Saturday, September 26, 2009

हवा में रहेगी ख़यालों की बिजली...



दरजे पांच की हिन्दी की किताब में भगत सिंह पर एक पाठ (सबक यानी लेसन) था। इसकी शुरुआत भगत सिंह के उस ख़त की काव्यपंक्तियों के अनुवाद से होती थी जो उन्होंने फांसी से पहले अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखा था। भगत सिंह का नाम हमारे लिए बेहद जाना-पहचाना था और इस नाम के प्रति गहरी आस्था भी थी। पर कोर्स के इस पाठ की शुरुआती लाइनें दिल-दिमाग (दिमाग तो खैर इतना काबिल नहीं था) को छू गईं थीं। ये लाइनें कुछ इस तरह थीं - ऊषा काल के दीपक की लौ की भांति बुझा चाहता हूँ। इससे क्या हानि है जो ये मुट्ठी भर राख विनष्ट की जाती है। मेरे विचार विद्युत की भांति आलोकित होते रहेंगे। मुझे तब न समाजवाद के बारे में कुछ पता था, न कम्युनिज्म के बारे में। ६-७ बरसों बाद अचानक एक पत्रिका में भगत सिंह का मशहूर लेख `मैं नास्तिक क्यों हूँ?` पढने को मिला। मैं दयानंद के अनुयायी परिवार का पक्का ईश्वरवादी था और आर्यसमाज के तार्किक होने के तमाम दावों के बावजूद ईश्वर के अस्तित्व को लेकर किसी तरह की शंका का सवाल ही नहीं उठता था। लेकिन इस लेख का जैसा असर मुझ पर हुआ, वैसा शायद ही किसी दूसरे लेख या किताब का हुआ हो। तत्काल मैं किसी तरह के भावावेश में नहीं था पर धीरे-धीरे मैंने पाया कि ईश्वर के अस्तित्व जैसी कोई धारणा मेरे भीतर कतई नहीं है। बाद में भगत सिंह की लिखी दूसरी उपलब्ध सामग्री मिली और हमेशा ही उनके आलोचनात्मक विवेक को लेकर हैरत होती रही।

हैरत यह कि इत्ती कम उम्र में ऐसा विवेक और साहस जो विचार और एक्शन को हर किस्म के झूठे फंदे से मुक्त कर दे। आखिर बड़े से बड़े प्रगतिशील लेखक, विचारक, एक्टिविस्ट कई तरह की संकीर्णताएं के छीटों से अपने लेखन और जीवन को बचा नहीं पाते हैं. कुछ जाति के मसले पर तो कुछ साम्प्रदायिकता के मसले पर तमाम किन्तु-परन्तु लगाकर काम चलाते हैं. सामंतीपन और आत्ममुग्धता तो खैर इन लोगों के जेवरों की तरह मौजूद रहते हैं. लेकिन आप भगत सिंह को जाति के सवाल पर पढ़िए तो अपनी छोटी सी टिप्पणी में ही वे धर्म और राष्ट्र की दुहाई देकर जाति और वर्ण की रक्षा को आतुर दुसरे `अछूत उद्धारकों` जैसा रवैया नहीं अपनाते बल्कि इस मुद्दे पर उनके यहाँ आंबेडकर और पेरियार जैसे दलित नेताओं जैसा दो टूक आह्वान मिलता है. धर्म और साम्प्रदायिकता के सवाल पर भी उनके विचार बेमिसाल हैं. यह दुर्भाग्य ही है कि उनके दस्तावेज लम्बे समय तक अँधेरे में रहे और इसका फायदा उठाकर संघ जैसी सांप्रदायिक और जातिवादी ताकतें उनके नाम का इस्तेमाल करने की कोशिश करती रहीं।
भगत सिंह का एक और गुण जो मुझे बेहद आकर्षित करता है, वह है उनका खुद तक के प्रति भी निर्मम आलोचनात्मक रवैया रखना. ऐसे लोग कम ही मिलेंगे (और राजनीति में तो और भी कम और खुद को आभामंडल से घिरा महसूस करने वाले तो नहीं के बराबर) जो अपने पिछले कदम की गलतियों को स्वीकार कर सकें. इस दौर में जब दुनिया में और अपने देश में पूंजीवादी व साम्राज्यवादी ताकतें न्याय व बराबरी के सवाल को बेशर्मी से कुचलने को उतारू हैं तो भगत सिंह का ऐतिहासिक बयान - जब तक शोषण है, संघर्ष जारी रहेगा - बिखरी हुई लडाइयों के रूप में ही सही पर सच साबित हो रहा है. बेशक इन संघर्षों को ऐसे नायकों की ज्यादा से ज्यादा जरूरत है जो धर्म, जाति, पुनरुत्थानवाद और ऐसे तमाम धूर्त फंदों से पूरी तरह मुक्त हों.

Saturday, September 19, 2009

सैर-सपाटा







ये तस्वीरें कबीर ने भेजी हैं. कबीर दिल्ली में रहता है, नौवीं-दसवीं का छात्र है और अपना कई बरस पुराना दोस्त है.

Wednesday, September 16, 2009

हुसेन : गुरबत में हों अगर हम...





