Saturday, January 8, 2011

फ़ैज़ पर कुछ नोट्स : असद ज़ैदी


इज़हारे-अक़ीदत और वक़्त की कैफ़ियत
1941 में प्रकाशित अपने पहले संकलन का नाम फ़ैज़ ने 'नक्शे फ़रियादी' रखा. ये 'दीवाने ग़ालिब' के पहले दो शब्द हैं. क़रीब एक चौथाई सदी बाद सन 1965 में अपने चौथे संकलन का नाम फिर उन्होंने ग़ालिब ही से लिया - 'दस्ते-तहे-संग' (चट्टान के नीचे दबा हाथ). ये कोई संयोग नहीं था. पुरानी रिवायत है कि दीवान की शुरूआत हम्द (ईश-वन्दना) से हो : "नक्शे-फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए तहरीर का / काग़ज़ी है पैराहन हर पैकरे-तस्वीर का." ग़ालिब पहले ही शेर में ऐसी कैफ़ियत सामने रख देते हैं कि पता नहीं चलता वह शरारत भरे अंदाज़ में आत्म-स्तुति कर रहे हैं, या अल्लाह की तारीफ़. अब ज़रा दस्ते-तहे-संग को देखें : "मजबूरी ओ दावा-ए गिरफ़्तारी-ए उल्फ़त / दस्ते-तहे-संग आमदः पैमाने वफ़ा है." हाथ एक भारी पत्थर के नीचे दबा हुआ है, और हम कह रहे हैं कि जन्म-जन्मान्तर तक तुम्हारे प्यार के क़ैदी रहने की क़सम खाए हुए हैं.
फ़ैज़ ने अपनी सारी ज़िंदगी ग़ालिब के साए में गुज़ारी. वह जब भी अपने से थक जाते हैं तो ग़ालिब की ज़मीन पर लौट आते हैं. उनकी तबीअत और मिज़ाज ग़ालिब से अलग हैं : ग़ालिब की ज़राफ़त, विडम्बना-बोध, कड़वाहट, खुद पर हँसने की आदत और अनासक्ति फ़ैज़ के यहाँ कम ही नज़र आती है. पर ग़ालिब के बिना उनको अपनी अस्मिता खतरे में लगती है. बिना ग़ालिब को याद किये वह ग़ज़ल तो लिख ही नहीं सकते. अपनी अंतिम ग़ज़ल में भी फ़ैज़ बिलकुल उस्ताद के पहलू में बैठे दिखाई देते हैं : 'हम एक उम्र से वाक़िफ़ हैं अब न समझाओ / कि लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है // करे न जग में अलाव तो शेर किसमक़सद / करे न शहर में जल थल तो चश्मे नम क्या है // अज़ल के हाथ कोई आ रहा है परवाना / न जाने आज की फ़ेहरिस्त में रक़म क्या है.'
मौलाना अल्ताफ़ हुसैन 'हाली' के बाद ग़ालिब की केन्द्रीयता को पहचानने और फिर उसे कविता में लाज़िम करने की ज़िम्मेदारी जिन लोगों ने उठाई उनमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सर्वोपरि हैं. हालाँकि जितना ध्यान इस बात पर दिया जाना चाहिए दिया नहीं गया है.
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इक़बाल के निधन के वक़्त फ़ैज़ 27 साल के थे और इक़बाल का असर पंजाब और उत्तर-पश्चिमी भारत में वैसा ही सघन था जैसा बंगाल में रवीन्द्रनाथ का. इक़बाल की तरह फ़ैज़ की पैदाइश भी सियालकोट ही की है. फ़ैज़ इक़बाल के दबदबे और मार से कैसे बचे रह सके यह भी एक गौरतलब चीज़ है. फ़ैज़ ने खुद इक़बाल के महत्त्व से इनकार नहीं किया, और उनको अक़ीदत पेश करते हुए दो नज़्में भी लिखीं, लेकिन 'इक़बालियत' के काले बादल से खुद दूर रहे. फ़ैज़ की भावी महानता और उर्दू शायरी के विकास में उनकी ऐतिहासिक भूमिका की चाबी शायद यहीं पर है. फ़ैज़ ने उर्दू शायरी के रिवायती साज़ो-सामान और तरीक़े-कार को फिर से सम्हाला, इक़बाल-युग में जो ढांचागत टूट-फूट हुई उसकी मरम्मत की और बड़े इत्मीनान से उसी पुरानी बुनियाद पर फिर से वही दरो-दीवार खड़े किये. उन्होंने नए से पुराने का काम लेने के बजाए पुराने से नए का काम लिया. उन्होंने उर्दू शायरी को इक़बाल के परवर्ती अतिमानववादी फ़लसफ़े और नए अस्मितावाद से बचाया. उन्होंने इक़बालियत को सीधी चुनौती देने के बजाए उर्दू की परम्परागत प्रगतिशीलता, नॉन-कन्फर्मिज्म और ग़ालिबियन आधुनिकता की राह पकड़ी. फ़ैज़ ने अपने उदाहरण से साबित किया कि शाइरी में ग़ालिब की परम्परा ही में आगे का रास्ता है, परवर्ती इक़बाल का रास्ता एक अंधी गली है. अल्लामा इक़बाल को सफ़ाई और आत्मविश्वास के साथ बाईपास करना फ़ैज़ के बड़े कारनामों में शुमार किया जाना चाहिए.
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राष्ट्रवाद आधुनिक इतिहास की एक केन्द्रीय संचालनकारी शक्ति रही है, ख़ासकर उन देशों में जो पश्चिम के उपनिवेश रहे. हिंदुस्तान जैसे मुल्कों में राष्ट्रवाद ने अनिवार्य साम्राज्यवाद-विरोधी जागरण का रोल अदा किया. लेकिन क़ौमी जागरण हर क़ौमी बीमारी का इलाज नहीं है इस बात को फ़ैज़ से पहले प्रेमचंदऔर इक़बाल ने, और इनसे पहले रवीन्द्रनाथ ने देख लिया था. राष्ट्रवाद कई रंगों में और कई नामों से आता है और इसके अनेक प्रकार ऐसे हैं जो सुधार के नाम पर और पुराने समाजों में चली आ रही और दो-ढाई हज़ार सालों में विकसित मानववादी परम्पराओं और एकताओं को नष्ट भ्रष्ट भी कर सकता है. फ़ैज़ ने बहुत जल्दी राष्ट्रवाद की इस विनाशकारी सम्भावनाओं को पहचाना और अपनी कविता में सार्वभौमिक मानववादी परम्पराओं और प्रतिरोध की अवामी रिवायतों को बुनियादी आधार बनाया. उन्होंने जनजीवन में रची बसी रोमानी-मुक्तिकामी परम्पराओं (सूफ़ी और ग़ैर-सूफ़ी) के साथ हमदर्दी का रिश्ता बनाया और उनके सहारे यथास्थिति के विरोध और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण को अपने यूटोपिया का हिस्सा बनाया. फ़ैज़ हमेशा यूटोपिया पर बल देते हैं. व्यवस्थाएँ बनती बिगड़ती रहती हैं, लेकिन यूटोपिया कभी नष्ट नहीं होते, बुनियादी क़द्रों के किए इंसान की लड़ाई जारी रहती है. उनके काव्य में वतन से प्यार झलकता है लेकिन कहीं भी"परबत वो सबसे ऊंचा" जैसा घमंड या उग्र राष्ट्रवाद नहीं है. दूसरी तरफ़ वह राष्ट्रीय दुखान्तों के प्रतिनिधि कवि हैं : 'निसार तेरी गलियों के ए वतन कि जहाँ / चलीहै रस्म कि कोई न सर उठा के चले' या कि 'ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गजीदः सहर'.
