Friday, August 27, 2021

ट्रैजडी किंग और इंडियन सेकुलरिज़्म की ट्रैजडी : धीरेश सैनी

 


दिलीप कुमार (11 दिसंबर, 1922-7 जुलाई, 2021) पर बात शुरू करते हुए एम. एस. सथ्यू की फ़िल्म `गर्म हवा` की बड़ी शिद्दत के साथ याद आ रही है। बँटवारे के पस-ए-मंज़र बनी इस फ़िल्म के मुख्य पात्र आगरे के एक जूता कारोबारी मिर्ज़ा सलीम हैं जो पाकिस्तान जाने के बजाय हिन्दुस्तान में ही रहना पसंद करते हैं। भारी मुश्किलों और बेइन्तिहा ज़िल्लत का सामना करने को मज़बूर मिर्ज़ा टूट जाते हैं। हार कर वह पाकिस्तान जाने के लिए रेलवे स्टेशन की तरफ़ निकल तो पड़ते हैं पर बदलाव की उम्मीद के लिए संघर्ष का प्रतीक एक जुलूस जिसमें उनका बेटा भी शामिल है, उन्हें रोक लेता है। मिर्ज़ा की भूमिका भारतीय सिनेमा के एक अज़ीम-तरीन अभिनेता बलराज साहनी ने अदा की थी जिसमें मुसलमानों के साथ हिन्दुस्तानी सेकुलरिज़्म के धोखे, उनकी कशमकश, जिद्दोजहद और ज़िल्लत की सच्ची व मार्मिक तस्वीर थी। देखने से गुरेज़ न किया जाए तो स्टारडम, अदाकारी और शख़्सियत के बेमिसाल उरुज पर रहे दिलीप कुमार की विडंबना को भी इस छवि में देखा जा सकता है।

पेशावर के फल कारोबारी पठान सरवर ख़ान का बेटा यूसुफ़ ख़ान पहले पढ़ाई और फिर कारोबार के सिलसिले में बंबई में था। बॉम्बे टाकीज की मालकिन, हिन्दी सिनेमा की पहली स्टार और लेजेंड्री शख़्सियत देविका रानी की उस पर नज़र पड़ी और हिन्दी सिनेमा में अप्रत्याशित रूप से एक नया सितारा दाख़िल हुआ। यूसुफ़ ख़ान नहीं, दिलीप कुमार।

यूसुफ़ ख़ान को दिलीप कुमार नाम दिए जाने के क़िस्से थोड़ी-बहुत फेर बदल के साथ मज़े-मज़े में सुनाए जाते हैं। दिलीप कुमार की यह बात भी दोहराई जाती है कि पिता से फ़िल्मों में आने की बात छिपाए रखने में नाम का बदला जाना मददगार महसूस हुआ। ये क़िस्से उनके इंतिक़ाल के साथ फिर चर्चा में आए। सेकुलर अदीबों के बीच एक धीमा स्वर अफ़सोस का रहा कि मिली-जुली कल्चर के एक मुल्क में कैसे एक मुसलमान कलाकार को हिन्दू चलन का एक नाम अपनाना पड़ा। हिन्दी के अदीबों के बीच आमतौर पर ऐसी किसी भी आवाज़ का बुरा मनाने का चलन रहा है। मोटे तौर पर कम्युनल हारमनी की हिमायती धारा भी प्रतिगामी को प्रगतिशील, थोपी गई मज़बूरियों को स्वेच्छा, विडंबनाओं को लोकमंगल और समर्पण को सद्भावना कहने की आदी रही है।


दिलीप कुमार से मोहब्बत दिखाते हुए ही लिखे गए एक लेख की इन्तिहाई खोज यह रही-

``उन्होंने नामों के संतुलन को अपने सलूक व सलीके से इस कदर साधा कि यह युग्म ‘यूसुफ बनाम दिलीप कुमार’ न हुआ, बल्कि ‘यूसुफ़ बरक्स (समानांतर) दिलीप कुमार’ होकर उनकी ज़िंदगी का एक गाढ़ा रूपक बन गया. यूसुफ़ को उन्होंने न छोड़ा, न छिपाया और दिलीप कुमार को भी समूचा अपना लिया. नामों की यह एकता-समता निजी जीवन व कला की संगति से होते हुए बहुत आगे निकलकर हिंदू-मुस्लिम एकता की प्रतीक भी बनी.`` सत्य देव त्रिपाठी के लेख का अंश। (https://samalochan.com/dilip-kumar-sataydev-tripathi/)       

सवाल यह है कि यह स्टार अगर दिलीप कुमार न होकर सिर्फ़ यूसुफ़ ख़ान होता और `नामों की यह एकता-समता ` संभव न होती तो क्या वह `हिंदू-मुस्लिम एकता` का प्रतीक कहला सकता था। लगता है कि ऐसे निष्कर्षों के लिए की जा रही ज़ेहनी कसरत में ज़ेहन से ज़्यादा दिल का इस्तेमाल किया जाता है। फ़राख़-दिल के पीछे तंग-दिल ही काम कर रहा होता है जो उन हादसात को देखने से इंकार कर रहा होता है जिनका असर सियासत से लेकर कल्चरल इदारों तक पर छा रहा था। वर्ना क्या वजह है कि हमारे कई उदार बुद्धिजीवियों तक का ज़ोर यह साबित करने में लगा रहा कि सिनेमा की दुनिया में कलाकारों के नाम बदले जाने का एक व्यापक चलन था। मिसाल के तौर पर उन हिन्दू अभिनेता-अभिनेत्रियों के नाम भी गिनाए गए जिन्हें सिने-परदे पर आने से पहले दूसरे नाम दिए गए थे या उनके बड़े नामों को छोटा करके `स्मार्ट` कर दिया गया था। ऐसी मिसालें पेश करते हुए हिन्दू और मुसलमान कलाकारों के नाम बदले जाने में एक साफ़ फ़र्क़ को अनदेखा किया जाता रहा। वह यह कि हिन्दू कलाकारों के नाम बदले जाकर भी हिन्दू चलन के ही रहे जबकि मुसलमान कलाकारों को हिन्दू चलन के नाम दिए गए। मीना कुमारी (महजबीं बानो), मधुबाला (मुमताज़ जहाँ देहलवी), अजीत (हामिद अली ख़ान), जगदीप (सैयद इश्तियाक़ अहमद जाफ़री), जयंत (ज़कारिया ख़ान) जैसे कुछ बड़े नाम उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं।

