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Tuesday, September 8, 2026

नामवर सिंह पर उर्मिलेश का ऐतिहासिक लेख

जेएनयू में नामवर सिंहः जैसा देखा, जैसा पाया

-उर्मिलेश

(समयांतर के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)



 पिछले दिनों एक किताब आई है-‘जेएनयू में नामवर सिंह।’ इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। संपादन किया है- जेएनयू की पूर्व छात्रा सुमन केशरी ने, जो अब एक वरिष्ठ अधिकारी व कवयित्री हैं। किताब की योजना जब बन रही थी तो राजकमल प्रकाशन के संचालक अशोक माहेश्वरी और सुमन ने इस किताब के लिए मुझसे भी लेख मांगा। उस वक्त, मैं लिख नहीं सका। नामवर जी के संदर्भ में जेएनयू दिनों के अनुभवों को मैं लिखना तो चाहता था पर मुझे लगा, यह एक अभिनंदनात्मक ग्रंथ होगा और उसमें लेख देकर मैं अपने अनुभवों की प्रस्तुति के साथ शायद न्याय नहीं कर सकूंगा। हालांकि किताब छपकर आई तो मुझे अच्छा लगा कि सुमन का संचयन कुल मिलाकर ठीक-ठाक है, उसमें सिर्फ अभिनंदन ही नहीं है।


निस्संदेह, डा. नामवर सिंह एक प्रभावशाली वक्ता और समकालीन हिन्दी समाज एवं उसकी सांस्कृतिक राजनीति में दबदबा रखने वाले प्रतिभाशाली बौद्धिक व्यक्तित्व हैं। वह समय-समय पर अपनी टिप्पणियों और फैसलों से विवाद भी पैदा करते रहते हैं। जैसे हाल ही में उन्होंने आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ टिप्पणी करके सबको स्तब्ध कर दिया। प्रगतिशील लेखक संघ की 75वीं वर्षगांठ पर लखनऊ में आयोजित एक विशेष समारोह में 8 अक्तूबर, 2011 को उन्होंने कहा, ‘आरक्षण के चलते दलित तो हैसियतदार हो गए हैं लेकिन बाम्हन-ठाकुर के लड़कों की भीख मांगने की नौबत आ गई है।‘(दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, 9 और 10 अक्तूबर, 2011, लखनऊ संस्करण)।
अपने समय के एक बड़े ‘प्रगतिशील’ लेखक-आलोचक-शिक्षक की इस टिप्पणी पर समारोह में बैठे लेखक-प्रतिनिधि हैरत में रह गए। कइयों ने लिखकर इसका प्रतिवाद किया। (‘शुक्रवार’, 28 अक्तूबर-3 नवम्बर, 2011 अंक, दिल्ली)।

पुस्तक में नामवर जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को कमोबेश कवर किया गया है। पर कुछेक पहलू छूट गए हैं। उनके एक छात्र (अयोग्य ही सही) और हिन्दी का एक अदना सा पत्रकार होने के नाते मेरे मन में हमेशा एक सवाल कुलबुलाता रहा है, ‘नामवर सिंह ने इतने लंबे समय तक देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्षता की, उसका मार्गदर्शन किया, इसके बावजूद यह केंद्र (उनके कार्यकाल के दौर में) देश में भारतीय भाषाओं के साहित्य व भाषा के अध्ययन-अध्यापन और शोध क्षेत्र में कोई वैसा बड़ा योगदान क्यों नहीं कर सका, जिसकी इससे अपेक्षा की गई थी!

अपने लंबे कार्यकाल के बावजूद वह इसे सही अर्थों में भारतीय भाषाओं का केंद्र क्यों नहीं बना सके?’ चूंकि इस विषय पर मेरा कोई विशद अध्ययन और शोध नहीं है, इसलिए सवाल का कोई ठोस जवाब भी नहीं दे सकता। लेकिन केंद्र के छात्र के तौर पर तक़रीबन चार-सवा चार साल जेएनयू में रहने का मौक़ा मिला, उसके नाते यहां सिर्फ़ अपने कुछ अनुभव बांट सकता हूं।

आज इस लेख के ज़रिए मैं जेएनयू में अपने जीवन के भी सबसे अहम और निर्णायक समय को याद कर रहा हूँ। लेकिन यह कोई मेरी निजी कहानी नहीं है। भारत के शैक्षणिक जगत, खासकर उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी असंख्य कहानियाँ भरी पड़ी हैं। मेरे विश्लेषण से किसी को असहमति हो सकती है पर तथ्यों और उससे जुड़े घटनाक्रमों से नहीं। यह सिर्फ़ मेरा, नामवर जी या जेएनयू के ‘प्रगतिकामी’ हिन्दी प्राध्यापकों-प्रोफे़सरों का ही सच नहीं है, सम्पूर्ण हिन्दी क्षेत्र में व्याप्त बड़े बौद्धिक सांस्कृतिक संकट, कथनी-करनी के भेद, हमारे शैक्षणिक जीवन, खासकर विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के हिन्दी विभागों की बौद्धिक-वैचारिक दरिद्रता का भी सच है। कुछेक को मेरी यह टिप्पणी गै़र-ज़रूरी या अप्रिय भी लग सकती है। ऐसे लोगों से मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। पर मुझे लगा, हिन्दी विभागों, हिन्दी विद्वानों और हम जैसे छात्रों का यह सच सामने आना चाहिए।

शुरुआत जेएनयू में अपने एडमिशन से करता हूं। बात सन 1978 की है। मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए (अंतिम वर्ष) की परीक्षा दी। प्रथम वर्ष में प्रथम श्रेणी के नंबर थे। फाइनल में भी प्रथम श्रेणी आने की उम्मीद तो थी पर अपनी पोजिशन को लेकर आश्वस्त नहीं था। अपने विश्वविद्यालय में उन दिनों पीएच.डी. के लिए सिर्फ एक ही यूजीसी फेलोशिप थी। पहली पोजिशन वाले को ही फेलोशिप मिल सकती थी। डा. रघुवंश के रिटायर होने के बाद विभाग में डा. जगदीश गुप्त का ‘राज’ चल रहा था। वह मुझे पसंद नहीं करते थे। शायद मेरी दो बातें उन्हें नागवार गुजरती रही हों-एक, विश्वविद्यालय की वामपंथी छात्र-राजनीति में मेरी सक्रियता और दूसरी, डा. रघुवंश और दूधनाथ सिंह आदि जैसे शिक्षकों से मेरी बौद्धिक-वैचारिक निकटता।

फेलोशिप के बगैर पीएच.डी. करना मेरे लिए बिल्कुल संभव नहीं था। मेरी पारिवारिक स्थिति बहुत ख़राब थी। ऐसे में मित्रों ने सलाह दी कि इलाहाबाद के अलावा मुझे जेएनयू में भी एडमिशन की कोशिश करनी चाहिए। वहां फेलोशिप भी ज्यादा हैं, इसलिए एडमिशन मिल गया तो फेलोशिप पाने की संभावना भी ज़्यादा रहेगी। मित्रों की सलाह पर जेएनयू में एडमिशन के लिए ‘आल इंडिया टेस्ट’ में बैठा। रिजल्ट आया तो पता चला, मैंने सन 1978 बैच में टॉप किया है। यूजीसी फेलोशिप मिलना तय। लेकिन अभी तक एमए अंतिम वर्ष का मेरा रिजल्ट नहीं आया था।

सन 1975-77 के दौर में इमर्जेन्सी-विरोधी आंदोलनों का हमारे कैम्पस पर भी प्रभाव पड़ा था। परीक्षाएं विलम्ब से हुई थीं, इसलिए रिजल्ट में भी देरी हो रही थी। जेएनयू प्रवेश परीक्षा नियमावली के तहत एमए फाइनल का रिजल्ट आए बगैर भी कोई अभ्यर्थी प्रवेश पा सकता था। लेकिन एडमिशन के बाद एक निश्चित अवधि के अंदर उसे अपना रिजल्ट जमा करना होता था। जेएनयू में एम.फिल. की पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई। मेरे नाम यूजीसी की फेलोशिप भी घोषित हो चुकी थी। भारतीय भाषा केंद्र के उस बैच में जिन अन्य लोगों को फेलोशिप मिली, उनमें रवि श्रीवास्तव, अरुण प्रकाश मिश्र आदि प्रमुख थे। यह सभी मित्र आज किसी न किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या विभागाध्यक्ष हैं।

दर्शनशास्त्र में शोध कर रहे गोरख पांडे का कमरा (संभवतः 356, झेलम होस्टल) मेरा पहला पड़ाव बना। अभी होस्टल नहीं मिला था। वह जितने तेजस्वी दार्शनिक थे, उतने ही सृजनशील कवि और गीतकार थे। फ़कीराना ढंग से रहते थे। किसी बात की परवाह नहीं करते थे। पूरे जेएनयू में अपने कि़स्म के अकेले छात्र थे, बिल्कुल फ़कीर-वामपंथी। उनकी सारी ‘प्राइवेट-प्रापर्टी’ छोटे से तख्त पर बिछे मैले गद्दे के नीचे फैली रहती थी। चाय पीने या कहीं बाहर जाना होता था तो वह गद्दा हटाते और तख्त पर बिखरे रुपयों में कुछ रकम निकाल कर चल देते थे। पांडे जी के जरिए ही जेएनयू स्थित रेडिकल स्टूडेंड्स सेंटर (आरएससी) के छात्रों-कार्यकर्ताओं से परिचय हुआ। आरएससी एक ढीला-ढाला संगठन था, उसमे कार्यकर्ता कम, बुद्दिजीवी ज्यादा थे। पर काफी पढ़े लिखे थे।

उनके कमरों में मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे और कास्ट्रो के अलावा क्रिस्टोफर काडवेल, रेमंड विलियम्स, राल फाक्स, गुन्नार मिरडल, ज्यां पाल सात्र, सिमोन, राल्फ मिलीबैंड, समीर अमीन, रजनी पामदत्त, रोमिला थाफर और इरफान हबीब आदि की किताबें भरी रहती थीं। इनमें कुछ हमारे सीनियर थे और कुछ समकक्ष। जल्दी ही इनसे मैत्री हो गई। इनमें ज्यादातर को मेरे बारे में मालूम था कि इलाहाबाद में मैं एसएफआई से और बाद के दिनों में पीएसए नामक स्वतंत्र किस्म के वामपंथी छात्र संगठन से जुड़ा था। बाद के दिनों में यही पीएसए प्रगतिशील छात्र संगठन (पीएसओ) बना। इलाहाबाद के अलावा जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी यह सक्रिय रहा। पीएसओ से मेरी सम्बद्धता के बावजूद जेएनयू स्थित एसएफआई के दो-तीन नेताओं से मेरा सम्बन्धी अपेक्षाकृत ठीकठाक था।
इनमें प्रवीर पुरकायस्थ प्रमुख थे। वह अपने इलाहाबाद के ‘सीनियर’ थे। अपना कमरा मिलने के बाद मैं गोरख के झेलम वाले कमरे से ब्रह्मपुत्र (पूर्वांचल) होस्टल चला गया। लेकिन मुलाक़ात हमेशा होती रहती थीं। कैम्पस में वह मेरे लिए एक बड़े भाई की तरह थे। पर उनकी कुछ समस्याएं भी थीं। निशात कैसर उनके समकक्ष और मैं बहुत जूनियर था। पर कैंपस में सिर्फ़ हम दोनों ही किसी बात पर उन्हें डांट-फटकार सकते थे। अनेक मौकों पर वह हमारी बात मान भी जाते थे।

केंद्र में एमफिल कक्षाओं और सेमिनार पेपर आदि का दौर शुरू हो चुका था। डा. नामवर सिंह को केंद्र का चेयरमैन पाकर हम जैसे दूर-दराज से आए छात्र गौरवान्वित महसूस करते थे। उन्हें पहले भी (इलाहाबाद और बनारस में) देखा-सुना था। पर यहां तो वह साक्षात् हमारे प्रोफेसर के रूप में सामने थे। निस्संदेह, वह बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। साहित्यिक आलोचना और साहित्येतिहास जैसे विषयों पर उन्हें सुनना एक अनुभव था। इलाहाबाद में मेरे लिए सबसे आदरणीय अध्यापक डा. रघुवंश थे और सबसे अच्छे व दोस्ताना अध्यापक दूधनाथ सिंह। मेरी नजर में पहला एक आदर्शवादी-मानववादी था तो दूसरा सृजनशील यथार्थवादी। पर जेएनयू में डा. नामवर सिंह को सुनने के बाद लगा कि हिन्दी और साहित्येतिहास के मामले में वह ज्ञान के सागर हैं। यूरोपीय साहित्य आदि की भी उनकी जानकारी बहुत पुख्ता है। पर उनके व्यक्तित्व का एक पहलू मुझे बहुत परेशान करता था। वह रहन-सहन और आचरण-व्यवहार में किसी सामंत (फ्यूडल) की तरह नजर आते थे।

