एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
Tuesday, December 29, 2009
आदिवासीजन धरती को बचाने की लड़ाई के वॅनगार्ड हैं- ह्यूगो ब्लांको
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साठ के दशक में पेरू की दमनकारी सामंती कृषि व्यवस्था के खिलाफ ह्यूगो ब्लांको ने किसानों के सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया. सेना द्वारा ग...
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Wednesday, December 23, 2009
हिंदुस्तान अखबार द्वारा पत्रकारों के शोषण की मुहिम का विरोध करें
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हिंदुस्तान टाइम्स समूह के दैनिक अखबार हिंदुस्तान में इन दिनों पत्रकारों से एक एग्रीमेंट पर ज़ोर-ज़बरदस्ती से हस्ताक्षर कराया जा रहा है जिसमें ...
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Tuesday, December 15, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक (रघुवीर सहाय पर मनमोहन) अंतिम किस्त
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(पिछली दो किस्तों से जारी) : रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी च...
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Monday, December 14, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन) दूसरी किस्त
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(पिछली किस्त से जारी) इसी तरह यह बात भी गौरतलब है कि उन्होंने अपने समय के इस शीतयुद्धीय सुझाव को अमान्य कर दिया था कि `जनतांत्रिक...
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Thursday, December 10, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन)
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(मैं यह लेख कल ९ दिसंबर को सहाय जी के जन्मदिन पर देना चाहता था पर यह मुमकिन न हो पाया। सहाय जी पर यह संभवतः सबसे अच्छे आलोचनात्मक लेखों...
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`व्यावहारिक` लोग न पढ़ें
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`मुझे उन तथाकथित व्यावहारिक लोगों की बुद्धि पर हंसी आती है, अगर कोई बैल बनना चाहे तभी वह मानवता की पीड़ाओं से मुंह मोड़कर अपनी ख़ुद की चमड़ी ...
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Monday, December 7, 2009
रोटी और तारे : ओक्तई रिफ़त
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गोद में रखी है रोटी और सितारे बहुत दूर मैं अपनी रोटी खाता हूँ सितारों को तकते हुए ख़यालों में इस कदर गुम कि कभी कभी मैं गलती से खा जाता हूँ ...
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