Monday, November 10, 2008

विष्णु नागर की एक पुरानी कविता



मेरे भाई ने लिखी चिट्ठी
लिखा आना
आना कि इस बार
बहन भी आ रही है
आना तो ख़ूब मज़ा रहेगा

गांव से भाई कहे आना
तो मैं क्यों न जाऊं?

मैं आऊंगा भाई
सोचना मत कि कैसे आऊंगा
800 मील की दूरी भी
बीड़ी पीते पार हो जायेगी
बीड़ी फिर भी न होगी खत्म
(1977-78)

Saturday, November 8, 2008

आबिद आलमी की दो गज़लें



आबिद आलमी यानी रामनाथ चसवाल. ४ जून १९३३ को रावलपिंडी की गूज़रखान तहसील के ददवाल गाँव में पैदा हुए और १९४७ में हरियाणा (तब पंजाब का ही हिस्सा) आये. शायरी को बेहद पाक मानते हुए शायर होने के `दंभ' से पूरी तरह दूर रहे और सुखन के कारोबारियों का क्या पड़ी कि उन पर गौर फरमाते. फिर विभिन्न कॉलेजों में अंग्रेजी अध्यापन और बतौर शिक्षक संगठनकर्ता दिन-रात खपते हुए आलमी साहब को इस सबकी की परवाह करने की फुर्सत भी नहीं थी. वे बीमारी से जूझते हुए ९ फरवरी १९९४ को दुनिया से रुखसत हुए. प्रदीप कासनी की कोशिशों से उनका संग्रह `अलफाज़' आधार प्रकाशन से साया हुआ है.

(1)
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घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक
बनाओगे इन्हें अख़बार की यों सुर्खियाँ कब तक

यूँ ही तरसेंगी बाशिंदों की खूनी बस्तियाँ कब तक
यूँ ही देखेंगी उनकी राह गूंगी खिड़कियाँ कब तक

नहीं समझेगा ये आखिर लुटेरों की जुबां कब तक
हमारे घर को लुटवाता रहेगा पासबाँ कब तक

रहीने-कत्लो-गारत यूँ मेरा हिन्दोस्तां कब तक
लुटेंगी अपनों के हाथों ही इसकी दिल्लियाँ कब तक

कहो सब चीखकर हम पर बला का कहर टूटा है
कि यूँ आपस में ये सहमी हुई सरगोशियाँ कब तक

गिरा देता है हमको ऊंची मंजिल पर पहुँचते ही
हम उसके वास्ते आखिर बनेंगे सीढियाँ कब तक

यूँ ही पड़ती रहेगी बर्फ़ ये कब तक पसे-मौसम
यूँ ही मरती रहेंगी नन्ही-नन्ही पत्तियाँ कब तक

कहीं से भी धुआं उठता जब घर याद आता है
यूँ ही सुलगेंगी मेरी बेसरो-सामानियाँ कब तक

हमारे दम से है सब शानो-शौकत जिनकी ऐ `आबिद'
उन्हीं के सामने फैलायेंगे हम झोलियाँ कब तक


(2)
रात का वक़्त है संभल के चलो
ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो

रास्ते पर जमी हुई है बर्फ़
अपने पैरों पै आग मल के चलो

राह मकतल की और जश्न का दिन
सरफ़रोशो मचल मचल के चलो

खाइयाँ हर कदम पे घात में हैं
राहगीरो संभल संभल के चलो

दायें बायें है और-सा माहौल
राह `आबिद' बदल बदल के चलो

Painting : Iraqi artist, Jabel Al-Saria, 2006.

