Wednesday, July 29, 2009

जेएनयू में नामवर - हैप्पी बर्थडे लीलाधर














निमंत्रण
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जे एन यू के हमारे गुरु और भारतीय साहित्य के गौरव पुरुष
डाक्टर नामवर सिंह
के जन्म दिन पर
आइए उनके साथ रात का भोजन करें.
हमारे निवास १५ लोधी स्टेट, नई दिल्ली-३ में
२९ जुलाई २००९ को शाम ७ बजे से आपके आने तक.

आपके
पुतुल सिंह
दिग्विजय सिंह
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नामवर सिंह ८३ के हो चुके हो चुके हैं। ८० के होने के बाद उनकी उपाधियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। `आलोचना का शीर्ष पुरुष` पहले `हिन्दी साहित्य का शीर्ष पुरुष` हुआ और अब `भारतीय साहित्य का गौरव पुरुष` हुआ। नया तमगा उन्हें पुतुल सिंह और दिग्विजय सिंह ने उनके सम्मान में दिए जा रहे रात्रिभोज के निमंत्रण पत्र में दिया है। जल्द वे `विश्व साहित्य के शीर्ष या गौरव पुरुष` कहलावें, ऐसी अपनी शुभकामना है। हैप्पी बर्थडे।
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दावत के मेजबान दिग्विजय सिंह वही ठाकुर साहेब हैं जो एक्स पी एम चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में शामिल थे। बाद में वे बीजेपी की सरपरस्ती में बनी सरकार में भी मंत्री रहे। कृपया तिल का ताड़ न बना दीजियेगा। ये किसी का भी निजी मसला है कि कोई किस सरकार में मंत्री बने और कोई किसे अपनी दावत का प्रायोजक बनाये। अपने प्रगतिशील लेखक संघ के `शीर्ष पुरुष` के फंडे तो यूँ भी साफ हैं और अब उन्होंने उदय प्रकाश सिंह के योगी आदित्यनाथ के हाथों `सम्मानित` होने के मसले में भी इसका सबूत इस तरह दिया है - `किसी लेखक का मूल्यांकन उसकी साहित्यिक कृतियों से ही होगा। तिल का ताड़ बनाना अच्छा नहीं।`
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नामवर सिंह के फंडे हमेशा ही साफ़ रहे हैं। शायद ही कभी किसी घड़ी में कोई फ़ैसला लेते उन्हें किसी तरह की झिझक रही हो। जाने कितने आपातकाल और कितने विध्वंस इस शीर्ष पुरुष ने आखिर यूँ ही खुशी-खुशी नहीं गुजर जाने दिए। २८ जुलाई को उनका हैप्पी बर्थडे दिल्ली में ही त्रिवेणी सभागार में मान्य गया, वहां उन्होंने कम से कम दो साल और जीने का संकल्प लिया और जनता ने उनसे कम से कम सौ साल जीने की गुजारिश की। इस मुश्किल वक्त में वे हर जटिल मसले पर हमेशा की तरह निश्चिंत रहें, द्वंद्व और बेचैनी को पास न फटकने दें तो निश्चय ही उनके सानिध्य से इस कलि काल में जनता को प्रेरणा मिलती रहेगी।
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त्रिवेणी सभागार में वक्ताओं को बोलने के लिए शीर्षक दिया गया था - `जेएनयू में नामवर सिंह`। मगर रामाधिकार कुमार यानी आर कुमार यानी जेएनयू के रेक्टर यानी नेक्स्ट टू वी सी कुछ ऐसे भावुक हुए कि नामवर सिंह को भूलकर जेएनयू के छात्रों और छात्र आन्दोलन पर बरसते रहे। अपने नॉन स्टॉप लंबे भाषण में वे आरक्षण की बखिया भी उधेड़ते चले। जेएनयू की जुझारू छात्र राजनीति का हिस्सा रहे कई भूतपूर्व छात्र इस प्रवचन के दौरान असमंजस में रहे (शर्मसार होते रहे? )। लीलाधर हमेशा की तरह निश्चिंत मंद-मंद मुस्कारते रहे । अलबत्ता जेएनयू के एक छात्र से न रहा गया और उसने झूठ बोल रहे रेक्टर को ललकारा. लीलाधर फिर भी मुस्कराते रहे, मानो कह रहे हों, `कैसी नादानी कर बैठे वत्स? मैंने भी छात्रों के साथ यही सुलूक किया था। विरोध करने वाले प्रतिभाशाली छात्रों का क्या हश्र हुआ और मलाई छात्रों की किस भक्त जमात को मिली, यह तो पहचानते वत्स`.
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रामाधिकार कुमार भले ही नामवर पर कम बोले पर जो कुछ वाक्य उन्होंने इस बारे में उच्चारित किए, काफी से ज्यादा ही थे। उन्होंने भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना से लेकर जेएनयू में जाने क्या-क्या रच देने का श्रेय नामवर के श्री चरणों में अर्पित किया। यह बात अलग कि भारतीय भाषा केन्द्र की स्थापना के पीछे सक्रिय रहे उस समय के छात्रों में से एक इस अर्पण पर गुस्से में जलते-भुनते रहे। नामवर बोलने उठे तो उन्होंने नीलकंठ की तरह झूठ के गरल को भी खुशी-खुशी यह कहकर स्वीकार किया कि मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
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गुरुजी के शिष्यों ने अलबत्ता दक्षिणा देने में कंजूसी की। उन्होंने गुरुजी की ढेरों बड़ी उपलाब्धियों का जिक्र ही नहीं किया। किसी ने नहीं कहा कि नामवर जी राजस्थान से जेएनयू में सावित्री चंद्रा (जिनकी एकमात्र योग्यता थी यू जी सी के तात्कालीन चेयरमैन सतीश चंद्रा की पत्नी होना ) को रीडर नियुक्त करने के लिए बुलाये गए थे। बाद में नामवर जी जेएनयू के हो ही जाने थे। बताते हैं कि इन्हीं सावित्री चंद्रा ने अपने साहित्य शोध में किसी मिठाई बनाने की विधि भी लिखी थी.
किसी ने नामवर जी की गुरुभक्ति का भी जिक्र नही किया कि कैसे उन्होंने बनारस में अपने गुरुजी का मकान बनाने वाले चिंतामणि को जेएनयू में अध्यापक बनाकर गुरु दक्षिणा दी थी।
किसी ने यह भी नहीं बताया कि इन दो अध्यापकों की अयोग्यता से परेशान हिंदी के छात्रों ने उनकी क्लास का बहिष्कार किये रखा था। बाद में आपातकाल ने नामवर जी को ताकत दी तो इन `दुस्साहसी छात्रों` को `ठीक` किया गया। यह जिक्र खासा प्रेरक हो सकता था.
लेकिन शिष्य आख़िर क्या-क्या बताते- हरि अनंत, हरि कथा अनंता।

