एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
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असद ज़ैदी
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Wednesday, June 20, 2018
मुक्तिबोध — उत्पीड़न और नायकत्व : असद ज़ैदी
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('नया पथ' का मुक्तिबोध विशेषांक मुझे बहुत देरी से हासिल हो पाया। इस पत्रिका में छपा असद जी का यह लेख मुक्तिबोध के उत्पीड़न और हि...
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Sunday, July 28, 2013
मंगलेश डबराल के कविता संग्रह 'नये युग में शत्रु' पर असद ज़ैदी की टिप्पणी
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न ये युग में शत्रु एक बेगाने और असंतुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं – अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल क...
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Saturday, January 8, 2011
फ़ैज़ पर कुछ नोट्स : दूसरी और अंतिम किस्त
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फ़ैज़ अपने उस्ताद के साथ शतरंज खेलना नहीं भूलते . बल्कि यह भी उनका प्रिय व्यसन है . ग़ालिब कहते हैं : ' बुलबुल के क...
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