एक दलील यह पेश की जा रही है कि फ़िल्मों में बतौर संगीतकार, गीतकार, डायरेक्टर, कैमरामैन वगैराह दूसरे मुस्लिम फ़नकार बड़ी संख्या में प्रभावी रूप से उपस्थित रहे। वे अपनी धार्मिक पहचान के साथ ही पब्लिक में मक़बूल हुए। जाहिर है कि फ़िल्म जनता के बीच सबसे पहले अदाकारों पर फ़िदा होने का माध्यम रहा है। नाम भी अदाकारों के ही बदले गए।

एक दलील यह है कि अभिनय की दुनिया में भी ऐसे बहुत से लोग थे जो अपने मुस्लिम पहचान वाले नामों के साथ ही काम कर रहे थे और मशहूर थे। तो फिर ऐसी क्या ज़रूरत थी कि मुस्लिम कलाकारों को हिन्दू पहचान वाले नाम देने का चलन पैदा किया गया था? वहीदा रहमान तो तब वहीदा रहमान रह सकीं जब उन्होंने अपना नाम बदलने से साफ़ इंकार कर दिया और फ़िल्मी दुनिया के गुरुदत्त जैसे असरदार लोग उनकी हिमायत में खड़े हुए।

यह माना जा सकता है कि युसूफ़ ख़ान को दिलीप कुमार बनाने के पीछे सीधे कोई साम्प्रदायिक मंशा नहीं थी। देविका रानी जो एक मुसलमान कलाकार नजमुल हसन के प्यार में डूबकर एक दफ़ा हिमांशु रॉय को छोड़कर भी चली गई थीं, मुसलमान नाम से घृणा क्यों करतीं? कहा जाता है कि गीतकार नरेंद्र शर्मा ने युसूफ़ ख़ान के लिए तीन नाम वासुदेव, जहाँगीर और दिलीप कुमार सुझाए थे। उनमें से युसूफ़ ख़ान ने जहाँगीर को पसंद किया था पर भगवतीचरण वर्मा के सुझाव पर देविका रानी ने दिलीप कुमार नाम को ही चुना। यह मान लिया जाए कि मुसलमान कलाकारों को हिन्दू चलन के नाम देने के पीछे कमर्शल दबाव या दिमाग़ था तो भी यह जानना ज़रूरी है कि इसकी जड़ें कहाँ थीं।


देश के बँटवारे और आज़ादी से पहले ही एक हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक दबाव कभी उग्र रूप में और कभी बड़़े सहज ढंग से चारों तरफ़़ मौजूद था। गाँधी-नेहरू की उपस्थिति के बावजूद कांग्रेस पार्टी तक इस गिरफ़्त में थी। बंबई तो यूँ भी तिलक, सावरकर, हेडगेवार वगौराह का `इलाक़ा` था। आज़ादी के बाद तो देश में पाकिस्तान के बरक्स हिन्दू हिन्दुस्तान के आग्रह को और ज़्यादा हवा दी गई। यहाँ तक कि गाँधी का क़त्ल कर दिया गया और नेहरू की बहुत हद तक घेराबंदी कर दी गई। न तो बँटवारा और न भयानक मारकाट अचानक पैदा हुई स्थिति थी और न गाँधी की हत्या किसी तात्कालिक उन्माद का नतीजा थी। हिन्दी सिनेमा की सेकुलरिज़्म की अद्भुत परंपरा के बावजूद वहाँ की बीमारियाँ भी कोई एक दिन की चीज़ नहीं थीं। आज़ादी के बाद भी हिन्दी फ़िल्मों में बे-शक़ एक लंबा दौर सेकुलर ट्रेडिशन में यक़ीन रखने वाले डायरेक्टरों और दूसरे कलाकारों के ही दबदबे का रहा। ऐसी तमाम फ़िल्में बनीं जिनके लिए आज कोई स्पेस ही नहीं है। लेकिन, यह साबित करते रहना कि सब कुछ अचानक ढह गया और पहले साम्प्रदायिकता मौजूद ही नहीं थी, नेहरू के असर के सेकुलर बुद्धिजीवों तक की भी एक पुरानी बीमारी रही है।

इस ट्रैजडी को दिलीप कुमार के दबदबे और उनकी लाचारी से भी समझा जा सकता है। वह एक ऐसे स्टार थे जिनकी पहली फ़िल्म `ज्वार भाटा` 1944 में आई पर उनकी चमक 2021 में उनकी मौत तक ज़माने और रुचियाँ बदल जाने के बावजूद भी क़ाएम थी जबकि वे अपनी सुधबुध खो जाने की वजह से लंबे समय से किसी तरह के सार्वजनिक जीवन तक में नहीं थे। वे नेहरू के क़रीबी थे। कहा जाता है कि उनके व्यक्तित्व, उनकी डायलॉग डिलीवरी के अंदाज़ और उनकी सोच पर नेहरू का साफ़ असर था। नेहरू भी उनकी जवाहिरनिगारी से मुतासिर थे और उनकी छवि के राष्ट्रीय इस्तेमाल के रूप में भी सचेत थे। नेहरू के परिवार और उनकी पार्टी के साथ उनका सक्रिय रिश्ता बाद में भी लंबे समय तक बरक़रार रहा। एक कामयाब सितारे के तौर पर, पीढ़ियों पर असर डालने वाले एक महान अभिनेता के रूप में और अपने नफ़ीस तौर-तरीक़ों से बौद्धिक हलकों और आम लोगों के बीच उनका अपना जादू भी कम नहीं था। इसके बावजूद एक मुसलमान के रूप में उन्हें मौत के बाद तक ज़लील हमलों का सामना करते रहना पड़ा।

