Sunday, September 29, 2013

शैलप्रिया की कविताएं

 
नवभारत टाइम्स के दिनों में अनुराग अन्वेषी बेहद शिद्दत से अपनी मां शैलप्रिया जी को याद करते थे। उन दिनों उन्होंने उनकी कुछ कविताएं भी सुनाई थीं और उनकी स्मृति में एक ब्लॉग शेष है अवशेष नाम से बनाया था। कुछ देर पहले अनुराग भाई से ही पता चला कि शैलप्रिया स्मृति सम्मान शुरू करने का निर्णय लिया गया है और इस संबंध में कवि-कथाकार प्रियदर्शन (शैलप्रिया जी के बड़े बेटे) ने जानकीपुल ब्लॉग पर पोस्ट लगाई है। वही पोस्ट यहां साझा कर रहा हूं-
 
18 साल पहले मां नहीं रही। तब वह सिर्फ 48 साल की थी। तब समझ में नहीं आता था, लेकिन आज अपनी 45 पार की उम्र में सोचता हूं, वह कितना कम जी सकी। हालांकि वह छोटा सा जीवन संवेदना और सरोकार से भरा-पूरा था। घर-परिवार-शहर और स्त्रियो के लिए अपने स्तर पर बहुत सारे संघर्षों में वह शामिल रही। कविताएं लिखती रही, कुछ कहानियां भी। उसके रहते उसके दो कविता संग्रह अपने लिए और चांदनी आग है भी प्रकाशित हुए। बाद में घर की तलाश में यात्रा’,  ‘जो अनकहा रहा और शेष है अवशेष नाम की किताबें भी आईं। लेकिन सबकुछ जैसे छूटता चला गया। हिंदी के विराट संसार में रांची की एक अनजान और दिवंगत कवयित्री को कौन याद करता- भले ही उसके पास स्त्री संवेदना से जुड़ी कुछ बहुत अच्छी कविताएं हों। हमारा संकोच हमें बार-बार रोकता रहा कि हम अपनी ओर से उसकी चर्चा करें। हम, उसके बच्चे, अक्सर सोचते रहे कि कभी उसकी स्मृति में भी कुछ कर पाएं। अब जाकर एक संयोग बनता दिख रहा है। हमने महिला लेखन के लिए15000 रुपये का शैलप्रिया स्मृति सम्मान देने का निश्चय किया है। पहला सम्मान उसके जन्मदिन पर इस 11 दिसंबर को रांची में दिया जाएगा। बाकी घोषणाएं बाद में होंगी। फिलहाल उनके संग्रह चांदनी आग है की पांच कविताएं आपके लिए प्रस्तुत हैं। बरसों पहले छोटे भाई अनुराग अन्वेषी ने मां की स्मृति में  वहीं से ये कविताएं से ली हैं- प्रियदर्शन 
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1.
फुरसत में

जब कभी
फुरसत में होता है आसमान,
उसके नीले विस्तार में
डूब जाते हैं
मेरी परिधि और बिंदु के
सभी अर्थ।
क्षितिज तट पर
औंधी पड़ी दिशाओं में
बिजली की कौंध
मरियल जिजीविषा-सी लहराती है।
इच्छाओं की मेघगर्जना
आशाओं की चकमकी चमक
के साथ गूंजती रहती है।
तब मन की घाटियों में
वर्षों से दुबका पड़ा सन्नाटा
खाली बरतनों की तरह
थर्राता है।
जब कभी फुरसत में होती हूं मैं
मेरा आसमान मुझको रौंदता है
बंजर उदास मिट्टी के ढूह की तरह
सारे अहसास
हो जाते हैं व्यर्थ।


2.
ज़िंदगी
अखबारों की दुनिया में
महंगी साड़ियों के सस्ते इश्तहार हैं।
शो-केसों में मिठाइयों और चूड़ियों की भरमार है।
प्रभू, तुम्हारी महिमा अपरम्पार है
कि घरेलू बजट को बुखार है।
तीज और करमा
अग्रिम और कर्ज
एक फर्ज।
इनका समीकरण
खुशियों का बंध्याकरण।
त्योहारों के मेले में
उत्साह अकेला है,
जिंदगी एक ठेला है।