Monday, November 3, 2008

`ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए`



मनमोहन की कविता और उसका मिज़ाज - असद ज़ैदी
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एक कवि और कवि-चिन्तक के रूप में मनमोहन काफी समय से मशहूर हैं ; उनकी अपनी तरह की शोहरत रही है- ऐसी शोहरत जो शोहरत के औजारों का इस्तेमाल किए बिना, सिर्फ़ उनके काम की पहचान से बनी है। तब भी वरिष्ठ होने के कगार पर खड़े हिन्दी कवियों में मनमोहन ही ऐसे हैं जिनका नाम अक्सर सूचियों में नहीं होता। हिन्दी का आलोचना प्रतिष्ठान, जो इन फेहरिस्तों को वक्त-वक्त पर जारी करता है, आम तौर पर वोटर लिस्ट के नवीनीकरण की पद्धति से काम करता है; या तो जब उनके आदमी मोहल्लों में आए हुए हों तो आप घर और मुहल्ले में मौजूद मिलिए या निश्चित तिथि तक उनके दफ्तर जाकर विधिवत प्रार्थनापत्र देकर और समुचित प्रमाण संलग्न करके अपना नाम दर्ज करा आइये। फिर यह चौकसी रखिये कि आपका नाम, पता, उम्र वगैरा सही सही दर्ज हैं या नहीं - कई बार दर्ज नाम तकनीकी आधारों पर खारिज हो सकता है। मनमोहन का नाम अब से तीन-चार पहले तक फेहरिस्तों में अगर नहीं था तो मनमोहन की अपनी लापरवाही या बेगानगी तो एक गौण कारण है: एक कारण बताया जाता था कि एक सुनिश्चित पते - यानी पुस्तक रूप में प्रकाशित संग्रह - का अभाव। आखिरकार ढाई साल पहले उनका कविता संग्रह `ज़िल्लत की रोटी` एक नामी प्रकाशनगृह से छपकर आया और यह झंझट ख़त्म हुआ। अब अध्यापकों और आलोचकों के रजिस्टरों में उन्हें हाज़िर दर्ज किया जाता है। पर यह एक मामूली रद्दो-बदल है।

मनमोहन के सिलसिले में वोटर लिस्ट या हाज़िरी रजिस्टर के रूपक खींचने के पीछे एक वजह और एक मंशा है। जैसा कि ज़िक्र हुआ है, मैं नहीं समझता कि हिंदी कविता का पाठक मनमोहन की कविता से परिचित नहीं था या उनके समकालीन कवि उनकी उपस्थिति से नावाक़िफ़ थे। उनकी आवाज़ अपनी पीढ़ी की प्रतिनिधि आवाज़ों में है। उनमें शुरू से ही हर अच्छे और रैडिकल युवा कवि की तरह उपलब्ध काव्य संसार के प्रति असंतोष का जज़्बा और उसके नैतिक पुनर्गठन की ज़रूरत का अहसास रहा है। यह उनका एक बुनियादी सरोकार है। वह उन गिने चुने कवियों में हैं जिन्होंने समकालीन हिंदी कविता के व्याकरण और मुहावरे को बनाने का और पुराने नियमों और परिपाटियों को बड़ी समझदारी से और धैर्य के साथ बदलने का बुनियादी काम किया है। उनकी कविता सत्तर और अस्सी के दशक में उभरी समकालीन कविता के अवचेतन में समाई हुई है। इस तरह की मौजूदगी और इसकी एतिहासिकता समकालीन हिंदी कविता की मूल्यवान धरोहर है।
लिहाज़ा यह एक विचारणीय विषय है क जो कविता अपने समय की रचनाशीलता के संवेदन बिंदुओं बल्कि स्नायु तंत्र के इतना नज़दीक रही है, वह आलोचना, शोध और विवेचना की स्थापित व्यवस्थाओं की पहुंच से इतना दूर क्यों थी? इस सवाल का संबंध हमारे साहित्य के समाजशास्त्र से भी है और संस्कृति की राजनीति से भी। हिंदी साहित्य की शोध और विमर्श की विभिन्न परंपराओं के बीच इतिहास और संस्कृति के बुनियादी सवालों को लेकर एक डरावनी और दीर्घकालीन सहमति का माहौल है। हिंदी भाषा और साहित्य के राज्य-समर्थित और वेतन-पोषित उद्योग से जुड़े लोगों के दरम्यान प्रगतिशीलता, यथास्थितिवाद और दक्षिणपंथी परंपरावाद एक दूसरे के विकल्प बनकर कम, पूरक बनकर ज़्यादा आते हैं - इनकी ट्रेड यूनियन एक है और नई यूनियन कभी बनी नहीं। मनमोहन की कविता और आलोचना इस सुलह (या अकबरकालीन `सुल्हे-कुल') को चुनौती देती है। हिंदी की लोकतांत्रिक समकालीन कविता और आलोचना व्यवस्था के बीच, या दूसरे शब्दों में सार्थक, प्रतिबद्ध रचनाशीलता और हिंदी प्रतिष्ठान के बीच जो मूल अंतर्विरोध है, वह इसी `पोलिटकल इकोनमी' से निकलता है। नेहरू-युग में ही फल-फूलकर परवान चढ़ चुकी इस राजनीतिक-सांस्कृतिक सर्वानुमति के मद्देनज़र आलोचनात्मक और काव्यात्मक विपक्ष का काम भी कवि-रचनाकार को ही करना पड़ा है - न सिर्फ़ काव्य-व्यवहार के बल्कि चिंतन और विमर्श के स्तर पर, और काव्यालोचना के स्तर पर। मुक्तिबोध से शुरू होकर रघुवीर सहाय से होता हुआ यह सिलसिला मनमोहन तक चला आता है।
इस अर्थ में मनमोहन की उपस्थिति गौण उपस्थिति नहीं, अपने दौर की एक प्रधान और प्रभावशील उपस्थिति है। उन्होंने प्रगतिशील और जनवादी परंपरा की हिफ़ाज़त करने और नई परिस्थिति में उसकी जोत जलाए रखने का काम किया है। यह काम सिर्फ़ वैकल्पिक राजनीति की हिमायत में खड़ा होना नहीं है, बल्कि कविता और काव्य चिंतन के मैदाने-अमल में इसको तब्दील करने, अपनी राह ढूंढने और रास्ता बनाने का काम है। जो इस खामोश मेहनत को नहीं पहचानते, वे मनमोहन की कविता की गहराइयों और मुश्किलों को ठीक से नहीं देख पाएंगे। ग़ालिब का एक अमर शे`र - जो अक्सर अमर चीज़ों की तरह आजकल भुला दिया गया है - याद आता है :
नश्वो-नुमा है अस्ल से ग़ालिब फ़ुरो` को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए

ग़ालिब ने ख़ामोशी को जड़ (मूल, अस्ल) और बातों को उससे निकलती टहनियां (फ़ुरो`,शाखें) कहा है। मनमोहन के काम में और उनके काम की दुनिया में ख़ामोशी और बातों का रिश्ता ठीक एसा ही है।
इस टिप्पणी के अंत में मैं वे बातें दोहरा दूं जो मैंने `ज़िल्लत की रोटी' के प्रकशन के मौके पर कही थीं। ये मनमोहन के रचना संसार की संपूर्णता या उसकी चुनौतियों का अहाता तो नहीं करतीं, पर उनकी कविता की कुछ ख़ूबियों को ज़रूर बयान करती हैं :
मनमोहन की कविता में वैचारिक और नैतिक आख्यान का एक अटूट सिलसिला है। उनके यहां वर्तमान जीवन या दैनिक अनुभव के किसी पहलू, किसी मामूली पीड़ा या नज़ारे के पीछे हमेशा हमारे समय की बड़ी कहानियों और बड़ी चिंताओं की झलक मिलती रहती है : वह मुक्तिबोधियन लैंडस्केप के कवि हैं। उनकी भाषा और उनके शिल्प को उनके कथ्य से अलग करना नामुमकिन है। यहां किसी तरह की कविताई का अतिरिक्त दबाव या एक वैयक्तिक मुहावरे के रियाज़ की ज़रूरत नहीं है, एक मुसलसल नैतिक उधेड़बुन है जो अपने वक्त की राजनीतिक दास्तानों और आत्मीय अनुभवों के पेचदार रास्तों में गुज़रकर उनकी भाषा और शिल्प को एक विशिष्ट `टेक्सचर' और धीमा लेकिन आशवस्त स्वर, और एक वांछनीय ख़ामोशी प्रदान करती हैं। मनमोहन अपनी पीढ़ी के सबसे ज़्यादा चिंतामग्न, विचारशील और नैतिक रूप से अत्यंत शिक्षित और सावधान कवि हैं। एक मुक्तिबोधीय पीड़ा और महान अपराधबोध उनके काव्य संस्कार में हैं, इन्हें एक रचनात्मक दौलत में बदलने की प्रतिभा और तौफ़ीक़ उनके पास है, और इनका इस्तेमाल उन्होंने बड़ी विनम्रता, वस्तुनिष्ठता और सतर्कता से किया है।
मनमोहन उस जगह के कवि हैं जहां `अपनी आवाज़ ने बताया/कितनी दूर निकल आये हम/अपनी आवाज़ ने बताई/निर्जनता'। वह ऐसे समय के कवि हैं जहां `अगर जीवित मित्र मिलता है/उससे ज़्यादा उसकी स्मृति उपस्थिति रहती है।' जहां मां एक `अजनबी स्त्री के वेश में' आकर अपने गंजे होते अधेड़ बेटे को `सपने में जगाती है' और `भूखी हूं' यह `पूरे तीस साल बाद' बताती है। जहां शोकसभा में आये लोग ख़ुद `पहले ही कहीं जा चुके हैं'। या जहां लोग कभी मिल नहीं पाते, सिर्फ़ उनकी छायाएं आपस में मिलती हैं।
मनमोहन की कविता में एक `गोपनीय आंसू' और एक `कठिन निष्कर्ष' है। इन दो चीज़ों को समझना आज अपने समय में कविता और समाज के, राजनीति और विचार के, और अंतत: रचना और आलोचना के रिश्ते को समझना है।