फ़ासिस्ट मीडिया और उसकी सोशल मीडिया इकाइयों ने दिलीप कुमार की मौत के बाद यह ज़हर उगला कि यूसुफ़ ख़ान ने अपना हिन्दू नाम दिलीप कुमार करके बेशुमार दौलत कमाई, और करोड़ों रुपये का दान किसी मुसलमान संस्था को दिया। यह सब पहली मर्तबा नहीं था। उन पर भयानक हमले कांग्रेस के `सेकुलर राज` में ही शुरू हो गए थे। 1964 में पाकिस्तान से जंग से एक बरस पहले उन पर पाकिस्तानी जासूस होने का इल्ज़ाम लगा दिया गया था। उनके बाथरूम में ट्रांसमीटर होने की बात प्रचारित की गई और उनके घर की तलाशी भी हुई। बाद में फ़ासिज़्म के उभार के दिनों में `फायर` फ़िल्म के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान पर उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री की एक सजग शख़्सियत के नाते स्टैंड लिया तो उन्हें राज्य सभा में पाकिस्तानी बोल दिया गया। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बंबई में दंगों से पैदा हुई बदहाली के बीच वे पीड़ितों की मदद के लिए निकले तो बाल ठाकरे ने उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। शिव सेना उनके घर के बाहर प्रदर्शन करती रही। उम्र के आख़िरी दौर में उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा की तो वहाँ उनका ज़ोरदार ख़ैर-मक़्दम किया गया। उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान `निशान-ए-इम्तियाज़`  से नवाजा गया। बाल ठाकरे ने फिर उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी और प्रदर्शन कराए। उन्हें दिल्ली जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने अपना पक्ष रखना पड़ा।

`भारत रत्न` और दूसरे बड़े राष्ट्रीय सम्मानों के स्वाभाविक हक़दार दिलीप कुमार को इनसे क्यों महरूम रखा गया, यह अहम सवाल इस बात के सामने कितना मामूली है कि एक बुलंद-तरीन शख़्सियत को कैसी हक़ीर-तरीन हरकतों का सामना करते हुए ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी। उन्हें भारत-पाक दोस्ती के सिम्बल के तौर पर याद करते हुए एक सानिहा यह भी दोहराया जा रहा है-  

``प्रधानमंत्री अटल बिहारीजी वाजपेयी ने जब उन्हीं सम्बंधों का वास्ता देते हुए बात करने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को फ़ोन लगाया, तो उनके साथ दिलीप कुमार भी जुड़े थे. तब दिलीप साहब ने युद्ध बंद करने की अपील करते हुए साफ़-साफ़ कहा था कि जब भारत-पाकिस्तान-सीमा पर तनाव पैदा होता है, तो हिंदुस्तान के मुसलमानों की हालत बहुत पेचीदा हो जाती है. उन्हें अपने घरों से निकलने में भी दिक़्क़त महसूस होती है, कुछ कीजिए,.`` (सत्यदेव त्रिपाठी के ही लेख से।)

 

रणनीति-कूटनीति कुछ भी कहिए पर यह कैसी बात है कि हिन्दुस्तान के किसी मुसलमान के मुँह से पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म से यह गुहार लगवाई जाए या उसे अपने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह कहना पड़े कि अपने मुल्क में मुसलमान किस पेंचीदी हाल में हैं! यूसुफ़ ख़ान को दिलीप कुमार बना दिए जाने की `स्वेच्छा` के लिए भी ज़लील होना पड़ा और यूसुफ़ ख़ान होने की हक़ीक़त के लिए भी। असल में, यह ट्रैजिड़ी हिन्दी फ़िल्मों के `ट्रैजिडी किंग` की न होकर इंडियन सेकुलरिज़्म की ट्रैजिडी है।        

 

2002 के गुजरात नरसंहार के बाद दिलीप कुमार ने एक नागरिक के नाते अपना मुखर विरोध दर्ज़ कराया था। तब सुभाष झा से उनकी बातचीत का एक हवाला महमूद फ़ारूक़ी ने अपने लेख में दिया है - ``अपने ही लोगों की बर्बरता से बचकर कहाँ जाऊं? …मुसलमान ज़ल्द ही तारीख़ का हिस्सा होकर रह जाएंगे। हर सिविलाइज़ेशन एक चक्र है जिसे ख़त्म होना ही है। मेरा अपना मानना है कि आख़िरकार हिन्दुस्तानी मुस्लिम आबादी को ख़त्म कर दिया जाएगा।`` Where can I go to escape the barbarism of my own people? … The Muslims will soon become a part of history. Every civilization is cyclic and must end. My personal view is that the Indian Muslim population may eventually be annihilated.’ 

देखें- A few word about Dilip Kumar, Mahmood Farooqui, (https://womendastangos.wordpress.com/

नेहरुवियन सेकुलरिज़्म के मुरीद जो हर बात को मामूली मानकर प्रफुल्लता से लीपापोती करने के आदी हैं, शायद इस हृदय-विदारक बयान से कुछ समझ सकें। नुक्ता-चीं शायद उनकी इंतिहाई हज़्म-ओ-एहतियात के पीछे की वजह समझ सकें। और समझ सकें कि यूसुफ़ ख़ान की जैसी स्वेच्छा दिलीप कुमार हो जाने में थी, वैसी ही इंदिरा-संजय से लेकर ठाकरे-अटल के साथ रिश्तों में थी। 

(समयांतर, अगस्त 2021 अंक में प्रकाशित)

 

Thursday, June 17, 2021

ज़िंदा नहीं रहने दिया गया था आम्बेडकर से प्रभावित तिलक के बेटे को

 


(मशहूर बुद्धिजीवी सूरज येंगडे की किताब `कास्ट मैटर्स` से लिया गया टुकड़ा जिसका हिन्दी अनुवाद भारत भूषण तिवारी ने किया है।)

जानकर हैरत होगी, ऐसे आम्बेडकर के एक और सहयोगी थे श्रीधरपंत तिलक जो रूढ़िवादी बाल गंगाधरपंत तिलक के बेटे थे. आम्बेडकर की सामाजिक गतिविधियों में श्रीधरपंत ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 2 अक्टूबर 1927 को पूना में डिप्रेस्ड क्लास छात्रों की कांफ्रेंस की अध्यक्षता आम्बेडकर ने की और पी.एन.राजभोज और सोलंकी के अलावा तीसरे वक्ता श्रीधरपंत तिलक थे. कांफ्रेंस के बाद पूना के नारायण पेठ में गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर श्रीधरपंत तिलक ने आम्बेडकर के सम्मान में चाय पार्टी आयोजित की.