3.
एक सुलगती नदी

मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास
एक सुलगती नदी
बहती है।
सबकी आंखों का इंद्रधनुष
उदास है
अर्थचक्र में पिसता है मधुमास।
मैं देखती हूं
सलाखों के पीछे
जिंदगी की आंखें
आदमियों के समंदर को
नहीं भिगोतीं।
उस दिन
लाल पाढ़ की बनारसी साड़ी ने
चूड़ियों का जखीरा
खरीदा था,
मगर सफेद सलवार-कुर्ते की जेब में
लिपस्टिक के रंग नहीं समा रहे थे।
मैं नहीं जानती,
कब से
मेरे आस-पास बहती है
एक सुलगती नदी।


4. 
उत्तर की खोज में

एक छोटे तालाब में
कमल-नाल की तरह
बढ़ता मेरा अहं
मुझसे पूछता है मेरा हाल।
मैं इस कदर एक घेरे को
प्यार क्यों करती हूं?
दिनचर्याओं की लक्ष्मण रेखाओं को
नयी यात्राओं से
क्यों नहीं काट पाती मैं?
दर्द को महसूसना
अगर आदमी होने का अर्थ है
तो मैं सवालों के चक्रव्यूह में
पाती हूं अपने को।
मुक्तिद्वार की कोई परिभाषा है
तो बोलो
वे द्वार कब तक बंद रहेंगे
औरत के लिए?
मैं घुटती हुई
खुली हवा के इंतजार में
खोती जाऊंगी अपना स्वत्व
तब शेष क्या रह जाएगा?
दिन का बचा हुआ टुकड़ा
या काली रात?
तब तक प्रश्नों की संचिका
और भारी हो जाएगी।
तब भी क्या कोई उत्तर
खोज सकूंगी मैं?

 5.
फाग और मैं

एक बार फिर
फाग के रंग
एक अनोखी जलतरंग छेड़ कर
लौट गये हैं।
मेरे आंगन में फैले हैं
रंगों के तीखे-फीके धब्बे।
चालीस पिचकारियों की फुहारों से
भींगती रंगभूमि-सी
यह जिंदगी।
और लौट चुके फाग की यादों से
वर्तमान में
एक अंतराल को
झेलती हूं मैं
अपने संग

फाग खेलती हूं मैं।

Thursday, September 26, 2013

गणेश विसपुते की कविता


प्रयोगशाला

कुछ भी हो सकता है वहाँ
मतलब कुछ भी करवाया जाना
संभव होता है उनके लिए वहाँ
इल्जामों  के पौधे बोए जा सकते हैं
अफवाहों के फ़व्वारे उड़ाकर
उस कुहासे में
कवि के होने को न होना किया सकता है

कब्र हुई उसकी तो वह भी उखाड़कर
नामोनिशाँ मिटा दिया जा सकता  उसका
किसी को कानोंकान खबर नहीं होती
इबादतगाहों का क्या
गाँव तक ज़मींदोज़ किए जा सकते हैं
खांडववन का तो 
अच्छा-ख़ासा अनुभव है उनके पास
लिखा हुआ मिटाया जा सकता है
जो घटा नहीं वह लिखवाया जा सकता है

नष्ट की जा सकती हैं सदा हरी रहने वाली फसलें
सरकंडे उगाकर

बहुत ही अद्भुत है
उनकी प्रयोगशाला
बहुत प्राचीन है
उनके ज़हरीले रसायनों का वंश.



~ गणेश विसपुते 
मराठी कवि, चित्रकार, अनुवादक. आलोचना, कला और सिनेमा पर भी लेखन.
 