शान-ए-हिंद, तुझे सालगिरह मुबारक हो



गुरबत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में


समझो वहीं हमें भी दिल है जहाँ हमारा


-इक़बाल

Tuesday, September 15, 2009

मसला - वीरेन डंगवाल



बेईमान सजे-बजे हैं
तो क्या हम मान लें कि
बेईमानी भी एक सजावट है?

कातिल मज़े में हैं
तो क्या हम मान लें कि क़त्ल करना मज़ेदार काम है?

मसला मनुष्य का है
इसलिए हम हरगिज़ नहीं मानेंगे
कि मसले जाने के लिए बना है मनुष्य

Wednesday, September 2, 2009

चरनदास चोर नहीं है – मंगलेश डबराल


हमारे पीढ़ी के बहुचर्चित कथाकार और कवि उदय प्रकाश की इस चिंता (जनसत्ता, 16 अगस्त) में ज्यादातर लोग शरीक होंगे कि ‘जब सारे अंदेशे और बुरे सपने सच होने लगते हैं तो उनकी परछाईं देर-सबेर सारे देश और बृहत्तर समाज पर भी गिरती है।' दरअसल ये छायाएं देश और समाज ही नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों और संवेदनाओं पर भी मंडराती रहती हैं। हिटलर सरीखा तानाशाह अपनी मांद में दयनीय ढंग से नष्ट हो जाता है लेकिन उसके वर्षों बाद भी पूरा यूरोप हिटलर की वापसी की आशंका से मुक्त नहीं हो पाता, यातना शिविरों के शिकार हुए लोग मिट जाते हैं लेकिन यातना की स्मृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। इन पंक्तियों के लेखक को उदय प्रकाश के कई तर्कों को पढ़ते हुए यूनान के कवाफ़ी और जॉर्ज सेफरिस के समकक्ष मानेजाने वाले महाकवि यानिस रित्सोस की याद आती है, जिन्हें टीबी जैसे रोग से ग्रस्त होने के बावजूद मैटाक्सस से लेकर पापादिपूलोस जैसे तानाशाहों की सरकारों ने करीब पंद्रह वर्ष तक जेल में रखा या विभिन्न द्वीपों में निर्वासित किया और जिनकी महान रचनाओं पर करीब पच्चीस वर्ष तक प्रतिबंध लगा रहा। ऐसा इसलिए हुआ कि रित्सोस यूनान की कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे और उनकी एक लंबी कविता ‘एपीताफ़िओस’ मिकिस थिओदोराकिस की लिपि में संगीतबद्ध होकर जनसाधारण का प्रतिरोध-गीत बन गयी थी। लेकिन इतनी लंबी यंत्रणा झेलने के बाद 11 नवंबर 1990 को यानिस रित्सोस के निधन पर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में उनके प्रति जो श्रद्धांजलि प्रकाशित हुई, उसमें कहा गया था कि ‘यानिस रित्सोस की क्रान्तिकारी राजनीति के बावजूद यूनान की कट्टरपंथी सरकार ने घोषणा की कि उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जायेगा। हमारे देश के कालजयी रंगकर्मी और सांस्कृतिक व्यक्तित्व हबीब तनवीर के निधन पर जब मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने, बक़ौल उदय प्रकाश, 21 बंदूकों की सलामी का राजकीय सम्मान दिया तो यह जैसे रित्सोस के अंतिम संस्कार की पुनरावृत्ति ही थी।

उदय प्रकाश का यह कहना सच नहीं है कि छत्तीसगढ़ में ‘प्रतिबंधित’ हबीब तनवीर मध्यप्रदेश में उसी भाजपा के शासन के तहत ‘अभिनंदित’ थे। दुनिया भर के लोकतंत्रों में रंगकर्म राज्य के अनुदान पर निर्भर रहता है और सच यह है कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार आने के बाद हबीब तनवीर के ‘नया थियेटर’ को मिलने वाली सहायता राशि में कई तरह की रुकावटें पैदा की गयीं, उनके रंगमंडल का घर खाली करवाने और उन्हें भोपाल छोड़कर जाने के लिए विवश करने की सरकारी कोशिशें हुईं, और जैसा कि उस समय की अखबारी रिपोर्टों और हबीब साहब पर बनी एक फिल्म ‘मोर नाँव हबीब तनवीर’ से जाहिर होता है, उनके नाट्य प्रदर्शनों को जगह-जगह रोका गया, धमकियां दी गयीं और उपद्रव मचाकर दर्शकों से भरे हुए हॉल खाली करवाये गये। कुल मिलाकर यह हबीब तनवीर जैसे कड़ियल का दमखम था या उनकी वैचारिक ताकत थी कि वे भोपाल में ही डटे रहे हालांकि उन्हें जिन रोजमर्रा परेशानियों का सामना करना पड़ा उनकी कहानी शायद कभी कोई – जैसे उनकी बेटी नगीन – लिखे तो हम 21 बंदूकों की सलामी देने वाली सत्ताओं की असलियत कुछ समझ पायेंगे। अभी हम सिर्फ यही पूछ सकते हैं कि क्या कोई सभ्य सत्ता-व्यवस्था हबीब तनवीर जैसे कालजयी व्यक्तित्व का घर खाली कराती है? यहां हम यह याद कर सकते हैं कि 1967 में जब ज्यां पॉल सार्त्र को पेरिस के छात्र विद्रोह का सक्रिय समर्थन करने के कारण गिरफ्तार किया गया तो तत्कालीन राष्ट्रपति शार्ल द गॉल ने उन्हें तुरंत रिहा करते हुए कहा था : 'वोल्तेअर को कौन गिरफ्तार कर सकता है!’

