Monday, July 20, 2009

उदय प्रकाश प्रकरण : भ्रष्ट आचरण को ट्रेंड बनाने की कोशिश

उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर उदय का निरंतर प्रलाप और उनके समर्थन में आई टिप्पणियों दोनों से जाहिर होता है। इतवारी जनसत्ता में भी उन्होंने एक ब्लॉगर से ऐसा ही कुछ लिखवाया है। इस ब्लॉगर का कहना है कि कई बड़े साहित्यकार अपने समय के तानाशाहों के कसीदे काढ़ चुके हैं, लेकिन उनके रचनाकर्म पर बात होती रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बहुत से लेखक हैं जिन्होंने भाजपा शासित राज्यों में साहित्यिक क्षेत्र के मुनाफे कमाये हैं। तो क्या कहने का मतलब है कि गू खाना पुरानी परम्परा है, सो हमने भी खा लिया और यही ट्रेंड के रूप में माना जाना चाहिए।
हैरत यह भी है कि जिस ब्लॉगर ने यह लेख लिखा है, वह पहले उदय प्रकाश की करतूत पर नाराजगी जता चुका है लेकिन फिर वो उदय प्रकाश के घर गया और उसे उनकी आंखों के कोर में अपने सही रास्ते का इलहाम हो गया। इस ब्लॉगर का कहने के मुताबिक यह मान लिया जाए कि उदय प्रकाश का विरोध करने वालों में कई बेदाग़ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस मुद्दे पर विरोध का अधिकार नहीं है। ऐसा है तो इस ब्लॉगर का निकट इतिहास ही बलात्कार के गंभीर आरोपों से बदनुमा है, फिर वो किस नैतिकता से यह फरमान जरी कर रहा है?
जनसत्ता के इस लेख में हिन्दी लेखकों को इस नाते असिह्ष्णु माना गया है कि उन्होंने उदयप्रकाश की चुप्पी को ग़लत ढंग से लिया और उनसे कुछ जानने की जरूरत नहीं समझी। अब इससे से बड़ा झूठ ही शायद कोई हो। उदय प्रकाश जब योगी के हुजूर से लौटे तो उनका ब्लॉग यह जानकारी नहीं दे रहा था। किसी भी तरह के करियरिज्म से दूर रहे बेमिसाल पत्रकार अनिल यादव (जो जनसत्ता के लेखक के मुताबिक नौजवान हैं और इस नाते लेखक दुधमुहाँ है ) ने इस बारे में गोरखपुर के अख़बारों में छपी ख़बर और फोटो को ब्लॉग पर छाप दिया था तो उदय प्रकाश हिंसा पर उतारू हो गए थे। पुरस्कार वो लाए थे और इस ख़बर को दूसरों की साजिश बता रहे थे, अनिल यादव को नौकरी से निकलवाने की धमकी दे रहे थे और इस घटना का विरोध करने वाले लेखकों को लांछित करा रहे थे। यह उनके परिवार के संघ की मजबूती के लिए उठा कदम था और योगी इस संघ की प्रेरणा शक्ति थे (हैं )। बाद में उनका सफाईनामा और उसके समर्थन में उनके द्वारा छापे जा रहे कमेन्ट भी गज़ब हैं। कई तो योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बना दे रहे हैं और लगभग सभी सेकुलरिज्म को गरियाते हुए उदय प्रकाश-आदित्यनाथ कंपनी को जायज ठहरा रहे हैं। उदय प्रकाश इन समर्थकों के शुक्रगुजार हैं।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि कभी अटल बिहारी और कभी सोनिया के कसीदे पढ़ चुके नट के हुनर से लोग जल रहे हैं. कमाल यह भी है कि इस भयानक मसले में असली मुद्दे को दरकिनार करने के लिए `कौन दूध का धुला है` और `विरोध करने वालों में कितने बिरहमन-कितने कायस्थ` आदि सवाल उठाने वालों में ऐसे लोग भी हैं जिनसे आदित्यनाथ जैसे मसले पर जिम्मेदारी की उम्मीद की जा सकती थी. कुछ लोग कह रहे हैं कि बात ठीक है पर व्यक्तिवादी बात न हो. तो क्या हिटलर को हिटलर कहना व्यक्तिवादी निंदा होगी?
कुछ लोगों को विरोध और गुस्से की भाषा पर एतराज है और वीरेन डंगवाल की टिप्पणी का खासकर ज़िक्र किया जा रहा है। नफरत और आतंकवाद के सरगना को लेकर कौन से शालीन भाव व् शब्द मन में उठते हैं, यह अशोक वाटिका और संघ परिवार के लोग ही बता सकते हैं। सवाल तो यह उठता है कि इस मसले पर संतुष्ट किस्म की चुप्पी साधे बैठे बहुत से बड़े लेखक जिनमें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव और दूसरे तमाम लेखक कब अपना रुख जाहिर करेंगे (`संतो कुछ तो कहो इस गाढ़े वक़्त में `)।
दरअसल यह मसला सांप्रदायिक ताकतों के उभार के बाद लेखकों के एक तबके में यह साफ़ हो जाने का है कि अब धर्मनिरपेक्षता से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। पहले लेखकों का हिन्दुवाद थोड़ा सफाई के साथ सामने आ रहा था, मगर अब उदय प्रकाश ने जरा आगे बढ़कर खुलेआम इस डेरे की शरण ले ली (हालाँकि निर्मल verma कुछ राह दिखा ही गए थे और कई दोयम पहले ही उस डेरे में बैठ भी चुके थे) । एक तरह से उन्होंने असमंजस में रहे लोगों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। वे साहित्य के जोर्ज फर्नाडीज कहे जा सकते हैं। देखना है कि अब उनके पीछे कितने लोग इस ट्रेंड का अनुसरण करते हैं।

