच.टी, मीडिया लि. को पत्र भी भेजा जाए। उन्होंने एक सुबह अचानक फोन कर इस बारे में बात की। उन्होंने कहा, ज़रूरी नहीं कि अपील जारी कर इस बारे में बहुत सारे लेखकों का समर्थन जुटाने की कोशिश की जाए। पत्र जल्दी जारी होना चाहिए और जिन्हें हस्ताक्षर करने में कोई हिचक न हो, सिर्फ़ उनके ही नाम दिए जाने चाहिए। मैंने तुरंत यही कहा कि आप बात कर लीजिए, लेकिन तय समझिए, असद ज़ैदी निश्चित तौर पर सहमति देंगे। युवाओं की बात है तो अशोक पांडे (हल्द्वानी) का नाम बिना पूछे लिख सकते हैं और शिरीष मौर्य का भी। बाक़ी मैं फोन करके पूछ लेता हूँ। आगरा क्षेत्र के अपने मित्रों से आप न ही पूछें तो बेहतर।

पंकज बिष्ट का फोन फिर क़रीब दो महीने बाद आया। बेहद दु:खी थे और बहुत गुस्से में। बोले, एचटी मीडिया को पत्र मेल कर देते हैं। मैंने पूछा कि अभी तक क्यों नहीं भेजा था। बोले, मंगलेश इसे दबा कर बैठा हुआ था। दो महीने पहले मंगलेश को फोन किया था, उसने कहा था कि वह लेटर पढ़कर बताता है। पंकज उन्हें फोन करते रहे, वे कभी उठाते-कभी नहीं उठाते। उठाते तो कहते कि किसी काम में फंस गए थे, लेटर को पढ़ नहीं सके हैं। पंकज को यह अंदाज़ था कि मसला वीरेन से जुड़ा हुआ है और हम इतना नराज़ हैं तो मंगलेश तो और भी ज़्यादा होगा। वह न सिर्फ़ पत्र पर हस्ताक्षर करेगा बल्कि उसमें लेखकों के नाम भी जोड़ देगा। पंकज बोले कि बेहतर होता, मंगलेश को हस्ताक्षर के लिए कहता ही नहीं। मैंने कहा कि अब और लेखकों से हस्ताक्षर करा लीजिए, पंकज बोले कि पहले ही देरी से इसका महत्व कम हो चुका है, अब जितने नाम हैं, काफ़ी हैं, इसे मेल कर देते हैं।

काफ़ी दिनों बाद, एक दिन तीसरे पहर के क़रीब मैं वैशाली से मैट्रो रेल में चढ़ा तो मंगलेश डबराल मिल गए। वे संजय कुंदन के साथ थे। मैंने नमस्ते की और उन्होंने सजल आत्मीयता के साथ हाल-चाल पूछने के बाद अप्रत्याशित सवाल कर दिया कि क्या पंकज (बिष्ट) उनसे नाराज़ है। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन असहज होकर कहा कि आपके मित्र हैं, आप जानें। उन्होंने कहा कि (वो) मुझे `समयांतर` नहीं भेज रहा है। मैंने कहा कि आपकी सहयोग राशि ख़त्म हो गई होगी। बोले कि नहीं, मुझे लगातार मिलती थी। मैंने कहा कि आपको तो घर से निकलते ही पटरी पर किताबों की दुकान पर दिखाई दे जाती होगी, ख़रीद लीजिए। तब मुझे यही लग रहा था कि वे मयूर विहार में रहते हैं लेकिन शायद वे किराये का मकान छोड़कर जनसत्ता अपार्टमेंट के अपने घर में आ चुके थे। उन्होंने नाराज़गी का सवाल दोहराया तो मैंने कहा कि नाराज़गी का तो पता नहीं लेकिन आप वीरेन डंगवाल पर सुधीश पचौरी की घृणित टिप्पणी के विरोध में जारी किया जाने वाला पत्र दबाकर बैठे रहे, यब बात तो उन्हें बुरी लगी थी। मंगलेश ने पहले तो कहा कि ऐसा कुछ नहीं था लेकिन मैंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसा था तो उन्होंने कहा कि वे किसी की नौकरी नहीं लेना चाहते थे। मुझे इस जवाब पर हैरानी हुई। मैंने पूछा, किसकी नौकरी, सुधीश पचौरी की वो तो वहाँ स्तम्भ लिखता है और उस पर रोज़गार का कोई संकट नहीं है। या संपादक की जिसे शर्म नहीं आयी कि वो छाप क्या रहा है? उसकी नौकरी चली जाती?

एक तनाव तारी हो चुका था। ऐसा नहीं था कि मंगलेश को वीरेन पर पचौरी का अमानवीय हमला बुरा नहीं लगा होगा लेकिन किसी अख़बार से संबंध न बिगड़ जाएं, इस समझदारी ने उन्हें मज़बूर कर दिया होगा। यह जनसत्ता में कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान मालिकान के साथ रहने की उनकी विवशता वाले उनके शुरुआती दौर जैसा मसला भी नहीं था। वे इतना कर सकते थे कि पत्र पर हस्ताक्षर न कर पाने की बात कह देते और लेटर को दबाए न बैठे रहते। दिल उनका वीरेन के साथ ही रहा होगा, लेकिन दिमाग़!

रघुवीर सहाय की ऐसी ही किसी विवशता से खिन्न होकर असद ज़ैदी ने कभी एक कविता लिखी थी - `बेदिल की मुश्किल`। उसी से यह पंक्ति - ऐसे बयान से क्या फ़ायदा?

(एचटी मीडिया की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को भेजा गया पत्र यहाँ पढ़ सकते हैं।)

(मैंने यह पीस 29 सितंबर 2024 को फेसबुक पर लिखा था। इसे संजोने के लिए ब्लॉग पर पोस्ट कर लिया है।- धीरेश सैनी )

Monday, September 21, 2026

नरेन्द्र जैन की कविताएँ

नरेंद्र जैन 


मेरे तईं नरेन्द्र जैन हिन्दी कविता के चित्तप्रसाद हैं क्योंकि उनकी कविता का विजुअल कॉन्टेंट वैसा ही सुस्पष्ट है और इम्पैक्ट उतना ही मर्मभेदी. उनकी कविता पढ़ना पिछले पचास सालों में  हिन्दी समाज और वृहत्तर भारतीय समाज के उल्लास और अवसाद, उत्थान और पतन की चित्रवीथिका से गुज़रना है. पिछले दो दशकों की उनकी कविता में सेंस ऑफ़ लॉस इतना गहरा है कि पाठक के मन में सालों तक बजता रहता है उस ‘उदास धुन’ की तरह ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे*’।-भारतभूषण तिवारी

(To me, Narendra Jain is the Chittoprasad of Hindi Poetry, for his poems have the same unmistakable visual content and impact, which is equally poignant. Reading his work is a stroll through a picture gallery of joys and despairs, the rise and fall of the Hindi world and Indian society at large. His poems from the last two decades carry a profound sense of loss that resonates in a reader’s mind for years like a ‘melancholy tune played by Rais Ahmed on his clarinet*’.-Bharatbhooshan Tiwari) 

 

