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Tuesday, September 29, 2026

ऐसे बयान से क्या फ़ायदा



आलोक धन्वा कविता पढ़ने के लिए मंच पर आए तो उन्होंने शुरुआत वीरेन डंगवाल की इस कार्यक्रम में ग़ैर-मौज़ूदगी के ज़िक्र से की। जादुई अंदाज़-ओ-अदा से श्रोताओं को गिरफ़्त में ले लेने वाले आलोक ने कहा कि वीरेन अपने पिता के अचानक बीमार हो जाने के कारण नहीं आ पाया लेकिन उसने मुझे और मंगलेश को भेजा है। इस तरह वीरेन यहाँ है। मैं, मंगलेश और वीरेन; हम तीनों एक ही माँ के गर्भ में पले सगे भाइयों की तरह है। और फिर उन्होंने वीरेन की कविताएँ सुनानी शुरू कीं। मंगलेश उनके सामने अगली पंक्ति में बैठे हुए थे।


इस तरह, आलोक धन्वा और मंगलेश डबराल दोनों से मेरा पहला सीधा परिचय उस दिन वीरेन डंगवाल की बदौलत हुआ था। दरअसल, 14 जुलाई 2002 को करनाल के पंचायत भवन के उस कार्यक्रम की योजना वीरेन डंगवाल को बुलाने की बात से शुरू हुई थी। मंगलेश व आलोक को वीरेन ने ही यहाँ पहुँचने के लिए कहा था। पत्रकार दोस्त सुधाकर भट्ट इन दोनों को लाने के लिए कार लेकर दिल्ली गए थे। मनमोहन रोहतक से रेल में बैठकर आ गए थे। ओमप्रकाश ग्रेवाल, स्वेदश दीपक, चमन लाल, सत्यपाल सहगल, अरुण आदित्य, प्रदीप कासनी और कई दूसरे साहित्यकार ख़ुद अलग-अलग ज़रियों से यहाँ पहुँचे थे। फ़िलहाल, यह सब याद करने का मक़्सद आलोक के इस `एक गर्भ में पले भाइयों जैसे` वाक्य को याद करना है। साहित्य और संबंधों की दुनिया में लाख पेंच होते होंगे लेकिन मंगलेश और वीरेन को मैं हमेशा इसी तरह के दोस्तों के रूप में देखता रहा। `लेखक की रोटी` में वीरेन पर मंगलेश की एक पंक्ति और शायद `समकालीन जनमत` में छपा वीरेन के कविता संग्रह पर मंगलेश का लेख वैसे ही दिल में रहा करते थे।

हाँ, बहुत सारी यादों की उमड़-घुमड़ में से कुछ का उल्लेख रात में जाने क्यों देख ली गई उस तस्वीर के मद्देनज़र जिसमें वीरेन डंगवाल अपनी बीमार-कमज़ोर देह के साथ मंच पर बैठे दिखाई दे रहे हैं। इस हाल में कवि की छवि चली आती है तो सुधीश पचौरी का घिनौनापन भी याद आता है। वीरेन के सम्मान में उन्हें चाहने वालों ने दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया था जो सुधीश पचौरी को बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने 6 अक्तूबर 2013 को हिन्दुस्तान अख़बार में इस बारे में घिनौनी टिप्पणी की। उसने कवि के बीमार होने का मज़ाक उड़ाया था जिसे हिन्दी के बड़े अख़बार ने छापा था। सत्ता-संबंधों पर टिकी हिन्दी की दुनिया ने इसका कोई विरोध किया हो, याद नहीं। हाँ, समयांतर पत्रिका (नवंबर 2013 अंक) ने `शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता` शीर्षक से सुधीश पचौरी और हिन्दुस्तान अख़बार की इस बेशर्मी को रेखांकित करते हुए तीखा विरोध जताया था।