मनमोहन की कुछ कविताएं

मेरी ओर

मैं तुम्हारी ओर हूं

ग़लत स्पेलिंग की ओर
अटपटे उच्चारण की ओर

सही-सही और साफ़-साफ़ सब ठीक है
लेकिन मैं ग़लतियों और उलझनों से भरी कटी-पिटी
बड़ी सच्चाई की ओर हूं

गुमशुदा को खोजने हर बार हाशिए की ओर जाना होता है
कतार तोड़कर उलट की ओर
अनबने अधबने की ओर

असम्बोधित को पुकारने
संदिग्ध की ओर
निषिद्ध की ओर
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यकीन

एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया

हिसाब
एक दिन सामने आएगा

जो बीच में ही चले गए
और अपनी कह नहीं सके
आएंगे और
अपनी पूरी कहेंगे

जो लुप्त हो गया अधूरा नक्शा
फिर खोजा जाएगा
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उम्मीद

आज
कमरे का एक कोना छलक रह है

माँ की आँख
बालक का हृदय छलक रहा है

छलक रह है एक तारा
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इच्छा

एक ऐसी स्वच्छ सुबह मैं जागूँ
जब सब कुछ याद रह जाय

और बहुत कुछ भूल जाय
जो फालतू है
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अपनी आवाज़ ने

अपनी आवाज़ ने बताया
कितनी दूर निकल आये हम

अपनी आवाज़ ने बताई
निर्जनता
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हमारा जातीय गौरव

आधी से ज़्यादा आबादी
जहां खून की कमी की शिकार थी
हमने वहां ख़ून के खुले खेल खेले

हर बड़ा रक्तपात
एक रंगारंग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ

हमने ख़ूब बस्तियां जलाईं
और खूब उजाला किया

और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा
देखो, दुनिया के लोगो
देखो हमारा जातीय गौरव!
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उसकी थकान

यह उस स्त्री की थकान थी
कि वह हंस कर रह जाती थी

जबकि वे समझते थे
कि अंतत: उसने उन्हें क्षमा कर दिया है
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उसकी पीठ

उसकी पीठ
जब जाने के लिए मुड़ती है
तो उसी क्षण एक सूनी, अकेली और निष्ठुर जगह बनाती है
जो अनिवार्य है

जाते हुए उसकी पीठ को देखना
ठीक ठीक सबसे ज़्यादा अपने साथ होना है
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तुम्हारा प्यार

यह स्त्री डरी हुई है
इस तरह
जैसे इसी के नाते
इसे मोहलत मिली हुई है

अपने शिशुओं को जहां-तहां छिपा कर
वह हर रोज़ कई बार मुस्कुराती
तुम्हारी दूरबीन के सामने से गुज़रती है

