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Monday, September 21, 2026

नरेन्द्र जैन की कविताएँ

नरेंद्र जैन 


मेरे तईं नरेन्द्र जैन हिन्दी कविता के चित्तप्रसाद हैं क्योंकि उनकी कविता का विजुअल कॉन्टेंट वैसा ही सुस्पष्ट है और इम्पैक्ट उतना ही मर्मभेदी. उनकी कविता पढ़ना पिछले पचास सालों में  हिन्दी समाज और वृहत्तर भारतीय समाज के उल्लास और अवसाद, उत्थान और पतन की चित्रवीथिका से गुज़रना है. पिछले दो दशकों की उनकी कविता में सेंस ऑफ़ लॉस इतना गहरा है कि पाठक के मन में सालों तक बजता रहता है उस ‘उदास धुन’ की तरह ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे*’।-भारतभूषण तिवारी

(To me, Narendra Jain is the Chittoprasad of Hindi Poetry, for his poems have the same unmistakable visual content and impact, which is equally poignant. Reading his work is a stroll through a picture gallery of joys and despairs, the rise and fall of the Hindi world and Indian society at large. His poems from the last two decades carry a profound sense of loss that resonates in a reader’s mind for years like a ‘melancholy tune played by Rais Ahmed on his clarinet*’.-Bharatbhooshan Tiwari) 

 

इस वक़्त


इस वक़्त

पीली सुनहरी रोशनी है

घर में फड़फड़ाती अकेली


दीवारों पर डोलती है

चीज़ों की आधी परछाई

क़मीज़ की दो बाँहें

ख़ाली बोतलों के आसपास दुबका अंधकार


तस्वीरों की ख़ामोश आकृतियाँ

डूबी हैं अपने निर्जीव अंधकार में

बाहर, मटमैले आसमान में

भटके हुए यात्री जैसा आधा चाँद

आख़िरी नज़र डालता है सामने फैले

अंधकार पर


कैसी है यह दुनिया

जो रोज़ जिए चली जाती है


कैसा है यह मिट्टी का दीया

जो फैलाता है

इस विध्वंस के बीच पीली सुनहरी रोशनी


आह, आखि़री तिनके का सहारा

कितना मज़बूत है चट्टान की तरह



समर्थ लोग


साधारण लोगों के बारे में

थोड़ा बहुत कह सकता हूँ

समर्थ लोगों के बारे में

न पहले कुछ कहा मैंने

न अब कह पाऊँगा


उस रास्ते से गुज़रता हूँ

थके-हारे लोग जहाँ आते जाते हैं 

उनके खुरदरे हाथों और आशंकित चेहरों पर

पढ़ता हूँ कितनी ही कथाएँ


समर्थ लोग उदास होते नहीं देखे मैंने

इतने समर्थ देखे समर्थ लोग मैंने

जो पलक झपकते ही कर दिया करते हत्या

चाहे वह एक विचार हो या आदमी


हर बार खदेड़ दिया गया मैं इतनी दूर

की बँधी रही मेरी आखि़री उम्मीद

थके-हारे लोगों से


समझा जाए इसे ही

समर्थ लोगों के प्रति

मेरी घृणा का पर्याय



रंग


पहले चटख़ हुआ करते हैं

फिर धीरे धीरे रंग

उड़ना शुरू कर देते हैं

वे इतने धुँधले हो जाते हैं कि

पहचाने नहीं जाते

वे धब्बा भर बच जाते हैं

धूसर, बेमेल, अनाकर्षक

उन्हें देखकर कोई प्रसन्न नहीं होता


बाज़ मौके ऐसे आते हैं

चित्रकार इन्हीं धूसर रंगों से

बनाता है अपना चित्र




संशय


कल मैंने फिर स्वप्न देखा

कि मेरी ट्रेन छूट गई है

और हाथ में टिकट लिए मैं हताश

प्लेटफार्म पर खड़ा हूँ

रात के सन्नाटे में

आते जाते वाहनों से बचते बचाते

मैं उस क़स्बे में प्रवेश करता हूँ

जिसका नाम याद नहीं आता

सहसा उस अनजान जगह मुझे

अपना घर दिख जाता है

वही दीवारें, पुराने दरवाज़े, खिड़कियाँ

मैं दरवाज़ा खटखटाता हूँ

स्वप्न में एक शख़्स खोलता है दरवाज़ा

और कहता है कि

जो शख़्स रहा करता था यहाँ

अब अन्यत्र चला गया है



Three Essays collective से प्रकाशित।
कविता लिखे ज़माना हुआ


कविता लिखे ज़माना हुआ

अब जो लिखते हैं कभी

कविता है या कविता का पैरहन

या कविता की हमज़ाद या कविता का

अभिनय करती कोई कविता

ज़्यादातर तो वह कविता कोई

बहुरूपिया हुआ करती है

वह बोलती तो है लेकिन परदे के पीछे से

कोई दोहरा रहा होता है उसके संवाद

वह हाव भाव चाल ढाल और

शक़्ल सूरत से भी कविता दिखना चाहती है

आग का दरिया तो मुश्किल ठहरा

तीली की हल्की सी कौंध नहीं यहाँ

कविता के अकाल में लेकिन

चौतरफ़ सैलाब उतर आया है कविता का

शब्द और काग़ज़ चीखते हैं

हमें बख़्शो!


कविता लिखे ज़माना हुआ



यही हासिल ठहरा


जो बात

शीशे की तरह साफ़ थी

उसमें एक बात की परछाई उतर आई है

नदी बह रही है पूरे वेग से

छायाकार ठहरा एक उदास शाम का मेहमान

उसके कैमरे में

शव की तरह लेटा है एक दृश्य

और वह अभी

बाहर नहीं आया है


बर्बादशुदा जीवन का

यही हासिल ठहरा



इर्द गिर्द


वह पत्थरदिल ना हो

लेकिन पत्थर की तरह ठोस हो

जंग लगे लोहे से उसे कोई वास्ता न हो

लेकिन हो वह पिघलते फ़ौलाद की मानिंद

संरचना उसकी ऐसी हो जैसे

बाँधा जा रहा हो कहीं एक लंबा पुल

रेलगाड़ियों के पहियों के घर्षण से खास

लगाव हो उसे

सूने और व्यस्त प्लेटफार्मों पर

वह लगातार आती जाती हो

गुमशुदा लोगों के पोस्टर में लिखी

मार्मिक अपील जैसी हो वह

कभी कभार टपकते हो उसकी आँख से आँसू


कोई ऐसी कविता

यहीं कहीं

तुम्हारे इर्द गिर्द ही चाहिए



धूल


नहीं हुआ शामिल 

दौड़ में 

हमेशा पाया गया पीछे


लेकिन इस बेडौल दुनिया के प्रति

मेरी दिलचस्पी कम न हुई


धूल में रहा

पाया गया लिथड़ा

धूल में ही


शब्द वहीं से शुरू हुए

जहाँ तोड़ रहा था कोई

रोटी का पहला कौर


इस भयावह दौर में

भूख के प्रति किया प्रकट सम्मान

कविता ने


मेरे लिए यही

बहुत हुआ

---

* भारतभूषण तिवारी की यह टिप्पणी नरेन्द्र जैन की कविताओं के Three Essays collective से प्रकाशित संग्रह `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` से ली गई है। यहाँ दी गईं कविताएँ इसी संग्रह से ली गई हैं। भारत की टिप्पणी में आई ‘उदास धुन’ ‘जिसे रईस अहमद क्लेरीनेट पर बजा रहे थे` 2012 में आधार प्रकाशन से छपे संकलन 'चौराहे पर लोहार' में शामिल ‘विदिशा डायरी सीरीज’ की एक कविता की पंक्ति है। 

(नरेन्द्र जैन का फ़ोटो `लाज़िम है कि हम भी देखेंगे` के बैक-कवर से लिया गया है। यह फोटो भारतभूषण तिवारी ने क्लिक किया है।)