आखिर ऐसा क्यों है कि अपने बड़े लेखकों और बुद्धिजीवियों को तरह-तरह से सताने वाली सत्ता व्यवस्थाएं उन्हें मरणोपरांत राजकीय सम्मान प्रदान करती हैं, उनकी स्मृति में स्मारक बनाती हैं या उनके नाम पर पुरस्कार स्थापित करती हैं जो उन लोगों को भी दिये जाते हैं जिनके मूल्य अक्सर उन दिवंगत बुद्धिजीवियों के विपरीत होते हैं? हम जानते हैं कि मध्यप्रदेश में मुक्तिबोध जैसे महाकवि की इतिहास संबंधी एक पाठ्य-पुस्तक पर कांग्रेस के शासन में प्रतिबंध लगा था जिससे मुक्तिबोध मानसिक रूप से हमेशा संतापित रहे और बार-बार अपने पत्रों में इसे हटाने की मांग किया करते थे। यह प्रतिबंध आज भी जारी है जबकि मध्य प्रदेश से निकल कर बने राज्य छत्तीसगढ़ में सरकार ने बाकायदा मुक्तिबोध का स्मारक बना दिया है और उसे एक लेखकीय तीर्थ के रूप में प्रचारित किया जाता है। सवाल यह है कि क्या रित्सोस और हबीब तनवीर के शवों को दी गयी राजकीय सलामी और मुक्तिबोध के स्मारक के निर्माण का उद्देश्य इन कालजयी व्यक्तित्वों का सम्मान और अभिनन्दन करना होता है या फिर ऐसी विरूप प्रतीकात्मकता के जरिये अमानुषिक, सांप्रदायिक, तानाशाह सत्ताएं अपनी तथाकथित उदारता और लोकतांत्रिकता को स्थापित करना चाहती हैं ताकि उनके पिछले दुष्कृत्यों पर पर्दा पड़ सके।

अब तक मिली खबरें बताती हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सतनामी पंथ के मुखिया महंथ बालदास द्वारा धमकी दिये जाने के बाद हबीब तनवीर के नाटक ‘चरनदास चोर’ की पाठ चर्चा पर प्रतिबंध लगाया था क्योंकि नाटक से पहले हबीब साहब की लिखी हुई एक बेहद रोचक भूमिका में हस्बे-मामूल यह उल्लेख किया गया है कि सतनामी पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास पहले एक डाकू थे। समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास की ‘संस्कृतकरण’ व्याख्या को छोड़ दें तो इस जनश्रुति के सच या झूठ होने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ‘चरनदास’ नाटक का मूल संदेश तो उसके एक गीत में ही निहित है: ‘सुनो सुनो संगवारी, भाई मोर चरनदास चोर नहीं है।’ कुछ लोगों द्वारा यह कहकर भी इस घटना को मामूली बताने की कोशिश की गयी कि ‘चरनदास चोर’ के मंचन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा है। लेकिन जब इस नाटक का कोई प्रदर्शन हुआ ही नहीं तो प्रतिबंध लगाने या न लगाने की बात अप्रसांगिक है हालांकि यह कल्पना की जा सकती है कि एक सरसरे उल्लेख के आधार पर अगर किताब पढ़ाये जाने पर रोक लग सकती है तो नाटक का मंचन हुआ होता तो उस पर जरूर कोई उपद्रव होता, पूरा प्रतिबंध लगता और मध्यप्रदेश की ही तरह, ‘चरनदास चोर’ सांप्रदायिक तत्वों का शिकार बन चुका होता। गनीमत है कि ऐसा नहीं हुआ।

