Showing posts with label कविताएं. Show all posts
Showing posts with label कविताएं. Show all posts

Tuesday, December 23, 2014

ज्योत्सना शर्मा की दो कविताएं


ज्योत्स्ना शर्मा (11 मार्च 1965-23 दिसंबर 2008) अपनी कुछ कविताओं के प्रकाशन के बावजूद हिंदी साहित्य की दुनिया में अनजाना नाम है। अनजाना की जगह उपेक्षित शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि उनकी जो कविताएं `अनुनाद` ब्लॉग, `संबोधन` और `जलसा` पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, वे एक रचनाकार को लेकर साहित्य के पाठकों और अन्वेषणकर्ताओं में चर्चा, जिज्ञासा और उन्हें और ज्यादा पढ़ने के लिए उनकी अप्रकाशित सामग्री की तलाश की भूख पैदा करने लायक तो हैं ही। लेकिन, इस वक़्त या कहें कि हमेशा ही जो हाल इस दुनिया का रहा है, उसमें ऐसा होना स्वाभाविक है। उपेक्षा की बात करें तो ज्योत्सना में खुद पत्रिकाओं में छपने या हिंदी साहित्य का हिस्सा बनने के प्रति गहरा उपेक्षा का भाव था। यह भाव उनमें शायद हर किस्म के ढांचों से था और अंततः इसका असर उनके अपने जीवन पर भी था। आज ही के दिन उन्होंने जैसा कि गहरी बेचैनियों में जीने वाले संवेदनशील मनुष्यों के साथ होता है, अचानक आत्महत्या का रास्ता चुन लिया था। उनकी स्मृति में उनकी  दो कविताएं, जो `जलसा` में प्रकाशित हो चुकी हैं-


ज्योत्सना की दो कविताएं
---------------------------------

लौटना

लौट चले कमेरे घर की ओर
                         भूख लिये साथ
प्रियजनों की यादें बिखरी बिखरी
जब चिडि़यों के बोल धीमे थे
जब लौटते थे बच्चे थके से
छाती थी पेड़ों पर काली गहराई
जब बकरियों के उदास रेवड़
लौटते थे बाड़ों में
अपने पीछे लिये खोये-खोये चरवाहों को
जब मच्छर निकलते थे भनभनाते
और दीवारों पर खिन्न छिपकलियाँ
जब जलती थी पुश्तैनी अंधेरे कमरों में
                            बल्ब की बीमार रोशनी
मैदान होने लगते थे अकेले
आसमान के गुलाबी सिरे पर
उठती थी अज़ान
                              डूबी डूबी।
..............



गुमनाम साहस

वयस्कों की दुनिया में बच्चा
और पुरूषों की दुनिया में स्त्री
अगर होते सिर्फ़ योद्धा
अगर होती ये धरती सिर्फ़ रणक्षेत्र
                     तो युद्ध भी और जीत भी
आसान होती किस क़दर;
लेकिन मरने का साहस लेकर
आते हैं बच्चे
और हारने का साहस लेकर
आती हैं स्त्रियां
ऐसा साहस जो गुमनाम है
ऐसा विचित्र साहस जो लील जाता है
                        समूचे व्यक्ति को

और कहते हैं वो जो मरा और हारा
                         कमज़ोर था
कि यही है भाग्य कीड़ों का;

ऐसी भी होती है एक शक्ति
उस छाती में जिसपर
हर रोज़ गुज़र जाती है
                              एक ओछी दुनिया।
--------

Saturday, September 6, 2014

शुभा की चार कविताएं


वरिष्ठ कवयित्री, लेखिका और एक्टिविस्ट शुभा का आज जन्मदिन है। इस मौके पर हम अपनी 60 साल की इस युवा साथी की चार कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं।
1
एक लम्बी दूरी
एक अधूरा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता
फिर भी दिखती है मंज़िल

दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर
***

2
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा नहीं
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है।
***

3
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह भी नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं।
***

4
प्यासा आदमी
पानी को याद करता है
वह उसे पीना चाहता है

फिर प्यास बढ़ती है
तो वह उसे देखना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह उसकी आवाज़ सुनना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह अपने और पानी के बीच की दूरी देखने लगता है

