आतंकवादी दो तरह के होते हैं. एक वो जो मुसलमान होते हैं. (कहा तो यह भी जाता है कि मुसलमान होते ही आतंकवादी हैं) दूसरे वो जो हमारे अजीज हैं, आँखों के तारे हैं. वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.