
(पिछली दो किस्तों से जारी) :
रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी चीजों को देखते हैं जिन पर अभी काम चल रहा है और जिनकी जगहें या शक्लें अंतिम रूप से तय नहीं हो गयी हैं। कई महाकवियों के यहाँ जो `आलीशान सन्नाटा` खिंचा दिखायी देता है, जिसमें देखने-दिखाने वाली तमाम चीजें होती हैं जो नाप-तौलकर चमका-चमकाकर रख दी जाती हैं, जैसे वे आख़िरी बार रख दी गयी हों, वैसा यहाँ नहीं है। लगता है रघुवीर सहाय अपनी कविताएँ काफी मेहनत, सावधानी और मनोयोग से लिखते थे लेकिन वह उनके लिए शायद ऐसी किसी विराट और महत्वाकांक्षी परियोजना का रूप नहीं लेती थी कि जिसकी सफलता अनिवार्य हो। उनकी कविता पूरी तरह जीवन-आलोचना के उन सूत्रों में व्याप्त रहती है जो निरंतर सजग-सक्रिय उनकी कविता में हर तरफ फैले रहते हैं। अक्सर वह अपने कामधाम में इतनी व्यस्त दिखायी देती है कि शायद ही वहां `कविताई` के लिए अलग से कोई जगह बच पाती है।
रघुवीर सहाय यथार्थ के साथ खुला हुआ विकासशील सम्बन्ध बनाने वाले कवि हैं। ऐसा कवि जो हर बार यथार्थ की गति का धीरज, सादगी, विवेक और दिलचस्पी के साथ पीछा करता है, अधबीच में भटक जाये या थककर लौट आये तो अपने अधूरे अनुभव को बताने में शर्म महसूस नहीं करता लेकिन `कविता पकड़ने` के लालच में हरगिज नहीं फंसता। शायद इसीलिए रघुवीर सहाय की कविता सबसे कम दावा करने वाली और सबसे कम नाज-नखरे उठाने वाली कविता है। शायद यह भी एक वजह है कि बहुत से कलाविदों को उनकी कविताएँ इतनी कम कविताएँ या लगभग गैर-कविताएँ लगती हैं।
रघुवीर सहाय यह दिखाने के लिये भी याद किये जायेंगे कि कविता अलग से शिल्पकारिता या काव्यात्मकता का कतई कोई भार उठाये बिना भी सीधे-सीधे अपना काम संभाल सकती है और इस तरह नए शिल्प का आविष्कार ज्यादा स्वतंत्रतापूर्वक कर सकती है। उन्होंने कविता की शिल्पकारिता को पूरी तरह उसके काम में ही शामिल कर लिया था। ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने चीजों को बिना किसी सहारे या बहाने के सीधे उनके नाम से पुकारने की मुश्किल लेकिन कारगर शुरुआत की थी। यहाँ यह याद दिलाना शायद उपयोगी होगा कि भाषा की `प्रतीकात्मक जड़ता` को लगभग निर्णायक रूप से ध्वस्त करने का उनका उपक्रम (शायद जिसे हर महत्वपूर्ण कवि अपने ढंग से करता ही है) किसी नयी भाषिक तरकीब की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। वह कवि की `प्रयोगशीलता` या कोई नया शिल्पगत पूर्वग्रह नहीं था। यह उस फासले को कम करने (या शायद स्पष्ट करने) की कोशिश थी जो रचनाकार के संज्ञान और यथार्थ की गतिविधि के बीच सहज ही बन जाता है और जिसमें तमाम तरह के धोखे और स्वांग डेरे डाले रहते हैं। यह कोशिश दरअसल यथार्थ की छटाओं को, उनकी तमाम गतिविधियों और प्रपंचों को खुली आँखों, सादगी के साथ, उसकी स्वाभाविकता में, गद्यात्मकता और लौकिकता में देखने-जाने और उसी भाषा में रचने की योजना का ही हिस्सा थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि रघुवीर सहाय ने कवि के संज्ञान की विधि को कई तरह की रूढ़ियों और कर्मकांडों से आजाद कर दिया और उसकी सृजनशील कल्पना के क्षेत्र को भी काफी कुछ बदल दिया। इस नए मैदान में कविकर्म के लिये जहाँ ढेरों नयी (कई बहुत भारी) असुविधाएं हैं, वहीं यह तय है कि इससे रचना की बिलकुल विरल, व्यापक और वास्तविक संभावनाएं खुली हैं। आधुनिक कविता और मुक्तिबोध की परम्परा में यह एक चीज रघुवीर सहाय का अपना योगदान कही जा सकती है।
रघुवीर सहाय का निधन एक ऐसे समय हुआ है जब तमाम रचनाशील जनतांत्रिक तत्वों के बीच गहरे संवाद और एक नयी किस्म की एकता की जरूरत सबसे ज्यादा बन रही थी। रघुवीर सहाय इस संवाद का शायद सबसे जरूरी पक्ष थे।
पिछले दिनों से (खासकर पिछले दो संग्रहों की कविताओं में) रघुवीर सहाय अधिक अकेले दिखायी देते थे। वहां वह नागरिक दिखायी देता था जो व्यथा के भार से थक चला था, अपने अकेलेपन में जो अपने आपसे और अपने लोगों से इस तरह जुड़ गया था जैसे किसी अप्रत्याशित हमले का सामना करने के लिए सन्नद्ध हो रहा हो। मृत्यु की नीली रेखा जो जब-तब दिखायी देने लगी थी वह यकीनन अपनी मृत्यु की नहीं थी। शायद फासिस्ट घेराबंदी में घेरा जाता हुआ वह हमारा अपना वक्त ही था।