Babasaheb Amedkar (seated, front row, third from right) with members of the Samaaj Samata Sangh in Bombay in 1927. (Inset) Shridhar Balwant Tilak, son of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak. (HT PHOTO) यह फोटो और कैप्शन HT से साभार 


इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए श्रीधरपंत ने सहभोजन के लिए `अछूत` लड़कों के गायन समूह के लिए अपने घर के दरवाज़े खोल दिए. ऐसा उन्होंने समाज समता संघ की पहल का समर्थन करने के लिए किया जो गायकवाड़ वाड़ा में ही स्थित था. उन्हें आमंत्रित कर उन्होंने समूचे समुदाय ख़ासकर केसरी-मराठा ट्रस्ट के ब्राह्मण ट्रस्टियों के विरोध की परवाह न की. उनके घर लोकमान्य निवास में एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ´चातुर्वर्ण्य विध्वंसक समिति´. इसकी वजह से भी उन्हें अपने रिश्तेदारों और ब्राह्मण समाज का रोष सहना पड़ा. श्रीधरपंत पर अत्यंत दबाव डाला गया और केसरी, जो उनके पिता द्वारा ही शुरू किया गया अख़बार था, में भी उनका निरंतर अपमान किया गया.


कट्टरपंथी ब्राह्मण समुदाय और केसरी-मराठा ट्रस्ट के रूढ़िवादी गुट, जिसने श्रीधरपंत को सात साल तक एक मुक़दमे में फँसाए रखा, के बढ़ते दबाव के कारण 25 मई 1928 को बॉम्बे-पूना एक्सप्रेस ट्रेन के सामने कूदकर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ली. इस घटना के लिए आम्बेडकर ने केसरी के रूढ़िवादी सवर्ण हिन्दू गुट को दोषी ठहराया जिन्हें श्रीधरपंत गैंग ऑफ़ रास्कल्स कहा करते. आत्महत्या से पहले उन्होंने आम्बेडकर को सम्बोधित एक आखिरी पत्र लिखा था जिसकी प्रति 29 जून 1928 को समता में प्रकाशित हुई थी और नीचे दी जा रही है:



यह पत्र आपके हाथों में पड़े इससे पहले ही मेरे दुनिया छोड़कर जाने की ख़बर आपके कानों में पड़ चुकी होगी. समाज समता संघ के काम को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ेलिखे और समाज सुधारवादी युवाओं को आन्दोलन की तरफ आकर्षित करना होगा. इस सिलसिले में आपके अथक प्रयासों को देखकर मैं बेहद प्रसन्न हूँ और मुझे भरोसा है कि ईश्वर आपको यश प्रदान करेंगे. महाराष्ट्रीय युवा अगर इस उद्देश्य का बीड़ा उठा ले तो छुआछूत की समस्या महज पाँच सालों में सुलझ जाएगी. उत्पीड़ित वर्गों के मेरे भाइयों के दुख-दर्दों को अपने इष्ट कृष्णदेव तक पहुँचाने मैं आगे जा रहा हूँ. मित्रों तक मेरा शुभकामनाएँ पहुँचाइएगा.


भवदीय

श्रीधर बलवंत तिलक

25/5/28


श्रीधरपंत की मृत्यु के बारे में सुनकर आम्बेडकर ने 26  मई 1928 को जलगाँव कांफ्रेंस में उनके योगदान को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया. अपने सम्पादकीय में उन्होंने श्रीधरपंत की मृत्यु पर शोक प्रगट किया: ¨मैं श्रीधरपंत से बहुत बड़े कार्य की उम्मीद कर रहा था लेकिन अब वे नहीं हैं.¨ समाज समता संघ के साथ श्रीधरपंत का जुड़ाव बढ़ने के बाद से आम्बेडकर उनके करीब आ गए थे. बहुत जल्द ही श्रीधरपंत आम्बेडकर के नज़दीकी मित्र समूह में शामिल हो गए थे. जब  भी वे मुम्बई जाते, आम्बेडकर से ज़रूर मिलते और अगर आम्बेडकर पुणे में होते तो तो उन्हें गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर लाने की कोशिश करते. श्रीधरपंत और उनके भाई रामभाऊ तिलक का केसरी-मराठा ट्रस्ट के साथ संघर्ष बेहद बढ़ गया. दोनों भाई अपने उदारवादी नज़रिये और सामाजिक सुधारवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे. तिलक बंधुओं और केसरी-मराठा ट्रस्ट के बीच के क़ानूनी झगडे में रामभाऊ ने वकील के तौर पर आम्बेडकर की सहायता लेने पर ज़ोर दिया था. मगर दीगर कारणों की वजह से आम्बेडकर यह ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं कर पाए.


1धनंजय कीर, डॉ. आम्बेडकर: लाइफ एंड मिशन, पृष्ठ 93-94

2शत्रुघ्न जाधव, श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर (नई दिल्ली: सम्यक 

प्रकाशन, 2012), पृ. 36.