Tuesday, May 14, 2024

मृणाल सेन का संस्मरण: रात में फूल खिलते हैं, पानी मे बेलें फलती हैं

अगस्त 14-15, 1947. देश ने स्वतंत्रता की खुशियाँ मनाईं और विभाजन का मातम भी. एक ओर तो लोग अतीव आनंद की अवस्था में थे वहीं दूसरी ओर क्रोध और हताशा ने लाखों लोगों को चूर-चूर कर दिया था - पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब से बेघर हुए लोग एक के बाद एक आने वाली लहरों की तरह सरहदें पार करते - हर कोई सिर छुपाने के लिए जगह ढूँढ़ता. ख़ुशी तो दीवाना कर देने वाली थी पर वह दोनों पडोसी देशों में ज़्यादा देर टिकी नहीं. पश्चिम में, सांप्रदायिक दंगों का मनहूस साया हर तरफ पसर गया, ख़ासकर भारत की राजधानी में और पाकिस्तान में अन्यत्र. सरहद के दोनों ओर से पनाहगीरों का आना-जाना चलता ही रहा. क्रूरता, हत्या और विनाश की ख़बरें और साथ में लूटपाट, आगजनी का वहशीपन. महात्मा जी, जो अब दिल्ली में थे, बेहद व्यथित महसूस कर रहे थे. अक्सर वे बड़े नेताओं, जो अब सब बड़े प्रशासक थे, को बुलवा भेजते और ताज़ा स्थितियों के बारे में और अधिक जानना चाहते. परिस्थिति कुछ इस तरह नियन्त्रण के बाहर हुई कि एक बार तो अपनी चिर-परिचित सादगी और सौम्यता के साथ उन्होंने कहा,”मैं इस वक़्त चीन में नहीं हूँ, दिल्ली में हूँ. और न मैंने अपनी आँखें और कान खो दिए हैं. अगर तुम मुझसे कहते हो कि मैं अपनी आँखों और कानों का भरोसा न करूँ, तो पक्की बात है कि न मैं तुम्हें समझा सकता हूँ और न तुम मुझे....” महात्मा जी को लगा उस वक़्त उनके पास अपने सबसे मज़बूत अस्त्र - अनशन - का इस्तेमाल करने के अलावा और कोई चारा नहीं है. उन्होंने अतीव आत्मविश्वास के साथ कहा, “स्वयं को कष्ट देकर मुझे प्रायश्चित करना होगा और मुझे आशा है कि मेरे अनशन से उनकी आँखें खुलेंगी और वे वास्तविकता देख पाएँगे.” कुछ दिनों में हर किसी ने मान लिया कि चमत्कार आखिर हो गया. हवा बदली और नतीजा चौंकाने वाला था. महात्मा जी, हालाँकि कमज़ोरी से उबर नहीं पाए थे, हमेशा की तरह संध्या काल में अपनी नियमित प्रार्थना सभाएँ करते रहे जिसमें गीता, क़ुरआन और बाइबिल की पंक्तियाँ पढ़ी जातीं. 30 जनवरी 1948 को उन्हें गोली मार दी गई.
स्वतंत्रता के पाँच महीने बाद, एक बार फिर नेहरू की आवाज़ रेडियो पर सुनाई दी. शोकाकुल, उन्होंने राष्ट्र को संबोधित किया: साथियो, उजाला हमारी ज़िंदगियों से चला गया है और हर तरफ अँधेरा है. मैं नहीं जानता आपसे क्या कहूँ और कैसे कहूँ. हमारे प्रिय नेता, जिन्हें हम बापू कह कर बुलाते थे, राष्ट्र के पिता, अब नहीं रहे.... फिर भी ज़िन्दगी चलती रही, प्रशासन चलता रहा और अब भी चला जाता है - लोग जीते रहे, प्यार करते रहे, हसरतें पालते रहे और हर मोड़ पर लड़ते और अंततः मिटते और फिर-फिर जीते रहे. मेरे माता-पिता ने, जो अब भी अपने गाँव में थे, कभी उस घर को छोड़ने के बारे में सोचा नहीं था जिसे उन्होंने इतने प्यार से खड़ा किया था. महीने गुज़रे और एक साल निकल गया. दिन प्रतिदिन मुसीबतें आती रहीं और हालात बद से बदतर होते रहे. आख़िरकार परिस्थितियों से होकर मेरे माता-पिता ने फैसला किया कि जो भी सम्पत्ति है उसे बेचकर देश छोड़ दिया जाए. सब कुछ औने-पौने दामों पर बेच दिया गया और एक दिन वे शरणार्थियों की तरह महानगर आ गए. अपना बनाया घर और जायदाद छोड़ने से पहले मेरे पिता ने नए बाशिंदे से छोटी से अर्ज़ की, “मैं नहीं कहूँगा कि तुम वचन दो लेकिन हो सके तो कोशिश करना वहाँ पानी के किनारे बने छोटे से स्मारक को सहेजने की.” वह हमारी सबसे छोटी बहन रेबा का स्मारक था. वह पाँच साल की नन्ही उम्र में ही चल बसी थी. वह फिसली और पोखर में गिर कर डूब गई. हम सब भाई-बहनों में रेबा सबसे ज़्यादा अज़ीज़ थी. हम एक बड़े परिवार में पले-बढ़े - सात भाई और पाँच बहनें. भाइयों में मैं छठा था और बहनों में रेबा सबसे छोटी. और वह सबसे ज़्यादा प्यारी थी- मुहल्ले के लोग भी उसे बेहद चाहते थे. उस मनहूस दिन- जहाँ तक याद पड़ता है वह छुट्टी का दिन था- हम साथ बैठकर दोपहर का खाना खा रहे थे. हमारा खाना पूरा होने से पहले ही रेबा हमें छोड़कर चुपके से घाट पर चली गई. मुझे साफ़-साफ़ याद है कि घाट बड़ी ख़ूबसूरती के साथ बना था- हमारे पोखर को उतरती हुई सीढ़ियाँ और एक बाहर निकला हुआ हिस्सा, पानी की सतह से बस कुछ इंच ऊपर, जो लगभग पोखर की चौड़ाई के लगभग एक-चौथाई हिस्से तक अंदर पहुँचता था - और यह सब बाँस से बना हुआ. हम सब को बेहद पसंद था उस पर चलना, दोनों तरफ पानी और फिर अपने पाँव पानी में डुबोए वहाँ बैठे रहना. रेबा भी इससे अछूती न थी. इसके अलावा उसे सबसे आगे बैठना अच्छा लगता था ताकि वह बड़ी आसानी से झूम पाए और गुनगुना पाए. मगर कोई नहीं जानता कि उस दिन क्या हुआ क्योंकि वहाँ कोई नहीं था. हम बस यह अनुमान लगा पाए कि वह उस हिस्से के मुहाने तक गई, वहाँ बैठी, अपने पाँव पानी में डुबोए और अनजाने में फिसल पड़ी. फिर बहुत बाद में जब हम उसे ढूँढ़ने निकले तो वह कहीं न मिली- न पड़ोसियों के घरों में, कहीं नामोनिशाँ नहीं. आख़िरकार, मेज दा, मेरे तैराक भाई ने पोखर में डुबकी लगाई और क्षण भर में उसका बेजान शरीर बाहर निकाला. पानी के अंदर वह बेजान पड़ी थी. रेबा की मौत की खबर सारे इलाके में फ़ैल गई. सब लोग आए क्योंकि वे सब रेबा से प्यार करते थे. मेरे सबसे बड़े भाई, शैलेश (हम सब के दादा), जो महानगर में रहते थे, भी आए. उनके साथ आए जसीमुद्दीन, दादा के जिगरी दोस्त, क्योंकि उन्हें भी रेबा बहुत अज़ीज़ थी. उनके आने पर, जसिम दा, जैसा कि हम उन्हें बुलाते थे, ने हम में से कुछ लोगों से थोड़ी-थोड़ी बातें सुनीं और एक मिनट भी ज़ाया किए बिना सीधे उस हत्यारे घाट पर पहुँच गए. उन्होंने सारा दिन घाट पर बिताया. चाय पहुँचाई गई जो उन्होंने लौटा दी. दोपहर में खाना परोसा गया जो उन्होंने थोड़ा सा खाया. बहुत थोड़ा सा. दोपहर गुज़र जाने पर उन्होंने मेरी माँ को बुलवा भेजा. वे जैसे-तैसे घाट तक पहुँची. जसिम दा उनसे लिपट कर बच्चों की तरह रोने लगे. फिर दोनों कुछ देर चुप रहे और उसके बाद जसिम दा ने मेरी माँ को बताया रेबा का एक राज़. रेबा के कई सारे राज़ थे जिनसे सिर्फ जसिम दा वाक़िफ़ थे. जो राज़ उन्होंने मेरी माँ से कहा वह रेबा ने उन्हें महीने भर पहले ही बताया था. वह जसिम दा से वायदा चाहती थी कि किसी दिन वह उसे रात भर जागने देंगे ताकि वह देख पाए कि किस तरह रात में फूल खिलते हैं, कैसे और कब पानी में बेलें फलती-फूलती हैं. बहुत बाद में मेरी माँ ने मुझे इन सब के बारे में बहुत कुछ बताया और रेबा से जुड़ी बहुत सारी कहानियाँ भी. अपने प्राइमरी स्कूल के दिनों से ही.जसिम दा में कविताई की प्रेरणा थी. बड़े होने पर वह कवि के तौर पर मशहूर हुए और हमारे प्रिय जसीमुद्दीन का टैगोर ने भी बड़े प्रेम से संज्ञान लिया. दरअसल नकशी काँथार माठ का, जो उनका एक शानदार और बेहतरीन संगीत नाटक है, मंचन कलकत्ते में हाल ही में हुआ था. उनकी सारी कविताएँ और गीत ग्रामीण परिवेश से उपजे हैं. उस दिन सूरज ढलने पर, जसिम दा घाट से उठकर आये और कुछ देर हमारे साथ रहे. उनका घर गोबिंदपुर नाम के गाँव में था जो हमारे यहाँ से पाँच-दस मील की दूरी पर था और उनके पिता वहाँ रहते थे. अपने घर लौटने से पहले उन्होंने घाट पर बैठकर लिखी एक लम्बी कविता मेरी माँ के हवाले की. .