Monday, November 10, 2008

विष्णु नागर की एक पुरानी कविता



मेरे भाई ने लिखी चिट्ठी
लिखा आना
आना कि इस बार
बहन भी आ रही है
आना तो ख़ूब मज़ा रहेगा

गांव से भाई कहे आना
तो मैं क्यों न जाऊं?

मैं आऊंगा भाई
सोचना मत कि कैसे आऊंगा
800 मील की दूरी भी
बीड़ी पीते पार हो जायेगी
बीड़ी फिर भी न होगी खत्म
(1977-78)

Saturday, November 8, 2008

आबिद आलमी की दो गज़लें



आबिद आलमी यानी रामनाथ चसवाल. ४ जून १९३३ को रावलपिंडी की गूज़रखान तहसील के ददवाल गाँव में पैदा हुए और १९४७ में हरियाणा (तब पंजाब का ही हिस्सा) आये. शायरी को बेहद पाक मानते हुए शायर होने के `दंभ' से पूरी तरह दूर रहे और सुखन के कारोबारियों का क्या पड़ी कि उन पर गौर फरमाते. फिर विभिन्न कॉलेजों में अंग्रेजी अध्यापन और बतौर शिक्षक संगठनकर्ता दिन-रात खपते हुए आलमी साहब को इस सबकी की परवाह करने की फुर्सत भी नहीं थी. वे बीमारी से जूझते हुए ९ फरवरी १९९४ को दुनिया से रुखसत हुए. प्रदीप कासनी की कोशिशों से उनका संग्रह `अलफाज़' आधार प्रकाशन से साया हुआ है.

(1)
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घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक
बनाओगे इन्हें अख़बार की यों सुर्खियाँ कब तक

यूँ ही तरसेंगी बाशिंदों की खूनी बस्तियाँ कब तक
यूँ ही देखेंगी उनकी राह गूंगी खिड़कियाँ कब तक

नहीं समझेगा ये आखिर लुटेरों की जुबां कब तक
हमारे घर को लुटवाता रहेगा पासबाँ कब तक

रहीने-कत्लो-गारत यूँ मेरा हिन्दोस्तां कब तक
लुटेंगी अपनों के हाथों ही इसकी दिल्लियाँ कब तक

कहो सब चीखकर हम पर बला का कहर टूटा है
कि यूँ आपस में ये सहमी हुई सरगोशियाँ कब तक

गिरा देता है हमको ऊंची मंजिल पर पहुँचते ही
हम उसके वास्ते आखिर बनेंगे सीढियाँ कब तक

यूँ ही पड़ती रहेगी बर्फ़ ये कब तक पसे-मौसम
यूँ ही मरती रहेंगी नन्ही-नन्ही पत्तियाँ कब तक

कहीं से भी धुआं उठता जब घर याद आता है
यूँ ही सुलगेंगी मेरी बेसरो-सामानियाँ कब तक

हमारे दम से है सब शानो-शौकत जिनकी ऐ `आबिद'
उन्हीं के सामने फैलायेंगे हम झोलियाँ कब तक


(2)
रात का वक़्त है संभल के चलो
ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो

रास्ते पर जमी हुई है बर्फ़
अपने पैरों पै आग मल के चलो

राह मकतल की और जश्न का दिन
सरफ़रोशो मचल मचल के चलो

खाइयाँ हर कदम पे घात में हैं
राहगीरो संभल संभल के चलो

दायें बायें है और-सा माहौल
राह `आबिद' बदल बदल के चलो

Painting : Iraqi artist, Jabel Al-Saria, 2006.

Monday, November 3, 2008

`ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए`



मनमोहन की कविता और उसका मिज़ाज - असद ज़ैदी
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एक कवि और कवि-चिन्तक के रूप में मनमोहन काफी समय से मशहूर हैं ; उनकी अपनी तरह की शोहरत रही है- ऐसी शोहरत जो शोहरत के औजारों का इस्तेमाल किए बिना, सिर्फ़ उनके काम की पहचान से बनी है। तब भी वरिष्ठ होने के कगार पर खड़े हिन्दी कवियों में मनमोहन ही ऐसे हैं जिनका नाम अक्सर सूचियों में नहीं होता। हिन्दी का आलोचना प्रतिष्ठान, जो इन फेहरिस्तों को वक्त-वक्त पर जारी करता है, आम तौर पर वोटर लिस्ट के नवीनीकरण की पद्धति से काम करता है; या तो जब उनके आदमी मोहल्लों में आए हुए हों तो आप घर और मुहल्ले में मौजूद मिलिए या निश्चित तिथि तक उनके दफ्तर जाकर विधिवत प्रार्थनापत्र देकर और समुचित प्रमाण संलग्न करके अपना नाम दर्ज करा आइये। फिर यह चौकसी रखिये कि आपका नाम, पता, उम्र वगैरा सही सही दर्ज हैं या नहीं - कई बार दर्ज नाम तकनीकी आधारों पर खारिज हो सकता है। मनमोहन का नाम अब से तीन-चार पहले तक फेहरिस्तों में अगर नहीं था तो मनमोहन की अपनी लापरवाही या बेगानगी तो एक गौण कारण है: एक कारण बताया जाता था कि एक सुनिश्चित पते - यानी पुस्तक रूप में प्रकाशित संग्रह - का अभाव। आखिरकार ढाई साल पहले उनका कविता संग्रह `ज़िल्लत की रोटी` एक नामी प्रकाशनगृह से छपकर आया और यह झंझट ख़त्म हुआ। अब अध्यापकों और आलोचकों के रजिस्टरों में उन्हें हाज़िर दर्ज किया जाता है। पर यह एक मामूली रद्दो-बदल है।

मनमोहन के सिलसिले में वोटर लिस्ट या हाज़िरी रजिस्टर के रूपक खींचने के पीछे एक वजह और एक मंशा है। जैसा कि ज़िक्र हुआ है, मैं नहीं समझता कि हिंदी कविता का पाठक मनमोहन की कविता से परिचित नहीं था या उनके समकालीन कवि उनकी उपस्थिति से नावाक़िफ़ थे। उनकी आवाज़ अपनी पीढ़ी की प्रतिनिधि आवाज़ों में है। उनमें शुरू से ही हर अच्छे और रैडिकल युवा कवि की तरह उपलब्ध काव्य संसार के प्रति असंतोष का जज़्बा और उसके नैतिक पुनर्गठन की ज़रूरत का अहसास रहा है। यह उनका एक बुनियादी सरोकार है। वह उन गिने चुने कवियों में हैं जिन्होंने समकालीन हिंदी कविता के व्याकरण और मुहावरे को बनाने का और पुराने नियमों और परिपाटियों को बड़ी समझदारी से और धैर्य के साथ बदलने का बुनियादी काम किया है। उनकी कविता सत्तर और अस्सी के दशक में उभरी समकालीन कविता के अवचेतन में समाई हुई है। इस तरह की मौजूदगी और इसकी एतिहासिकता समकालीन हिंदी कविता की मूल्यवान धरोहर है।
लिहाज़ा यह एक विचारणीय विषय है क जो कविता अपने समय की रचनाशीलता के संवेदन बिंदुओं बल्कि स्नायु तंत्र के इतना नज़दीक रही है, वह आलोचना, शोध और विवेचना की स्थापित व्यवस्थाओं की पहुंच से इतना दूर क्यों थी? इस सवाल का संबंध हमारे साहित्य के समाजशास्त्र से भी है और संस्कृति की राजनीति से भी। हिंदी साहित्य की शोध और विमर्श की विभिन्न परंपराओं के बीच इतिहास और संस्कृति के बुनियादी सवालों को लेकर एक डरावनी और दीर्घकालीन सहमति का माहौल है। हिंदी भाषा और साहित्य के राज्य-समर्थित और वेतन-पोषित उद्योग से जुड़े लोगों के दरम्यान प्रगतिशीलता, यथास्थितिवाद और दक्षिणपंथी परंपरावाद एक दूसरे के विकल्प बनकर कम, पूरक बनकर ज़्यादा आते हैं - इनकी ट्रेड यूनियन एक है और नई यूनियन कभी बनी नहीं। मनमोहन की कविता और आलोचना इस सुलह (या अकबरकालीन `सुल्हे-कुल') को चुनौती देती है। हिंदी की लोकतांत्रिक समकालीन कविता और आलोचना व्यवस्था के बीच, या दूसरे शब्दों में सार्थक, प्रतिबद्ध रचनाशीलता और हिंदी प्रतिष्ठान के बीच जो मूल अंतर्विरोध है, वह इसी `पोलिटकल इकोनमी' से निकलता है। नेहरू-युग में ही फल-फूलकर परवान चढ़ चुकी इस राजनीतिक-सांस्कृतिक सर्वानुमति के मद्देनज़र आलोचनात्मक और काव्यात्मक विपक्ष का काम भी कवि-रचनाकार को ही करना पड़ा है - न सिर्फ़ काव्य-व्यवहार के बल्कि चिंतन और विमर्श के स्तर पर, और काव्यालोचना के स्तर पर। मुक्तिबोध से शुरू होकर रघुवीर सहाय से होता हुआ यह सिलसिला मनमोहन तक चला आता है।
इस अर्थ में मनमोहन की उपस्थिति गौण उपस्थिति नहीं, अपने दौर की एक प्रधान और प्रभावशील उपस्थिति है। उन्होंने प्रगतिशील और जनवादी परंपरा की हिफ़ाज़त करने और नई परिस्थिति में उसकी जोत जलाए रखने का काम किया है। यह काम सिर्फ़ वैकल्पिक राजनीति की हिमायत में खड़ा होना नहीं है, बल्कि कविता और काव्य चिंतन के मैदाने-अमल में इसको तब्दील करने, अपनी राह ढूंढने और रास्ता बनाने का काम है। जो इस खामोश मेहनत को नहीं पहचानते, वे मनमोहन की कविता की गहराइयों और मुश्किलों को ठीक से नहीं देख पाएंगे। ग़ालिब का एक अमर शे`र - जो अक्सर अमर चीज़ों की तरह आजकल भुला दिया गया है - याद आता है :
नश्वो-नुमा है अस्ल से ग़ालिब फ़ुरो` को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए

ग़ालिब ने ख़ामोशी को जड़ (मूल, अस्ल) और बातों को उससे निकलती टहनियां (फ़ुरो`,शाखें) कहा है। मनमोहन के काम में और उनके काम की दुनिया में ख़ामोशी और बातों का रिश्ता ठीक एसा ही है।
इस टिप्पणी के अंत में मैं वे बातें दोहरा दूं जो मैंने `ज़िल्लत की रोटी' के प्रकशन के मौके पर कही थीं। ये मनमोहन के रचना संसार की संपूर्णता या उसकी चुनौतियों का अहाता तो नहीं करतीं, पर उनकी कविता की कुछ ख़ूबियों को ज़रूर बयान करती हैं :
मनमोहन की कविता में वैचारिक और नैतिक आख्यान का एक अटूट सिलसिला है। उनके यहां वर्तमान जीवन या दैनिक अनुभव के किसी पहलू, किसी मामूली पीड़ा या नज़ारे के पीछे हमेशा हमारे समय की बड़ी कहानियों और बड़ी चिंताओं की झलक मिलती रहती है : वह मुक्तिबोधियन लैंडस्केप के कवि हैं। उनकी भाषा और उनके शिल्प को उनके कथ्य से अलग करना नामुमकिन है। यहां किसी तरह की कविताई का अतिरिक्त दबाव या एक वैयक्तिक मुहावरे के रियाज़ की ज़रूरत नहीं है, एक मुसलसल नैतिक उधेड़बुन है जो अपने वक्त की राजनीतिक दास्तानों और आत्मीय अनुभवों के पेचदार रास्तों में गुज़रकर उनकी भाषा और शिल्प को एक विशिष्ट `टेक्सचर' और धीमा लेकिन आशवस्त स्वर, और एक वांछनीय ख़ामोशी प्रदान करती हैं। मनमोहन अपनी पीढ़ी के सबसे ज़्यादा चिंतामग्न, विचारशील और नैतिक रूप से अत्यंत शिक्षित और सावधान कवि हैं। एक मुक्तिबोधीय पीड़ा और महान अपराधबोध उनके काव्य संस्कार में हैं, इन्हें एक रचनात्मक दौलत में बदलने की प्रतिभा और तौफ़ीक़ उनके पास है, और इनका इस्तेमाल उन्होंने बड़ी विनम्रता, वस्तुनिष्ठता और सतर्कता से किया है।
मनमोहन उस जगह के कवि हैं जहां `अपनी आवाज़ ने बताया/कितनी दूर निकल आये हम/अपनी आवाज़ ने बताई/निर्जनता'। वह ऐसे समय के कवि हैं जहां `अगर जीवित मित्र मिलता है/उससे ज़्यादा उसकी स्मृति उपस्थिति रहती है।' जहां मां एक `अजनबी स्त्री के वेश में' आकर अपने गंजे होते अधेड़ बेटे को `सपने में जगाती है' और `भूखी हूं' यह `पूरे तीस साल बाद' बताती है। जहां शोकसभा में आये लोग ख़ुद `पहले ही कहीं जा चुके हैं'। या जहां लोग कभी मिल नहीं पाते, सिर्फ़ उनकी छायाएं आपस में मिलती हैं।
मनमोहन की कविता में एक `गोपनीय आंसू' और एक `कठिन निष्कर्ष' है। इन दो चीज़ों को समझना आज अपने समय में कविता और समाज के, राजनीति और विचार के, और अंतत: रचना और आलोचना के रिश्ते को समझना है।

मनमोहन की कुछ कविताएं

मेरी ओर

मैं तुम्हारी ओर हूं

ग़लत स्पेलिंग की ओर
अटपटे उच्चारण की ओर

सही-सही और साफ़-साफ़ सब ठीक है
लेकिन मैं ग़लतियों और उलझनों से भरी कटी-पिटी
बड़ी सच्चाई की ओर हूं

गुमशुदा को खोजने हर बार हाशिए की ओर जाना होता है
कतार तोड़कर उलट की ओर
अनबने अधबने की ओर

असम्बोधित को पुकारने
संदिग्ध की ओर
निषिद्ध की ओर
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यकीन

एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया

हिसाब
एक दिन सामने आएगा

जो बीच में ही चले गए
और अपनी कह नहीं सके
आएंगे और
अपनी पूरी कहेंगे

जो लुप्त हो गया अधूरा नक्शा
फिर खोजा जाएगा
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उम्मीद

आज
कमरे का एक कोना छलक रह है

माँ की आँख
बालक का हृदय छलक रहा है

छलक रह है एक तारा
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इच्छा

एक ऐसी स्वच्छ सुबह मैं जागूँ
जब सब कुछ याद रह जाय

और बहुत कुछ भूल जाय
जो फालतू है
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अपनी आवाज़ ने

अपनी आवाज़ ने बताया
कितनी दूर निकल आये हम

अपनी आवाज़ ने बताई
निर्जनता
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हमारा जातीय गौरव

आधी से ज़्यादा आबादी
जहां खून की कमी की शिकार थी
हमने वहां ख़ून के खुले खेल खेले

हर बड़ा रक्तपात
एक रंगारंग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ

हमने ख़ूब बस्तियां जलाईं
और खूब उजाला किया

और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा
देखो, दुनिया के लोगो
देखो हमारा जातीय गौरव!
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उसकी थकान

यह उस स्त्री की थकान थी
कि वह हंस कर रह जाती थी

जबकि वे समझते थे
कि अंतत: उसने उन्हें क्षमा कर दिया है
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उसकी पीठ

उसकी पीठ
जब जाने के लिए मुड़ती है
तो उसी क्षण एक सूनी, अकेली और निष्ठुर जगह बनाती है
जो अनिवार्य है

जाते हुए उसकी पीठ को देखना
ठीक ठीक सबसे ज़्यादा अपने साथ होना है
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तुम्हारा प्यार

यह स्त्री डरी हुई है
इस तरह
जैसे इसी के नाते
इसे मोहलत मिली हुई है

अपने शिशुओं को जहां-तहां छिपा कर
वह हर रोज़ कई बार मुस्कुराती
तुम्हारी दूरबीन के सामने से गुज़रती है

