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Monday, February 17, 2014

`फैन्ड्री’ के निर्देशक का मार्मिक आत्म-कथन


सपनों को छोटी-छोटी राहें और सख्त नाकेबंदी
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इस हफ्ते एक मराठी फिल्म रिलीज़ हुई है 'फैन्ड्री', जो कुछ-कुछ निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले की अपनी कहानी है. आज महाराष्ट्र टाइम्स के रविवारी संस्करण में नागराज का यह आत्म-कथन छपा है, जिसे यहां भारतभूषण तिवारी की बदौलत दिया जा पा रहा है.  पक्का नहीं मालूम पर पढ़ने से लगता है कि वे महाराष्ट्र की अति पिछड़ी घुमंतू जाति 'वडर' से सम्बन्ध रखते हैं. फिल्म मैंने अभी तक नहीं देखी पर उसका प्रोमो यूट्यूब पर मौजूद है.



फैन्ड्री को याद करते हुए

‘फैन्ड्री’ के बहाने अलग-अलग यादों का कोलाहल मचने लगा है मन में...इन यादों का कालखंड बहुत लम्बा है. फैन्ड्री इस शीर्षक के साथ बचपन से लेकर कल-परसों तक की अनेक बातें आँखों के सामने तैरने लगती हैं. जैसे-जैसे समझ आती गई वैसे-वैसे मन में एक अजीब सा डर, हीनता का अहसास ‘बाइ डीफ़ॉल्ट’ रहा. यह हीन भावना खानदानी है. जब से समझ आई तभी से अनजाने ही अपनी सीमाओं का अहसास मन में घर कर गया था. बचपन में रामायण देखने जाता तब सब की जगहें निश्चित हुआ करती थीं. मैं अपनी जगह पर खड़े होकर राजा राम की माया देखा करता, तभी मन के अन्दर लगे “नो एंट्री” के अदृश्य बोर्ड मज़बूत होते गए होंगे. मेरे अन्दर की हीनता के पुख्ता सुबूत परिवेश द्वारा अधोरेखित हो रहे थे.
अबोध उम्र के मासूम साहस पर पाबंदी कब लगी यह पक्का याद नहीं. हरेक दहलीज की जाति-धर्म पता करके कदम कब से रखने लगा कौन जाने? ये नपुंसक सयानापन, एक अंधी शरणशीलता कब घर कर गई किसे पता? स्कूल में अलग-अलग फॉर्म भरते हुए खुद का, माँ-बाप का या जाति का नाम बताया तो एक हिंस्र, कुटिल हँसी क्लास में गूँजती, इसलिए जितना संभव हो सके उतना अध्यापक के करीब जाकर किसी दूसरे को सुनाई न दे पाए इतनी धीमी आवाज़ में अपनी पहचान बताई जाए यह सयानापन तीसरी-चौथी कक्षा से आने लगा था. अपनी पहचान का, अस्तित्व का रूपांतर हीन भावना में हो जाने पर कहने लायक खुद के पास कुछ नहीं बचता.
पता नहीं कब से खुद अपना नाम लेते हुए भय लगने लगा. कोई अपराध होने का, हो चुकने का डर लगातार लगने लगा.
मेरा बाप मेरे हमउम्र दोस्तों को सीधे ‘सेठ’,’साहेब’,’सरकार’ ऐसे संबोधनों से पुकारता तब अपनी दोस्ती की, समानता की आशा अतिरंजना लगती और गले का फंदा कभी किसी ने ढीला कर बाँधा तो वही आज़ादी लगती. ऐसा होने पर भी पलकें सपने संजोना नहीं छोड़तीं. इतनी सख्त नाकेबंदी में सपनों को छोटी-छोटी राहें मिलतीं. बस एक जींस पैंट, तीज-त्यौहार पर पूरनपोली, घर में बिजली का कनेक्शन, पैरों में चप्पल ऐसी बातें सपनों जैसी लगतीं. ऐसी साधारण इच्छाओं की जमाखोरी करके व्यवस्था उन्हें सपनों का भाव दिला देती है. मगर इच्छाओं की, सपनों की न कोई जाति होती है न धर्म. सपने मासूमियत के साथ कोई भी इच्छा ज़ाहिर करते हैं. फिर अपने सपनों और हीन भावना का संघर्ष शुरू होता है. इस संघर्ष में हमेशा ही हीन भावना सपनों को मात दे देती है.
कॉलेज पहुँचने पर एक पुराना सा सपना ठाठें मारने लगा. क्लास में, कॉलेज में सम्मानजनक व्यवहार हो, इज्ज़त मिले यह सपना था. प्रथम वर्ष में श्री.म. माटे की एक कहानी पाठ्यक्रम में थी. उस कहानी का नायक एक खलनायक को ‘ए, काले वडर[i]....’ कहते हुए गालियाँ देता है. पाठ्यक्रम की सारी कहानियाँ पहले से पढ़ लेने की आदत की वजह से यह वाक्य पढ़ कर मैंने फैसला कर लिया था कि यह कहानी जब क्लास में पढ़ाई जाएगी तब अनुपस्थित रहूँगा. कहानी पढ़ाई जा चुकी होगी यह मानकर आठ-दस दिनों बाद क्लास में हाज़िर हुआ तो ठीक उसी दिन सर ने माटे की वह कहानी पढ़ाना शुरू किया. और जिस बात का मुझे डर था वही हुआ. ‘ऐ, काले वडर...’ यह वाक्य सर ने पढ़ा और सारी क्लास अपनी हंसी रोकते हुए मेरी ओर देखने लगी. ईश्वर की भांति वहीँ बैठे-बैठे अंतर्ध्यान हो जाऊं, ऐसा बस उसी क्षण लगा था.
ऐसे तबाह असफल लम्हों में आदमी ऐसे चमत्कारों की उम्मीद करने लगता है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर ऐसे तबाह होने की याद आती है. स्कूल नाम के भयालय की याद आती है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर नाज़ुक मासूम सपनों की याद आती है...सपनों के चूर-चूर होने की याद आती है...

फैन्ड्री का क्या मतलब?
यह सवाल मुझसे कई बार पूछा गया.
और मैं आज तक टालता रहा एक लफ्ज़ में फैन्ड्री के मानी बताना..
फैन्ड्री हमारे ही अगल-बगल में जीने वाली एक जनजाति की बोली का शब्द
है.
यह भाषा बोलने वाले इंसानों को हम नहीं जानते
उनके सुख-दुख
उनके सपने
उनकी वेदनाएं
उनके अस्तित्व का जैसे हमें कोई अहसास ही नहीं.