जसिम दा ने माँ को आगाह किया कि उस कविता को कभी प्रकाशित न किया जाए, कभी भी नहीं. वह सिर्फ उनके लिए थी. वह कविता रेबा के बारे में थी. मेरी माँ ने वह कविता सितम्बर 1973 में अपनी मृत्यु तक एक राज़ की तरह अपने पास सहेज कर रखी. इतने सालों तक वह एक लिफ़ाफ़े में रखी रही. मेरे पिता के साथ उन्होंने जब अपना घर हमेशा के लिए छोड़ा, तब भी वे वह अनमोल लिफाफा अपने साथ रखना नहीं भूली. उनके अंतिम संस्कार के साथ ही वह लिफाफा भी आग की लपटों के हवाले कर दिया गया. बेहद लम्बे अंतराल के बाद, 1990 में, कभी न लौटने के लिए अपना गृह नगर छोड़ने के सैंतालीस सालों बाद, वह दिन आया जब मेरी पत्नी और मैं उसी नगर में उसी घर के सामने खड़े थे, जो अब एक सार्वभौम राज्य बांग्लादेश में था. वह घर जहाँ मैंने अपना बचपन और कच्ची उम्र के साल बिताये. उन सैंतालीस सालों में उस घर की मिल्कियत केवल एक बार बदली. वह आदमी जिसने मेरे पिता से वह घर और अन्य संपत्ति खरीदी थी, उसने वह नए मालिकों को उस वायदे के साथ दी जो उसने मेरे पिता से किया था - पानी के किनारे बने स्मारक की देखभाल करने का- और फिर जैसा कि मुझे बताया गया, वह कराची चला गया. अजीब बात यह है कि उन सैंतालीस सालों में मैंने मेरे उस सुदूर अतीत को एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा. क्या ऐसा इसलिए हुआ कि इतने सारे सालों में मेरे मन में विभाजन को लेकर इतनी सी भी टीस नहीं उठी? अगर ऐसा है, तो फिर अब क्यों? ऐसा पिछले पंद्रह सालों में क्यों नहीं हुआ, जब आमंत्रित किये जाने पर मैंने ढाका की कई सारी यात्राएँ कीं. क्यों लगभग पाँच-छह बार इस दौरान मैंने अपने गृहनगर आने के आमंत्रण ठुकरा दिए? ढाका से फरीदपुर और फिर लौटकर ढाका? आखिरकार, सैंतालिस सालों बाद, अब क्यों? बाहक़ मुझे नहीं पता. मेरे बचपन और किशोरावस्था के सालों में ढाका और फरीदपुर के बीच की यात्रा खूबसूरत होते हुए भी पूरा एक दिन ले लेती. हमेशा नदी के रास्ते जाना पड़ता- नारायणगंज से दुमंजिला बड़ी नाव, एमु या ऑस्ट्रिच या उस जैसा कोई, में बैठकर अशांत पद्मा नदी से गुज़रना और फिर पानी के बीच में उस बड़ी नाव से उतर कर छोटी सी नाव, दमदिम, में बैठना और अंततः एक पतली सी नहर में, दोनों तरफ जूट और धान के खेतों को पीछे छोड़ते हुए, फ़रीदपुर की ओर. अब यातायात के साधनों के हैरतअंगेज़ ढंग से बढ़ जाने पर- पहले मोटर और फिर उसी में बैठे-बैठे एक बड़ी नाव द्वारा पद्मा पार करने की छोटी सी यात्रा और आख़िर में फिर मोटर. यह सब कुछ चार घंटों में.
इस बार, 1990 में, जैसे ही मैं और मेरी पत्नी ढाका पहुँचे, हमने फैसला किया कि हम फरीदपुर जायेंगे भले ही चंद घंटों के लिए. बिना किसी विशेष कारण के. एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में शिरकत करने के लिए हम तीन दिनों तक ढाका में थे और चौथे दिन हमने यात्रा करने की योजना बनाई. हमारे साथ मेरे युवा कैमरामैन शशि आनंद थे जिनके माता-पिता पश्चिमी हिस्से अर्थात रावलपिंडी से भारत आये थे. वे जिस साल विभाजन हुआ उस साल आये थे. जब वे आये तो शरणार्थी थे पर शशि शरणार्थी न थे. वे भारत में पैदा हुए थे- मेरे महानगर में- और मेरी ही तरह वहाँ बने थे. जब वे बड़े हुए, उनके माता-पिता ने उन्हें अपने गृहनगर के बारे में अनेकों कहानियाँ सुनाईं और अब वे खुद देखना चाहते थे के पूर्वी हिस्से में मेरा गृहनगर कैसा लगता होगा. वह एक अविस्मरणीय यात्रा थी. हम, विदेशी लोग, तीन लोगों का एक परिवार, मेरी पत्नी गीता और मैं, और शशि. और हमारे साथी और उस सफ़र के गाइड, मेरे मित्र अब्दुल खाएर. एक हँसोड़ आदमी. जैसे-जैसे हम शहर के पास आते जा रहे थे, ज़ाहिर तौर पर मेरा तनाव बढ़ता जा रहा था. “क्या हुआ?” हमारे गाइड ने पूछा. मैंने आत्मविश्वास के साथ कहा, “आगे नहर है”, और फिर उन्हें चौंकाने के लिए कहा, “वह लकड़ी का पुल!” “इस से पहले कि वह खुद टूट कर गिर जाए, वह लकड़ी का पुल तोड़ दिया गया,” अब्दुल खाएर ने बताया, “और अब तुम एक कंक्रीट का पक्का पुल देखोगे, जो थोड़ा आगे है, पंद्रह साल पुराना.” तब तक हम पुल पार करने को थे. हमारी गाड़ी ने पुल पार किया, कुछ देर तक नाक की सीध में जाने के बाद एक गली में मुड़ी - एकदम साफ़-सुथरी, सभ्य, इज्ज़तदार लगती हुई जो मेरे समय में वेश्याओं का इलाका था. कार एक घर के सामने रुकी. हम नीचे उतरे. खूब स्वागत-सत्कार और खाने-पीने के बाद हमने थोड़ा आराम किया. फिर हम माज़ी की खोज में निकल पड़े. पैदल.
जहाँ तक मेरा सवाल है, यादें अपने-आप मेरे मन में घुमड़ रहीं थी, एक के बाद एक. लगभग सौ स्थानीय नागरिक पीछे से हमें देख रहे थे. उन्होंने मुझे पहचान लिया, पीछे आने लगे, दो-दो तीन-तीन के झुण्ड में, और हमारा घर ढूँढने तक के रास्ते में लोगों की तादाद बढती गई. उत्तेजना बढ़ रही थी क्योंकि हर बढ़ते कदम के साथ मैं अनेको अनिश्चितताओं से दो-चार हो रहा था. स्मृतियों के टुकडों को बेपर्दा करते हुए. लॉस्ट होराइज़न की तरह, रॉनल्ड कोलमन की तरह. और मैं चाहता कि स्थानीय जन मुझे अपनी राह ख़ुद बनाने दें और एक लफ्ज़ न कहें चाहे किसी जगह पहुँच कर मैं उलझ क्यों न जाऊँ. वह ऐसा अनुभव था जो मैं कभी नहीं भुला पाऊँगा. और मैंने घर ढूँढ़ ही लिया- अपने दम पर. सैंतालीस सालों बाद! अब घर के सामने मेरी ओर मुँह किये, कुछ लोग थे, बिखरे हुए. कोई कुछ नहीं बोला- न हमसे और न ही आपस में. ऐसी नीरवता जो बहुत कुछ कहती है! गीता ने फुसफुसा कर कहा, “क्या तुम यहाँ की चीज़ों को पहचान रहे हो? और इन लोगों को भी?” मैंने मुड़कर देखा, गीता ने हलके से मुझे छुआ. मैं रोना चाहता था पर रोया नहीं. पीछे से कोई सामने आया. उसने कहा कि मेरे सामने खड़े लोग उस घर के नए मालिक हैं. उस वक़्त एक प्रौढ़ महिला, एक आम गृहिणी, वैसे ही लिबास में, कुछ कदम आगे आई और मेरी पत्नी को एक गुलदस्ता दिया और मुस्कुराते हुए कहा, “तुम अपने ससुर के घर आई हो.” साफ़ था कि गीता का दिल भर आया था. उस महिला ने फिर मुझसे कहा, “आओ, पानी के किनारे बना स्मारक तुम्हें दिखाई देगा.” मैं चौंक गया. चौंकी गीता भी जिसने मेरी बहन के बारे में मुझसे सब कुछ सुन रखा था. “मेरा मतलब है तुम्हारी बहन रेबा का स्मारक”, घर की मालकिन ने हौले से कहा, ‘रेबा’ पर कुछ जोर देकर. गीता और मैंने एक दूसरे की ओर देखा. महसूस हुआ जैसे कलेजा मुँह में आ गया हो. “आओ!”, उसने फिर एक बार कहा. एकाएक मुझे राष्ट्रपिता की याद आई, महात्मा जी. याद आईं वे सभी पीड़ाएँ जो उन्होंने अपनी हत्या से पहले भोगीं. काश आज महात्मा जी यहाँ होते. काश मैं गर्व से अपने पिता को बता पाता कि उनकी छुटकी रेबा का छोटा स्मारक उनसे घर और जायदाद खरीदने वालों ने बड़े प्यार से सहेजा था. नए मालिकों द्वारा वह अब भी सहेजा जा रहा है. पानी के किनारे! काश मैं अपनी माँ को बता पाता कि उनकी मृदुभाषी बिटिया अब भी उस हत्यारे-घाट के किनारे है जहाँ जसिम दा ने अकेले पूरा दिन बिताया था और लम्बी कविता लिखी थी. एकाएक मेरी आँखों के आगे अपनी माँ के आलिंगन में उस बेटे की छवि कौंधी जो बहुत पहले बिछुड़ चूका था - जसिम दा और मेरी माँ की आखिरी मुलाक़ात. उनकी मृत्यु के तीन साल पहले. शायद यह तब की बात है जब जसिम दा ढाका विश्वविद्यालय में बाँग्ला के विभागाध्यक्ष के पद से निवृत्त हुए थे.
वह यादगार मौका था जब जसिम दा को उनके सृजनात्मक कार्य के लिए रविन्द्र भारती विश्वविद्यालय ने डी. लिट. की मानद उपाधि प्रदान की. समारोह हो चुका था पर वे मेरे शहर में रुक गए. उन्होंने मुझे कई बार फ़ोन किया. मैं कलकत्ते से बाहर था. लौटने पर मैंने उन्हें फ़ोन किया. उन्होंने मुझे तुरंत उनके मित्र के घर आकर मिलने और उन्हें मा से मिलने ले जाने को कहा. मा मतलब मेरी माँ. वे तब मेरे भाई के साथ रह रही थीं- मेरे तीसरे नंबर के भाई गणेश जो शहर से दूर दक्षिण में बसे नाकतला में रहते थे. हमारी माँ बहुत बीमार थीं, दिल की बीमारियों से जूझ रही थीं और बिस्तर पर ही थीं. मैं उन्हें जसिम दा की खबर देता रहा और आधे घण्टे में हम घर के दरवाज़े पर पहुँच गए. जिस घड़ी कार का इंजन ‘दहाड़ा’ और गाड़ी घर के सामने जा रुकी, हमने माँ की पुकार सुनी, “ज..सि..म!” “मा….!” जसिम दा ने जवाब में पुकार लगाई. गाड़ी से उतरने और माँ की ओर लपकने में उन्होंने एक लम्हा भी ज़ाया नहीं किया. क्षण भर में मैंने उन्हें अंदर के आँगन के बीचोंबीच देखा. वे एक दूसरे से लिपट गए थे, माँ और बेटा. वे बच्चों की तरह रो रहे थे. चुपचाप अंदर आते हुए और पोर्च में बैठते हुए, मैं उन्हें दूर से देखता रहा- बड़े सम्मान के साथ.
[मृणाल सेन की संस्मरणात्मक पुस्तक 'ऑलवेज बीइंग बॉर्न' 2011 में मुझे यूएनसी चैपल हिल की लाइब्रेरी में मिली थी. इस मार्मिक टुकड़े का अनुवाद करने से पहले मैंने इंटरनेट पर ढूँढ़ कर कुणाल सेन का नंबर हासिल किया जो अमेरिका में ही रहते थे. उन्हें फ़ोन कर बताया कि मैं अनुवाद हेतु अनुमति चाहता हूँ तो उन्होंने वादा किया कि वह अपने पिता तक मेरी बात पहुँचा देंगे और फिर कुछ दिनों में मृणाल सेन का ईमेल मुझे मिला (जो अब मेरी उपलब्धि है - स्क्रीनशॉट दे रहा हूँ). इस अनुवाद को पूरा करने में मुझे लगभग आठ साल लग गए जिसकी वजह प्रकाशक द्वारा माँगे गए 2000 रुपये कम और मेरी अपनी काहिली ज़्यादा है. संयोग (या दुर्योग) ऐसा कि अभी तीन चार दिन पहले ही इन्दर राज आनंद के बारे में पढ़ते हुए मैं (वाया सत्यजित राय) विकिपीडिया पर मृणाल सेन तक पहुँचा था और आश्वस्त हुआ था कि वे जीवित हैं. दूसरा संयोग यह कि कवि जसीमुद्दीन की आज पहली जनवरी को जयंती है.-भारतभूषण तिवारी] नोट- यह संस्मरण हिन्दी अनुवाद के रूप में 1 जनवरी 2019 को जनचौक वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया था लेकिन तकनीकी कारणों से अब वहाँ उपलब्ध नहीं है। आज मृणाल सेन के जन्मदिन पर यहाँ सहेजा जा रहा है।