यह उसके अंदर का डर है
जो तुममें नशा पैदा करता है

और जिसे तुम प्यार कहते हो
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Sunday, October 26, 2008

सड़ांध मार रहे हैं तालाब


तहलका कांड के खुलासे के बाद कई लोग हैरत जैसा भाव दिखा रहे थे और बीजेपी व संघ खानदान की बोलती कई दिनों तक बंद थी। हालांकि जो हैरत दिखा रहे थे, हैरत उन्हें भी नहीं थी। मालेगांव विस्फोट में हिंदुत्ववादी कारकुनों और किसी साध्वी के खिलाफ सबूत मिलने पर भी फिलहाल संघ खानदान थोड़ा सकते में है (हालांकि, वह जानता है कि कुछ होने-जाने वाला नहीं है, उसे समाज के सांप्रदायिक हो चुकने पर सही ही गहरा भरोसा है)। पर बहुत से लोग हैरत दिखा रहे हैं - `अच्छा, हिंदुत्ववादी भी एसा कर सकते हैं, हम तो सोच भी नहीं सकते थे`, वगैरह, वगैरह। पर क्या वाकई उन्हें कोई हैरत है! देश के विभाजन और गांधी की हत्या के बाद भी क्या कुछ छिपा रह गया था? जिसे हमारा मीडिया और हमारा समाज संघ-बीजेपी आदि का हिडन एजेंडा कहता रहा क्या वह हमेशा ही पूरी तरह साफ खुला अभियान नहीं था? बाबरी मस्जिद ढहाने केबाद भी सांप्रदायिकता के कितने खूनी खेल संघ परिवार ने खेले और मीडिया, समाज और राजनीति की स्वीकार्यता भी अपने इन कृत्यों के लिए हासिल कर ली। इन दिनों हमने देखा कि सेक्युलरिज्म की राजनीति करते रहे मुलायम, माया और तमाम दूसरे नेता भी जब चाहते हैं बेझिझक सांप्रदायिक गाड़ी पर सवार हो लते हैं, यह जानते हुए कि मुसलमान के पास अब रास्ता ही क्या है(हालांकि ढिंढोरा मुस्लिम तुष्टिकरण का ही सबसे ज्यादा पीटा जाता रहा है)। पूरी तरह आइसोलेशन में धकेल दिए गए मुसलमानों के आतंकवादी होने का प्रचार भी हम खूब जोरशोर से करते रहे (हालांकि हालात हमने उनके आतंकवादी हो जाने के ही पैदा कर रखे हैं) और हिंदुत्वावदी आतंकी तांडव पर फूले नहीं समाते रहे।
हैरत तो यह भी नहीं है कि संघी प्रचार में वो लोग भी शामिल रहे हैं जिनके चेहरे बेहद शालीन, अत्यंत मृदु और अति भद्र हैं और जो अपनी गांधीवादी उदारता में बस बेमिसाल हैं। गीतफरोश भवानी भाई के साहबजादे और `तालाब भी खरे हैं` वाले गांधीवादी मार्का अनुपम मिश्र भी अपनी गांधीवादी चेयर पर बैठकर फरमा सकते हैं कि हिंदू तो उदार है और मुस्लिम स्वभाव से ही आतंकवादी है। दरअसल दो बरस पहले अखबार के काम के सिलसिले में उनके पास गांधी पर एक छोटे इंटरव्यू के लिए गया था तो वे भगत सिंह पर पिल पड़े थे और फिर कहने लगे थे कि भगत सिंह सही हैं तो फिर लादेन को भी सही कहना पड़ेगा। बात विषय से भटक चुकी थी और उनके साथ मैं भी। बजरंग दल और गुजरात का जिक्र आया तो उन्होंने कहा- हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, मुसलमान जहां भी हैं, वहां आतंकवाद हैं। उनके इस एकांगी और नफरत भरे नजरिये से मैं गहरी वितृष्णा में रह गया और मैंने महसूस किया कि तालाब खरे नहीं हैं बल्कि उनमें भारी सड़ांध है। मुझे समझ में आया कि कैसे कांग्रेस में हमेशा संघ मजे से फलत-फूलता रहा, कैसे गांधी की हत्या में कांग्रेस के ही मंत्रियों की भूमिका घिनौनी रही, कैसे नेहरू बार-बार सांप्रदायिकता से लड़ाई के मसले में अपनी ही पार्टी में अकेले पड़ते रहे। मुझे अचानक अपने स्कूल के समय के अपने गांधी, विनोबा और जेपी के अनुयायी कई खद्दरधारी सर्वोदयी टीचर याद आए कि कैसे वो संघ के अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे थे। मुझे वो सीध दिखाई पड़ी जो संघ, कांग्रेस और आर्यसमाज व दूसरे एसे संगठनों में है और जो अब आम जन के मन तक बन चुकी है। खैर अब ये इंटरव्यू छपने लायक तो था नहीं पर मेरे मन में यह छप चुका था। भला अनुपम मिश्र को अब कोई हैरत हो रही होगी?

Tuesday, October 14, 2008

मनमोहन की दो पुरानी कविताएं


कवि-लड़का (मनमोहन का मथुरा के छात्र दिनों का फोटो)
मनमोहन हमारे समय के बड़े कवि हैं, 80 के दशक की कविता का शिल्प तय करने वाले प्रमुख कवि और ठीक पहली कविता के तेवरों की वास्तविकता की पड़ताल का रिस्क उठाने वाले आलोचक भी। छपने से परहेज बरतते रहे इस कवि का एक संग्रह `ज़िल्लत की रोटी` आया है, जिसमें बाद की कविताएं है. 1969 से कविता लिख रहे इस कवि की आपातकाल में बहुचर्चित `राजा का बाजा` समेत कई पुरानी कविताएं मेरे हाथ लगी हैं, जिन्हें एक-दो सीरीज़ में ही टाइप कर पाऊंगा। हाल में उन्हें हरियाणा साहित्य अकादमी ने कविता पर लखटकिया सम्मान दिया है। एक लाख रुपये की यह राशि उन्होंने सामाजिक-सांस्कृितक क्षेत्र में काम कर रही संस्था `हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति` को भेंट कर दी है। इस मौके पर उनकी कविताओं पर असद जैदी की टिप्पणी और खुद उनका (मनमोहन का) वक्तव्य देने का भी इरादा है। फिलहाल उनकी दो पुरानी कविताएं- 

आग
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आग
दरख्तों में सोई हुई
आग, पत्थरों में खोई हुई

सिसकती हुई अलावों में
सुबकती हुई चूल्हों में

आँखों में जगी हुई या
डरी हुई आग

आग, तुझे लौ बनना है
भीगी हुई, सुर्ख, निडर
एक लौ तुझे बनना है

लौ, तुझे जाना है चिरागों तक
न जाने कब से बुझे हुए अनगिन
चिरागों तक तुझे जाना है

चिराग, तुझे जाना है
गरजते और बरसते अंधेरों में
हाथों की ओट
तुझे जाना है

गलियों के झुरमुट से
गुजरना है
हर बंद दरवाजे पर
बरसना है तुझे
(१९७६-७७)


मशालें...
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मशालें हमें वैसी ही प्यारी हैं
जैसी हमें भोर

मशालें जिन्हें लेकर
हम गाढ़े अंधेरों को चीरते हैं
और बिखरे हुए
अजीजों को ढूंढते हैं
सफ़र के लिए

मशालें जिनकी रोशनी में
हम पाठ्य पुस्तकें पढ़ते हैं

वैसे ही पनीले रंग हैं
इनकी आंच के...जैसे
हमारी भोर के होंगे

लहू का वही गुनगुनापन
ताज़ा...बरसता हुआ...