आप फैन्ड्री का मतलब क्या है यह खोजने आएँगे तब
आपको इन उपेक्षित-तुच्छ समझे जाने वाले इंसानों के अस्तित्व का, उनकी वेदनाओं का
अहसास हुआ तो
फैन्ड्री की आपकी तलाश
और मैंने बनाकर रखा हुआ रहस्य दोनों फलीभूत हुए, ऐसा कहा जा सकेगा.

असल में फैन्ड्री ये कोई रहस्य नहीं.
वह एक आमंत्रण है हम सबके लिए
कि आएं और स्वीकार करें इस कटु यथार्थ को
जिस से हमेशा हम आँख बचाकर निकल जाना चाहते हैं...
जिसे हरदम हम छुपाते आए किसी महारोग की भांति
एड्स की तरह.
मगर जब इस बीमारी का इलाज होगा
हम स्वीकार करेंगे कि हम रोगग्रस्त हैं
तभी एक निरोग, ममतामयी सुबह की संभावना तैयार होगी.



[i] महाराष्ट्र की एक पिछड़ी घुमंतू जाति जिसका पारंपरिक काम पत्थर तोड़ना है.

Monday, November 18, 2013

मुज़फ़्फ़रनगर के ओमप्रकाश वाल्मीकि


ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के थे और इस तरह एक चलन की तरह मैं कह सकता हूं कि यह मेरी निजी क्षति है। कहने को मुज़फ़्फ़रनगर की `साहित्यिक?` संस्थाएं भी ऐसे बयान अखबारों के लोकल पन्नों पर छपवा सकती हैं कि यह उनकी और मुज़फ़्फ़रनगर की `अपूर्णीय क्षति` है। लेकिन, सच यह है कि वे दिल्ली-देहरादून राजमार्ग पर मुज़फ़्फ़रनगर जिला मुख्यालय के पास ही स्थित बरला गांव में पले-बढ़े होने के बावजूद न मुज़फ़्फ़रनगर के ताकतवर सामाजिक-सांस्कृतिक मिजाज का प्रतिनिधित्व करते थे और न खुद को साहित्य-संस्कृति की संस्था कहने वाले स्थानीय सवर्ण नेतृत्व वाले जमावड़ों का। ऊपर से कोई कुछ भी कहे, इन संस्थाओं के हालचाल, इनकी नातियों, एजेंडों और इनकी किताबों को देखते ही पता चल जाएगा कि वाल्मीकि जी बचपन के प्राइमरी स्कूल के त्यागी मास्टर की तरह इनके लिए भी `अबे चूहडे के` ही बने रहे। जिन संस्थाओं ने कवि सम्मेलनों के मंच पर ज़िंदगी भर अश्लील-फूहड़ चुटकुलेबाजी करने वाले सत्यदेव शास्त्री भोंपू को हास्यारसावतार बताकर उसकी पालकी ढ़ोई हो और जहां कभी जाति, वर्ग और दूसरे यथार्थवादी सवालों पर बहस आते ही इस्तीफों और निष्कासन की नौबत आ जाती हो, जिन संस्थाओं की सालाना किताबें फूहड़ ब्राह्मणवादी, स्त्री विरोधी और उन्मादी और दक्षिणपंथी सामग्री से भरी रहती हों, वहां वाल्मीकि जी को आयकन होना भी नहीं चाहिए था।

लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से परिचय से पहले स्कूली दिनों मैंने शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा `अक्करमाशी` के बारे में किसी अखबार के इतवारी पन्ने पर पढ़ा था और किसी तरह दिल्ली पहुंचकर यह किताब हासिल भी कर ली थी। इस किताब ने दिल-दिमाग में तूफान खड़ा कर दिया था। जूठन चूंकि अपने ही आसपास की `कहानी` थी, उसे पढ़ने पर बेचैनी और ज्यादा बढ़ जाना स्वाभाविक था। मैंने कई लोगों को बड़ी बेशर्मी से यह कहते भी सुना कि मेलोड़्रामा पैदा कर किताब बेचने का यह बढ़िया तरीका है। इनमें एक सज्जन गाहे-बगाहे दलितों के प्रति भावभीने उद्गार सुनाने में प्रवीण थे। मैंने कहा कि कौन नहीं जानता कि इसमें लिखा एक-एक शब्द सही है और गांव का नाम बदलने और मास्टर से पहले त्यागी की जगह जाट, राजपूत वगैरहा ऐसा कोई दूसरा `ताकतवर शब्द` जोड़ देने से भी उतना ही सही रहता है।

1992 के बाद के किसी साल वाल्मीकि जी मुज़फ़्फ़रनगर के लेखकों के पास रुके होंगे। मुझे अगले दिन `अमर उजाला` में पहुंची `वाणी` नाम की एक संस्था की प्रेस विज्ञप्ति से यह पता चला। उन्होंने गोष्ठी में क्या कहा, स्थानीय लेखकों से उनकी क्या बातचीत हुई, इस बारे में विज्ञप्ति में कोई शब्द नहीं था। मैंने उनके कार्यक्रम की कोई पूर्व सूचना न देने और विज्ञप्ति में उनकी कही बातों का जिक्र तक न होने पर नाराजगी जताई तो वाणी के एक जिम्मेदार पदाधिकारी ने बताया कि वे तो बस यूं ही आए थे, मुलाकात हुई, कुछ बातें हुईं। पिछले साल इसी संस्था की सालाना किताब के संपादन की जिम्मेदारी एक दलित युवक को दी गई थी जिसने `समन्वय` उनवान को सार्थक बनाने के लिए पूरा समर्पण कर रखा था। तो भी संस्था के सवर्ण संचालकों को जाने क्या नागवार गुजरा कि इस बरस शर्त बना दी गई कि रचनाएं शोधपरक न हों और सद्भाव बिगाड़ने वाली न हों। तो मुझे लगता है कि उस दिन बाल्मीकि जी की बातें `सद्भाव की हिफाजत` करने के लिहाज से ही जारी नहीं की गई होंगी।