मराठी से अनुवाद- भारतभूषण तिवारी
चित्र यहां से

Wednesday, September 11, 2013

झुलसी आरजुओं का मुज़फ़्फ़रनगर

वे 1989-90 के दिन थे, मेरे छात्र जीवन के दिन। अपने आरजुओं के शहर मुज़फ़्फ़रनगर में जमकर आवारागर्दी के दिन। रामजन्मभूमि के नाम पर आरएसएस आए दिन नए-नए प्रतीकों के साथ सक्रिय था। उसके कार्यकर्ता मुस्कराते हुए, जी-जी करते हुए अपनी बात कहते थे तो कभी चौराहों पर तीखे भाषण देते हुए। इस सब के प्रति एक अजीब सा आकर्षण अपने मन में भी पैदा होता और कई बार अपने मन की रोशनी में ही इस सम्मोहन और आकर्षण का ज़हर भी साफ-साफ दिखाई दे जाता। मुज़फ़्फ़रनगर में दंगों की रिहर्सल के तौर पर कई बार भगदड़ का आयोजन किया जा चुका था। (दंगे हो भी चुके थे और बाद में भी `सफल` दंगे भी आयोजित किए गए।) इन्हीं दिनों गांव-गांव और शहर के गली-मोहल्लों में रामशिला पूजन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे। इन्हीं दिनों एक फर्रे पर अपनी बेचैनी अटपटे ढंग से दर्ज की थी। आज गांव में एक पुरानी संदूकची में यह फर्रा पड़ा मिला। आज अपना वो प्यारा शहर और पूरा जिला साम्प्रदायिकता की आग में धू-धूकर जल रहा है। 1947 में और बाद में परंपरा की तरह आयोजित किए जाते रहे दंगों में और बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस के बाद के दंगों में भी जो रेशे बचे रह गए थे, वे जल रहे हैं। वही पुराना फर्रा जिसका कोई अर्थ नहीं रह गया है, पूरी नाउम्मीदी के साथ-

मैं चीख-चीखकर खोल देना चाहता था उनके झूठ की पोल
उनके खूंखार चेहरे पर चढ़ी सभ्य मुस्कान नोंच लेना चाहता था
और जनता को बता देना चाहता था
कि ये ईंटें जो तुमने तैयार की हैं
तुम्हारे शयनकक्षों के लिए नहीं हैं
और ये लोहा भी
तुम्हारे दरवाजों, नलों के लिए नहीं है
और मेरे दोस्तो
ये तुम्हारे पूजाघरों के लिए भी नहीं है
कतई नहीं है दोस्तो
जिस लिए कि तुम्हें बताया गया है

दोस्तो! तुम्हारे ही हाथों तैयार हुआ है
तुम्हारी जेलों, सलाखों, हत्याओं का सामान
दोस्तो! उनके चेहरे का जादुई सम्मोहन
अपने ही लहू से भिड़ाता रहेगा तुम्हें

और मैं चीखा
और पागल करार दे दिया गया
और एक दिन चुपचाप
ज़िंदा दफ़ना दिया गया
इस रेगिस्तान में
पर मेरी चीख
एक दिन उगेगी़ फूल बनकर
और सुगंध वे कैद न कर सकेंगे
यही उम्मीद जीवित बनाए है मुझे
इस गरम रेत के तले

Thursday, August 15, 2013

यह वह सुबह तो नहीं-पंकज बिष्ट



अगर मुझे आप 'आधी रात की संतान (मिडनाइट्स चिल्ड्रन) भी कहें तो भी मैं पैदा  ''जब दुनिया सो रही थी और भारत जाग रहा था`` या जागने की ओर बढ़ रहा था, वाले नशे के दौर में हुआ।
सौभाग्य है कि मैंने उस पीढ़ी को देखा जिसकी प्रतिबद्धता, ईमानदारी और आत्मत्याग हमारे लिए उदाहरण होता था और आज भी होना चाहिए था। जैसा भी था, उस पीढ़ी ने ऐसा सपना देखने की कोशिश की, जिसमें देश अपनी मध्यकालीन निद्रा से जाग बीसवीं सदी के विचारों और विकास के साथ तालमेल बैठाने के लिए बेचैन नजर रहा था। उस सपने में कमोबेश सब के लिए जगह थी। जगह थी उन मूल्यों, परंपराओं और धरोहरों - प्राकृतिक और सांस्कृतिक - के लिए जो हमें विरासत में मिलीं थीं। वह सपना एक सम्यक समाज का सपना था। गोकि वहां कोई हड़बड़ी नहीं थी। रातों रात सब कुछ को बदल कर पश्चिमी सभ्यता से टक्कर लेने की। हां, प्रतिबद्धता और ईमानदारी स्पष्ट देखी जा सकती थी। पिछले दशकों में हमने क्या किया है? एक अहर्निश उपभोगतावाद को जन्म दिया है जिसने पूरे समाज को बुभुक्षा रोग की महामारी से ग्रस्त कर दिया है। (जितना चाहे खाओ और 'गोलियों` से पचाओ) भौतिकवाद की एक ऐसी दौड़ में शामिल कर दिया है जिसमें मानवीय मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं रही है। निजी स्तर पर सब को पीछे छोड़ देने की और उपभोग के स्तर पर, जो भी जहां भी, अच्छा है उसे हड़प लेने की एक सर्वव्याप्त लालसा है। समाज का पूरा ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। उदाहरण के लिए परिवार को लें। संयुक्त परिवार टूटे हैं पर उनकी जगह लेने वाली कोई दूसरी संस्थागत सुरक्षा - भावात्मक और भौतिक- कहीं नजर नहीं आती है। इसने हर स्तर पर गरीबी, असहायता और निराश्रयता को बढ़ाया है।
 