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दुनिया में बंदी-जीवन और निर्वासन या वतन-बदरी के फ़ैज़ जैसे शाइर कम ही हुए हैं. इस तरह के दो शाइरों - नाज़िम हिकमत और महमूद दरवीश - से अक्सर उनकी तुलना की जाती है. फ़ैज़ से इन दोनों की दोस्ती भी थी और नाज़िम हिकमत का तो उन्हों ने अनुवाद भी किया था. क़ैद और निर्वासन पर इन सभी का काम लगता है एक बहुत लम्बी, बहुभाषीय आलमी कविता का हिस्सा है.
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'निसार तेरी गलियों के ए वतन...' में फ़ैज़ अपने प्रतिनिधि रूप में मौजूद हैं :
बहुत हैं ज़ुल्म के दस्ते-बहाना-जू के लिए / जो चंद अहले-जुनूँ तेरे नामलेवा हैं // बने हैं अहले-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी / किसे वकील करें किससे मुंसिफ़ी चाहें //मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं / तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबहो-शाम करते हैं ... ग़रज़ तसव्वुरे-शामो-सहर में जीते हैं / गिरफ्ते-साया-ए-दीवारो-दर में जीते हैं ...यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ / न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई ... जो तुझसे अहदे-वफ़ा उस्तवार रखते हैं / इलाजे-गर्दिशे-लैलो-निहार रखतेहैं.'
यहाँ शाइर की अपने वतन से और वतन के लोगों से मुहब्बत और देशभक्ति के नाम पर वतन पर क़ाबिज़ ज़ालिमाना जमातों से नफ़रत एक साथ मौजूद है. उसका यह अंदाज़ उसे बीसवीं सदी की कविता की मशहूर बाग़ी आवाज़ों की उस सफ़ में खड़ा कर देता है जिसमें ब्लोक, लोर्का, नाज़िम हिकमत, नेरूदा, ब्रेख्त,पासोलिनी, महमूद दरवीश, मीगेल एर्नान्देज़ और अर्नेस्तो कार्देनाल मौजूद हैं. इन आवाज़ों में उदासी और उम्मीद और विषमताओं के निरंतर, स्थायी प्रतिरोधकी प्रतिज्ञा` है.
फ़ैज़ पराजय के बाद की पस्ती और चुप्पी को भी इन्तिज़ार के एक वक्फ़े, प्रतिरोध की एक मुद्रा, और शाश्वत इन्तिज़ार की निरंतरता में देखते हैं. यह बात उर्दू नज़्म के लिबास में और विरह-मिलन, क़फ़स और सैयाद, शामो-सहर, बहारो-खिज़ां की ज़बान में आता है तो सुनने वाले को इससे ऐसी तसल्ली और ताक़त मिलती है जो इक़बाल की ओजपूर्ण, ग़ैरत को ललकारती आवाज़ से नहीं मिलती. फ़ैज़ कहते नज़र आते हैं : लड़ाई बुरी नहीं थी, और शिकस्त भी बुरी नहीं है. वह हताशा की गोद से उम्मीद उठा लाते हैं. जैसा ग़ालिब कहते हैं: 'वफ़ादारी बशर्ते-उस्तवारी अस्ले-ईमाँ है'.
वह वर्तमान को धिक्कारते नहीं, उसे गुलशन के कारोबार का हिस्सा मानते हैं. यह कौन सा कारोबार है, और यह किसका इन्तिज़ार है? बीसवीं सदी के मध्य तक आते आते फ़ैज़ उर्दू ग़ज़ल और नज़्म के बाह्य रूप, बुनियादी उपकरणों, केन्द्रीय रूपकों और तरकीबों को छेड़े बग़ैर एक अंदरूनी इंक़िलाब ला देते हैं. वह उर्दू शायरी के पुराने श्रोता वर्ग को खोए बग़ैर प्रेम और विरह के कवि नहीं रहते, उनका माशूक कोई मानवीय या आध्यात्मिक शै नहीं रहता, उनका गुलशन कोई गुलशन नहीं रहता -- वह अपनी शायरी को सामाजिक क्रान्ति, इंसाफ़ और आज़ादी की मुस्तकिल तशवीश और उम्मीद की शायरी बना देते हैं, और छिछली इश्क़िया शायरी का रास्ता लगभग बंद कर देते हैं. उनका आशिक़ हस्बे-मामूल कू-ए यार से निकलकर सू-ए दार की तरफ़ जाता है, लेकिन इस आमदो-रफ्त के मानी स्थायी तौर पर बदल चुके हैं. वह सूफ़ियाना मज़मून के धागों से समाजी और सियासी इंक़िलाब का नया मिथक बुन देते हैं, और यह मिथक उर्दू में जदीदियत और उत्तर-आधुनिकतावाद के शोर, धूल और धुएँ के बीच अपनी जगह या चमक नहीं खोता. वाम-विरोधी समूह भी फ़ैज़ से अदब से ही मुखातिब होते हैं, लेकिन फरियादियों वाला "काग़ज़ी पैराहन" पहनकर.
इस तरह फ़ैज़ बीसवीं सदी में ग़ज़ल को फिर से (और उसके साथ युवतर विधा नज़्म को) प्रासंगिक बनाते हैं. ग़ज़ल अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी की प्रधान विधा रही. उन्नीसवीं सदी ग़ालिब की सदी थी. पर इसे बीसवीं सदी में जिलाए रखने में भी ग़ालिब के लोगों ही का योगदान सबसे ज़्यादा है -- उन लोगों में फ़ैज़ सबसे आगे हैं. फ़ैज़ की शायरी में ग़ालिब से इजहारे-अक़ीदत और और जिरह भरी हुई है. दोनों को एक दूसरे से काम पड़ता रहता है.
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(नया पथ के फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक से साभार, अगली किस्त में समाप्य)