अपनी टिप्पणी में उदय प्रकाश जगह-जगह निम्नवर्गीय-सबऑल्टर्न-विमर्श के जरिये महावृत्तान्तों को प्रश्नांकित किये जाने की वास्तविकता को उभारते हैं, लेकिन इस बात को अनदेखा कर देते हैं कि महंथ बालदास भी एक सत्ता संरचना के शीर्ष पर हैं और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वे सतनामी पंथ के सभी सदस्यों के प्रतिनिधि हैं या उनकी चेतना और उनका विवेक हैं। ठीक उसी तरह जैसे गोरखपुर स्थित गुरु गोरखनाथ की पीठ के आधुनिक दौर के मुखिया महंथ दिग्विजय नाथ और आदित्य नाथ को इस पीठ का सच्चा उत्तराधिकारी मानना कठिन है क्योंकि वे एक समय के मूलगामी प्रेम और ध्यानमग्नता के दर्शन को सांप्रदायिक विद्वेष, घृणा और आक्रामकता के अभियान में बदलकर एक गहरे रसातल में ले जा चुके हैं। ये हमारे समय की क्रूर-निर्मम विपर्यय हैं जिनमें अतीत के क्रान्तिकारी अभियान आज के पतित मठ बन जाते हैं, जातिवाद का विरोध खुद अपने को जातियों में विभाजित कर लेता है, उत्पीड़ित दलित चेतना एक बहुसंख्यक और उत्पीड़क सवर्ण विमर्श से हाथ मिला लेती है, मुंबई की मैली चालों से उभर कर अपने समय की मराठी कविता को बदल देने वाला कवि नामदेव ढसाल समूची दलित चेतना को धता बताता हुआ शिवसेना के माफिया की शरण में चला जाता है, कोई स्वघोषित क्रान्तिकारी रचनाकार किसी सांप्रदायिक नेता से कोई भी पुरस्कार ग्रहण कर लेता है, कोई स्वघोषित क्रांतिकारी रचनाकार किसी साम्प्रदायिक नेता के कर-कमलों से किसी व्यापारी संघ द्वारा स्थापित कोई पुरस्कार ग्रहण कर लेता है, मध्य प्रदेश में भाजपा-शासित भारत भवन का बहिष्कार करने वाले प्रगतिशील साहित्यिक नेतागण दूसरे भाजपा-शासित राज्य और सलवा जुडुम जैसे कुख्यात संगठनों के जनक छत्तीसगढ़ की पुलिस के मुखिया द्वारा आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में जाने से कोई परहेज नही करते और अंत में हम देखते हैं कि सारे विचार एक ही थाली में आराम से खाना खा रहे हैं। उदय प्रकाश द्वारा गोरखपीठ के संचालक आदित्य नाथ के हाथों पुरस्कार लेने का प्रकरणी भी इसी विमर्श का एक हिस्सा है हालांकि उसकी आलोचना को किसी सत्ताधारी गिरोह की निजी कुंठा की तरह देखा गया।

दमनकारी सत्ताओं की ‘भर्त्सना’, ‘निंदा’ और ‘विरोध प्रस्ताव’ जैसी कार्रवाइयों को उदय प्रकाश ने ‘सुविधावादी और सरलीकृत राजनीतिक समझ और रणनीति’ करार दिया है और कहा है कि ‘ये बासी और खोखले तरीके अब गैर-ईमानदार और चतुर लोगों के हाथ के झुनझुने’ बन चुके हैं। इस सन्दर्भ में पहली बात यह है कि प्रतिरोध की संस्कृति कुछ चालाक लोगों के हाथों में आकर अपना मूल्य नहीं खो देती, गो कि तात्कालिक रूप से ऐसा लग सकता है। यहां हम देश के सबसे बड़े आधुनिक चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन की जानी-पहचानी त्रासदी को देख सकते हैं। वे कई साल से स्व-निर्वासन में हैं और कुछ संगठन समय-समय पर उनकी देश-वापसी और इसके लिए एक अनुकूल वातावरण की मांग सरकार से करते हैं। सरकार हमेशा यह तर्क देती है कि हुसेन जब चाहें भारत आ सकते हैं, उनके लिए दरवाजे खुले हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हुसेन भारत आ नहीं सकते और शायद अब आना भी नहीं चाहते होंगे, क्योंकि उन पर भाजपा के सहस्रमुख वैध-अवैध संगठनों की ओर से एक सौ से अधिक मुकदमे दायर किये गये हैं और वे जब कभी भारत आयेंगे, किसी न किसी धारा के तहत गिरफ्तार कर लिये जायेंगे। अब हुसेन की देश-वापसी की मांग लगभग एक अनुष्ठान में बदलने जा रही है और हमारे समकालीन कलाकार अपनी कला को बेचने में इस कदर डूब चुके हैं कि उन्हें हुसेन का खयाल भी नहीं आता। संभव है कि कुछ लोग इस मांग को झुनझुने की तरह ‘जब चाहतें हैं तब बजा देते’ हों, लेकिन इससे क्या यह पूरी मांग और यह आवाज महज एक झुनझुना बन जाती है? उदय ने तसलीमा नसरीन के प्रकरण का भी उल्लेख किया है जिसकी राजनीतिक पेचीदगियों में गए बिना भी रेखांकित करना ज़रूरी है कि बांगलादेश के कट्टरपंथी मुल्लाओं के विरोध के बाद पश्चिम बंगाल की सरकार ने ही उन्हें पनाह दी थी.

