एक ज़िद्दी धुन
जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद / वही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायद
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Sahay-Manmohan
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Tuesday, December 15, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक (रघुवीर सहाय पर मनमोहन) अंतिम किस्त
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(पिछली दो किस्तों से जारी) : रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी च...
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Monday, December 14, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन) दूसरी किस्त
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(पिछली किस्त से जारी) इसी तरह यह बात भी गौरतलब है कि उन्होंने अपने समय के इस शीतयुद्धीय सुझाव को अमान्य कर दिया था कि `जनतांत्रिक...
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Thursday, December 10, 2009
व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन)
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(मैं यह लेख कल ९ दिसंबर को सहाय जी के जन्मदिन पर देना चाहता था पर यह मुमकिन न हो पाया। सहाय जी पर यह संभवतः सबसे अच्छे आलोचनात्मक लेखों...
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