Wednesday, March 10, 2010

हुसेन प्रकरण : क्या विष्णु खरे ने बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का `भार` उतार फेंका? - धीरेश सैनी



विष्णु खरे को उनके `मित्र` ज़िद की हद तक सेक्युलर कवि-चिन्तक बताते रहे हैं। `लालटेन जलाना` समेत उनकी दो किताबें (कविता की) मैंने पढ़ी हैं और वाकई मुझ पर उनकी कई कविताओं का गहरा असर हुआ है। मसलन दिल्ली में मुसलमानों की हत्या के प्रसंग को लेकर उनकी एक कविता का। लेकिन इतवार (7 march, 2010 page 6)को जनसत्ता में चित्रकार हुसेन पर उनका लेख `अपने और पराये` पढ़ने के बाद मैं लगातार सोच रहा हूँ कि यह कविता क्या उसी विष्णु खरे ने लिखी है जिस विष्णु खरे ने यह लेख लिखा है या ये दोनों खरे कोई दो हमनाम लोग हैं या फिर इनमें से बाद वाला हमेशा से पहले वाले के भीतर ही रहता रहा है।

खरे अपने इस विशाल आकार वाले लेख की शुरुआत क़तर को (उस क़तर को जिसने हुसेन को नागरिकता दी है) उसकी औकात बताने से करते हैं कि उसकी औकात खरे के मौजूदा शहर दिल्ली के मयूर विहार इलाके से भी और कच्छ जिले से भी मामूली है। वो धनवान है पर उसकी हालत ऐसे इस्लामी धनपशु की है जो कला, प्रजातंत्र आदि मूल्यों से विहीन है और हुसेन के मुस्लिम होने के नाते किसी भी मुस्लिम देश का उन पर फ़िदा होना स्वाभाविक है। तो इस तरह विष्णु खरे प्रस्तावना से ही पाठक का दिमाग एक गहरी मुस्लिम घृणा से भर देना चाहते लगते हैं। इसके बाद वे बताते हैं -
`निसंदेह भारत में हुसेन पर संकट था और है- था इसलिए कि हिन्दू देवी-देवताओं और `भारतमाता` पर बनाए गए उनके चित्रों को लेकर जो धार्मिक दुर्भावनाएं भड़काई गईं और जो सैकड़ों मुक़दमे दायर किये गए उनमें बहुत कमी आई है- दुर्भावनाएं शायद कुछ ठंडी पड़ी हैं और मुकदमे कुल तीन बच रहे हैं। उच्चतर न्यायालयों ने हुसेन की कलाकृतियों पर लगातार एक उदार, सहिष्णु और प्रबुद्ध रुख अपनाया है। देश के सैकड़ों लेखकों, बुद्धिजीवियों, मीडियाकर्मियों, कलाकारों, सक्रियतावादियों और वामपंथी पार्टियों ने हुसेन का बचाव और समर्थन किया है। हुसेन के वकील अदालतों में मौजूद हैं, लेकिन संकट अब भी इसलिए है कि अपनी विवादित कृतियों में हुसेन हमेशा भारत में हैं और उन पर आपत्ति करने वाले, कभी भी, कोई भी आन्दोलन खड़ा कर सकने वाले साम्प्रदायिक तत्व तो इस देश में रहेंगे ही।`
तो यह चतुर शैली इस पूरे लेख की खासियत है जिसमें हुसेन के लिए भी और उनके किए पर भी पर एक साथ अफ़सोस किया जाता है। मतलब खरे यह नाप लेते हैं कि हुसेन के प्रति दुर्भावनाओं में कमी आ गयी है, शायद वे संघ प्रमुख के उस बयान से मुतमईन हों जिसमें उसने कहा है कि हुसेन के भारत लौटने पर उसे एतराज नहीं है। नरसिम्हा राव भी बाबरी मस्जिद पर इस जमात के बयान से पूरी तरह मुतमईन थे (मुझे नहीं पता कि खरे ने सोनिया, अर्जुन सिंह आदि की तरह राव को भी अपनी किसी कविता से निहाल किया हो) । खरे बताते हैं कि मुक़दमे कुल तीन रह गए हैं और पूरा बुद्धिजीवी समाज हुसेन के `बचाव` में मुस्तैद है। हालाँकि जिस हिंदी में खरे लिखते हैं, उसके ही बुद्धिजीवियों और अखबारों ने हुसेन के खिलाफ निरंतर अभियान चलाये हैं और इस घृणित मुहिम में वे `समाजवादी` भी शामिल रहे हैं जिनके नेता राम मनोहर लोहिया के कहने पर हुसेन ने राम और भारतीय मिथकों पर पेंटिंग्स की सीरीज शुरू की थी। क्या इस समय भी `बुद्धिजीवियों` के हुसेन विरोधी लेख और सम्पादकीय जारी नहीं हैं। दरअसल यह पैरा इस लेख में बाद में आये इस निष्कर्ष को प्रतिपादित करने के लिए है कि हुसेन भगौड़े हैं। बकौल खरे,` खुद हुसेन बौद्धिक रूप से कुछ दुर्बल, दुविधाग्रस्त और दोमुंहे लगते हैं`। ऐसा कुतर्क करने वाले कई लोग हैं जो इस आधार पर हुसेन का पक्ष लेना उचित नहीं मानते कि वे खुद `संघर्ष` नहीं कर रहे हैं। तो क्या अगर कोई शख्स `क्रांतिकारी` नहीं है तो उस पर साम्प्रदायिक हमला वाजिब हो जाता है। हुसेन जैसे विश्वप्रसिद्ध कलाकार तो क्या किसी भी सामान्य व्यक्ति पर किसी भी फासीवादी हमले का विरोध सेक्युलरिज्म या मनुष्यता की शर्त की तरह ही है। एक बार हबीब तनवीर ने कुछ ऐसा कहा था कि बेशक मैं सांप्रदायिक ताकतों से कला और सड़क दोनों जगह लड़ता रहा हूँ। हुसेन सड़क पर नहीं लड़ते तो उन पर हमले वाजिब नहीं हो जाते।