मेरे लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की `जूठन` मेरे `घर` के यथार्थ को सामने रखने वाली किताब थी और वे इस जिले की उन हस्तियों की तरह मेरे लिए गौरव की वजह थे जिन्हें मुख्यधारा या तो भुलाए रखती है या याद भी करती है तो इस तरह कि उनकी ज़िंदगी और उनके कामों के जिक्र से कथित सद्भाव में कोई खलल न पड़े। वाल्मीकि जी ने कई उल्लेखनीय कविताएं और कहानियां लिखीं पर `जूठन` के साथ कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे पास कभी नहीं रह सकी। मैं इस किताब को हमेशा किसी को पढ़ने के लिए देता रहा और मौका लगते ही फिर-फिर खरीदता रहा। `अमर उजाला` ने करनाल भेज दिया तो वहां रंगकर्मी युवक अमित नागपाल ने `जूठन` के कुछ हिस्सों की अनेक बार एकल प्रस्तुति दी। तरह-तरह के तर्क देकर इस मंचन को रोकने की कोशिशें बार-बार की गईं। युवा महोत्सव में यह तर्क दिया गया कि एक अकेले कलाकार की प्रस्तुति को सामूहिकता दर्शाने वाले कार्यक्रम में नहीं होना चाहिए। कॉलेजों के ऐसे जाहिल और धूर्त मास्टरों-`कला-संरक्षकों` को उनकी असल चिढ़ का कारण बताकर हम लोगों ने हमेशा चुप भी कराया।

संयोग से वाल्मीकि जी से एकमात्र मुलाकात कुछ बरस पहले रोहतक में एक सेमिनार में हुई थी। उनकी कई बातों से मैं सहमत नहीं था बल्कि कई बातों से हैरान था। सीपीआईएम से जुड़े लोगों और बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड़े एक अध्यापक व उनके कार्यकर्ताओं के रवैये से सेमिनार में सवाल-जवाब का मौका भी नहीं मिल सका। मैं उनसे फिर कभी मिलकर विस्तार से बहुत सारी बातें करना चाहता था। उन्हें लम्बे समय से पसंद करने की अपनी वजहें एक आम कस्बाई पाठक की तरह बताना चाहता था और उनसे अपनी असहमतियों और सामने खड़े खतरों पर चर्चा करना चाहता था। इन दिनों जबकि मुज़फ़्फ़रनगर उन्हीं मनुवादी ताकतों की साम्प्रदायिक चालों का शिकार हो रहा हो, जिनके खिलाफ संघर्ष से उनका लेखन निकला था, ये बातें और भी ज्यादा जरूरी लग रही थीं। मुझे उम्मीद थी कि वे ठीक होकर फिर से सक्रिय होंगे।

`जनसंदेश टाइम्स` अखबार में आज 18 नवंबर को प्रकाशित।
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और मुज़फ़्फ़रनगर के ही रहने वाले कवि-मित्र परमेंद्र सिंह की फेसबुक पर इस पोस्ट पर आई टिपण्णी के बिना ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुज़फ़्फ़रनगर के साहित्यिक समाज के रिश्ते की यह गाथा अधूरी रह जाती। इसलिए वह टिपण्णी यहां भी साझा कर रहा हूं-`ओमप्रकाश वाल्मीकि का निधन एक बहुत बड़ी क्षति है पूरे हिंदी समाज के लिए. जहाँ तक मुज़फ्फरनगर से उनके सम्बन्ध का सवाल है, तो मुज़फ़्फ़रनगर की साहित्यिक संस्थाएं जिस तरह से अन्य मूर्धन्यों का नाम लेकर आत्मगौरव के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करती रही हैं, करती रहेंगी. ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ्फरनगर आये थे 'वाणी' संस्था के वार्षिक संकलन 'तारतम्य' (सम्पादक - नेमपाल प्रजापति) के विमोचन के लिए. समारोह में उनके वक्तव्य में प्रसाद, प्रेमचंद, पन्त पर की गयीं उनकी टिप्पणियों से अग्रिम पंक्ति में बैठे डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागों के अध्यक्ष, रीडर, प्रोफेसर वगैरह जिन्होंने साहित्यकार होने का सर्टिफिकेट देने का ठेका उठा रखा ही, कैसे उछल-उछल पड़े थे तिलमिलाकर, देखते ही बनता था. प्रोफेसर साहिबान के कुछ शिष्यों ने तो बाकायदा नारेबाजी तक की थी. हम कुछ लोगों ने मिलकर उन उपद्रवी शिष्यों पर बामुश्किल काबू पाया था. उक्त संकलन में शामिल किया गया 'दलित खंड' ही दरअसल में उन लोगों की आँख की किरकिरी बन गया था, और बना भी रहा... हमारा यह प्रतिरोध बना रहा और अंततः हम तीन मित्रों ने उस संस्था से किनारा कर लिया... खैर, उस गोष्ठी के बाद भाई Ashwani Khandelwal के घर पर 'प्रोफेसरों के साथ चाय पर भी बड़ी गरमा-गरम बहस हुई... एक प्रोफेसर ने अंत में कहा - दलितों को बराबरी का दर्जा देते हुए हमारे संस्कार आड़े आते हैं.`

Saturday, October 19, 2013

हिटलर के यातना शिविर हैं ये गांव- शंबूक

देसां म्हैं देस हरियाणा जित......