इस वक़्त


इस वक़्त

पीली सुनहरी रोशनी है

घर में फड़फड़ाती अकेली


दीवारों पर डोलती है

चीज़ों की आधी परछाई

क़मीज़ की दो बाँहें

ख़ाली बोतलों के आसपास दुबका अंधकार


तस्वीरों की ख़ामोश आकृतियाँ

डूबी हैं अपने निर्जीव अंधकार में

बाहर, मटमैले आसमान में

भटके हुए यात्री जैसा आधा चाँद

आख़िरी नज़र डालता है सामने फैले

अंधकार पर


कैसी है यह दुनिया

जो रोज़ जिए चली जाती है


कैसा है यह मिट्टी का दीया

जो फैलाता है

इस विध्वंस के बीच पीली सुनहरी रोशनी


आह, आखि़री तिनके का सहारा

कितना मज़बूत है चट्टान की तरह



समर्थ लोग


साधारण लोगों के बारे में

थोड़ा बहुत कह सकता हूँ

समर्थ लोगों के बारे में

न पहले कुछ कहा मैंने

न अब कह पाऊँगा


उस रास्ते से गुज़रता हूँ

थके-हारे लोग जहाँ आते जाते हैं 

उनके खुरदरे हाथों और आशंकित चेहरों पर

पढ़ता हूँ कितनी ही कथाएँ


समर्थ लोग उदास होते नहीं देखे मैंने

इतने समर्थ देखे समर्थ लोग मैंने

जो पलक झपकते ही कर दिया करते हत्या

चाहे वह एक विचार हो या आदमी


हर बार खदेड़ दिया गया मैं इतनी दूर

की बँधी रही मेरी आखि़री उम्मीद

थके-हारे लोगों से


समझा जाए इसे ही

समर्थ लोगों के प्रति

मेरी घृणा का पर्याय



रंग


पहले चटख़ हुआ करते हैं

फिर धीरे धीरे रंग

उड़ना शुरू कर देते हैं

वे इतने धुँधले हो जाते हैं कि

पहचाने नहीं जाते

वे धब्बा भर बच जाते हैं

धूसर, बेमेल, अनाकर्षक

उन्हें देखकर कोई प्रसन्न नहीं होता


बाज़ मौके ऐसे आते हैं

चित्रकार इन्हीं धूसर रंगों से

बनाता है अपना चित्र




संशय


कल मैंने फिर स्वप्न देखा

कि मेरी ट्रेन छूट गई है

और हाथ में टिकट लिए मैं हताश

प्लेटफार्म पर खड़ा हूँ

रात के सन्नाटे में

आते जाते वाहनों से बचते बचाते

मैं उस क़स्बे में प्रवेश करता हूँ

जिसका नाम याद नहीं आता

सहसा उस अनजान जगह मुझे

अपना घर दिख जाता है

वही दीवारें, पुराने दरवाज़े, खिड़कियाँ

मैं दरवाज़ा खटखटाता हूँ

स्वप्न में एक शख़्स खोलता है दरवाज़ा

और कहता है कि

जो शख़्स रहा करता था यहाँ

अब अन्यत्र चला गया है



Three Essays collective से प्रकाशित।
कविता लिखे ज़माना हुआ


कविता लिखे ज़माना हुआ

अब जो लिखते हैं कभी

कविता है या कविता का पैरहन

या कविता की हमज़ाद या कविता का

अभिनय करती कोई कविता

ज़्यादातर तो वह कविता कोई

बहुरूपिया हुआ करती है

वह बोलती तो है लेकिन परदे के पीछे से

कोई दोहरा रहा होता है उसके संवाद

वह हाव भाव चाल ढाल और

शक़्ल सूरत से भी कविता दिखना चाहती है

आग का दरिया तो मुश्किल ठहरा

तीली की हल्की सी कौंध नहीं यहाँ

कविता के अकाल में लेकिन

चौतरफ़ सैलाब उतर आया है कविता का

शब्द और काग़ज़ चीखते हैं

हमें बख़्शो!


कविता लिखे ज़माना हुआ



यही हासिल ठहरा


जो बात

शीशे की तरह साफ़ थी

उसमें एक बात की परछाई उतर आई है

नदी बह रही है पूरे वेग से

छायाकार ठहरा एक उदास शाम का मेहमान

उसके कैमरे में

शव की तरह लेटा है एक दृश्य

और वह अभी

बाहर नहीं आया है


बर्बादशुदा जीवन का

यही हासिल ठहरा



इर्द गिर्द


वह पत्थरदिल ना हो

लेकिन पत्थर की तरह ठोस हो

जंग लगे लोहे से उसे कोई वास्ता न हो

लेकिन हो वह पिघलते फ़ौलाद की मानिंद

संरचना उसकी ऐसी हो जैसे

बाँधा जा रहा हो कहीं एक लंबा पुल

रेलगाड़ियों के पहियों के घर्षण से खास

लगाव हो उसे

सूने और व्यस्त प्लेटफार्मों पर

वह लगातार आती जाती हो

गुमशुदा लोगों के पोस्टर में लिखी

मार्मिक अपील जैसी हो वह

कभी कभार टपकते हो उसकी आँख से आँसू


कोई ऐसी कविता

यहीं कहीं

तुम्हारे इर्द गिर्द ही चाहिए



धूल


नहीं हुआ शामिल 

दौड़ में 

हमेशा पाया गया पीछे


लेकिन इस बेडौल दुनिया के प्रति

मेरी दिलचस्पी कम न हुई


धूल में रहा

पाया गया लिथड़ा

धूल में ही


शब्द वहीं से शुरू हुए

जहाँ तोड़ रहा था कोई

रोटी का पहला कौर


इस भयावह दौर में

भूख के प्रति किया प्रकट सम्मान

कविता ने


मेरे लिए यही

बहुत हुआ

---

* भारतभूषण तिवारी की यह टिप्पणी नरेन्द्र जैन की कविताओं के Three Essays collective से प्रकाशित संग्रह `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` से ली गई है। यहाँ दी गईं कविताएँ इसी संग्रह से ली गई हैं। भारत की टिप्पणी में आई ‘उदास धुन’ ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे` 2012 में आधार प्रकाशन से छपे संकलन 'चौराहे पर लोहार' में शामिल ‘विदिशा डायरी सीरीज’ की एक कविता की पंक्ति है। 

(नरेन्द्र जैन का फ़ोटो `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` के बैक-कवर से लिया गया है। यह फोटो भारतभूषण तिवारी ने क्लिक किया है।)





Friday, September 18, 2026

अशोक वाजपेयी को संस्कृति का मसीहा कोई मूर्ख ही कहेगा - भैरव प्रसाद गुप्त

भैरव प्रसाद गुप्त (वर्तमान साहित्य, अगस्त-90)

(सुप्रसिद्ध कथाकार भैरव प्रसाद गुप्त से विद्याधर शुक्ल की बातचीत)

