एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
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विष्णु नागर
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विष्णु नागर
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Monday, June 14, 2010
कविता का कठिन रास्ता : संजय कुंदन
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विष्णु नागर हिंदी के ऐसे विरले रचनाकार हैं जिन्होंने रोजमर्रा जीवन की एकदम मामूली दिखने वाली चीजों, प्रसंगों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया ह...
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Wednesday, February 24, 2010
विष्णु नागर के नये संग्रह से चार कविताएँ
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दो यात्राएँ ------ मैं एक यात्रा में एक और यात्रा करता हूँ एक जगह से एक और जगह पहुँच जाता हूँ कुछ और लोगों से मिलकर कुछ और लोगों से मिलने चल...
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Thursday, January 14, 2010
विष्णु नागर की एक कविता
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मेरा जीवन नाक की दिशा में दौड़ाता है कान, आँख सिर, मुँह कुछ नहीं नाक की दिशा में दौड़ हाथ, पाँव पेट, पीठ कुछ नहीं नाक की दिशा में दौड़ पीठ क...
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Monday, November 10, 2008
विष्णु नागर की एक पुरानी कविता
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मेरे भाई ने लिखी चिट्ठी लिखा आना आना कि इस बार बहन भी आ रही है आना तो ख़ूब मज़ा रहेगा गांव से भाई कहे आना तो मैं क्यों न जाऊं? मैं आऊंगा भाई...
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