30 मार्च, शनिवार तक़रीबन शाम साढ़े 5 बजे के आस-पास का बात है, जब मदीना गांव, भैराण रोड़ नहर पर दबंग जाति के लोगों द्वारा खेतों में मेहनत-मजूरी करके लौट रहे दलितों के साथ जमकर ख़ून की होली खेली गई। ताक़तवर दबंग जाति के ये बिगड़े हुए शोहदे बकायदा योजनाबद्ध तरीके से, हथियारों से लैस होकर, नहर के पास झाड़ियों में घात लगाए बैठे थे। दलित मज़दूरों में महिलाएं भी थीं और बच्चे भी। दिन भर की कड़ी मेहनत और पसीने से रवां शरीर, मज़दूरी ख़त्म होने के बाद जब शाम को सूरज ढल रहा होता है, दोबारा से नई ताज़गी हासिल कर लेता है। क्योंकि इस बात का इत्मीनान होता है कि आाज का काम ख़त्म। चेहरे पर मेहनत की लकीरें चुहलबाज़ी करने लगती हैं और हल्की-फुल्की चुटकियां लेते मज़दूर घर को लौटने लगते हैं। इसी वक़्त परींदे भी अपने घोंसलों को लौटते हैं। ये दलित परीवार भी इसी तरह अपने घर को लौट रहा था। इस बात से अनभिज्ञ कि नहर पर मौत उनका इंतज़ार कर रही है।
जैसे ही दलितों की बुग्गी नहर पर पहुंची, बदमाशों ने हमला बोल दिया। अंधाधुंध फायरिंग कर दी। एक 10 साल के बच्चे के सिर में गोली लगी और बच्चा ख़ून से लथपथ तड़पने लगा। एक नौजवान की छाती में गोली लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। एक नौजवान की जांघ में गोली लगी जो आज भी मेडिकल में ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है। महिलाओं और लड़कियों ने खेतों में भागकर, छिपकर अपनी जान बचाई।
हादसे का कारण ये है कि दलितों ने बस्ती में महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाले दबंग जाति के इन बदमाशों को टोक दिया था। ये घटना कोई 8-9 महीने पहले की है। दबंग जाति के ये नौजवान एक मरतबा रात को जबरन एक दलित परिवार के घर में घुस गये अैर महिलाओं के साथ बदतमीज़ी करने लगे तो दलितों ने उसकी जमकर पिटाई की। गौरतलब है कि दलित बस्ती में गांव के सरपंच ने अपना अड्डा बना रखा है जहां दिन-रात लफंगे पड़े रहते है। राब पीते हैं, अय्याशी करते हैं और कहीं भी खड़े होकर पेशाब करने लगते हैं। पानी भरने या अन्य किसी काम से भीतर-बाहर जाने वाली लड़कियों के साथ बदतमीज़ी करते हैं। शौच के लिये बाहर जाना पड़ता है, इस वक़्त महिलाओं को तंग किया जाता है और जोर-जबरदस्ती तक की नौबत आ जाती है। इन लफंगों ने पहले भी कई बार बस्ती में महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की है और कहासुनी हुई है। ये मामला 8-9 महीने पुराना है। इस दरम्यान पुलिस थाने में भी कई बार इतिल्ला दी गई लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नही की। आज गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है और दलित ख़ौफ के साये में हैं।
ऐसा ही सन्नाटा उस वक़्त पसरा था जब दलितों ने दबंग जाति के नौजवान की पिटाई की थी। तब जाटों ने योजना बनाई थी कि दलितों को गांव से खदेड़ दिया जाये। लेकिन गांव के ही एक पूर्व चेयरमैन और ज़िला प्रशासन के हस्तक्षेप से बड़ा हादसा टल गया था। बहरहाल उसी मौके पर लड़के ने भरी पंचायत में ऐलान कर दिया था कि मैं जेल से छूटते ही इन (दलित) लोगों को क़त्ल करूंगा। अभी कुछ दिन हुये ये लड़का जेल से छूटकर आया था। इसने आते ही अन्य बदमाशों को इकठ्ठा किया, गैंग बनाया और दलितों की बर्बरतापूर्ण हत्या कर दी। गांव के लोंगों का मानना है कि अगर पुलिस समय रहते कार्रवाई करती तो ये हादसा टल सकता था।
गौरतलब है कि हरियाणा में ये कोई पहली घटना नही है और ना ही मदीना में पहली घटना है। मदीना में पहले भी दबंगों ने एक दलित की हत्या की थी और पंचायत आदि करके मामले को रफा-दफा कर दिया गया था। जाटों ने पीड़ित परिवार को मुआवज़ा देने की बात तय की थी लेकिन गांव गवाह है कि आज तक कोई मुआवज़ा नही दिया गया। इसके अलावा गाहे-बगाहे दलितों के साथ मारपीट आम है। एक बार एक दबंग जाति के किसान ने दलितों की चैहनीशमशानघाट पर कब्ज़ा कर लिया था और मात्र थोड़ी सी ज़मीन छोड़ दी। दलित बस्ती के लोग इकठ्ठा होकर तुरंत मौके पर पहुंचे तब शान घाट पर बाड़ की जा रही थी। दलितों ने ऐतराज़ जताया तो उन्होंने बहुत बेहूदा और घटिया अंदाज़ में कहा था कि ‘‘के सारे चूड़े कठ्ठे मरोगे, जो इतना बड़ा शान घाट चाहिये।’’
रविदास जयंति पर मदीना गांव में ही कुछ दबंग जाति के नौजवान जानबूझकर बार-बार महिलाओं में घुस रहे थे। वहीं पर पास में कढ़ाई चढा रखी थी, प्रसाद के लिये। कुछ नौजवान वहां बैठकर सब्ज़ी काट रहे थे, आलू वगैरह छील रहे थे। इन दलित नौजवानों ने जब उन लफंगों को टोका तो उन्होंने चाकू से हमला कर दिया। जिसमें तीन नौजवान घायल हुए। एक नौजवान का ज़ख़्म आज तक नही भरा है। इसके अलावा वाल्मीकि जाति के नौजवान पंकज को सर्दियों में दबंगों ने तक़रीबन जान से मार दिया था। ख़ुदा की ख़ैर है कि वो बच गया लेकिन छः महीने तक खाट भुगती। सर्दियों की बात है, सुबह 6-7 बजे के आस-पास पंकज शौच आदि से निवृत्त होकर घर लौट रहा था। कोल्हू के पास दबंग जाति के नौजवान छिपे हुये थे। उन्होंने गुड़ बनाने वाले गरम पलटों से हमला बोल दिया....। मात्र मदीना ही नही बल्कि हर गांव में दलित उत्पीड़न के महाकाव्य हैं।
हरियाणा के गांव हिटलर के यातना शिविर बने हुए हैं। हर गांव में बर्बर हादसे सिर दबाये बैठे हैं। ये हर रोज़ गर्दन निकालते हैं और दलित ख़ून का घूंट पीकर, अपमान झेलकर, माफी आदि मांगकर इन हादसों को दो क़दम दूर ठेल देते हैं। रोजमर्रा के स्वाभाविक काम मसलन भीतर-बाहर आना-जाना, बच्चों का स्कूल जान, पानी लाना, दुकान से सौदा लाना, टट्टी-पेशाब जाना आदि अत्यंत अपमान से गुजरकर अंजाम पाते है। अगर कोई व्यक्ति ये स्वाभाविक क्रियाएं करने के लिये भी सौ बार सोचे तो आप समझ सकते हैं कि क्या स्थिति है। ग़रीबों का पूरा कुनबा खटता है तब पेट भरता है। दिहाड़ी-मजूरी करनी ही पड़ती है। दिहाड़ी के लिये इन्हीं के खेतों में जाना होता है। मजूरी के पैसे के लिये झगड़े होते हैं। ईंधन लेने जाने वाली महिलाओं के पीछे दबंग जाति के ये तथाकथित इज़्ज़तदार लोग और इनके सुपुत्र कपड़े निकाल कर भाग पड़ते हैं। अैसी कई घटनाएं सामने आई हैं। गुजारे के लिये कुछ परिवार पशुपालन करते हैं मसलन एकाध मुर्गी, बकरी या सुअर पालते है। इन पशुओं को लेकर दलितों को आये दिन धमकाया जाता है, पीटा जाता है। कई मरतबा पषुओं को ज़हर दे दिया जाता है। गांव में गुजारा कैसे हो? गांव में गुजारे के साधन यही हैं- ज़मीन, शुपालन या फिर दिहाड़ी-मजूरी। ज़मीन चाहे खेती योग्य हो या शामलाती, सब जगह वे ही पसरे पड़े हैं। जातिगत उत्पीड़न का ताल्लुक़ ज़मीन से सीधा है। हरियाणा में भूमि सुधार लागू किया जाना चाहिये और बेज़मीनी दलित परिवारों को भूमि आवंटित की जानी चाहिये।
दलित महिलाएं ताक़तवर तबकों के निशाने पर हैं। हरियाणा में पिछले दिनों हुई सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में ज़्यादातर शिकार दलित लड़कियां हैं। दलित महिलाओं के साथ छेड़खानी, बलात्कार करना दबंग जाति के ये लफंगे अपना अधिकार समझते हैं। शायद गाम-राम, मौज़िज़ लोग, पुलिस और प्रशासन भी। तभी तो कोई कार्रवाई नही होती। उल्टा अगर दलित ऐतराज़ ज़ाहिर करते हैं, महिलाएं विरोध करती हैं तो सबमें कभी खुली तो कभी छिपी प्रतिक्रिया होती है। मात्र मदीना ही नही तक़रीबन हर गांव में दलित बस्ती को इन लफंगों ने अपनी चारागाह बना रखा है। अगर कोई टोक दे तो मारपीट, क़त्ल, दंगा, आगजनी।