भोपाल का भारत भवन अपने जन्म के साथ तमाम तरह के विवादों से ग्रस्त रहा। फोर्ड फाउंडेशन से अपने सम्बन्धों तथा मार्क्सवाद के प्रखर विरोध के कारण वाम से जुड़े लेखक काफी हद तक इससे कतराते रहे। हालांकि यह भी सच्चाई रही है कि बहुत से वामपंथी लेखक चाहे, वे जनवादी लेखक संघ के सदस्य हों अथवा प्रगतिशील लेखक संघ के, अपने व्यक्तिगत नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए अशोक वाजपेयी और भारत भवन के नजदीक या दूर आते-जाते रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने मार्क्सवाद के प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छिपाया, लेकिन उनसे और भारत भवन से जुड़ने पर जो फायदे मिलते, उनके कारण नयी-पुरानी पीढ़ी के तमाम मार्क्सवादी लेखक उनके करीब आने के बहाने ढूंढ़ते रहे हैं। हाल में मध्यप्रदेश में हुए सत्ता-परिवर्तन के बाद यह लगभग तय हो गया है कि अशोक वाजपेयी अब भारत भवन को निजी जागीर के रूप में नहीं चला पायेंगे। यद्यपि परिवर्तन की इस स्थिति में कई और भयंकर खतरे निहित हैं। इस बात की पूरी सम्भावना उत्पन्न हो गयी है कि हिन्दू पुनरुत्थानवादी फासिस्ट शक्तियां भारत भवन पर काबिज हो जायेंगी। अशोक वाजपेयी ने इस स्थिति का चालाकी के साथ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अपने निष्कासन को वे शहीदाना स्तर पर ले जाना चाहते हैं। स्वामीनाथन, त्रिलोचन या हुसेन जैसे लोगों से अपने पक्ष में इस्तीफे दिलाकर वे स्वयं को संस्कृति की रक्षा में धराशायी योद्धा का दर्जा दिलाना चाहते हैं। अभी हाल में अशोक वाजपेयी इलाहाबाद आये थे। यहाँ जिस तरह दूधनाथ और मार्कण्डेय जैसे जनवादी लेखक संघ के लोगों ने भक्तिभाव से उनकी सेवा की, उससे कई दिलचस्प सवाल पैदा हुए। ये सवाल मार्क्सवाद, अशोक वाजपेयी, भारत भवन और जनवादी लेखक संघ के रिश्तों की मनोरंजक पड़ताल करते हैं। इन्हीं सवालों पर भैरवप्रसाद गुप्त से व. सा. ने बात-चीत की जो इस अंक में दी जा रही है। अशोक वाजपेयी से भी इलाहाबाद के कुछ लेखकों ने बात-चीत की, वह भी इसी अंक में पढ़ें। इसके अतिरिक्त भारत भवन के बारे में अन्य सामग्री भी हम इस अंक में उपलब्ध करा रहे हैं—सम्पादक, `वर्तमान साहित्य`। विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी के इस बयान (संडे आब्जर्वर 20. 5. 90) पर आप क्या कहना चाहेंगे? - 'यह देखकर हैरानी होती है कि पिछले दिनों के उथल-पुथल के बाद हमारे यहाँ उन बौद्धिक-साहित्यिक हलकों में जहाँ सारा जीवनाधार ही प्रगतिशीलता और जनवादिता है, किसी तरह की बौद्धिक बेचैनी नजर नहीं आती, बल्कि कहा तो यह जा सकता है कि जिस अनुपात में यूरोप और ऐसे बुद्धिजीवियों के पितृदेश सोवियत रूस में खुलापन और बहुलता आयी है, उसी अनुपात में हिन्दी में कट्टरता और अन्य-आग्रह बढ़े हैं - ये लोग अपनी विचारधारा के बाड़े में कैद और सुरक्षित हैं।' भैरव प्रसाद गुप्त : मुझे लगता है कि पूर्वी यूरोप में और रूस में जो घटनायें घट रही हैं, उनसे जिस प्रकार बहुत जल्दबाजी में पूँजीवादी, साम्राज्यवादी हलके अति उत्साह में आ गये हैं और तरह-तरह की बातें करते जा रहे हैं, जैसे कि साम्यवाद समाप्त हो गया, मार्क्सवाद-लेनिनवाद समाप्त हो गया... पूँजीवाद की विजय हो गयी आदि आदि। उसी प्रकार हमारे देश में भी अशोक वाजपेयी जैसे कुछ बुद्धिजीवी हैं, जो अति उत्साह में इसी तरह की बातें करने लगे हैं। पहली बात जो मैं उनकी बातों के सम्बन्ध में कहना चाहता हूँ, वह यह कि हम प्रगतिशील अथवा जनवादी कट्टर नहीं हैं और हमारा यह संकल्प भी है कि हम कट्टर नहीं होंगे। सही मार्क्सवादी कभी भी कट्टर नहीं होता। अपने सिद्धान्तों के प्रति आस्थावान बनना, दृढ़ रहना कट्टरवाद नहीं होता। कट्टरवाद वहाँ होता है, जहाँ आदमी अपने सिद्धान्तों को मार्गदर्शक सिद्धान्त न समझकर उन्हें लेकर या उसकी पूँछ पकड़कर बैठ जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह केवल अपने सिद्धान्त को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि अपने को भी नष्ट कर देता है। अशोक वाजपेयी को यह जानना चाहिए कि प्रगतिवाद अथवा जनवाद कोई आज की चीज़ नहीं है, अशोक वाजपेयी को यह भी जानना चाहिए कि जनवाद का सच्चा पाठ साम्यवादी आंदोलनों ने ही पढ़ाया है। उनका जनवाद और हमारा जनवाद अलग अलग है, इसमें कोई संदेह नहीं है। बड़े-बड़े विचारकों ने, पूँजीवादी विचारकों ने भी स्वीकार किया है कि उन्होंने या पूँजीवादी व्यवस्था ने साम्यवादी विचारधारा से बहुत कुछ सीखा और लिया है। उदाहरण के लिए एक लोक कल्याण की ही बात लीजिए, लोक-कल्याण के लिए समाजवादी व्यवस्था जैसे काम करती है, उसी प्रकार आज पूँजीवादी व्यवस्था भी करने की घोषणा करती है। मैं जानता हूँ और अशोक वाजपेयी भी यह जानते होंगे कि पूँजीवादी व्यवस्था किस रूप में और कैसे समाजवादी व्यवस्था को प्रभावित करती है?

जब तक विश्व में एक साथ समाजवादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था अस्तित्व में रहेंगी, तब तक वे एक दूसरे को प्रभावित करती रहेंगी, एक दूसरे पर क्रियाशील रहेंगी। यदि पूँजीवादी देश समाजवाद से प्रेरणा लेकर लोक-कल्याण की बात करते हैं और इसी प्रकार कुछ समाजवादी देश पूँजीवाद से प्रेरणा लेकर बाजार से सम्बद्ध आर्थिक नीति की बातें करने लगते हैं तो इसमें बेचैन होने की कौन सी बात है! कुछ समाजवादी देश ऐसी बातें करने लगे हैं इसलिए इस परिणाम पर पहुँचना कि साम्यवाद का अंत हो गया, मार्क्सवाद लेनिनवाद का अंत हो गया, क्या सरासर मूर्खतापूर्ण बात नहीं है? आखिर किस बात की बेचैनी? उन देशों में उथल-पुथल मच रहा है, इस बात की बेचैनी? वहाँ परिवर्तन आ रहे हैं, इस बात की बेचैनी? परिवर्तन तो हमारा नारा है। परिवर्तन तो मार्क्सवाद का मूल नारा है। परिवर्तन का सिद्धान्त मार्क्सवाद ने प्रतिष्ठित किया और मार्क्सवादी परिवर्तन के लिए आये तथा समाजवादी व्यवस्था परिवर्तन के लिये आयी। हम इस बात से बेचैनी का अहसास नहीं करते कि किस देश में क्या हो रहा है बल्कि हम उसको ठंडे दिमाग से समझने का प्रयत्न करते हैं कि क्या हो रहा है, हम इन्तज़ार करते हैं कि देखा जाय ऊँट किस करवट बैठता है। अभी इसी बीच जो कुछ पोलैंड में हुआ है, चैकोस्लोवाकिया में हुआ है या रूमानिया या अल्बानिया में हुआ है, क्या अशोक वाजपेयी इन चीज़ों को देख रहे हैं? वहाँ के परिवर्तनों को, वहाँ के चुनावों के नतीजों को उन्होंने देखा है। भाई, ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद एक दिन में आ गया और एक दिन में चला जायेगा।

मार्क्सवाद एक सतत् विकासशील प्रगतिशील सिद्धान्त है। मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धान्त नहीं है, मार्क्सवाद कोई जड़ आदर्श नहीं है, ऐसा दर्शन नहीं है जो एक दिन में आये और दूसरे दिन चला जाय। दुनिया में और कोई वाद है, और कोई दर्शन है, और कोई विचारधारा है जिसने इस तरह तेजी से विकास किया हो और सारी दुनिया में फैल गया हो। मार्क्स और एंगेल्स ने जो सिद्धान्त निरूपित किये थे, विकास के सिद्धान्त, सामाजिक विकास के सिद्धान्त, राजनीतिक विकास के सिद्धान्त, क्या वे आज उसी रूप में हैं? क्या लेनिन ने कुछ नहीं किया? क्या स्टालिन ने कुछ नहीं किया? क्या माओ ने कुछ नहीं किया? क्या होचीमिन्ह ने कुछ नहीं किया? क्या फिदेल कास्त्रो ने कुछ नहीं किया? अशोक वाजपेयी को कुछ पढ़ना चाहिए, कुछ समझना चाहिए। राजनीति मज़ाक नहीं है। इस तरह अशोक वाजपेयी जैसे बुद्धिजीवियों को बुलबुल नहीं उड़ाना चाहिए। उनको इस बात को समझना चाहिए और समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। हम इस बात का दावा नहीं करते कि समाजवादी व्यवस्था हमेशा सही काम ही करेगी। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह ग़लती भी करता है। पार्टियों का स्वभाव भी ऐसा ही होता है। वे भी ग़लतियां करती हैं। हम अपने को सदा सही काम करने वाला नहीं मानते। हमसे भी ग़लतियां होती हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि अगर ग़लतियां करते हो और गलतियां सामने आ जाती हैं तो उसको समझो, उसको ठीक करो और यह ध्यान रखो कि आगे वे ग़लतियां न हों। क्या और भी ऐसी कोई पार्टी है, कम्युनिस्ट पार्टी के अलावे, जो यह काम करती हो?