मशालें हमें वैसी ही प्यारी हैं
जैसी हमें भोर
(1976)

Tuesday, September 30, 2008

इस वक़्त मेरे पास आपकी दिलजोई के लिए कोई नाजुक कविता नहीं है

साहित्य में मेरी रूचि है और मैं कोई प्यारी सी कविता या कोई कविता सा गद्य का टुकडा पोस्ट करने का मन बनाता हूँ पर ऐसा हो नहीं पाता. आज सुबह द हिन्दू देखा और फिर दिल और दिमाग सुन्न सा रह गया. फिर भी कई साथी कहते हैं कि आतंकवादी तो मुसलमान हैं बस. ये मुल्क खतरे में है, कुछ कर सकते हो तो करो. आतंकवादी आर एस एस तो जो करना था कर चुका और कर रहा है.......
Nun was gang raped and priest brutally assaulted in Kandhamal
Parvathi Menon
FIRs lodged but no arrests by State government; no response from Centre; Sister Nirmala wrote to CM and PM appealing for protection to Christians

Bhubaneswar: The Orissa government has failed to take any action, under the law of the land, against those who committed bestial crimes — the gang rape of a 28-year-old Catholic nun and the brutal attack on a Catholic priest who courageously resisted their attempts to force him to participate in the atrocity. These incidents took place on August 25 at K. Nuagaon, 12 km from the Baliguda subdivision in Kandhamal district. Both victims filed First Information Reports at the Baliguda police station. Sister Nirmala, Superior-General of the Missionaries of Charity, wrote to the Orissa Chief Minister and the Prime Minister specifying the atrocities.
The brutalisation of the nun and the priest by a mob raising anti-Christian, Hindutva slogans took place around 1 p.m. at the site of the Divya Jyothi Pastor Centre. The church was burnt the previous day in reprisal against the murder of an RSS activist, Lakshmanananda Saraswathi, and four of his associates on August 23. The gang rape of the young nun, whose “virginity [was] grossly violated in public” (and whose identity is being withheld by this newspaper to protect her privacy) took place in front of a police outpost with 12 policemen from the Orissa State Armed Police present and watching, according to Father Thomas Chellan, the priest who was dragged out and badly beaten.
“Around 1 p.m., a gang came and pulled me and the Sister out of the house where we had taken shelter and started assaulting us,” Father Chellan told The Hindu in a telephonic interview from Kerala where he is recuperating.
“My appeals to the policemen who were standing nearby and watching only resulted in further beating. At one point the nun slipped away to plead with the police for help but she was dragged back by the mob and her blouse torn,” he said. The nun was gang raped in a nearby building, and he was doused with kerosene by the mob, which threatened to set him on fire. They were saved by a group of youth who took them to the police outpost where “one among the attackers was present with the police between 3 p.m. and 9 p.m.,” Father Chellan said.
News of the K. Nuagaon atrocity was conveyed through mobile phones to several priests and nuns hiding in the forests, fearing for their lives as the anti-Christian hunt was on. The victims were taken to the Baliguda police station around 9 p.m. where they lodged First Information Reports. “I believe the Sister wrote in her complaint that she was raped,” Father Chellan said.
The atrocity, about which the State government has not gone public, has outraged and terrified Christian organisations working in Kandhamal district. News of it was brought to the notice of Chief Minister Naveen Patnaik by Raphael Cheenath, Archbishop of the Cuttack-Bhubaneswar diocese.
Sister Nirmala wrote letters to the Orissa Chief Minister and the Prime Minister on this and other brutal attacks on Christians in Orissa. In her letter, dated August 28, 2008, to Chief Minister Patnaik, she took up “a very sad incident, soon after the eruption of the violence” of “one young sister, consecrated to God, who was administrator of an institute, being hunted out of her hiding place and stripped naked by the mob and her virginity grossly violated in public, without any help from the police present there.”
In her appeal for protection to Christians, Sister Nirmala urged the Chief Minister to “ask the Central Govt. for as many extra forces from the Centre as they are willing to give and you need.”
When contacted, Praveen Kumar, Superintendent of Police, Kandhamal district, told The Hindu that investigations into the episode by a Deputy Superintendent of Police were on and “the law will take its course.” He confirmed that no arrests have been made in connection with the incidents.

Tuesday, September 23, 2008

हमारे प्यारे आतंकवादी!

आतंकवादी दो तरह के होते हैं. एक वो जो मुसलमान होते हैं. (कहा तो यह भी जाता है कि मुसलमान होते ही आतंकवादी हैं) दूसरे वो जो हमारे अजीज हैं, आँखों के तारे हैं. वो आतंकवादियों की तरह छुपकर-दुबककर कुछ भी नहीं करते, जो करना होता है, खुलेआम करते हैं, डंके की चोट पे. कोई मस्जिद गिरानी हो, कोई बम फोड़ना हो, संविधान को गरियाना हो, कत्ले आम करने हों, पादरी-वादरी निपटाने हों, बस्तियां जलानी हों, जरूरत हो तो आतंकवाद से लड़ने के नाम पर धरने-प्रदर्शन करने हों- वे सब कुछ शान के साथ करते हैं. वो कभी किसी एन्काउन्टर में मारे नहीं जाते. जो मारे जाते हैं, वे खानदानी आतंकवादी होते हैं. पुलिस और सरकार की कहानी में लाख झोल हों, पर उनका मारा जाना वाजिब ही होता है, क्योंकि कहा न, वो होते ही खानदानी आतंकवादी हैं. आख़िर वे मुसलमान होते हैं.

Sunday, September 14, 2008

दिल्ली के धमाके - मुश्किल वक्त में कुछ ज़रूरी बातें


सांप्रदायिक ताकतों का काम हमेशा बेहद आसान होता है और इनके खिलाफ लडाई उतनी ही मुश्किल होती है। कई बार या कहें अधिकतर समय यह रास्ता बेहद तनहा, बार-बार हार का अहसास कराने वाला और खतरे व अपमान पैदा कराने वाला होता है. हम पाते हैं कि मुश्किल लड़ाई में शामिल कोई प्यारा साथी साम्प्रदायिक बहाव का शिकार हो गया है या फ़िर लोकतंत्र, न्याय, निष्पक्षता जैसे तर्कों का इस्तेमाल करते हुए ही वह घोर फासीवादी बातें करने लगा है.

साम्प्रदायिक ताकतों की असल जीत किसी धमाके में कुछ या बहुत सी जिंदगियां ले लेना नहीं होती, बल्कि यही होती है कि लोग उनके एजेंडे पर सोचना और रिअक्ट करना शुरू कर दें।

दिल्ली के धमाके मुझे भी बेहद दुखी और परेशां कर रहे हैं पर मैं ऐसे मौकों के लिए उत्साह से बयानों में भडास निकालने वाले पत्रकारों, नेताओं और राष्ट्रभक्तों से और भी ज्यादा परेशां होता हूँ। मसलन - आतंकवाद से आर-पार की लड़ाई का वक्त आ गया है, पकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए, पोटा-सोटा कुछ हो, चूडियाँ कब तक पहने रहेंगे (और मुसलमानों को सबक सिखाना होगा) जैसी बातें वो काम कर रही होती हैं, जो बम के धमाके भी नहीं कर पाते। या कहें जो धमाका करने वाले लोग चाहते हैं।

ऐसे मौके बीजेपी और पूरे संघ परिवार के लिए टोनिक का काम करते हैं। १९४७ में देश के बंटवारे और हाल के दो दशकों में इसी तरह की राजनीति से देश को छिन्न-भिन्न कर देने की कीमत पर ताकतवर होता गया संघ परिवार ऐसे धमाकों की इंतज़ार ही नहीं करता बल्कि ऐसी स्थितियां पैदा करने के लिए खाद-पानी भी देता है।

देखने में यह बेहद सामान्य और बेहद साफ़ बात है कि कोई भी सिमी-विमी किसी भी संघ-वंघ को और संघ-वंघ,सिमी-विमी को अपने-अपने अस्तित्व के लिए कितना जरूरी मानते हैं। दुर्भाग्य यह है कि सामान्य और साफ़ बातें देख पाना हमेशा ही मुश्किल रहता आया है. यह देखने के लिए मूलगामी नज़र की जरूरत होती है, जो माइंड सेट को तोड़ सके. यह नज़र एक चेतना का हिस्सा होती है, जो इस तरह के धमाकों को किसी धर्म के लोगों से नफरत की शक्ल में नहीं देखने लगती बल्कि यह पड़ताल कर लेती है कि इस साजिश से क्या चीज बन रही है. सांप्रदायिक ताकतों से मूलगामी नजर के साथ लम्बी लड़ाई लड़ते रहे मार्क्सवादी आन्दोलन के ही बहुत से साथी इस चेतना के अभाव में जब-तब अजीबोगरीब बातें करते दिख जाते हैं (हाल में हुसेन के चित्रों को लेकर और असद जैदी की कुछ कविताओं को लेकर भी यह देखा गया). लिब्रेलिज्म की आड़ में तो वैसे भी साम्प्रदायिकता और तमाम तरह का फासीवाद इत्मीनान से पलता रहता है। ऐसे लिबरल गुडी-गुडी बातें करते हुए मजे से डेमोक्रेसी की दुहाई देते रहते हैं और मौका मिलते ही साम्प्रदायिक नफरत उनके पेट से बाहर आ जाती है.