Tuesday, December 28, 2010

मैं यानी हम


शिवप्रसाद जोशी

21वीं सदी के पहले दस साल पूरे हो गए हैं और एक अभूतपूर्व विकास दर की कुलांचे भरते देश में दुश्चिंता का न जाने ये साया क्यों नहीं जाता कि क्या हम सब वलनरेबल हैं. यानी हम सब आम नागरिक.

मुझे बार बार आशंका होती है कि मुझे कभी भी गिरफ़्तार तो नहीं कर लिया जाएगा. हालांकि अगले ही पल मैं सोचता हूं कि मैने तो कोई अपराध किया नहीं. पत्रकार हूं ख़बरें की हैं, कविताएं-निबंध लिखता हूं, ईमानदारी से लेखन करता हूं. बस.

और तो मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. पर फिर भी मुझे क्यों लगता है कि कोई मुझे देख रहा है, घूर रहा है, मेरा पीछा कर रहा है. मुझे कभी भी दबोचा जा सकता है. मैं कार ड्राइव कर दफ्तर जाता हूं, मुझे कोई किसी आधार पर फंसा सकता है.

क्या मैं सरकार या सत्ता के किसी नुमायंदे के लिए असहनीय होने की स्थिति में आ चुका हूं. क्या मैं शांति भंग कर सकता हूं. क्या मैं सत्ता राजनीति या दबंग समाज की आंख में खटका हूं. क्या मेरी शिनाख्त दुर्योग से एक व्यवस्था विरोधी शख़्स के रूप में हो चुकी है. क्या किसी को भनक लग गई है कि दमनकारी रवैये का मैं विरोधी हूं. क्या मुझे देशद्रोही माना जाएगा.

मैं अरुंधति रॉय का समर्थक हूं. मैं वरवर राव को हमारे समय का एक बड़ा कवि क्रांतिकारी मानता हूं. मुझे सांप्रदायिकता से नफ़रत है. मुझे अमेरिकापरस्ती नापसंद है. मैं इस्राएल की दमनकारी नीतियों का विरोधी हूं. मुझे हुसैन एक बड़े आर्टिस्ट लगते हैं. मुझे सचिन तेंदुलकर के व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं पर एतराज़ है. मुझे टीवी समाचार में फैले हुए अघाएपन और अपठनीयता और एक घमंडी किस्म की नालायकी से नफ़रत है. मुझे हिंदी में ज्ञानरंजन, चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, विनोद कुमार शुक्ल, असद ज़ैदी, वीरेन डंगवाल, देवीप्रसाद मिश्र और योगेंद्र आहुजा की रचनाएं सबसे ज़्यादा पसंद हैं. मुक्तिबोध के बाद रघुबीर सहाय की कविता आने वाले वक़्तों की भयावहता को सबसे पहले दर्ज करती हैं, ये मैं भी आगे बढ़कर मानता हूं. मेरे कुछ पत्रकार ब्लॉगर कवि लेखक साथी हैं, वे मुझे पसंद करते हैं, मैं उनसे निकटता महसूस करता हूं. मुझे नॉम चॉमस्की पसंद हैं, एडवर्ड सईद पसंद हैं, रोमिला थापर और पी साईनाथ पसंद हैं. हमारे कुटुंब के एक बड़े बुज़ुर्ग मार्क्सवादी हैं. हमारे आसपास लोकतंत्रवादी विचारधारा के बहुत से कवि लेखक संस्कृतिकर्मी और एक्टिविस्ट हैं.