पंकज बिष्ट चाहते थे कि सुधीश पचौरी की टिप्पणी के विरोध में एच.टी, मीडिया लि. को पत्र भी भेजा जाए। उन्होंने एक सुबह अचानक फोन कर इस बारे में बात की। उन्होंने कहा, ज़रूरी नहीं कि अपील जारी कर इस बारे में बहुत सारे लेखकों का समर्थन जुटाने की कोशिश की जाए। पत्र जल्दी जारी होना चाहिए और जिन्हें हस्ताक्षर करने में कोई हिचक न हो, सिर्फ़ उनके ही नाम दिए जाने चाहिए। मैंने तुरंत यही कहा कि आप बात कर लीजिए, लेकिन तय समझिए, असद ज़ैदी निश्चित तौर पर सहमति देंगे। युवाओं की बात है तो अशोक पांडे (हल्द्वानी) का नाम बिना पूछे लिख सकते हैं और शिरीष मौर्य का भी। बाक़ी मैं फोन करके पूछ लेता हूँ। आगरा क्षेत्र के अपने मित्रों से आप न ही पूछें तो बेहतर।

पंकज बिष्ट का फोन फिर क़रीब दो महीने बाद आया। बेहद दु:खी थे और बहुत गुस्से में। बोले, एचटी मीडिया को पत्र मेल कर देते हैं। मैंने पूछा कि अभी तक क्यों नहीं भेजा था। बोले, मंगलेश इसे दबा कर बैठा हुआ था। दो महीने पहले मंगलेश को फोन किया था, उसने कहा था कि वह लेटर पढ़कर बताता है। पंकज उन्हें फोन करते रहे, वे कभी उठाते-कभी नहीं उठाते। उठाते तो कहते कि किसी काम में फंस गए थे, लेटर को पढ़ नहीं सके हैं। पंकज को यह अंदाज़ था कि मसला वीरेन से जुड़ा हुआ है और हम इतना नराज़ हैं तो मंगलेश तो और भी ज़्यादा होगा। वह न सिर्फ़ पत्र पर हस्ताक्षर करेगा बल्कि उसमें लेखकों के नाम भी जोड़ देगा। पंकज बोले कि बेहतर होता, मंगलेश को हस्ताक्षर के लिए कहता ही नहीं। मैंने कहा कि अब और लेखकों से हस्ताक्षर करा लीजिए, पंकज बोले कि पहले ही देरी से इसका महत्व कम हो चुका है, अब जितने नाम हैं, काफ़ी हैं, इसे मेल कर देते हैं।

काफ़ी दिनों बाद, एक दिन तीसरे पहर के क़रीब मैं वैशाली से मैट्रो रेल में चढ़ा तो मंगलेश डबराल मिल गए। वे संजय कुंदन के साथ थे। मैंने नमस्ते की और उन्होंने सजल आत्मीयता के साथ हाल-चाल पूछने के बाद अप्रत्याशित सवाल कर दिया कि क्या पंकज (बिष्ट) उनसे नाराज़ है। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन असहज होकर कहा कि आपके मित्र हैं, आप जानें। उन्होंने कहा कि (वो) मुझे `समयांतर` नहीं भेज रहा है। मैंने कहा कि आपकी सहयोग राशि ख़त्म हो गई होगी। बोले कि नहीं, मुझे लगातार मिलती थी। मैंने कहा कि आपको तो घर से निकलते ही पटरी पर किताबों की दुकान पर दिखाई दे जाती होगी, ख़रीद लीजिए। तब मुझे यही लग रहा था कि वे मयूर विहार में रहते हैं लेकिन शायद वे किराये का मकान छोड़कर जनसत्ता अपार्टमेंट के अपने घर में आ चुके थे। उन्होंने नाराज़गी का सवाल दोहराया तो मैंने कहा कि नाराज़गी का तो पता नहीं लेकिन आप वीरेन डंगवाल पर सुधीश पचौरी की घृणित टिप्पणी के विरोध में जारी किया जाने वाला पत्र दबाकर बैठे रहे, यब बात तो उन्हें बुरी लगी थी। मंगलेश ने पहले तो कहा कि ऐसा कुछ नहीं था लेकिन मैंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसा था तो उन्होंने कहा कि वे किसी की नौकरी नहीं लेना चाहते थे। मुझे इस जवाब पर हैरानी हुई। मैंने पूछा, किसकी नौकरी, सुधीश पचौरी की वो तो वहाँ स्तम्भ लिखता है और उस पर रोज़गार का कोई संकट नहीं है। या संपादक की जिसे शर्म नहीं आयी कि वो छाप क्या रहा है? उसकी नौकरी चली जाती?