3समता, 29 जून 1928, जाधव द्वारा लिखित श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर में पृ 108 पर उद्धृत

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(सूरज येंगड़े की पुस्तक ´कास्ट मैटर्स´ के चैप्टर ´ब्राह्मिन्स अगेंस्ट ब्राह्मिनिज़्म´ सब-चैप्टर ´ब्राह्मिनएक्शन´ से उद्धृत) 

 

    


Wednesday, June 9, 2021

वाम आंदोलन में भी अपने ऊपर दबंग जातियों की शक्ति महसूस करते हैं दलित - सूरज येंगडे



नव-उदारवादी धज के पूँजीवाद ने जो वायदे किए थे उनमें से अधिकतर पूरे नहीं हुए बल्कि इसने भारत के सबसे अधिक हाशिए के लोगों की मृत्युसंख्या में वृद्धि ही की. 1980 के दशक में आया नव-उदारवादी कॉरपोरेट पूँजीवाद पूँजी बाज़ार पर जाति नियंत्रण को कमज़ोर नहीं कर पाया. आर्थिक वैश्वीकरण का जहाँ स्वागत किया गया, वहीं अभिव्यक्तियों के सांस्कृतिक स्वरूप मसलन मुक्त-बाज़ार के सन्दर्भ में स्व की अभिव्यक्ति, वैयक्तिक उदारवाद और लैंगिकता, जेंडर और वर्ग जैसे सांस्कृतिक चिह्नक गहरे धँसे हुए जातिवाद को हिला नहीं पाए. पूँजीवाद के पक्ष और विपक्ष में  होने वाली बहसों ने हाशिए के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर बेहद कम असर डाला क्योंकि वे पावर डायनामिक्स का शिकार हो गईं जिसके चलते वे चीज़ें सामने आईं जिन्हें तेलतुंबड़े ‘नापाक गठबंधन’ (अनहोली अलाइंसेस) कहते हैं.


पारम्परिक तौर पर सम्पन्न और ताक़तवर जातियों ने नव-उदारवादी युग में भारत में पूँजीवादी अन्वेषण के साथ बढ़िया संगति बिठा ली है. पश्चिमी और साम्राज्यवादी शोषणात्मक पूँजी के एजेंटों के तौर पर काम करते हुए व्यापारी जातियाँ मेहनतकश वर्ग और उत्पीड़ित जाति समूहों पर नव-उदारवादी मंशा थोपती हैं. भारत में नव-उदारवाद के ख़िलाफ़ बहसों में पश्चिमी पूँजीवादी संरचनाओं पर हमला करने से पहले देशी पूँजीवादी ताक़तों से निबटने की बात शायद ही कोई करता है. भारत में वाम आन्दोलनों की बहस सीधे-सीधे पश्चिमी साम्राज्यवादी व्यवस्था को केंद्रीय समस्या साबित कर नए पूँजीवादी जाति बाज़ार में किए जाने वाले रोज़मर्रा के जाति उत्पीड़नों की अनदेखी करती है. अन्य देशों के दीगर उत्पीड़ित समूहों के सिद्धांतों (थ्योरी) और अनुभवों को उधार लेकर यह मुमकिन किया जाता है. उनके अनुभवों को भारत के उत्पीड़ितों के अनुभवों के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. इसलिए एक दलित को एशिया, अफ्रीका और नॉर्थ अमेरिका में उस जैसों के पूँजीवादी शोषण का दर्द महसूस करना होता है. वाम विमर्श में दलित कर्तृत्वहीन (एजेंटलेस) बना रहता है. होना यह चाहिए  कि जब ज़मींदारों द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न के ख़िलाफ़ दलितों को संगठित किया जाता है तब जाति संरचनाओं के स्पष्ट वर्गीकरण को शुरुआत में ही स्वीकार किया जाना चाहिए जिनके अंतर्गत सामंती समाज परिचालित होता है. बजाय इसके होता यह है कि दलित के और संघर्ष के मनमस्तिष्क से जाति को मिटा दिया जाता है. इसलिए दलित दलित होने की वजह से कष्ट भुगतता है मगर दलित के तौर पर होने वाले उत्पीड़न को महसूस करने की अनुमति उसे नहीं होती. इसके बदले उसे एक ग़ैर-दलित, ग़ैर-जाति कर्ता बना दिया जाता है जो उसके श्रमजीवी स्वत्व मात्र तक सीमित है.


दलित कर्तृत्व (एजेंसी) के हनन से ऐसी चेतना-विहीन दलित कांस्टीट्यूएंसी का जन्म होता है जो अपने समुदाय के सामाजिक बदलाव के लिए काम करने में असमर्थ है. इसकी जगह वे अपने दबंग जाति कामरेडों के हितों के लिए लामबंद होते हैं जो दरअसल अपने ही समुदाय के बचाव का काम कर रहे होते हैं - उन्हें और उनके द्वारा होने वाले जातिगत उत्पीड़न को सामने न लाकर. वे ठीकरा फोड़ते हैं काल्पनिक-अवास्तविक बाहरी शै के सिर जिस तक एक दलित की पहुँच ही नहीं. यह उत्पीड़न एक दलित की कल्पना मात्र में बरकरार रहता होता है क्योंकि केवल एक ´कामगार´ के तौर पर उत्पीड़न का अनुभव एक दलित को विरले ही होता है. वाम आंदोलन में भी दलित अपने ऊपर दबंग जातियों की शक्ति महसूस करते हैं. इसी वजह से इन्क़लाबी प्रोजेक्ट में ठोस दलित सहभागिता कभी वास्तविक रूप नहीं ले पाती. दबंग जातियों के वामपंथियों ने अपने जाति भाइयों की उत्पीड़ित जाति-वर्ग जन की क्रांतिकारी परिणतियों से रक्षा की है. एक सचेत रैडिकल आम्बेडकरी दलित सहभागिता के बग़ैर वाम आन्दोलन एक नाकाम प्रोजेक्ट और मेहनतकश तबके की सच्ची मुक्ति के परिप्रेक्ष्य में भारत के इतिहास का दुखद अध्याय है.


इस प्रकार भारत में क्रोनी लेफ़्टिस्टों का विजन मार्क्स, लेनिन और माओ द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक समझ तक सीमित रहा. भारतीय समाज के दुखों को कहीं गहरे तौर पर जीने और समझने वाले देशज क्रान्तिकारियों को उन्होंने आँख मूँद कर अस्वीकार कर दिया. भारत में मार्क्सवादी फ़्रेमवर्क में जाति-आधारित पूँजीवादी शोषण पर कम ही फ़ोकस है. फुले और आम्बेडकर उपेक्षित और तिरस्कृत हस्तियाँ रही आई हैं और निहित ब्राह्मणीय राज्यव्यवस्था से भारत को उबार पाने वाली असुविधाजनक रामबाण भी.


