आलोक धन्वा कविता पढ़ने के लिए मंच पर आए तो उन्होंने शुरुआत वीरेन डंगवाल की इस कार्यक्रम में ग़ैर-मौज़ूदगी के ज़िक्र से की। जादुई अंदाज़-ओ-अदा से श्रोताओं को गिरफ़्त में ले लेने वाले आलोक ने कहा कि वीरेन अपने पिता के अचानक बीमार हो जाने के कारण नहीं आ पाया लेकिन उसने मुझे और मंगलेश को भेजा है। इस तरह वीरेन यहाँ है। मैं, मंगलेश और वीरेन; हम तीनों एक ही माँ के गर्भ में पले सगे भाइयों की तरह है। और फिर उन्होंने वीरेन की कविताएँ सुनानी शुरू कीं। मंगलेश उनके सामने अगली पंक्ति में बैठे हुए थे।
इस तरह, आलोक धन्वा और मंगलेश डबराल दोनों से मेरा पहला सीधा परिचय उस दिन वीरेन डंगवाल की बदौलत हुआ था। दरअसल, 14 जुलाई 2002 को करनाल के पंचायत भवन के उस कार्यक्रम की योजना वीरेन डंगवाल को बुलाने की बात से शुरू हुई थी। मंगलेश व आलोक को वीरेन ने ही यहाँ पहुँचने के लिए कहा था। पत्रकार दोस्त सुधाकर भट्ट इन दोनों को लाने के लिए कार लेकर दिल्ली गए थे। मनमोहन रोहतक से रेल में बैठकर आ गए थे। ओमप्रकाश ग्रेवाल, स्वेदश दीपक, चमन लाल, सत्यपाल सहगल, अरुण आदित्य, प्रदीप कासनी और कई दूसरे साहित्यकार ख़ुद अलग-अलग ज़रियों से यहाँ पहुँचे थे। फ़िलहाल, यह सब याद करने का मक़्सद आलोक के इस `एक गर्भ में पले भाइयों जैसे` वाक्य को याद करना है। साहित्य और संबंधों की दुनिया में लाख पेंच होते होंगे लेकिन मंगलेश और वीरेन को मैं हमेशा इसी तरह के दोस्तों के रूप में देखता रहा। `लेखक की रोटी` में वीरेन पर मंगलेश की एक पंक्ति और शायद `समकालीन जनमत` में छपा वीरेन के कविता संग्रह पर मंगलेश का लेख वैसे ही दिल में रहा करते थे।
हाँ, बहुत सारी यादों की उमड़-घुमड़ में से कुछ का उल्लेख रात में जाने क्यों देख ली गई उस तस्वीर के मद्देनज़र जिसमें वीरेन डंगवाल अपनी बीमार-कमज़ोर देह के साथ मंच पर बैठे दिखाई दे रहे हैं। इस हाल में कवि की छवि चली आती है तो सुधीश पचौरी का घिनौनापन भी याद आता है। वीरेन के सम्मान में उन्हें चाहने वालों ने दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया था जो सुधीश पचौरी को बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने 6 अक्तूबर 2013 को हिन्दुस्तान अख़बार में इस बारे में घिनौनी टिप्पणी की। उसने कवि के बीमार होने का मज़ाक उड़ाया था जिसे हिन्दी के बड़े अख़बार ने छापा था। सत्ता-संबंधों पर टिकी हिन्दी की दुनिया ने इसका कोई विरोध किया हो, याद नहीं। हाँ, समयांतर पत्रिका (नवंबर 2013 अंक) ने `शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता` शीर्षक से सुधीश पचौरी और हिन्दुस्तान अख़बार की इस बेशर्मी को रेखांकित करते हुए तीखा विरोध जताया था।
पंकज बिष्ट चाहते थे कि सुधीश पचौरी की टिप्पणी के विरोध में एच.टी, मीडिया लि. को पत्र भी भेजा जाए। उन्होंने एक सुबह अचानक फोन कर इस बारे में बात की। उन्होंने कहा, ज़रूरी नहीं कि अपील जारी कर इस बारे में बहुत सारे लेखकों का समर्थन जुटाने की कोशिश की जाए। पत्र जल्दी जारी होना चाहिए और जिन्हें हस्ताक्षर करने में कोई हिचक न हो, सिर्फ़ उनके ही नाम दिए जाने चाहिए। मैंने तुरंत यही कहा कि आप बात कर लीजिए, लेकिन तय समझिए, असद ज़ैदी निश्चित तौर पर सहमति देंगे। युवाओं की बात है तो अशोक पांडे (हल्द्वानी) का नाम बिना पूछे लिख सकते हैं और शिरीष मौर्य का भी। बाक़ी मैं फोन करके पूछ लेता हूँ। आगरा क्षेत्र के अपने मित्रों से आप न ही पूछें तो बेहतर।