आज ही देख लें, अपने देश में देख लें। राजीव गांधी क्या कर रहे हैं? कांग्रेस क्या कर रही है? सब उन्हीं लोगों का किया-दिया है, देश का सारा नाश उन्हीं लोगों ने किया है, लेकिन आज ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं कि नयी सरकार देश को कमज़ोर कर रही है, नई सरकार देश की समस्याएं हल नहीं कर पा रही है, पंजाब, कश्मीर की समस्या हल नहीं कर पा रही है। क्या कोई उनसे पूछने वाला है कि तुम लोगों ने क्या किया? क्या तुम लोगों ने हल कर दिया था? हल कर देते तो काहे को यह संकट आता, काहे को यह तक़लीफे़ं होतीं। लेकिन नहीं, हमारे यहां मुसीबत यही है कि जहां कहीं कुछ होता है, देश में या बाहर तो उसे लेकर ढपली बजाने लगते हैं और इस तरह की बातें करते हैं कि हम बेचैन क्यों नहीं होते। अरे भाई, हम जानते हैं, हम समाजशास्त्र के नियमों और सिद्धांतों को कुछ समझते हैं। परिवर्तन से हमें कोई घबराहट नहीं होती। लेकिन हमें एक बात का पूरा विश्वास है और अशोक वाजपेयी को यह जान लेना चाहिए कि वह विश्वास ही प्रमुख वस्तु है, क्योंकि इस विश्वास का आधार इतिहास है, इतिहास का आधार समाज का विकास है, मनुष्य का विकास है, मनुष्य के विवेक का विकास है, समझ का विकास है, उसके ज्ञान तथा चेतना का विकास है, कि परिवर्तन अवश्यंभावी है। कभी यह परिवर्तन ग़लत भी हो सकता है और कभी सही भी हो सकता है। अगर ग़लत है तो उसको सही करना चाहिए और अगर सही है तो उसको आगे बढ़ाना चाहिए। यह हम जानते हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी से मेरा नम्र निवेदन यह है कि वह ऐसी जल्दबाजी न करें और हमें बेचैन होने का सबक न सिखाएं। बेचैनी दरअसल उन्हें होगी, क्योंकि वे जानते हैं कि यह जो कुछ हो रहा है, वह कुछ दिनों की बात है, क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा, समाजवादी सिद्धांत, मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत यों ही हवा से उतरकर नहीं आये हैं, मार्क्सवाद-लेनिनवादी सिद्धांत वे ठोस ज़मीन से, समाज-विकास के नियमों के एक वैज्ञानिक तरीके़ से निकाले गये हैं और लगातार आज तक विकसित होते गये हैं। क्या कोई ऐसा वाद है इस दुनिया में, जिसने इस तरह से अपना विकास-विस्तार किया हो, इतनी व्याप्ति से दुनिया के देश-देश में पहुँचा हो, इतना वेग से जनमानस को उद्वेलित किया हो, इतनी ही गहराई से लोगों को संघर्ष के लिए उत्प्रेरित किया हो, इतनी शिद्दत से बौद्धिकों को आंदोलित किया हो? मार्क्सवाद एक सर्वाधिक सशक्त विचारधारा के रूप में आज भी है और मैं यह कहना चाहता हूँ कि वह अंततः विकसित होता रहेगा। लेकिन मार्क्सवाद को उसी रूप में जो लोग आज भी देखते हैं, जिस रूप में उसका सूत्रपात हुआ था, वे बड़ी ग़लती करते हैं। मार्क्सवाद आज बहुत अधिक विकसित हो गया है और आगे बढ़ गया है। उसे समग्र रूप में समझना चाहिए, उसके भविष्य के रूपों की कल्पना करना चाहिए।

अशोक वाजपेयी से मैं यह पूछना चाहूँगा कि उनके पास जनता की ग़रीबी का क्या हल है? उनके पास मज़दूरों की बदहाली का क्या हल है? उनके पास बेकारों की समस्या का क्या हल है? क्या पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर सकता है? अगर कर सकता है तो अमरीका में बेकारी क्यों है, इंग्लैण्ड में बेकारी क्यों है, पश्चिमी जर्मनी में बेकारी क्यों है, खु़द हमारे हिन्दुस्तान में इतनी बड़ी बेकारी क्यों है? 48 साल से हम आज़ाद हैं। क्या हमने इन समस्याओं को हल कर लिया? हमें कर लेना चाहिए था। अशोक वाजपेयी बतायें कि ये समस्याएँ क्यों दिन प्रतिदिन और विकराल होती चली जा रही हैं? क्या रूस में भी ऐसी ही समस्याएँ हैं? क्या चीन में भी ऐसी बेकारी है? क्या क्यूबा में भी ऐसी ही ग़रीबी है? क्या वियतनाम में भी ऐसी ही बदहाली है? हमें तो ख़ुशी होगी अगर पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर दे। जनता की भलाई और सुख-शांति के लिए काम करने लगे। तब क्या मुझे उसमें बेचैनी होगी कि अरे, यह पूँजीवाद क्या करने लगा? लेकिन नहीं, पूँजीवाद के बस की यह बात है ही नहीं। अशोक वाजपेयी जैसे लोग आज भी उसका पूँछल्ला बनकर उसका गीत गाये जा रहे हैं। पूर्वी यूरोप में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर उनका ख्याल है कि पूँजीवाद की विजय हो रही है। इस खु़शफ़हमी में वे जश्न मनायें, जैसे उन्होंने गैस-त्रासदी के दौरान भारत-भवन में मनाया था। जनता के सुख-दुःख से उन्हें क्या लेना? कुलीन संस्कृति वालों का नाच-गान चलता रहे, देव जावे भाड़ में।

विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी की बात चली तो इन्हीं से संदर्भित एक और प्रश्न। विगत दिनों इलाहाबाद में जनवादी लेखक संघ के तीन पदाधिकारियों-मार्कडेय, शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह ने भारत भवन के सिरमौर अशोक वाजपेयी के सम्मान में 'कथा' की ओर से काव्य संध्या (18.4.90) का आयोजन किया। 'संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा' के रूप में उनका परिचय दिया गया। ज्ञातव्य है कि जलेस के ही रमेश कुंतल मेघ का विगत दिनों `पूर्वग्रह` में अशोक वाजपेयी के नाम लिखा गया एक पत्र छपा था, जिसका आशय यह था कि भारत-भवन के आयोजन में अवश्य आता (पूर्व स्वीकारोक्ति भी भेज चुका था) लेकिन 'जलेस' की अनुमति न होने के कारण मैं नहीं आ पाऊँगा। क्या भारत भवन के जलसों में शरीक न होने हेतु जलेस का कोई ऐसा निर्देश था? यदि था तो क्या अब उस पर से पाबन्दी हटा ली गयी है?

भैरव प्रसाद गुप्त : रमेश कुंतल मेघ ने जो बात लिखी थी, वो सही है। जलेस की कार्यकारिणी की एक बैठक में भारत भवन की गतिविधियों के सम्बन्ध में चर्चा हुई थी और यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या जलेस के सदस्य उसके समारोहों में सम्मिलित हों? काफी बहस-मुबाहिसे के बाद यह तय हुआ था कि भारत भवन की गतिविधियां, भारत भवन का फोर्ड फाउंडेशन के साथ सम्बन्धित होना और स्वयं अशोक वाजपेयी की विचारधारा ऐसी है, जिससे हमारा कोई भी सहयोग नहीं हो सकता। अगर उनसे हमारा कोई सम्बन्ध हो सकता है तो वह विरोध का ही हो सकता है। ऐसी स्थिति में जलेस के सदस्यों को उसके समारोहों से या उन्हें किसी भी प्रकार का सहयोग देने से बचना चाहिए। इलाहाबाद में 'कथा' की ओर से अशोक वाजपेयी के लिए जो जलसा किया गया, उसके सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि 'कथा' जलेस की पत्रिका नहीं है। हाँ, उसके सम्पादक मार्कण्डेय और जलसे के आयोजकों में शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह जलेस के पदाधिकारी हैं। इन लोगों ने 'कथा' की ओर से जो जलसा किया, मेरा ख्याल है, कि यह समझकर किया होगा कि वे लोग अपनी व्यक्तिगत हैसियत से यह काम कर रहे हैं। उसका सम्बन्ध जलेस से कुछ भी नहीं है। फिर भी इस सम्बन्ध में यह कहना चाहूँगा कि जलेस के जिम्मेदार सदस्यों को, विशेषकर उसके पदाधिकारियों को, ऐसा काम नहीं करना चाहिए था। मुझे यह सुनकर, अन्य लोगों से जिन लोगों ने शिरकत की थी जलसे में, बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ कि इस तरह की बातें जैसी कि आपने अपने प्रश्न में की है, कैसे कहीं गयीं? क्या कोई यह मानने को तैयार होगा कि अशोक वाजपेयी संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा है? संस्कृति का भी क्या कोई समय होता है, जिसे कोई एक लाता हो? संस्कृति को कोई सम्पन्न कर सकता है, संस्कृति का कोई उन्नयन कर सकता है, संस्कृति के प्रति कोई जनता को जागरूक बना सकता है, यह सब तो सही है। क्या अशोक वाजपेयी ने इन कामों में से कोई काम किया? तथाकथित कुलीन संस्कृति का पोषण वे जनता के धन से कर रहे हैं, उससे कुछ कलाकारों का पोषण भले हो, जनता की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा है?