चलिए एक मशहूर शेर का यह मिसरा याद करें -
"पहुँची वहीं पे ख़ाक जहाँ का ख़मीर था."

Wednesday, July 22, 2009

गंगूबाई हंगल, 1913–2009


गंगूबाई हंगल २१ जुलाई की सुबह, अपने जीवन के ९७वें वर्ष में, चल बसीं. हमारे वक़्त में वह किराना घराने का सबसे रौशन चिराग़ थीं. बस अब उनके गुरुभाई भीमसेन जोशी बचे हैं, तो लगता है वो भी पूना के अपने घर में सुबह के चिराग़ की तरह बुझने-बुझने को हैं.

सवाई गन्धर्व की इस किस्मतवाली शिष्या ने अब्दुल करीम खां, भास्करराव बाखले, अल्लादिया खां, फैयाज़ खां को चलते फिरते देखा और गाते हुए सुना था. बड़ी बहन जैसी स्नेहिल आँखों से भीमसेन को एक आला गायक के मक़ाम तक पहुँचते हुए देखा था. जीवन में कभी उन्होंने अपने गायन की शुद्धता और अलंकारहीन सादगी को नहीं छोड़ा. उन्होंने बचपन और जवानी के आरंभिक दौर में घोर ग़रीबी, सामाजिक अपमान और भूख का सामना किया. किसी कार्यक्रम में उस्ताद अब्दुल करीम खां ने उनका गाना सुना, उनका हुलिया अच्छी तरह देखा, फिर पास बुलाकर उनके सर पर हाथ फेरकर बोले: "बेटी, खूब खाना और खूब गाना!" बालिका गंगूबाई सिमटी हुई सोच रही थी : गाना तो घर में खूब है, पर खाना कहाँ है!