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जनसत्ता शायद हर न्यायकारी आवाजों पर हमले करने का मंच बन गया है. पांचजन्य का `बौद्धिक` वहां छपता ही रहता है. सरकारी हत्यारे गिरोह सलवा जुडूम द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान आयोजित करने के नाटक और उसमें कई लेखकों के शामिल होने का कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने विरोध किया था। इस कदम का न्याय की पक्षधर शक्तियों ने स्वागत किया है पर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। यह पुराने अफसर का स्वाभाविक अफसर प्रेम भी है और उनका हमेशा परगतिशील जनपक्ष का विरोधी होने का भी.

--इस बीच ख़बर यह है की गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया है की उन्होंने उदयप्रकाश को समझाया था की वे उनसे ईनाम न लें क्योंकि इससे उनके वामपंथी साथी नाराज हो जायेंगे।

9 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

saval yah bhii poochana chaahiye avinash se ki itihaas me kya darz hoga...aankho ki kor kii baadh yaa fir manch se saanskritik raashtravaad kii dahad.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

is jagah chali ek aisii hii bahas dekhiye

http://mohalla.blogspot.com/2009/07/blog-post_18.html

अंशुमाली रस्तोगी said...

जनसत्ता जैसा थका हुआ अखबार ऐसे ही थके लेखकों को छापकर महान हो जाना चाहता है।

pankaj said...

आपने बहुत शानदार, निर्भ्रान्त और दृष्टि-संपन्न ढंग से लिखा है. सवाल किसी की व्यक्तिगत आलोचना का है ही नहीं ; सवाल यह है कि क्या अब हिन्दी के सम्मानित
और प्रतिबद्ध साहित्यकार साम्प्रदायिक दंगों के लिए ज़िम्मेदार और 'उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देंगे ' जैसे फ़ासीवादी बयान देनेवाले सामन्ती, कट्टर हिन्दुत्ववादी और हिंस्र तत्त्वों के हाथों सम्मानित होना पसंद करने लगेंगे ? ऐसे तत्त्वों के तो संपूर्ण बहिष्कार की ज़रूरत है . उदय प्रकाश तो इतने बड़े रचनाकार हैं कि उन्हें इस तरह के
सम्मानों की क़तई ज़रूरत न थी , न है . क्षमा -याचना की बात करने की बजाए सबसे अच्छा और स्वागत-योग्य यह होगा कि वे यह सम्मान तुरंत लौटा दें ! इससे उनका सम्मान और बढ़ जाएगा और वे समूची नयी पीढ़ी के सर्वथा असंदिग्ध और समुज्ज्वलतम आदर्श की तरह सामने आ सकेंगे . यह बात सबसे ज़्यादा समझने की है कि इस पूरे प्रकरण से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उदय प्रकाश जी के सबसे अन्तरंग साथियों , उनके सबसे बड़े लेखक-शुभचिन्तकों को ही हुई है ------मुझे व्यक्तिशः लगता है कि उनके ब्लॉग पर लगातार उनकी तारीफ़ और तथाकथित समर्थन करनेवाले अगर उनके 'fans' हैं ; तो जिन लोगों को इस प्रकरण से तकलीफ़ है , वे लोग निश्चय ही उदय प्रकाश जी के उनसे भी बड़े 'fans' हैं . मुझे यक़ीन है कि उदय जी
व्यापक जन-हित और मूल्यनिष्ठता की ख़ातिर यह कथित 'सम्मान ' ज़रूर वापस करेंगे !
---------पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

अशोक कुमार पाण्डेय said...