क्या ये सब वजहें हैं जिनके चलते मुझे डरा रहना चाहिए. एक निहायत ही दुबकेपन में रहना चाहिए. घिरा घिरा सा अपने ही डर दुविधा और सवालों में. अपने बच्चों और परिवार की फ़िक्र करता हुआ. नौकरी करता हुआ. कोई कड़वी बात न कह दूं इसके लिए सजग रहता हुआ, हर महीने तनख्वाह घर लाता हुआ. रोटी मक्खन चैन से खाता हुआ और ईश्वर को प्रणाम कर एक बेफ़िक्र नींद में जाता हुआ.
मैं छत्तीसगढ़ नहीं गया, अरुंधति की तरह पहले नहीं बोला, मेधा पाटकर के साथ नर्मदा पर नहीं लड़ा. दूर रहा, सुरक्षित लेखन किया, उड़ीसा और कर्नाटक और गुजरात मेरा जाना नहीं हुआ. मैंने खुद को किसी जोखिम में नहीं डाला. फिर भी मैं डरा हुआ क्यों हूं. जब से डॉक्टर बिनायक सेन को उम्रक़ैद देने की ख़बर आई है, मेरा डर और बढ़ गया है. वो तीस साल से छत्तीसगढ़ में अपनी डॉक्टरी को आम आदिवासियों के बीच अमल में ला रहे थे. उनको मदद पहुंचा रहे थे. वो शंकर गुहा नियोगी के अघोषित शागिर्द थे. उन्होंने अपनी डॉक्टरी के नए आयाम खोलते हुए इतना भर किया था कि इलाक़े में नक्सलवाद पर काबू पाए जाने के नाम पर की जा रही बर्बरताओं का खुला और पुरज़ोर विरोध किया था. उन्होंने लोगों को मिटाए जाने की उस रौद्र षडयंत्र भरी रणनीति को अन्याय कहा था. बस.

अदालतें इंसाफ़ का एक ठिकाना होती हैं. पर उन्होंने मेरा डर बढ़ा दिया है. हम सबका डर बढ़ा दिया है. मेरे पिता का, मेरी मां का, मेरी पत्नी का, मेरे बच्चे डरेंगे. हम सब डरे हुए हैं. हमारा परिवार, हमारा समाज, हमारे लोग. क्यों.

दशमलव के नीचे की या उससे थोड़ा ऊपर की आबादी दिल्ली मुंबई कोलकाता बंगलौर, हैदराबाद, चेन्नई, पटना, सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, देहरादून, लखनऊ, जयपुर आदि में अविश्वसनीय किस्म की विलासिता भोग रही है. वह हमारे समय के समस्त सुख भोग रही है. हमारे महादेश की बाकी आबादी न जाने क्यों भुगतते रहने पर विवश है. नीरा राडिया की कंपनी बहुत कम समय में करोड़ों अरबों की कंपनी बन जाती है. उसके लिहाज़ से ये ऊंचा और ऊंचा उठती विकास दर तो ठीक है लेकिन छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तराखंड और कर्नाटक, उड़ीसा केरल तक एक आम मज़दूर और एक खेतिहर के लिए, किसी भी वक़्त नौकरी न रहने की आशंका में झुलसते एक बड़े निम्न मध्यवर्ग के लिए विकास दर आखिर कहां सोई रहती है. क्या वो इन सोए हुए, डरे हुए, भुगतते हुए और खपते हुए पसीने और धूल से सने हुए लोगों की आकांक्षाओं और सपनों के किनारों से किसी शातिर शैतान बिल्ली की तरह दबे पांव निकल जाती है.

कि ये बताने के लिए सुबह के अखबार मीडिया को कि देखो यहां से विकास होकर गुज़रा तो है.
बिनायक सेन की सज़ा क्या हम सबको मिली हुई सज़ा नहीं है. क्या इस चिंता से पीछा छु़डाने का य़े वक़्त नहीं है कि हमें कोई क्या दबोचेगा, हम पहले से सज़ायाफ़्ता हैं, हम इस क़ैद में हैं और मुक्ति के लिए संघर्ष हमारा जारी है. 2010 की अभूतपूर्व आर्थिक तरक्की अगले दस साल यानी 2020 में एक नया मकाम हासिल कर लेगी. वो अकल्पनीय विकास का पड़ाव होगा. लेकिन वह कुछ जद्दोजहद कुछ बेचैनियों कुछ लड़ाइयों का भी एक पड़ाव होगा. उन पड़ावों तक आते आते बहुत सी जेलों में बहुत से बिनायक सेन आ चुके होंगे. पोस्को और वेदांत एक नया सामाजिक चोला पहन लेंगे. वे कानूनों के पास एक चमकीला रिसॉर्ट बना देंगे. सरकारें उनसे अंततः अभिभूत होती जाएगीं. पर अरुंधति रॉय जैसे और स्वर भी तो आएंगें.

नवारुण भट्टाचार्य ये याद दिला चुके हैं कि यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश, यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश.

Monday, December 6, 2010

मलबा -सुदीप बनर्जी

समतल नहीं होगा कयामत तक
पूरे मुल्क की छाती पर फैला मलबा
ऊबड़-खाबड़ ही रह जाएगा यह प्रसंग
इबादतगाह की आख़िरी अज़ान
विक्षिप्त अनंत तक पुकारती हुई।


Thursday, December 2, 2010

रोज़ा पार्क्स जिसने अपनी सीट से उठने से मना कर दिया था


एक दिन एक औरत ने कहा कि मैं भेदभाव नहीं मानूँगी और उसने उस सीट से उठने से मना कर दिया, जो नस्लवादी नियमों के अनुसार उसके लिए नहीं थी। आज यह एक सामान्य वाक्य सा लगता है। जैसे कोई कहानी हो। यह वाक्य बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक की रवानी है। इस घटना के बाद से एक आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसका सिलसिला ओबामा के राष्ट्रपति बन सकने तक जुड़ा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में हालांकि दास प्रथा को उन्नीसवीं सदी के गृहयुद्ध (१८६२-६४) के बाद गैरकानूनी करार कर दिया गया था, पर जल्दी ही कई तरह के दाँवपेंचों के जरिए गोरे शासक काले लोगों की आजादी को निरर्थक कर डालने में सफल हो गए थे। दीवालिएपन के नाम पर उनसे मतदान का अधिकार छीन लिया गया। फिर दक्षिणी राज्यों में गोरी बहुलता वाली सभाओं में उनके खिलाफ मत पारित कर जिम क्रो कहलाने वाली एक ऐसी व्यवस्था बनाई गयी, जो अपने स्वरुप में दक्षिण अफ्रीका में १९४८ से १९९० तक चली अपार्थीड व्यवस्था के समान थी। कई सार्वजनिक जगहों पर कालों की उपस्थिति पर निषेध लागू किया गया। अन्य जगहों पर जैसे, रेस्तरां, दफ्तरों आदि जगहों पर उनके आने जाने के लिए अलग दरवाजे बनाए गए। इस व्यवस्था का विरोध तो होना ही था। विरोध की कई धाराएँ पनपीं। मार्कस गार्वे का 'बैक टू अफ्रीका', डब्ल्यू ई बी ड्युबोयस की बौद्धिक लडाई, यह सब एक लंबा इतिहास है। आखिर मुख्यधारा में रहते हुए ही संघर्ष होना था और इसकी शुरुआत एक अनोखे ढंग से हुई। अन्य दक्षिणी राज्यों की तरह अलाबामा के मांटगोमरी शहर की बसों में गोरे और काले लोगों के लिए अलग सीटें तय थीं। चूँकि बसों में चलने वाले लोग ज्यादातर काले होते थे, इसके बावजूद कि गोरों की सीटें खाली पडी होती थीं, काले लोगों को खड़े रहना पड़ता था। एक दिन, १ दिसंबर १९५५ को, बयालीस साल की रोजा पार्क्स ने सीट से उठने से मना कर दिया। इसके पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं। पर निहायत ही साधारण महिला होते हुए भी रोज़ा राष्ट्रीय कलर्ड जन संगठन (National Association for the Advancement of Colored People (NAACP)) की स्थानीय शाखा की सचिव थी। और उसके अपने शब्दों में वह 'अन्याय मानते रहने से थक चुकी थी'। उसके इस कदम लेने पर लोगों में व्यापक चेतना फैली और जल्दी ही यह नस्लवाद विरोधी व्यापक जनांदोलन में तब्दील हो गया जिसका नेतृत्व रेवरेंड मार्टिन लूथर किंग ने किया। साथ ही ब्लैक इस्लामिक आन्दोलनों और मार्क्सवादी आन्दोलनों ने भी जोर पकड़ा।

रोज़ा एक दूकान में कटाई सिलाई का काम करती थी और अपने ऐतिहासिक कदम के कारण उसकी नौकरी छूट गयी और कई तकलीफों का सामना उसे करना पडा। बाद में डेट्रायट में उसने फिर इसी काम की नौकरी मिली।

मैंने अपने शोध-छात्र दिनों में एक बार रोजा को बोलते सुना था। यकीन नहीं होता था कि अत्यंत साधारण दिखती यह महिला इतने बड़े आन्दोलन के सूत्रपात का कारण बनी। आम अधिकारों के उस संघर्ष की परिणति को आज हम ओबामा के राष्ट्रपति बनने में देखते हैं।