कहने को मन होता कि यह एक युग का अंत है. पर यह श्रद्धांजलियों वाला "युगांत" नहीं है, बल्कि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और रंगमंच के सुतूनों के थोक विध्वंस का दौर है. एक महीने के अन्दर हबीब तनवीर, अली अकबर ख़ाँ, डी के पट्टमाल, गंगूबाई हंगल जाते रहे, अभी के पाँच सालों में फ़ीरोज़ दस्तूर, बिस्मिल्लाह ख़ाँ, विलायत ख़ाँ, एम एस सुब्बुलक्ष्मी और इसी पाये की अनेक प्रतिभाएं नहीं रहीं. पता नहीं सन २००९ के ख़त्म होते-होते कितनी और हस्तियाँ रुख़सत हो जाएंगी. हिन्दुस्तान में शास्त्रीय संगीत और मंचीय कलाएं एक भयावह मीडियाक्रिटी, समझौतापरस्ती और बाज़ारूपन के दौर में दाखिल हो रही हैं और यह हमारा सौभाग्य है कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की उन्नत ध्वन्यांकन टेक्नोलाजी की बदौलत हमारे पास कम से कम उस दौर के लोगों के गायन और वादन की रिकार्डिंग उपलब्ध रहेंगी.

हम इस महान दलित गायिका पर जल्दी ही एक विस्तृत पोस्ट लगाने की कोशिश करेंगे.

(यह टिपण्णी श्री असद ज़ैदी ने मेल की थी. मैंने अपने किसी दोस्त को फ़ोन के जरिये ईमेल आईडी बताकर इसे पोस्ट कराया.चूंकि असद जी ने अपने नाम का ज़िक्र नहीं किया, इसलिए पोस्ट में यह जानकारी देर से दी जा पा रही है.)