एक तनाव तारी हो चुका था। ऐसा नहीं था कि मंगलेश को वीरेन पर पचौरी का अमानवीय हमला बुरा नहीं लगा होगा लेकिन किसी अख़बार से संबंध न बिगड़ जाएं, इस समझदारी ने उन्हें मज़बूर कर दिया होगा। यह जनसत्ता में कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान मालिकान के साथ रहने की उनकी विवशता वाले उनके शुरुआती दौर जैसा मसला भी नहीं था। वे इतना कर सकते थे कि पत्र पर हस्ताक्षर न कर पाने की बात कह देते और लेटर को दबाए न बैठे रहते। दिल उनका वीरेन के साथ ही रहा होगा, लेकिन दिमाग़!

रघुवीर सहाय की ऐसी ही किसी विवशता से खिन्न होकर असद ज़ैदी ने कभी एक कविता लिखी थी - `बेदिल की मुश्किल`। उसी से यह पंक्ति - ऐसे बयान से क्या फ़ायदा?

(एचटी मीडिया की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को भेजा गया पत्र यहाँ पढ़ सकते हैं।)

(मैंने यह पीस 29 सितंबर 2024 को फेसबुक पर लिखा था। इसे संजोने के लिए ब्लॉग पर पोस्ट कर लिया है।- धीरेश सैनी )