केंद्र के कुछेक छात्र उनका पैर छूते थे। कुछ छात्र तो उनके घर के रोजमर्रे के कामकाज में जुटे रहते थे। वह जब चलते, कुछ छात्र और नए शिक्षक उनके पीछे-पीछे चलने लगते। कुछ लोग उनकी बिगड़ी चीजें बनवाने में लगते तो कुछेक ऐसे भी थे, जो नियमित रूप से कैम्पस स्थित उनके फ्लैट जाकर गुरुवर का आशीर्वाद ले आया करते थे। हमारे एक मित्र सुरेश शर्मा ने तो बाकायदा लेख लिखकर बताया है कि नामवर जी की एक खास घड़ी जब खराब हुई तो उसे बनवाने में उन्होंने दिल्ली की खाक छान मारी पर नामवर जी ने सुयोग्य होने के बावजूद जामिया सहित कई जगहों पर हुई नियुक्तियों में उनकी कोई मदद नहीं की। उनसे काफी जूनियर और योग्यता में नीचे के लोगों की नियुक्तियां करा दीं (अभी कुछ ही दिनों पहले पता चला कि उक्त लेख के छपने के कुछ समय बाद सुरेश जी (इस समय उनकी उम्र 57-58 से कम नहीं होगी) वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो गए। संयोगवश, नामवर जी ही विश्वविद्यालय के चांसलर हैं। अगर उनकी पहल पर सुरेश जी नियुक्त हुए तो इसे ‘गुरुवर’ का प्रशंसनीय प्रायश्चित कहा जा सकता है। लेकिन विश्वविद्यालय के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक उनकी नियुक्ति की पहल कुलपति वीएन राय की ओर से हुई।

अपने नामवर जी की तरह इलाहाबाद के डा. रघुवंश ‘मार्क्सवादी’ नहीं, पर छात्रों-शिक्षकों के प्रति नजरिए में वह ज्यादा सहज और लोकतांत्रिक थे। दूधनाथ सिंह तो खैर वामपंथी रहे हैं। दिल्ली के नामीगिरामी मार्क्सवादी (हिन्दी) आलोचकों-शिक्षकों के मुकाबले निजी और प्रोफेशनल जीवन में वह भी ज्यादा सुसंगत और लोकतांत्रिक नजर आते थे। मुझे आज भी याद है। उन दिनों मेरा एक छोटा सा सर्जिकल-आपरेशन हुआ था और मैं डायमंड जुबिली होस्टल के कमरा नंबर 38 में लेटा रहता था। एक दिन अचानक देखा, दूधनाथ और डा. मालती तिवारी मुझे देखने मेरे कमरे में आ गए।

ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं था, दूसरे छात्रों के साथ भी रघुवंश, दूथनाथ या मालती तिवारी जैसे शिक्षकों का व्यवहार आमतौर पर ज्यादा मानवीय और उदार था। कम से कम वे ‘साइकोफैंसी’ को रिश्तों का आधार नहीं बनाते थे। मेरा उनसे विधिवत परिचय एमए प्रथम वर्ष के परीक्षाफल आने के बाद ही हुआ। इसके पहले वह मुझे ठीक से जानते भी नहीं थे। प्रथम वर्ष में जो पेपर वह पढ़ाते थे, उसमें मुझे सर्वोच्च अंक मिले थे। फिर उनसे क्लास के बाहर भी संवाद का सिलसिला बन गया। पर जेएनयू के जनवादी माहौल के बावजूद मुझे कम से कम भारतीय भाषा केंद्र में इस तरह के माहौल का अभाव दिखा।

नामवर जी अपने कुछ ‘खास शिष्यों’ से ही ज्यादा संवाद करते थे। ऐसे लोगों ने गुरुदेव की सेवा का मेवा खूब खाया। इनमें कुछ नामी विश्वविद्यालयों-संस्थानों में हैं तो कुछेक सरकारी सेवा में भी। लेकिन हमारे सीनियर्स में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें प्रतिभाशाली माना जाता था, पर गुरूदेव का शायद उन्हें उतना समर्थन-सहयोग नहीं मिला। इनमें एक, मनमोहन को रोहतक में अध्यापकी से संतोष करना करना पड़ा। उदय प्रकाश ने कुछ समय पूर्वोत्तर में अध्यापकी की, फिर दिल्ली लौट आए। स्वतंत्र लेखन, पत्रकारिता और फिल्मनिर्माण के जरिए उन्होंने हिन्दी रचना जगत में अपनी खास पहचान बनाई। सुभाष यादव को बिहार के किसी कालेज में जगह मिली।


राजेंद्र शर्मा माकपा के अखबार ‘लोकलहर’ के संपादकीय विभाग से जुड़ गए। सुरेश शर्मा ने मेरी तरह पत्रकारिता का रास्ता चुना। विजय चौधरी सृजनशील थे और एक समय नामवर जी के करीबी भी पर बाद में पता नहीं क्या हुआ? जेएनयू से बाहर आकर वह वृत्तचित्र निर्माण से जुड़े। चमनलाल को भी जेएनयू आने के लिए बरसों इंतजार करना पड़ा। संभवतः वह नामवर जी के निष्प्रभावी होने के बाद ही जेएनयू में नियुक्ति पा सके। लंबे समय तक वह पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में पढ़ाते रहे। शुरुआती दिनों में उन्होंने बैंक की नौकरी और फिर जनसत्ता की उप संपादकी की। हमारे समकालीन या बाद के छात्रों में जो केंद्र में समझदार या संभावनाशील समझे जाते थे, उनमें कुलदीप कुमार, नागेश्वर यादव, मदन राय, जगदीश्वर चतुर्वेदी, संजय चौहान, सुधीर रंजन, अजय ब्रह्मात्मज जैसे कई लोग थे। पर इनमें ज्यादातर शायद गुरुदेव को पसंद नहीं थे।

भारतीय भाषा केंद्र में हमारे दूसरे प्रतिभाशाली अध्यापक थे-डा. मैनेजर पांडे। क्लासरूम में ‘चिचिया’ कर पढ़ाने के उनके अंदाज का हम लोग खूब मजा लेते थे। अपने लेखन और अध्यापन के लिए वह मेहनत करते थे। डा. केदारनाथ सिंह काव्य साहित्य ठीकठाक पढ़ाते थे। नामवर जी उन्हें पूर्वी उत्तरप्रदेश के पडरौना के एक डिग्री कालेज से सीधे जेएनयू ले आए थे। दोनों सिंह-बंधु बाद में समधी बने। हमारी एक अध्यापिका थीं-डा. सावित्री चंद्र शोभा। वह नामवर सिंह की अध्यक्षता वाले भारतीय भाषा केंद्र की वाकई शोभा थीं। देश के हिन्दी विभागों के चेहरे का वह प्रतिनिधित्व करती थीं। अगर आपका रसूख वाले लोगों से संपर्क है तो रचनात्मकता, समझ और ज्ञान के बगैर हिन्दी विभागों में नियुक्त होना कितना आसान है, शोभा जी इसका साक्षात उदाहरण थीं। जेएनयू में सभी बताते थे कि शोभा जी को नामवर सिंह ने ही नियुक्त कराया। उनके पति जाने-माने इतिहासकार और यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन डा. सतीश चंद्र के नामवर पर कई तरह के एहसान थे। स्वयं नामवर जी ने इस बारे में अपने एक इंटरव्यू में आधा-अधूरा इसका खुलासा किया है—“मुझे ठीक से याद नहीं है, हिन्दी की नियुक्ति (शोभा जी और सुधेश जी की) मेरे सेंटर में आने के बाद हुई थी या फिर मैं विशेषज्ञ के रूप में आया था। क्योंकि जो चयन समिति हुई थी, संभवतः मेरे आने के बाद हुई थी क्योंकि डा. नगेंद्र विशेषज्ञ थे, एक विशेषज्ञ देवेंद्र नाथ शर्मा थे और मैं अध्यक्ष था।

रीडर और लेक्चरर की दो नियुक्तियां हुईं, जिसमें सुधेश जी और शोभा जी आए।...शोभा जी चूंकि यूजीसी चेयरमैन की पत्नी थीं तो लगभग तय सा था...विनय राय से मैंने कहा कि भाई, मुसीबत में फंस गया हूं। उन्होंने कहा, यूजीसी रुपया देती है, चेयरमैन की बीवी को नहीं रखेंगे तो किसको रखेंगे? किसी तरह निभाइए---बीएम चिंतामणि के पिता जी और हमारे नागचौधरी साहब के पिता जी मित्र थे, पारिवारिक सम्बन्ध थे। इस नाते नागचौधरी जी (जेएनयू के तत्कालीन कुलपति) ने मुझे बुलाकर चिंतामणि जी को टेम्पोरेरी रखने की बात की। द्विवेदी जी के नाते भी चिंतामणि जी को मैंने ले लिया।” (जेएनयू में नामवर सिंहः संपादक-सुमन केशरी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 26-27 और 31)।

जिन लोगों ने उस दौर में जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में अध्ययन-अध्यापन किया या विभाग के बारे में जिनकी तनिक भी जानकारी है, वे आज भी बता सकते हैं कि चिंतामणि जी और शोभा जी की कक्षाओं में जाना या अध्ययन से जुड़े किसी विषय पर उनसे बातचीत करना किस तरह एक दुर्दांत-दुष्कर यात्रा करने जैसा था। ...इस तरह नामवर जी ने जेएनयू जैसे एकेडेमिक एक्सीलेंस वाले संस्थान में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की आधारशिला रखी। हाँ, मैनेजर पांडे के आने के बाद हालात जरूर बदले। वह योग्य-समर्थ शिक्षक साबित हुए। जब मैने एडमिशन लिया तो हिन्दी में नामवर जी, पांडे जी और केदार जी ही केंद्र के तीन स्तम्भ थे। नामवर जी के सुयोग्य-संरक्षण में शोभा-चिंतामणि जी जैसी नियुक्तियां आखिरी नहीं साबित हुईं। डीयू, जेएनयू, जामिया और इग्नू सहित भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में अगर आज शोभा-चिंतामणि जी जैसी प्रतिभाएं हिन्दी विभागों की शोभा बढ़ा रही हैं तो इसमें हिन्दी के अन्य करतबी मठाधीशों के साथ अपने आदरणीय गुरुदेव का भी कम योगदान नहीं है।

जेएनयू में मेरा सब कुछ ठीक चल रहा था। शुरुआती झिझक के बाद मुझे अच्छा लगने लगा। वहां का माहौल, समृद्ध पुस्तकालय, सीनियर छात्रों की बौद्धिक तेजस्विता, बहस-मुबाहिसे का उच्च स्तर, बड़े कुलीन या उच्च मध्यवर्गीय घरों से आए सोशस साइसेंज या इंटरनेशनल स्टडीज के प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियों के बीच पिछड़े इलाकों से आए दलित व पिछड़े वर्ग के अपेक्षाकृत अभावग्रस्त जीवन के आदी रहे प्रखर छात्रों की अच्छी-खासी संख्या, अपेक्षाकृत सहिष्णु माहौल, सस्ता बढ़िया खाना, सात या बारह रुपये में महीने भर का डीटीसी की बसों का रियायती पास, हर रोज तीनमूर्ति होते हुए सप्रू हाउस (मंडी हाउस) जाने वाली जेएनयू की मुफ्त बससेवा, झेलम लान और गोदावरी के पास वाले टी-स्टाल की शामें, रात को होने वाली छात्र-सभाएं, संगोष्ठियां और बहस-मुबाहिसे, सबकुछ मुझे अच्छा लगने लगा। अलग-अलग होस्टल में होने के बावजूद पांडे जी, निशात कैसर, चमनलाल, मदन राय, आनंद कुशवाहा, कोदंड रामा रेड्डी, अशोक टंकशाला, वी मोहन रेड्डी, जे मनोहर राव, डी रविकांत और ए चंद्रशेखर जैसे समान सोच के मित्रों से अक्सर ही मुलाकात होती रहती थी। थोड़ी-बहुत छात्र-राजनीति की गतिविधियां भी शुरू हो गईं।

