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Tuesday, February 9, 2010

ठेठ जीवन के उच्छलित स्त्रोतों के समीप \शिरीष कुमार मौर्य की कविता पर पंकज चतुर्वेदी

शिरीष कुमार मौर्य ने बहुत धीरज, गम्भीरता, संयम और निष्ठा से ऐसी कविता सम्भव की है, जिसमें जीवन-द्रव्य की सान्द्रता है और आत्मतत्व की उदात्तता। यह इस बदौलत कि एक ओर उसमें इस दुनिया से गहरा और निबिड़ प्यार है, दूसरी ओर साधारण इंसान के दुखों से प्रतिबद्ध तलस्पर्शी विचारशीलता। उनके पास निरन्तर जाग्रत, एकाग्र और मुक्तिधर्मी विवेक है, जो इतिहास, भूगोल, सभ्यता और संस्कृति में प्राथमिक किस्म की दिलचस्पी से सन्तुष्ट नहीं हो जाता, बल्कि उनके अन्तरंग विश्लेषण के ज़रिए व्यापक मनुष्यता के हित में मूल्यवान और मार्मिक निष्कर्षों तक पहुँचना चाहता है। इस प्रक्रिया में वे अन्योक्ति का इस्तेमाल करते हुए बड़े सांकेतिक ढंग से मनुष्य के शान्त, निश्छल, गरिमामय, शालीन एवं विशाल हृदय होने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। जब वे कहते हैं कि पहाड़ `अपनी गरिमा में/निश्छल सोये-से/बहुत बड़े और शान्त/दिखते हैं´ या यह कि पैसिंजर गाड़ी `हर स्टेशन पर शीश नवाती/खुद रुककर/तेज़ भागती दुनिया को राह दिखाती है´ तो प्रकारान्तर से इन मूल्यों में अपनी अविचलित आस्था का इज़हार करते हैं। उनकी कविता की विशिष्ट संरचना और सार्थकता का सम्बन्ध इसी आस्था से है।

शिरीष की रचनाओं में ताज़ा, स्वस्थ, निर्मल और अकुंठित सौन्दर्य है, जो चीज़ों के निकटस्थ निरीक्षण और आत्मीय अनुचिन्तन से जन्मा है। उनमें बिम्बों के अन्तराल की काफ़ी अच्छी समझ है, मात्रा और अनुपात की अचूक और सन्तुलित दृष्टि है और एक उमड़ता हुआ भावुक आवेग, पर वह उसी समय वैज्ञानिक चेतना से अनुशासित है। जब वे पहाड़ों के निर्माण की कहानी कहते हैं, तो जानते हैं कि उन्हें ठण्डा होने में कितना पानी और वक़्त लगा होगा -`फिर गिरा पानी/एक लगातार अनथक बरसात/एक प्रागैतिहासिक धीरज के साथ/ये ठण्डे हुए´। इसके अलावा यह लिखकर कि `जब धरती अलग होने का फैसला करती है/तो खाईयां बनती हैं/और जब मिलने का/तब बनते हैं पहाड़´, शिरीष ने अलगाव की विडम्बना और मिलने के महत्व को उजागर किया है। `अनूठा और विशाल´ होने के लिए औरों से मिलना, प्रेम करना बहुत ज़रूरी है। इस प्यार में इतनी ताक़त है कि `धरती के फैसले´ को समुद्र `पृथ्वी पर दो-तिहाई होकर भी नहीं रोक पाया।´ प्रसंगवश, ब्रेख़्त की कविता के सन्दर्भ में वाल्टर बेंजामिन की टिप्पणी याद आती है कि `जो भी चाहता है कि बलवान और क्रूर की हार हो, उसे दोस्ती का कोई मौक़ा छोड़ना नहीं चाहिए।´

शिरीष के यहां ताज़गी, पवित्रता और सुन्दरता बेशक हमारा ध्यान खींचती है, पर इसका यह मतलब नहीं कि मौजूदा व्यवस्था के अभावों, विसंगतियों और रुग्णताओं की वे समुचित आलोचना नहीं करते। वे तीखे व्यंग्य के सहारे भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण के निभृत, परोक्ष और कुटिल तौर-तरीकों को सामने लाते, उन पर चोट करते हैं। मसलन पगडण्डियों के लिए `सरकार को कोई बजट नहीं लाना पड़ता/वे ठेकेदारों और अभियन्ताओं के/समयसिद्ध हुनर का इस्तेमाल भी नहीं करतीं।´ इसी तरह शिरीष रेल्वे के सिपाही को `अतुलित बलशाली आत्ममुग्ध´ कहते हैं, जो आम लोगों, बच्चों, स्त्रियों और मज़दूरों को ही डपटता है। ख़ास बात यह कि कवि इन आततायियों के बरअक्स आम जनता की कमज़ोरियों, विवशताओं और वेध्यताओं, उसकी तकलीफ और पिछड़ेपन के समूचे यथार्थ से बाबस्ता है, इसलिए उसकी कविता में ऐसे क्षण मार्मिक कन्ट्रास्ट पैदा होता है। जैसे टी.टी.ई. जब किसी ग़रीब मुसाफिर को पकड़ता है, तो वह बेचारा `अपने गुदड़ों में टिकट ढूंढता रह जाता है।´ सृजन की बेचैनी और प्रतिरोध की ऊर्जा के क्षरण के अर्थ में जब आदमी को चुपके से मार दिया जाता है, तो वह अपनी महज़ भौतिक उपलिब्ध्यों पर गर्व करने लगता है। इस थीम पर केन्द्रित कविता में अर्थ के दो स्तर हैं। `फूलने´ में श्लेष है। आदमीयत की मृत्यु इस हैरतअंगेज़ दौर की सबसे यक़ीनी सच्चाई है -`तुम्हारे इस अविश्वसनीय देशकाल का/सर्वाधिक विश्वसनीय सच हूँ मैं´। मौत की इसी हक़ीक़त पर सुविधाभोगी तबक़े की खुशी और इत्मीनान टिके हुए हैं।

