एक ज़िद्दी धुन

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

Monday, May 24, 2010

इतिहास का अंत

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इतिहास की प्रवृत्ति है अपने को दुहराना , यह मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है; इतिहास के अंत की घोषणाओं के बारे में ही यह बात सबसे ज़्यादा ख...
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Wednesday, May 12, 2010

लौट आ, ओ धार!

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लौट आ, ओ धार! टूट मत ओ साँझ के पत्थर हृदय पर। (मैं समय की एक लंबी आह! मौन लंबी आह!) लौट आ, ओ फूल की पंखडी! फिर फूल में लग जा। चूमता है ...
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Saturday, May 8, 2010

कसाब के बहाने उन्माद का जश्न

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अदालत ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी है। दुनिया ने भारतीय न्याय प्रक्रिया में मुल्क की डेमोक्रेसी को देखा जो मुल्क के बाहरी और भीतरी दुश्मन...
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Thursday, April 22, 2010

नरेन्द्र जैन की तीन कविताएँ

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(उनके नए संग्रह काला सफ़ेद में प्रविष्ट होता है से साभार) भाई ----- दिवंगत बड़े भाई के लिए जहाँ तक छायाचित्र संबंधी समानता का प्रश्न है ब...
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Saturday, April 3, 2010

लाल्टू की एक कविता : हुसैन सागर

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(दिल्ली से हैदराबाद लौटते हुए) नहीं शहर के उस हिस्से में जहाँ मुझे जाना है दंगा नहीं हुआ है। जहाँ हुआ है, ठीक ठीक किन कारणों से हुआ है...
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Wednesday, March 10, 2010

हुसेन प्रकरण : क्या विष्णु खरे ने बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का `भार` उतार फेंका? - धीरेश सैनी

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विष्णु खरे को उनके `मित्र` ज़िद की हद तक सेक्युलर कवि-चिन्तक बताते रहे हैं। `लालटेन जलाना` समेत उनकी दो किताबें (कविता की) मैंने पढ़ी हैं ...
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Sunday, March 7, 2010

औरतों की कविताएँ : शुभा

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1. औरतें ---------- औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं मिट्टी के चूल्हे और झाँपी बनाती हैं औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं मिट्टी के रंग के कपडे ...
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धीरेश सैनी Dhiresh Saini
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