अगर ऐसा कहने का उद्देश्य अशोक वाजपेयी को मस्का लगाना हो, तो मेरा दुःख और भी बढ़ जायेगा। इस तरह की ग़लत और ऊल-जलूल बातें करना ठीक नहीं है। और जलेस के अधिकारियों को तो इस तरह की बातें करनी ही नहीं चाहिए।

अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से, 'पूर्वग्रह' के माध्यम से जो कुछ कर रहे हैं, उन्होंने आज तक जो कुछ किया है और आगे, अगर वे बने रहे तो, जो कुछ करेंगे, हम जानते हैं। बड़े-बड़े जलसे सरकारी पैसे से (म० प्र० सरकार भारत- भवन को पचास लाख रुपये प्रति वर्ष देती है) कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। करोड़ों रुपये खर्च कर इतना बड़ा 'अपना उत्सव' राजीव गांधी ने किया था, उसका क्या परिणाम हुआ? क्या उससे हमारी लोक-संस्कृति का कोई विकास हो गया? क्या उससे दुनिया को मालूम हो गया कि हमारी लोक-संस्कृति क्या है? नहीं भाई, इस तरह संस्कृति के साथ खेलवाड़ पूंजीवादी ही करते हैं। उनके पास धन है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उनके पास साधन है, जितना चाहें प्रचार कर सकते हैं। किन्तु हम तो देखेंगे कि उसका परिणाम क्या होता है? यह सही है कि अशोक वाजपेयी ने कुछ लेखकों को, कुछ चित्रकारों को, कुछ अभिनेताओं गायकों को अपने आस-पास इकट्ठा कर लिया है। लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अशोक वाजपेयी के पास जो शक्ति है, वह तंत्र की शक्ति है, धन की शक्ति है, जिसके बल पर लेखकों को चित्रकारों और गायकों को उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जमा कर रखा है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत भवन लाखों रुपये इन जलसों पर, कलाकारों पर खर्च करता है और यह जानकर कि ये रुपये केवल सही मार्ग से नहीं आते हैं, ग़लत मार्ग से भी आते हैं, फोर्ड फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं से आते हैं, कोई मार्क्सवादी, प्रगतिशील या जनवादी चित्रकार अथवा कलाकार कैसे इनसे सहयोग करेगा? हमें यह देखना चाहिए और समझना चाहिए कि अशोक वाजपेयी क्या कर रहे हैं, अशोक वाजपेयी कोई भारत कला भवन के निर्माता रायकृष्ण दास नहीं हैं, जिन्होंने भारत कला भवन के निर्माण में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। अशोक वाजपेयी एक बड़े नौकरशाह हैं, बहुत मोटी तनख्वाह पाते हैं और भारत-भवन के पदाधिकारी तथा उससे जुड़े लेखक, चित्रकार तथा गायक भी काफी मोटी तनख्वाहें अथवा सुविधा पाते हैं। ये लोग कला तथा संस्कृति की सेवा के नाम पर क्या कर रहे हैं? उनके कामों का जनता के सांस्कृतिक जीवन पर क्या असर पड़ रहा है? हमें यह भी देखना चाहिए कि उन लोगों की इन कामों के पीछे मंशा क्या है, वे किस प्रकार के साहित्य, कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं?

वाजपेयी बार-बार मार्क्सवाद पर आक्रमण करते हैं, साम्यवाद पर आक्रमण करते हैं, प्रगतिवादियों और जनवादियों से हमेशा खार खाये रहते हैं। ऐसे अशोक वाजपेयी को संस्कृति का समय लाने वाला मसीहा, मेरा ख्याल है, कोई प्रगतिवादी या जनवादी तो नहीं कह सकता। ऐसा वही आदमी कह सकता है, जिसका स्वार्थ किसी न किसी रूप में अशोक वाजपेयी से जुड़ा हो, जुड़ने वाला हो या जो चाहता हो कि जुड़े। अशोक वाजपेयी के पास लाभ पहुँचाने के बहुत से साधन हैं। वे लेखकों को, कलाकारों को हवाई जहाज का किराया देकर बुलाते हैं और उनके आतिथ्य में लाखों रुपये खर्च करते हैं। जो इन सब सुविधाओं का भोग करना चाहते हैं, वे निश्चित रूप से उनके पास जायेंगे। उनके लिए अशोक वाजपेयी संस्कृति के मसीहा हो सकते हैं।अशोक वाजपेयी से या किसी से भी हमारी कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। लड़ाई तो उनकी तथा हमारी विचारधारा के बीच है। वे अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं और हम अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं। विचारधाराओं के बीच यह संघर्ष जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। हमारी विचारधारा के मसीहा तो मार्क्स हैं, उनकी विचारधारा के मसीहा कौन हैं, लोगों को साफ़-साफ़ बतायें तो? यदि वे स्वयं मसीहा हैं, तो यही कहें।

विद्याधर शुक्ल : `भारत-भवन के पीछे फोर्ड फाउन्डेशन का भी हाथ है। भारत भवन के क्रिया-कलापों में जनता के पैसे का दुरुपयोग किया जाता रहा है।' इस प्रकार की बातें प्रारम्भ से ही सुनने को मिलती रही हैं। फोर्ड फाउन्डेशन आखिर भारत भवन पर ही क्यों मेहरबान हुआ? भारत भवन के कार्य-कलापों से जन साधारण को क्या लाभ हुआ है? अशोक वाजपेयी भारत भवन, संस्कृति विभाग म० प्र० के अब तक के कार्य-कलापों के बारे में आपकी क्या राय है?

