एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
Showing posts with label
फ़ैज़
.
Show all posts
Showing posts with label
फ़ैज़
.
Show all posts
Saturday, January 8, 2011
फ़ैज़ पर कुछ नोट्स : दूसरी और अंतिम किस्त
›
फ़ैज़ अपने उस्ताद के साथ शतरंज खेलना नहीं भूलते . बल्कि यह भी उनका प्रिय व्यसन है . ग़ालिब कहते हैं : ' बुलबुल के क...
3 comments:
›
Home
View web version