--लाल्टू

(पहली दिसंबर २०१० को रोज़ा पार्क्स के इस ऐतिहासिक कदम के पचपन बरस पूरे हुए. नवम्बर २००८ में रिकार्ड किया गया एमी डिक्सन-कोलार का यह गीत जो ओबामा की ऐतिहासिक जीत को सेलीब्रेट करता है, रोज़ा पार्क्स के उस कदम के महत्त्व को इंगित करता है)


Tuesday, November 30, 2010

संस्कृति का जनपक्ष : दूसरी और अंतिम किस्त

(पिछली कड़ी से जारी)

हमने अपनी लोक-प्रज्ञा की उपेक्षा की है, उस पारंपरिक ज्ञान के भण्डार की भी उपेक्षा की है जो पंचायत प्रशासन का आधार थी. इस व्यवस्था में पेड़-पौधों और जड़ी-बूटियों की प्रचुर जानकारी थी, फसलों के आवर्तन, देशी खाद्य व्यवस्था,महाकाव्यों की मौखिक परंपरा,लोक साहित्य,गाथा-गीत,लोक-गीत और ठेठ देशी प्रदर्शन कलाओं का प्राचुर्य था. इस लोक ज्ञान के दायरे में आदिवासी मांझी समुदाय की सामाजिक न्याय पर आधारित व्यवस्था,विधिशास्त्र,पेड़ों को संरक्षित करने से सम्बंधित वर्जनाएं,जंगल का जीवन एवं मानवाधिकार सभी कुछ शामिल था. इस लोक-ज्ञान का तिरस्कार कर हमने सर्वाधिक भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था को, जिसमें चुनाव व्यवस्था भी शामिल थी, ऊपर से नीचे तक पनपने का मौका दिया और ऐसा हमने इसलिए किया क्योंकि यह हमारे निहित स्वार्थ को पोषित करता था और प्रशासन भी सुविधाजनक था. मानक प्रशासनिक व्यवस्था सबसे अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक थी क्योंकि इसमें आम आदमी की कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी.
एकरूपता के सिद्धांत पर आधारित बाज़ार व्यवस्था से सीख लेकर कला,संस्कृति एवं लोक रीति-रिवाजों को भी खरीदी-बिक्री की उपभोक्ता सामग्री में तब्दील कर दिया गया. जैसा कि प्रोफ़ेसर अमिय बागची ने संकेत किया था कि जन जातियों के कल्याण,बड़ी पूँजी एवं बड़े उद्योग तथा कृषि आधारित उद्योगों की ज़रूरतों के हिसाब से विकास के अलग-अलग ढांचों की तलाश को निहायत असुविधाजनक बताते हुए खारिज कर दिया गया. दूसरी तरफ हमने भूमि-वितरण के मुद्दे की वर्षों तक अवहेलना की,जिससे बिचौलियों का शोषण तंत्र पनपता रहा.जंगल एवं जंगल से जुड़े उत्पादों पर से आदिवासियों के अधिकार छीन लिए गए जिसके परिणामस्वरूप जनजातीय विकास में बाधा उपस्थित हुई और वे कंगाल हो गए. इस तरह से उनकी सामुदायिक समझ को नष्ट कर दिया गया और उन्हें दिहाड़ी मजदूर,पियक्कड़ और वेश्या में तब्दील कर दिया गया. इनके स्थान पर हमने असंख्य भ्रष्ट अंतर्राष्ट्रीय दूरदर्शन चैनलों को पनपने दिया जिन्होंने 'चमचमाते भारत' को ग्रामीण एवं जनजातीय सामुदायिक केन्द्रों में प्रदर्शित किया और इस प्रक्रिया में लोक एवं जनजातीय प्रस्तुति कलाओं को विकृत और कमज़ोर कर नष्ट कर दिया गया.हमने जानबूझकर और लगातार बीजों,जड़ी-बूटियों,औषधि-वनस्पतियों और फलों से सम्बंधित अपनी बौद्धिक संपत्ति और अधिकारों की अवहेलना की जिसके फलस्वरूप हल्दी,जीरा,नीम और अन्य मसाले तथा बासमती, आम आदि फल के अधिकार शिकागो,कैलिफोर्निया,फ्रांस आदि की झोली में चले गए. इस तरह से, संस्कृति जो दूसरे शब्दों में हमारी जीवन-शैली थी, उसे विनिमय-वस्तु में तब्दील कर दिया गया और परिणामस्वरूप हमें मिले विदेशी कपडे,नियमित भोजन और नृत्य और संगीत के अपरिचित तरीके.
कला और संस्कृति जो जीवन के हर पक्ष से सम्बंधित है उसे सिर्फ एक विभाग,एक फ़ाइल तक सीमित कर दिया गया और इस छलावे द्वारा संस्कृति को बचाने पर जोर दिया गया. सूचना एवं प्रसारण,वाणिज्य एवं वित्त मंत्रालय के सहयोग एवं तालमेल के बिना ही संस्कृति को सुरक्षित किया गया. इस तरह भारतीय बाज़ार इन मंत्रालयों की खुली छूट की वजह से विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण झेलने को अभिशप्त होकर रह गए. हमें इस बात का कभी ख्याल ही नहीं आया कि हम एक सार्थक सांस्कृतिक नीति बनाएं जो रक्षा एवं विदेश मंत्रालयों सहित सभी विभागों के कार्यक्रमों हावी रहे. पोटा जो अब शायद समाप्त होने वाला है, उसे शुरू किया गया और अब एक बार फिर वह विरोधी दलों की कार्यसूची में शामिल है. हम शायद भूल रहे हैं कि रूढ़िवाद, रूढ़िवाद को ही जन्म देता है, साम्प्रदायिकता से साम्प्रदायिकता ही पैदा होती है और आतंकवाद से आतंकवाद. एक बम अनेक बमों की श्रृंखला को जन्म देता है और इस अंधी दौड़ में हम जनसंहार के हथियारों का ढेर लगाते जा रहे हैं.
फासिज़्म जो लोकतंत्र की पूजीवादी व्यवस्था का हिस्सा है, उसके भयानक चेहरे पर से १९६४ में तब नकाब हट गया जब सैकड़ों बस्तर आदिवासियों को उनके राजा समेत मौत के घाट उतार दिया गया. १९८४ में सैकड़ों सिखों का कत्लेआम हुआ, उनकी संपत्ति को या तो लूट लिया गया या जला दिया गया. १९९० में इन दंगों के परिणामस्वरूप भीषण नरसंहार और लूट की वारदातें हुईं, जिंदा लोगों को उनके घर-परिवार से वंचित कर बेरोज़गारी की मार झेलने को छोड़ दिया गया. २००२ में हजारों मुसलमानों का संहार हुआ, जिसमें पहली बार दलित एवं पिछड़ी जनजातियाँ, कैबिनेट मंत्री और पुलिस भी दंगों में शामिल थी. २००४ में ईसाई आदिवासियों को धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया. झाबुआ के ईसाई धर्मगुरुओं, चर्चों और ईसाई आदिवासी परिवारों और उनके घरों पर आक्रमण हुआ. इस दबाव के फलस्वरूप सैकड़ों की संख्या में लोग जंगलों में भाग गए और आज भी लापता हैं. इन घटनाओं से जहाँ एक ओर जातियों के समूल विनाश का पता चलता है, वहीँ फासिस्ट आक्रमणों से होने वाले घिनौने आर्थिक लाभ का भी पर्दाफाश होता है. क्या आप किसी अल्पसंखक समुदाय द्वारा प्रचारित किये गए फासिज़्म की कल्पना कर सकते हैं? फासिज़्म पर हमेशा बहुसंख्यक समुदाय का एकाधिकार रहा है, फिर वह चाहे इटली का हो, जर्मनी का या भारत का. सोनिया गांधी के नामांकन के बिना, जिसने कई महत्त्वाकांक्षी सदस्यों की आशाओं पर पानी फेर दिया, अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले मनमोहन सिंह शायद कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते. आप अल्पसंख्यक समुदाय के किसी सदस्य को राष्ट्रपति के रूप में देख सकते हैं पर क्या आप कभी किसी ईसाई या मुसलमान की प्रधानमंत्री के रूप में कल्पना कर सकते हैं? गांधीजी की सलाह के बावजूद जिन्ना प्रधानमंत्री नहीं बन सके. यहाँ तक की जगजीवन राम जो शूद्र जाति के हिन्दू थे वे भी राजनीतिक दांव-पेंचों और चालों की वजह से प्रधानमन्त्री होते-होते रह गए.
फूट डालो और शासन करो की नीति ने न केवल अल्पसंख्यक समुदाय को अलग अलग वोट बैंकों में बांटा है, बल्कि हिन्दुओं को भी दलित,अनुसूचित जाति एवं जनजातियों में विभाजित कर पूरी चुनाव प्रणाली को ही विकृत व्यवस्था में तब्दील कर सत्ता का रास्ता साफ़ किया है. इस देश में सिर्फ गांधी को ही मारा नहीं गया, उनकी नीतियों का भी दम घोंट दिया गया है. आज गांधी सिर्फ जिह्वा-विलास की वस्तु होकर रह गए हैं, जिनकी तस्वीरें मंत्रियों के दफ्तरों की शोभा हैं और उनका नाम केवल सड़कों और पार्कों के नाम के साथ जुड़कर ही जीवित बचा है.
आज हम एक-ध्रुवीय विश्व में बड़े दादा अमरीका की निगरानी में जी रहे हैं. पर यह बड़ा भाई आज पश्चिमी विश्व के लिए भी एक खतरा बन चुका है. इसी वजह से यूरोपीय संघ का गठन हुआ और यह संघ सैन्य बल के रूप में भी खुद को अमरीका की एकपक्षीय मनमानी की प्रतिरोधी शक्ति के रूप में सुदृढ़ कर रहा है.
यह एक बुरा एवं अप्रिय समय है. अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, एक तेज व सक्रिय जीवन-शक्ति से समृद्ध भारत तो हमें कई ज़रूरी कदम उठाने होंगे. हमें समझना होगा की समदृष्टि के बिना कोई भी आर्थिक नीति न तो गरीबी कम कर सकती है, न ही संस्कृति को बचा सकती है और उसका चेहरा तो कदापि मानवीय नहीं हो सकता. सामाजिक न्याय के बिना कोई भी राजनैतिक योजना केवल फासिज़्म को ही जन्म देगी. मानवाधिकार संरक्षण की गारंटी के बिना गृह मंत्रालय की कोई भी नीति सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद को ही पनपने में मदद करेगी. निःशस्त्रीकरण की अवधारणा के बगैर बनाई गई रक्षा-नीति सिर्फ तलवार खड़खड़ाने तक ही सीमित होकर रह जायेगी और कभी भी शान्ति कायम नहीं कर पाएगी. सांस्कृतिक सन्दर्भ से रहित विदेश नीति कदापि सद्भाव एवं सही विकास को जन्म नहीं दे पाएगी.
संक्षेप में, हाशिये पर जीवन जीने को अभिशप्त असंख्य वंचितों की भलाई ही मूल समस्या है. हमारे देश की मजबूती और जीवन-शक्ति इन्हीं वंचितों की भलाई से कायम रह सकती है. मैंने बहुत सरलीकृत ढंग से संस्कृति को दो भागों में विभाजित किया है: शोषक-वर्ग की संस्कृति और शोषितों की संस्कृति. आपको तय करना है, आप किसके साथ हैं : शोषकों के या शोषितों के?