यह उसके अंदर का डर है
जो तुममें नशा पैदा करता है

और जिसे तुम प्यार कहते हो
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Sunday, October 26, 2008

सड़ांध मार रहे हैं तालाब


तहलका कांड के खुलासे के बाद कई लोग हैरत जैसा भाव दिखा रहे थे और बीजेपी व संघ खानदान की बोलती कई दिनों तक बंद थी। हालांकि जो हैरत दिखा रहे थे, हैरत उन्हें भी नहीं थी। मालेगांव विस्फोट में हिंदुत्ववादी कारकुनों और किसी साध्वी के खिलाफ सबूत मिलने पर भी फिलहाल संघ खानदान थोड़ा सकते में है (हालांकि, वह जानता है कि कुछ होने-जाने वाला नहीं है, उसे समाज के सांप्रदायिक हो चुकने पर सही ही गहरा भरोसा है)। पर बहुत से लोग हैरत दिखा रहे हैं - `अच्छा, हिंदुत्ववादी भी एसा कर सकते हैं, हम तो सोच भी नहीं सकते थे`, वगैरह, वगैरह। पर क्या वाकई उन्हें कोई हैरत है! देश के विभाजन और गांधी की हत्या के बाद भी क्या कुछ छिपा रह गया था? जिसे हमारा मीडिया और हमारा समाज संघ-बीजेपी आदि का हिडन एजेंडा कहता रहा क्या वह हमेशा ही पूरी तरह साफ खुला अभियान नहीं था? बाबरी मस्जिद ढहाने केबाद भी सांप्रदायिकता के कितने खूनी खेल संघ परिवार ने खेले और मीडिया, समाज और राजनीति की स्वीकार्यता भी अपने इन कृत्यों के लिए हासिल कर ली। इन दिनों हमने देखा कि सेक्युलरिज्म की राजनीति करते रहे मुलायम, माया और तमाम दूसरे नेता भी जब चाहते हैं बेझिझक सांप्रदायिक गाड़ी पर सवार हो लते हैं, यह जानते हुए कि मुसलमान के पास अब रास्ता ही क्या है(हालांकि ढिंढोरा मुस्लिम तुष्टिकरण का ही सबसे ज्यादा पीटा जाता रहा है)। पूरी तरह आइसोलेशन में धकेल दिए गए मुसलमानों के आतंकवादी होने का प्रचार भी हम खूब जोरशोर से करते रहे (हालांकि हालात हमने उनके आतंकवादी हो जाने के ही पैदा कर रखे हैं) और हिंदुत्वावदी आतंकी तांडव पर फूले नहीं समाते रहे।
हैरत तो यह भी नहीं है कि संघी प्रचार में वो लोग भी शामिल रहे हैं जिनके चेहरे बेहद शालीन, अत्यंत मृदु और अति भद्र हैं और जो अपनी गांधीवादी उदारता में बस बेमिसाल हैं। गीतफरोश भवानी भाई के साहबजादे और `तालाब भी खरे हैं` वाले गांधीवादी मार्का अनुपम मिश्र भी अपनी गांधीवादी चेयर पर बैठकर फरमा सकते हैं कि हिंदू तो उदार है और मुस्लिम स्वभाव से ही आतंकवादी है। दरअसल दो बरस पहले अखबार के काम के सिलसिले में उनके पास गांधी पर एक छोटे इंटरव्यू के लिए गया था तो वे भगत सिंह पर पिल पड़े थे और फिर कहने लगे थे कि भगत सिंह सही हैं तो फिर लादेन को भी सही कहना पड़ेगा। बात विषय से भटक चुकी थी और उनके साथ मैं भी। बजरंग दल और गुजरात का जिक्र आया तो उन्होंने कहा- हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, मुसलमान जहां भी हैं, वहां आतंकवाद हैं। उनके इस एकांगी और नफरत भरे नजरिये से मैं गहरी वितृष्णा में रह गया और मैंने महसूस किया कि तालाब खरे नहीं हैं बल्कि उनमें भारी सड़ांध है। मुझे समझ में आया कि कैसे कांग्रेस में हमेशा संघ मजे से फलत-फूलता रहा, कैसे गांधी की हत्या में कांग्रेस के ही मंत्रियों की भूमिका घिनौनी रही, कैसे नेहरू बार-बार सांप्रदायिकता से लड़ाई के मसले में अपनी ही पार्टी में अकेले पड़ते रहे। मुझे अचानक अपने स्कूल के समय के अपने गांधी, विनोबा और जेपी के अनुयायी कई खद्दरधारी सर्वोदयी टीचर याद आए कि कैसे वो संघ के अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे थे। मुझे वो सीध दिखाई पड़ी जो संघ, कांग्रेस और आर्यसमाज व दूसरे एसे संगठनों में है और जो अब आम जन के मन तक बन चुकी है। खैर अब ये इंटरव्यू छपने लायक तो था नहीं पर मेरे मन में यह छप चुका था। भला अनुपम मिश्र को अब कोई हैरत हो रही होगी?