खरे हुसेन के कुछ `विवादित` चित्रों का जिक्र करते हुए कहते है - `दुर्भाग्यवश, न तो खुद हुसेन ने कोई स्पष्टीकरण दिया है और न ही उनके प्रशंसकों-निंदकों ने उनसे पूछा है.` मानो हुसेन के स्पष्टीकरण के बाद या उनकी `माफी` के बाद मामला सुखद हो जाता. मानो बाबरी मस्जिद पर दावा (जो कितना बचा है?) छोड़ने के बाद साम्प्रदायिक ताकतें मुस्लिम प्रेम में डूब जातीं. मानो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद खरे हुसेन की मंशा को लेकर संतुष्ट हो गए हों. हालांकि खुद खरे भी इसका जवाब जानते हैं और इसी लेख में एक जगह वे कहते हैं, `हम जानते हैं कि हुसेन के क्षमा मानने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि एक ओर वे अपनी विवादित कृतियों को सिर्फ़ `रिग्रेट` करते हैं और दूसरी ओर हिन्दू साम्रदायिक तत्व एन-केन-प्रकारेण इस मसले को पुनर्जीवित करते रहेंगे.`

लेकिन बात इतनी सी नहीं है, पूरा लेख बार-बार हुसेन को कठघरे में खड़ा करता है और हुसेन को सीमा तय करने की नसीहत देता है. खरे कहते हैं, `कोई मुस्लिम भी हिन्दू देवी-देवताओं के अर्द्धनग्न चित्र देखना-दिखाना नहीं चाहेगा. पश्चिमी समाजों में भी नग्नता की एक आपत्तिजनक सीमा होती है. `कामसूत्र` और खजुराहो आदि की दुहाई देना व्यर्थ और हास्यास्पद है. ......अर्द्धनग्नता भले ही हमारे अखबारों और टैबलोइड्स में बिछी पड़ी हो, भले पश्चिमी मोडेल्स की उद्दीपक तस्वीरों में, हमारे किसी भी धर्म को मानने वाले समाज में उसकी स्वीकृति कहाँ है? यह प्रश्न अलग है कि हमें वैसा करना चाहिए या नहीं, लेकिन क्या हमने `कलात्मक` नग्नता को आम भारतीय को कभी समझाया? कलाओं या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाइयां देकर हम देश को उसकी सदियों की नैतिक, सामाजिक, धार्मिक वर्जनाओं से रातोंरात मुक्त नहीं कर सकते.` लेखक की मुसलमानों और हुसेन से घृणा बार-बार छलछलाती है. वे हिन्दू कट्टरवाद को बाकायदा `नैतिक` आधार देने को उतावले हैं -` विडंबना यह है कि `खुलेपन` की वह हिन्दू `संस्कृति` भारत में इस्लाम के आने के कारण ही लुप्त हुई- जब हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व या `आम जनता` हुसेन पर हमला करते हैं तो वे एक तरह से इस्लाम की ताईद ही कर रहे होते हैं`.