और प्यास बढ़ती है तो वह
इस दूरी को एक रास्ते की तरह देखता है

और दूरी बढ़ती है
तो वह रास्ते को प्यार करने लगता है

और प्यास बढ़ती है
तो हर क्षण पानी भी उसके साथ रहने लगता है

लोग न उसके पानी को देखते हैं न उसकी प्यास को

ऐसा आदमी कभी-कभी गूंगा हो जाता है।
-----------

Thursday, March 6, 2014

अविनाश मिश्र की चार कविताएं





सफदर हाशमी से निर्मल वर्मा में तब्दील होते हुए

मैं थक गया हूं यह नाटक करते-करते
रवींद्र भवन से लेकर भारत भवन तक
एक भीड़ के सम्मुख ‘आत्म सत्य’ प्रस्तुत करते-करते
मैं अब सचमुच बहुत ऊब गया हूं
इस निर्मम, निष्ठुर और अमानवीय संसार में...

मैं मुक्तिबोध या गोरख पांडेय नहीं हूं
मैं तो श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ का वह बच्चा भी नहीं हूं
जो एक अय्यास सामंत की जागीर पर
एक पत्थर फेंककर भागता है
मैं ‘हल्ला बोल’ का ‘ह’ तक नहीं हूं
मैं वह किरदार तक नहीं हूं
जो नुक्कड़ साफ करता है ताकि नाटक हो
मैं उस कोरस का सबसे मद्धिम स्वर तक नहीं हूं
जो ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर...’ गाता है

मैं कुछ नहीं बस एक संतुलन भर हूं
विक्षिप्तताओं और आत्महत्याओं के बीच

मैं जो सांस ले रहा हूं वह एक औसत यथार्थ की आदी है
इस सांस का क्या करूं मैं
यह जहां होती है वहां वारदातें टल जाती हैं

मैं अपने गंतव्यों तक संगीत सुनते हुए जाता हूं
टकराहटें दरकिनार करते हुए...
मुझे कोई मतलब नहीं-
धरना...विरोध...प्रदर्शन...अनशन...बंद... वगैरह से

मैंने बहुत नजदीक से नहीं देखा कभी बर्बरता को
मैंने इसे जाना है तरंगों के माध्यम से


शहर भर में फैली बीमारियां फटक नहीं पातीं मेरे आस-पास
मेरे नौकर मेरे साथ वफादार हैं
और अब तक बचा हुआ है मेरा गला धारदार औजारों से

मैं कभी शामिल नहीं रहा सरकारी मुआवजा लेने वालों में
शराब पीकर भी मैं कभी गंदगी में नहीं गिरा
और शायद मेरी लाश का पोस्टमार्टम नहीं होगा
और न ही वह महरूम रहेगी कुछ अंतिम औपचारिकताओं से...

खराब खबरें बिगाड़ नहीं पातीं मेरे लजीज खाने का जायका
      
मैंने खिड़कियों से सटकर नरसंहार देखे हैं और पूर्ववत बना रहा हूं

...इस तरह जीवन कायरताओं से एक लंबा प्रलाप था
और मैं बच गया यथार्थ समय के ‘अंतिम अरण्य’ में
मुझे लगता है मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा
कि मैं स्वयं को एक प्रत्यक्षदर्शी की तरह अभिव्यक्त कर सकूं

लेकिन जो देखता हूं मैं आजकल नींद में--
सब कुछ एक भीड़ को दे देता हूं
अंत में केवल अवसाद बचता है मेरे शरीर पर
इस अवसाद के साथ मैं खुद को खत्म करने जा ही रहा होता हूं
कि बस तब ही... चाय आ जाती है
और साथ में आज का अखबार...

प्रतिभाएं अपनी ही आग में

कोई इलाहाबाद का था
यह उसके लिए बहुत था
कोई ‘सिंह’ था
यह उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी
वह इसे नाम के आगे लगाए या न लगाए

सब इस तरह अपने-अपने
जनपदीय और जातीय वैभव में
बहुत और योग्य थे
        
जबकि बहुत सारे योग्य लोग
सिर्फ इस वजह मार दिए जाते थे
क्योंकि वे इनकार करते थे...
  