Saturday, November 5, 2016

कम्बख़्त दस्तावेज़ `पासपोर्ट` और नानी का इंतिक़ाल



(सईद नक़वी की पुस्तक ‘बीइंग दि अदर: दि मुस्लिम इन इण्डिया` (अलिफ़ बुक कंपनी, 2016) के एक अध्याय ‘ग्रोइंग अप इन अवध’’ का हिस्सा )
अनुवाद और प्रस्तुति : भारतभूषण तिवारी


हमारे समरसतापूर्ण अस्तित्व और मुक्त सांस्कृतिक अंतर्मिश्रण के चलते 1947 में हुए बँटवारे का दर्द कुछ गहरा था क्योंकि घनिष्ठता से जुड़े कुनबे भी अकस्मात् बंट गए. यह ज़िन्दगी की एक दर्दनाक विडम्बनाओं में से एक है कि हमारी इतनी अच्छी ख़ाला-नानी, नानी अम्मी, जिन्होंने हमेशा मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाए जाने का ख़्वाब देखा था, लाहौर में अल्लाह को प्यारी हुईं. उनका शरीर हिंदुस्तान वापिस नहीं लाया जा सका और हम उनके जनाज़े में शरीक नहीं हो सके. आज के दौर में,  जहाँ छोटे परिवार बढ़ते जाते हैं, ख़ाला-नानी शायद दूर की रिश्तेदार लगे, मगर हमारे परिवार में ऐसा नहीं था जो कि पारम्परिक संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आधारित था. मेरी अम्मी की अम्मी अपने कुनबे में सबसे बड़ी थीं और नानी अम्मी सबसे छोटी. मेरी अम्मी से उनका ख़ास लगाव था जिनकी निगहबानी में वह बड़ी हुई थीं. इसका नतीजा यह नहीं हुआ कि नानी अम्मी के अपने बच्चों का ख़याल न रखा गया हो; एक दूसरे पर अत्यधिक आश्रित रहने वाली उस व्यवस्था में उनके अपने बच्चों का ख़याल औरों ने रखा. दरअसल, जैसा कि मैंने पहले बताया, मुस्तफ़ाबाद का हमारा घर ममेरे-फ़ूफ़ेरे-मौसरे भाई-बहनों, मामियों-मौसियों-फूफियों और मामाओं-फ़ूफ़ाओं-मौसियों से भरा रहता (जिनकी तादाद मुहर्रम, बच्चा पैदा होने, किसी की मौत होने या शादी-ब्याह के मौकों पर सौ तक पहुँच जाती).

अपने इंतकाल के दिन तक नानी अम्मी को पासपोर्ट नामके दस्तावेज़ को समझने में बेहद मुश्किल हुई. वह इस इल्म के साथ बड़ी हुई थीं कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए फ़क़त रेलगाड़ी के टिकट की दरकार होती है.  यह बात आसानी से समझ में आती है क्योंकि पहले की उनकी सारी यात्राएँ यूपी में अवध तक सीमित रहीं. वह बाराबंकी में पैदा हुईं, बिलग्राम में ब्याहीं और मुस्तफ़ाबाद या लखनऊ मेरे माता-पिता से मिलने आती रहीं. फिर बँटवारा हुआ, उसके बाद ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा और फिर उनके शौहर का इंतकाल जो एक छोटे-मोटे  सामंत थे. बाराबंकी और बिलग्राम के घर जीण-शीर्ण हालात में थे. नानी अम्मी हमारे साथ रहने आ गईं और मुस्तफ़ाबाद और लखनऊ के बीच आना-जाना करती रहीं.

पासपोर्ट की ज़रूरत इसलिए आन पड़ी थी कि उनकी दो बेटियाँ पाकिस्तान में ब्याहीं और वहीं रह गईं. उनकी कश्मकश उतनी ही शदीद थी जितनी टोबा टेक सिंह की (सआदत हसन मंटो का एक काल्पनिक चरित्र) जो यह नहीं  समझ पाया कि बँटवारा होने पर उसका गाँव पाकिस्तान में कैसे ‘जा’ सकता है; उसी तरह नानी अम्मी नहीं समझ पाईं कि उनकी बेटियाँ दूसरे मुल्क कैसे ‘जा’ सकती हैं. कोई अपना घरबार हमेशा के लिए कैसे छोड़ सकता है? उन्हें दिलासा देने की कोशिश में यह बतलाया गया कि उनकी बेटियाँ, सुग़रा  और सकीना, वाकई घर छोड़ कर नहीं जा रही हैं. बम्बई में उनकी लड़कियों के वास्ते दो ‘बहुत अच्छे लड़के’ थे, मगर लाहौर लखनऊ से बेहद करीब था. तिस पर वे ‘लड़के’ (जिन्हें पाकिस्तान के कुछ कज़िन ने ढूँढा था) बहुत अच्छी ‘ज़ात’ के थे. ( उपमहाद्वीप के मुसलमानों पर हिन्दू जाति प्रथा के असर को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सैयद, शेख़, पठान अब भी ऊँची जातियाँ हैं और जुलाहे और दीगर पेशेगत श्रेणियों को नीचा माना जाता है.)
    