(समाप्त)

Wednesday, November 24, 2010

संस्कृति का जनपक्ष : हबीब तनवीर


(उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 'क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सन्दर्भों में भारत की जीवन शक्ति' में हबीब तनवीर ने यह व्याख्यान अंग्रेज़ी में दिया था जो 'नुक्कड़ जनम संवाद' में छपा था. आभा गुप्ता ठाकुर का यह हिंदी अनुवाद संवेद पत्रिका के जुलाई २०१० अंक से साभार)

अधिकतर मैं कुछ सूत्रों से मदद लेकर तात्कालिक भाषण दिया करता हूँ, पर ऐसे में शब्दों के भावावेग में बह जाने की प्रवृत्ति की वजह से समय का ध्यान नहीं रहता. मैंने एक व्याख्यान ही लिखा है, लेख नहीं, इसलिए मैं इसे पढ़कर सुना रहा हूँ.
कल के एक घंटे के व्याख्यान में ही अध्यात्म की काफी भारी खुराक आपको मिल चुकी है. मैं मूलतः एक रंगकर्मी हूँ. मैं कला को अध्यात्म से अलग-थलग नहीं देखता. कला हो या विज्ञान दोनों ही जीवन से सम्बंधित हैं. मेरा मानना है कि रंगकर्म जीवन के हर पहलू से सम्बंधित होता है. भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित अभिप्राय की ही तरह मैं प्रस्तुति कला को एक गंभीर अध्यात्मिक कार्य मानता हूँ.
मुझे अपनी लोक-कलाओं की जीवंत समृद्ध परंपरा और क्लासिकल नाटकों की महान विरासत पर गर्व है. जैसा कि अधिकाँश कला समीक्षक मानते हैं, ये एक दूसरे के विरोध में नहीं खड़ी हैं, अपितु के दूसरे से जुड़ी हुई हैं. स्पष्ट कारणों की वजह से मैं संस्कृत भाषा के ज्ञान से अनभिज्ञ रहा, पर मैंने अनुवाद के माध्यम से अपने धर्मग्रंथों, नाटकों एवं उपनिषदों से परिचित होने का प्रयास किया. मैंने ऋग्वेद के उस प्रसिद्द स्तोत्र का अनुवाद किया जो प्राचीन भारत की वैज्ञानिक दृष्टि का प्रतिबिम्ब है. यह स्तोत्र जिज्ञासा एवं प्रश्नाकुलता से परिपूर्ण है और अज्ञेयवाद की सीमा तक पहुंचे संशय के प्रति एक संबोध-गीति है. मैंने एक उर्दू कविता में इस स्तोत्र का भाषांतरण किया है. उर्दू मेरी मातृभाषा है और मैं मूलतः एक उर्दू लेखक हूँ. मैं उर्दू,हिंदी एवं छतीसगढ़ी में नाटक लिखता हूँ, पर मेरा सर्जनात्मक लेखन हमेशा अरबी लिपि में होता है. मैंने अपने जीवन में हिंदी काफी देर से सीखी. मैं हिंदी पढ़ता हूँ और ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ व्यावसायिक पत्र हिंदी में लिखता हूँ.
मुझे अफ़सोस है कि उत्तर से दक्षिण तक के इतने व्यापक क्षेत्र में बोली जाने वाली समृद्ध भाषा उर्दू को हमारे देश के राजनीतिज्ञों ने एक राज्य तो क्या,एक शहर यहाँ तक कि एक मोहल्ला भी देना मुनासिब नहीं समझा. इस रूप में निश्चित ही इन लोगों ने इस समृद्ध भाषा को दुर्बल किया है. उर्दू सिर्फ मुसलमानों की भाषा नहीं है, बल्कि यह जनता की भाषा है और हिन्दू और मुसलमान दोनों कौमों में प्रचलित है. उर्दू गद्य और पद्य को विकसित करने में मुसलमानों का ही नहीं हिन्दू लेखकों का भी योगदान है. इन लेखकों में कुछ महत्त्वपूर्ण नाम हैं- मुंशी प्रेमचंद, चकबस्त,रघुपति सही 'फ़िराक', किशनचन्दर, राजेन्द्र सिंह बेदी आदि. उर्दू को अपनी जायज़ जगह न देकर और चालाकी से हिंदी साम्राज्यवाद के प्रसार के माध्यम से एक भाषा द्वारा दूसरी का दम घोंट दिया गया और इसके परिणामस्वरूप हिंदी भाषा स्वयं असक्त एवं कमज़ोर हो गयी. विश्व की अन्य भाषाओं में मौखिक और लिखित रूप में बहुत कम अंतर है. इसके विपरीत रेडियो तथा अन्य सरकारी उपायों के माध्यम से हिंदी के जिस सरकारी संस्करण को प्रचलित किया गया, वह मौखिक हिंदी से बिलकुल अलग थी, जिसके परिणामस्वरूप लिखित हिंदी के स्वरूप पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा और हिन्दी भाषा मूलतः मौखिक भाषा के रूप में ही सफल हो पायी.
इस तरह के विकृत विकास का केवल एक ही और उदाहरण मिलता है. हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा मानते हुए इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने उर्दू को इतने खतरनाक रूप से संरक्षण दिया कि पश्तो,पंजाबी,सिन्धी आदि समृद्ध भाषाएँ हाशिये पर धकेल दी गयीं और पाकिस्तान के उर्दू साम्राज्यवाद ने अंततः उर्दू को एक गूढ़ भाषा बना दिया. पाकिस्तान एवं हिन्दुस्तान का आम आदमी इन भाषाओं से इतना कट गया अपनी मातृभाषा समझने के लिए उसे विशिष्ट अकादमिक उपाधि की ज़रूरत पड़ने लगी. हमारी प्राचीन गौरवशाली समृद्ध देशी-बोलियों के साथ भारतीय न्याय व्यवस्था के इसी बर्ताव की वजह से संस्कृत के दिव्य शब्दों के साथ-साथ ध्वनियों से भी दूर रखा गया. इस तरह आभिजात्य वर्ग ने जनसंचार के माध्यम से जनता को अलग रखकर इस भाषा की ओजस्विता से वंचित रखा, जिससे वह आसानी से शासन कर सके.
हम सभी प्राचीन भारत के गौरव से परिचित हैं पर हमें देशभक्ति पूर्ण व्याख्यानों के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय संस्कृति की महानता से परिचित होने की ज़रूरत है. हमने जहाँ अमीर खुसरो एवं गुरु नानक जैसे मुस्लिम और सिख संतों का आवाहन किया वहीँ इकबाल का गलत हवाला दिया. हमने समकालीन भारत के कुछ हिस्सों में अल्पसंख्यक जाति संहार, महान कवियों एवं गायकों की कब्रों का विनाश एवं मस्जिदों के ध्वंस की पृष्ठभूमि में भारत में धार्मिक विश्वासों,भाषाओँ एवं संस्कृतियों की विविधता का गुणगान किया. इस क्रम में कई कलाकृतियों, किताबों,फिल्मों एवं रंगमंच पर प्रहार किया गया और इस तरह से भारत को मजबूती प्रदान करने की दुस्साहसी कोशिशें की गईं जिससे आने वाले चुनाव में अल्पसंख्यक समुदाय के वोट हासिल किये जा सकें.
प्रोफ़ेसर यशपाल के द्वारा 'शक्ति' को कट्टर देश प्रेम के सन्दर्भ में परिभाषित करने पर मुझे इस शब्द से घृणा होती है. इस शब्द से अंधी उग्र राष्ट्रीयता की गंध आती है, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और नकलची संस्कृति के रूप में प्रचलित हो गया है, विशेषतः इस सन्दर्भ में कि किसी राष्ट्र की जीवन-शक्ति से सम्बंधित पहली चर्चा अमेरिका,नीदरलैंड तथा जापान में प्रारम्भ हुई. मैं 'जीवन-शक्ति' (vitality) की जगह सामान्य शब्द 'शक्ति' का प्रयोग बेहतर मानता हूँ. अंग्रेजी शासकों, वर्तमान अमेरिकी मालिकों और बहुराष्ट्रीय संगठनों के प्रभाव में हम लोग नकलची राष्ट्र के रूप में परिवर्तित हो चुके हैं. हम अभी भी सीखने के दौर से गुज़र रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र का पश्चिमी ढांचा हमारे सामने पहले आया फिर पूंजीवाद. अतः पूंजीवाद के पश्चिमी संस्करण अभी भी अपने चरम उत्कर्ष पर हैं. लेकिन पूंजीवाद के परिणामस्वरूप विकास का कौनसा रूप हमारे सामने आया? तकनीक ने विज्ञान को अपने वश में किया और उसे पीछे छोड़ दिया, पूरी दुनिया को प्रदूषित और निरावृत्त कर दिया. मानव निवास के लिए अंतरिक्ष में जगह की खोज शुरू हुई और हर प्रकार के युद्ध की शुरुआत हुई - पेट्रोल के लिए,पानी के लिए, बाज़ार के लिए, राज्य पोषित आतंकवाद पर आधारित युद्ध, नस्ली युद्ध, गैर ईसाईयों से युद्ध आदि. ये युद्ध अफ्रीका,एशिया,पूर्वी यूरोप,लातिन अमेरिका तथा अन्य सभी जगहों में फ़ैल गए, लेकिन विशुद्ध पश्चिमी देशों में ये शायद ही कभी लड़े गए.
पश्चिमी संस्कृति की नकल की इस अंधी दौड़ में हमने अविकसित देशों की स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक विकास के ढाँचे को विकसित करने का स्वर्णिम अवसर खो दिया. हम यह भूल गए कि पूंजीवादी एकरूपता पर आधारित पश्चिमी समाज बंद गली के उस आखिरी मुकाम तक पहुँच गया है जहाँ युद्ध के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है. पश्चिमी जगत इस विनाश के कगार पर बहुत तेजी से पहुँचा, अविकसित देशों के लोगों ने उनकी इस गलती से सीखने का स्वर्णिम अवसर देखा. लेकिन हम भूल गए कि विकास के इस अराजक परिदृश्य और संतृप्ति के कगार पर पहुंचे मानव समाज के बीच भी सिर्फ अविकसित दुनिया के लोगों के पास स्वयं के विकास का ढांचा बनाने तथा अस्तित्व बचाने का दुर्लभ अवसर उपलब्ध था.
हमने अपनी आत्मा को प्रौद्योगिकी,भूमंडलीकरण,उपभोक्तावाद,उदारीकरण,खुली बाज़ार-व्यवस्था,अश्लील विज्ञापनों एवं जहरीले दूरदर्शन के शैतान को बेच दिया और हमने १३ प्रतिशत सेलफोन और वाहन धारकों को विपुल धन-संपत्ति के नशे में झूमने का मौका दिया है. इस तरह वंचितों की एक बहुत बड़ी आबादी जिसमें आदिवासी,दलित, किसान एवं शहरी निम्न मध्यवर्ग शामिल है, गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को बाध्य है,हज़ारों लोग आत्महत्या कर रहे हैं. पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण एवं शहरी बेरोजगारों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. कृषि प्रधान भारत के वही लोग जिनके उत्पादन ने 'चमचमाते भारत' को कायम रखा है, उन्हीं को इस साम्प्रदायिक एवं दूषित शिक्षा-व्यवस्था ने निरक्षर एवं अशिक्षित छोड़ दिया है. बस्तर के एक व्यक्ति ने मुझसे कहा-' तुम अपने शिक्षक को पढ़ाने के लिए पैसे देते हो, पर हमारे बच्चों को क्यों पढ़ने के लिए पैसे नहीं देते?'

(अगली किस्त में समाप्य)