सबआल्टर्न जातियों (दलित और अन्य उत्पीड़ित जातियाँ) के शोषण का शिरोमणि साहूकार, ब्राह्मण के साथ-साथ पहला ‘वर्ग शत्रु’ है जो हमारी चेतना पर अपनी शर्तें थोपता आया है. दलितों से मानवी गरिमा और आत्मसम्मान छीन लेने के ब्राह्मणीय विचार-आरोपण द्वारा हुई दलित दासता से इस चेतना की दूरी ने हमारे दुखों को अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया को अवरुद्ध किया और इस तरह अंततः क्रान्ति की राह में रुकावट डाली है. सबआल्टर्न जातियों के होने को पहला विद्रोही ढाँचा प्रदान करने व्यक्ति थे फुले. सामूहिक उत्पीड़ित, जिसे बड़े प्यार से उन्होंने ‘बहुजन’ का नाम दिया था, के अंतर्गत व्यापक दलित, शूद्र, मुस्लिम और सभी जातियों की महिलाओं को शामिल कर उसकी चेतना का उन्होंने विन्यास किया. फिर आम्बेडकर ने इसमें साहसिक अमल जोड़ा और मानव अधिकारों और नागरिक अधिकारों की भाषा में प्रस्तुत किया. वे इतने पर ही नहीं रुके बल्कि यह दावा करने लगे कि राजनीतिक अधिकार उनके द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के केंद्र में है जो मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तन और भौतिक प्रक्रियाओं से सम्बद्ध है. भारत की समस्याओं के प्रति उनकी वर्ग-आधारित एप्रोच को कम करके आँका गया और यह एक ऐसा अवसर है जो बहुत पहले चूक गया. सारी दुनिया पर और इस प्रकार आम्बेडकर पर मार्क्स का गहरा प्रभाव ज़ाहिर है अनेकों मार्क्सवादी पुस्तकों से जो उनकी लाइब्रेरी में पाई गईं.


कट्टर हिन्दू धर्म-सिद्धांतों के खिलाफ आम्बेडकर की लड़ाई और उसके साथ-साथ चलाया गया जाति-प्रेरित वर्ग संघर्ष उन्हें विशिष्ट जगह प्रदान करता है. वे एक परिष्कृत विचारक की जीती-जागती मिसाल और अंतर्विरोधों से ग्रस्त भारतीय समाज के लिए गंभीर ख़तरा थे. शायद यही वजह है कि आम्बेडकर एक ऐसी शख्सियत है जिससे सबसे ज़्यादा प्यार भी किया जाता है और नफ़रत भी. आम्बेडकर के प्रति भावनाएं, चाहे सकारात्मक हों या नकारात्मक, यथास्थिति को बदलने या बनाए रखने की इच्छा से ही उपजती हैं.


(सूरज येंगड़े की किताब ´कास्ट मैटर्स´ के चैप्टर ´दलित कैपिटलिज़्म´ सब-चैप्टर ´कास्ट इन दि निओलिबेरल एजेंडा´ से उद्धृत.)


हिन्दी अनुवाद : भारत भूषण तिवारी


Sunday, September 27, 2020

आलोचना की आलोचना : फ़ासीवाद सम्बंधी अंक पर कृष्ण मोहन की समीक्षा

 


पिछले दिनों नामवर सिंह पर हिन्दी के `विद्वानों` के ताबड़तोड़ लाइव कार्यक्रमों के दौरान किसी ने उनके संपादन में `आलोचना` का पुनर्प्रकाशन शुरू होने पर पहला अंक (फ़ासीवाद और संस्कृति का संकट') फ़ासीवाद पर केंद्रित किए जाने को उनकी प्रमाणिकता के तौर पर पेश किया था। इस अंक पर 2000 में छपी आलोचक कृष्ण मोहन की विस्तृत समीक्षा (उदारवादी भ्रमों का पुलिंदा - आलोचना का फ़ासीवादी अंक) पढ़ी। यह अंक `फ़ासीवाद संबंधी लेखों का दिशाहीन और भ्रामक ढेर` क्यों है, इस पर उन्होंने गंभीरता से विभिन्न लेखों के उदाहरण सामने रखते हुए विचार किया है। यूँ यह एक ज़रूरी बात है कि लेखक जैसा समझता है, उसे ईमानदारी से लिखे पर जैसा कि साहित्य की दुनिया का पावर स्ट्रक्चर है और जवाब में विमर्श के बजाय हिसाब चुकता करने का रिवाज़ है, एक साथ इतने सारे प्रभावशाली और फ़ितरती लेखकों से बेबाकी के साथ तीखी असहमति व्यक्त करन साहस की बात है।

बेहतर तो यह होता कि इस लेख से एक के बाद एक कई हिस्से यहाँ उद्धृत करता या पूरा लेख ही यहाँ देता। फ़िलहाल, लंबा टाइप न कर पाने की स्थिति से यह संभव नहीं है। आलोचना के फ़ासीवादी अंक में एजाज़ अहमद के एक पूर्व प्रकाशित लेख को भी शामिल किया गया था जिसे कृष्ण मोहन सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय मानते हैं और पर विस्तार से बात करते हुए अपनी असहमतियां भी जताते हैं। लेकिन खिन्नता पैदा करने वाले वे हिस्से हैं जिन्हें हिन्दी के विद्वानों के लेखों से लिया गया है। यह अंक `आलोचना` का है लेकिन जो विशेषांक लेखक संगठनों द्वारा निकाले जाते रहे हैं, उनमें भी यही लेखक अपनी फ़ासिस्ट समर्थक, कम्युनल, सेमी-कम्यूनल या सवर्ण अवधारणाओं के साथ उपस्थित रहते आए हैं और सर्व-स्वीकार्य रहे हैं। कृष्ण मोहन इस अंक के संपादक और प्रभाष जोशी के `रेनेसां पर्सन` नामवर सिंह की `मासूम` शिकायत का ज़िक्र भी करते हैं कि पटेल तो नेहरु की बात मान लेते थे पर अटल की बात आड़वाणी नहीं मानते। जसम के विचारक रविभूषण आरएसएस द्वारा ही पेश किए जाते रहे जुमले `वस्तुत; संघ परिवार जिस `हिन्दुत्व``को धर्म मानता है, वह एक जीवन-शैली है`, दोहरा रहे हैं उनके लेख से ऐसे वाक्य उद्धृत कर कृष्ण मोहन जो सवाल उठाते हैं, वे असल में हिन्दी के पूरे बौद्धिक समाज से हैं। प्रभाष जोशी फ़ासीवाद से लड़ने के लिए सनातन धर्म का सहारा लेने और संघ के स्वयंसेवकों से प्रेरणा लेने की सीख देते हैं।