उदय प्रकाश जिन सरलीकरणों की आलोचना करते दिखते हैं, खुद भी उनके शिकार लगते हैं। वे उत्तर-आधुनिक फैशन में महावृत्तांतों और मोनोलिथ वैचारिकताओं को सरलीकृत और उनके टूटने से पैदा हुई अस्मिताओं को जटिल संरचना मानते हैं। महावृत्तांतों को वे एक गहरे संशय से देखते हैं, लेकिन लघुविविमर्शों के लिए कोई आलोचनात्मक कसौटी नहीं अपनाते। इस तरह देखने पर उत्तर भारतीय दलित राजनीति में कांसीराम और मायावती को तमाम संदेहों से परे दलित नेतृत्व का अंतिम विकल्प मान लिया जायेगा। और यह कहना भी चतुराई या भोलापन या फिर दोनों हैं कि चरनदास चोर, हबीब तनवीर और टाटा की छोटी कार नैनो का एक भूगोल से दूसरे भूगोल में स्थानांतरित हो जाना महज एक स्थानिक-सांख्यिकीय परिघटना है जिसके राजनीतिक निहितार्थ नहीं हैं। उदय प्रकाश अपने को ‘प्रचलित राजनीतिक भाषा और उसकी चालू प्रतिक्रयाओं‘ से थोडा सा अलग हटकर सोचने और बोलने’ वाला व्यक्ति मानते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उनकी सारी शब्दावली उस प्रचलित राजनीति की ही है, जिसमें ‘दबी-कुचली जातियों’ और ‘अनगिनत पंथों’ के ‘स्वाभिमान’ और ‘अधिकारों’ और सत्ताओं में उनके हिस्से को बिना किसी आलोचनात्मक पड़ताल के बारबार रेखांकित किया जाता है। जिस महावृत्तांत के खोखलेपन की तरफ वे इशारा करते हैं वह दरअसल मार्क्सवाद है, लेकिन इससे कौन इनकार करेगा कि आज यह वैचारिक दर्शन एक सत्ता के रूप में ध्वस्त और बहिष्कृत है – महज एक लाल कपड़ा, जिसे देखते ही दुनिया के संपन्न शासक वर्ग, बहुराष्ट्रीय निगम, देसी पूंजीपति, खाता-पीता मध्यवर्ग, बाजार, मीडिया सब मुहावरे की बैल की तरह भड़क उठते हैं? साथी, यह विचार तो सबसे किनारे के हाशिये पर है, इसके पास कौन सी सत्ता है?

हमारे समाज में अगर यह बाजार का युग है तो साहित्य में इसे अंधकार का ही युग कहा जाना चाहिए। खासकर हिंदी समाज में अब न कोई बड़ा विचार रह गया है न कोई बड़ा स्वप्न और न कोई बड़ी रचना जो इन दोनों के मेल से उपजती है। इस अंधेरे में कभी कोई महाश्वेता देवी, कोई अरुंधति रॉय, कोई वरवर राव दिख जाते हैं जो प्रतिरोध के विचार को अपनी नैतिकता की तरह मानते हैं और हमें चेतावनियां देते रहते हैं जिन्हें हम उतनी ही तत्परता से अनसुना कर देते हैं। कई वर्ष पहले रघुवीर सहाय ने लगभग भविष्य-कथन करती हुई अपनी कई कविताओं में से एक कविता में लिखा था :

मुझे मालूम था मगर इस तरह नहीं कि जो
खतरे मैंने देखे थे वे जब सच होंगे
तो किस तरह उनकी चेतावनी देने की भाषा
बेकार हो चुकी होगी।


उदय प्रकाश ने पूछा है कि ‘विरोध और भर्त्सना के अलावा हम और क्या कर सकते हैं।’ इसका जवाब यही हो सकता है कि हम विरोध और भर्त्सना का मूल कर्तव्य न छोड़ें। खासकर तीसरी दुनिया के लिए एडवर्ड सईद की यह सलाह शायद हमेशा याद रखने लायक है कि बुद्धिजीवियों को प्रतिपक्ष की ही भूमिका निभानी होगी। उदय प्रकाश की इस आशंका का जवाब कि अगर उनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर कोई फिल्म बनी तो उसके साथ भी ‘परजानिया’ या गौहर रजा की फिल्मों जैसा सलूक हो सकता है, इसी प्रतिश्रुति में निहित है। दुर्भाग्य से, अगर ऐसा हुआ तो इसका विरोध करने वालों की अब भी कमी नहीं होगी।

(जनसत्ता से साभार)

Sunday, August 30, 2009

साहित्य, सत्ता और सम्मान : प्रणय कृष्ण



जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों ने शिरकत की। वहीं कुछ ही दिनों पहले हिंदी के अप्रतिम कथाकार उदय प्रकाश उन भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ से सम्मानित हो आए जिनका नाम और संगठन यानी हिंदू युवा वाहिनी गोरखपुर से बहराइच तक के क्षेत्र को अल्पसंख्यकों के लिए दूसरा गुजरात बना देने का सपना पाले हुए है।

छत्तीसगढ़ में प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसका उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। कई साहित्यकारों को इस आयोजन के स्वरूप की जानकारी ही नहीं थी। वे तो स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को सम्मान देने आए थे। लेकिन वहां उन्होंने पाया कि प्रमोद वर्मा की स्मृति का शासकीय अपहरण किया जा चुका है। मुख्यमंत्री बुलाए गए हैं जो विचारधारा से मुक्त होकर लिखने का उपदेश दे रहे हैं, मार्क्सवाद को अप्रासंगिक बता रहे हैं और लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं। कई लोगों का नाम कार्ड मे बगैर उनकी स्वीकृति के छापा गया। कार्ड पर मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि के पहुंचने की कोई सूचना नहीं छापी गयी। आखिर क्यों? कई लोग स्वीकृति देने के बाद भी नहीं आए, तो शायद इसलिए कि उन्हें इसका अनुमान हो गया होगा। आश्चर्य है कि श्री आशोक वाजपेई ने अपने कालम 'कभी कभार' में ऎसे लोगों को यह तोहमत दी है कि वे राज्यहिंसा के विरोध में नहीं आए, जबकि माऒवादी हिंसा इन की निगाह में 'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' की तर्ज़ पर आलोचना के काबिल नहीं है। श्री वाजपेई को बताना चाहिए था कि स्वीकृति देकर न आनेवालों में कौन से ऎसे लोग थे, जिन्होंने माओवादी हिंसा को उचित ठहराया हो। क्या उनमे से कोई माओवादी मंचों पर गया? यदि नहीं, तो राजसत्ता के साथ मंच का साझा करने का दबाव उनपर अशोकजी क्यों डालना चाहते हैं?