हमारे केंद्र में पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई थी। एम फिल के शुरुआती दिनों में कक्षाएं भी चलती हैं। फिर सभी छात्र सेमिनार पेपर-टर्म पेपर की तैयारी में जुट जाते हैं और अंत में डिसर्टेशन पर काम शुरू करते हैं। मैं नामवर जी, केदार जी और पांडे जी की कक्षाएं या सेमिनार आदि कभी नहीं छोड़ता था। लेकिन नामवर जी के मुकाबले पांडे जी से मेरी निकटता बढ़ रही थी। डा. शोभा की क्लास में जाना और लगातार बैठे रहना दर्द के दरिया से गुजरने जैसा था। एक दिन मैं किसी क्लास से निकलकर जा रहा था कि चेयरमैन आफिस के एक क्लर्क ने आकर कहा कि डा. नामवर सिंह आपको चैम्बर में बुला रहे हैं। मैं अंदर दाखिल हुआ तो देखा कि नामवर जी के साथ केदार जी भी वहां बैठे हुए हैं। नामवर जी ने बड़े प्यार से बैठने को कहा। पहले थोड़ी बहुत भूमिका बांधी, ‘ आप तो स्वयं वामपंथी हो और यह जानते हैं कि आप और हमारे जैसे लोगों के लिए जाति-बिरादरी के कोई मायने नहीं होते। पर भारतीय समाज में सब किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। आप तो ठाकुर हो न?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ एक शब्द का मेरा जवाब सुनकर नामवर जी और केदार जी शांत नहीं हुए। अगला सवाल था, ‘फिर क्या जाति है आपकी, हम यूं ही पूछे रहे हैं, इसका कोई मतलब नहीं है।’
मैंने कहा, मैं एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुआ हूं। पर दोनों को इससे संतोष नहीं हुआ तो मुझे अंततः अपने किसान परिवार की जाति बतानी पड़ी। आखिर गुरुओं को कब तक चकमा देता! जाति-पड़ताल में सफल होने के बाद नामवर जी ने कहा, ‘ अच्छा, अच्छा, कोई बात नहीं। जाइए, अपना काम करिए।’ बीच में केदार जी ने भी कुछ कहा, जो इस वक्त वह मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। ऐसा लगा कि दोनों गुरुदेवों का जिज्ञासु मन शांत हो चुका है। इस घटनाक्रम से मैं स्तब्ध था। जेएनयू में अब तक किसी ने भी मेरी जाति नहीं पूछी थी। अपने बचपन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में लोगों को किसी अपरिचित से उसका नाम, गांव और जाति आदि पूछते देखा-सुना था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरी जाति पूछकर या जानकारी लेकर किसी को क्या मिल जाएगा या उसका कोई क्या उपयोग कर सकेगा? मैं चकित था कि जेएनयू के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों की अचानक मेरी जाति जानने में ऐसी क्या दिलचस्पी हो गई!


मैं इस वाकये को भुलाने की कोशिश करता रहा। दूसरे या तीसरे दिन गोरख पांडे से जिक्र किया तो किसी विस्मय के बगैर उन्होंने कहा, ‘अरे भाई, इसे लेकर आप इतना परेशान क्यों हैं? नामवर जी को लेकर कोई भ्रम मत पालिए। वह ऐसे ही हैं।‘ पर मुझे लगा----और आज भी लगता है कि नामवर जी निजी स्वार्थवादी और गुटबाज ज्यादा हैं। जहां तक जाति-निरपेक्षता का सवाल है, हिन्दी क्षेत्र के अनेक ‘प्रगतिकामियों’ की तरह उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाय! पिछले दिनों, लखनऊ और दिल्ली में उन्होंने दलित-पिछड़ा आरक्षण के खिलाफ जिस तरह की टिप्पणियां कीं, उससे भी उनके मिजाज का खुलासा होता है। लेकिन जेएनयू में एआईएसएफ वाले उन्हें अपना ‘फ्रेंड-फिलास्फर-गाइड’ मानते थे। जेएनयू की छात्र-राजनीति में एआईएसएफ वालों की हालत आज बहुत पतली है। एक छात्र के तौर पर मैं नामवर जी को जितना समझ पाया, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उन्हें दो तरह के लोग पसंद हैं—वे, जो किसी विचार के हों या न हों, उनके चाटुकार हों, उनका निजी कामकाज कर दें और जरूरी चीजें लाते रहें और दूसरे, वे जो कुछ पढ़े-लिखे हों, जो उनका गुणगान करें या उनके बौद्धिक-साहित्यिक प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ अपने लेखन या संगोष्ठी-सेमिनार आदि में तलवारें भांज सकें।

चूंकि, मैं उनके ‘गुट’ का कभी हिस्सा नहीं था और इन दोनों श्रेणिय़ों में फिट नहीं बैठता था, इसलिए शायद उन्होंने मेरी जाति जानने में दिलचस्पी दिखाई होगी। वह स्वयं भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही तो हैं, जहां गांव-कस्बों में किसी की जाति पूछना सामान्य सी बात मानी जाती रही है। अगर नामवर जी सिर्फ भाकपावादी होते तो प्रतिबद्ध और ईमानदार भाकपाई और समर्थ कवि डा. रामकृष्ण पांडे को जेएनयू में लेक्चरशिप मिल जानी चाहिए थी। पर पांडे जी को वहां नौकरी नहीं मिली, उन्होंने ताउम्र न्यूज एजेंसी ‘वार्ता’ में डेस्क पर काम किया और असमय ही दिवंगत हो गए। कई अन्य छात्र, जो एआईएसएफ से सम्बद्ध थे, ठीकठाक होने के बावजूद जेएनयू में नौकरी नहीं पा सके। सिर्फ उन्हीं भाकपाई-छात्रों को उन्होंने दिल्ली या बाहर के विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में नौकरियां दिलवाईं, जो थोड़े-बहुत प्रभावशाली या उनके किसी काम के थे या फिर ‘चंगू-मंगू’ की तरह उनके आगे-पीछे लगे रहते थे।

केंद्र की ‘एडमिशन-लिस्ट’ देखकर भी उनकी पसंद को समझा जा सकता है। एक उदाहरण देखिए, सन 1980 की एम फिल एडमिशन-लिस्ट में पहली से पाचवीं पोजिशन पर एक से बढ़कर एक आए। पर कुलदीप कुमार को कुल 20 छात्रों की सूची में 14वीं पोजिशन पर रखा गया ताकि उन्हें फेलोशिप कभी न मिल सके। वह सृजनशील थे। अंततः उन्हें जेएनयू छोड़कर जाना पड़ा। कई साल वह जर्मन रेडियो मे रहे। अब वह ‘द हिन्दू’ सहित देश के कई प्रमुख अखबारों में सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर स्तम्भ लिखते हैं।

यह बताना यहां जरूरी है कि मैंने अपना लेखन ‘उर्मिलेश’ नाम से शुरू किया पर स्कूल रजिस्टर में मेरा नाम ‘उर्मिलेश सिंह’ था, जो विश्वविद्यालय के समय तक हर आधिकारिक रिकार्ड में बना रहा। मेरे पासपोर्ट में भी यही नाम रहा है। पर मुझे विश्वविद्यालय या बाहर, हर कोई उर्मिलेश नाम से ही पुकारता रहा है, कोई उर्मिलेश सिंह या मिस्टर सिंह नहीं कहता रहा है। सरनेम के तौर पर यह ‘सिंह’ मेरे नाम के साथ कैसे आ चिपका, इसकी भी एक कहानी है। गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिले के वक्त पिता जी मुझे स्कूल लेकर गए थे। वह अद्भुत व्यक्ति थे, गरीब, निरक्षर पर ज्ञानवान। स्कूल के हेडमास्टर संभवतः उन दिनों ताड़ीघाट के पास के गांव मेदिनीपुर के मिसिर जी थे। वह हमारे गांव के पिछड़े समुदाय के लोगों से बहुत चिढ़ते थे। कहा भी करते थे, ‘अबे, अहीर-गड़ेरी पढ़ाई करके क्या करेंगे, जाकर भैंस, गाय, भेड़ चराएं!’ लेकिन गरीब किसान होने के बावजूद मेरे पिता और मेरे परिवार की आसपास के इलाके में प्रतिष्ठा थी। पिता जी राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय थे, गांव के दलितों-पिछड़ों के बीच उनकी अच्छी पकड़ थी।

बड़े भाई पढ़ने में तेज थे और पूरे क्षेत्र में हाकी के जाने-माने खिलाड़ी भी। मिसिर जी हमारे परिवार वालों को बाकी यादवों से ज्यादा ‘सभ्य’ समझते थे। शायद , कुछ अलगाने के लिए ही उन्होंने मेरे नाम में ‘सिंह’ सरनेम जोड़ दिया। पिता जी को भी नहीं बताया, उनसे सिर्फ यही पूछा कि बच्चे का क्या नाम रखा है, पिता जी ने कहा, उर्मिलेश। सिर्फ मेरे नाम के साथ ही उन्होंने खेल नहीं किया, मेरे पिता का नाम था-सरजू सिंह यादव तो उन्होंने लिख दिया-सूर्य सिंह। नामों का संस्कृतीकरण! मेरा उर्मिलेश नामकरण भी दिलचस्प ढंग से हुआ था। मेरे बड़े भाई जब ग्यारहवीं या बारहवीं में पढ़ते थे तो मेरा जन्म हुआ। वह मां-पिता की पहली संतान थे और मैं आखिरी। बीच में मेरे दो-तीन भाई-बहन हुए पर वे जिंदा नहीं रह सके। कुछ तो पैदाइश के वक्त ही मरे थे। मेरी पैदाइश से पहले एक भाई, जिसका नाम मुसाफिर था, कुछ बड़ा होकर मरा। उन दिनों गांव में डाक्टर या अस्पताल आदि की सुविधा नहीं थी। उससे भी बड़ी समस्या परिवार की गरीबी थी।

मैं जब पैदा हुआ तो बचने की उम्मीद कम थी। मां ने बचपन में बताया था कि मेरा वजन बहुत कम था, जो भी देखता, कहता, यह भी शायद ही बचे। पर मैं बच गया। उधर, मेरे बड़े भाई साहब, इस बार बहन पाने की उम्मीद लगाए थे पर मिल गया भाई। उन्होंने अपनी संभावित बहन का नाम भी तय कर रखा था-उर्मिला। वह साहित्य खूब पढ़ते थे। उन दिनों मैथिलीशरण गुप्त की किताब ‘साकेत’ पढ़ रहे थे, जिसमें उर्मिला का चरित्र बहुत उभरकर सामने आता है। जब भाई पैदा हुआ तो उन्होंने नाम रख दिया-उर्मिलेश। स्कूल में नामांकन के वक्त हेडमास्टर मिसिर जी की कृपा से मैं उर्मिलेश सिंह हो गया। नामांकन के वक्त पिता जी के साथ भाई साहब होते तो शायद मिसिर जी को मेरे और पिता जी के नाम के साथ मनमानी करने का मौका नहीं मिला होता। मेदिनीपुर वाले मिसिर जी की यही खुराफात शायद वर्षों बाद डा. नामवर सिंह जैसे ‘दिग्गज मार्क्सवादी आलोचक’ के ‘कन्फ्यूजन’ का कारण बनी।

जेएनयू मे दाखिले के कुछ ही समय बाद, मुझे बैरंग इलाहाबाद लौटना पड़ा, जहां मित्रों के सहयोग से मैंने सत्र के शेष दिन बिताए। मेरा ज्यादा वक्त अपनी निजी पढ़ाई-लिखाई और पीएसओ की गतिविधियों को समर्पित रहा। दाखिला रद्द होने की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं। पहले वाकये की तरह, एक दिन अचानक नामवर जी ने मुझे अपने चैम्बर में बुलवाया। इस बार वह अकेले थे। मैं डरते-डरते गया, इस बार पता नहीं क्या पूछेंगे? चैम्बर में दाखिल होते ही उन्होंने पूछा, उर्मिलेश जी, आपका एमए फाइनल का रिजल्ट अभी आया कि नहीं? मैंने कहा, नहीं सर। बस आने वाला है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन छात्रों की सूची मांगी है, जिन्होंने अब तक अपना फाइनल रिजल्ट नहीं जमा किया है। भारतीय भाषा केंद्र से उसमें आपका नाम जा रहा है। नियमानुसार, आपका एडमिशन रद्द हो जाएगा।

मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। उनके चैम्बर से उदास मन लौटा। कुछ दिनों पहले, नामवर जी से उनके चैम्बर में हुई पिछली मुलाकात याद आने लगी। उस दिन मैं बेहद परेशान रहा। उन दिनों बाहर से फोन आदि करके सारी जानकारी ले पाना कठिन था, इसलिए मैं अगले ही दिन मैं अपर इंडिया एक्सप्रेस से इलाहाबाद के लिए रवाना हो गया। विभाग में सबसे मिला। रजिस्ट्रार से भी बातचीत हुई। सबने कहा, रिजल्ट जल्दी ही आ जाएगा। मैंने विभाग से एक परिपत्र भी ले लिया, जिसमें लिखा था कि उर्मिलेश सिंह फाइनल के छात्र हैं और इनका परीक्षाफल आने वाला है। कृपया इन्हें अपेक्षित सहयोग और मोहलत दी जाय। लेकिन दिल्ली में नामवर सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने मेरे एडमिशन को रद्द कराने की प्रक्रिया शुरू करा दी। केंद्र की स्टूडेंट्स फैक्वल्टी कमेटी (एसएफसी) के कुछ छात्र-सदस्य भी चाहते थे कि मेरा एडमिशन जल्दी रद्द हो जाय। इसके दो फायदे थे। एडमिशन के लिए ‘वेटिंग’ में पड़े किसी एक छात्र का एडमिशन हो जाता और किसी एक एडमिशन ले चुके छात्र को मेरी वाली यूजीसी फेलोशिप मिल जाती।

इनमें कुछेक एसएफसी सदस्य नामवर जी के पटु शिष्य थे। कोशिश की गई कि मेरे एडमिशन रद्द किए जाने के मामले में छात्र संघ (एसएफआई-एएसएफआई नियंत्रित) की तरफ से कोई पंगा न हो। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि सितम्बर के अंतिम सप्ताह से ही मेरे एडमिशन पर खतरे के बादल मंडराने लगे। कुछ छात्र नेताओं ने प्रवीर दा के कहने पर मेरे मामले में विश्वविद्यालय-उच्चाधिकारियों से बातचीत भी की। कुछ दिनों की मोहलत मिली लेकिन मेरा रिजल्ट उस वक्त तक नहीं आया और जहां तक मुझे याद आ रहा है, अंततः अक्तूबर में मुझे केंद्र से बोरिया-बिस्तर बांधने को कह दिया गया। हालांकि एडमिशन रद्द करने सम्बन्धी औपचारिक परिपत्र नवम्बर,1978 में जारी किया गया। बाद में पता चला कि जेएनयू के कुछ अन्य केंद्रों में भी ऐसे मामले सामने आए। रूसी अध्ययन केंद्र में कम से कम दो छात्रों को, जिनका रिजल्ट मेरी तरह लंबित था, उन्हें जनवरी, 79 के पहले सप्ताह तक की मोहलत दी गई। केंद्र के छात्र रह चुके डा. कैसर शमीम ने बाद के दिनों में इस बात की पुष्टि की। वह उन दिनों केंद्र और भाषा संकाय की कई शैक्षणिक-प्रशासनिक इकाइयों में छात्र-प्रतिनिधि के तौर पर शामिल थे। जिनको मोहलत मिली, वे भाग्यशाली रहे। उनका मेरी तरह एक साल बर्बाद नहीं हुआ। पर इसके लिए मैं नामवर जी पर कोई दोषारोपण नहीं कर रहा हूं।

उन्होंने तो बस ‘नियमों का पालन करते हुए’ मेरा एडमिशन रद्द करा दिया। ...और मोहलत पाने की उनसे अपेक्षा भी नहीं थी। कुछ ही दिनों बाद, मैं इलाहाबाद लौट आया। छात्र-राजनीति में सक्रियता के अलावा ‘वर्तमान’ नाम से हम लोगों ने एक पत्रिका भी निकाली थी। इसके संपादक मंडल में मेरे अलावा रामजी राय और राजेंद्र मंगज थे। कृष्ण प्रताप सिंह (दिवंगत केपी सिंह) और विभूति नारायण राय (तब तक आईपीएस हो चुके थे) पर्दे के पीछे से हमारी पत्रिका के प्रमुख संसाधक थे। पत्रिका का दफ्तर मेरे कमरे से चलता था। इसके अलावा एक स्टडी सर्किल भी हम लोग चलाते थे, जिसमें विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों के अलावा बीच-बीच में कुछ तरक्कीपसंद वकील, पत्रकार, कवि-लेखक और अन्य प्रोफेशनल्स भी आते रहते थे। इसके कुछेक हिस्सेदार आज देश के जाने-माने न्यायविद्, नौकरशाह, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और लेखक-कवि हैं।
अगले साल, यानी 1979 में जेएनयू में एम.फिल्.-पीएचडी के दाखिले के लिए फिर से फार्म भरा।

परीक्षाफल आया तो ज्यादा निराशा नहीं हुई। मेरा एडमिशन हो गया, इस बार कुल 20 छात्रों की सूची में तीसरी पोजिशन थी। फेलोशिप मिलना तयशुदा था। उन दिनों भारतीय भाषा केंद्र में कम से कम तीन या चार फेलोशिप आसानी से मिल जाती थीं। शुरू में लगा था कि पता नहीं, इस बार मेरा एडमिशन होगा कि नहीं, पर कई लोगों ने सही ही कहा कि पिछले साल के अपने टापर को केंद्र एडमिशन से वंचित कैसे रखता? मेरा पेपर और इंटरव्यू भी अच्छे हुए थे। एमए फाइनल का परीक्षाफल भी आ चुका था, 65.5 फीसदी अंकों के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने विभाग में मेरी दूसरी पोजिशन थी। इधर, जेएनयू में तीसरी पोजिशन मिली। जहां तक मुझे याद आ रहा है कि पहली पोजिशन इस बार पुरुषोत्तम अग्रवाल की थी। दूसरे स्थान पर संभवतः पटना विश्वविद्यालय से आए रामानुज शर्मा रहे। पुरुषोत्तम ने जेएनयू से ही एमए किया था और नामवर जी के प्रिय शिष्य के अलावा एएसएफआई के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। पढ़ने-लिखने और बोलने में भी तेजतर्रार थे। पुरुषोत्तम पहले डीयू और फिर जेएनयू में कई साल शिक्षण कर
ने के बाद संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य बने। उन्होंने कबीर पर अच्छा काम किया। नामवर जी के प्रिय और समझदार शिष्यों में उनके अलावा कुछ और नाम याद करना चाहें तो वीरभारत तलवार का नाम लिया जा सकता है।
वीरभारत अच्छे रिसर्चर रहे लेकिन व्यक्ति, शिक्षक-प्रशासक, दोनों स्तर पर उन्होंने जेएनयू को निराश ही किया। रामानुज जी मितभाषी थे और नंद किशोर नवल के करीबी थे, बातचीत में अक्सर उनका उल्लेख किया करते थे। नवल जी संगठन और विचार के स्तर पर नामवर जी के सहयोगी और बहुत करीबी रहे। रामानुज और मुझे एक ही होस्टल में आसपास कमरा मिला था। बाद में मुझे महानदी (मैरिड होस्टल) मिल गया तो पत्नी के साथ रहने लगा। इसी होस्टल में दिग्विजय सिंह (अब दिवंगत), बाबूराम भट्टराई (नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री) और हिसिला यमी, विमल और सुखदेव थोरट भी रहा करते थे। बहरहाल, नए सत्र में मैंने एमफिल डिसर्टेशन के लिए राहुल सांकृत्यायन पर काम करने का फैसला किया। मेरे गाइड थे-डा. मैनेजर पांडे। फरवरी, 1982 में मुझे एमफिल एवार्ड हो गई। पीएचडी के लिए डा पांडे के ही निर्देशन में ‘प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में वैचारिक संघर्ष (सन 1946-54)’ विषय पर काम शुरू कर दिया था।

फेलोशिप के पैसों से हम लोगों का काम यहां आराम से चल जाता था। कभी-कभी मां को भी मनीआर्डर से पैसे गांव भेजा करता था। पढ़ाई के साथ छात्र-राजनीति में भी मेरी सक्रियता बढ़ चुकी थी। जेएनयू में पीएसओ का मैं संयोजक या सचिव भी रहा। कुछ समय के लिए पीएसओ की दिल्ली राज्य कमेटी का भी पदाधिकारी था। सन 80 या 81 में मैंने डीएसएफ (पीएसओ-आरएसएफआई का मोर्चा) के बैनर तले जेएनयू छात्रसंघ के महासचिव पद का चुनाव भी लड़ा। एसएफआई-एआईएसएफ गठबंधन की नमिता सिन्हा से चुनाव तो मैं हार गया पर एक नया रिकार्ड भी बना। नौ सौ या एक हजार की छात्र संख्या वाले जेएनयू में संभवतः मुझे 289 वोट मिले। सीपीआई-सीपीएम धारा से बाहर के स्वतंत्र वामपंथी खेमे के किसी उम्मीदवार को जेएनयू में अब तक इतना वोट कभी नहीं मिला था।

सन 1983 की गर्मियों में जेएनयू की पहाडियां नारों से गूंजने लगीं। डाऊन से अप कैम्पस तक, पूरा विश्वविद्यालय पोस्टरों-बैनरों से पट चुका था। केंद्र सरकार के दबाव में विश्वविद्यालय प्रशासन ने जेएनयू की प्रगतिशील और सामाजिक न्याय-पक्षी प्रवेश नीति को बदलने का एलान कर दिया। छात्रों की तरफ से इसकी जबर्दस्त मुखालफत हुई। छात्रसंघ के नेतृत्व ने शुरू में थोड़ी ना-नुकूर की पर बड़ा आंदोलन छेड़ने की छात्रों की भावना को देखते हुए वह भी समर्थन में आ गया। जेएनयू के इतिहास में वैसा आंदोलन न पहले कभी हुआ और न आज तक देखा गया। इसमें तीन सौ से ज्यादा छात्र तिहाड़ जेल भेज दिए गए। इनमें नब्बे फीसदी देश के विभिन्न राज्यों से आकर जेएनयू में पढ़ रहे प्रथम श्रेणी के प्रतिभाशाली छात्र थे। इनमें कइयों ने तो आईएएस जैसी सिविल सर्विस परीक्षाएं भी उत्तीर्ण कर ली थीं।

राजनीतिक हस्तक्षेप और बहुदलीय दबाव के बाद प्रशासन ने छात्रों पर लंबित मामलों को बिना शर्त वापस कर लिया पर आंदोलन की नेतृत्वकारी टीम के संभवतः 17 छात्रों को कुछ समय के लिए (एक साल से तीन साल) के लिए कैम्पस से बाहर कर दिया गया। इनमें मैं भी शामिल था। आंदोलन छिड़ने से पहले मैं अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करने की तैयारी कर रहा था। एनसीईआरटी के पास एक टाइपिस्ट से शोध-प्रबंध के अध्यायों को क्रमवार टाइप करने को लेकर बात भी हो चुकी थी। अब पीएचडी भी लटक गई। खाने-पीने और रहने के लाले पड़ गए। फेलोशिप से वंचित हो चुके थे। पत्नी घर चली गईं। कुछ दिनों बाद मैं भी घर गया। लेकिन वहां क्या करता, जल्दी ही दिल्ली लौट आया। विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने हम जैसों के हालात पर चिंता जताई। सहयोग का आमंत्रण भी दिया। लेकिन इस घटना के बाद गुरुदेव नामवर ने मुझसे कभी नहीं पूछा कि तुम क्या कर रहे हो या आगे की जिन्दगी के लिए क्या योजना है? जेएनयू के डाउन कैम्पस के एक कर्मचारी फ्लैट में ईश, शशिभूषण और राहुल जैसे कुछ दोस्त रह रहे थे। मैंने भी वहीं डेरा डाला।

एक दिन अचानक विश्वविद्यालय के एक शीर्ष अधिकारी की तरफ से मुझे उनके एक परिजन ने संदेश दिया कि आप अगर एक पंक्ति में लिख कर दे दें कि ‘9 मई, 83 को जो कुछ हुआ, उसके लिए मुझे खेद है’ तो आपको फिर से कैम्पस में इंट्री मिल जाएगी, फेलोशिप जारी रहेगी और आप अपनी पीएच.डी. थीसिस जमा करा सकेंगे। जिन सज्जन ने मुझे यह संदेश दिया, वह उन दिनों राजस्थान में काम करते थे। मैंने विनम्रतापूर्वक कहा कि ऐसा मैं नहीं कर सकता। हम लोगों ने अन्याय के विरोध में आंदोलन किया था, उस पर खेद प्रकट करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर विश्वविद्यालय प्रशासन मेरे परिवार की खराब आर्थिक स्थिति और मेरे कथित उज्ज्वल एकेडेमिक भविष्य के प्रति इतना संवेदनशील है तो उसे इस तरह की कोई शर्त ही नहीं रखनी चाहिए।