खरे यह भी याद दिलाते हैं कि `हुसेन सिर्फ़ शिया नहीं हैं, उनमें भी बोहरा उप-सम्प्रदाय से हैं, जिसकी आलोचना बोहरा बुद्धिजीवी असगर अली इंजीनियर करते रहे है और उन पर जानलेवा हमले हो चुके हैं. हुसेन अपने बोहरा सम्प्रदाय के वर्तमान दाइल मुतलक सैयदना मुहम्मद बुरहानुद्दीन की शबीह भी शायद नहीं बनाना चाहते. लेकिन अपनी एक फिल्म में अभिनेत्री तब्बू द्वारा अभिनीत किरदार को `नुरुन्न्लानूर` कहलवा कर, जो कुरान में अल्लाह का एक संबोधन है, वे अपनी उँगलियाँ जला चुके हैं और उन्हें मुस्लिम समाज से माफी मांगनी पड़ी है.` इस तरह खरे वे तमाम बातें करते हैं जो संघ और दूसरे हुसेन विरोधी करते ही रहे हैं. सीता और हनुमान के चित्र की वे बाकायदा विस्तार से बेहद-बेहद भड़काने वाली व्याख्या करते हैं और पूछते हैं - `क्या इसके लिए इन्साफ माँगना `अकलात्मक`, `हिन्दुत्ववादी`, `सावरकारी` फासीवाद है?` तुर्रा यह कि एक जगह वे यह भी जोड़ते हैं, `हुसेन का अधिकांशत: पक्ष लिया ही जाना चाहिए...`. उनका एक और मजेदार (?) वाक्य है, `बदकिस्मती यह भी है कि हमारे समाज में आधुनिक प्रबुद्धों और जनसाधारण के बीच एक लगभग अपार बौद्धिक खाई है...`. पूरा लेख पढ़कर यह बदकिस्मती शब्द ऐसा ही लगता है जैसा बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आडवाणी के मुंह से कोई ऐसा ही पर्यायवाची निकला था.

वही बात फिर से कि इस लेख में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जो हुसेन के प्रति नफरत फैलाने वाले कह न चुके हों, नया सिर्फ़ यह है कि यह उस बुद्धिजीवी ने लिखा है जो सेक्युलर जाना जाता है और जलेस और जसम जैसे संगठनों के मंच से आग उगलता रहता है. उसके मित्र उसे एक मसीहा बुद्धिजीवी के रूप में `खरे जी- खरे जी` मन्त्र पढ़ते हुए यहाँ-वहाँ उल्लेखित करते रहते हैं. शुरू में किया गया वही सवाल मुझे परेशान करता है कि यह खरे अचानक प्रकट हुआ है या खरे जी के भीतर हमेशा से था और वे बड़ी व्यथा के साथ सेक्युलर बने रहते आए हैं. अगर ऐसा है तो बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का भार ढोते रहने की ज्यादती भरी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए जैसे कि ९५ बरस के बूढ़े चित्रकार से अदालत दर अदालत धक्के खाने और कट्टरवादी ताकतों से गुत्थमगुत्था होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए.

कुछ मित्रों का यह भी ख्याल है कि खरे के वामपंथी मित्रों के पास अब उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है और वक़्त की नजाकत को भांपकर उनकी `खोज` युवतर लेखक भी बाएं चलने का हुनर बताते-बताते दायें चलने लगे हैं तो खरे के लिए भी अपनी उपलब्द्धता विज्ञापित करना जरूरी था. अशोक वाटिका अपने गमले में सजने को उत्सुक पुराने पेड़ों को बोनसाई बना लेने में अक्सर गुरेज नहीं करती. यहाँ तो इस लेख में पांचजन्य तक को लुभा लेने की क्षमता है. खरे जी को शुभकामनाएं.