भैरव प्रसाद गुप्त : फोर्ड फाउन्डेशन के साथ भारत भवन का सम्बन्ध स्थापित करने में कृष्ण बलदेव वैद का हाथ होगा। वैद कई वर्षों से भारतीय साहित्य के सम्बन्ध में अमेरिका के सलाहकार थे। मेरा ख्याल है कि उन्हीं के माध्यम से अशोक वाजपेयी का सम्बन्ध फोर्ड फाउन्डेशन से बना होगा, यह सन्देह मुझे इसलिए हो रहा है कि जैसे ही कृष्ण बलदेव वैद अमेरिका की सेवा से मुक्त होकर भारत आये, उन्हें अशोक वाजपेयी ने अपने यहाँ एक बहुत बड़ी जगह दे दी, जहाँ वे अब भी हैं। फोर्ड फाउन्डेशन हमेशा ऐसी संस्थाओं की खोज में रहता है जिनके माध्यम से वह अमेरिकी संस्कृति का प्रचार और समाजवादी संस्कृति का विरोध कर सके। 'इनकाउन्टर' पत्रिका इसका एक उदाहरण है। 'इनकाउन्टर' के सम्पादक को कई वर्षों तक यह पता ही नहीं चला कि 'इनकाउन्टर' किसके पैसे से चल रहा है। 'इनकाउन्टर' लगातार निकलता रहा और रूस का, सोवियत साहित्य का सदा विरोध करता रहा, मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र का विरोध करता रहा, लेकिन सम्पादक को यह पता ही नहीं था कि यह सब कौन करा रहा है। कई वर्षों बाद उसे मालूम हुआ कि 'इनकाउन्टर' सी. आई. ए. के पैसे से चल रहा है। सी. आई. ए. का पैसा हो या फोर्ड फाउन्डेशन का पैसा हो या और भी किसी पूँजीवादी देश या समाजवादी देश का पैसा हो, यह यूँ ही किसी को नहीं दिया जाता। यह पैसा उन संस्थाओं और व्यक्तियों को दिया जाता है जो समाजवाद विरोध का कार्य करते हैं। अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से सच कहा जाय तो समाजवादी विचारधारा का लगातार विरोध ही कर रहे थे। ऐसी संस्था फोर्ड फाउन्डेशन को बहुत उपयोगी लगी होगी और उसने खु़शी से उन्हें धन दिया होगा ताकि वह अपना काम आगे बढ़ा सकें। मैं तो नहीं जानता कि भारत भवन के क्रिया-कलापों से मध्य प्रदेश के जन साधारण को कोई लाभ पहुँचा। भारत भवन में जो कुछ होता है, उससे चंद लोगों को कुछ लाभ भले ही हुआ हो, वहाँ की जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है। भारत भवन का जिस रूप में प्रचार हुआ है, वैसा भारत भवन है नहीं। भारत भवन जैसी ही या उससे बड़ी कई सांस्कृतिक संस्थाएं भारतवर्ष में काम कर रही हैं और भारत भवन से कहीं अधिक लाभकारी काम कर रही हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में इस तरह की तेरह संस्थाएं हैं। उत्तर प्रदेश में भारत कला भवन ही है। भारत भवन को लेकर जितना शोर किया गया सच पूछिये तो उतना काम नहीं हुआ। काम बहुत थोड़ा हुआ है। कुछ संग्रह किये गये हैं वहाँ कुछ कला-चित्रों के, कुछ मूर्तियों के और कुछ काव्य ग्रंथों के। संग्रह से हो सकता है कि वहाँ के जो लोग मूर्तिकार हैं, उनको कुछ लाभ हुआ हो या कला-दीर्घा के चित्रों से हो सकता है कुछ कलाकारों को कुछ लाभ हुआ हो। यह भी हो सकता है कि भारत भवन के प्रचार से प्रभावित होकर कुछ लोग भारत भवन देखने जाते हों लेकिन सचमुच भारत भवन के क्रिया-कलापों से म. प्र. के आम लोगों को कुछ लाभ हुआ हो या उनका सांस्कृतिक जीवन किसी भी रूप में बेहतर हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता। यूँ भी सामान्य लोगों की दिलचस्पी भारत-भवन में केवल इसलिए हो सकती है कि चलो यह भी एक देखने की जगह है, इससे अधिक कुछ नहीं।

अशोक वाजपेयी ने जिस तरह भारत भवन या म. प्र. सरकार के संस्कृति विभाग का कार्य चलाया है, मेरा ख्याल है कि उन्होंने अपनी मर्जी से, अपनी समझ के अनुसार एक विशिष्ट विचारधारा के अन्तर्गत चलाया है। सरकार और फोर्ड-फाउंडेशन का, और सम्भव है कि कुछ अन्य माध्यमों से भी भारत भवन को धन मिलता हो, से जिस तरह के कार्य उन्होंने किये है और जिस तरह के जश्न उन्होंने मनाये है, उनमें अकूत धन खर्च हुआ है। मुझे नहीं मालूम और मैंने देखा भी नहीं है अभी तक, भारत भवन के आय-व्यय के विवरण का लेखा-जोखा अगर वह सामने आये तो मालूम होगा कि उन्होंने इन वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं। यहाँ इतने भारी खर्चे से उन्होंने म. प्र. के सांस्कृतिक जीवन में कौन सा परिवर्तन किया है, यह समझ में आने वाली बात नहीं है। भारत-भवन के माध्यम से उन्होंने कुछ संस्कृति-कर्मियों को इकट्ठा किया है, उनमें प्रमुख स्वामीनाथन हैं। उन्हें उन्होंने आजीवन ट्रस्टी बनाया था और कला दीर्घा का निदेशक भी। भारत भवन से सम्बद्ध होने से पहले स्वामीनाथन दिल्ली की सड़कों पर घूमते नजर आते थे। स्वामीनाथन, निर्मल वर्मा और कभी-कभी श्रीकांत वर्मा नाम को वहाँ किसी होटल में एक साथ दिखाई पड़ते थे, स्वामीनाथन का हाल यह था कि वह दिन में कहीं न कहीं कोई काम करके विशेषकर लिंक हाउस में 'लिंक' का आवरण बनाकर कुछ पैसा बनाकर लाते थे और उसे शाम को वे खर्च कर देते थे, लेकिन जब से भारत भवन के साथ उनका सम्बन्ध हुआ, उनका जीवन ही बदल गया, उनकी कला के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह असामाजिक है, उनका कोई भी कार्य मैंने नहीं देखा जिसका कोई मतलब हो, यों भी उनकी मान्यता है कि एक चित्रकार को कुछ सोचकर चित्रकारी नहीं करनी चाहिए बल्कि ब्रश उठाना चाहिए और उसे कैनवस पर चला देना चाहिए। जो चित्र बनेगा वही चित्र होगा, वे बोहेमियन हैं और ऐसा एक बोहेमियन चित्रकार कलादीर्घा में क्या कर सकता था, उसका नमूना भारत भवन की कला दीर्घा है, इसी तरह कई लेखक और रंग-कर्मी भारत भवन से सम्बद्ध हुए जैसे निर्मल वर्मा हैं, पहले नामवर सिंह का भी सम्बन्ध भारत भवन से बना था जो काफी दिन तक चला। नेमिचंद जैन तो लिखित रूप से किसी रूप में भारत भवन से संबद्ध नहीं थे लेकिन प्रायः वे भारत भवन के कार्यक्रमों में भाग लेने जाते रहे, अब इधर नामवर सिंह का सम्बन्ध टूटा है, रघुवीर सहाय को तो अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन में हिन्दी का प्रतिनिधि कवि बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, जो हो, कुछ न कुछ लेखक सदा भारत भवन की ओर जाते रहे हैं और इस तरह से भारत भवन का काम चलता रहा।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी, जैसा आपने कहा कि ये लोग लाभ उठाते हैं लेकिन लाभ उठाने वालों में आपने मार्क्सवादी लोगों का नाम नहीं लिया जैसे त्रिलोचन जी, शमशेर बहादुर जी पीठ पर बैठे। इन लोगों में दो दूसरे तरह के लोग हैं, जैसे- नरेश मेहता, निर्मल वर्मा हैं, जिक्र तो ऐसे लोगों का करना है जो लोग अपने को वामपंथी तेवर का लेखक कहते हैं और उसकी भुनाते हैं। असल में मैं इन्हीं मुद्दों पर आपसे कुछ जानना चाहता हूँ।