हिंदुस्तान का नक्शा निकाल कर बिछाया गया. नानी अम्मी को दिखाया गया कि कैसे त्रिवेंद्रम, मद्रास, बैंगलोर, हैदराबाद, बम्बई ये सब हिंदुस्तान में होते हुए भी लखनऊ से लाहौर क्या कराची से भी ज़्यादा दूर थे. उन्हें बतलाया गया की हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहद महज एक बनावटी सरहद थी जिसे चंद हफ़्तों में एक ‘अंग्रेज़’ सर सिरिल रैडक्लिफ ने जल्दी-जल्दी में खींच दिया था, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की सरहद का फैसला करने के लिए मुकर्रर लिए गए दो कमीशनों के मुखिया थे. वक़्त के साथ-साथ सरहद ख़त्म हो जाएगी और वह  उसे एक अस्थायी असुविधा के तौर पर ही  लें.

इसलिए नानी अम्मी सुग़रा और सकीना को पाकिस्तान के ‘लड़कों’ से ब्याहने को राज़ी हो गईं. मगर जल्दी ही वह  उनके शुरूआती शुबहों से रूबरू हुईं जो शुरुआत थी मोहभंग की. उनकी हसरत थी कि वह अपनी बेटियों के पास लाहौर जाएं और उन्हें पासपोर्ट हासिल करने को कहा गया. अगर लाहौर और कराची हिंदुस्तान के दीगर बड़े शहरों के मुकाबले लखनऊ से नज़दीक थे तो फिर क्यों उन्हें रेलगाड़ी के टिकट के अलावा एक और ‘टिकट’ लेने के लिए क्यों कहा जा रहा है. इस ‘अजीब’ ज़रूरत के पीछे की वजहों को उन्हें समझाने की कोशिशें की गईं, फिर पासपोर्ट के फॉर्म लाए गए और उन्होंने अचरज के साथ अपनी साफ़ उर्दू लिखावट में उन्हें भरा. मोहभंग  का दूसरा मौक़ा आया. मेरे पिता के मुंशी ने उन्हें बतलाया कि अगर फॉर्म हिंदी या अंग्रेज़ी में भरा जाए तो उन्हें पासपोर्ट जल्दी मिल जाएगा. क्या उर्दू का कोई मोल नहीं रहा? उन्होंने पूछा.

नानी अम्मी का उर्दू से लगाव इस वजह था क्योंकि यही इकलौती लिपि उन्हें सिखाई गई थी, हालांकि जो भाषा वह बोलती थीं वह थी खालिस अवधी या देहाती. दरअसल, बोली के मामले में लिंगभेद था. ज़्यादातर ख़वातीन अवधी या देहाती बोलतीं  मगर औपचारिक मौकों पर उर्दू या हिंदुस्तानी बोल लेतीं. हज़रात उर्दू या हिंदुस्तानी में गुफ़्तगू  करते और अनौपचारिक मौकों पर अवधी या देहाती पर आ जाते.

पासपोर्ट, जो नानी अम्मी के लिए हमेशा एक बेहद नापसंद दस्तावेज़ रहा, के बिना ही वह सिधार गईं इस बात में कुछ प्रतीकात्मकता शायद होगी. वह  लाहौर में अपनी बेटियों के पास थीं, छह महीनों से बीमार. उनका  हिंदुस्तानी पासपोर्ट एक्सपायर हो चूका था. वह चाहती थीं कि उसे रिन्यू करवाया जाए क्योंकि वह चाहती थीं कि उन्हें मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाया जाए. उनकी बेटियों ने उनसे कहा कि यह काम जल्दी ही करवाया जाएगा. मगर बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. वह एक बेहद ग़मगीन  दौर के रूप में मेरी यादों में बसा है. नानी अम्मी के इंतिकाल से हम उबरे ही थे  कि अखबारों ने  मुरादाबाद (उ.प्र) में 1980 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बारे में दुनिया को बताया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हमेशा की तरह ‘हज़ारों’ बेघर हुए.