पंकज बिष्ट का फोन फिर क़रीब दो महीने बाद आया। बेहद दु:खी थे और बहुत गुस्से में। बोले, एचटी मीडिया को पत्र मेल कर देते हैं। मैंने पूछा कि अभी तक क्यों नहीं भेजा था। बोले, मंगलेश इसे दबा कर बैठा हुआ था। दो महीने पहले मंगलेश को फोन किया था, उसने कहा था कि वह लेटर पढ़कर बताता है। पंकज उन्हें फोन करते रहे, वे कभी उठाते-कभी नहीं उठाते। उठाते तो कहते कि किसी काम में फंस गए थे, लेटर को पढ़ नहीं सके हैं। पंकज को यह अंदाज़ था कि मसला वीरेन से जुड़ा हुआ है और हम इतना नराज़ हैं तो मंगलेश तो और भी ज़्यादा होगा। वह न सिर्फ़ पत्र पर हस्ताक्षर करेगा बल्कि उसमें लेखकों के नाम भी जोड़ देगा। पंकज बोले कि बेहतर होता, मंगलेश को हस्ताक्षर के लिए कहता ही नहीं। मैंने कहा कि अब और लेखकों से हस्ताक्षर करा लीजिए, पंकज बोले कि पहले ही देरी से इसका महत्व कम हो चुका है, अब जितने नाम हैं, काफ़ी हैं, इसे मेल कर देते हैं।
काफ़ी दिनों बाद, एक दिन तीसरे पहर के क़रीब मैं वैशाली से मैट्रो रेल में चढ़ा तो मंगलेश डबराल मिल गए। वे संजय कुंदन के साथ थे। मैंने नमस्ते की और उन्होंने सजल आत्मीयता के साथ हाल-चाल पूछने के बाद अप्रत्याशित सवाल कर दिया कि क्या पंकज (बिष्ट) उनसे नाराज़ है। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन असहज होकर कहा कि आपके मित्र हैं, आप जानें। उन्होंने कहा कि (वो) मुझे `समयांतर` नहीं भेज रहा है। मैंने कहा कि आपकी सहयोग राशि ख़त्म हो गई होगी। बोले कि नहीं, मुझे लगातार मिलती थी। मैंने कहा कि आपको तो घर से निकलते ही पटरी पर किताबों की दुकान पर दिखाई दे जाती होगी, ख़रीद लीजिए। तब मुझे यही लग रहा था कि वे मयूर विहार में रहते हैं लेकिन शायद वे किराये का मकान छोड़कर जनसत्ता अपार्टमेंट के अपने घर में आ चुके थे। उन्होंने नाराज़गी का सवाल दोहराया तो मैंने कहा कि नाराज़गी का तो पता नहीं लेकिन आप वीरेन डंगवाल पर सुधीश पचौरी की घृणित टिप्पणी के विरोध में जारी किया जाने वाला पत्र दबाकर बैठे रहे, यब बात तो उन्हें बुरी लगी थी। मंगलेश ने पहले तो कहा कि ऐसा कुछ नहीं था लेकिन मैंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसा था तो उन्होंने कहा कि वे किसी की नौकरी नहीं लेना चाहते थे। मुझे इस जवाब पर हैरानी हुई। मैंने पूछा, किसकी नौकरी, सुधीश पचौरी की वो तो वहाँ स्तम्भ लिखता है और उस पर रोज़गार का कोई संकट नहीं है। या संपादक की जिसे शर्म नहीं आयी कि वो छाप क्या रहा है? उसकी नौकरी चली जाती?
एक तनाव तारी हो चुका था। ऐसा नहीं था कि मंगलेश को वीरेन पर पचौरी का अमानवीय हमला बुरा नहीं लगा होगा लेकिन किसी अख़बार से संबंध न बिगड़ जाएं, इस समझदारी ने उन्हें मज़बूर कर दिया होगा। यह जनसत्ता में कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान मालिकान के साथ रहने की उनकी विवशता वाले उनके शुरुआती दौर जैसा मसला भी नहीं था। वे इतना कर सकते थे कि पत्र पर हस्ताक्षर न कर पाने की बात कह देते और लेटर को दबाए न बैठे रहते। दिल उनका वीरेन के साथ ही रहा होगा, लेकिन दिमाग़!
रघुवीर सहाय की ऐसी ही किसी विवशता से खिन्न होकर असद ज़ैदी ने कभी एक कविता लिखी थी - `बेदिल की मुश्किल`। उसी से यह पंक्ति - ऐसे बयान से क्या फ़ायदा?
(मैंने यह पीस 29 सितंबर 2024 को फेसबुक पर लिखा था। इसे संजोने के लिए ब्लॉग पर पोस्ट कर लिया है।- धीरेश सैनी )