दरअसल छ्त्तीसगढ़ वह राज्य है जहां हर जनांदोलन या व्यक्तियों का भॊ माओवादी बताकर 'छत्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिटी ऎक्ट' जैसे काले कानूनों के ज़रिए दमन किया जाता रहा है। एक फ़र्ज़ी एनकाउन्टर में कुछ आदिवासी जब माओवादी बताकर मारे गए, तो पी. यू. सी. एल. के राज्य सचिव और मानवतावादी चिकित्सक बिनायकसेन ने कहा कि मारे गए लोग सामान्य आदिवासी थे और उनका माओवाद से कोई संबंध नहीं था। इसके बाद ही उन्हें माओवादी बताकर दो साल जेल में डाला गया, फ़र्ज़ी गवाह और साक्ष्य जुटाए गए, हालांकि हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने उन्हें ज़मानत दे दी। यह छत्तीसगढ़ राज्य ही है जहां के खनिजों, जल, जंगल और ज़मीन की कार्पोरेट लूट के लिए सरकार ने खुली सुविधा मुहैया कराई हुई है और जब आदिवासी अपनी ज़मीन और आजीविका को बचाने का संघर्ष चलाते हैं, तो माओवाद के नाम पर उनका दमन किया जाता है। राज्यप्रायोजित सलवा जुडुम जैसी सेनाएं आदिवासियों को जंगल और ज़मीन से खदेड़कर कारपोरेट अधिग्रहण और दोहन का रास्ता साफ़ कर रही हैं। हिमांशु जैसे गांधीवादी का दंतेवाड़ा में आश्रम पुलिस ने ढहा दिया क्योंकि ७९% आदिवासी जनसंख्या वाले इस इलाके में वे आदिवासियों का कथित रूप से पुनर्वास कर रहे थे। अजय टी.जी. एक फ़िल्मकार हैं और उन्हें भी माओवादी बताकर सताया गया। छ्त्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले ही तमाम जनतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटने में यह युक्ति काम में लाई जाती रही है। वर्षों पहले भारत के एस सी/एस टी कमिश्नर रहे गांधीवादी समाजसेवी डा. बी.डी. शर्मा को भाजपा के ही शासनकाल में बस्तर में नंगा घुमाया गया। महान ट्रेड यूनियन नेता और समाजसेवी शंकर गुहा नियोगी की एक कारपोरेट समूह ने हत्या करा दी। इस तरह हर लोकतांत्रिक आंदोलन का गला घोंटकर वहां की सत्ता ने खुद ही माओवाद का रास्ता प्रशस्त किया। ऎसी राजसत्ता के पुलिस मुखिया के आमंत्रण पर क्यों कोई साहित्यकार मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री और राज्यपाल का उपदेश सुनने जाए? फ़िर छतीसगढ़ राज्य की साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त सांस्कृतिक संस्थाएं भी तो प्रायोजन कर सकती थीं, पुलिस के मुखिया से ही कराने की क्या मजबूरी थी? क्यों अशोक वाजपेई को इसमे राजनीति नही दिखती?

दर असल यह पूरा आयोजन ही इसलिए किया गया कि बिनायक सेन और सलवा जुडुम के मसले पर विश्वस्तर पर निंदित सरकार यह दिखला सके कि उसके साथ तमाम प्रगतिशील, जनवादी लोग भी खड़े हैं। यह सत्ता द्वारा साहित्यकारों का घृणित उपयोग है। पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन राजसता का साहित्यिक चेहरा हैं। अपने कवि होने और महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के वंशज होने का खूब उपयोग वे छ्त्तीसगढ़ की जनविरोधी सरकार के कारनामों को वैधता प्रदान कराने में कर रहे है। अशोक वाजपेई शायद चाहते हैं कि भले ही राजसत्ता साहित्यकारों का शातिराना उपयोग करे, लेकिन साहित्यकार को गऊ होना चाहिए, सत्ता को छूट है कि साहित्य के नाम पर उन्हें कहीं भी हंका कर ले जाए। छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक की निगाह में शंकर गुहा नियोगी नक्सली/माओवादी थे, जबकि सलवा जुडुम जनांदोलन है।

हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुओं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०,००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है।