Friday, December 4, 2015

कूलर साहब का इंतज़ार : नदीम एफ़. पराचा

अहमद परवेज़ की पेंटिंग
कराची में हाल ही में तामीर हुए क्लिफ्टन फ़्लाइ-ओवर का अच्छा-ख़ासा हिस्सा सूफ़ी संत अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी की मज़ार से होकर गुज़रता है. कुछ दो महीने पहले उस पर ड्राइव करते हुए मुझे लगा कि मैंने एक मलंग को देखा है जिसे मैं कभी जानता था.
फ़्लाइ-ओवर जहाँ ख़त्म होता है उसके दाहिनी तरफ बने फुटपाथ पर वह पड़ा था. करीब से देख सकूँ इसलिए मैंने गाड़ी धीमी की और वाकई वही था हालाँकि अब वह सत्तर पार की उम्र में था. मैंने उसे तेईस सालों से नहीं देखा था मगर मुझे उसकी शक्ल अच्छी तरह याद थी और खासकर उसका नाम: खस्सू.
मैंने गाड़ी फुटपाथ के करीब ली जहाँ वह बड़े आराम से से सोया हुआ था. गाड़ी का शीशा नीचे कर मैं चिल्लाया, ‘खस्सू!खस्सू!’
मगर खस्सू जवाब ही नहीं दे. मैंने अपनी गाड़ी फुटपाथ के किनारे खड़ी करने की कोशिश की ताकि नीचे उतर सकूँ, मगर गाड़ियों का एक रेला मेरी गाड़ी के पीछे जमा होना शुरू हो गया था, और उनके ड्राइवर इस कदर दीवानावार हॉर्न बजा रहे थे जैसे कि उनकी ज़िंदगियाँ उस पर टिकी हुई हों.
मैंने सहज बोध से गाड़ी बाएँ लेकर रास्ते के बीच में ली और आगे बढ़ा. करीब हफ़्ते भर बाद मैं खस्सू को ढूँढने फिर गया मगर वह कहीं नहीं मिला.
लगभग 1995 तक अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार के बिलकुल पीछे कुछ अपार्टमेंट्स की कतार हुआ करती थी. ये अपार्टमेन्ट साठ के दशक में बने थे और वहां पार्किंग की काफी बड़ी जगह थी. मैं और मेरे कुछ दोस्त वहाँ अक्सर क्रिकेट खेलने जाया करते. ये अस्सी और नब्बे के दशक के शुरूआती सालों के दरमियान की बात है.
1995 के बाद उन अपार्टमेंट्स को तोड़ने की शुरुआत हुई और आज उस प्लाट पर रियल इस्टेट टाइकून मलिक रियाज़ द्वारा एक विशाल इमारत बनाई जा रही है.
अस्सी के दशक के आखिरी सालों में मैं अपने दोस्तों के साथ शाह ग़ाज़ी मज़ार पर (ज़्यादातर कुतुहलवश) अक्सर जाया करता, खासकर जुमेरात की शामों को जब वहाँ कव्व्वाली की महफ़िलें लगतीं. पता नहीं वे महफ़िलें अब भी लगती हैं या नहीं मगर नब्बे के दशक के शुरूआती सालों तक हर जुमेरात को दस बजे से लेकर आधी रात तक कव्वाली की महफ़िलें बिलानागा लगा करतीं.
खस्सू से से मेरी पहली मुलाक़ात यहीं हुई थी. मेरा ख़याल है ये 1987 की बात है. हमने उम्र के महज बीस साल पूरे किए थे. खस्सू वहाँ था, हमेशा हरे रंग के लहराते कुर्ते में, बहुरंगी फ़कीराना टोपी, सफ़ेद होती छोटी दाढ़ी और कलाइयों पर बहुत से कड़े पहने.
अगर वह कव्वाली में नहीं है (जहाँ वह आम तौर पर होता) तो एक लफ्ज़ न बोलता. जब गाना-बजाना अपने चक्करदार उरूज पर पहुँचता तो खस्सू नंगे पैर कूद कर एक दिलचस्प अराजक नृत्य (धमाल) शुरू करता; लगातार ‘हक़, हक़, हक़ अल्लाह!’ चिल्लाता हुआ. कव्वाली के बाद फ़ौरन वह अपनी हमेशा की ग़मगीन अवस्था में लौट जाता.
एक दिन मेरे एक दोस्त ने एक और मलंग से पूछा कि खस्सू की क्या दास्ताँ है. उसने हमें बताया कि खस्सू को उसके बचपन में मज़ार के फाटक पर छोड़ दिया गया था (जो पचास के दशक का आखिरी दौर रहा होगा). तब से वह यहीं रह रहा है.
उस मलंग ने हमें बताया कि खस्सू हमेशा से इस तरह खामोश (या ग़मगीन) नहीं था. और फिर एक शानदार कहानी सामने आई. उसने कहा, ‘खस्सू इंतज़ार कर रहा है.’
किसका इंतज़ार?’कूलर साहब का....’ उसने जवाब दिया. वह दरअसल कहना चाहता था कलर साहब.
कूलर साहब कौन थे? वह मलंग तुरंत उर्दू छोड़ पंजाबी पर आ गया: ‘कूलर साहब (मज़ार के मलंगों के) अज़ीज़ दोस्त थे. खासकर के खस्सू के. खस्सू अब भी उनका मुन्तज़िर है.
कूलर साहब गए कहाँ? “ख़ुदा के पास,’ मलंग ने हमें बताया.
फिर खस्सू क्यों अब भी उनका मुन्तज़िर है? कूलर साहब ने उससे कहा था कि के वह उस ड्राइंग को पूरा करने लौटेंगे जो वह खस्सू के लिए बना रहे थे,’ मलंग ने समझाया. ‘मगर वह कभी नहीं आए. हमें पता चला कि उनका इंतकाल हो गया. मगर खस्सू ने कभी इस बात पर यकीन नहीं किया. वह अब भी उनका इंतज़ार कर रहा है.
अगले कुछ महीनों में हमें मालूम हुआ कि कूलर साहब कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तान के अग्रणी मुसव्विरों में से एक अहमद परवेज़ थे. परवेज़ का 1979 में इंतकाल हो गया था.
रावलपिंडी में पैदा हुए परवेज़ ने चित्रकार के तौर पर अपने करियर की शुरुआत पंजाब विश्वविद्यालय से की थी. चूंकि वे एक बेचैन रूह के मालिक थे, वे जल्द ही 1955 में लन्दन चले गए.
साठ के दशक के आखिरी दौर में वे पाकिस्तान लौटे और कराची में आ बसे. सत्तर के दशक में मुल्क के प्रमुख कलाकारों में उनका शुमार होने लगा और कराची शहर के उस वक़्त फलते-फूलते कला पटल पर उनका गहरा प्रभाव था.
अपने प्रशंसकों से घिरे होने के बावजूद बेचैन और बेक़रार बने रहे, कभी संतुष्ट न होने वाले.
उनकी जीवन शैली और भी अनियमित होने लगी. यूके, यूएस और पाकिस्तान के कला समीक्षकों द्वारा जीनियस कहे जाने को लेकर और अपनी कृतियों के लिए बड़ी आसानी से खरीदार पाने को लेकर बेपरवाह परवेज़ के बारे में उनके एक समकालीन ने टिप्पणी की कि वे पैसे के साथ ऐसा बर्ताव करते थे ‘जैसे उससे उन्हें नफरत हो.’
कला समीक्षक सलवत अली ने (डॉन अखबार में) परवेज़ के प्रोफाइल में लिखा कि ‘उपद्रव और बातचीत में बेहद उत्तेजित हो जाना परवेज़ की प्रवृत्ति थी.’ ग्लोबल पोस्ट की उप-सम्पादक और कला समीक्षक मरिया करीमजी अपने पाठकों को बताती हैं कि ‘1970 के दशक में मुल्क के माने हुए कलाकारों में से एक अहमद परवेज़ अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार में नियमित रूप से आते थे और उन्हें वहां हाथों में चिलम लिए अक्सर देखा जा सकता था.’
कला समीक्षक और परवेज़ के समकालीन बताते हैं कि उन्होंने जितना पैसा कमाया वह सब शराब पर खर्च हो जाता था. जो लोग उनकी सोहबत में आ रहे थे, उनसे उकताकर वे कराची की विभिन्न सूफ़ी मज़ारों पर जाने लगे. कराची की अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार पर वे नियमित रूप से आने लगे.
कला समीक्षक ज़ुबैदा आग़ा अहमद परवेज़ पर केन्द्रित एक आलेख में कहती हैं कि जैसे-जैसे उनकी शोहरत बढ़ती गई, वैसे-वैसे उनकी जीवन शैली और भी अनियमित और ‘अस्वास्थ्यकर’ होती गई.
1970 के दशक के अंत तक वे लगभग स्थायी रूप से अब्दुल्ला शाह ग़ाज़ी मज़ार के मैदानों पर रहने लगे. उसी दौरान खस्सू के साथ उनका याराना हुआ होगा.
लाहौरवासी कलाकार मक़बूल अहमद ने, जो 1970 के दशक के आखिरी सालों में लाहौर कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स के छात्र थे, मुझे बताया कि कैसे वे अपने आदर्श अहमद परवेज़ से मिलने कराची आए मगर जो दिखाई दिया उससे भौंचक्का रह गए. ‘ये 1978 की बात है. परवेज़ ख़स्ताहाल थे. न उन्होंने मेरी तारीफ़ तस्लीम की और न मौजूदगी. वे बेहद परेशान थे, मगर किसी की समझ में नहीं आता था कि ऐसा क्यों था.’
मक़बूल ने बताया कि परवेज़ लाखों रुपये कमा सकते थे: ‘उन्होंने थोड़ा पैसा कमाया भी मगर ऐसा लगता था कि उनकी उसमें दिलचस्पी नहीं थी. वे ऐसा बर्ताव करते जैसे वे उन लोगों को अपनी आत्मा बेच रहे हों जिन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी कला के मानी क्या हैं.’ मक़बूल ने फिर कयास लगाया, ‘शायद इसी अपराध बोध ने उन्हें बेघर मलंगों के हाथों में पहुँचा दिया?’
सरकार द्वारा प्रतिष्ठित प्राइड ऑफ़ परफॉरमेंस अवार्ड से नवाजे जाने पर भी परवेज़ की परीशां जीवन-शैली जारी रही. और फिर वह हो गया. और किसी को ताज्जुब नहीं हुआ.
1979 में वे अचानक गिरे और होटल के कमरे में मृत पाए गए. वह होटल कराची में आई.आई. चुन्द्रिगर रोड के करीब वाला बॉम्बे होटल था जो अब बंद हो चुका है.
अहमद परवेज़
परवेज़ द्वारा खुद अपने पर थोपे गए एकाकीपन और बर्बाद कर देने वाली जीवन शैली पर रंज करते हुए एक कला समीक्षक ने डॉन अखबार के लिए लेख में यह जोड़ा कि ‘अहमद परवेज़ में अभी बीस और सालों की प्रतिभा शेष थी. मगर शायद इस प्रतिभा ने ही उनकी तकदीर का फैसला इस ट्रेजिक अंदाज़ में कर दिया.’
मैं अब इस बात से वाकिफ़ हूँ कि मज़ार पर उनका दोस्त खस्सू अब भी ज़िन्दा है. हालाँकि जब मैंने उसे आखिरी बार देखा तब वह सो रहा था, मगर ऐसा लगा कि वह अब भी कूलर साहब का इंतज़ार कर रहा था. और उस ड्राइंग का जिसका वादा उससे 36 साल पहले किया गया था.

मशहूर पत्रकार नदीम एफ. पराचा का यह पीस कूलर साहब का इंतज़ार भारत भूषण तिवारी ने अनुवाद कर `एक ज़िद्दी धुन` के लिए भेजा है।

Monday, February 17, 2014

`फैन्ड्री’ के निर्देशक का मार्मिक आत्म-कथन


सपनों को छोटी-छोटी राहें और सख्त नाकेबंदी
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इस हफ्ते एक मराठी फिल्म रिलीज़ हुई है 'फैन्ड्री', जो कुछ-कुछ निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले की अपनी कहानी है. आज महाराष्ट्र टाइम्स के रविवारी संस्करण में नागराज का यह आत्म-कथन छपा है, जिसे यहां भारतभूषण तिवारी की बदौलत दिया जा पा रहा है.  पक्का नहीं मालूम पर पढ़ने से लगता है कि वे महाराष्ट्र की अति पिछड़ी घुमंतू जाति 'वडर' से सम्बन्ध रखते हैं. फिल्म मैंने अभी तक नहीं देखी पर उसका प्रोमो यूट्यूब पर मौजूद है.