Tuesday, September 29, 2015

एक अपराजेय का जाना : मंगलेश डबराल


अब ऐसे लोगों का होना बहुत कम हो गया है, जिनसे, बकौल शमशेर बहादुर सिंह, ‘जिंदगी में मानी पैदा होते हों।’ वीरेन डंगवाल ऐसा ही इंसान था, जिससे मिलना जीवन को अर्थ दे जाता था। वीरेन पहली भेंट में अपनी नेकदिली की छाप मिलने वाले के दिल में छोड़ देता था। वह प्रसन्नता की प्रतिमूर्ति था-दोस्तों की संवेदना को सहलाता हुआ, उन्हें धीरज बंधाता हुआ। यह उसकी जीवनोन्मुखता ही थी कि तीन साल तक वह कैंसर से बहादुरी के साथ लड़ता रहा। बीमारी के दिनों में उसे देख हेमिंग्वे के उपन्यास द ओल्ड मैन ऐंड द सी का यह वाक्य याद आता था कि ‘मनुष्य को नष्ट किया जा सकता है, पर उसे पराजित नहीं किया जा सकता।’ वीरेन चला गया, पर यह जाना एक अपराजेय व्यक्ति का जाना है।
वीरेन के जीवन पर यह बात पूरी तरह लागू होती थी कि एक अच्छा कवि पहले एक अच्छा मनुष्य होता है। कविता वीरेन की पहली प्राथमिकता भी नहीं थी, बल्कि उसकी संवेदनशीलता और इंसानियत के भविष्य के प्रति अटूट आस्था का ही एक विस्तार, एक आयाम थी, उसकी अच्छाई की महज एक अभिव्यक्ति और एक पगचिह्न थी। तीन संग्रहों में प्रकाशित उसकी कविताएं अनोखी विषयवस्तु और शिल्प के प्रयोगों के कारण महत्वपूर्ण हैं, जिनमें से कई जन आंदोलनों का हिस्सा बनीं। उनकी रचना एक ऐसे कवि ने की है, जो कवि-कर्म के प्रति बहुत संजीदा नहीं रहा। यह कविता मामूली कही जाने वाली चीजों और लोगों को प्रतिष्ठित करती है, और इसी के जरिये जनपक्षधर राजनीति भी निर्मित करती है।
वीरेन की कविता एक अजन्मे बच्चे को भी मां की कोख में फुदकते रंगीन गुब्बारे की तरह फूलते-पिचकते, कोई शरारत भरा करतब सोचते हुए महसूस करती है, दोस्तों की गेंद जैसी बेटियों को अच्छे भविष्य का भरोसा दिलाती है और उसका यह प्रेम मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, वनस्पतियों, फेरीवालों, नींबू, इमली, चूने, पाइप के पानी, पोदीने, पोस्टकार्ड, चप्पल और भात तक को समेट लेता है। वीरेन की संवेदना के एक सिरे पर शमशेर जैसे क्लासिकी ‘सौंदर्य के कवि’ हैं, तो दूसरा सिरा नागार्जुन की देशज, यथार्थपरक कविता से जुड़ता है। दोनों के बीच निराला हैं, जिनसे वीरेन अंधेरे से लड़ने की ताकत हासिल करता रहा। उसकी कविता पूरे संसार को ढोनेवाली/नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताकत की पहचान करती हुई कविता है, जिसके विषय वीरेन से पहले हिंदी में नहीं आए। वह हमारी पीढ़ी का सबसे चहेता कवि था, जिसके भीतर पी टी उषा के लिए जितना लगाव था, उतना ही स्याही की दावात में गिरी हुई मक्खी और बारिश में नहाए सूअर के बच्चे के लिए था। एक पेड़ पर पीले-हरे चमकते हुए पत्तों को देखकर वह कहता है, पेड़ों के पास यही एक तरीका है/यह बताने का कि वे भी दुनिया से प्यार करते हैं। मीर तकी मीर ने एक रुबाई में ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की है, जो ‘सचमुच मनुष्य हो, जिसे अपने हुनर का अहंकार न हो, जो कुछ बोले, तो पूरी दुनिया सुनने को इकट्ठा हो जाए और जब वह खामोश हो, तो लगे कि दुनिया खामोश हो गई है।’ वीरेन की शख्सियत कुछ ऐसी ही थी, जिसके खामोश होने से जैसे एक दुनिया खामोश हो गई है।
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(अमर उजाला से साभार)

Sunday, July 28, 2013

मंगलेश डबराल के कविता संग्रह 'नये युग में शत्रु' पर असद ज़ैदी की टिप्पणी

नये युग में शत्रु
एक बेगाने और असंतुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं – अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अंतराल से आये इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है – उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अंतःकरण का आयतन।  यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फ़ासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके  लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं, और इसके बरक्स एक सौंदर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नये में मुखरित नये को भी  परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरूआत ही 'गुजरात के मृतक का बयान' से होती है।

ऊपर से शांत, संयमित और कोमल दिखने वाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख़्तजान रही है – किसी भी चीज़ के लिए तैयार! इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पीभूत और जल्दी ही बदरंग हो जाने वाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश  क्लासिसिस्ट मिज़ाज के कवि हैँ – समकालीनों में सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई, और तहदार ज़बान लिखने वाले।

मंगलेश के यहाँ जो असाधारण संतुलन है कभी बिगड़ता नहीं – उनकी कविता ने न यथार्थबोध को खोया है न अपने निजी संगीत को। वह अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं;  इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहजे की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अक़ीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।

और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साज़े-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो पहाड़ पर लालटेन से लेकर उनके पिछले संग्रह आवाज़ भी एक जगह है  में सुनाई देता रहा था। नये युग में शत्रु में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।

–असद ज़ैदी
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ग़ालिब का शेर, जिसका हल्का सा हवाला ब्लर्ब में है, इस तरह है :

नग़्माहा-ए ग़म को भी, ऐ दिल, ग़नीमत जानिये
बे-सदा हो जाएगा, ये साज़े-हस्ती, एक दिन