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रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी चीजों को देखते हैं जिन पर अभी काम चल रहा है और जिनकी जगहें या शक्लें अंतिम रूप से तय नहीं हो गयी हैं। कई महाकवियों के यहाँ जो `आलीशान सन्नाटा` खिंचा दिखायी देता है, जिसमें देखने-दिखाने वाली तमाम चीजें होती हैं जो नाप-तौलकर चमका-चमकाकर रख दी जाती हैं, जैसे वे आख़िरी बार रख दी गयी हों, वैसा यहाँ नहीं है। लगता है रघुवीर सहाय अपनी कविताएँ काफी मेहनत, सावधानी और मनोयोग से लिखते थे लेकिन वह उनके लिए शायद ऐसी किसी विराट और महत्वाकांक्षी परियोजना का रूप नहीं लेती थी कि जिसकी सफलता अनिवार्य हो। उनकी कविता पूरी तरह जीवन-आलोचना के उन सूत्रों में व्याप्त रहती है जो निरंतर सजग-सक्रिय उनकी कविता में हर तरफ फैले रहते हैं। अक्सर वह अपने कामधाम में इतनी व्यस्त दिखायी देती है कि शायद ही वहां `कविताई` के लिए अलग से कोई जगह बच पाती है।
रघुवीर सहाय यथार्थ के साथ खुला हुआ विकासशील सम्बन्ध बनाने वाले कवि हैं। ऐसा कवि जो हर बार यथार्थ की गति का धीरज, सादगी, विवेक और दिलचस्पी के साथ पीछा करता है, अधबीच में भटक जाये या थककर लौट आये तो अपने अधूरे अनुभव को बताने में शर्म महसूस नहीं करता लेकिन `कविता पकड़ने` के लालच में हरगिज नहीं फंसता। शायद इसीलिए रघुवीर सहाय की कविता सबसे कम दावा करने वाली और सबसे कम नाज-नखरे उठाने वाली कविता है। शायद यह भी एक वजह है कि बहुत से कलाविदों को उनकी कविताएँ इतनी कम कविताएँ या लगभग गैर-कविताएँ लगती हैं।
रघुवीर सहाय यह दिखाने के लिये भी याद किये जायेंगे कि कविता अलग से शिल्पकारिता या काव्यात्मकता का कतई कोई भार उठाये बिना भी सीधे-सीधे अपना काम संभाल सकती है और इस तरह नए शिल्प का आविष्कार ज्यादा स्वतंत्रतापूर्वक कर सकती है। उन्होंने कविता की शिल्पकारिता को पूरी तरह उसके काम में ही शामिल कर लिया था। ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने चीजों को बिना किसी सहारे या बहाने के सीधे उनके नाम से पुकारने की मुश्किल लेकिन कारगर शुरुआत की थी। यहाँ यह याद दिलाना शायद उपयोगी होगा कि भाषा की `प्रतीकात्मक जड़ता` को लगभग निर्णायक रूप से ध्वस्त करने का उनका उपक्रम (शायद जिसे हर महत्वपूर्ण कवि अपने ढंग से करता ही है) किसी नयी भाषिक तरकीब की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। वह कवि की `प्रयोगशीलता` या कोई नया शिल्पगत पूर्वग्रह नहीं था। यह उस फासले को कम करने (या शायद स्पष्ट करने) की कोशिश थी जो रचनाकार के संज्ञान और यथार्थ की गतिविधि के बीच सहज ही बन जाता है और जिसमें तमाम तरह के धोखे और स्वांग डेरे डाले रहते हैं। यह कोशिश दरअसल यथार्थ की छटाओं को, उनकी तमाम गतिविधियों और प्रपंचों को खुली आँखों, सादगी के साथ, उसकी स्वाभाविकता में, गद्यात्मकता और लौकिकता में देखने-जाने और उसी भाषा में रचने की योजना का ही हिस्सा थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि रघुवीर सहाय ने कवि के संज्ञान की विधि को कई तरह की रूढ़ियों और कर्मकांडों से आजाद कर दिया और उसकी सृजनशील कल्पना के क्षेत्र को भी काफी कुछ बदल दिया। इस नए मैदान में कविकर्म के लिये जहाँ ढेरों नयी (कई बहुत भारी) असुविधाएं हैं, वहीं यह तय है कि इससे रचना की बिलकुल विरल, व्यापक और वास्तविक संभावनाएं खुली हैं। आधुनिक कविता और मुक्तिबोध की परम्परा में यह एक चीज रघुवीर सहाय का अपना योगदान कही जा सकती है।
रघुवीर सहाय का निधन एक ऐसे समय हुआ है जब तमाम रचनाशील जनतांत्रिक तत्वों के बीच गहरे संवाद और एक नयी किस्म की एकता की जरूरत सबसे ज्यादा बन रही थी। रघुवीर सहाय इस संवाद का शायद सबसे जरूरी पक्ष थे।
पिछले दिनों से (खासकर पिछले दो संग्रहों की कविताओं में) रघुवीर सहाय अधिक अकेले दिखायी देते थे। वहां वह नागरिक दिखायी देता था जो व्यथा के भार से थक चला था, अपने अकेलेपन में जो अपने आपसे और अपने लोगों से इस तरह जुड़ गया था जैसे किसी अप्रत्याशित हमले का सामना करने के लिए सन्नद्ध हो रहा हो। मृत्यु की नीली रेखा जो जब-तब दिखायी देने लगी थी वह यकीनन अपनी मृत्यु की नहीं थी। शायद फासिस्ट घेराबंदी में घेरा जाता हुआ वह हमारा अपना वक्त ही था।
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