फैन्ड्री को याद करते हुए

‘फैन्ड्री’ के बहाने अलग-अलग यादों का कोलाहल मचने लगा है मन में...इन यादों का कालखंड बहुत लम्बा है. फैन्ड्री इस शीर्षक के साथ बचपन से लेकर कल-परसों तक की अनेक बातें आँखों के सामने तैरने लगती हैं. जैसे-जैसे समझ आती गई वैसे-वैसे मन में एक अजीब सा डर, हीनता का अहसास ‘बाइ डीफ़ॉल्ट’ रहा. यह हीन भावना खानदानी है. जब से समझ आई तभी से अनजाने ही अपनी सीमाओं का अहसास मन में घर कर गया था. बचपन में रामायण देखने जाता तब सब की जगहें निश्चित हुआ करती थीं. मैं अपनी जगह पर खड़े होकर राजा राम की माया देखा करता, तभी मन के अन्दर लगे “नो एंट्री” के अदृश्य बोर्ड मज़बूत होते गए होंगे. मेरे अन्दर की हीनता के पुख्ता सुबूत परिवेश द्वारा अधोरेखित हो रहे थे.
अबोध उम्र के मासूम साहस पर पाबंदी कब लगी यह पक्का याद नहीं. हरेक दहलीज की जाति-धर्म पता करके कदम कब से रखने लगा कौन जाने? ये नपुंसक सयानापन, एक अंधी शरणशीलता कब घर कर गई किसे पता? स्कूल में अलग-अलग फॉर्म भरते हुए खुद का, माँ-बाप का या जाति का नाम बताया तो एक हिंस्र, कुटिल हँसी क्लास में गूँजती, इसलिए जितना संभव हो सके उतना अध्यापक के करीब जाकर किसी दूसरे को सुनाई न दे पाए इतनी धीमी आवाज़ में अपनी पहचान बताई जाए यह सयानापन तीसरी-चौथी कक्षा से आने लगा था. अपनी पहचान का, अस्तित्व का रूपांतर हीन भावना में हो जाने पर कहने लायक खुद के पास कुछ नहीं बचता.
पता नहीं कब से खुद अपना नाम लेते हुए भय लगने लगा. कोई अपराध होने का, हो चुकने का डर लगातार लगने लगा.
मेरा बाप मेरे हमउम्र दोस्तों को सीधे ‘सेठ’,’साहेब’,’सरकार’ ऐसे संबोधनों से पुकारता तब अपनी दोस्ती की, समानता की आशा अतिरंजना लगती और गले का फंदा कभी किसी ने ढीला कर बाँधा तो वही आज़ादी लगती. ऐसा होने पर भी पलकें सपने संजोना नहीं छोड़तीं. इतनी सख्त नाकेबंदी में सपनों को छोटी-छोटी राहें मिलतीं. बस एक जींस पैंट, तीज-त्यौहार पर पूरनपोली, घर में बिजली का कनेक्शन, पैरों में चप्पल ऐसी बातें सपनों जैसी लगतीं. ऐसी साधारण इच्छाओं की जमाखोरी करके व्यवस्था उन्हें सपनों का भाव दिला देती है. मगर इच्छाओं की, सपनों की न कोई जाति होती है न धर्म. सपने मासूमियत के साथ कोई भी इच्छा ज़ाहिर करते हैं. फिर अपने सपनों और हीन भावना का संघर्ष शुरू होता है. इस संघर्ष में हमेशा ही हीन भावना सपनों को मात दे देती है.
कॉलेज पहुँचने पर एक पुराना सा सपना ठाठें मारने लगा. क्लास में, कॉलेज में सम्मानजनक व्यवहार हो, इज्ज़त मिले यह सपना था. प्रथम वर्ष में श्री.म. माटे की एक कहानी पाठ्यक्रम में थी. उस कहानी का नायक एक खलनायक को ‘ए, काले वडर[i]....’ कहते हुए गालियाँ देता है. पाठ्यक्रम की सारी कहानियाँ पहले से पढ़ लेने की आदत की वजह से यह वाक्य पढ़ कर मैंने फैसला कर लिया था कि यह कहानी जब क्लास में पढ़ाई जाएगी तब अनुपस्थित रहूँगा. कहानी पढ़ाई जा चुकी होगी यह मानकर आठ-दस दिनों बाद क्लास में हाज़िर हुआ तो ठीक उसी दिन सर ने माटे की वह कहानी पढ़ाना शुरू किया. और जिस बात का मुझे डर था वही हुआ. ‘ऐ, काले वडर...’ यह वाक्य सर ने पढ़ा और सारी क्लास अपनी हंसी रोकते हुए मेरी ओर देखने लगी. ईश्वर की भांति वहीँ बैठे-बैठे अंतर्ध्यान हो जाऊं, ऐसा बस उसी क्षण लगा था.
ऐसे तबाह असफल लम्हों में आदमी ऐसे चमत्कारों की उम्मीद करने लगता है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर ऐसे तबाह होने की याद आती है. स्कूल नाम के भयालय की याद आती है. ‘फैन्ड्री’ कहने पर नाज़ुक मासूम सपनों की याद आती है...सपनों के चूर-चूर होने की याद आती है...

फैन्ड्री का क्या मतलब?
यह सवाल मुझसे कई बार पूछा गया.
और मैं आज तक टालता रहा एक लफ्ज़ में फैन्ड्री के मानी बताना..
फैन्ड्री हमारे ही अगल-बगल में जीने वाली एक जनजाति की बोली का शब्द
है.
यह भाषा बोलने वाले इंसानों को हम नहीं जानते
उनके सुख-दुख
उनके सपने
उनकी वेदनाएं
उनके अस्तित्व का जैसे हमें कोई अहसास ही नहीं.

आप फैन्ड्री का मतलब क्या है यह खोजने आएँगे तब
आपको इन उपेक्षित-तुच्छ समझे जाने वाले इंसानों के अस्तित्व का, उनकी वेदनाओं का
अहसास हुआ तो
फैन्ड्री की आपकी तलाश
और मैंने बनाकर रखा हुआ रहस्य दोनों फलीभूत हुए, ऐसा कहा जा सकेगा.

असल में फैन्ड्री ये कोई रहस्य नहीं.
वह एक आमंत्रण है हम सबके लिए
कि आएं और स्वीकार करें इस कटु यथार्थ को
जिस से हमेशा हम आँख बचाकर निकल जाना चाहते हैं...
जिसे हरदम हम छुपाते आए किसी महारोग की भांति
एड्स की तरह.
मगर जब इस बीमारी का इलाज होगा
हम स्वीकार करेंगे कि हम रोगग्रस्त हैं
तभी एक निरोग, ममतामयी सुबह की संभावना तैयार होगी.



[i] महाराष्ट्र की एक पिछड़ी घुमंतू जाति जिसका पारंपरिक काम पत्थर तोड़ना है.

Monday, December 30, 2013

वाम पक्षों में यौन हिंसा के मामले और जवाबदेही : लॉरी पैनी



(लॉरी पेनी ब्रिटेन की मशहूर नारीवादी वामपंथी लेखक और ब्लॉगर हैं. उनकी यह टिप्पणी “न्यू स्टेट्समन” पत्रिका में प्रकाशित हुई  थी जिसमें वे नियमित स्तम्भ लिखती हैं. घटना विशेष और देश के ख़ास सन्दर्भ में लिखी गई यह टिप्पणी हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी कितनी मौजूं है ये देखकर हैरत और अफ़सोस दोनों का अहसास होता है. इस टिप्पणी का अंग्रेजी से अनुवाद भारतभूषण तिवारी ने किया है।)

वाम पक्षों में होने वाली यौन हिंसा के साथ किस तरह पेश आएँ? एक केस स्टडी पर नज़र डालते हैं.
जो लोग पहले से वाकिफ़ नहीं है उनके लिए बता दिया जाए कि सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (एसडब्ल्यूपी) कई हज़ार सदस्यों वाला एक राजनीतिक संगठन है जो 30 से भी अधिक सालों से ब्रिटिश वाम की प्रमुख ताक़त रहा है ब्रिटेन में सड़कछाप फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में वह आगे रहा है,पिछले कई सालों से छात्र और कामगार आंदोलन में उसकी बड़ी सांगठनिक उपस्थिति रही है और जर्मनी की डी लिंख जैसे अन्य देशों के बड़े,सक्रिय दलों से संलग्न रहा है. यूके के बहुत से बेहद महत्वपूर्ण चिन्तक और लेखक इस पार्टी के सदस्य हैं अथवा पूर्व सदस्य रहे हैं.
ब्रिटेन के बहुत से वामपंथियों की तरह मेरी भी उनसे अपनी असहमतियाँ रही हैं मगर मैं उनके सम्मेलनों में बोल चुकी हूँ, उनकी चाय पी चुकी हूँ और जो काम वे करते हैं उसके प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. उनका समूह गौण या परिधि के बाहर का नहीं है: वे महत्त्व रखते हैं. और यह भी महत्त्व रखता है इस वक्त लैंगिकवाद (सेक्सिज़्म), यौन हिंसा और जवाबदेही के वृहत मुद्दों पर बहस की वजह से पार्टी का ठीकरा बहुत बुरे तरीके से फूट रहा है.
जनवरी के दूसरे हफ्ते में पता चला कि एक वरिष्ठ पार्टी सदस्य के खिलाफ जब बलात्कार और यौन हिंसा के आरोप लगाए गए,तो मामले की रपट पुलिस को नहीं दी गई बल्कि उसे खारिज किए जाने से पहले उससे 'अंदरूनी तौर' पर निपटा गया. जनवरी की शुरुआत में हुए पार्टी के वार्षिक सम्मेलन की लिखित प्रतिलिपि (ट्रांसक्रिप्ट) के अनुसार शिकायत की तहक़ीक़ करने की अनुमति कथित बलात्कारी के मित्रों को दी गई,इतना ही नहीं बल्कि कथित पीड़ितों का और भी उत्पीडन किया गया. उनके पीने की आदतों और पूर्व संबंधों पर सवाल उठाए गए,और जिन्होंने उनका साथ दिया उन्हें निष्कासित कर दिया गया या किनारे कर दिया गया.
पार्टी के एक सदस्य टॉम वॉकर ने इस हफ्ते उकताकर इस्तीफ़ा दे दिया. वे बताते हैं कि नारीवाद (फेमिनिज़्म) को  "पार्टी नेतृत्व के समर्थक बड़े प्रभावशाली ढंग से अपशब्द की तरह इस्तेमाल करते हैं..जेंडर के मुद्दों पर जो 'अति चिंतित' नज़र आता है उसके खिलाफ यह असरदार तरीके से इस्तेमाल किया जाता है."
10 जनवरी को प्रकाशित अपने साहसी और सिद्धांतों पर आधारित अपने त्यागपत्र में वॉकर ने कहा कि: “वाम पक्षों में शक्तिशाली पदों पर आसीन बहुत से पुरुषों की यौन राजनीति पर ज़ाहिर तौर पर एक सवालिया निशान लगा है. मुझे लगता है इसकी जड़ इस बात में है कि या तो प्रतिष्ठा के कारण,या आतंरिक लोकतंत्र के अभाव के कारण या दोनों ही वजहों से ये अक्सर ऐसे पद होते हैं जिन्हें असल में चुनौती नहीं दी जा सकती. ये यूँ ही नहीं हुआ कि हाल में दुनिया भर में लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों का फोकस 'सज़ा से ऊपर होने की संस्कृति’ (कल्चर ऑफ इम्प्युनिटी) के विचार पर था.सोशलिस्ट वर्कर ने इशारा किया है कि किस तरह संस्थाएँ अपने अंदर के ताक़तवर लोगों को बचाने के लिए अपने आप को बंद सा कर लेती हैं. जो बात स्वीकार नहीं की गई है वह यह कि जीवित रहने के लिए आत्म-रक्षा की अपनी प्रवृत्ति के साथ एसडब्ल्यूपी भी इन अर्थो में एक संस्था ही है. जैसा कि पहले कहा गया है, स्वयं के विश्व-ऐतिहासिक महत्त्व में उसका भरोसा ऐसी बातों को छिपाने की कोशिशों और दुष्कर्मियों को सुरक्षित महसूस करवाने का निमित्त बनता है.”
पार्टी के सम्मेलन में यह मामला सामने आने पर और बहसों की लिखित प्रतिलिपि के इंटरनेट पर लीक होने के बाद अब सदस्य भारी संख्या में पार्टी छोड़ रहे हैं या निष्कासित किए जा रहे हैं.
एसडब्ल्यूपी के काफी पुराने सदस्य और लेखक चाइना मिएविल ने मुझसे कहा कि बहुत से सदस्यों की तरह वे भी "हक्का-बक्का' हैं: “इन आरोपों को लेकर जिस तरह का बर्ताव किया गया - आरोप लगाने वालों के पूर्व संबंधों और पीने की आदतों को लेकर उठाये गए सवालों से भरपूर, किसी और सन्दर्भ में हम तुरंत और उचित ही इसकी लैंगिकवादी कह कर भर्त्सना कर देते - वह भयावह है. लोकतंत्र, जवाबदेही और आतंरिक संस्कृति की यह भीषण समस्या है कि ऐसी स्थिति उपजती है और यह तथ्य भी कि प्रभारी वर्ग जिसे अवांछनीय मानता है उस तरीके से ऑफिशियल लाइन के खिलाफ बात करने वालों को 'गुप्त गुटवाद' के लिए निष्कासित किया जा सकता है.”
मिएविल ने समझाया कि अन्य कई संगठनों की ही तरह उनकी पार्टी में भी इस तरह की समस्याओं को आगे बढाने वाले शक्ति सोपानक्रम (पावर हाइरार्की) लंबे समय से विवादास्पद रहे हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि "बिलकुल इसी तरह के लोकतंत्र के अभाव, केंद्रीय समिति और उनके वफादारों की अत्यधिक शक्ति, कथित 'असहमति' को लेकर सख्त पुलिसिया रवैया, और गलतियों को मानने से इनकार- जैसे कि वर्तमान स्थिति जो नेतृत्व के दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार से उपजी त्रासदी है-जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए हम बहुत से लोग बरसों से संगठन की संस्कृति और संरचना में बदलाव के लिए खुले रूप से लड़ रहे हैं. पार्टी के हम सभी लोगों में इस तरह के मुद्दों को स्वीकार करने की विनम्रता होनी चाहिए. एसडब्ल्यूपी के सदस्यों की ये ज़िम्मेदारी है कि वे हमारी परम्परा के भले के लिए लड़ें,बुरी बातों को बर्दाश्त न करें और हमारे संगठन को ऐसा बनाएँ जैसा वह हो सकता है मगर बदकिस्मती से अब तक हुआ नहीं है.