चंद्रमोहन के बीवी बच्चे 

चंद्रमोहन की शादी हो गई और दो बच्चे भी और इस होने में चंद्रमोहन मर भी गया सामाजिकताएं प्राय: नैरंतर्य में कुछ भिन्न होने पर उसके सूत्र तलाशने के लिए बाध्य हैं। चंद्रमोहन के सामाजिक नैरंतर्य में उसका मर जाना कुछ भिन्न है। चंद्रमोहन अकेले सोने से ऊब गया था नतीजतन उसने शादी कर ली नतीजतन बच्चे हुए नतीजतन चंद्रमोहन का जीवन सर्वथा सामान्य होता चला गया। चंद्रमोहन संभवतः रचनात्मक था और वह एक ऐसे समय में था जब रचना से सामान्यता विलुप्त होती जा रही थी। समय के साथ होने के लिए चंद्रमोहन ने आत्मघात किया क्योंकि जीवन जो सामान्य हो गया था उसकी ही रचना था।

चंद्रमोहन अब नहीं है यह एक सर्वमान्य तथ्य है और अब चंद्रमोहन के बीवी और बच्चों को मैं पाल रहा हूं यह एक सर्वमान्य रस। जीवन की संकुचित अवधारणाओं के विराट पैनेपन में यह भाषा वर्जित और अव्यावहारिक हो सकती है लेकिन जब बच्चे मर रहे हों तब मां से अवैध संबंध बना लेने में कोई बुराई नहीं है।

ऐसी हास्यास्पद स्थितियों के जाहिर वैभव में चंद्रमोहन की बीवी मेरी रखैल है और उसके बच्चे मेरे गुलाम। रखैलों और गुलामों के ईश्वर बहुत अजीब होते हैं। मैं जानता हूं वे मेरे विरुद्ध अदृश्यताओं के सम्मुख प्रार्थनारत हैं। लेकिन फिलहाल मैं ईश्वर की तरह ही ताकतवर हूं और इसलिए वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन एक दिन मैं ताकतवर नहीं रहूंगा। तब चंद्रमोहन के बच्चे ताकतवर होंगे और ईश्वर के न्याय और मध्यथता दोनों को ही नकारकर मुझे सजा देंगे। यह अलग बात है कि मांएं प्राय: बच्चों को हिंसा की इजाजत नहीं देतीं...


शादी के कार्ड

इस संसार में कई व्यक्तियों के जीवन में
केवल शादी के कार्ड ही अच्छे होते हैं
लेकिन वे भी वक्त की चोट से धीरे-धीरे
एक जर्जर और मटमैली सी चीज होते जाते हैं 

वे कहीं से भी आए हों
घर की एक उपेक्षित अलमारी में रख दिए जाते हैं
पूर्वजों के चित्रों, एलुमिनियम के बर्तनों, तुलसी के बीजों,
दीपकों, पंचांगों, पुस्तकों, पतंगों और लट्टुओं के साथ
उन्हें नष्ट करना अपशगुन समझा जाता है
जबकि इस कृत्य से बहुत बड़े-बड़े उजड़ने और उजाड़ने के खेल
शगुन बनकर चलन में उपस्थित रहते हैं
समय व समाज के अंतवंचित शुभाशुभ कार्यक्रमों में

समय समर में असंख्य शीर्षक एक संग परिणय में गुंथे हुए
श्री गणेशाय नम: और वक्रतुंड महाकाय... की अनिवार्यता में
बुजुर्ग दर्शनाभिलाषी और स्वागतोत्सुक बच्चे
प्रीतिभोज के स्वाद से जुड़ी हुईं वे मधुर और कड़वी स्मृतियां
और वह संगीत ‘तू हो तो बढ़ जाती है कीमत मौसम की...’
और इसका विस्तार ‘अरमां किसको जन्नत की रंगीं गलियों का...’