Monday, July 20, 2009

उदय प्रकाश प्रकरण : भ्रष्ट आचरण को ट्रेंड बनाने की कोशिश

उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर उदय का निरंतर प्रलाप और उनके समर्थन में आई टिप्पणियों दोनों से जाहिर होता है। इतवारी जनसत्ता में भी उन्होंने एक ब्लॉगर से ऐसा ही कुछ लिखवाया है। इस ब्लॉगर का कहना है कि कई बड़े साहित्यकार अपने समय के तानाशाहों के कसीदे काढ़ चुके हैं, लेकिन उनके रचनाकर्म पर बात होती रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बहुत से लेखक हैं जिन्होंने भाजपा शासित राज्यों में साहित्यिक क्षेत्र के मुनाफे कमाये हैं। तो क्या कहने का मतलब है कि गू खाना पुरानी परम्परा है, सो हमने भी खा लिया और यही ट्रेंड के रूप में माना जाना चाहिए।
हैरत यह भी है कि जिस ब्लॉगर ने यह लेख लिखा है, वह पहले उदय प्रकाश की करतूत पर नाराजगी जता चुका है लेकिन फिर वो उदय प्रकाश के घर गया और उसे उनकी आंखों के कोर में अपने सही रास्ते का इलहाम हो गया। इस ब्लॉगर का कहने के मुताबिक यह मान लिया जाए कि उदय प्रकाश का विरोध करने वालों में कई बेदाग़ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस मुद्दे पर विरोध का अधिकार नहीं है। ऐसा है तो इस ब्लॉगर का निकट इतिहास ही बलात्कार के गंभीर आरोपों से बदनुमा है, फिर वो किस नैतिकता से यह फरमान जरी कर रहा है?
जनसत्ता के इस लेख में हिन्दी लेखकों को इस नाते असिह्ष्णु माना गया है कि उन्होंने उदयप्रकाश की चुप्पी को ग़लत ढंग से लिया और उनसे कुछ जानने की जरूरत नहीं समझी। अब इससे से बड़ा झूठ ही शायद कोई हो। उदय प्रकाश जब योगी के हुजूर से लौटे तो उनका ब्लॉग यह जानकारी नहीं दे रहा था। किसी भी तरह के करियरिज्म से दूर रहे बेमिसाल पत्रकार अनिल यादव (जो जनसत्ता के लेखक के मुताबिक नौजवान हैं और इस नाते लेखक दुधमुहाँ है ) ने इस बारे में गोरखपुर के अख़बारों में छपी ख़बर और फोटो को ब्लॉग पर छाप दिया था तो उदय प्रकाश हिंसा पर उतारू हो गए थे। पुरस्कार वो लाए थे और इस ख़बर को दूसरों की साजिश बता रहे थे, अनिल यादव को नौकरी से निकलवाने की धमकी दे रहे थे और इस घटना का विरोध करने वाले लेखकों को लांछित करा रहे थे। यह उनके परिवार के संघ की मजबूती के लिए उठा कदम था और योगी इस संघ की प्रेरणा शक्ति थे (हैं )। बाद में उनका सफाईनामा और उसके समर्थन में उनके द्वारा छापे जा रहे कमेन्ट भी गज़ब हैं। कई तो योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बना दे रहे हैं और लगभग सभी सेकुलरिज्म को गरियाते हुए उदय प्रकाश-आदित्यनाथ कंपनी को जायज ठहरा रहे हैं। उदय प्रकाश इन समर्थकों के शुक्रगुजार हैं।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि कभी अटल बिहारी और कभी सोनिया के कसीदे पढ़ चुके नट के हुनर से लोग जल रहे हैं. कमाल यह भी है कि इस भयानक मसले में असली मुद्दे को दरकिनार करने के लिए `कौन दूध का धुला है` और `विरोध करने वालों में कितने बिरहमन-कितने कायस्थ` आदि सवाल उठाने वालों में ऐसे लोग भी हैं जिनसे आदित्यनाथ जैसे मसले पर जिम्मेदारी की उम्मीद की जा सकती थी. कुछ लोग कह रहे हैं कि बात ठीक है पर व्यक्तिवादी बात न हो. तो क्या हिटलर को हिटलर कहना व्यक्तिवादी निंदा होगी?
कुछ लोगों को विरोध और गुस्से की भाषा पर एतराज है और वीरेन डंगवाल की टिप्पणी का खासकर ज़िक्र किया जा रहा है। नफरत और आतंकवाद के सरगना को लेकर कौन से शालीन भाव व् शब्द मन में उठते हैं, यह अशोक वाटिका और संघ परिवार के लोग ही बता सकते हैं। सवाल तो यह उठता है कि इस मसले पर संतुष्ट किस्म की चुप्पी साधे बैठे बहुत से बड़े लेखक जिनमें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव और दूसरे तमाम लेखक कब अपना रुख जाहिर करेंगे (`संतो कुछ तो कहो इस गाढ़े वक़्त में `)।
दरअसल यह मसला सांप्रदायिक ताकतों के उभार के बाद लेखकों के एक तबके में यह साफ़ हो जाने का है कि अब धर्मनिरपेक्षता से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। पहले लेखकों का हिन्दुवाद थोड़ा सफाई के साथ सामने आ रहा था, मगर अब उदय प्रकाश ने जरा आगे बढ़कर खुलेआम इस डेरे की शरण ले ली (हालाँकि निर्मल verma कुछ राह दिखा ही गए थे और कई दोयम पहले ही उस डेरे में बैठ भी चुके थे) । एक तरह से उन्होंने असमंजस में रहे लोगों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। वे साहित्य के जोर्ज फर्नाडीज कहे जा सकते हैं। देखना है कि अब उनके पीछे कितने लोग इस ट्रेंड का अनुसरण करते हैं।

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जनसत्ता शायद हर न्यायकारी आवाजों पर हमले करने का मंच बन गया है. पांचजन्य का `बौद्धिक` वहां छपता ही रहता है. सरकारी हत्यारे गिरोह सलवा जुडूम द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान आयोजित करने के नाटक और उसमें कई लेखकों के शामिल होने का कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने विरोध किया था। इस कदम का न्याय की पक्षधर शक्तियों ने स्वागत किया है पर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। यह पुराने अफसर का स्वाभाविक अफसर प्रेम भी है और उनका हमेशा परगतिशील जनपक्ष का विरोधी होने का भी.