Sunday, March 7, 2010

औरतों की कविताएँ : शुभा

1.औरतें
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औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं

औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं

औरतों की इच्छाएं
बहुत दिनों में फलती हैं
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2.
औरत के हाथ में न्याय
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औरत कम से कम पशु की तरह
अपने बच्चे को प्यार करती है
उसकी रक्षा करती है

अगर आदमी छोड़ दे
बच्चा मां के पास रहता है
अगर मां छोड़ दे
बच्चा अकेला रहता है

औरत अपने बच्चे के लिए
बहुत कुछ चाहती है
और चतुर ग़ुलाम की तरह
मालिकों से उसे बचाती है
वह तिरिया चरित्तर रचती है

जब कोई उम्मीद नहीं रहती
औरत तिरिया चरित्तर छोड़कर
बच्चे की रक्षा करती है

वह चालाकी छोड़
न्याय की तलवार उठाती है

औरत के हाथ में न्याय
उसके बच्चे के लिए ज़रूरी
तमाम चीजों की गारंटी है।
***


3.
औरत के बिना जीवन
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औरत दुनिया से डरती है
और दुनियादार की तरह जीवन बिताती है
वह घर में और बाहर
मालिक की चाकरी करती है

वह रोती है
उलाहने देती है
कोसती है
पिटती है
और मर जाती है

बच्चे आवारा हो जाते हैं
बूढ़े असहाय
और मर्द अनाथ हो जाते हैं
वे अपने घर में चोर की तरह रहते हैं
और दुखपूर्वक अपनी थाली खुद मांजते हैं
***


4.
औरतें काम करती हैं
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चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की
दुनिया के बाहर
मालिकों की दुनिया के बाहर
पिताओं की दुनिया के बाहर
औरतें बहुत से काम करती हैं

वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती हैं
आटे को रोटी में
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े में बदल देती हैं।

वे खंडहरों को
घरों में बदल देती हैं
और घरों को कुंए में
वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं
और तमाम चीज़ें संवार देती हैं

वे बोलती हैं
और कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैं
कथाएं लोकगीत रचती हैं

बाहर की दुनिया के आदमी को देखते ही
औरतें ख़ामोश हो जाती हैं।
***

5.
निडर औरतें
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हम औरतें चिताओं को आग नहीं देतीं
क़ब्रों पर मिट्टी नहीं देतीं
हम औरतें मरे हुओं को भी
बहुत समय जीवित देखती हैं

सच तो ये है हम मौत को
लगभग झूठ मानती हैं
और बिछुड़ने का दुख हम
खूब समझते हैं
और बिछुड़े हुओं को हम
खूब याद रखती हैं
वे लगभग सशरीर हमारी
दुनियाओं में चलते-फिरते हैं

हम जन्म देती हैं और इसको
कोई इतना बड़ा काम नहीं मानतीं
कि हमारी पूजा की जाए

ज़ाहिर है जीवन को लेकर हम
काफी व्यस्त रहती हैं
और हमारा रोना-गाना
बस चलता ही रहता है

हम न तो मोक्ष की इच्छा कर पाती हैं
न बैरागी हो पाती हैं
हम नरक का द्वार कही जाती हैं

सारे ऋषि-मुनि, पंडित-ज्ञानी
साधु और संत नरक से डरते हैं

और हम नरक में जन्म देती हैं
इस तरह यह जीवन चलता है
***


6.
बाहर की दुनिया में औरतें
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औरत बाहर की दुनिया में प्रवेश करती है
वह खोलती है
कथाओं में छिपी अंतर्कथाएं
और न्याय को अपने पक्ष में कर लेती हैं
वह निर्णायक युद्द को
किनारे की ओर धकेलती है
और बीच के पड़ावों को
नष्ट कर देती है

दलितों के बीच
अंधकार से निकलती है औरत
रोशनी के चक्र में धुरी की तरह

वह दुश्मन को गिराती है
और सदियों की सहनशक्ति
प्रमाणित करती है
***

Saturday, March 6, 2010

Tuesday, March 2, 2010

क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

मेरे दस सिर हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मेरे बीस हाथ हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मैंने सीता का अपहरण किया है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
सोने की लंका मेरी राजधानी है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मुझे खाक में मिला दिया जाएगा
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

लेकिन मेरी तुलना रावण से करना भी ज़्यादती है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

मेरी क्या हैसियत
कि मैं अट्टहास कर सकूँ
मेरी क्या हस्ती
कि मैं सीता का अपहरण करने की सोच भी सकूँ
मैं हूँ क्या
जो सोने की लंका में रह सकूँ
मैंने ऐसा किया क्या जो तुलसी के राम के हाथों
मरने की कल्पना भी कर सकूँ

क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
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विष्णु नागर की यह कविता उनके नए संग्रह `घर के बाहर घर` से ली गई है. इस संग्रह की कुछ कवितायेँ यहाँ भी देखें.