कितने अैसे मामले हैं जिनमें टोकने पर दलितों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया और पंचायत में माफी भी मंगवाई और बेइज़्ज़त भी किया। सवाल उठता है कि ये असामाजिक तत्व इतना बेख़ौफ़ क्यों है? जवाब स्पष्ट है कि पुलिस, क़ानून, कोर्ट किसी बात का डर नही है। क्योंकि इन सब ने बार-बार दलित और महिला उत्पीड़न के मामलों में इन ताकतवर जातियों और लफंगों के साथ ही प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है। गौरतलब है कि दुलीना में पुलिस चौकी के अंदर पांच दलितों की पीट-पीट कर हत्या की गई थी, गोहाना में पुलिस की मौजूदगी में दलित बस्ती को आग लगाई और मिर्चपुर के दलित जब न्याय के लिये प्रतिरोध कर रहे थे तब उन पर लाठियां भांजी गई। सामूहिक बलात्कारों और यौन हिंसा के खि़लाफ रोहतक में प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर लाठीचार्ज किया गया। प्रदर्शन में पीड़ित लड़कियां, उनके परिजन और पूर्व सांसद वृंदा करात भी थी। इन असामाजिक तत्वों को दूसरी ताक़त मिलती है जात से, ज़मीन से, दलाली से आयी नई पूंजी से, खाप पंचयतों से, पुरूष होने के दंभ से। हरदम ग़रीबों की जान हलक़ में अटकाये रखने वाले ये बदमाश हरियाणा की राजनीति को चलाने के महत्वपूर्ण क़िरदार हैं। इनको बकायदा राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। क्योंकि दलित, अल्पसंख्यक, महिलाओं के साथ मनमर्ज़ी करना, अपमान करना, बेगार कराना इन बातों को सामाजिक स्वीकार्यता है, हरियाणा के दंभी समाज में।
इसलिये इस तरह की घिनौनी हरकतों को टोल बनाकर, गैंग बनाकर भीड़ बनाकर अंज़ाम दिया जाता है। इसके कई फायदे हैं ताकत तो बढ़ती ही है, इसके अलावा क़ानूनी चोर दरवाज़ों की मदद भी मिलती है। चाहे दुलीना का मामला हो, चाहे मिर्चपुर हो, हरसौला हो या फिर गोहाना हो या फिर मदीना हो, टोल बनाकर, इकठ्ठे होकर ये लोग अपनी ताकत का झण्डा कमजोरों की छाती में गाड़ते हैं। परिणामस्वरूप केस ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ दर्ज़ होता है। इस बात पर और अधिक प्रतिक्रिया होती है। यहां तक कि कई संवेदनषील व समझदार लोग भी बेक़सूरोंको बचाने की दुहाई देने लगते हैं। ये फिनोमिना की तरह सामने आया है। मिर्चपुर में बेक़सूरोंको बचाने के लिये पंचायतें हुई। प्रगतिषील लोगों ने भी सुर में सुर मिलाया। आॅनर किलिंग के मामलों में भी अैसी बात सामने आई और अब मदीना में भी 1 अप्रैल को जाटों की पंचायत हुई। जिसमें यही बात सामने आई कि बेक़सूरोंके नाम भी लिखे गये हैं। मदीना कांड मामले की जांच कर रहे एसपी राजेष दुग्गल का कहना है कि ‘‘मामला गंभीर है और बेक़सूरों को सजा नही मिलनी चाहिये।’’ कमाल है बिना किसी कार्रवाई, पूछताछ, जांच, गिरफ्तारी के इन्हें कैसे मालूम पड़ जाता है कि कौन बेक़सूर है। दलित उत्पीड़न के केस में ये अधिकारी जांच करने की बजाय अंतर्यामी बन जाते हैं। गौरतलब है कि गांव के सरपंच जितेन्द्र के ख़िलाफ भी एफआईआर है। लेकिन वो गांव में खुला घूम रहा है और उसी ने गांव में पहलकदमी करके समानांतर पंचायत का आयोजन किया। जिसमे दलितों के किसी प्रतिनिधि और पीड़ित परीवार को पक्ष रखने के लिये षरीक तक नही किया गया। इससे साफ पता चलता है कि इस तरह की पंचायतों के क्या रूझान हैं। जिस पर गुजरी है वो ढंग से एफआईआर भी नही करा सकता। ये सुनिष्ति करना बहुत ज़रूरी है कि पीड़ितों के द्वारा दर्ज़ कराई गई एफआईआर को ही जांच का आधार बनाया जाये और भविष्यवाणी के आधार पर स्वयंभू न्यायधीष बनने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
इन गांवों की रोजमर्रा की ज़िंदगी में फासीवाद पसरा पड़ा है। प्रतिदिन का अपमान और उत्पीड़न, थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बर्बर हमले और उसके बाद न्याय की लड़ाई। न्याय की प्रक्रिया और भी कष्टकारी है। क्येंकि बाद में धमकियों का दौर षुरू हो जाता है। डराया जाता है, कर्ज़ वापसी का दबाव बनाया जाता है, स्कूलों से बच्चों को निकाल दिया जाता है, दुकानों से सामान नही लेने दिया जाता मतलब पूरी ज़िंदगी अस्त-व्यस्त। हरियाणा में कितनी ही बार दलित विस्थापन की नौबत आई है। 200-250 परिवार, बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे, पषु वगैरह खुले आसमान के नीचे मौसम की मार खाते हैं। मिर्चपुर के ज़्यादातर परिवार अभी गांव से बेदखल हैं।
प्रष्न ये उठता है कि पुलिस, नौकरषाह, राजनेता, न्यायपालिका क्या अफीम खाये बैठे हैं। कब तक महिला सषक्तिकरण और दलित उत्थान के गूंगे ढोल पीटते रहेंगे। हरियाणा में दलित आयोग का गठन क्यों नहीं किया जा रहा है। ये सुनिश्चित किया जाये कि आयोग में ऐसे लोग हों जो सामाजिक न्याय और जातिगत मसलों पर संवेदनशील हों, जिनका इन मसलों पर संघर्ष करने का रिकार्ड हो। वर्ना महिला आयोग की तरह ही खानापूर्ति होगी। जगजाहिर है कि हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष ने लड़कियों के लिये ड्रैस कोडकी वकालत की थी। यूं तो 6-7 महीने पहले ही हरियाणा में मानवाधिकार आयोग बनाया गया है, जो ख़ुद दयनीय हालत में है। आयोग के नाम पर बेहूदा मज़ाक। ये और भी ज़्यादा भयानक बात है क्योंकि उत्पीड़ित तबकों के हक़ों, मान-सम्मान और सुरक्षा के लिये बनी महत्वपूर्ण एजेंसी प्रहसन बन जाती है। उत्पीड़ितों के बचे-खुचे एकाध सहारे भी छीन लिये जाते हैं, उनका अपहरण कर लिया जाता है।
जिस भी इलाके में जातिगत हिंसा होती है वहां पर कार्रवाई ना करने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को दोषी करार दिया जाये, सजा मिले। चुने हुये प्रतिनिधियों की जवाबदेही फिक्सकी जाए। इस तरह के मामलों पर उल-जुलूल बयान देने वाले राजनेताओं और पंचायतियों पर भी कार्रवाई की जाये। केस के दौरान होने वाली पंचायतों पर अंकुश लगे जो गुण्डों को बचाने के भोंडे तर्क देते हैं। पीड़ितों पर दबाव बनाते हैं और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। दलित उत्पीड़न के केसों में पीड़ितों के द्वारा बार-बार जोर दिये जाने के वजूद भी एससीएसटी एक्ट नही लगाया जाता। मात्र पुलिस ही नही बल्कि आमतौर पर समाज में भी जातिगत हिंसा को आम झगड़े व अपराध की तरह देखने का रुझान है। दुख और हैरानी की बात ये है कि संवेदनशील लोग भी इस रुझान की चपेट में आ जाते हैं। असल में एफआईआर दर्ज़ कराना ही महाभारत है और अगर हो भी जाये तो साधारण मारपीट, झगड़े आदि के केस बनाये जाते हैं। एफआईआर दर्ज़ करने की प्रक्रिया सुगम बने और कार्यरत प्रभारी कर्मियों की मनमानी पर अंकुश लगाने और उन्हें मॉनीटर करने का प्रबंध किया जाये। एफआईआार दर्ज़ ना करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो। असल में विडम्बना ये है कि बदमाशों के पास आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक ताकत है, साथ ही औपचारिक और अनौपचारिक ढांचे भी कहीं न कहीं इन्हें ही सर्पोट मुहैया कराते हैं। ग़रीब, दलित और महिलाओं के मदद, सुरक्षा और न्याय के लिये बनी एजेंसियों मसलन थानों आदि तक से ये तबके तौबा करते हैं, डरते हैं। ये बड़ा प्रश्न है कि कानूनों को व्यवहारिक तौर पर अमल में कैसे लाया जाये? थाने, तहसील, कोर्ट, पुलिस, प्रशासन को अपना क़िरदार बदलना होगा। ताकि पीड़ित लोग बेहिचक अपनी शिकायतें दर्ज़ करा पाएं और बदमाशों के आत्मविष्वास को ढीला किया जाये। वर्ना एफआईआर, शिकायत तो दूर की बात, अभी तो हालत ये है कि आपका कलेजा निकाल लें और रोने भी ना दें।