हाँ जरूरी नहीं कि हर कोई एक मूलगामी नज़र पैदा करने की कुव्वत रखता हो, पर अगर उसमें वैल्यूज़ की गहरी जड़ें हैं तो भी वह सांप्रदायिक साजिशों का शिकार होने से बचा रह सकता है. नेहरू ने एक सेकुलर और प्रगतिशील समाज की लडाई लड़ी थी तो प्रगतिशीलता और वैल्यूज़ उनकी बड़ी ताकत थी लेकिन गाँधी अपने पिछडेपन के बावजूद इंसानी वैल्यूज़ में गहरी आस्था के बूते ही साम्प्रदायिकता के खिलाफ इतनी बड़ी लडाई लड़ सके थे. अगर मूलगामी नज़र और वैल्यूज़ दोनों ही न हों, तो फ़िर साम्प्रदायिकता ही क्या, जाति और जेंडर के सवालों पर भी कोई लडाई लड़ना मुमकिन नहीं हो सकता. हम देखें कि हम किस नज़र और किन वैल्यूज़ को लेकर फासीवाद से लड़ना चाहते हैं.

(पेंटिंग The Wolf at the Door; water colour on paper by Atul Dodiya`सहमत` से साभार)


Wednesday, September 10, 2008

९/११ लोकतंत्र की हत्या के अमेरिकी अभियानों की प्रतीक बन चुकी तारीख


९/११ । यह तारीख अमेरिका की लोकतंत्रविरोधी करतूतों का प्रतीक बन चुकी है। डब्ल्यूटीओ पर हमले की बात भर नहीं है (हालांकि यह भी अमेरिका द्वारा दुनिया में हिंसा के सहारे लोकतंत्र और स्वतंत्र सरकारों को कुचलने के लिए पैदा किए गए आतंकवाद का ही नतीजा थी। इसके बाद आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिका ने जो घिनौने अभियान छेड़े, वो भी सामने हैं)। हम जरा पीछे जाना चाहेंगे, जब अमेरिका के पास आतंकवाद से झूठी लड़ाई का बहाना भी नहीं था। तब ११ सितंबर १९७३ को अमेरिका ने चिली की लोकप्रिय सरकार का तख्ता पलटकर वहां सैनिक तानाशाह को गद्दीनशीं किया था। चिली में अमेरिका के इशारे पर सल्वादोर अलेंदे का तख्ता पलटने के लिए दक्षिणपंथी फासिस्ट सैनिक धड़े ने मजदूरों, राजनैतक कार्यकर्ताओं और आम लोगों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया था। अलेंदे बाकायदा चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे और यह अमेरिका को रास नहीं आ रहा था कि जनता के लिए प्रतिबद्ध क्रांतिकारी विचारों वाली सरकार इस तरह व्यापक जनसमर्थन के साथ सत्ता में आए। इस शांतिपूर्ण औऱ लोकतांत्रिक क्रांति को दुनियाभर ने सलाम किया था और यही बात अमेरिका को खतरे की घंटी लगी थी। तमाम आर्थिक साजिशों के बावजूद अलेंदे डटे रहे तो सीआईए ने सीधा हस्तक्षेप कर लोकतंत्र की हत्या को अंजाम दिया। यह बात अलग है कि अलेंदे आज भी दुनिया भर में लोकतंत्र और क्रांतिकारी प्रतिबद्धता की मिसाल के तौर पर जीवित हैं।

Friday, September 5, 2008

हबीब तनवीर से संगत

१ सितंबर को महान रंगकर्मी हबीब तनवीर का जन्मदिन था। इस मौके पर वीपी हाउस, दिल्ली में सहमत ने हबीब के चाहने वालों और अदीबों से उनकी बातचीत का इंतजाम किया था। मैं इसके कुछ हिस्से को पोस्ट करना चाहता था कि इस बीच वेणुगोपाल नहीं रहे। इस नाते इस पोस्ट को स्थगित करना पड़ा। इस बीच इसका बड़ा हिस्सा मुझसे खो भी गया.....बहरहाल जो है, उसका लुत्फ लीजिए-

मासूमियत या मजबूरी
कीमतें आसमान छू रही हैं। एक तरफ गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी है और दूसरी तरफ कुछ लोग लाखों रुपये महीना कमा रहे हैं। यह खाई पटना जरूरी है। कैसे पटेगी मोटेंक अहलूवालिया या चिदंबरम से, नहीं जानता। या तो मासूमियत है या मजबूरी कि वो किसी और तरीके से सोच नहीं सकते। ...मां के पेट से झूठ बोलते हुए कोई नहीं आता सोसायटी से ही सीखते हैं...

अंधेरे में उम्मीद भी
जो थिएटर छोड़कर फिल्मों, सीरियलों की तरफ जा रहे हैं, वहां काम की तलाश में जूतियां चटकाते हैं। कुछ चापलूसी, कुछ जान-पहचान काम करती है। मुझे उनसे कुछ शिकायत नहीं है। क्या करें पेट पर पत्थर रखकर काम मुश्किल है। हमारे जमाने में दुश्मन बहुत साफ नजर आता था। सामराजवाद से लड़ाई थी। एक मकसद (सबका) - अंग्रेजों को हटाओ, रास्ते कितने अलग हों (भले ही)। अब घर के भीतर दुश्मन है, उसे पहचान नहीं सकते। विचारधारा बंटी है। पार्टियों की गिनती नहीं, हरेक की मंजिल अलग-अलग। इस अफरातफरी में क्या किसी से कोई आदर्श की तवक्को करे। हां, मगर लिबरेलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन, नए कालोनेलिज्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं सब तरफ से। खुद उनके गढ़ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन में भी। तो ये उम्मीद बनती है।
जवाब से कतराता हूं
मैं अपने डेमोक्रेटिक मिजाज का शिकार रहा हूं। मेरी अप्रोच डेमोक्रेसी रही है, मैं प्रचारक या उपदेशक थिएटर में यकीन नहीं रखता। ये कोई जम्हूरी बात नहीं (शायद यही शब्द बोला था) कि आपने सब कुछ पका-पकाया दे दिया, कि मुंह में डालकर पी जाना है। अगर आप समझते हैं कि दिल-दिमाग वाला दर्शक आता है तो उकसाने वाला सवाल देना काफी होता है। ये नहीं कि मैं सवाल भी और जवाब भी पेश कर दूं। जवाब से कतराता हूं। हां, इसका हक नुक्कड़ नाटक को है, वहां जरूरी है जवाब भी देना। उनकी प्रोब्लम्स हैं। हड़ताल वगैरह होती हैं, सड़कों पर भी निकलना पड़ता है (नुक्कड़ नाटक वालों को)।

हुसेन के मिजाज की कद्र करता हूं
मैं दोनों काम करता हूं, सड़कों पर भी निकलता हूं, न निकलने वालों पर एतराज नहीं। हुसेन नहीं निकलते। उनका मिजाज अलग है। उसकी मैं कद्र करता हूं। उन्होंने (हुसेन ने) कहा, जो मेरे खिलाफ बातें हो रही हैं, सैकड़ों मुकदमे बना दिए गए हैं, इसलिए नहीं आ रहा हूं। ये भी एक तरीका है रेजिस्टेंस का। हर आर्टिस्ट अपने-अपने मिजाज के तहत काम करता है।
मैं यहां कोई फारमूला पेश नहीं करता। मैंने अपने नाटकों में कई तरह के प्रयोग किए। ये आप लोग रियलाइज करें, चाहें तो उड़ाएं, चाहें तो सराहें। इस बारे में पूछकर आप मुझे थका रहे हैं। मैं अपने काम की व्याख्या से इंकार करता

