Wednesday, February 24, 2010

विष्णु नागर के नये संग्रह से चार कविताएँ



दो यात्राएँ
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मैं एक यात्रा में
एक और यात्रा करता हूँ
एक जगह से एक और जगह पहुँच जाता हूँ
कुछ और लोगों से मिलकर कुछ और लोगों से मिलने चला जाता हूँ
कुछ और पहाड़ों, कुछ और नदियों को देख कुछ और ही पहाड़ों
कुछ और नदियों पर मुग्ध हो जाता हूँ

इस यात्रा में मेरा कुछ ख़र्च नहीं होता
जबकि वहाँ मेरा कोई मेज़बान भी नहीं होता
इस यात्रा में मेरा कोई सामान नहीं खोता
पसीना बिलकुल नहीं आता
न भूख लगती है, न प्यास
कितनी ही दूर चला जाऊं
थकने का नाम नहीं लेता

मैं दो यात्राओं से लौटता हूँ
और सिर्फ़ एक का टिकट फाड़कर फेंकता हूँ
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किरायेदार
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एक कबूतर के जोड़े को सुरक्षित घर की तलाश है
जहाँ कबूतरी अंडे दे सके, उन्हें से सके, बच्चे दे सके
उड़ना सीखने तक वहाँ सुकून से रह सके

एग्रीमेंट कोई नहीं
एडवांस बिल्कुल नहीं
किराया एक धेला नहीं
किराये पर यह घर दूसरे को न चढ़ाने की कोई गारंटी नहीं
आने-जाने में समय की कोई पाबंदी नहीं
लेकिन बिजली-पानी का कोई ख़र्च नहीं

इच्छुक व्यक्ति आज ही ई-मेल करें या फ़ोन करें
चिट्ठी न लिखें, अर्जेंसी है.
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पहाड़ जैसे आदमी
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पहाड़ अपने बारे में कुछ नहीं जानते
यह भी नहीं कि वे पहाड़ हैं
इसलिए अपनी उपलब्धियों की
प्रशंसा करना-करवाना भी नहीं जानते

कुछ आदमी भी ऐसे होते हैं
लोग उन्हें खोदते रहते हैं
उन पर चढ़ते-उतरते रहते हैं
माकन और मंदिर बनवाते रहते हैं
उनसे नीचे देखते हुए डरते रहते हैं
ऊपर खुला नीला आसमान देख ख़ुश होते रहते हैं

हो सकता है ऐसे आदमी
पहाड़ों के वंशज हों.
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फ़र्क़ पड़ता है
(युवा कवि निशांत के लिए)
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मौसम बदलता है तो फ़र्क़ पड़ता है
चिड़िया चहकती है तो फ़र्क़ पड़ता है
बेटी गोद में आती है तो फ़र्क़ पड़ता है
किसी का किसी से प्रेम हो जाता है तो फ़र्क़ पड़ता है
भूख बढ़ती है, आत्महत्याएँ होती हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
आदमी अकेले लड़ता है तो भी फ़र्क़ पड़ता है

आस्मां पर बादल छाते हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
ऑंखें देखती हैं, कान सुनते हैं तो फ़र्क़ पड़ता है
यहाँ तक कि यह कहने से भी आप में और दूसरों में फ़र्क़ पड़ता है
कि क्या फ़र्क़ पड़ता है!

जहाँ भी आदमी है, हवा है, रोशनी है, आसमान है, अँधेरा है,
पहाड़ हैं, नदियाँ हैं, समुद्र हैं, खेत हैं, लोग हैं, आवाज़ें हैं
नारे हैं
फ़र्क़ पड़ता है

फ़र्क़ पड़ता है
इसलिए फ़र्क़ लानेवालों के साथ लोग खड़े होते हैं
और लोग कहने लगते हैं कि हाँ, इससे फ़र्क़ पड़ता है.
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घर के बाहर घर
अंतिका प्रकाशक, सी-५६/यूजीएफ-४, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-।।
गाज़ियाबाद (उप्र)

7 comments:

Shrikant Dubey said...

Simply Fabulous Sir!!!
Thanks for this presentation.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अरे यह किताब हमसे कैसे रह गयी?

अभी गौरीनाथ भाई को फुनियाते हैं।

अनिल कान्त : said...

sabki sab padh kar aanand aa gaya.

सुभाष नीरव said...

विष्णुजी की रचनाओं का मैं प्रशंसक रहा हूँ। अब इतनी सुन्दर कविताएं पढ़कर मन हो आया है कि किताब खरीद कर पूरा संग्रह पढ़ डालूं। मैं भी विष्णु जी की कुछ चुनिंदा कविताएं अपने ब्लॉग पर देना का इच्छुक हूँ। जल्द ही कोशिश करूंगा।

रंगनाथ सिंह said...

कविताओं का चयन बढ़िया है। कविताएं भी बढ़िया हैं।

वर्षा said...

अरे कबूतरों को भेज दो, हमें अपनी खिड़कियों पर उनकी तेज़ गूटरगूं सुनने की आदत सी हो गई है।
बड़ी अच्छी कविताएं।

manav said...

Dhiresh bhai maine apne kai dosto ko jo aisi koi jgah available krwa skte hain unke paas ye kvita post ki hai ummid hai hume jald hi shayad koi jgah miljaye.