एक ज़िद्दी धुन

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

Sunday, September 2, 2007

यहां एक रेल आकर रुकती है -मंगलेश डबराल

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स्मृति के डिब्बे से अगर किसी पुरानी फिल्म को निकालकर देखें तो वह शायद क्रमवार-शुरुआत, मध्य और अंत-नहीं दिखायी देगी। उसका दृश्य क्रम उलट-...
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Thursday, August 30, 2007

मैंने यह नाम कयों रखा...`अजीब ज़िद्दी धुन थी कि हारता चला गया`

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मेरी एक पसंदीदा कविता की पंक्ति है- ` अजीब ज़िद्दी धुन थी  कि हारता चला गया '। इसमें में `एक बात है` जो शायद आप को भी अपील करे। इस ...
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Ek ziddi dhun
धीरेश सैनी Dhiresh Saini
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