--इस बीच ख़बर यह है की गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया है की उन्होंने उदयप्रकाश को समझाया था की वे उनसे ईनाम न लें क्योंकि इससे उनके वामपंथी साथी नाराज हो जायेंगे।

Friday, July 17, 2009

उदयप्रकाश का सफाईनामा और संसद में रोना आदित्यनाथ का

दोस्तों, उदय प्रकाश बड़े लेखक हैं. उनके पास शब्दों की जादूगरी है और दुनिया भर का साहित्य उन्होंने पढ़ा है. वे अपनी उपलब्धियों और बेबसी व यंत्रणाओं का अनंत किस्सा अपने ब्लॉग पर ही लगभग आत्मरति के अंदाज में पढ़ाते ही रहते हैं. वे महान भी हैं और कुंवर भी, अति लोकप्रिय भी हैं और हाशिये के बेहद उत्पीडित साधारण जन भी. ऐसा सब उनका ब्लॉग लगातार बोलता है. इन दिनों उन्हें बेहद दुःख है कि आखिर वर्चुअल सर्च के जरिये क्यों उनका आदित्यनाथ के हुजूर में सलाम का फोटो पेश कर दिया गया. फिर यह उनका पारिवारिक मसला था जिसके राजनीतिक अर्थ तलाश लिए गए. इस यंत्रणा के दौरे में उन्होंने अनिल यादव को इस गुस्ताखी के लिए धमकियाँ भी दे डालीं, और जिस-तिस को जातिवादी और भ्रष्ट भी करार दे डाला. उनके समर्थकों ने तमाम अफवाहें भी फैलायीं और इस कृत्य का विरोध कर रहे लेखकों पर भी सवाल खड़े किए - कि विरोध करने वाले क्या दूध के धुले हैं आदि, आदि. यानी हमने जो किया, सही किया. अब अचानक उनकी आत्मा में नई हलचल हुई है और उन्होंने अपने ब्लॉग पर गज़ब का स्पष्टीकरण दिया है. अंदाज़ वही पुराने हैं. चाहें तो संसद में योगी आदित्यनाथ को रोते हुए याद कर सकते हैं.

Wednesday, July 15, 2009

आदित्यनाथ-उदयप्रकाश एंड कंपनी उर्फ़ प्रतिरोध अभी मरा नहीं है

हिन्दी साहित्य जगत में इधर कई हलचलें मची हुई हैं. एक लम्बे अरसे के बाद कवि, लेखक और विचारकगण एकजुट होकर दक्षिणपंथी खेमे की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षा का मुँहतोड़ जवाब देते दिख रहे हैं. हाल ही गोरखपुर में हिन्दी कहानीकार और कवि उदय प्रकाश द्वारा बदनाम फाशिस्ट योगी आदित्यनाथ के हुज़ूर में उपस्थित होकर "नरेंद्रप्रताप सिंह स्मृति सम्मान" प्राप्त करने की निर्लज्ज करतूत से हिन्दी साहित्य जगत में सनसनी फैल गयी. वरिष्ठ और युवा लेखकों और बुद्धिजीवियों ने एक स्वर से इसकी निंदा की, और निम्नलिखित प्रस्ताव पास किया. प्रस्ताव पढ़कर और हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची देखकर ढाढस बंधता है कि अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है. आप भी पढ़ें. ('कबाड़खाना' से साभार)


विरोध-पत्र
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हमें इस घटना से गहरा आघात पहुँचा है कि कुछ दिन पहले हिन्दी के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय साहित्यकार उदय प्रकाश ने गोरखपुर में पहला "कुँवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान" योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिन्दुत्ववादी, सामन्ती और साम्प्रदायिक सांसद के हाथों से ग्रहण किया है, जो 'उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है' जैसे फ़ाशीवादी बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं . हम अपने लेखकों से एक ज़िम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं .


ज्ञानरंजन,
विद्यासागर नौटियाल,
विष्णु खरे,
मैनेजर पाण्डेय,
लीलाधर जगूड़ी,
भगवत रावत,
राजेन्द्र कुमार,
राजेन्द्र राव,
चंचल चौहान,
आनंदस्वरूप वर्मा,
पंकज बिष्ट,
इब्बार रब्बी,
नीलाभ,
वीरेन डंगवाल,
आलोक धन्वा,
मंगलेश डबराल,
त्रिनेत्र जोशी,
मनीषा पाण्डेय,
रविभूषण,
प्रदीप सक्सेना,
अजय सिंह,
जवरीमल्ल पारख,
वाचस्पति,
अतुल शर्मा,
विजय राय,
मनमोहन,
असद ज़ैदी,
मदन कश्यप,
रवीन्द्र त्रिपाठी,
नवीन जोशी,
अजेय कुमार,
वीरेन्द्र यादव,
देवीप्रसाद मिश्र,
कुमार अम्बुज,
कात्यायनी,
निर्मला गर्ग,
अनीता वर्मा,
योगेन्द्र आहूजा,
शुभा,
बोधिसत्व,
संजय खाती,
नवीन कुमार नैथानी,
कृष्णबिहारी,
विनोद श्रीवास्तव,
प्रणय कृष्ण,
राजेश सकलानी,
इरफ़ान,
मुनीश शर्मा,
विजय गौड़,
आशुतोष कुमार,
मनोज सिंह,
सुन्दर चन्द ठाकुर,
नीलेश रघुवंशी,
आर. चेतनक्रान्ति,
पंकज चतुर्वेदी,
शिरीष कुमार मौर्य,
रामाज्ञा शशिधर,
प्रियम अंकित,
अंशुल त्रिपाठी,
प्रेमशंकर,
अशोक कुमार पाण्डेय,
रविकांत,
मृत्युंजय,
धीरेश सैनी,
अनुराग वत्स,
व्योमेश शुक्ल.

आदित्यनाथ की करतूतों को सामने लाने के लिए सुभाष गाताडे ने महत्वपूर्ण काम किया है. उदयप्रकाश द्वारा आदित्यनाथ के हाथों `सम्मानित` होने की खबर सुनकर उन्हें भी गहरा दुःख हुआ और उन्होंने भी इस विरोध में अपना नाम शामिल कराया है.

Thursday, June 18, 2009

गोरा आदमी (अफ्रीकी कविता)

गोरे आदमी ने मेरे बाप को मार डाला
मेरा बाप अभिमानी था

गोरे आदमी ने मेरी माँ को धर दबोचा
मेरी माँ सुंदर थी

गोरे आदमी ने दिन दहाड़े मेरे भाई को जला डाला
मेरा भाई शक्तिशाली था

अश्वेत रक्त से लाल अपने हाथ लिए
गोरा आदमी फिर मेरी तरफ़ मुड़ा
और विजेता के स्वर में चिल्लाया
ब्वॉय! एक कुर्सी...एक नैपकिन...एक बोतल
(अज्ञात)

१९८० के आसपास जेएनयू से एक पत्रिका निकली थी `कथ्य'। बहुत सारे प्रतिभाशाली युवा साहित्यकार इससे जुड़े थे पर दुर्भाग्य से इसका एक ही अंक निकल पाया था। यह कविता उसी पत्रिका से ली है।

Monday, June 8, 2009

बेमिसाल हबीब


आज सुबह हबीब तनवीर नहीं रहे. अपने विशुद्ध थियेटर के काम की लिहाज़ से भी वे लिविंग लीजैंड थे पर उन्होंने सेक्युलर मूल्यों को बचाने के लिए जिस कदर संघ परिवार और उसकी साम्प्रदायिक बिरादरी से मोर्चा लिया, वैसे उदाहरण दुनिया भर में कम ही मिलते हैं. फिर अपने यहाँ तो साहित्यकारों-कलाकारों में संघ के फासीवाद तक को सांस्कृतिक शब्दावली से गौरवान्वित करने की लम्बी परम्परा है. जल्द ही हबीब साहब पर अलग से एक पोस्ट देने की कोशिश करूँगा, फ़िलहाल श्रद्धांजलि स्वरूप इसी ब्लॉग से ये पुरानी पोस्ट (5सितम्बर 2008) चस्पा कर रहा हूँ-