उदय जी द्वारा योगी आदित्यनाथ से सम्मानित होने के प्रकरण में उनके पक्ष में कई दलीलें आईं हैं। पहली तो यह कि उदय जी का मूल्यांकन उनके साहित्य से होगा, न कि जीवन से, मानो ये दोनों पूरब पश्चिम की तरह कहीं मिलते ही न हों। यह युक्ति नई समीक्षा के दौर में लाई गई। ईलियट ने कहा कि आलोचना के लिए लेखक का जीवन वृत्तांत अप्रासंगिक है। लेकिन इसके चलते एज़रा पाउंड जैसे आधुनिकतावादी या पाल डी मान जैसे उत्तर आधुनिकों द्वारा फ़ासिस्टों के समर्थन की आलोचना से न तो आधुनिकतावादियों ने गुरेज़ किया और न ही उत्तर-आधुनिकों ने। लेकिन हिंदी में मार्क्सवदियों से यह मांग हो रही है वे जीवन और विचार में किसी साहित्यकार के विचलन पर इसलिए खामोश रहें क्योंकि वह साहित्य में प्रगतिशील मूल्यों का सर्जक है। मज़े की बात है ऐसी मांग करनेवाले कथित प्रगतिशील ही हैं जिन्हें कलावाद की पचास साल पुरानी उतारन पहनने में आज शर्म की जगह गर्व की अनुभूति हो रही है।

१९९० के बाद से सोवियत संघ के ढहने, भूमंडलीकरण की आंधी, समाजवाद के संकट, उत्तर-आधुनिकतावाद की सैद्धांतिकी और भारत में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताकतों के उभार ने बहुत से प्रगतिशील और जनवादियों को विचलित किया। उदय प्रकाश इस मामले में ज़रूर ईमानदार कहे जाएंगे कि जहां बाकी लोग इस विचलन को खुलकर स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जूटा पाए और जनवादी, प्रगतिशील मूल्यों वाले सांस्कृतिक संगठनों में बने रहते हुए भी साहित्य को विचारधारा और प्रतिबद्धता से मुक्त रहने, साहित्य की वर्गदृष्टि को खारिज करने और राज्याश्रय को उचित बताने में लगे रहे और नवोदित साहित्यकारों को गलत राह सिखाते रहे, वहीं उदय जी ने खुलेआम मार्क्सवाद से अपने मोहभंग को घोषित किया, उत्तर-आधुनिकता से प्रभाव ग्रहण को स्वीकार किया और हर तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता से इनकार किया, शायद संगठनों से भी किनाराकशी की। ऐसा नहीं कि उदय जी की इस दौर की कहानियों पर उनके वैचारिक बदलाव का असर नहीं है, भले ही इस दौर में भी उन्होंने अनेक उत्कृष्ट काहानियां लिखीं। इस दौर में उदय जी का व्यक्तिवाद और अराजकता की प्रवृत्ति ज़्यादा उभरकर आई जो पहले भी उनकी व्यक्तियों को निशाना बनाकार परपीड़न में लुत्फ़ लेनेवाली कहानियों में दिखती है, उनके यथार्थबोध को क्षतिग्रस्त करती हुई। लेकिन तब भी उनकी बेहतरीन कहानियां बहुत दूर तक इस दोष से मुक्त रहीं। आलोचना को जूते की नोंक पर रखते हैं। इसीलिए उनके क्षमा-प्रस्ताव में भी धमकी की गूंज है. कभी अपनी आलोचना को ब्राह्मणवादी षड़यंत्र बताते हैं, कभी पहाड़ी लाबी की करतूत. दरअसल, उदय जी को क्षमा किसी और से नहीं, अपने भीतर के कथाकार से मांगनी चाहिए.

उपनिवेशवाद से लड़कर जो भी देश आजाद हुए, उनकी भाषाओं और साहित्य में प्रतिरोध की मूल्य चेतना इतिहासत: विकसित हुई। इसलिए जब भी कोई जनद्रोही सरकार,कारपोरेट घराना, संस्थान या फिर व्यक्ति साहित्यकारों को सम्मानित या पुरस्कृत करता है, तो ऐसे साहित्य में स्वाभाविक रूप से विरोध के स्वर उठते हैं। यह इन भाषाओं और साहित्य का संस्कार है। इतिहास से प्राप्त मूल्य चेतना है। कई बार ऐसे विरोधों को ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित बताकर, किन्हीं राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का षडयंत्र बताकर हल्का बनाने की कोशिश की जाती है। दुर्भाग्य से उदय जी शायद अब इस समझ पर पहुंच चुके हैं कि उनके जैसे विश्वस्तरीय कथाकार के योग्य हिंदी भाषा और समाज नहीं है। वे गुस्से में दोनों को खारिज करते हैं। मनमाना करते हैं।

हिंदी में लम्बे समय से कुछ लोग यह कह रहे हैं कि साहित्यकार को अपनी स्वायत्तता की रक्षा के लिए विचारधारा और संगठन से मुक्त रहना चाहिए, लेकिन ऐसे लोग कभी भी यह नहीं कहते कि लेखकों को दमनकारी राजसत्ताओं और बहुराष्ट्रीय पूंजी के घरानों से मुक्त रहना चाहिए। उनकी निगाह में इनसे उनकी स्वायत्तता खंडित नहीं होती। अच्छा तो यही होता कि साहित्य संस्कृति के लिए जनता के पैसे का उपयोग सरकारें करना ही चाहती हैं तो वे ऐसी संस्थाओं को वह धन सौंप दें, जो पूर्णत: स्वायत्त और पारदर्शी हों, फिर साहित्य संवर्धन के लिए पुरस्कार ही एकमात्र उपाय तो है नहीं। लेकिन इन संस्थाओं की स्वायत्तता की एकमात्र गारंटी है कि साहित्यकारों की अपनी संस्थाएं स्वतंत्र रूप से मजबूत हों, सांस्कृतिक आंदोलन मजबूत हो, ताकि इन संस्थाओं पर लोकतांत्रिक, स्वायत्त और पारदर्शी होने का दबाव बनाया जा सके।