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं इस बात पर आना ही चाहता था। यह अच्छा हुआ कि आपने मुझे टोक दिया। अशोक वाजपेयी एक तपे हुए नौकरशाह है। वे अपना काम किस तरह करें, उन्हें मालूम है। वे प्रत्यक्ष रूप से यह प्रगट करना कभी भी नहीं चाहेंगे कि दरअसल वे क्या करना चाहते हैं। वे बहुत ही गोपनीय या यों कहिए कि छद्म रूप से अपना काम करते हैं। वे यह कभी प्रगट करना नहीं चाहते हैं कि वे किसी विशिष्ट धारा के मानने वाले और पोषक हैं। वे प्रगट यह करना चाहते हैं कि वे सभी विचारधाराओं के लेखकों और कलाकारों को भारत-भवन से सम्बद्ध करना चाहते हैं। जाहिर है कि एक बहुत ही चतुर नौकरशाह यह काम कर सकता है और बखू़बी निभा सकता है। बहुत दिनों तक वाजपेयी ने यह मुखौटा धारण किया और इसी के तहत उन्होंने कुछ प्रगतशिलों को, जैसे विशेषकर नामवर सिंह को, हरिशंकर परसाई को तथा अन्य लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। हम लोगों को स्वयं बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि क्या बात है, क्योंकि नामवर जी को मैं किसी भी रूप में ऐसे मार्क्सवादी के रूप में स्वीकार नहीं करता कि वह कोई भी काम ऐसा करें जो उनकी विचारधारा के विरुद्ध हो। लेकिन वह बार-बार उनके जंजालों में जाते थे। उसी तरह हरिशंकर परसाई हैं, वे भी अपने को मार्क्सवादी और शायद कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी कहते थे, कैसे वे उनके जाल में फँस जायेंगे। लेकिन ये चीजें चलती रही। ये एक नौकरशाह के काम करने का अपना तरीका था। वह यह दिखलावा लोगों के सामने करता था कि उसका कोई विशिष्ट विचार नहीं है। वह सभी लोगों को आमंत्रित करता है। वह मार्क्सवादियों को आमंत्रित करता है, वह गैर मार्क्सवादियों को भी आमंत्रित करता है और उसकी कोशिश यह है कि सब लोग मिलकर किसी विशिष्ट विषय पर बात करें और लोगों का यह सोचने का मौका दे कि क्या सही है और क्या गलत है, दरअसल अशोक वाजपेयी जो काम करते थे, उसमें चाहे परचाई हो या नामवर हो या इनके जैसे और कोई म. प्र. के लोग हों, वे देखें और समझें कि अशोक वाजपेयी किसी विशेष विचारधारा के साथ पक्षपात नहीं कर रहे हैं लेकिन अशोक वाजपेयी इस परदे के पीछे अपना काम सही रूप में कर रहे थे। इनके जश्न की जो रिपोर्ट आती थी, उससे स्पष्ट होता था कि किस विचारधारा का पलड़ा भारी रहता था। नामवर सिंह ने अपने भाषणों में, जहाँ तक मैंने पढ़ा है, सुनने का तो मुझे कोई अवसर नहीं मिला। क्योंकि मैं भारत भवन तक तो नहीं गया। मैं बार-बार जश्न का नाम ले रहा, इसलिये कि मैं समझता हूँ कि वो जश्न ही थे। इस माने में जश्न थे कि जैसे दरबारों में पहले कभी हुआ करते थे, जहाँ राजाओं के, नवाबों के दरबारी इकट्ठा होते थे उसी तरह से अशोक वाजपेयी के दरबार में ये लेखक, चित्रकार गायक, अभिनेता, रंगकर्मी एकत्रित होते थे और अपनी बातें करते थे। मेरे कहने का मतलब यह है कि अशोक वाजपेयी ने कभी भी एक क्षण के लिए यह नहीं सोचा कि संस्कृति का कोई संबंध जनता से भी है। वे हमेशा सफेदपोशों के बीच घिरे रहे या यों कहना चाहिये कि अपने चारों ओर सफेद पोश कलाकारों को एकत्रित करते रहे। जैसा कि मैंने पहले कहा कि नामवर जी के भागीदारी के सम्बन्ध में हम लोगों को बराबर आश्चर्य होता रहता कि ये क्यों जाते हैं। ये क्यों भारत भवन के आयोजनों में हिस्सा लेते हैं जब कि ये जानते हैं कि अशोक वाजपेयी की विचारधारा क्या है और वे भारत-भवन द्वारा कौन सा काम करना चाहते हैं, फिर भी क्यों जाते हैं, आखिर वो दिन आया जब कि नामवर सिंह ने अपना सम्बन्ध पूर्णरूप से विच्छेद कर लिया और वहाँ जाना-आना बन्द कर दिया। जहाँ तक निर्मल वर्मा और रघुवीर सहाय का सम्बन्ध है या विजय मोहन सिंह का सम्बन्ध है—ये लोग तो सचमुच अशोक वाजपेयी की विचारधारा के ही लोग हैं। इन लोगों का वहाँ बने रहना या जब तक अशोक वाजपेयी वहाँ रहेंगे, उस वक्त तक बने रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जहाँ तक कि शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन शास्त्री का सवाल है—शमशेर बहादुर सिंह आजीवन बहुत ही दुखी और परेशान व्यक्ति रहे हैं। शमशेर बहादुर सिंह से मेरा सम्बन्ध बहुत पुराना और बहुत दिनों का है। उन्होंने मेरे सहयोगी के रूप में जिसे अब वे स्वीकार करने के लिए कहीं भी किसी भी रूप में तैयार नहीं हैं, कई वर्षों तक काम किया। उनके काम करने का ढंग और काम करने की समझ के बारे में मैं जानता हूँ और मैं यह कह सकता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह कवि चाहे जैसे हों जहाँ तक काम का सम्बन्ध है, वे बिल्कुल बेकार के आदमी हैं।

अशोक वाजपेयी को ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी जो परेशान हों। हमारे त्रिलोचन शास्त्री भी उसी तरह एक परेशान व्यक्ति हैं। बिहार की किसी पत्रिका में यह पढ़कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और दुख भी। दुख इसलिये कि त्रिलोचन शास्त्री को मैं एक स्वाभिमानी कवि के रूप में देखता और समझता था। केदारनाथ सिंह किसी गोष्ठी में जिसकी रिपोर्ट बिहार की एक पत्रिका में छपी थी, उसमें यह कहा कि एक दिन मैं त्रिलोचन शास्त्री के यहाँ सुबह-सुबह पहुँचा तो देखा कि त्रिलोचन सूखी रोटी गुड़ के साथ खा रहे हैं। मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ। जाहिर है कि केदार सिंह को तो दुख होता है क्योंकि......

विद्याधर शुक्ल : क्योंकि सामंत किस्म के आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : वे जवाहर लाल नेहरू वि. वि. में प्राध्यापक हैं।

विद्याधर शुक्ल : और घर के भी सम्पन्न आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : घर के सम्पन्न आदमी हैं। जमींदार किस्म के परिवार के रहने वाले हैं। उनको तो दुख होता ही क्योंकि रोटी के साथ गुड़ तो आमतौर पर आम लोगों के जलपान की चीज़ है लेकिन उन्हें दुख हुआ क्योंकि वे समझते थे कि त्रिलोचन शास्त्री जैसा महान कवि यह क्या यह नाश्ता कर रहा है। इसे तो ऐसा नाश्ता करना चाहिए जो कि केदारनाथ स्वयं अपने घर में करते हैं। केदारनाथ सिंह का कहना यह था कि मैंने तुरन्त अशोक वाजपेयी को पत्र लिखा कि—हे अशोक वाजपेयी, एक महान कवि जिसका नाम त्रिलोचन शास्त्री है, वह इस परिस्थिति में पड़ा हुआ है कि वह रोटी गुड़ का जलपान करता है फिर उन्होंने कहा कि अशोक वाजपेयी इतने उदार हैं, इतने महान हैं कि उन्होंने त्रिलोचन को एक पीठ पर आसीन कर दिया। वैसे ही शमशेर बहादुर सिंह को भी एक पीठ पर अशोक वाजपेयी ने आसीन किया था। शमशेर बहादुर भी त्रिलोचन शास्त्री से कहीं अधिक परेशान थे। इलाहाबाद में जो उनकी स्थिति थी, हम लोग अच्छी तरह से जानते हैं फिर वे दिल्ली गये। दिल्ली में भी उनकी हालत बदतर रही। मतलब ये कि शमशेर बहादुर सिंह हमेशा दूसरों की सहायता, दूसरों की मदद, दूसरों की कृपा पर अपना जीवन व्यतीत करते रहे। मैं कहूँगा कि उनमें स्वयं ऐसी योग्यता नहीं थी कि वे अपनी कमाई अपनी योग्यता की या अपने काम की कमाई खा सकते। कभी प्रभाकर माचवे ने कृपा कर दी, कही कोई काम दिला दिया, कभी मैंने कृपा कर दी, उन्हें अपने पास रख लिया। इसी प्रकार कभी अज्ञेय ने कृपा कर दी, कुछ रुपये दे दिये। मतलब, इसी तरह से उनका जीवन निर्वाह होता रहा। लेकिन अशोक वाजपेयी ने उन्हें एक पीठ पर आसीन करके उन्हें कुछ वर्षों के लिये स्थायी जगह दे दी। फिर तो साहब कमाल ही हो गया। कमाल ये हो गया कि उन्हें दो-दो बड़े पुरस्कार अशोक वाजपेयी ने दिया और उनके बुढ़ापे का पूरा इन्तजाम कर दिया। इतना ही करते तो कोई बात नहीं, उन्होंने यहभी सिद्ध कर दिया कि वे भारतवर्ष के सबसे महान कवि हैं। मुझे आश्चर्य होता है, एक पुरस्कार 51 हजार का पहले दिया,जो बाद में त्रिलोचन को भी मिला, फिर कबीर पुरस्कार। खैर! पुरस्कार उनके पास पैसा है, किसी को भी दें। मैं तोहमेशा यह कहता हूँ कि कोई मालिक अपने गधे को मलीदा खिलाये तो हमको क्या आपत्ति हो सकती है, बहुत अच्छा है। कम से कम गधे को मलीदा खाने को तो मिल रहा है। लेकिन मुझे आश्चर्य उस सम्बन्ध में होता कि पुरस्कार समिति के बहुत सारे अहिन्दी भाषा-भाषी कवियों और लेखकों की रिपोर्टों में कहा गया कि उन सबों ने यह भी स्वीकार किया कि शमशेर बहादुर भारत के सबसे महान कवि हैं। मुझे नहीं मालूम कि इन प्रादेशिक भाषाओं के कवियों ने शमशेर बहादुर सिंह की एक पंक्ति भी पढ़ी है या नहीं।