1सितंबर को महान रंगकर्मी हबीब तनवीर का जन्मदिन था। इस मौके पर वीपी हाउस, दिल्ली में सहमत ने हबीब के चाहने वालों और अदीबों से उनकी बातचीत का इंतजाम किया था। मैं इसके कुछ हिस्से को पोस्ट करना चाहता था कि इस बीच वेणुगोपाल नहीं रहे। इस नाते इस पोस्ट को स्थगित करना पड़ा। इस बीच इसका बड़ा हिस्सा मुझसे खो भी गया.....बहरहाल जो है, उसका लुत्फ लीजिए-

मासूमियत या मजबूरी
कीमतें आसमान छू रही हैं। एक तरफ गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी है और दूसरी तरफ कुछ लोग लाखों रुपये महीना कमा रहे हैं। यह खाई पटना जरूरी है। कैसे पटेगी मोटेंक अहलूवालिया या चिदंबरम से, नहीं जानता। या तो मासूमियत है या मजबूरी कि वो किसी और तरीके से सोच नहीं सकते। ...मां के पेट से झूठ बोलते हुए कोई नहीं आता सोसायटी से ही सीखते हैं...

अंधेरे में उम्मीद भी
जो थिएटर छोड़कर फिल्मों, सीरियलों की तरफ जा रहे हैं, वहां काम की तलाश में जूतियां चटकाते हैं। कुछ चापलूसी, कुछ जान-पहचान काम करती है। मुझे उनसे कुछ शिकायत नहीं है। क्या करें पेट पर पत्थर रखकर काम मुश्किल है। हमारे जमाने में दुश्मन बहुत साफ नजर आता था। सामराजवाद से लड़ाई थी। एक मकसद (सबका) - अंग्रेजों को हटाओ, रास्ते कितने अलग हों (भले ही)। अब घर के भीतर दुश्मन है, उसे पहचान नहीं सकते। विचारधारा बंटी है। पार्टियों की गिनती नहीं, हरेक की मंजिल अलग-अलग। इस अफरातफरी में क्या किसी से कोई आदर्श की तवक्को करे। हां, मगर लिबरेलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन, नए कालोनेलिज्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं सब तरफ से। खुद उनके गढ़ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन में भी। तो ये उम्मीद बनती है।

जवाब से कतराता हूं
मैं अपने डेमोक्रेटिक मिजाज का शिकार रहा हूं। मेरी अप्रोच डेमोक्रेसी रही है, मैं प्रचारक या उपदेशक थिएटर में यकीन नहीं रखता। ये कोई जम्हूरी बात नहीं (शायद यही शब्द बोला था) कि आपने सब कुछ पका-पकाया दे दिया, कि मुंह में डालकर पी जाना है। अगर आप समझते हैं कि दिल-दिमाग वाला दर्शक आता है तो उकसाने वाला सवाल देना काफी होता है। ये नहीं कि मैं सवाल भी और जवाब भी पेश कर दूं। जवाब से कतराता हूं। हां, इसका हक नुक्कड़ नाटक को है, वहां जरूरी है जवाब भी देना। उनकी प्रोब्लम्स हैं। हड़ताल वगैरह होती हैं, सड़कों पर भी निकलना पड़ता है (नुक्कड़ नाटक वालों को)।

हुसेन के मिजाज की कद्र करता हूं
मैं दोनों काम करता हूं, सड़कों पर भी निकलता हूं, न निकलने वालों पर एतराज नहीं। हुसेन नहीं निकलते। उनका मिजाज अलग है। उसकी मैं कद्र करता हूं। उन्होंने (हुसेन ने) कहा, जो मेरे खिलाफ बातें हो रही हैं, सैकड़ों मुकदमे बना दिए गए हैं, इसलिए नहीं आ रहा हूं। ये भी एक तरीका है रेजिस्टेंस का। हर आर्टिस्ट अपने-अपने मिजाज के तहत काम करता है।मैं यहां कोई फारमूला पेश नहीं करता। मैंने अपने नाटकों में कई तरह के प्रयोग किए। ये आप लोग रियलाइज करें, चाहें तो उड़ाएं, चाहें तो सराहें। इस बारे में पूछकर आप मुझे थका रहे हैं। मैं अपने काम की व्याख्या से इंकार करता