नोटः- गौरतलब है कि मदीना काण्ड में 18 लोगों के खि़लाफ एफआईआर दर्ज़ है लेकिन अब तक मात्र चार लोगों को ही गिरफ्तार किया गया है। इसी दरम्यान पबनावा कैथल में भी जातिगत उत्पीड़न का गंभीर मामला सामने आ चुका है। हिसार ज़िला के कल्लर भैणी गांव में 15 साल के बच्चे से दबंगों ने पानी का बर्तन छीन लिया, बर्तन का पानी उड़ेला और पीने के पानी के बर्तन में पेषाब किया। लड़के के मामा ने विरोध किया तो जातिसूचक गालियां दी, लाठियों और बल्लम से उस पर हमला बोल दिया। यहां भी दबंग जाति के इन लफंगों ने दलित बस्ती को अपना अड्डा बना रखा है।
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(मार्च 2013 में मदीना कांड के बाद दिल्ली से वहां गए एक दलित युवक ने ये बातें मेल के जरिये भेजी थीं। तब से जींद में दलित युवती के साथ रेप और उसकी हत्या समेत जाने कितनी वारदातें हो चुकी हैं। उन सभी को इस मेल की रोशनी में देखा जा सकता है कि हर बार सरकार और उसकी मशीनरी का रवैया वही रहता है। चाहें तो हरियाणा के पड़ोसी राज्यों और देश के बाकी हिस्सों के गांवों को भी इस मेल की रोशनी में देख-समझ सकते हैं। इसीलिए इस पुराने मेल को इतने दिन बाद भी पूरी तरह प्रासंगिक पाकर यहां चिपका रहा हूं।-धीरेश)