Tuesday, October 14, 2008

मनमोहन की दो पुरानी कविताएं


कवि-लड़का (मनमोहन का मथुरा के छात्र दिनों का फोटो)
मनमोहन हमारे समय के बड़े कवि हैं, 80 के दशक की कविता का शिल्प तय करने वाले प्रमुख कवि और ठीक पहली कविता के तेवरों की वास्तविकता की पड़ताल का रिस्क उठाने वाले आलोचक भी। छपने से परहेज बरतते रहे इस कवि का एक संग्रह `ज़िल्लत की रोटी` आया है, जिसमें बाद की कविताएं है. 1969 से कविता लिख रहे इस कवि की आपातकाल में बहुचर्चित `राजा का बाजा` समेत कई पुरानी कविताएं मेरे हाथ लगी हैं, जिन्हें एक-दो सीरीज़ में ही टाइप कर पाऊंगा। हाल में उन्हें हरियाणा साहित्य अकादमी ने कविता पर लखटकिया सम्मान दिया है। एक लाख रुपये की यह राशि उन्होंने सामाजिक-सांस्कृितक क्षेत्र में काम कर रही संस्था `हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति` को भेंट कर दी है। इस मौके पर उनकी कविताओं पर असद जैदी की टिप्पणी और खुद उनका (मनमोहन का) वक्तव्य देने का भी इरादा है। फिलहाल उनकी दो पुरानी कविताएं- 

आग
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आग
दरख्तों में सोई हुई
आग, पत्थरों में खोई हुई

सिसकती हुई अलावों में
सुबकती हुई चूल्हों में

आँखों में जगी हुई या
डरी हुई आग

आग, तुझे लौ बनना है
भीगी हुई, सुर्ख, निडर
एक लौ तुझे बनना है

लौ, तुझे जाना है चिरागों तक
न जाने कब से बुझे हुए अनगिन
चिरागों तक तुझे जाना है

चिराग, तुझे जाना है
गरजते और बरसते अंधेरों में
हाथों की ओट
तुझे जाना है

गलियों के झुरमुट से
गुजरना है
हर बंद दरवाजे पर
बरसना है तुझे
(१९७६-७७)


मशालें...
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मशालें हमें वैसी ही प्यारी हैं
जैसी हमें भोर

मशालें जिन्हें लेकर
हम गाढ़े अंधेरों को चीरते हैं
और बिखरे हुए
अजीजों को ढूंढते हैं
सफ़र के लिए

मशालें जिनकी रोशनी में
हम पाठ्य पुस्तकें पढ़ते हैं

वैसे ही पनीले रंग हैं
इनकी आंच के...जैसे
हमारी भोर के होंगे

लहू का वही गुनगुनापन
ताज़ा...बरसता हुआ...