वीरेन डंगवाल ने लिखा है दुनिया एक गांव तो बने/लेकिन सारे गांव बाहर रहें उस दुनिया के।´ शिरीष को भी इस साजिश का अन्दाज़ा है कि दुनिया करीब आती जा रही है, मगर `बहुत पास बैठे लोग भी अकसर बिना मिले रहे जाते हैं।´ निराला ने ऐसे ही हालात में कहा होगा-`भर गया है ज़हर से/संसार जैसे हार खाकर/देखते हैं लोग लोगों को/सही परिचय न पाकर।´ अलबत्ता आज यह विडम्बना दोहरी है, क्योंकि सूचना और संचार-क्रान्ति के बल पर जब सारी दूरियां मिटाने का दावा किया जा रहा है, आदमी आदमी के लिए पराया हो गया है। शिरीष की एक विशेषता यह है कि वे ठेठ जीवन के उच्छलित स्त्रोतों के समीप जाते हैं, जहां `खुरों के निशान´ और `घंटियों की लुप्त हो रही आवाज़ें´ हैं, चाहे इसके लिए उन्हें `अफ्रीका के सबाना´ और `मैक्सिको के वर्षावनों' में भटकना पड़े। दूसरे, वे देशज और तत्सम, अनगढ़ और परिस्कृत -भाषा के इन छोरों के बीच जीवन्त आवाजाही करते हैं। तीसरे, प्राय: उपेक्षित रह जानेवाली छोटी-छोटी चीज़ों, जगहों, लोगों, जानवरों, पक्षियों और प्रकृति के विभिन्न उपादानों के प्रति उनमें दुर्लभ किस्म का लगाव है। इसी सहानुभूति के स्पर्श से वस्तुएं सप्राण हो उठती हैं, चाहे वह नामालूम-सा स्टेशन हो, झिंझोड़ी जाती पटरियां या `पांच पुराने खंखड़ डिब्बों वाली पैसिंजर गाड़ी।´ इसके यात्रियों के लिए उनके मन में अथक सम्मान है, क्योंकि वह मामूली इच्छाओं वाली निष्कपट जनता है। उसके दु:ख, उत्पीड़न और वंचना की दास्तान सुनाते हुए उन्हें लगता है कि दरअसल उसे ही `जीवन की असली यात्राएं´ करनी हैं, भले वह बहुत दूर न जा पाए। यहां भी एक मार्मिक अन्तर्विरोध से कवि का सामना है। जिसका संघर्ष जितना गहरा, सच्चा और अहम है, उसका प्राप्य उतना ही कम। यह कुछ वैसी स्थिति है, जिसका आख्यान अपनी एक विलक्षण कविता में असद ज़ैदी ने किया है- `जो ग़रीब है उसे अपने गांव से आगे कुछ पता नहीं/कम ग़रीब है जो उसने देखा है पूरा ज़िला/सिर्फ अनाचारी ज़ालिमों ने देखे हैं राष्ट्र और राज्य।´
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(वागर्थ, उर्वर प्रदेश और "रचना आज- सम्पादक: लीलाधर मंडलोई" में प्रकाशित लेख)

ये सूचना भी : शिरीष को २००९ का लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान छिंदवाडा(मध्य प्रदेश) में आयोजित एक आत्मीय समारोह में दिया गया, जिसमें लीलाधर मंडलोई, कमला प्रसाद, विजय कुमार, विष्णु नागर, राजकुमार केसवानी, प्रतापराव कदम, राजेन्द्र शर्मा, बसंत त्रिपाठी, हनुमंत मनगाटे, मुकेश वर्मा सहित कई रचनाकार शामिल हुए. इस अवसर पर चित्रकार ध्रुव वानखेड़े द्वारा शिरीष की कविताओं पर एक पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गई.

unka adress : शिरीष कुमार मौर्य
एसोसिएट प्रोफ़ेसर
हिंदी विभाग
डी.एस.बी. परिसर
नैनीताल
263002