दूसरी ओर लगभग सात दशक बाद भी हमारी एक तिहाई आबादी कुपोषण और भूख से ग्रस्त है। कारण साफ है कोई भी समाज बिना एक ऐसा न्यूनतम आधार बनाए, जिसमें कुछ आधारभूत बिंदुओं पर एकता हो, कोई न्यायसंगत समाज बनना तो रहा दूर उसकी कल्पना तक संभव नहीं है। आज हुआ क्या है? एक ओर समाज का अणु जैसा हिस्सा, पूरे गाजे-बाजे के साथ, दुनिया के सबसे धनी लोगों की जमात में शामिल हो चुका है तो दूसरी ओर बहुसंख्यक लोग दुनिया के सबसे गरीब अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र से भी नीचे की श्रेणी को छू रहे हैं। यह वह तबका है जो कुपोषण से मरता है, बीमारियों से मरता है और प्राकृतिक आपदाओं से मरता है। दूसरे शब्दों में हमारी बेरुखी से मरता है।

इस दौरान हमने क्या किया है?
एक से एक अट्टालिकाओं वाले बड़े-बड़े महानगरों को पैदा किया है, जहां सारी समृद्धि और संसाधन सिमट चुके हैं। दिल्ली आजादी के समय पांच लाख की आबादीवाला शहर भी नहीं था आज डेढ़ करोड़ के निकट पहुंचने जा रहा है। मुंबई को देखें। आजादी के बाद के सबसे सुंदर शहर का आज कैसा क्षरण नजर रहा है। कोलकाता को तो एक अर्से पहले ही 'मरणासन्न शहर` घोषित किया जा चुका है। साफ है कि ये बढ़ती आबादी के दबाव को सह नहीं पाने के कारण बिखर रहे हैं। आजादी के समय मात्र तीन महानगर थे, आज उनसे बड़े दर्जनों शहर पैदा हो गए हैं।
 
आखिर ऐसा हो क्यों रहा है कि गांव खाली हो रहे हैं और शहर विशालकाय और असंतुलित हो अपने ही बोझ से छिन्न-भिन्न हो रहे हैं? सारे औद्योगिकीकरण के बावजूद देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। शिक्षित बेरोजगारों की संख्या चरम पर है। सच यह है कि औद्योगिक विकास ने जो रूप ले लिया है वह किसी भी तरह हमारी इतनी बड़ी आबादी को नौकरी नहीं दे सकता। आज लाभ का बड़ा आधार श्रम के क्षेत्र में बचत करना है। यह अचानक नहीं है कि पूंजीपति देश तीसरी दुनिया या विकासमान देशों में कारखाने लगा रहे हैं। सीधा-सा कारण है सस्ते श्रम की तलाश।  ऐसे में, यानी निजीकरण और उदारीकरण के दौर में, पूर्ण और सुरक्षित रोजगार की अपेक्षा मूर्खता है। मजदूरी घट रही है और उपभोग कम हो रहा है। अर्थव्यवस्था ठहर रही है।
उदारीकरण ने हमारे बाजारों को ही नहीं खोला है, प्राकृतिक संसाधनों की लूट के द्वार भी पूरी तरह उघाड़ दिए हैं। हमारा शासक वर्ग इस कोशिश में है कि किसी तरह से इस धरती में जो कुछ है उसे खोद-खाद कर  विदेशी मुद्रा कमा ली जाए और फिर उससे निर्बाध विदेशी उपभोक्ता सामान आता रहे। राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हथियार आएं और कमीशन से वोटरों को खरीदना-भ्रमित करना आसान बना रहे।
 इसने एक और तरह के आंतरिक असंतुलन को भी पैदा किया है जिसने उत्तराखंड जैसी त्रासदियों को जन्म देना शुरू कर दिया है।
 