Thursday, November 15, 2012

दलित उत्पीड़न का जातीय समीकरण



दिल्ली से सटा हरियाणा देसी-ग्रामीण मिजाज वाले विकसित राज्य के तौर पर जाना जाता है। यहां की सड़कें, यहां के गबरू जवान, यहां की बोली-बानी, यहां के खिलाड़ी लड़के-लड़कियां, यहां के नेता, यहां तक कि यहां की बदतमीजियां सब कुछ ग्लेमर के साथ पेश की जाती हैं। अहा ग्राम्य जीवन के सुरूर में जीने वालों को ग्रामीण समाज की भयंकर विसंगतियां कभी विचलित नहीं करती हों तो हरियाणा में हाल-फिलहाल में हुई बलात्कार की एक के बाद एक करीब बीस वारदातों से भी उन पर कोई असर पडऩे वाला नहीं है। तब तो शायद बिल्कुल भी नहीं जबकि उत्पीडि़त परिवार दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हों। लेकिन हरियाणा की घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के लिए भयंकर चेतावनी और चुनौती की तरह हैं। सबसे ज्यादा शायद इसलिए कि व्यवस्था ने न्याय करने के चिर-परिचित नाटक तक को जरूरी नहीं समझा। सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्ष दोनों खुलकर उत्पीड़कों की हिमायत में खड़े हो गए। अधिकांश वारदातों में आरोपी युवक हरियाणा के समाज और राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली किसान जाट जाति से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में स्वाभावकि था कि कुख्यात खाप पंचायतें सक्रिय हो गईं और बलात्कारियों को कड़ी सजा देने और उत्पीडि़तों की सुरक्षा और विश्वास बहाल करने की मांग के बजाय बलात्कार की वजहों के बेशर्म विश्लेषण शुरू हो गए। पश्चिमी संस्कृति और लड़कियों की चाल-ढाल से लेकर युवाओं की बेरोजगारी तक तमाम वजहें गिनाकर अपराध को एक स्वाभाविक और अनिवार्य सी घटना की तरह पेश करने की होड़ लग गई। खाप प्रतिनिधियों ने लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर देने की मांग करते हुए कानून में बदलाव की मांग की और इंडियन नैशनल लोकदल के मुखिया व पूर्व मुख्मंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने इसकी खुली हिमायत की। खापों को एनजीओ करार दे चुके और ऑनर किलिंग जैसे मामलों तक में खापों की भूमिका का बचाव कर चुके मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने चौटाला के बयान की भरपाई के लिए अपने सिपेहसालारों को आगे किया। कांग्रेस के एक जाट नेता धर्मवीर गोयत ने कहा कि रेप की वारदातें लड़कियों की मर्जी से होती हैं। वे अपने किसी प्रेमी के साथ कहीं चली जाती हैं और उनका प्रेमी अपने साथियों को बुलाकर लड़की को सामूहिक बलात्कार का शिकार बना लेता है। ऐसे बयानों से देश भर में प्रगतिशील तबका सन्न था लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री को कोई फिक्र थी तो सिर्फ यह कि जाट उनसे नाराज न हों। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस सिलसिले में हरियाणा का दौरा किया तो हुड्डा उन्हें ऐसे गांव में ले गए जहां उत्पीडि़त और आरोपी दोनों दलित समुदाय से ताल्लुक रखते थे और इस तरह जाटों के नाराज होने का खतरा नहीं के बराबर था। इस बारे में आवाज उठाने वाले संगठनों को जातिवाद न फैलाने की चेतावनी दी गई और दलित संगठनों को गांवों का कथित भाईचारा कायम रहने देने की सलाह दी गई। जनवादी महिला समिति ने विभिन्न महिला संगठनों के साथ मिलकर रोहतक में प्रदर्शन किया तो पुलिस ने लाठियां बरसा दीं। कहने का मतलब यह कि डेमोक्रेसी में इंसाफ न करते हुए भी इंसाफ करने का जो प्रहसन मजबूरी माना जाता है उससे पूरी तरह मुक्ति पा ली गई।
उत्पीड़कों को राजनीतकि संरक्षण के असर के लिहाज से अकेले हिसार जिले की कुछ वारदातों पर नज़र डालना मददगार हो सकता है। 21 अप्रैल 2010 को हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में जाट समुदाय के लोगों ने बाल्मीकि समुदाय के लोगों के घरों में आग लगा दी थी। एक विकलांग युवती सुमन और उसके पिता ताराचंद की मौके पर ही मौत हो गई थी। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना में सरकार और उसकी मशीनरी का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। खापों और जाट महासभा ने बाकायदा बयान जारी कर दलितों को मुकदमे वापस लेने की धमकियां दीं और आरोपियों के पक्ष में खूब हंगामा किया। आखिर, दलितों को गांव से पलायन करना पड़ा। मिर्चपुर के बहुत सारे दलित परिवार आज भी हिसार में वेदपाल तंवर नाम के एक चर्चित व्यापारी के फार्म हाउस पर झोपडिय़ां डालकर रहने को मजबूर हैं। मिर्चपुर कांड के एक प्रमुख गवाह विक्की के पिता धूप सिंह के मुताबिक, करीब एक साल पहले विक्की की भी हत्या कर दी गई है लेकिन इस बारे में कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं है। इसी फार्म हाउस पर खरड़ अलीपुर गांव से जाट किसानो द्वारा खदेड़ दिए गए कुछ बावरिया परिवार भी शरण लिए हुए हैं। दलितों का
मानना है कि मिर्चपुर की घटना में सरकार के रवैये ने उत्पीड़कों के दुस्साहस को दोगुना कर दिया। बाद में जाटों को आरक्षण की मांग को लेकर हिसार से सटे मइयड गांव में जाटों ने रेलवे ट्रेक पर डेरा डाल दिया। महीनों तक रेलवे लाइन पर कब्जा जमाए रखने और जमकर तोडफ़ोड़ करने के बावजूद उत्पातयिों के प्रति सरकार पूरी तरह नरम रही। मइयड ताकतवर जाटों के लिए एक सफल प्रयोग साबित हुआ और इसके बाद गांवों में दलितों पर उत्पीडऩ की वारदातें और तेज हो गईं। सदियों से चुपचाप सहते चले आने वाले दलितों की युवा पीढ़ी में प्रतिरोध की जिद ने भी प्रतिहिंसा को बढ़ावा दिया। हिसार में मिनी सेक्रेट्रिएट परिसर में लंबे समय से धरने पर बैठे भगाना से खदेड़े गए दलितों की यही कहानी है।