दिल को तनहा भी छोड़िए
(मख्दूम के एक शेर का हवाला देते हुए रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कुछ कहते हैं। शायद अंतरात्मा जैसा कुछ )...वो इकबाल का शेर है- अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल, कभी-कभी इसे तनहा भी छोड़िए। सिर्फ अक्ल से क्रिएट करना संभव नहीं है। दिल से भी बातें होती हैं। (मख्दूम का - शहर में धूम है एक शोलानवां की मख्दूम को पूरा पढ़ते हैं।) बाल्जक से पूछा गया था कि एक प्रास्टीच्यूट की एसी तस्वीर क्यों बनाई, उन्होंने कहा, एमा इज मी। एलन्सबर्ग ने भी कहा कि आप करक्टर क्रिएट जरूर करते हैं लेकिन वो अपनी कहानी खुद कहता है। आपका उसमें कोई कंट्रोल नहीं रहता।
देखिए आप उसमें शऊर घुसाएंगे तो वो कुछ हो जाएगी- उपदेश, अखबारनवीसी या कुछ न कुछ मगर कला नहीं रहेगी।

सरकारें नहीं बल्कि मौत के सौदागर कर रहे हैं रूल
ग्लोबलाइजेशन सब कुछ सपाट कर रहा है। सिस्टेमेटिक ढंग से सोचने के आदी हो गए हैं। आराम इसी में है कि सिस्टम बनाएं, उसके पीछे छिप जाएं। इन लोगों के लिए ये मुमकिन नहीं है कि आदिवासी सभ्यता को समझ कर लोकेट किया जाए या हर तबके के लिए अलग ढंग से सोचें। एक सिस्टम बना है शोषण-दमन का, बंटवारे का, कि लोगों को डिवाइड करो। यही क्लासिकल तरीका था, अब इसमें नए-नए तरीके जुड़ गए हैं। पालिटिशन, गवर्मेंट्स रूल नहीं कर रहे हैं, मर्चेंट्स आफ वार, मर्चेंट आफ डेथ, ड्रग मर्चेंट (कुछ और भी जुमले कहे), यही सब डिक्टेट कर रहे हैं। होम, फारन, इकानमी, सब पालिसी वही तय कर रहे हैं। हमारे यहां इसकी शुरुआत है। हम ग्लोबलाइजेशन के चौराहे पर हैं।

खतरे के रास्ते से मिलता है खजाना
पुराने जमाने में किस्से यूं थे कि एक हीरो निकला, दो रास्ते आए। एक मुश्किलों भरा, जिस पर न जाने के लिए उसे सलाह दी जाती है लेकिन वो उसी मुश्किलों भरे रास्ते पर निकलता है। और खजाना उसी रास्ते पर जाकर मिलता है। हीरोइन भी खतरे भरे रास्ते के आखिर में ही मिलती है।

(कार्यक्रम में कई बड़े आर्टिस्ट थे, अलग-अलग फील्ड के। सबने कुछ पूछा। लंबी बातें जो नोट कीं, मुझसे खो गईं। जोहरा सहगल से किसी ने कहा, आपा कुछ पूछेंगी, हबीब साहब से। उन्होंने कहा, मैं क्या पूछूंगी, मैं तो उनकी आशिक हूं। उन्होंने हबीब के 25 साल और जीने की तमन्ना भी की। एक सवाल के जवाब में हबीब ने कहा कि बहादुर कलारिन तैयार करने में सबसे ज्यादा मुश्किल आई। पोंगा पंडित पहले से होता आया। मैंने खेला तो संघ वालों ने खूब पत्थर फेंके और मुझे मशहूर कर दिया। इस सब के बीच कुछ करने का दबाव भी हमेशा रहा। गुमनामी अच्छी है या नामवरी...जैसे कई गीत भी हबीब की मंडली ने सुनाए।)

Wednesday, September 3, 2008

कुढ़िये, कुढ़िये, कुढ़ते रहिये


ब्लूलाइन बस शकरपुर बस स्टेंड से खिसकना शुरू हुई है। भीड़ नहीं है और कई सीटें खाली पड़ी हैं। अचानक एक लड़की चीखने लगती है - बस रोको, इसे बस से उतारो, ये परेशान कर रहा है। लड़की की बगल में बैठा अधेड़ खड़ा हो गया है और बड़े सधे हुए अंदाज में सवाल करता है- मैंने क्या कहा तुम्हें? लड़की मदद की उम्मीद और गुस्से में फिर चीखती है। बस रोको, इसे बस से उतारो। मैं उस आदमी को पकड़ने की कोशिश करता हूं और तब तक अगली सीट पर बैठी एक और लड़की कहती है - हां ये परेशान कर रहा था, मुझे भी। कपड़ों और हाथ में ली गई फाइलों से जेंटलमैन लग रहा अधेड़ तेजी से बस से उतरकर भागने की कोशिश में है और एक चुटियाधारी सज्जन उसे पकड़ने के अंदाज में बचाने की कोशिश करते हैं। एक युवक मेरी मदद में आता है पर अधेड़ एक-दो हाथ खाकर भाग निकलते हैं। एक और लड़की इस दौरान परेशान लड़की की मदद का हौसला दिखाती है। मैं देखता हूं, यह दीपा मेरे ही आफिस से हैं।
जो खामोश थे, वे अब घटना की व्याख्या कर रसरंजन की संभावना तलाशना चाहते हैं। चुटियाधारी कहता है- आदमी गलत था, उसके भागने के अंदाज से ही पता चल गया। कोई और भी कुछ बोलता है।
लगता है छेड़खानी कर भागा अधेड़ बस में ही है, सारे मरदों के भीतर और अब और ज्यादा खुलकर खेल रहा है। मैं चीखता हूं- तब हम चुप थे सब, हम सारे हरामखोर हैं। हम सब यही करते हैं। कोई लड़की बोलती है तो उस पर टूट पड़ते हैं। ९९ फीसदी लोग या तो चुप रहते हैं या विकृत मजा लेते हैं।
चुटियाधारी मोरचा लेता है। इसे पूरे पुरुष समाज पर हमला मानता है। गुस्से में चिल्लाता है। कहता है- लोग विरोध करते हैं गलत काम का, लेकिन हमने तो एसी लड़कियां भी देखी हैं जो झुट्टो ई (झूठा इल्जाम लगाकर) किसी को कुछ कह देत्ती हैं और बिचारे को सब पीटते हैं।
मैं देखता हूं जिस लड़की को छेड़खानी का शिकार होना पड़ा था, वह फूट-फूट कर रो रही है। मैं कहता हूं, तुम क्यों रोती हो, तुमने क्या बुरा किया? दीपा भी उसे संभालने की कोशिश करती हैं। हालांकि मैं जानता हूं, एसे समाज में जहां मनुष्य होने की गरिमा को इस तरह सरेआम कुचला जाता हो और फिर मरदानगी के वकील बेशरम दलीलें पेश करते हों, रोना ही बचता है। मैं भी रोना चाहता हूं।
चुटियाधारी अब तक उपदेश की मुद्रा में आ चुका है। कहता है - तू क्यूं रोवे, तन्नै तो हिम्मत करी। तू कायर थोड़े ही है। मेरा मन करता है, उसके मुंह पर थूक दूं। उसे कौन समझा समझा सकता है कि जो चीख नहीं पड़तीं, जो छींटाकशी पर हंसते हुए किसी तरह सफर पूरा करती हैं, जो किसी तरह जब्त किए खुद को संभाले रखती हैं, जो भीड़ चीरते वक्त अपने सीने पर अचानक आने वाली कुहनियों को सहज अनुमान के आधार पर धता देते हुए रास्ता तय करती हैं, जो अपनी कमर, कंधों, छाती और दिल-दिमाग पर मरदों की अश्ललीलता का गू ढोते हुए किसी तरह गुजर करती हैं, वे भी कायर नहीं हैं।
चुटियाधारी चुप नहीं होना चाहता। उसे ९९ फीसदी मरदों को बुरा कहना नागवार गुजरा है। उसे कौन कहे, लड़कियां अपने बाप, भाई और बेटे के पास भी अपमानित होती हैं। पुरानी खाप-पंचायतें और आधुनिक समाज उन्हें और भी अपमानित करता है। मैं और मेरी साथी कुछ बोलते हैं तो आगे बैठे एक सज्जन चुटियाधारी के पक्ष में लड़ने को तैयार दीखते हैं। देहाती और शहरी मरदों की एकता का कैसा कामन ग्राउंड है। यही लोग हैं जो बसों में छेड़खानी की शिकायत करने पर चिल्लाकर लड़की को डांटते हैं- बस में क्यूं चलती हो, कार में चला करो।
मैं कुछ और लिखना चाहता था पर एसी जिल्लत झेलने के बाद क्या लिखा जा सकता है। और ये जिल्लत रोज-रोज की है। एसे किस्से अनगिन हैं और पिट जाने की नौबत रोज ही आती है।