कुछ समय बाद, मैं दिल्ली में सामाजिक-राजनीतिक कामकाज करते हुए लेखन-अनुवाद आदि से अपनी आर्थिक जरुरतें पूरा करने में जुट गया। लेकिन यह आसान नहीं था। मैं किसी पार्टी का होलटाइमर तो था नहीं। आय या गुजारे का कोई और स्रोत भी नहीं दिख रहा था। घर चलाने के लिए जितनी जरूरत थी, वह हिन्दी में फ्रीलांसिंग से संभव नहीं दिख रही थी। मई, 83 के ‘भूचाल’ से पहले भी मैं लेक्चरशिप पाने की कोशिश करता आ रहा था, सन 81-82 से ही लगातार रिक्तियां देखकर आवेदन कर देता। पर कभी इंटरव्यू में छंट जाता तो कभी काल-लेटर ही नहीं आता। जहां तक मुझे याद आ रहा है, तब मैं जेएनयू में पीएचडी कर रहा था और एमफिल एवार्ड हो चुकी थी। एक दिन मैनेजर पांडे डाउन कैम्पस बस स्टैंड पर मिल गए। उन्होंने पूछा, ‘ अरे भाई, आपने कुमायूं विश्वविद्यालय में अप्लाई किया है न!’ मैंने कहा, ‘किया है सर।’ उन्होंने बताया कि ‘डा. नामवर सिंह ही वहां एक्सपर्ट के रूप में जा रहे हैं।

मैने उनसे काफी कहा है कि आपको नौकरी की बहुत जरूरत हो। शुरू में तो उन्होंने ज्यादा रूचि नहीं दिखाई पर मेरे जोर देने के बाद अब वह तैयार हो गए हैं। आप जरूर जाइए वहां, इस बार आपकी नौकरी हो जाएगी।‘ नैनीताल आने-जाने और रहने के खर्च आदि का इंतजाम कर मैं इंटरव्यू देने नैनीताल चला गया। वहां गिर्दा, पीसी तिवाड़ी और प्रदीप टाम्टा जैसे मित्रों के सहयोग से एक यूथ होस्टल में कमरा भी मिल गया था। इंटरव्यू शानदार हुआ। नामवर जी के अलावा दक्षिण के किसी विश्वविद्यालय से कोई पांडे या शर्मा जी वहां एक्सपर्ट बनकर आए थे। आधुनिक साहित्य में विशेषज्ञता वाले अभ्यर्थी के लिए यह पद था। इस नाते भी मेरा पलड़ा भारी दिख रहा था। पर सारा अंदाज गलत साबित हुआ। कुछ दिनों बाद पता चला कि कुंमायूं में भी मेरा नहीं हुआ। किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हुई, जिसका काम मध्यकालीन साहित्य पर था। इसके बाद मैं बेहद दुखी और निराश हो गया।

सन 83 की घटना के बाद लेक्चरशिप पाने की कोशिश एक बार फिर शुरू की। मेरे साथ के कई मित्रों को लेक्चरशिप मिल गई थी। उनमें कई मेरिट के हिसाब से मुझसे नीचे थे। उनमें कइयों के अंदर शिक्षक बनने की कोई बलवती इच्छा भी नहीं दिखती थी, जबकि मेरे अंदर इलाहाबाद के दिनों से ही एक समर्थ शिक्षक बनने का सपना पलता आ रहा था। इसी सपने के चलते मैंने सिविल सर्विसेज(आईएएस-आईपीएस) की परीक्षा में बैठने की अपने बड़े भाई की सलाह मानने से इंकार कर उनकी नाराजगी मोल ली थी। वैसे भी मेरे वाम मन-मानस को सरकारी सेवा में जाना गवारा नहीं था। विश्वविद्यालय से निकलने के बाद भी मुझे कुछ समय तक लगता था कि कहीं न कहीं मुझे लेक्चरशिप मिल जाएगी। नामवर जी की ताकत से मैं वाकिफ था। विश्वास था कि मैनेजर पांडे जरूर उन पर दबाव बनाएंगे। दिल्ली के हर कालेज, विश्वविद्यालय, यहां तक कि बाहर के संस्थानों के हिन्दी विभागों में स्थानीय प्रबंधन, सत्तारूढ़ राजनेताओं या नामवर जी की मंडली के प्रोफेसरों का ही दबदबा था। मैं चारों तरफ से गोल था। सिर्फ मैनेजर पांडे ही एक थे, जो जमा-जुबानी समर्थन करते थे। मेरे सामने अस्तित्व का संकट था। एक बच्चा भी अब परिवार से जुड़ चुका था। डाउन कैम्पस के उस कर्मचारी फ्लैट से हटने के बाद विकासपुरी के ए ब्लाक में एक कमरे का एक सेट किराए पर लिया। गांव से परिवार भी ले आया।

सन 1985 आते-आते मुझे लगने लगा कि अब लेक्चरशिप के लिए ज्यादा इंतजार ठीक नहीं। मुझे विकल्प तलाशने होंगे। नियमित रोजगार के नाम पर कुछ ठोस नहीं दिखा तो जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, प्रतिपक्ष, युवकधारा, शान-ए-सहारा, अमर उजाला, और अमृत प्रभात जैसे पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित ढंग से लिखना शुरू कर दिया। जनसत्ता, नभाटा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमृत प्रभात आदि के काम से घर के किराए की राशि निकालने की कोशिश करता, जबकि प्रतिपक्ष के नियमित भुगतान से महीने भर के दूध का भुगतान हो जाया करता था। उन दिनों प्रतिपक्ष के संपादक विनोद प्रसाद सिंह थे और उसका दफ्तर था, तुगलक क्रीसेंट स्थित जार्ज फर्नांडीस का सरकारी बंगला। विनोद बाबू से मेरी मुलाकात संभवतः जेएनयू के एक मेरे मित्र अजय कुमार ने कराई थी, जो आजकल बड़े आयकर अधिकारी हैं। प्रतिपक्ष के आखिरी पेज पर एक कालम छपता था, फू-नुआर का बैंड। वह खाली हो गया था।

उसके लेखक शायद पत्रिका से अलग हो गए थे। उसके बाद लगभग दो साल मैंने वह कालम लिखा, जिसका मुझे नियमित भुगतान मिल जाता था। इस दौर में जनसत्ता के मैगजीन संपादक मंगलेश डबराल, पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता आनंदस्वरूप वर्मा, प्रख्यात कवि व पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रो. डी प्रेमपति, सुरेश सलिल और विनोद प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ लोगों से मुझे सहयोग-समर्थन मिला। जनसत्ता में लगातार लिखने के बावजूद प्रभाष जोशी ने मुझे वहां नौकरी नहीं दी। शायद, उन्हें मेरे बारे में जो सूचनाएं मिली होंगी, उससे उन्होंने मुझे जनसत्ता में नौकरी के लायक नहीं समझा होगा। मेरी अर्जी खारिज हो गई पर उन्हें मेरे वहां छपने से शायद कोई एतराज नहीं था। ‘खोज खबर’, ‘खास खबर’ और ‘रविवारी जनसत्ता’ के लिए लगातार लिखा। मेरे घर में पहला ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी सेट ‘जनसत्ता’ के पारिश्रमिक के पैसे से ही आया।

कुछ समय मैं पीयूसीएल की दिल्ली कमेटी में भी सक्रिय रहा। तब इंदर मोहन उसके महासचिव थे। राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष वी एम तारकुंडे थे। बाद में गोबिन्द मुखौटी की अगुवाई में पीयूडीआर बना। बेरोजगारी और फ्रीलांसिंग के शुरुआती दिनों में मैं विकासपुरी के बाद पुष्प विहार और लोधी रोड कांप्लेक्स के सरकारी आवासों में किराए पर रहा। फ्रीलांसिंग के इस दौर में भी जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, वाराणसी, इलाहाबाद, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर या जामिया जैसे विश्वविद्यालयों या सम्बद्ध कालेजों के हिन्दी विभागों में नियुक्तियों की कहानियां सुनता रहता था। मुझे लगता है, नामवर सिंह ने यूरोपीय और अन्य विदेशी विश्वविद्यालयों के तर्ज पर योग्य छात्रों को आगे कर जेएनयू या अपने प्रभाव के अन्य संस्थानों में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन को सुदृढ़ आधार देने की कोशिश की होती तो हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान हो सकता था।

पत्रकारिता की उबड़खाबड़ जमीन पर पांव बढ़ाते हुए सन 1986 के मार्च महीने में मेरी नियुक्ति टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप के हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स में हो गई। इसके लिए अखिल भारतीय लिखित परीक्षा हुई थी। बहुत सारे युवक-युवतियां उसमें शामिल हुए थे। बताया गया कि उस लिखित परीक्षा में मुझे दूसरा स्थान मिला। वहां किसी ने मुझसे जाति आदि के बारे में पूछताछ नहीं की। अखबार के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने मुझे पटना संस्करण में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी। 1 अप्रैल को दिल्ली से पटना के लिए रवाना हो गया। तब तक एसपी सिंह भी मुंबई से दिल्ली नभाटा में कार्यकारी संपादक बनकर आ चुके थे। शुरू में ही उन्होंने नभाटा के संपादकीय पृष्ठ पर ‘बिहार के कृषि संकट’ पर दो किस्तों का लेख छापकर मेरा उत्साहवर्धन किया। लेकिन बाद के दिनों में उनका मुझे ज्यादा समर्थन नहीं मिला। मेरी पहली किताब ‘बिहार का सच’ सन 1991 में छपी। पुस्तक का बिहार और बाहर भी स्वागत हुआ।

एसपी ने भी पसंद किया। उन्होंने नभाटा में तुरंत समीक्षा छपवाई। कई प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएं आईं। एक दिन टीवी(दूरदर्शन) देख रहा था। पहले से मुझे कत्तई नहीं मालूम था। अचानक, देखा दूरदर्शन पर मेरी किताब की चर्चा चल रही थी। बाद में पता चला कि इस कार्यक्रम का निर्माण दूरदर्शन के जाने-माने प्रोड्यूसर कुबेर दत्त(अब दिवंगत) ने किया था। सन 1993 में मुझे मीडिया जगत में (उन दिनों की) प्रतिष्ठित ‘टाइम्स फेलोशिप’ मिली। इसके इंटरव्यू बोर्ड में उस समय के बड़े संपादक और विचारक निखिल चक्रवर्ती, योजना आयोग के सदस्य पी एन धर, टी एन चतुर्वेदी, टाइम्स के तत्कालीन संपादक दिलीप पडगांवकर और टाइम्स ग्रुप के चेयरमैन अशोक जैन सहित कई गणमान्य लोग बैठे थे। शोध के मेरे प्रस्तावित विषय पर कई सवाल पूछे गए। किसी ने मुझसे मेरी जाति आदि के बारे में नहीं पूछा। कुछ ही दिनों बाद परिणाम निकला, पता चला किश्वर अहलूवालिया, मारूफ रजा, शैलजा वाजपेयी और मुझे इस फेलोशिप के लिए चुना गया है। बीते साल यह फेलोशिप जेएनयू के ही एक पूर्व छात्र पी. साईनाथ को मिली थी। टाइम्स आफ इंडिया सहित ग्रुप के सभी अखबारों में हम लोगों के चित्र के साथ फेलोशिप की उद्धोषणा हुई थी। इस फेलोशिप के तहत मैंने झारखंड के संदर्भ में क्षेत्रीय विषमता पर काम किया, जो सन 1999 में ‘झारखंडः जादुई जमीन का अंधेरा’ नाम से पुस्तकाकार छपा। शोध-लेखन के लिए बाद में कुछ और फेलोशिप भी मिलीं।

नामवर जी, केदार जी और पांडे जी के जेएनयू स्थित ‘हिन्दी के दिव्यलोक’ से पत्रकारिता की उबड़खाबड़ दुनिया मुझे बेहतर लगने लगी। लेकिन पत्रकारिता में 26 साल से ज्यादा के अपने अनुभव के बाद जब पेशे में ‘ऊपर की दुनिया’ के करीब आया तो पता चला कि यहां का अंदरुनी सच भी कुछ कम विकराल नहीं है। नामवर जी से भी ज्यादा महाबलियों की इसमें भरमार है। ज्यादा पेंचदार लोग हैं। जात-गोत्र, पारिवारिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक सोच के अलावा बड़े राजनेताओं, कारपोरेट-कप्तानों से किसके कितने रिश्ते हैं, आज के मीडिया में ऊंचे पदों तक पहुंचने में इन चीजों का खासा महत्व हो गया है। भारत में पत्रकारिता वाकई चौथा स्तम्भ है पर हमारे समाज और लोकतंत्र का नहीं, राजव्यवस्था का चौथा स्तम्भ बनती गई है।

