एक ज़िद्दी धुन

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद

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Monday, December 7, 2009

रोटी और तारे : ओक्तई रिफ़त

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गोद में रखी है रोटी और सितारे बहुत दूर मैं अपनी रोटी खाता हूँ सितारों को तकते हुए ख़यालों में इस कदर गुम कि कभी कभी मैं गलती से खा जाता हूँ ...
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धीरेश सैनी Dhiresh Saini
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