Saturday, August 30, 2008

दे देना - योजेफ़ तोरनेई (हंगरी कवि)

प्यारी को तुम्हारी जब ले जाने आयेंगे
तुम उसे उनके सुपुर्द कर देना
ऊपर से नीचे तक
उसकी निश्वास सहित
त्वचा, वर्ण, दीठ सहित
मन के रहस्य सहित
और इसके साथ उसके पहनने ओढ़ने, निर्वस्त्र होने का ढंग भी
पुलक भरी सिहरनें,
उसका दुलारना
सब उसकी दुलराई देह सहित
दे देना ही होगा
उसका वह न जाने कहां खो जाने का मन
कभी-कभी का वह खुल बैठना रात में,
साथ में वह थकान।
बड़ी-बड़ी आँखें बादामी
कजरारी पलकें और साथ में कनबितयां
उसकी जांघों की फड़कन के अतिरिक्त
उसकी अतृप्ति के क्षण भी
उसकी आसक्ति की तरंग का चढ़ना-उतरना
उस देशी से दीखते चेहरे के साथ-साथ
उसके विदित और संतुलित जीवन के साथ-साथ
तुमको देना ही है।
(अंग्रेजी से अनुवाद - रघुवीर सहाय)

बरसों पहले मेरे एक मित्र सुधाकर भट्ट ने एक किताब दी थी- आधुनिक हंगरी कविताएं। बाद में यह किताब एक अन्य मित्र ने ले ली। आज पुस्तक मेले में यह किताब फिर दिखाई दी तो मैंने इसे लेने में जरा देर नहीं लगाई। इसी से ली गई है यह कविता।

Friday, August 22, 2008

चूतिया नहीं वजाइनल कहते हैं संस्कृतपुरुष

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २१ अगस्त २००८ को `हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी` विषय पर गोष्ठी के दूसरे सत्र में रमेश चन्द्र शाह बोले। उनका जोर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी पर था। अपने व्याख्यान के बाद एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ही देश को एकता के सूत्र में बाँध सकती है, न कि हिन्दुस्तानी कही जाने वाली हिन्दी। इस सत्र के तुंरत बाद लंच हुआ। मुझे यह देखर हैरानी हुई कि शाह साहब कुछ युवकों को कह रहे थे- तुम्हें जवाब देना चाहिए। उनकी भाषा में ही मुँहतोड़ जवाब देना चाहिए। साहित्य पर उनका ठेका है क्या? मुझ अपरिचित को बातें सुनते देख वे युवक इधर-उधर हो गए। मैंने कुछ समझने की कोशिश की और कुछ समझा भी। (जाहिर है कि शाह अपने व्याख्यान को लेकर सवाल उठाने वालों और अपने समर्थकों की चुप्पी को लेकर नाराज होंगे) मैंने एक स्टुडेंट से ही पता किया तो मालूम हुआ कि जिन युवकों से शाह साहब मुखातिब थे, वे अखिल विद्यार्थी परिषद् से जुड़े शावक थे।
बहरहाल आगे बढ़ते हैं और गोष्ठी के बाहर बन रही या चल रही हिन्दी का रूप देखते हैं कि वो कितनी संस्कृतनिष्ठ है। रमेश चन्द्र शाह और राजकिशोर की हाय-हलो होती है। किसी बात पर राजकिशोर कहते हैं कि हिन्दी का समाज चूतिया समाज है। शाह साहब- कृतघ्न है। राजकिशोर- नहीं, नहीं चूतिया है। शाह साहब लजाने का अभिनय करते हुए कहते हैं- चूतिया नहीं वजाइनल कह लेता हूँ। वजाइनल है। राजकिशोर- वजाइनल नहीं फिर वजाइनीज कहिये। कुछ देर बाद कोई एक कहता है कि हिन्दी में काम करना शव साधना है। दूसरा कहता है, शव सम्भोग है। फ़िर दोनों कहते हैं, हाँ शव सम्भोग है।

Monday, August 18, 2008

कब तक हिफाजत का वचन लेगी बहन

मेरी एक दोस्त का फ़ोन आया. एक संगठन में काम कर चुकी है और फिलहाल भी घर से दूर रहकर काम कर रही है. उसकी दिक्कत यह है कि उसकी सरकारी नौकरी लग गयी है और उसके परिवार ने भागदौड़ कर होम डिस्ट्रिक्ट में पोस्टिंग का जुगाड़ कर लिया है. मेरी दोस्त जानती है कि होम पोस्टिंग का मतलब है, पूरी तरह परिवार के ढांचे में जकड जाना. उसका भाई उसे प्यार करता है पर इस मामले में वो बाप के साथ है. मेरी दोस्त का फ़ोन राखी के त्यौहार वाले दिन आया था.
इसी दिन पता चला कि संतलेश को उसको देवर ने बेच दिया है. संतलेश के पति का कत्ल हो गया था और इस इल्जाम में उसे ही फंसा दिया गया था. उसके भाई हैं पर वे मुकदमे में पैसा खर्च नहीं करना चाहते. आख़िर संतलेश को उसके देवर ने इस शर्त के साथ छुडा दिया कि वो धरती में हिस्सा नहीं मांगेगी और एक आदमी के साथ रहने लगेगी. संतलेश के भाई का कहना है कि बहन ने उसकी नाक कटवा दी है और वह उसके लिए मर गयी है.
मेरी एक मौसी है. मौके-बेमौके उसे भाई के घर से कपड़े-लत्ते और दूसरे उपहार मिलते रहे हैं. अब यह सिलसिला बंद हो गया है. उसे खतरनाक विशेषणों से नवाजा जा रहा है. उसका कसूर सिर्फ़ यह है कि उसने पिता की संपत्ति से अपने हिस्सा मांगने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है.
मेरे पिता आदर्शवादी हैं. घोर संकटों में भी पैसे का मोह नहीं किया. बेटियों को पढाया-लिखाया. वकील भी हैं पर पिता की संपत्ति में बेटी के हिस्से की बात उन्हें नागवार गुजरती है.
अधिकतर ऐसा ही है. भाई अपनी बहनों पर कुर्बान रहते हैं. उनकी शादी में खूब धूम करने को तत्पर. शादी के बाद उपहार देने या गले मिलकर रोने को भी. संपत्ति में हिस्से की बात चले तो बहन के कत्ल को तैयार. बहन प्यार कर ले या अपनी मर्जी से शादी करे तो भी उसकी खैर नहीं. हमारे महापुरुषों का भी इन मसलों पर यही रुख रहा है, भारतेंदु जैसे लेखकों का भी.
असल में ये हमारी महान परम्परा है. राखी के त्यौहार की यह भी अजीब बात है कि बहन राखी बांधे और हिफाजत का वचन ले. ऐसा क्यों नही कि बहन अपनी हिफाजत लायक ख़ुद बने. खुदमुख्तार हो, अपने फैसले ख़ुद ले. लेकिन यह हमारी परम्परा के खिलाफ है.
यहां तो राखी का त्योहार भी रस्म है और फिर `ऑनर` के नाम पर उन्हीं बहनों का कत्ल भी।

Sunday, August 10, 2008

Mahmoud Darwish (13 March 1941 – 9 August 2008)