खगेंद्र ठाकुर के लेखन का अद्भुत कमाल तो जलेस के `1857 पर आए विशेषांक` में देखा था। भारतेंदु की जिन पंक्तियों को फेरबदल कर रामविलास शर्मा ने 1857 से जोड़ दिया था, उनका असल रूप वीरभारत तलवार सप्रमाण हिन्दी वालों के सामने रख चुके थे पर खगेंद्र ठाकुर ने उन्हें बदले हुए रूप में ही इस्तेमाल किया। अकारण नहीं कि ऐसे झूठे उद्धरणों और विवादित अवधारणाओं से भरा वह (खगेंद्र ठाकुर का) लेख, उस अंक के कुछ बेहतरीन लेखों का प्रतिपक्ष ही था। फ़ासीवाद सम्बंधी `आलोचना` में छपे खगेंद्र ठाकुर के लेख से कृष्ण मोहन ने कुछ उद्धरण देते हुए लिखा है,-

``खगेंद्र ठाकुर और उनके भाकपाई मित्रों की यह पुरानी कमज़ोरी है कि वे शासक वर्ग से बार-बार उसका अंध-राष्ट्रवादी हथियार उधार मांगते हैं ताकि वे उनसे भी बड़े `राष्ट्रवादी` दिखें और एक ही झटके में पूरे राष्ट्र के नेता बन जाएँ।``

राजकिशोर के लेख से उद्धृत अंश देखिए- ``दुर्भाग्य यह है कि इतिहास फ़ासीवादियों के साथ है। भारत में मुस्लिम शासन के बारे में सेकुलरवादियों का नज़रिया साफ़ नहीं है। वे यह नहीं देख पाते कि शासन जैसा भी रहा हो, मूलत: एक अल्पसंख्यक शासन था। भारत की बहुसंख्या हिन्दुओं की थी, अत: यहाँ का सामंतवाद भी हिन्दू सामंतवाद होना चाहिए।``

इस पर कृष्ण मोहन टिप्पणी करते हैं-

``मध्यकाल के बारे में औपनिवेशिक इतिहास लेखन की इसी साम्प्रदायिक दृष्टि में साझा करने के कारण उदारवाद अपने को कट्टरवाद के सामने कुंठित पाता है। उसे लगता है कि एक बार इस दृष्टि को सर्वस्वीकृति मिल जाए तो वह अपने ही जैसे उदार हिन्दू मन को भूल जाने और माफ़ करने के लिए मना लेगा। उसका सरल चित्त यह नहीं समझ पाता कि वह जितनी बार इस झूठ को शिरोधार्य करता है, उतनी ही बार कट्टरवादी शक्तियों को बल प्रदान करता है। उसकी वह मांग संघ परिवार की उस बुनियादी मांग से अलग नहीं है कि अगर अयोध्या, काशी, मथुरा पर उनका दावा मान लिया जाए तो वे बाकी मसले छोड़ देंगे। सामंतवाद सिर्फ़ सामंतवाद होता है। वह हिन्दू या मुस्लिम नहीं होता। और वह अनिवार्यत: अल्पसंख्यक का शासन होता है। राजकिशोर आधुनिकता की बातें बहुत करते हैं लेकिन धर्म के परदे के पार कुछ देख नहीं पाते। उनकी उदारता उन्हें बहुसंख्यकवाद की वक़ालत तक ले जाती है जो फ़ासीवादियों का एक प्रिय तर्क है। वे इतिहास की न्यूनतम आवश्यक छानबीन भी नहीं करते वरना उनके विश्वास भी ख़ुद ब ख़ुद खंडित हो जाते। संख्या की दृष्टि से उन्हें लगता है कि शासन तंत्र में मुसलमानो का बहुमत होता होगा जबकि मध्यकाल के सबसे मजहबी माने जाने वाले शासक औरंगेजेब के समय उसके सामंतों में लगभग अस्सी प्रतिशत हिन्दू थे।``  

कृष्ण मोहन के लेख से ही हमें विष्णु खरे के इस `जागरूक समर्थन` का पता चलता है - ``सिनेमा, टी.वी. में भारतीय मानव-मूल्य बनाए रखने का बीजेपी का नारा भी प्रबुद्धता से फ़ासिज़्म-विरोध के पक्ष में लेने में कोई हर्ज नहीं है। उनका हिंसा और सेक्स में डूबी अमेरिकी फिल्मो के विरोध का हमें जागरूक समर्थन करना चाहिए।``

खरे के इस आह्वान पर कृष्ण मोहन लिखते हैं, ``इसे कहते हैं प्रबुद्धता और जागरूकता। सिनेमा में `भारतीय` मूल्यों को बचाने के भाजपाई नारे का समर्थन! हिंसा और अश्लीलता अमरीकी मूल्य हैं, भारतीय समाज में हिंसा और अश्लीलता कहाँ। भारतीय संस्कृति के स्वयंभू, लंपट ठेकेदारों के सुर में सुर मिलाने वाले खर साहब किसे धोखा देने चले हैं। सवाल यह है कि भारतीय फ़ासीवाद के सांस्कृतिक एजेंडे का समर्थन करने वाला यह लेख कहीं आलोचना की संपादकीय नीति का हिस्सा तो नहीं है।``