दिल को तनहा भी छोड़िए
(मख्दूम के एक शेर का हवाला देते हुए रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कुछ कहते हैं। शायद अंतरात्मा जैसा कुछ )...वो इकबाल का शेर है- अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल, कभी-कभी इसे तनहा भी छोड़िए। सिर्फ अक्ल से क्रिएट करना संभव नहीं है। दिल से भी बातें होती हैं। (मख्दूम का - शहर में धूम है एक शोलानवां की मख्दूम को पूरा पढ़ते हैं।) बाल्जक से पूछा गया था कि एक प्रास्टीच्यूट की एसी तस्वीर क्यों बनाई, उन्होंने कहा, एमा इज मी। एलन्सबर्ग ने भी कहा कि आप करक्टर क्रिएट जरूर करते हैं लेकिन वो अपनी कहानी खुद कहता है। आपका उसमें कोई कंट्रोल नहीं रहता।
देखिए आप उसमें शऊर घुसाएंगे तो वो कुछ हो जाएगी- उपदेश, अखबारनवीसी या कुछ न कुछ मगर कला नहीं रहेगी।

मौत के सौदागर कर रहे हैं रूल
ग्लोबलाइजेशन सब कुछ सपाट कर रहा है। सिस्टेमेटिक ढंग से सोचने के आदी हो गए हैं। आराम इसी में है कि सिस्टम बनाएं, उसके पीछे छिप जाएं। इन लोगों के लिए ये मुमकिन नहीं है कि आदिवासी सभ्यता को समझ कर लोकेट किया जाए या हर तबके के लिए अलग ढंग से सोचें। एक सिस्टम बना है शोषण-दमन का, बंटवारे का, कि लोगों को डिवाइड करो। यही क्लासिकल तरीका था, अब इसमें नए-नए तरीके जुड़ गए हैं। पालिटिशन, गवर्मेंट्स रूल नहीं कर रहे हैं, मर्चेंट्स आफ वार, मर्चेंट आफ डेथ, ड्रग मर्चेंट (कुछ और भी जुमले कहे), यही सब डिक्टेट कर रहे हैं। होम, फारन, इकानमी, सब पालिसी वही तय कर रहे हैं। हमारे यहां इसकी शुरुआत है। हम ग्लोबलाइजेशन के चौराहे पर हैं।

खतरे के रास्ते से मिलता है खजाना
पुराने जमाने में किस्से यूं थे कि एक हीरो निकला, दो रास्ते आए। एक मुश्किलों भरा, जिस पर न जाने के लिए उसे सलाह दी जाती है लेकिन वो उसी मुश्किलों भरे रास्ते पर निकलता है। और खजाना उसी रास्ते पर जाकर मिलता है। हीरोइन भी खतरे भरे रास्ते के आखिर में ही मिलती है।

(कार्यक्रम में कई बड़े आर्टिस्ट थे, अलग-अलग फील्ड के। सबने कुछ पूछा। लंबी बातें जो नोट कीं, मुझसे खो गईं। जोहरा सहगल से किसी ने कहा, आपा कुछ पूछेंगी, हबीब साहब से। उन्होंने कहा, मैं क्या पूछूंगी, मैं तो उनकी आशिक हूं। उन्होंने हबीब के 25 साल और जीने की तमन्ना भी की। एक सवाल के जवाब में हबीब ने कहा कि बहादुर कलारिन तैयार करने में सबसे ज्यादा मुश्किल आई। पोंगा पंडित पहले से होता आया। मैंने खेला तो संघ वालों ने खूब पत्थर फेंके और मुझे मशहूर कर दिया। इस सब के बीच कुछ करने का दबाव भी हमेशा रहा। गुमनामी अच्छी है या नामवरी...जैसे कई गीत भी हबीब की मंडली ने सुनाए।)