शमशेर बहादुर सिंह अपने बारे में जब कुछ लिखते हैं तो बहुत सारी झूठी बातें लिखते हैं यहाँ से वहाँ तक। वे भैरवप्रसाद गुप्त को नहीं याद करते हैं क्योंकि भैरव प्रसाद गुप्त तो हमेशा प्रगतिशील रहा है और हमेशा रहेगा। इसी सन्दर्भ में, मैं शमशेर बहादुर सिंह के सम्बन्ध में एक बात और कह देना जरूरी समझता हूँ। शायद यही कारण हो जिससे शमशेर बहादुर सिंह ने अशोक वाजपेयी जैसे मार्क्सवाद विरोधीसे सम्पर्क किया। मेरे साथ उन्होंने कई वर्षों तक काम किया। वे लिखते हैं कि माया का मैं सहायक-सम्पादक था। असल में सहायक सम्पादक नहीं, उप सम्पादक थे। मैंने उन्हें यह काम दिया था कि वे कहानियाँ पढ़ें और कहानियों के बारे में अपनी नोटिंग दें। आज मैं बता रहा हूँ और आपको सुनकर आश्चर्यहोगा कि जिन कहानियों पर शमशेर बहादुर सिंह 'एवन' की नोटिंग करते थे, उन कहानियों को भी मैं कभी नहीं छाप सका। खैर शमशेर काम करते रहे, तनख्वाह लेते रहे लेकिन मालिक तो काम देखते हैं, लेकिन मेरी आदत शुरू से है कि मैं अपने मातहतों के विरुद्ध मालिक को कोई रिपोर्ट नहीं देता था कभी भी। जब मालिक कभी पूछते थे तो मैं कह देता था ठीक है, काम चल रहा है, कोई परेशानी की बात नहीं। लेकिन मालिक की एक नजर होती है। वह देखता रहता है। मैंने बता दिया था कि मेरे पास 'कहानी' में सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। पर शमशेर बहादुर सिंह माया प्रेस से निकाल दिये गये। फिर वे जैसे रहते थे, रहने लगे। काफी परेशानी में वे बेचारे। क्योंकि उनकी कुछ आदतें ऐसी थी, कुछ शौक ऐसे थे कि वे हमेशा परेशानी में रहते थे। आमदनी नहीं देखते थे, खर्चा करते जाते थे।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी असली सवाल पर आवें। शमशेर बहादुर सिंह तो कवियों के कवि हैं जैसा कि बहुत से लोग और मैं भी मानता हूँ। मैं आप से पूछ सकता हूँ कि क्या शमशेर बहादुर सिंह की कोई कविता या उसके कुछ अंश भी आपको याद हैं या अन्य किसी कवि-लेखक की कोई कविता याद है? नागार्जुन की कविताएँ लोगों की जुबान पर हैं कुछ अंशों तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ लोगों के याद हैं, सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने किस तर्क पर उन्हें सबसे बड़ा कवि मान लिया। उन्हें जनकवि तो कहा नहीं जा सकता। विगत वर्षों में प्रगतिशीलों ने और अशोक वाजपेयी ने केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह को और मजबूरन नागार्जुन को माना लेकिन इन तीनों की श्रेणी में शमशेर बहादुर सिंह कहाँ आते हैं। सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने ऐसे कवि को सबसे महान कवि घोषित किया, अशोक वाजपेयी के इस गैर साहित्यिक रवैये पर आप का कहना चाहेंगे?

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं कहना यह चाहता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह एक कवि के रूप में मध्य प्रदेश में ही प्रतिष्ठित रहे हैं जबसे उनका सम्बन्ध अशोक वाजपेयी से बना, पूर्वग्रह और 'साक्षात्कार' में जिस रूप में शमशेर पर प्रचार किया गया, वह निश्चय ही शमशेर बहादुर सिंह के सही रूप में कवि की हैसियत नहीं थी। उसके पीछे अशोक वाजपेयी के कुछ अपने मन्तव्य थे, कुछ लक्ष्य थे जिसके अनुसार उन्होंने शमशेर बहादुर के साथ व्यवहार किया और शमशेर को चूँकि जीवन में एक तरह से पहला अवसर मिला आराम का, जब कि वे आराम से रह सकते थे,उन्होंने इसे स्वीकार किया था और अब भी स्वीकार करते हैं और अब उसी को भोग रहे हैं। मैं जो कहने जा रहा था आपके उसी प्रश्न के सन्दर्भ में है। जब वे माया प्रेस छोड़कर फिर उसी बेकारी के जीवन में आ गये। बेकारी का जीवन यानी परेशानी का जीवन। जैसे एक बोहेमियन होता है जिसको कोई भी परवाह नहीं होती, क्या आमदनी है, क्या खर्चा है? वे जीवन को व्यवस्थित ढंग से चलाने की कोई परवाह या प्रयास भी नहीं करते। कर्ज हो जाय या कोई परेशानी हो जाय, वे उसकी परवाह नहीं करते। जैसे चल रहा है, जीवन चल रहा है, चलने दो। जैसे वह चले, चलेगा। उन्हीं दिनों एक दिन अचानक मुझसे शमशेर बहादुर सिंह की इलाहाबाद चौक में नीम तले मुलाकात हो गयी। नमस्कार के बाद बिना किसी अन्य बातचीत के उन्होंने कहा—'कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर अगर मैं बना रहता तो मेरा कवि मर जाता। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर मैंने अपने कवि को बचा लिया।' अचानक उन्होंने ये बात कही। जवाब में मेरे मुँह से निकल गया कि मैं देखूँगा कि आप कैसे कवि बनते हैं। आप इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि अब तक आप जिस कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुये हैं, उसका बहुत सारा श्रेय कम्युनिस्ट पार्टी को है। आपके बम्बई के जीवन को है, इलाहाबाद के जीवन को है। उसके बाद हमारी कोई बातचीत नहीं हुई। वे अपनी राह चले गये, मैं अपनी राह। बाद में जो भी बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं। मैं उनमें नहीं जाना चाहता। वे मध्य प्रदेश पहुँचे, अशोक वाजपेयी की उन पर कृपा हुई। उनके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था हो गई। अशोक वाजपेयी को ऐसे लोगों की तलाश रहती है, किसी जमाने में अज्ञेय को भी ऐसे कवियों, ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी। ऐसे कवियों की सहायता करने के लिये वे तैयार रहते थे। जैसे रघुवीर सहाय हैं, अब भूल गये होगें, अज्ञेय ने उनकी मदद की। खैर, इस प्रकरण में मैं नहीं जाना चाहता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। मुझे इन लोगों का बड़ा अनुभव रहा है। यह सब मैं कहने लगूँ तो लम्बा प्रसंग हो जायगा। मेरे कहने का लब्बो-लबाब यह है कि ये लोग कभी भी नहीं सोच सकते कि संस्कृति का सम्बन्ध जनता से होता है। अशोक वाजपेयी ने सफेदपोशों को ही संस्कृति का कर्ता-धर्ता मान लिया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि संस्कृति के सारे स्रोत आम जनता से ही निकलते हैं।

(जनवादी लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष भैरव प्रसाद गुप्त का यह साक्षात्कार वर्तमान साहित्य के अगस्त 1990 अंक से साभार।)