लेकिन यह रोमांटिसिज्म सब संसर्गों में संभव नहीं होता
जो अभी और भद्दी होंगी वे भद्दी लडकियां भी बड़ी आकर्षक लगती हैं
काली करतूतों वाले व्यसनी पुरुष चेहरे भी
मर्यादा पुरुषोत्तम से जान पड़ते हैं प्रथम भेंटों में...

लेकिन मेरे इस अद्भुत राष्ट्र में परंपरा है कि बस ठीक है
यहां असंख्य प्रसंगों और प्रचलनों में तर्क की गुंजाइश नहीं

विवाह को मार्क्स और एंगेल्स ने ‘संस्थाबद्ध वेश्यावृत्ति’ कहा है
लेकिन जैसाकि ज्ञात है भारतीय परिवेश में ही नहीं
अपितु अखिल विश्व में अब तक
इन दोनों महानुभावों का कहा हुआ काफी कुछ गलत सिद्ध हुआ है
वैसे ही यह घृणित कथन भी...

‘प्रेम काव्य है और विवाह साधारण गद्य’
ऐसा कहीं ओशो ने कहा है
लेकिन यह कथन स्वयं वैसे ही साधारण हो गया
जैसे एक भाषा की कुछ सामयिक लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित काव्य...

फिलहाल तलाक तलाक तलाक और दहेज प्रताड़नाएं व हत्याएं
और कन्या भ्रूण हत्याएं और कई स्थानीयताओं और जातियों में
पुरुषों की तुलना में घटता महिला अनुपात 
 और घरेलू अत्याचार और स्वयंवरों का बाजार
और लिवइनरिलेशनशिप और समलैंगिकता और स्त्री-विमर्श और महंगाई 
और और भी कई सारी बुराइयों के बावजूद
‘शादी के कार्ड’ हैं कि आते ही जाते हैं बराबर और बदस्तूर
मेरे घर नई-नई जगहों पर मुझे न्योतते हुए...
 --------------

'समावर्तन' के फरवरी अंक के रेखांकित स्तंभ में प्रकाशित

Tuesday, October 1, 2013

लाल सिंह दिल की कविताएं



कुत्ते पुकारते हैं
`मेरा घर, मेरा घर`
जगीरदार
`मेरा गाँव, मेरी सल्तनत`
लीडर
`मेरा देश, मेरा देश`
लोग सिर्फ कहते हैं
`मेरी क़िस्मत, मेरी क़िस्मत`
मैं क्या कहूँ?
 (दिल की कविता का एक अंश)

लाल सिंह दिल की कविताओं को पढ़ने के लिए जीवट चाहिए। तल्ख़ हकीकतों में सने इक़लाब के ख़्वाब, इन ख़्वाबों की तामील के लिए संघर्ष, कड़े संघर्षों और लगभग न जी सकने के हालात में भी ज़िंदगी की दुर्लभ छवियां, एक ऐताहिसक पराजय की विडंबनाओं का गहरा बोध...। उम्मीदों और अवसादों का एक अटूट सिलसिला। एक क्लासिक कविता जिसकी भाषा और शिल्प में एक सुच्चा अनगढ़पन है और पुख़्तापन भी, वैचारिक संज़ीदगी है, अद्भुत सौंदर्यबोध है, मुहब्बतों, ख़्वाबों से भरी आग है और झूठी तसल्लियों के लिए कोई जगह नहीं है। फूल, पत्ती, कुहुक, गांव-गांव चिल्लाकर लोक-लोक करने के बजाय यहां गांव, किसानी, मजूरी, जात और इनसे जुड़ी ज़िल्लतों, कमबख्तियों के बीच संघर्षों का असली लोक है।
नक्सल आंदोलन के असर में उभरे पंजाबी कवियों पाश, अमरजीत चंदन, सुरजीत पातर आदि के समकालीन दिल की ज़िंदगी की दास्तान कम कमबख़्तियों से भरी नहीं है। लेकिन, उसका जिक्र बाद के लिए, हालांकि वह हमारे समाज के टुच्चेपन की भी दास्तान है। वे दलित थे और इस सच ने इंकलाबी होने, बड़ा कवि होने और इस्लाम कबूल करने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा, इस दास्तान का एक मार्मिक पहलू है। एक लंबी इंतजार और कवि के जाने के बाद ही सही, आधार प्रकाशन ने उनकी कविताओं के हिंदी अनुवाद के प्रकाशन का ऐतिहासिक काम कर दिखाया है। अनुवाद का `आग का दरिया दिल से` गुजारने जैसा काम संवेदनशील हिंदी कवि सत्यपाल सहगल ने किया है। और उनकी कविताओं के मिजाज सा ही कवर डिजाइन कवि भूपेंद्र सिंह बराड़ का है। 
संग्रह से कुछ कविताएं-