उत्तराखंड देश के अब तक के सबसे नये राज्यों में रहा है। इस एक दशक में यहां की नदियों के दोहन के लिए जो नहीं हो सकता था वह तक किया गया, सिवा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के विकास के। इस पर भी हर सरकार का एक ही एजेंडा है 'विकास करना` विकास से उसका तात्पर्य है ज्यादा से ज्यादा पहाड़ों को खोद देना और बड़े से बड़ा बांध बनाना। उत्तराखंड का यह दुर्भाग्य है कि वह दिल्ली जैसे महानगर के इतने निकट है। उर्जा के मामले में दिल्ली किसी सुरसा से कम नहीं है।  उसकी मांग थमनेवाली नहीं है क्योंकि वहां ऐसी जीवनशैली को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है जो सिर्फ उर्जा केंद्रित है। उत्तराखंड उसी जीवन शैली का शिकार है। उत्तराखंड में कुल बिजली की खपत का सिर्फ 13 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्रों में होता है। बाकी सारी बिजली प्रदेश के मैदानी भाग में इस्तेमाल होती है या फिर राष्ट्रीय ग्रिड में इजाफा करती है। पर इस बिजली उत्पादन के सारे खतरे पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को भोगने होते हैं और वे भोग रहे हैं।
इस बात को आप कमोबश उत्तराखंड के साथ बने दो और राज्यों पर भी यथावत लागू कर सकते हैं। विकास के इस मॉडल ने इन इलाकों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और भौगोलिक उथल-पुथल मचा दी है। गांव तो उजड़े  ही हैं। जंगल और नदियां खत्म होने के कगार पर हैं और प्राकृतिक असंतुलन अपने चरम पर पहुंच चुका है। अतिवृष्टि, भूस्खलन, बाढ़ का तांडव हर दिन बढ़ रहा है।
 
हम विदेशी पूंजी की आस लगाए दरवाजे पर बैठे हैं। विदेशी पूंजी है कि आने का नाम नहीं ले रही है। जो भी रही है वह अपनी शर्तें लाद रही है। यह विश्वबैंक की 'रिस्ट्रकचरिंग` के अलावा है। अर्थव्यवस्था ठहर चुकी है और मंदी नए सिरे से बढ़ रही है। वे उद्योग जो अपनी वृद्धि की दर के कारण उदाहरण माने जाते थे छंटनी के नजदीक हैं। मोटरगाड़ी उद्योग लीजिए। अगर हमारे नीति नियंताओं ने निजी वाहनों को बढ़ा कर सार्वजनिक यातायात को तरजीह दी होती तो हमारा विदेशी मुद्रा कोष तेल के आयात के दबाव में इस कदर दरकता।
बेरोजगारी निश्चय ही मंदी को और बढ़ाएगी। अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ेगा। पर सरकार कृषि के भी कॉरपोरेटीकरण की फिराक में है। इससे और बेरोजगारी बढ़ेगी। हमारे नियंता यह नहीं समझ रहे हैं कि हम बड़ी आबादीवाले समाज हैं और हमारी सबसे बड़ी चुनौती अपने लोगों को रोजगार मुहैया करवाना है। वह तभी हो सकता है जब हम पश्चिमी विकास के तरीके को आंख मूंद कर बढ़ावा दें। वह समाज अल्प जनसंख्या से पीडि़त है। हमारी समस्या अति जनसंख्या की है। कहा नहीं जा सकता कि आगे क्या होगा पर यह जरूर कहा जा सकता है कि यह विकास हमारे सपने का हिस्सा नहीं था।

नोट: इस लेख का संक्षिप्त रूप दैनिक 'अमर उजाला` में आज 15 अगस्त को प्रकाशित हुआ है।