हम लोग जिस समय पत्रकारिता में दाखिल हुए, वह इमर्जेन्सी के बाद का जमाना था और प्रोफेशन में जबर्दस्त उथलपुथल थी। हिन्दी में पहली बार नए ढंग के प्रयोग हो रहे थे और नए सोच को जगह मिल रही थी। जनपक्षी सोच के ढेर सारे नौजवान पत्रकारिता में दाखिल हुए थे। लेकिन कुछ ही बरस बाद चीजें तेजी से बदलती नजर आईं। सन 95-97 के आसपास पत्रकारिता पर आर्थिक सुधार और उदारीकरण की प्रक्रिया का असर साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सन 2000 के बाद उसने ठोस रूप ले लिया। अब पत्रकारिता का चेहरा बिल्कुल बदल चुका है। बड़े मीडिया संस्थानों के मालिक आज खुलेआम कहते हैं कि वे खबर के नहीं, विज्ञापन के धंधे में हैं। मुख्यधारा की हिन्दी पत्रकारिता तो और पिचक रही है। वह कूपमंडूकता, सरोकारहीनता, समाचार-विचार की दरिद्रता, चाटुकारिता, जातिवाद और गुटबाजी से बेहाल है। बेहतर की बात कौन करे, राहुल बारपुते, रघुवीर सहाय और राजेद्र माथुर के जमाने की पत्रकारिता के निशान भी मिट रहे हैं। पत्रकारिता के इस मौजूदा सच से जब टकराता हूं तो छात्रजीवन के दौरान देखा एक सजग-समर्थ शिक्षक बनने का सपना याद आता है। फिर देखता हूं, मेरे सच और सपने के ठीक बीच में खड़े हैं-हिन्दी के महाबली डा. नामवर सिंह।

आशा-निराशा और सफलता-असफलता भरी दिल्ली से पटना, पटना से दिल्ली वाया चंडीगढ़ की 26 साल लंबी अपनी यात्रा पर नजर डालता हूं तो कुल-मिलाकर अच्छा लगता है। इस पेशे में आने का अफसोस नहीं होता। हिन्दी क्या, संपूर्ण शैक्षणिक जगत के बड़े-बड़े महाबलियों को जो लोग इधर से उधर पदारूढ़ करते-कराते हैं, बड़े ओहदे या सम्मान देते-दिलाते हैं, एक पत्रकार के रूप में उन लोगों को भी बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला। कैसे अचानक अपने बीच से ही कोई जुगाड़ और रिश्तों के सहारे बड़ा ओहदेदार, वाइसचांसलर, निदेशक या सीधे प्रोफेसर बन जाता है! कैसे कोई रातोंरात चैनल हेड, प्रधान संपादक, किसी कारपोरेट संस्थान में उपाध्यक्ष या कारपोरेरट-कम्युनिकेशन का चीफ, कहीं निजी या सरकारी क्षेत्र में बड़ा अधिकारी, सलाहकार या विदेश में कोई अच्छी सरकारी पोस्टिंग पा लेता है! पत्रकारिता के इस दिलचस्प-रोमांचक रास्ते का हरेक सच मुझे उन वजहों से रू-ब-रू कराता है कि बड़ी संभावनाओं और प्रतिभाओं के बावजूद हमारा समाज क्यों दुनिया के नक्शे पर आज तक इतना फिसड्डी बना हुआ है! प्रतिभा-पलायन क्यों हो रहा है या कि एक खास मुकाम के बाद प्रतिभा-विकास का रास्ता अवरुद्ध क्यों हो जाता है! सचमुच हम ‘अतुल्य भारत’ हैं!
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Sunday, September 27, 2020

आलोचना की आलोचना : फ़ासीवाद सम्बंधी अंक पर कृष्ण मोहन की समीक्षा

 


पिछले दिनों नामवर सिंह पर हिन्दी के `विद्वानों` के ताबड़तोड़ लाइव कार्यक्रमों के दौरान किसी ने उनके संपादन में `आलोचना` का पुनर्प्रकाशन शुरू होने पर पहला अंक (फ़ासीवाद और संस्कृति का संकट') फ़ासीवाद पर केंद्रित किए जाने को उनकी प्रमाणिकता के तौर पर पेश किया था। इस अंक पर 2000 में छपी आलोचक कृष्ण मोहन की विस्तृत समीक्षा (उदारवादी भ्रमों का पुलिंदा - आलोचना का फ़ासीवादी अंक) पढ़ी। यह अंक `फ़ासीवाद संबंधी लेखों का दिशाहीन और भ्रामक ढेर` क्यों है, इस पर उन्होंने गंभीरता से विभिन्न लेखों के उदाहरण सामने रखते हुए विचार किया है। यूँ यह एक ज़रूरी बात है कि लेखक जैसा समझता है, उसे ईमानदारी से लिखे पर जैसा कि साहित्य की दुनिया का पावर स्ट्रक्चर है और जवाब में विमर्श के बजाय हिसाब चुकता करने का रिवाज़ है, एक साथ इतने सारे प्रभावशाली और फ़ितरती लेखकों से बेबाकी के साथ तीखी असहमति व्यक्त करन साहस की बात है।

बेहतर तो यह होता कि इस लेख से एक के बाद एक कई हिस्से यहाँ उद्धृत करता या पूरा लेख ही यहाँ देता। फ़िलहाल, लंबा टाइप न कर पाने की स्थिति से यह संभव नहीं है। आलोचना के फ़ासीवादी अंक में एजाज़ अहमद के एक पूर्व प्रकाशित लेख को भी शामिल किया गया था जिसे कृष्ण मोहन सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय मानते हैं और पर विस्तार से बात करते हुए अपनी असहमतियां भी जताते हैं। लेकिन खिन्नता पैदा करने वाले वे हिस्से हैं जिन्हें हिन्दी के विद्वानों के लेखों से लिया गया है। यह अंक `आलोचना` का है लेकिन जो विशेषांक लेखक संगठनों द्वारा निकाले जाते रहे हैं, उनमें भी यही लेखक अपनी फ़ासिस्ट समर्थक, कम्युनल, सेमी-कम्यूनल या सवर्ण अवधारणाओं के साथ उपस्थित रहते आए हैं और सर्व-स्वीकार्य रहे हैं। कृष्ण मोहन इस अंक के संपादक और प्रभाष जोशी के `रेनेसां पर्सन` नामवर सिंह की `मासूम` शिकायत का ज़िक्र भी करते हैं कि पटेल तो नेहरु की बात मान लेते थे पर अटल की बात आड़वाणी नहीं मानते। जसम के विचारक रविभूषण आरएसएस द्वारा ही पेश किए जाते रहे जुमले `वस्तुत; संघ परिवार जिस `हिन्दुत्व``को धर्म मानता है, वह एक जीवन-शैली है`, दोहरा रहे हैं। उनके लेख से ऐसे वाक्य उद्धृत कर कृष्ण मोहन जो सवाल उठाते हैं, वे असल में हिन्दी के पूरे बौद्धिक समाज से हैं। प्रभाष जोशी फ़ासीवाद से लड़ने के लिए सनातन धर्म का सहारा लेने और संघ के स्वयंसेवकों से प्रेरणा लेने की सीख देते हैं।

खगेंद्र ठाकुर के लेखन का अद्भुत कमाल तो जलेस के `1857 पर आए विशेषांक` में देखा था। भारतेंदु की जिन पंक्तियों को फेरबदल कर रामविलास शर्मा ने 1857 से जोड़ दिया था, उनका असल रूप वीरभारत तलवार सप्रमाण हिन्दी वालों के सामने रख चुके थे पर खगेंद्र ठाकुर ने उन्हें बदले हुए रूप में ही इस्तेमाल किया। अकारण नहीं कि ऐसे झूठे उद्धरणों और विवादित अवधारणाओं से भरा वह (खगेंद्र ठाकुर का) लेख, उस अंक के कुछ बेहतरीन लेखों का प्रतिपक्ष ही था। फ़ासीवाद सम्बंधी `आलोचना` में छपे खगेंद्र ठाकुर के लेख से कृष्ण मोहन ने कुछ उद्धरण देते हुए लिखा है,-

``खगेंद्र ठाकुर और उनके भाकपाई मित्रों की यह पुरानी कमज़ोरी है कि वे शासक वर्ग से बार-बार उसका अंध-राष्ट्रवादी हथियार उधार मांगते हैं ताकि वे उनसे भी बड़े `राष्ट्रवादी` दिखें और एक ही झटके में पूरे राष्ट्र के नेता बन जाएँ।``

राजकिशोर के लेख से उद्धृत अंश देखिए- ``दुर्भाग्य यह है कि इतिहास फ़ासीवादियों के साथ है। भारत में मुस्लिम शासन के बारे में सेकुलरवादियों का नज़रिया साफ़ नहीं है। वे यह नहीं देख पाते कि शासन जैसा भी रहा हो, मूलत: एक अल्पसंख्यक शासन था। भारत की बहुसंख्या हिन्दुओं की थी, अत: यहाँ का सामंतवाद भी हिन्दू सामंतवाद होना चाहिए।``

इस पर कृष्ण मोहन टिप्पणी करते हैं-

``मध्यकाल के बारे में औपनिवेशिक इतिहास लेखन की इसी साम्प्रदायिक दृष्टि में साझा करने के कारण उदारवाद अपने को कट्टरवाद के सामने कुंठित पाता है। उसे लगता है कि एक बार इस दृष्टि को सर्वस्वीकृति मिल जाए तो वह अपने ही जैसे उदार हिन्दू मन को भूल जाने और माफ़ करने के लिए मना लेगा। उसका सरल चित्त यह नहीं समझ पाता कि वह जितनी बार इस झूठ को शिरोधार्य करता है, उतनी ही बार कट्टरवादी शक्तियों को बल प्रदान करता है। उसकी वह मांग संघ परिवार की उस बुनियादी मांग से अलग नहीं है कि अगर अयोध्या, काशी, मथुरा पर उनका दावा मान लिया जाए तो वे बाकी मसले छोड़ देंगे। सामंतवाद सिर्फ़ सामंतवाद होता है। वह हिन्दू या मुस्लिम नहीं होता। और वह अनिवार्यत: अल्पसंख्यक का शासन होता है। राजकिशोर आधुनिकता की बातें बहुत करते हैं लेकिन धर्म के परदे के पार कुछ देख नहीं पाते। उनकी उदारता उन्हें बहुसंख्यकवाद की वक़ालत तक ले जाती है जो फ़ासीवादियों का एक प्रिय तर्क है। वे इतिहास की न्यूनतम आवश्यक छानबीन भी नहीं करते वरना उनके विश्वास भी ख़ुद ब ख़ुद खंडित हो जाते। संख्या की दृष्टि से उन्हें लगता है कि शासन तंत्र में मुसलमानो का बहुमत होता होगा जबकि मध्यकाल के सबसे मजहबी माने जाने वाले शासक औरंगेजेब के समय उसके सामंतों में लगभग अस्सी प्रतिशत हिन्दू थे।``  

कृष्ण मोहन के लेख से ही हमें विष्णु खरे के इस `जागरूक समर्थन` का पता चलता है - ``सिनेमा, टी.वी. में भारतीय मानव-मूल्य बनाए रखने का बीजेपी का नारा भी प्रबुद्धता से फ़ासिज़्म-विरोध के पक्ष में लेने में कोई हर्ज नहीं है। उनका हिंसा और सेक्स में डूबी अमेरिकी फिल्मो के विरोध का हमें जागरूक समर्थन करना चाहिए।``

खरे के इस आह्वान पर कृष्ण मोहन लिखते हैं, ``इसे कहते हैं प्रबुद्धता और जागरूकता। सिनेमा में `भारतीय` मूल्यों को बचाने के भाजपाई नारे का समर्थन! हिंसा और अश्लीलता अमरीकी मूल्य हैं, भारतीय समाज में हिंसा और अश्लीलता कहाँ। भारतीय संस्कृति के स्वयंभू, लंपट ठेकेदारों के सुर में सुर मिलाने वाले खर साहब किसे धोखा देने चले हैं। सवाल यह है कि भारतीय फ़ासीवाद के सांस्कृतिक एजेंडे का समर्थन करने वाला यह लेख कहीं आलोचना की संपादकीय नीति का हिस्सा तो नहीं है।``

जाहिर है कि इस अंक के संपादक नामवर सिंह की नीति तो कहीं ज़्य़ादा भयानक रही ही है। खरे के बाद के हुसेन पर लिखे गए हमलावर लेख को `अरे, उन्हें क्या हुआ` कहकर हैरान होने वालों को इस टिप्पणी में उनके दिल-दिमाग़ को समझने की कोशिश करनी चाहिए। मीर पर उनके लिखे को भी। इस टिप्पणी में उनके तर्क के आधार पर तो यह भी लगता है कि वे आज होते तो बॉलीवुड में दीपिका वगैराह के ख़िलाफ़ चल रही कार्रवाइयों के `जागरूक समर्थन` में भी खड़े मिल सकते थे।