Thursday, February 25, 2010

हम शर्मिंदा हैं हुसैन



अखबार अभी कुछ देर पहले शाम को उठाया और सन्न रह गया. `द हिन्दू` की बोटम स्टोरी `M.F. Husain gets Qatar nationality` आपने तो सुबह ही देख ली होगी. जो हाल मेरा है, इस देश के महान सेक्युलर मूल्यों में विशवास रखने वाले हर नागरिक का होगा. कुछ नहीं सूझा, कबाड़ख़ाने वाले अशोक भाई को फ़ोन लगाया कि वहाँ ब्लॉग पे इस बारे में कुछ जाए पर फोन नहीं उठ सका. हम शर्मिंदा है कि इतने महान कलाकार को इस उम्र में दरबदर कर रखा है. कांग्रेस सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध के नाम पर वोट चाहती है लेकिन उसकी सरकार में ऐसा जरा भी गंभीर प्रयास नहीं हुआ कि यह महान कलाकार इज़्ज़त के साथ देश लौट पाए. फिलहाल `द हिन्दू` की स्टोरी ही चिपका रहा हूँ. आप पाएंगे कि यहाँ एन.राम भी क्यूँ एन.राम हैं.

M.F. Husain gets Qatar nationality

N. RAM
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M.F. Husain, India’s greatest and most celebrated artist, has been conferred Qatar nationality - something that is very rarely given. The artist gave me this news from Dubai early Wednesday morning by reading out the few lines he had written on a black-and-white line drawing that he released to The Hindu.

“Honoured by Qatar nationality” but deeply saddened by his enforced exile and the need now to give up the citizenship of the land of his birth, which he has lovingly and secularly celebrated in his art covering a period of over seven decades. India does not allow dual citizenship, even though it has instituted the category of the ‘Overseas Indian Citizen.’ Mr. Husain will no doubt seek to acquire OIC status after completing the due procedures.

It is important to note that Mr. Husain did not apply for Qatar nationality and that it was conferred upon him at the instance of the modernising emirate’s ruling family.

Since 2006, when the Hindutva hate campaign against him escalated, Mr. Husain has been living in Dubai, spending his summers in London. He travels freely except to India, where he faces legal harassment and physical threats, with the system impotent and not committed to enabling his return. Though the Supreme Court has intervened on the right side, it was too little, too late. The Congress-led government, it is clear, has done no better than the preceding BJP-led governments in protecting Mr. Husain’s freedom of creativity and peace of mind.

Almost 95, the artist works a long day, producing large canvasses and life-size glass sculptures. Never has he been as commercially successful as he is today. His work now is mostly towards two large projects, the history of Indian civilisation and the history of Arab civilisation. The latter was commissioned by Qatar’s powerful first lady – Sheikha Mozah bint Nasser al Missned, wife of the emirate’s ruler, Sheikh Hamad bin Khalifa Al Thani. The works will be housed in a separate museum in Doha.

While being a rare honour, Mr. Husain’s impending change of nationality brings to a close one of the sorriest chapters in independent India’s secular history. Mr. Husain’s time of troubles began in 1996, after a Hindi monthly published an inflammatory article on his paintings of Hindu deities done in the 1970s. This led to a slew of criminal cases, filed in far-flung places, which alleged in the main that the artist had hurt the feelings of Hindus through his paintings. Mr. Husain estimates that there are 900 cases against him in various courts of India. He has been harassed by fanatical mobs. Exhibitions of his work have been vandalised. All this has created a fear of exhibiting his work in India.

I have personally accompanied Mr. Husain to court proceedings in Indore and have first-hand experience of the harassment and terror he faced from bigoted mobs. I received him in Mumbai on his return from the first of his temporary exiles and saw what insecurity and uncertainty this creative genius had to endure in rising India. It is ironical that a country whose religious art often portrays nudity and even overt sexuality, as in the case of the Khajuraho sculptures and the murals and frescoes of south Indian temples, has grown so intolerant as to drive into permanent exile its most famous artist.