मातृभूमि

प्यार का भी कोई कारण होता है?
महक की कोई जड़ होती है?
सच का हो न हो मकसद कोई
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता!

तुम्हारे नीले पहाड़ों के लिए नहीं
न नीले पानियों के लिए
यदि ये बूढ़ी माँ के बालों की तरह
सफेद-रंग भी होते
तब भी मैं तुझे प्यार करता
न होते तब भी
मैं तुझे प्यार करता
ये दौलतों के खजाने मेरे लिए तो नहीं
चाहे नहीं
प्यार का कोई कारण नहीं होता
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता

खजानों के साँप
तेरे गीत गाते हैं
सोने की चिड़िया कहते हैं।


लहर

वह
साँवली औरत
जब कभी बहुत खुशी से भरी
कहती है
``मैं बहुत हरामी हूं!``

वह बहुत कुछ झोंक देती है
मेरी तरह
तारकोल के नीचे जलती आग में
मूर्तियाँ
किताबें
अपनी जुत्ती का पाँव
बन रही छत
और
ईंटें ईंटें ईंटें।



हृढ़

वे तो हमें वहाँ फेंकते हैं
जहाँ शहीद गिरा करते हैं
, गिरते आये हैं
नहरों दरियाओं में जो, वही हमारे हैं
, कानून की चिताओं में
जो वही, अंग्रेंज वाले हैं
वहाँ लाखों करोड़ों देशभक्तों की राख है
उन्होंने सरमायेदार तो
एक भी नहीं जलाया
उन्होंने तो जट्टों सैणियों के लड़के
, झीवर पानी ढोते ही जलाये हैं
, भट्टों में कोयला झोंकने वाले लोग
काले काले प्यारे नैन-नक्श वाले पुरबीए।

वे तो हमें फेंकते हैं
हरी लचकीली काही* में
या पहाड़ी कीकरों की महक में, हम उनको
नालियों में
गोबरों में
कुत्तों के बीच से
लोगों की जूतियों के नीचे से घसीटेंगे

 * काही- नदियों, नहरों के किनारे उगने वाले सरकंडे



प्रतिकांति के पैर

सपना ही रह गया
कि फंदा पहनायेंगे
बुरे शरीफज़ादों को
वे लकीरें निकालेंगे नाक के साथ
हिसाब देंगे लोगों के आगे।

प्रतिक्रांति के पैर
हमारी छातियों पर आ टिके
ज़लील होना ही हमारा
जैसे एकमात्र
पड़ाव रह गया।


गैर विद्रोही कविता की तलाश


मुझे गैर विद्रोही
कविता की तलाश है
ताकि मुझे कोई दोस्त
मिल सके।
मैं अपनी सोच के नाखून
काटना चाहता हूँ
ताकि मुझे कोई
दोस्त मिल सके।
मैं और वह
सदा के लिए घुलमिल जायें।
पर कोई विषय
गैर विद्रोही नहीं मिलता
ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।


हमारे लिए

हमारे लिए
पेड़ों पर फल नहीं लगते
हमारे लिए
फूल नहीं खिलते
हमारे लिए
बहारें नहीं आतीं
हमारे लिए
इंकलाब नहीं आते


जात

मुझे प्यार करने वाली
पराई जात कुड़िये
हमारे सगे मुरदे भी
एक जगह नहीं जलाते
 -------

लाल सिंह दिल (1943-2007) 

आधार प्रकाशन
एस.सी.एफ. 267, सेक्टर-16
पंचकूला-134113 हरियाणा।