भगवान सिंह हिन्दी के वामपंथियों के प्रिय लेखक रहे हैं और अपने खुले साम्प्रदायिक लेखन के बावजूद अभी भी हैं। नामवर के फ़ासीवाद सम्बंधी अंक में वे न हों और अपने इसी रंग में न हों तो इस अंक की सार्थकता ही भला क्या होती? कृष्ण मोहन लिखते हैं-

``भगवान सिंह ने अपने लेख में मार्क्सवाद को दुनिया का सबसे नया, वैज्ञानिक और प्राधिकारवादी धर्म माना है तथा `एक ही सामाजिक वातावरण में उपजे होने के कारण` इसे ईसाइयत औऱ इस्लाम के समतुल्य कहा है। साम्प्रदायिकता की आलोचना करने के लिए उन्होंने मार्क्सवादियों की खिंचाई की है। उनका ख़याल है कि इसी वजह से साम्प्रदायिक पार्टियों की ताक़त बढ़ी है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को वे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं, लेकिन `राजनीतिक लाभ` के लिए उसकी बरसी मनाने को उससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण। वे मुसलमानों को भारत में अल्पपसंख्यक नहीं मानते और चिंता व्यक्त करते हैं कि अगर यही रवैया रहा तो भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे। यह लेख शुरू से अंत तक ऐसी ही भ्रामक अवधारणाओं और आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी से भरा पड़ा है।``

असल में भगवान सिंह के लेख की ये अवधारणाएं और `आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी` उनकी अपनी हैं ही नहीं। `मार्क्सवाद भी ईसाइयत और इस्लामियत के समतुल्य धर्म है` या `भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे` जैसी बातें आरएसएस के प्रचारकों के `बौद्धिकों` में प्रमुखता से बताई जाती रही हैं। यहाँ तक कि ऐसे वचनों की कवरेज मैंने ही कई बार की है। यह बात अलग है कि हिन्दी के वामपंथी कवि-लेखक यह जानना-मानना नहीं चाहते हैं।

एक ज़माने के वामपंथी और साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यशालओं के आयोजक पुरुषोत्तम अग्रवाल इन दिनों मुख्य रूप से कबीर विशेषज्ञ हैं। नामवर सिंह पर लाइव श्रृंखला में ही कुछ महीने पहले रामजन्मभूमि शिलान्यस की वेला में उन्होंने घोषणा की थी कि `गुरुजी` की इच्छा के अनुरूप उनकी अगली किताब तुलसी पर होगी। यूँ, कबीर भी उनके लिए तुलसी ही हैं। इस बात को आलोचना के फ़ासीवाद अंक के कबीर खंड में छपे पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेख पर कृष्ण मोहन की यह टिप्पणी पढ़कर समझा जा सकता है-

पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर की कविता को दलितों की पहचान के साथ जोड़ने को अस्मितावाद क़रार देते हुए उसे मूलत: आध्यात्मिक अनुभव की कविता कहते हैं। ``कवि कबीर की संवेदना का सत्य है वह अमरलोक जिसकी कसौटी पर वे जगत के तथ्य को कसते हैं…इस असीमित ब्रह्मांड में अपनी असीमित सत्ता के साथ होने का अनुभव;इस सीमित सत्ता के निस्सीम ब्रह्मांड के साथ सम्बद्ध होने की महिमा का अनुभव। ` `शंभुनाथ ने अपने लेख में समग्र का अंश होने के जिस अनुभव को सामाजिक अनुभव माना है और कबीर की कविता की रहस्यवादी व्याख्या से इनकार किया है, उस श्री अग्रवाल अध्यात्म की चाशनी में लपेटते हैं। इसका नतीज़ा निकालते हुए वे कहते हैं, ``कबीर अपने ख़ास दो-टूक ढंग से बताते हैं कि अनुभव का अपरिहार्य, अंतिम सत्य है मृत्यु। एक नाम-अनाम ही नित्य है बाक़ी सब अनित्य।`` श्री अग्रवाल ने अपने लेख में जिन यथास्थितिवादी आचार्यों को बार-बार कबीर निंदा का दोषी ठहराया है उनका भी विरोध कबीर के सामाजिक सरोकारों से ही था। हाँ, वे इतने कुशल अवश्य ही नहीं थे कि कबीर के नख-दंत तोड़कर उन्हें अपने ब्राह्मणवादी प्रोजेक्ट में शामिल करने की सोचते।

`परख` में छपा यह लेख `आलोचना` में छपता तो क्या हिन्दी विद्वानों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का नज़रिया अपने इन विद्वानों को लेकर कुछ अलग होता? नहीं, क्योंकि ऐसी बातें या तो कही नहीं जातीं और कही जाती हैं तो उन पर चर्चा नहीं की जाती। यह भी कह दिया जाता है कि ऐसी बातें लड़ाई को कमज़ोर करती हैं। हालांकि, रघुवीर सहाय की पंक्ति ``अगर वही हो तुम जिससे तुम लड़ते हो तो लड़ते क्यों हो`` उनके सामने होती है। इस लेख का महत्व यही है कि बातें कही ज़रूर गई थीं। नामवर सिंह और उनके संपादन में निकले उस अंक की याद में `आलोचना` के वर्तमान संपादक चाहें तो इस लेख को अब प्रकाशित कर सकते हैं।

Saturday, May 5, 2018

नामवरी में कोई कमी नहीं - धीरेश सैनी



प्राइम टाइम में नामवर
रवीश कुमार की वजह से एनडीटीवी इंडिया कई मामलों में अनूठा है। 4 मई 2018, शुक्रवार रात के प्राइम टाइम में हिंदी के किसी बड़े साहित्यकार को देखना इस दौर के लिहाज से कोई मामूली बात नहीं थी। अमितेश ने हिंदी आलोचना के `शीर्ष पुरुष` कहे जाने वाले 90 पार के नामवर सिंह से उनके घर जाकर बड़ी विनम्रता के साथ बातचीत की थी जिसे दिखाने से पहले रवीश ने भी नामवर के नाम पर पूरे सम्मान और विनम्रता के साथ रोशनी डाली। मीडिया घरानों में जब `हिंदी साहित्य और विचार` से नाक-भौं सिकोड़ने का चलन हो तब एक बड़े हिंदी पत्रकार का एक वरिष्ठ-बुजुर्ग हिंदी साहित्यकार के प्रति ऐसा भाव सुखद था। रवीश जेएनयू में `धोती-धज-बनारस` को लेकर अतिशय भावुक भी थे और नामवर की रीढ़ को लेकर अतिश्यक्ति में भी। उन्होंने कहा, ``नामवर की पीठ और रीढ़ आज भी उसी तरह तनी हुई है जैसे स्टील की बनी हो।`` 90 साल की स्टील की यह रीढ़ केंचुए की तरह लिजलिजी होकर केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा से `बूढ़े बैल` का खिताब व `संरक्षण` की आशवस्ति पा रही थी और मैनेजर पांडे इस `महान` निर्लज्ज परंपरा का सच्चा अनुयायी होने का परिचय दे रहे थे तो तब आलोचना से भक्तमंडली अग़र थोड़ा-बहुत आहत हुई होगी, अब रवीश के शब्दों से तर गई होगी।

हमारा ईश्वर उनसे कमज़ोर है?
बहरहाल, 90 पार के नामवर सिंह को देखना `भारतीय परंपरा` के लिहाज से किसी पुरुष के इस आयु में इस तरह स्वस्थ और चेतन दिखाई देने पर आनंदित होने जैसा रहा। वे धीमे-धीमे चल पा रहे थे। आवाज़ मद्धम पड़ जाने के बावजूद बिल्कुल पुराने अंदाज़ में शेर सुना रहे थे, गीत के बोल उद्धृत कर रहे थे। उन्होंने बेशक एक लंबा सफल, निर्द्वंद्व, सदैव सत्ता समर्थक, सुविधावादी, करियरवादी जीवन जिया है पर ऐसी ज़िंदगी जीने वाले भी इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर स्मृतिलोप का शिकार हो जाया करते हैं या बहकी-बहकी बात करने लग जाते हैं। यह सुखद आश्चर्य की बात थी कि नामवर पूरी तरह चेतन दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा भी कि ``भगवान की कृपा से मेरी याददाश्त बहुत अच्छी है। पढ़ी हुई किताबें याद हैं।`` वाकई, उनकी बातों में उनकी जानी-पहचानी `वैचारिक परंपरा` और `प्रतिबद्धता` खुलकर अभिव्यक्त हुई। आश्चर्य नहीं हुआ, जब उन्होंने साक्षात्कार ले रहे अमितेश से ही जोर देकर सवाल किया, ``हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से (उन लोगों के ख़ुदा से) कमज़ोर है? ख़राब है?``

स्टील की रीढ़, मनुष्य की रीढ़ 
इस उम्र में भी यह पुरुष उतना ही निर्लज्ज और सामप्रदायिक है, ऐसा कुछ सोचकर मैं तो सो गया था पर यह सब लिखने की वजह सुबह वॉट्सएप पर एक मुग्ध भक्त का भेजा लिंक रहा। रात के कार्यक्रम का लिंक भेजते हुए, उसने अद्भुत-अद्भुत करते हुए `नामवर जी` की बेबाकी के कसीदे भी काढ़ रखे थे। ख़ैर, उसे बताने के लिए ही कि ऐसी बेशर्म और निरापद बेबाकी तो नामवर के यहां हमेशा ही रही है, कुछ बातें दोहराना ज़रूरी लग रहा है। सबसे पहले नामवर से बातचीत की प्रस्तुति से पहले रवीश की भूमिका की विनम्र शुरुआत, ``मैं हिंदी साहित्य का व्यक्ति नहीं हूँ। साहित्य से बहुत दूर भी नहीं हूँ और बहुत पास भी नहीं रहता। मगर इस बात का अहसास जरूर रहा कि हिंदी के पास दो ही चीज़ें श्रेष्ठ हैं- हिंदी भाषी मज़दूर और हिंदी के साहित्यकार। यही हमारे हीरो हैं।`` मज़दूरों के प्रति पक्षधरता की कोशिश मेरी भी रही है और अरसे तक साहित्यकार अतार्किकता की हद तक मेरे लिए हीरो रहे हैं। दिलचस्पी अब भी है पर नायक-पूजा का पुराना भाव नहीं बचा है। रवीश तो हिंदी साहित्य के व्यक्ति हैं। किताब भी आ चुकी है और बतौर पत्रकार फिलहाल उनकी जो भूमिका है, किसी सच्चे लेखक, पत्रकार और मनुष्य की भूमिका वही होनी चाहिए। `स्टील की रीढ़` वाले हजार नामवरों के मुकाबले अपने लिए रवीश की यह `मनुष्य की रीढ़` सम्मान के काबिल है।


हे ईश्वर!
``हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से (उन लोगों के ख़ुदा से) कमजोर है? ख़राब है?``
नामवर कहते हैं, ``उम्र अब 90 के पार है हमारी। जी गए, ये भगवान की कृपा है।`` अमितेश कहते हैं, ``अब लोग कहेंगे कि आप भगवान को याद कर रहे हैं। आप तो सर किसी ज़माने में कम्युनिस्ट और प्रगतिशील...।`` नामवर - ``मुहावरा है ये।`` अमितेश- ```मने किसी न किसी को तो धन्यवाद कहना है...।`
नामवर- ``वो ही। किसी के मुंह से निकलता है, माय गॉड। निकल जाता है न? या ख़ुदा। मुसलमान कहता है। कहता है न? कहते हैं न? बोल पड़ते हैं न, ऑह माय गॉड, या ख़ुदा? तो हम हे ईश्वर कहते हैं, तो क्या बुरा? (हमारा) ईश्वर कोई उन लोगों से कमज़ोर है? ख़राब है? तो इसलिए, हे ईश्वर।``
नामवर सिंह कहते कि उन्हें भगवान में विश्वास है तो भी कोई बुराई नहीं थी। मान सकते थे कि ठीक है, वे सीपीआई पर आजीवन लदे रहे, चुनाव लड़े और प्रगतिशील लेखक संघ के भी अगुआ (अगवा?) रहे पर भगवान की परिकल्पना को लेकर आस्तिक रहे। वे  कहते कि आदतन जबान पर चढ़ा मुहावरा है तो भी ठीक। लेकिन, वे यहां मुसलमानों को लाते हैं। `माय गॉड` और `या ख़ुदा` से `हे ईश्वर` को तौलते हैं और कहते हैं, `` हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से कमज़ोर है? ख़राब है? तो इसलिए, हे ईश्वर।``