जाहिर है कि इस अंक के संपादक नामवर सिंह की नीति तो कहीं ज़्य़ादा भयानक रही ही है। खरे के बाद के हुसेन पर लिखे गए हमलावर लेख को `अरे, उन्हें क्या हुआ` कहकर हैरान होने वालों को इस टिप्पणी में उनके दिल-दिमाग़ को समझने की कोशिश करनी चाहिए। मीर पर उनके लिखे को भी। इस टिप्पणी में उनके तर्क के आधार पर तो यह भी लगता है कि वे आज होते तो बॉलीवुड में दीपिका वगैराह के ख़िलाफ़ चल रही कार्रवाइयों के `जागरूक समर्थन` में भी खड़े मिल सकते थे।

भगवान सिंह हिन्दी के वामपंथियों के प्रिय लेखक रहे हैं और अपने खुले साम्प्रदायिक लेखन के बावजूद अभी भी हैं। नामवर के फ़ासीवाद सम्बंधी अंक में वे न हों और अपने इसी रंग में न हों तो इस अंक की सार्थकता ही भला क्या होती? कृष्ण मोहन लिखते हैं-

``भगवान सिंह ने अपने लेख में मार्क्सवाद को दुनिया का सबसे नया, वैज्ञानिक और प्राधिकारवादी धर्म माना है तथा `एक ही सामाजिक वातावरण में उपजे होने के कारण` इसे ईसाइयत औऱ इस्लाम के समतुल्य कहा है। साम्प्रदायिकता की आलोचना करने के लिए उन्होंने मार्क्सवादियों की खिंचाई की है। उनका ख़याल है कि इसी वजह से साम्प्रदायिक पार्टियों की ताक़त बढ़ी है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को वे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं, लेकिन `राजनीतिक लाभ` के लिए उसकी बरसी मनाने को उससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण। वे मुसलमानों को भारत में अल्पपसंख्यक नहीं मानते और चिंता व्यक्त करते हैं कि अगर यही रवैया रहा तो भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे। यह लेख शुरू से अंत तक ऐसी ही भ्रामक अवधारणाओं और आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी से भरा पड़ा है।``

असल में भगवान सिंह के लेख की ये अवधारणाएं और `आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी` उनकी अपनी हैं ही नहीं। `मार्क्सवाद भी ईसाइयत और इस्लामियत के समतुल्य धर्म है` या `भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे` जैसी बातें आरएसएस के प्रचारकों के `बौद्धिकों` में प्रमुखता से बताई जाती रही हैं। यहाँ तक कि ऐसे वचनों की कवरेज मैंने ही कई बार की है। यह बात अलग है कि हिन्दी के वामपंथी कवि-लेखक यह जानना-मानना नहीं चाहते हैं।

एक ज़माने के वामपंथी और साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यशालओं के आयोजक पुरुषोत्तम अग्रवाल इन दिनों मुख्य रूप से कबीर विशेषज्ञ हैं। नामवर सिंह पर लाइव श्रृंखला में ही कुछ महीने पहले रामजन्मभूमि शिलान्यस की वेला में उन्होंने घोषणा की थी कि `गुरुजी` की इच्छा के अनुरूप उनकी अगली किताब तुलसी पर होगी। यूँ, कबीर भी उनके लिए तुलसी ही हैं। इस बात को आलोचना के फ़ासीवाद अंक के कबीर खंड में छपे पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेख पर कृष्ण मोहन की यह टिप्पणी पढ़कर समझा जा सकता है-

पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर की कविता को दलितों की पहचान के साथ जोड़ने को अस्मितावाद क़रार देते हुए उसे मूलत: आध्यात्मिक अनुभव की कविता कहते हैं। ``कवि कबीर की संवेदना का सत्य है वह अमरलोक जिसकी कसौटी पर वे जगत के तथ्य को कसते हैं…इस असीमित ब्रह्मांड में अपनी असीमित सत्ता के साथ होने का अनुभव;इस सीमित सत्ता के निस्सीम ब्रह्मांड के साथ सम्बद्ध होने की महिमा का अनुभव। ` `शंभुनाथ ने अपने लेख में समग्र का अंश होने के जिस अनुभव को सामाजिक अनुभव माना है और कबीर की कविता की रहस्यवादी व्याख्या से इनकार किया है, उस श्री अग्रवाल अध्यात्म की चाशनी में लपेटते हैं। इसका नतीज़ा निकालते हुए वे कहते हैं, ``कबीर अपने ख़ास दो-टूक ढंग से बताते हैं कि अनुभव का अपरिहार्य, अंतिम सत्य है मृत्यु। एक नाम-अनाम ही नित्य है बाक़ी सब अनित्य।`` श्री अग्रवाल ने अपने लेख में जिन यथास्थितिवादी आचार्यों को बार-बार कबीर निंदा का दोषी ठहराया है उनका भी विरोध कबीर के सामाजिक सरोकारों से ही था। हाँ, वे इतने कुशल अवश्य ही नहीं थे कि कबीर के नख-दंत तोड़कर उन्हें अपने ब्राह्मणवादी प्रोजेक्ट में शामिल करने की सोचते।

`परख` में छपा यह लेख `आलोचना` में छपता तो क्या हिन्दी विद्वानों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का नज़रिया अपने इन विद्वानों को लेकर कुछ अलग होता? नहीं, क्योंकि ऐसी बातें या तो कही नहीं जातीं और कही जाती हैं तो उन पर चर्चा नहीं की जाती। यह भी कह दिया जाता है कि ऐसी बातें लड़ाई को कमज़ोर करती हैं। हालांकि, रघुवीर सहाय की पंक्ति ``अगर वही हो तुम जिससे तुम लड़ते हो तो लड़ते क्यों हो`` उनके सामने होती है। इस लेख का महत्व यही है कि बातें कही ज़रूर गई थीं। नामवर सिंह और उनके संपादन में निकले उस अंक की याद में `आलोचना` के वर्तमान संपादक चाहें तो इस लेख को अब प्रकाशित कर सकते हैं।