पंकज जी अब तो यह लग रहा है कि उन्हें पाठकों की नही अभिधा में पंखों की ही फिक्र है।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह ख़बर भी बताईये कि परमानन्द वहां भाग लेने नहीं इन्टर्व्यू के लिय ेगये थे…और इससे बेहतर जगह कहां मिलती वहां?

कुछ वक़्त पहले जब योगी का पैर छू रहे थे तो भी शायद किसी लेखिका का गिफ़्टेड पेन ढूंढ रह ेथे।

Anonymous said...

Udai Prakash ek Ahankari Lekhak hain. Unke andar ka samantvad unke blog mein bakhuhi ubharkar aya. Samantivadi sanskar ek din ki den nahi hote voh unake andar the. 42 salon tak Samyavad ki seva ka dava ek ek dhokha aur swayam ke sath sath sahitya ke sath vishwashghat. Aj unaka mukhauta utar gaya. Yadav ko dhamaki dena unka pahala kukritya nahi. Pahale bhi voh yeh sab karate rahe hain. Arthikrup se tang rahane aur bekari ka dansh jhelane ki unaki baat mein dam nahi. Kisi bhi achhe lekhak se adhik unaki aay hai. Unase puchhiye ais kaun kar raha hai. Au voh itane mahan nahi ki Vishwavidyalay unhe apane aaj ke niyamon ko dar kinar kar rakh lete jaisa ki unaka rona hai. Voh Hazari Prasad kab se ho gaye? Aur Rajendra ki chuppi--- voh to pahale Lalu Prasad jaise sampradayik se upkrit huye baithe hai. Aur Namavar Ji --- voh muh dekhkar bolate hai. Uadai unake chahete rahe hain baavjud JNU Udai ko unhone isliye nahi lagane diya kyonki voh Pratibhashaliyon ko bardasht nahi kar sakate . Uadai pratibhashali hain, lekin unki pratibha ne galat mod le liya hai aur ab voh PATAN ki or unmukh hai. Har ahankari ka patan hota hi hai aur har Chhadma Marxwadi ka mukhauta ek din utarata hi hai.

Sukrati Rai

Ek ziddi dhun said...

दोस्तो, योगी का बयान आने के बाद भोले पाठकों के लिए भी तस्वीर साफ़ हो गई होगी. धूर्त तो पहले ही सब जानते-समझते हुए भी उदय की महिमा का गान कर रहे थे. इस के शीर्षक पर कुछ दोस्तों को एतराज है. जाहिर है यह गुस्से में लिखा गया है और इस गुस्से की वजह भी साफ़ है. बहरहाल शीर्षक से एक शब्द मैं बदल दे रहा हूँ.
इस मसले पर दो अन्यत्र छपे लेख दोस्तों ने मेल किए थे जो किसी वजह से लगा नहीं सका था, उन्हें रिकॉर्ड के नाते लगाऊंगा लेकिन फिलहाल गंगुबाई हंगल जी की स्मृति में शाम तक पोस्ट देने की कोशिश की जा रही है.

S.C.kushwaha said...

jansatta me chhapi Avinash ji ki hindi ke lekhakon ki lanat- malanat jaisi tipadi per mere kuchh sawal the aur maine ek tippadi Jansatta me bhej di thi. Use roke rakkha gaya aur nahi chhapa jayega, puchane per bataya bhi nahi gaya . Khair, ab tak to saf ho chuka hai ki Gorakhpur ka karyakram na to parivarik tha, na keval samman lene tak simit tha. Bhai Udai Prakash ne wohan sanskritik rastrvad per bola bhi. Usaki vakalat ki . wohan kard me Unka nam ayojakon ki taraf se Udai Prakash Singh chhapa gaya tha.Bhai Udai Prakash ki kahaniyon ka prasanshak hone ke nate mujhe afasos hai aur yeh tippadi matra isliye hai ki ki we apne mahan kathakar ko jinda rakhate. Adig rahen. Yogi jaise log to Manav virodhi hai. Yogi purvanchal ke Modi hain. Unke pas jane se ek vichardhara ka poshan hi hoga, samaj me lekhakon ki chhavi kharab hogi. Ummid hai age woh isse bachenge .