भगाना गांव में जाटों ने करीब 280 एकड़ शामलात की जमीन पर कब्जे के साथ ही खेल के मैदान पर भी कब्जे की कोशिश की तो दलित युवकों ने इसका विरोध किया औप प्रशासन को शिकायत भेज दी। जाटों ने पंचायत कर दलित युवकों के पिताओं को सख्त चेतावनी दी जिसे युवाओं ने मानने से इंकार कर दिया। आखिरकार, दलितों के घरों में तोडफ़ोड़ कर दी गई, उनके सामाजिक बहिष्कार का ऐलान कर उन्हें गांव से खदेड़ दिया गया। कुछ दलितों के घरों के दरवाजों के बाहर दीवारें चुनवा दी गईं। गांव से पलायन कर मिनी सेक्रेट्रिएट पहुंचे दलितों के पशु जब्त कर गौशाला भेज दिए गए और छह दलितों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा कायम कर दिया गया। भगाना के दलित अभी तक मिनी सेक्रेट्रिएट परिसर में डेरा डाले हुए हैं और वे दिल्ली में भी प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन इंसाफ मिल पाना तो दूर की बात उनके सम्मान व सुरक्षा के साथ गांव लौट पाने की संभावनाएं भी नहीं बन पा रही हैं। इसी जिले के डावडा गांव की नाबालिग दलित छात्रा के साथ गांव के ही किसान परिवारों के करीब 12 युवकों ने 9 सितंबर को न केवल सामूहिक बलात्कार किया बल्कि मोबाइल से फिल्म बनाकर एमएमएस भी जारी कर दिए। करीब नौ दिन बाद लड़की के पिता ने आत्महत्या कर ली और दलितों ने बलात्कारियों की गिरफ्तारी तक शव का पोस्टमार्टम न होने देने की चेतावनी दी तो हडकंप मच गया। पांच दिनों तक शव रखा रहा और खासी जद्दोजहद के बाद एक आरोपी पकड़ा गया तो 23 सितंबर को शव का अंतिम संस्कार किया गया। अभी तक सारे आरोपी गिरफ्तार नहीं हो पाए हैं और दलितों के खिलाफ जाटों का ध्रुवीकरण हो चुका है। उत्पीडि़त परिवार आतंक के साये में हैं। प्रशासन कुछ युवकों को बचाना चाहता है जिनमें से एक राजकुमार की मां उत्पीड़ित छात्रा को धमकी देने के लिए उसके मामा के हिसार स्थित घर ही जा पहुंची। आरोपियों में इनेलो और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के नेताओं से जुड़े युवा हैं और इस बात की संभावनाएं कम हैं कि लंबी लड़ाई में उत्पीड़ित को इंसाफ मिल पाएगा।

इसमें कोई शक नहीं है कि अपराधों में बढ़ोतरी के पीछे आर्थिक वजहें भी हैं। आज़ादी  के बाद हरियाणा में भूमि वितरण कानून लागू नहीं हो सका था। यही वजह रही कि पड़ोसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान बीघे को मानक मानते हुए बात करता है तो हरियाणा में किल्ले (एकड़) को मानक मानकर। यहां किसान खुद को जमींदार कहना ही पसंद करता रहा है। अब खेती की जोतें छोटी हो रही हैं और बेरोजगारी बढ़ रही है तो युवा अपराधों की तरफ बढ़ रहे हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति ने लुंपनिज़्म को बढ़ावा दिया है और आखिरकार लुंपन समूहों की मार औरतों और दलित औरतों पर सबसे ज्यादा पड़ रही है जिन पर पहले ही ज़मीन के नाम पर कुछ नहीं था। जाहिर है कि कोई भी विश्लेषण जातीय पहलू को शामिल किए बिना नाकाफी है क्योंकि सबसे ज्यादा आसान शिकार व नाइंसाफी के लिए अभिशप्त दलित तबका ही है और दलितों के प्रति उत्पीडऩ में शामिल तबके के युवाओं के पास ही प्रदेश में नौकरी की गारंटी सबसे ज्यादा है जिसे अब आरक्षण की मांग के साथ और पुख्ता करने की कोशिश की जा रही है। हरियाणा की सांस्कृतिक परंपरा की बात की जाए तो यहां नवजागरण का असर नहीं के बराबर रहा। आर्य समाज के असर वाले इस इलाके ने बंटवारे के खूनखराबे के साथ ही मिलीजुली सेक्युलर संस्कृति से भी रिश्ता खत्म कर डाला। बाद में इसके असर को पूरी तरह धो-पोंछ कर नया हरियाणा खड़ा किया गया। यहां बीजेपी खुद अकेली बड़ी राजनीतिक ताकत भले न हो लेकिन आरएसएस का नेटवर्क पूरे प्रदेश में बेहद मजबूत है। गाय के सहारे गांवों खासकर जाटों में सक्रिय रहने वाले आर्य समाज के साथ आरएसएस ने भी गांवों में असर बढ़ा लिया है। दुलीना में पांच दलितों को गाय के नाम पर जिंदा जला दिया गया था तो आर्य समाज और आरएसएस दोनों ने खाप-पंचायतों के साथ मिलकर हत्यारों के पक्ष में आवाज उठाई थी। दलित उत्पीडऩ की ताजा घटनाओं में भी आरएसएस की संदिग्ध सक्रियता से इंकार नहीं किया जा सकता है। दिल्ली में भी आरएसएस के राकेश सिन्हा जैसे प्रवक्ता टीवी बहसों में खाप प्रतिनिधियों के सुर में सुर मिला ही रहे हैं। 

इस तरह के मामलों में एक बड़ी बाधा संगठित प्रतिरोध का अभाव है। हिसार जिले का ही उदाहरण लें तो अलग-अलग धरनों के बावजूद एक सामूहिक संघर्ष खड़ा नहीं हो पाया है। यूं भी दलितों की चमार, धानक और बाल्मीकि जातियों में खासी दूरियां हैं और तीनों के ही पास न सामूहिक और न अलग-अलग विश्वसनीय नेतृत्व है। ऐसी परिस्थितियों में सबसे आसान माहौल जाट बनाम गैर जाट की सियासत करने वालों को नज़र आ रहा है। भजनलाल और देवीलाल परिवार लंबे समय तक इसी आसान सियासत का फायदा उठाते रहे। यह साफ है कि जाटों की तरह ही दूसरी ताकतवर जातियां भी अपने-अपने असर वाले इलाकों में दलितों और औरतों के साथ दुश्मनी का सलूक ही करते आए हैं। जहां तक नवजागरण और प्रगतिशील बदलाव की कोशिशों में जुटी ताकतों को सवाल है तो वे काफी बेबस नज़र आती हैं। लगातार मोर्चा लेने के बावजूद नई परिस्थितियों से कैसे निपटा जाए,इसकी तैयारी और समझ दोनों का अभाव साफ नज़र आता है।
खेत मजदूर सभा और ट्रेड यूनियन के सहारे सीपीएम ने हरियाणा के किसानों-मजदूरों के बीच खासा काम किया है और हिसार में अभी तक इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। जनवादी महिला समिति ने भी उत्पीडऩ के मामलों में प्रतिरोध की भूमिका अदा की है। लेकिन, नया दलित उभार वाम ताकतों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार नहीं है और खुद वाम ने इतने लंबे समय तक दलित कार्यकर्ताओं के साथ काम करते हुए दलित नेतृत्व तैयार नहीं किया।
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हरियाणा में दलित उत्पीड़न की वारदातों पर एक आधी-अधूरी टिपण्णी जो समयांतर नवंबर 2012 अंक में छपी है।