I know no one more genuinely and deeply committed to the composite, multi-religious, and secular values of Indian civilisation than M. F. Husain. He breathes the spirit of modernity, progress, and tolerance. The whole narrative of what forced him into exile, including the shameful failure of the executive and the legal system to enable his safe return, revolves round the issues of freedom of expression and creativity and what secular nationhood is all about.

The conferment of Qatar nationality is an honour to Mr. Husain, to his artistic genius, and to the India-rooted civilisational values he represents. Nevertheless, it is a sad day for India.

Wednesday, February 24, 2010

विष्णु नागर के नये संग्रह से चार कविताएँ



दो यात्राएँ
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मैं एक यात्रा में
एक और यात्रा करता हूँ
एक जगह से एक और जगह पहुँच जाता हूँ
कुछ और लोगों से मिलकर कुछ और लोगों से मिलने चला जाता हूँ
कुछ और पहाड़ों, कुछ और नदियों को देख कुछ और ही पहाड़ों
कुछ और नदियों पर मुग्ध हो जाता हूँ

इस यात्रा में मेरा कुछ ख़र्च नहीं होता
जबकि वहाँ मेरा कोई मेज़बान भी नहीं होता
इस यात्रा में मेरा कोई सामान नहीं खोता
पसीना बिलकुल नहीं आता
न भूख लगती है, न प्यास
कितनी ही दूर चला जाऊं
थकने का नाम नहीं लेता

मैं दो यात्राओं से लौटता हूँ
और सिर्फ़ एक का टिकट फाड़कर फेंकता हूँ
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किरायेदार
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एक कबूतर के जोड़े को सुरक्षित घर की तलाश है
जहाँ कबूतरी अंडे दे सके, उन्हें से सके, बच्चे दे सके
उड़ना सीखने तक वहाँ सुकून से रह सके

एग्रीमेंट कोई नहीं
एडवांस बिल्कुल नहीं
किराया एक धेला नहीं
किराये पर यह घर दूसरे को न चढ़ाने की कोई गारंटी नहीं
आने-जाने में समय की कोई पाबंदी नहीं
लेकिन बिजली-पानी का कोई ख़र्च नहीं

इच्छुक व्यक्ति आज ही ई-मेल करें या फ़ोन करें
चिट्ठी न लिखें, अर्जेंसी है.
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पहाड़ जैसे आदमी
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पहाड़ अपने बारे में कुछ नहीं जानते
यह भी नहीं कि वे पहाड़ हैं
इसलिए अपनी उपलब्धियों की
प्रशंसा करना-करवाना भी नहीं जानते

कुछ आदमी भी ऐसे होते हैं
लोग उन्हें खोदते रहते हैं
उन पर चढ़ते-उतरते रहते हैं
माकन और मंदिर बनवाते रहते हैं
उनसे नीचे देखते हुए डरते रहते हैं
ऊपर खुला नीला आसमान देख ख़ुश होते रहते हैं

हो सकता है ऐसे आदमी
पहाड़ों के वंशज हों.
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फ़र्क़ पड़ता है
(युवा कवि निशांत के लिए)
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मौसम बदलता है तो फ़र्क़ पड़ता है
चिड़िया चहकती है तो फ़र्क़ पड़ता है
बेटी गोद में आती है तो फ़र्क़ पड़ता है
किसी का किसी से प्रेम हो जाता है तो फ़र्क़ पड़ता है
भूख बढ़ती है, आत्महत्याएँ होती हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
आदमी अकेले लड़ता है तो भी फ़र्क़ पड़ता है

आस्मां पर बादल छाते हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
ऑंखें देखती हैं, कान सुनते हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
यहाँ तक कि यह कहने से भी आप में और दूसरों में फ़र्क़ पड़ता है
कि क्या फ़र्क़ पड़ता है!

जहाँ भी आदमी है, हवा है, रोशनी है, आसमान है, अँधेरा है,
पहाड़ हैं, नदियाँ हैं, समुद्र हैं, खेत हैं, लोग हैं, आवाज़ें हैं
नारे हैं
फ़र्क़ पड़ता है

फ़र्क़ पड़ता है
इसलिए फ़र्क़ लानेवालों के साथ लोग खड़े होते हैं
और लोग कहने लगते हैं कि हाँ, इससे फ़र्क़ पड़ता है.
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घर के बाहर घर
अंतिका प्रकाशक, सी-५६/यूजीएफ-४, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-।।
गाज़ियाबाद (उप्र)