Friday, November 19, 2010

जसम का बारहवां राष्ट्रीय सम्मेलन


लूट और दमन की संस्कृति के खिलाफ सृजन और संघर्ष को समर्पित जसम का बारहवां राष्ट्रीय सम्मेलन 13-14 नवंबर को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सम्मेलन में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, दिल्ली, राजस्थान, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रो. मैनेजर पांडेय और प्रणय कृष्ण को पुनः जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और महासचिव रूप में चुनाव किया गया। सम्मेलन में 115 सदस्यीय नई राष्ट्रीय परिषद का चुनाव किया गया। कामकाज के विस्तार के लिहाज से महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के प्रतिनिधियों को भी राष्ट्रीय पार्षद बनाया गया। प्रलेस के संस्थापक सज्जाद जहीर की पुत्री प्रसिद्ध कथाकार-पत्रकार और नृत्यांगना नूर जहीर समेत 19 नए नाम राष्ट्रीय परिषद में शामिल किए गए। मंगलेश डबराल, अशोक भौमिक, शोभा सिंह, वीरेन डंगवाल, रामजी राय, मदन कश्यप, रविभूषण, रामनिहाल गुजन, शंभु बादल और सियाराम शर्मा को जसम का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी 35 सदस्यों की है, जिसमें सुधीर सुमन, भाषा सिंह, दीपक सिन्हा, सुरेंद्र सुमन, संतोष झा, अनिल अंशुमन, अजय सिंह, के. के. पांडेय, आशुतोष कुमार, बलराज पांडेय, संजय जोशी, सुभाष कुशवाहा, हिमांशु पंड्या, गोपाल प्रधान, कौशल किशोर, पंकज चतुर्वेदी, कैलाश बनवासी और सोनी तिरिया शामिल हैं।
सृजन और संघर्ष के दो बडे नाम- मुक्तिबोध और शंकर गुहा नियोगी सम्मेलन के केंद्र में थे। सम्मेलन के तमाम सत्रों में मंच पर लगे मुख्य बैनर पर दोनों की तस्वीरें थीं। दुर्ग के शंकर गुहा नियोगी हाल (बाकलीवाल स्मृति भवन) में हिरावल (पटना) के कलाकारों द्वारा मुक्तिबोध की ‘अधेरे में’ कविता के एक उत्प्रेरक अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन/ ओ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया/ जीवन क्या जीया’ के बेहद प्रभावशाली गायन से सम्मेलन की शुरुआत हुई और समापन हिरावल (भिलाई) द्वारा ‘अधेरे में’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। सम्मेलन ने बिहार के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के नायक का. रामनरेश राम, छात्र नेता राजेश, ‘सही समझ’ के संपादक और कथाकार सोहन शर्मा, रंगकर्मी शिवराम, जनकवि गिर्दा, रंगकर्मी अमिताभ दासगुप्ता और अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता को एक मिनट का मौन रखकर अपनी श्रद्धांजलि दी।
प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने ‘सत्ता और संस्कृति’ विषय पर मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यान दिया, जो कि सम्मेलन का उद्घाटन वक्तव्य भी था। मंगलेश डबराल ने इराक, अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले और भारतीय शासकवर्ग द्वारा आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों और किसानों के बर्बर दमन का जिक्र करते हुए कहा कि आज सत्ता को अपने किसी भी दुष्कृत्य के लिए कोई ग्लानिबोध नहीं रह गया है। साधारणजन की तकलीफों के प्रति सत्ता बिल्कुल संवेदनहीन हो चुकी है। कश्मीर में जनप्रदर्शनों के हिंसक दमन, अरुंधति राय को जेल भेजने की धमकी, दंतेवाड़ा में आदिवासियों की हत्याओं और विस्थापन, कामन वेल्थ गेम के नाम पर मजदूरो को दिल्ली से भगाए जाने जैसे कई प्रसगों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता बिल्कुल प्रतिक्रियावादी और फासिस्ट हो चुकी है। एक अनियंत्रित आर्थिक उदारवाद की जो संस्कृति है, भाजपा और कांग्रेस उसके प्रवक्ता और वाहक हैं और उन्हें भारत में पनपे नवधनाढ़य नए मध्यवर्ग का निर्लज्ज साथ मिल रहा है। साधारण जनता के जो बड़े सांस्कृतिक मूल्य है सत्ता उसे खत्म कर देना चाहती है और लूट, बर्बरता के मूल्यों के प्रचार में लगी है, मीडिया उसका एक ताकतवर माध्यम है। मंगलेश डबराल ने कहा कि आज संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों को ऐसी सत्ताओं से अपने संबंध को पुनर्परिभाषित करना होगा। राज्य, पूंजी, बाजार या उसके उत्पाद और उसकी राजनीति के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध संगठित करना होगा।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि जो आतताई, निर्मम, लुटेरी और झूठ की सत्ता है, उसका होना ही मनुष्यता के प्रति अपराध है। उसके विकल्प के प्रति सोचना ही पड़ेगा। आज पूंजीवाद समाजवाद से लड़ने के लिए उसी सामंतवाद और धार्मिक प्रवृत्तियों का सहारा ले रहा है, जिसका कभी उसने विरोध किया था। हमारे पास जनता, समाजवाद और माक्र्सवाद से जुड़े लेखकों और संस्कतिकर्मियों के त्याग, समर्पण और संघर्ष की मिसालें हैं, उनकी स्मृति हमारी ताकत है, हमें उस ताकत के साथ मौजूदा सत्ताओं के खिलाफ खड़ा होना होगा। अन्याय और बुराई के खिलाफ जनता में जो बेचैनी और आक्रोश है, उसे अभिव्यक्ति देनी होगी। उद्धाटन सत्र में प्रलेस के महासचिव कमला प्रसाद, जलेस की केंद्रीय कार्यकारिणी की ओर से मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चैहान द्वारा भेजा गया शुभकामना संदेश भी पढ़ा गया। कवि आलोक धन्वा ने भी सम्मेलन के लिए अपना संदेश भेजा था, जिसका पाठ किया गया। सम्मेलन को जलेस के नासिर अहमद सिकंदर और प्रलेस के रवि श्रीवास्तव ने भी संबोधित किया। मंच पर वीपी केशरी, रविभूषण, राजेंद्र कुमार, रामजी राय, अशोक भौमिक आदि भी मौजूद थे। संचालन अवधेश ने किया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए विशिष्ट अतिथि सुप्रसिद्ध कवि नवारुण भट्टाचार्य ने कहा कि मुक्तिबोध और शंकर गुहा नियोगी को याद करते हुए आज फिर से ‘संघर्ष और निर्माण’ के नारे की याद आती है। जिस तरह से आज का साम्राज्यवाद और उसके देशी दलाल अपने स्वार्थ में आदिवासियों और देश के मेहनतकशों के लिए विनाश और विस्थापन का चक्र चला रहे हैं, उसके खिलाफ फिर उसी नारे के साथ उठ खड़ा होना वक्त की जरूरत है।
दूसरे दिन सांगठनिक सत्र की शुरुआत मसविदा दस्तावेज के पाठ से हुई। दस्तावेज की शुरुआत जनभाषा में अवधेश प्रधान द्वारा रचित एक गीत से हुई, जो अपने आप में जसम के लक्ष्य की ओर भी संकेत करता है। उस गीत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट के हित में भारतीय शासकवर्गों द्वारा की जा रही लूट और लूट को जारी रखने के लिए किए जा रहे बर्बर दमन के यथार्थ के साथ उसके खिलाफ एक ताकतवर जनप्रतिरोध का आह्वान है। दस्तावेज ने इसे चिह्नित किया कि अमेरिका अपने देश में बेरोजगारी दूर करने लिए भारतीय बाजार के आखेट में लगा है। ओबामा इसी मकसद से भारत आए थे। विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों, जंगल, पहाड़, जल, जमीन के दोहन, भारी पैमाने पर विस्थापन, पर्यावरण विनाश और जनसंहार की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जाहिर करते इस दस्तावेज में यह कहा गया कि आज पूंजीवादी लोकतंत्र के हर खंभे की निष्पक्षता और स्वायत्तता स्वांग लगने लगी है। न्यायपालिका तक सत्ता की राजनीति और पूंजी के तकाजों से घिरी नजर आ रही है। अयोध्या और यूनियन कार्बाइड मामले में जो फैसला आया है, वह इसी का उदाहरण है। पेड न्यूज, अंधविश्वास, युद्धोन्माद, सांप्रदायिकता के सहयोगी होने और जनांदोलनों के प्रति विरोधी रुख के कारण मीडिया की भूमिका भी जनपक्षधर नहीं रह गई है। अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी कंपनियों-एजेंसियों के साथ सरकार, संसद, सैन्यबल, नौकरशाही, वित्तीय संस्थाओं, एनजीओ और मीडिया के स्वार्थपूर्ण समझौतों तथा शैक्षणिक, बौद्धिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर ग्राम पंचायतों तक लूट और दमन की संस्कृति के विस्तार पर गहरी फिक्र जाहिर करते सम्मेलन के इस दस्तावेज में जनता के प्रतिरोध की संस्कृति को संगठित करने पर जोर दिया गया। किसानों की आत्महत्या और आनर किलिंग के संदर्भ में जसम की ओर से मजबूत सांस्कृतिक हस्तक्षेप की जरूरत पर भी दस्तावेज में जोर दिया गया।
दस्तावेज पर विचार विमर्श की शुरुआत करते हुए प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि आज आशा के जो स्रोत हैं, उन्हें भी याद करने की जरूरत है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ क्यूबा, वेनेजुएला जैसे देशों का प्रतिरोध और सेज के खिलाफ भारतीय जनता के प्रतिरोध को उम्मीद की तरह देखना होगा। उन्होंने कहा कि संघर्ष की छोटी सी छोटी कोशिशों को भी दर्ज करना होगा। उन्होंने कहा कि कला-संस्कृति की सारी विधाओं में जनता के जीवन की जो अभिव्यक्ति हो रही है, उसे एक सुचिंतित वैचारिक दिशा देनी होगी। समाजवाद आज और भी प्रासंगिक हो गया है। समाजवादी सपनों की दिशा में संस्कृतिकर्म को गति देनी होगी। उड़ीसा से आए राधाकांत, पश्चिम बंग गण सांस्कृतिक परिषद् के नीतीश, जेवियर कुजूर-झारखंड, राकेश दिवाकर, सुनील चौधरी-आरा, सूर्यनारायण-इलाहाबाद, सुरेश पंजम-लखनऊ, आशुतोष कुमार-दिल्ली, संजय जोशी-गाजियाबाद, शोभा सिंह-लखनऊ, पंकज चतुर्वेदी-कानपुर, कपिल शर्मा-दिल्ली, समता राय-पटना, जय प्रकाश नायर-छत्तीसगढ़, मंगलेश डबराल-दिल्ली और के.के.पांडेय-इलाहाबाद ने सांगठनिक सत्र में चले विचार विमर्श में हिस्सा लिया। सांगठनिक सत्र की अघ्यक्षता रामजी राय, राजेंद्र कुमार, शंभू बादल और रामनिहाल गुंजन ने की।
जसम के इस सम्मेलन में कला-संस्कृति की कई विधाओं और शैलियों की छटाएं देखी गई। कला का हर रंग इस स्वप्न को सामने ला रहा था कि कैसे देश दुनिया में जनपक्षधर व्यवस्थाएं निर्मित हों, किस तरह मानवीय सभ्यता-संस्कृति की प्रगति हो। जो है उससे बेहतर चाहिए, मुक्तिबोध की यह चिंता जैसे सम्मेलन के केंद्र में थी। मुक्तिबोध के चारों पुत्र- रमेश, दिवाकर, गिरीष और दिलीप सम्मेलन में आए, यह सम्मेलन एक सुखद संयोग था।