शीर्ष पुरुष की परंपरा 
यह `हिंदी की परंपरा` के `शीर्ष पुरुष` का `सुसंगत` और `तार्किक` कथन है। (कोई चाहे तो जैसा कि नामवर के मामले में आम हिंदी वालों और अधिकतर प्रगतिशीलों का चलन है, मुग्ध भाव से इसकी भक्ति भरी व्याख्या में गोते लगा सकता है।) नामवर से बातचीत के दौरान उनके लिए जो पट्टियां चलाई जा रही थीं, उनमें एक पट्टी थी- `भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की`। संयोग नहीं है कि नामवर की इस बातचीत में छलक रही साम्प्रदायिक घृणा जेएनयू के उस केंद्र में उनकी भूमिका में भी इसी तरह छलकती रही थी। अव्वल तो जिस तरह उन्हें केंद्र का संस्थापक घोषित कर दिया गया, वह एक कोरा झूठ है। इस केंद्र में नामवर सिंह के पदार्पण से पहले इसका ब्लू प्रिंट ही तैयार नहीं हो चुका था बल्कि छात्रों का पहला बैच भी मौजूद था। नाम से ही बड़े फलक वाले भारतीय भाषा केंद्र (सेंटर ऑफ इंडियन लेंग्वेजेज) की शुरुआत मोटे तौर पर हिंदी-उर्दू के केंद्र के रूप में हुई थी। दोनों भाषाओं का एक कॉमन पेपर भी तैयार किया गया था। इस दौरान नामवर सिंह का रुख न तब और न अब कोई छुपी चीज़ रहा है। उनकी खुली भूमिका इस केंद्र में भाषाई साम्प्रदायिक घृणा के आधार पर दरार डालने की थी। वे कॉमन पेपर को क्रेडिट कोर्स न होने देने पर आमादा थे और केंद्र के `पाकिस्तान` बन जाने तक की टिप्पणी करने से नहीं चूके थे। लेकिन, तब जमाना जरा कुछ और था और रेक्टर मुनीस रज़ा से लेकर स्टूडेंट्स तक उनसे सहमत नहीं थे। नामवर के रवैये को लेकर बाद की पीढ़ी के जिस किसी को कोई शक हो, वह `हंस` में नामवर का लिखा `बासी भात में ख़ुदा का साझा` भी तलाश कर पढ़ सकता है। आनंद स्वरूप वर्मा, राजेंद्र शर्मा आदि काफी लेखकों ने तब नामवर को कड़े जवाब भी दिए थे।

तिकड़म, पतन और पतन
बहरहाल, उस भारतीय भाषा केंद्र जिसकी स्थापना का श्रेय नामवर सिंह को दिया गया, उसमें उनके आगमन की कथा भी भ्रष्टाचार का कोई मामूली उदाहरण नहीं है। असल में यह `गिव एंड टेक` अपॉइंटमेंट था। जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में अपनी नियुक्ति से पहले नामवर सिंह को सावित्री चंद्रा को रीडर नियुक्त करने के लिए जोधपुर से बुलाया गया था। सावित्री चंद्रा की एकमात्र योग्यता यह थी कि वे यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन सतीश चंद्रा की पत्नी थी। इस तरह की नियुक्ति के लिए जेएनयू और यूजीसी दोनों पर ही लानत है और इस तिकड़म में शामिल नामवर पर भी। जेएनयू के इस प्रतिष्ठित भारतीय भाषा केंद्र का दुर्भाग्य था कि उसके पहले ही बैच के लिए ऐसी रीडर को नियुक्त कर दिया गया जो पढ़ा ही नहीं सकती थी। नामवर को इससे क्या, उन्हें तो यूजीसी के चेयरमैन और जेएनयू प्रशासन को एक साथ उपकृत करने का मौका मिल गया और सौदेबाजी के रूप में इस केंद्र में प्रफेसर बनकर आ गए। क्या इस बात से नामवर के भक्त भी इंकार कर सकेंगे कि पढ़ा पाने में पूरी तरह अयोग्य-अक्षम सावित्री चंद्रा को लेकर छात्रों को आंदोलन चलाना पड़ा और नामवर सिंह बेशर्मी से छात्रों के खिलाफ खड़े हो गए। इसी केंद्र में उनके हाथों एक ऐसी नियुक्ति (चिंतामणि) से भी सभी वाकिफ हैं जिसकी योग्यता नामवर सिंह के गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी का मकान तैयार करना थी। अफसोस कि हिंदी के इस `शीर्ष पुरुष` का जीवन ऐसी ही तिकड़मबाजियों, मुखर और योग्य छात्रों के उत्पीड़न, सत्ता के साथ खड़े होकर प्रतिरोधी परंपरा के दमन, वामपंथ के साथ गलबहियां करते हुए दक्षिणपंथी रास्ते के निर्माण जैसी नीच हरकतों से भरा पड़ा है जो इतना कामयाब है कि उसे किंवदंती की तरह पेश कर वैसा होने की चाह रखने वालों की कमी नहीं है।

पावर स्ट्रकचर के साथ
जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र की शुरुआत का दौर ही देश में इमरजेंसी का दौर भी है। सौभाग्य से जेएनयू ने और उसके हिंदी-उर्दू के भी बहुत से स्टूडेंट्स ने करियर की परवाह किए बिना दमनकारी सत्ता से लोहा लिया था। नामवर सिंह उस समय सत्ता के साथ खड़े थे। जब छात्रों की धरपकड़ के लिए जेएनयू में पुलिस के छापे लगा करते थे, नामवर सिंह अपनी तिकड़मों को निर्विरोध संपन्न करने के लिए छात्रों को गिरफ्तारी का भय दिखाया करते थे। उनका यह अवसरवाद और पावर स्ट्रकचर के साथ खड़े होने की आदत हमेशा बनी रही। वे इतने, इतने, इतने बड़े थे कि शीर्ष पुरुष थे और शीला संधु के जमाने से ही हिंदी के `शीर्ष प्रकाशक` के प्रिय थे। पर क्या मजाल कि वे कभी प्रकाशक और लेखक के बीच किसी मसले में लेखक के साथ खड़े हुए हों! हिंदी के `शीर्ष पुरुष` और `शीर्ष प्रकाशक` दोनों एक-दूसरे के लिए हिंदी साहित्य की सत्ता को नियंत्रित करने के टूल बने रहे। नामवर को राजा राममोहन राय फाउंडेशन का चेयरमैन होने का मौका मिला तो चहेते प्रकाशक के वारे-न्यारे करने के लिए किस हद तक बदनामी उठाने से नहीं झिझके थे, उसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मालिनी भट्टाचार्य को यह मामला संसद तक में उठाना पड़ा था।
यह सत्ता की छतरी के नीचे रहने की नामवर सिंह की पुरानी अदा थी या बदले जमाने में खुलकर संघ के आगे समर्पण की चाह कि वे 90 साल की उम्र में `ज़लील` होने के लिए  `इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र` में पहुंच गए थे। केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने वहां कहा था कि बूढ़े बैलों के संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी `कभी मार्क्सवादी थे` नामवर सिंह के लिए `मर्यादा का कभी अतिक्रमण नहीं करसकते` कहा था तो सही ही कहा था। ख़ामोशी से यह सब सुनकर, `सम्मानित` होकर लौटे हिंदी के शीर्ष पुरुष नामवर और उनके अनुचर वामपंथी मैनेजर पांडे के अलावा वहां विश्वनाथ त्रिपाठी थे जिनको लेकर इतनी भी आलोचना का कोई मतलब नहीं बनता है।


यात्राओं के सरोकार
नामवर सिंह ने जब अपनी देश-विदेश की यात्राओं की बात कर रहे थे तो उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वे कभी कहीं अपने पैसे से नहीं गए। लोगों ने प्यार से बुलाया। हवाई यात्रा का भी किराया दिया और जहां रेल का रास्ता हुआ, वहां रेल का किराया दिया। वास्तव में यह बड़ी बात है। लेकिन, ठीक इसी वक़्त यह कहना चाहता हूँ कि इसमें उनके आलोचक की नहीं, जेएनयू शक्तिपीठ और उसके जरिये साहित्य की तमाम शक्तिपीठों से उनके रिश्तों की भूमिका ज्यादा बड़ी है। देश भर में हिंदी विभागों की नियुक्तियों और सेमिनारों आदि का स्तर इन यात्राओं से शायद उन्होंने रद्दीपन से ऊपर खींचा हो? पर मेरे लिए एक दूसरी बात महत्वपूर्ण है कि वे इतनी ठसक से कैसे कह सकते हैं कि कभी अपने पैसे से नहीं गया। क्या उन्हें कभी मज़दूर संगठनों ने नहीं बुलाया? अपने तो परिचित कई लेखक ऐसे आयोजनों में अपने किराये से दौड़े चले आए। हम भी ऐसे आयोजनों में अपने किराए से ही गए और यथासंभव सहयोग राशि भी देकर आए। विष्णु नागर सिरसा में ऐसे ही एक कार्यक्रम में बस में बैठकर ही गए जबकि उन्हें गाड़ी से आने का प्रस्ताव दिया गया था। सुभाष गाताडे तो कितनी बार इसी तरह हमारे बुलावे पर दौड़ते रहे। उनके पास न इस तरह के वेतन रहे, न आय के दूसरे साधन।

सवर्ण-सामंती सोच
रवीश ने नामवर सिंह के `विवादित और मर्यादित` होने की बात का भी जिक्र उसी ग्लेमरस अंदाज में किया है जिस अंदाज में पहले भी किया जाता रहा है। लेकिन, ऐसा कर पाना हर किसी के लिए इतना सरल नहीं है। नामवर के साम्प्रदायिक, जातिवादी, स्त्रीविरोधी, सामंती और तिकड़मी व्यक्तित्व पर लिखा भी जा चुका है और उनके भक्त भी निजी महफिलों में इन किस्सों को कभी प्रशंसा भाव से और कभी चटखारे लेकर सुनाते रहे हैं। लेकिन, प्रगतिशील परंपरा के साथ दिखते रहकर चतुर रेहटरिक का इस्तेमाल करते हुए धीरे-धीरे दक्षिणपंथी राह बनाते रहे नामवर के एक के बाद एक चलाए जाने वाले शब्द बाणों से बिंधा हुआ महसूस करते रहे हमारे जैसे लोग कैसे मुग्ध हो सकते हैं? यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है, जब उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में ही आरक्षण के खिलाफ जहर उगला था और कहा था कि इस तरह तो ब्राह्मणों-ठाकुरों के लड़के भीख मांगा करेंगे। कब, क्या बोलना है, इसमें माहिर माने जाने वाले नामवर का यह बयान मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान की तरह दिल से निकला हुआ पर पूरी तरह केलकुलेटेड बयान था। साहित्य के बहुत से सवर्णवीरों को आपसी बातचीत में उनके इस बयान पर रीझते हुए भी पाया जाता ही है।

दांत और मनुष्यता
और अंत में नामवर सिंह के दांत का दिलचस्प जिक्र यूं ही। बाबरी मस्जिद को लेकर लखनऊ खंडपीठ का फैसला आया था तो मैंने उस पर हिंदी के कुछ लेखकों से `समयांतर` के लिए प्रतिक्रियाएं ली थीं। नामवर सिंह को जब भी फोन किया, उन्होंने बताया कि उनके दांत में दर्द है। तब `दांत का निरंतर दर्द` ही `समयांतर` में उनकी प्रतिक्रिया थी। रात एनडीटीवी पर `भगवान विश्वनाथ की नगरी` के पान खाने के शौक का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इस कुटेव का दांत पर असर हुआ है, टूटा-फूटा भी है। ``लेकिन मैंने दांत नया नहीं बनवाया है। सारे बिल्कुल मेरे ही हैं। मैंने ये काम नहीं किया। नकली दांत बनवाकर जवान दिखना ये मनुष्यता का अपमान है।`` सुनकर बहुत हंसी आई। पिताजी भी याद आए जो दांतों के दर्द से कराहते रहते थे पर मॉडर्न डेंटिस्ट्री में दांत बचाने और नये बनाने के बेहतर तरीकों के नाम पर वे तरह-तरह के बहाने तलाशते थे। नामवर सिंह के मुंह में काफी दांत मौजूद हैं और मैं इसे खुशी और प्रशंसा के रूप में ही देखता हूँ पर नकली दांत बनवाकर लगवाना न जवान दिखने का ही मसला है और न मनुष्यता का अपमान है। बहुत से बुजुर्ग और कम उम्र के लोग भी डेंचर के सहारे खाना खा रहे हैं तो यह मेडिकल साइंस की प्रशंसनीय देन है।
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नामवर सिंह का चित्र `Opinion Post` से साभार।