शक्तिशाली पदों पर बैठे पुरुषों द्वारा यौन दुर्व्यवहार और महिला-द्वेष (मिसोजनी) अबाधित रूप से चलने देने वाली संरचनाएँ रखने में राजनीतिक दलों के बीच, वामपंथी समूहों के बीच, प्रतिबद्ध लोगों के संगठनों के बीच, या वास्तव में मित्रों या सहकर्मियों के समूहों के बीच ब्रिटिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी का मामला शायद ही असामान्य है. फक़त पिछले 12 महीनों के दौर में जिन बातों की इशारा किया जा सकता है वह हैं जिमी साविल के मामले में बीबीसी का बर्ताव, या विकिलीक्स के वे समर्थक जो मानते हैं कि जूलियन असांज को स्वीडन में बलात्कार और यौन दुष्कर्म पर सफाई देने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
व्यक्तिगत तौर पर मैं दो मिसालें दे सकती हूँ जिनमें सम्मानित व्यक्ति कष्टपूर्वक अलग हो गए और फौरेवर फ्रेंडशिप समूह जिनमें ऐसी घटनाओं को स्वीकार करने का साहस नहीं था. एकमात्र फर्क यह है कि एसडब्ल्यूपी ने खुले रूप से उन अनकहे नियमों की बात की जिनकी वजह से ऐसा डराना-धमकाना अक्सर चलता जाता है. दीगर समूह इतने बेशर्म नहीं हैं जो यह कह दें कि उनके नैतिक संघर्ष नारीवाद जैसे महत्त्वहीन मुद्दों से ज्यादा अहम हैं - भले ही असलियत में उनका तात्पर्य यही हो, या यह दावा कर दें की सही सोच रखने वाले वे लोग और उनके नेतागण कानून से ऊपर हैं. प्रतीत होता है कि एसडब्ल्यूपी के नेतृत्व ने यह बात अपने नियमों में लिख रखी थी.
यौन हिंसा के मामले बरतने में वाम को दिक्कत होती है ऐसा कहने का मतलब यह नहीं कि दूसरी जगहों पर यह समस्या नहीं है. मगर खास तौर पर वाम में या वृहत रूप में प्रगतिशीलों में पाए जाने वाले 'रेप कल्चर' को स्वीकार करने और हल करने को लेकर एक अड़ियल अस्वीकार ज़रूर है. निश्चित रूप से इसका सम्बन्ध इस ख़याल से है कि प्रगतिशील होने के नाते, बराबरी और सामाजिक न्याय  के लिए लड़ने के नाते, और हाँ, इस नाते के नाते, किसी तरह से हम नस्ल,जेंडर और यौन हिंसा के मुद्दों को लेकर व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने से ऊपर हैं.
हमारे अपने बर्ताव का विश्लेषण करने को लेकर अनिच्छा जल्दी ही जड़सूत्र (डॉग्मा) बन जाती है. तस्वीर ऐसी बनती है कि ये तुच्छ, ज़रा-ज़रा सी बात को मुद्दा बनाने वाली औरतों की वाम के भले आदमियों के अच्छे काम को बर्बाद करने की कोशिश है, औरतों वाले शिकायती अंदाज़ में इस बात पर ज़ोर देकर कि प्रगतिशील स्पेस भी ऐसी स्पेस हों जहाँ उन्हें बलात्कार की, दुर्व्यवहार की, बदचलन कहे जाने की, और अपनी बात कहने पर शिकार बनाए जाने की उम्मीद न हो. और भावनाओं में रोष और नाराजगी है कि: वर्ग युद्ध,पारदर्शिता और सेंसरशिप से आज़ादी का हमारा विशुद्ध और परिपूर्ण संघर्ष क्यों कर 'अस्मिता की राजनीति' से प्रदूषित हो? और अस्मिता की राजनीति इस तरह मुँह बनाकर बोला जाता है जैसे यह लफ्ज़ कितना बेस्वाद है. आम कट्टरपंथियों से अधिक जवाबदेही की अपेक्षा हम से क्यों की जाए? क्यों हमें उच्चतर आदर्शों पर रखा जाए?
वह इसलिए कि अगर हम ऐसे नहीं हैं,तो हमें प्रगतिशील कहलाने का कोई हक नहीं. क्योंकि अगर हम अपनी संस्थाओं के भीतर हिंसा, दुर्व्यवहार और जेंडर हाइरार्की के मुद्दों को स्वीकार नहीं करते तो हमें इन्साफ़ के लिए लड़ने का क्या उसकी बात करने का भी हक नहीं.
वॉकर लिखते हैं, "लोकतंत्र और लैंगिकवाद के मुद्दे अलग नहीं हैं, वे विकट रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. लोकतंत्र का अभाव लैंगिकवाद  के बढ़ने हेतु स्पेस तैयार करता है और जब वह बढ़ जाता है तो उसे जड़ से दूर करने को और भी मुश्किल बनाता है." वे एसडब्ल्यूपी के बारे में बात कर रहे हैं मगर यह बात वाम की किसी भी पार्टी के बारे में कही जा सकती है जो पीढ़ियों के महिला-द्वेषी असबाब से स्वयं को मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रही है. 
बराबरी कोई वैकल्पिक पूरक या गौण मुद्दा नहीं जिस से इन्कलाब के बाद निपटा जा सकता है. महिलाओं के अधिकारों के बिना न कोई सच्चा लोकतंत्र हो सकता है और न ढंग का वर्ग-संघर्ष. वाम जितनी जल्दी इस बात को स्वीकार कर लेगा और अपने साझा पिछवाड़े से  दम्भीपन और पूर्वाग्रह का भारी-भरकम डंडा निकालने  का काम शुरू कर देगा, उतनी जल्दी हम अपना असली काम शुरू कर पाएँगे.