मशालें हमें वैसी ही प्यारी हैं
जैसी हमें भोर
(1976)

Tuesday, September 30, 2008

इस वक़्त मेरे पास आपकी दिलजोई के लिए कोई नाजुक कविता नहीं है

साहित्य में मेरी रूचि है और मैं कोई प्यारी सी कविता या कोई कविता सा गद्य का टुकडा पोस्ट करने का मन बनाता हूँ पर ऐसा हो नहीं पाता. आज सुबह द हिन्दू देखा और फिर दिल और दिमाग सुन्न सा रह गया. फिर भी कई साथी कहते हैं कि आतंकवादी तो मुसलमान हैं बस. ये मुल्क खतरे में है, कुछ कर सकते हो तो करो. आतंकवादी आर एस एस तो जो करना था कर चुका और कर रहा है.......
Nun was gang raped and priest brutally assaulted in Kandhamal
Parvathi Menon
FIRs lodged but no arrests by State government; no response from Centre; Sister Nirmala wrote to CM and PM appealing for protection to Christians

Bhubaneswar: The Orissa government has failed to take any action, under the law of the land, against those who committed bestial crimes — the gang rape of a 28-year-old Catholic nun and the brutal attack on a Catholic priest who courageously resisted their attempts to force him to participate in the atrocity. These incidents took place on August 25 at K. Nuagaon, 12 km from the Baliguda subdivision in Kandhamal district. Both victims filed First Information Reports at the Baliguda police station. Sister Nirmala, Superior-General of the Missionaries of Charity, wrote to the Orissa Chief Minister and the Prime Minister specifying the atrocities.
The brutalisation of the nun and the priest by a mob raising anti-Christian, Hindutva slogans took place around 1 p.m. at the site of the Divya Jyothi Pastor Centre. The church was burnt the previous day in reprisal against the murder of an RSS activist, Lakshmanananda Saraswathi, and four of his associates on August 23. The gang rape of the young nun, whose “virginity [was] grossly violated in public” (and whose identity is being withheld by this newspaper to protect her privacy) took place in front of a police outpost with 12 policemen from the Orissa State Armed Police present and watching, according to Father Thomas Chellan, the priest who was dragged out and badly beaten.
“Around 1 p.m., a gang came and pulled me and the Sister out of the house where we had taken shelter and started assaulting us,” Father Chellan told The Hindu in a telephonic interview from Kerala where he is recuperating.
“My appeals to the policemen who were standing nearby and watching only resulted in further beating. At one point the nun slipped away to plead with the police for help but she was dragged back by the mob and her blouse torn,” he said. The nun was gang raped in a nearby building, and he was doused with kerosene by the mob, which threatened to set him on fire. They were saved by a group of youth who took them to the police outpost where “one among the attackers was present with the police between 3 p.m. and 9 p.m.,” Father Chellan said.
News of the K. Nuagaon atrocity was conveyed through mobile phones to several priests and nuns hiding in the forests, fearing for their lives as the anti-Christian hunt was on. The victims were taken to the Baliguda police station around 9 p.m. where they lodged First Information Reports. “I believe the Sister wrote in her complaint that she was raped,” Father Chellan said.
The atrocity, about which the State government has not gone public, has outraged and terrified Christian organisations working in Kandhamal district. News of it was brought to the notice of Chief Minister Naveen Patnaik by Raphael Cheenath, Archbishop of the Cuttack-Bhubaneswar diocese.
Sister Nirmala wrote letters to the Orissa Chief Minister and the Prime Minister on this and other brutal attacks on Christians in Orissa. In her letter, dated August 28, 2008, to Chief Minister Patnaik, she took up “a very sad incident, soon after the eruption of the violence” of “one young sister, consecrated to God, who was administrator of an institute, being hunted out of her hiding place and stripped naked by the mob and her virginity grossly violated in public, without any help from the police present there.”
In her appeal for protection to Christians, Sister Nirmala urged the Chief Minister to “ask the Central Govt. for as many extra forces from the Centre as they are willing to give and you need.”
When contacted, Praveen Kumar, Superintendent of Police, Kandhamal district, told The Hindu that investigations into the episode by a Deputy Superintendent of Police were on and “the law will take its course.” He confirmed that no arrests have been made in connection with the incidents.

Tuesday, September 23, 2008

हमारे प्यारे आतंकवादी!

आतंकवादी दो तरह के होते हैं. एक वो जो मुसलमान होते हैं. (कहा तो यह भी जाता है कि मुसलमान होते ही आतंकवादी हैं) दूसरे वो जो हमारे अजीज हैं, आँखों के तारे हैं. वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.