भारतीय चित्रकला के प्रगतिशील पक्ष से अवगत हुए दर्शक

प्रसिद्ध चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने भारतीय चित्रकला का प्रगतिशील पक्ष’ विषय पर काफी जानकारीपूर्ण और सरोकारों के लिहाज से अत्यंत उपयोगी व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय चित्रकला के इतिहास को, उस पर मौजूद राजनैतिक-आर्थिक प्रभावों का जिक्र करते हुए, पेश किया। धर्म, सामंती मूल्यबोध, मुगल और यूरोपीय कला से भारत की चित्रकला किस कदर प्रभावित रही और किस तरह बंगाल के भीषण अकाल और तेभागा आंदोलन के दौर में भारतीय चित्रकला में आम मेहनतकश जन के दुख-सुख और संघर्ष का दस्तावेजीकरण हुआ, इसकी भी उन्होंने चर्चा की। उन्होंने भारतीय चित्रकला को जनोन्मुख बनाने में कम्युनिस्ट पार्टी की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। अशोक भौमिक अपने कविता पोस्टरों के लिए भी चर्चित रहे हैं। जसम सम्मेलन स्थल पर लगाए गए राधिका-अर्जुन द्वारा बनाए गए पोस्टर उसी परंपरा को विकसित करने की एक कोशिश लगे।

कविता पोस्टरों के जरिए याद किए गए मशहूर कवि और शाय

यह वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप के मशहूर शायर फैज अहमद फैज,मजाज, हिंदी कवि नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय का जन्मशताब्दी वर्ष है। राधिका-अर्जुन ने उनकी कविताओं पर आधारित बडे़ प्रभावशाली पोस्टर बनाए थे। इन कविता पोस्टरों के जरिए इन शायरों और कवियों की विचारधारा, काव्य-संवेदना और उनकी प्रतिबद्धता से दर्शक रूबरू हुए। नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘प्रतिबद्ध हूं’ के संकल्प के साथ एक पोस्टर में यह दिशानिर्देश भी नजर आया कि ‘साधारण जनों से/ अलहदा होकर रहो मत/ कलाधर या रचयिता होना नहीं है पर्याप्त/ पक्षधर की भूमिका धारण करो।’ पोस्टरों में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘हरिजन गाथा’ के अंश थे तो शासकीय दमन के प्रतिरोध में उतरे मुक्ति सैनिकों की तलाश भी थी। फैज के मशहूर नज्म ‘लाजिम है’ का यकीन एक ओर था तो दूसरी ओर आदमी में मौजूद लोहे की ताकत का बयान करती केदारनाथ अग्रवाल की कविता का अंश तो तीसरी ओर शमशेर की कविता में मौजूद ‘वज्र कठिन कमकर की मुट्ठी में पथ प्रदर्शिका मशाल’। अधिकांश कविता पोस्टरों में साधारण मेहनतकश जनता की इंकलाबी ताकत के प्रति गहन आस्था की अभिव्यक्ति थी। रक्तपायी शासकवर्ग के हित में जनता की बदहाली, शोषण-दमन आदि के सवाल पर चुप रहने वाले साहित्यिक-कविजन, चिंतक, शिल्पकार आदि के प्रति सख्त आलोचना मुक्तिबोध के साथ-साथ सर्वेश्वर, गोरख, मायकोव्स्की, पाब्लो नेरुदा, आलोक धन्वा की कविताओं पर आधारित पोस्टरों में भी थी। गुर्राते हुए भेड़ियों के खिलाफ मशाल जलाने और बेजुबानों की आवाज बनने का आह्वान और संकल्प का इजहार भी थे ये पोस्टर।
सांगठनिक सत्र में मंच की दायीं ओर लगा मशहूर कवि और गायक पाल राबसन की कविता पर आधारित पोस्टर एक तरह से जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन के मकसद की अभिव्यक्ति था-

प्रत्येक कलाकार, प्रत्येक वैज्ञानिक
प्रत्येक लेखक को अब यह तय करना
होगा कि वह कहां खड़ा है
सुरक्षित आश्रय के रूप में कोई पृष्ठभाग
नहीं है.....कलाकार को पक्ष चुनना ही होगा।
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष, या फिर गुलामी- उसे
किसी एक को चुनना ही होगा....
और कोई विकल्प नहीं है।

लोकार्पण

नवारुण भट्टाचार्य ने जसम सम्मेलन की स्मारिका का लोकार्पण किया। जिसमें जन्मशताब्दी वर्ष वाले रचनाकारों के अतिरिक्त पहल के संपादक ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडेय, रघुवीर सहाय, निराला आदि की रचनाएं हैं। संपादन कैलाश बनवासी ने किया है। इस अवसर पर झारखंड के संस्कृतिकर्मी कालेश्वर गोप के कहानी संग्रह ‘मैं जीती हूं’ का लोकार्पण कैलाश बनवासी ने किया।
चित्र और मूर्ति प्रर्दशनी सम्मेलन में गिलबर्ट जोसेफ, सुनीता वर्मा, डीएस विद्यार्थी, एफ.आर. सिन्हा, बृजेश तिवारी, रश्मि भल्ला, जीके निर्मलकर और प्रांजली के चित्र तथा धनंजय पाल के चित्र प्रदर्शित थे, जो सम्मेलन का महत्वपूर्ण आकर्षण थे।

जनगीत, बाउल, डाक्युमेंटरी और फिल्म का प्रदर्शन

पश्चिम बंग गण परिषद की ओर से आए बाउल गायकों-नर्तकों ने अपनी प्रस्तुति के जरिए अद्भुत समां बांधा। भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन के महानायक का. रामनरेश राम के निधन के तुरत बाद बनाई गई नीतिन की डाक्यूमेंटरी और ईरानी फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ भी सम्मेलन में दिखाई गई। शहीद गुरु बालकदास बाल मंच (जामुल/छत्तीसगढ़) और हिरावल (भिलाई) के बालकलाकारों की प्रस्तुति जितनी मनमोहक थी, उतना ही भविष्य की संभावनाओं से लैस थी। सम्मेलन में हिरावल (भिलाई), हिरावल (बिहार), दस्ता(इलाहाबाद) और युवानीति (आरा) के कलाकारों ने जनगीत पेश किए।

कविता पाठ

सम्मेलन के आखिरी सत्र के आरंभ में कविता पाठ हुआ, जिसमें नवारुण भट्टाचार्य ने अपनी बहुचर्चित कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश' का अंश सुनाया। मीता दास ने हिंदी में अनुदित उनकी कविताओं का पाठ किया। मंगलेष डबराल ने टार्च, भूख और भूत, मैं तैयार नहीं हूं, दरवाजे और खिड़कियां जैसी अपनी प्रसिद्ध कविताओं को सुनाया। विनोद कुमार शुक्ल ने भी अपनी तीन कविताओं का पाठ किया, जिसमें हमारे दौर की कई ज्वलंत समस्याओं को लेकर चिंता मौजूद थी। शोभा सिंह ने कश्मीर के हालात पर रची गई दो कविताओं और शमशेर की याद में लिखी गई अपनी कविता का पाठ किया। रमाशंकर विद्रोही ने नूर मियां के सूरमे और मानव सभ्यता में स्त्रियों के उत्पीड़न और दमन के खिलाफ लिखी गई अपनी लंबी कविता का पाठ किया। राजेंद्र कुमार की कविता में शासकों-प्रशासकों की खबर ली गई थी तो शंभू बादल की छोटी कविताएं जनजीवन की छोटी-छोटी उम्मीदें को बटोरने की एक कोशिश थी।
सम्मेलन का समापन हिरावल (बिहार) द्वारा गोरख पांडेय की स्मृति में रचित दिनेष कुमार शुक्ल की कविता ‘जाग मेरे मन मछंदर’ के गायन और हिरावल (भिलाई) द्वारा ‘अंधेरे में’ कविता की नाट्य प्रस्तुति से हुआ।
सम्मेलन में लेनिन पुस्तक केंद्र (लखनऊ), गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और समकालीन जनमत की ओर से बुकस्टाल भी लगाए गए थे।

--सुधीर सुमन