(समयांतर से साभार)

Wednesday, August 19, 2009

प्रभाष जोशी! शर्म तुमको मगर नहीं आती




बड़ा हल्ला रहता आया है कि प्रभाष जोशी पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष हैं. उनके शीर्ष पुरुषवादी विचार हमेशा ही सामने आते रहे हैं, यह बात अलग है कि हमारे बहुत से `सेक्युलर`, `प्रगतिशील` व `उदारवादी` इस तरफ से आँखें मूंदे भक्ति-भाव से उनकी और उन जैसे कई रंगे सियारों की बंदगी किये जाते हैं. इस दौर में जबकि दुनिया भर में प्रगतिशील ताकतों का दबाव कम हुआ है और भेड़ की खाल में छुपे भेड़िए अपनी असली शक्ल में आकर हुआं-हुआं करने लगे हैं तो प्रभाष जोशी जैसे शीर्ष पुरुष भी अपने फलसफे के साथ खुलकर सामने आ रहे हैं. हालाँकि सती प्रथा हो या ऐसे दूसरे मामले, वे पहले भी यही सब करते रहे हैं. फिलहाल वे मनु महाराज से भी आगे निकलकर ब्राह्मण श्रेष्ठता साबित करने के लिए जहरीली ज़िद पर उतर आए हैं. उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ प्रेम भी देखते ही बनता है जब वे संघ पर पूर्व में लगी पाबंदियों पर गुस्सा दिखलाते हैं. पेश हैं उनके raviwar.com को दिए गए साक्षात्कार से कुछ अंश-


`...सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.


अपने समाज में अलग-अलग कौशल के अलग-अलग लोग हैं. अपन ने ये माना कि राजकाज में राजपूत अच्छा राज चलाते है. क्यों माना हमने ? एक तो वो परंपरा से राज चलाते आ रहे है, दूसरा चीजों के लिए समझौते करना, सब को खुश रखना, इसकी जो समझदारी है, कौशल जो होती है, वो आपको राज चलाते-चलाते आती है. आप अगर अपने परिवार के मुखिया है तो आप जानते हैं कि आपके परिवार के लोगों को किस तरह से हैंडल किया जाये.


ब्राह्मणों का वर्चस्व
मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है. अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है. जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला. अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा. ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूं. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है. इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है. क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण.


--देखिए, दो लोग थे जिन्होंने कहा कि हम आजाद नहीं हुए। एक तो कम्युनिस्टों ने कहा कि हम आजाद नहीं हुए दूसरा हिंदुत्ववादियों ने कहा था। हिंदुत्ववादी ने भी इस आंदोलन में भाग नहीं लिया और कम्युनिस्टो ने भी. कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ अंग्रेजों की मुखबिरी की थी। क्योंकि उस वक्त उनको लगता था कि रूस दुनिया में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है तो उसकी मदद करो. तो जिधर रूस है, वो उधर चले गए. हिंदुत्ववादियों को लगता था कि अगर पाकिस्तान को यह देश सौंप कर जाएंगे, टुकड़ा करके तो बाकि टुकड़ा हम हिंदुओं को मिलना चाहिए.


--जब नक्सलियों पर प्रतिबंध लगा तो कुछ पार्टियों ने कहा कि प्रतिबंध लगाना गलत है, क्योंकि हम उनसे राजनीतिक रूप से निपट सकते हैं, ये कहा गया. मैंने तब लिखा कि भाई आप नक्सलाईट से तो राजनीतिक रूप से निपट सकते हैं और इसलिए आप कहते हैं कि उन पर पाबंदी मत लगाओ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर इस देश में तीन बार पाबंदी लगी, सन 1948 में, सन 1975 में और 1992 में बाबरी मस्जिद के बाद. तब तो किसी लोकतांत्रिक उदारवादी ने उठकर नहीं कहा कि भाई आरएसएस पर पांबदी क्यों लगाते हो. हिंदुत्व से हम विचार से निपटेंगे. हम राजनीतिक रूप से निपटेंगे हिंदुत्व वालों से. नक्सलाईट के बारे में आप कहते हैं क्योंकि नक्सलाईट से आपको सहानुभूति है. अगर इस देश को अपने हिंदुत्ववादियों से सहानुभूति नहीं होगी तो उनको वो वापस मोड़ कर नहीं ला सकते. इसलिए संवाद सबसे जारी रखना चाहिए. वह चाहे नक्सलवादी हो या फिर हिंदुत्ववादी हो क्योंकि इसके अलावा लोकतंत्र में कोई तरीका ही नहीं है.


सती हमारी परंपरा
• मुझको आपका एक बहुचर्चित लेख याद आता है सती प्रथा वाला... मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया. सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां ? सीता. सीता आदमी के लिए मरी नहीं. दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती. वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए. उसके लिए. सावित्री. सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है. सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया. सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं. अब वो अगर पतित होकर... बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे. जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते. अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं. `


http://www.raviwar.com/ से साभार लिए गए अंश