Mahmoud Darwish was born in 1942 in Barwa, Palestine (now Israel), into a land-owning Sunni Muslim family. Following the Israeli occupation in 1948 his family fled their hometown. He attended the University of Moscow, USSR, for one year in 1970, and then moved to Cairo, Egypt. As a young man Darwish faced house arrest and imprisonment his political activism and for publicly reading his poetry. His collections of poetry include Stage of Siege (2002), The Adam of Two Edens (2001), Mural (2000), Bed of the Stranger (1999), Psalms (1995), and The Music of Human Flesh (1980). Darwish's awards and honors include the Ibn Sina Prize, the Lenin Peace Prize, the Lotus prize from the Union of Afro-Asian Writers, France's Knight of Arts and Belles Lettres medal, the Prize for Cultural Freedom from the Lannan Foundation, and the USSR's Stalin Peace Prize. He was an editor for a Palestine Liberation Organization monthly journal and the director of the group's research center. In 1987 he was appointed to the PLO executive committee, and resigned in 1993 in opposition to the Oslo Agreement. In 1996 Darwish returned to Israel after twenty-six years of exile to visit his birthplace, and settled in Ramallah in the West Bank. He was currently the editor-in-chief and founder of the literary review Al Karmel, published out of the Sakakini Centre since 1997

Friday, August 8, 2008

आज भगत सिंह होते तो?

कल एक लैब में टेस्ट के लिए अपनी बारी का इन्तिज़ार करते हुए अखबार में छोटी सी ख़बर पढ़ी कि संसद में भगत सिंह की मूर्ति लगाई जाएगी. तब से मन बुरी तरह बेचैन है. ये वही संसद है, जहाँ भगत सिंह और साथियों ने साम्राज्यवादियों के कान खोलने के लिए बम फेंका था. ये वही संसद है जहाँ साम्राज्यवादियों के पिट्ठू और सांप्रदायिक ताकतों की पार्टी के हीरो सावरकर की मूर्ति लगाई जा चुकी है और इन दिनों लोकतंत्र के मसीहा बताये जा रहे सोमनाथ `जी` सावरकर को लेकर भावुक हो रहे थे. ये वही संसद है, जहाँ साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के सरदार अमेरिका को देश बेचने के लिए हमारे नेता उतावले रहते हैं (परमाणु मसले पर बहस का नज़ारा भी याद आता है). ओह, भगत सिंह आप होते तो ऐसी संसद के साथ आज क्या सलूक करते?

Monday, August 4, 2008

ज़ाफर ज़टल्ली (जान जाये या रहे, न रहें कहे बगैर)

हरियाणा में सांस्कृतक विरासत के सिलसिले में मनमोहन के मुंह से कई बार ज़ाफर ज़टल्ली का जिक्र सुना कि वे नारनौल के रहने वाले शायर थे। ज़टल्ली का मतलब है गाली-गलौज करने वाला और इस शायर को इससे भी परहेज नहीं था और इसीलिए उन्होंने अपना उपनाम ज़टल्ली रख लिया था। तबीयत से विद्रोही थे और सच (वो भी अपने अंदाज में) कहने से नहीं चूकते थे। बादशाह फ़रुख़शियर के शासन की आलोचना कर दी, फिर माफी नहीं मांगी, मौत ईनाम में मिली। मनमोहन ने ही बताया था कि अलीगढ़ में नईम ने उन पर काम किया था जो शायद अप्रकाशित है। बहरहाल नया पथ के ताजा अंक में अली जावेद ने उन पर लिखा है और उनकी कुछ रचनाएं भी दी हैं। उन्हीं में से एक-

दर बयाने क़नाअत
--------------------
दिला दर मुफ्लिसी सबसे अकड़ रह
ब आलम बेकसी सबसे अकड़ रह
चिकन और ज़र का चीरा पश्म कर बोझ
फटी१ पग बांध कर सबसे अकड़ रह
न कर ख़ाहिश तू जामा बाफ्ते२ का
कोहन3 दुगला4 पहन सबसे अकड़ रह
अगर शलवर न बाशद कसको ग़म है
लंगोटा खींचकर सबसे अकड़ रह
जो कुछ भी हाथ लगा छिप छिपाकर
खुशी हो डंड कर सबसे अकड़ रह
अगर ये भी मुयस्सर जो न होवे
अकेला जूं अलिफ़ सबसे अकड़ रह
१-पगड़ी, २-सूत या रेशम या सूत से बना कपड़ा ३- पुराना, ४- रुईदार लिबास

Thursday, July 31, 2008

प्रेमचंद


आज ३१ जुलाई प्रेमचंद का जन्मदिन है। तिलिस्मी किस्सों से शुरू हुए प्रेमचंद जल्द ही आम आदमी के जीवन संघर्षों को साहित्य की मुख्यधारा में ले आए थे। फिर अपनी यात्रा में वे लगातार संघर्ष करते हुए आधुनिकता की ओर उन्मुख रहे। नवजागरण के नाम पर पल रहे भ्रष्टाचार मसलन भाषा की सांप्रदायिकता, शुद्धिकरण, छुआछूत, पुनरुत्थानवाद आदि को उन्होंने सिरे से खारिज किया और अंततः वे प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के गवाह भी बने। कहना न होगा कि एक न्यायकारी समाज के लिए उनकी बेचैनी उन्हें गांधी के ट्रस्टी सिद्धांत को खारिज करते हुए कम्यूनिस्ट एजेंडे तक ले गई।

आज घीसू, माधव, हामिद आदि के लिए बची-खुची जगह भी तेजी से गायब हुई है। सांप्रदायिक, पूंजावादी और साम्राज्यवादी ताकतें कुटिल गठजोड़ से और मजबूत हुई हैं। देश और दुनिया के जो हालात हैं, उनमें प्रेमचंद और भी प्रासंगिक व जरूरी हो गए हैं। प्रेमचंद पर मनमोहन का एक लेख जल्द टाइप करने की इच्छा है, कोशिश करूंगा।

Wednesday, July 23, 2008

`दिमाग में भूसा और हाथ में काठ की तलवार`

हमारे बेहद पिछडे समाज में अरसे पहले राधामोहन गोकुल, भगत सिंह, राहुल आदि नेताओं, बुद्धिजीवियों ने कट्टरताओं, अंधविश्वासों, लीचड़ मान्यताओं, सामंतवाद, जातिवाद, साम्राज्यवाद, बराबरी आदि मुद्दों पर समग्र रूप से मुखर मोर्चे लिए थे। टुकडों-टुकडों में अलग-अलग मसलों पर भी मोर्चे लिए गए और इन सभी को तब के पुरातनपंथी कथित बुद्धिजीविओं के भरी विरोध का सामना करना पड़ा था. दुर्भाग्य से आज का बुद्धीजीवी मामूली रिस्क उठाने को भी तैयार नहीं है और कल के नवजागरण विरोधी पुरातनपंथी भारतेंदु सरीखों के वंशजों के आगे घुटने टिका रहे हैं. असद जैदी जैसे लेखक-कवि जब सच को सामने रखते हैं, तो धूर्त हमले किए जाते हैं. उन पर निजी हमले कर रहे एक ब्लॉग मोहल्‍ला ने उनके जनसत्ता के सती विषयक रूख पर आलोचना के रवैये को भी ग़लत ठहराने की कोशिश की है और आधे-अधूरे ढंग से यह साबित करना चाह ही की जनसत्ता तब सती विरोध का चैम्पियन था. हकीकत यह है कि दिवराला कांड को लेकर इस अखबार ने कट्टर सम्पादकीय तक लिखे थे और उसकी थू-थू भी हुई थी. इस बारे में १० अक्टूबर १९८७ को सरला महेश्वरी का एक लेख कहीं छापा था, जो अब उनकी किताब `नारी प्रश्न`` में संगृहीत है, इसकी बानगी देता है. ब्लॉग संचालक को चाहिए ४ सितम्बर87 दिवराला कांड के बाद के अक्टूबर ८७ तक के जनसत्ता के समाद्कीय सामने रखें. जो एक समाद्कीय दिया गया है, वो भी बहुत बाद का है और जिस एक पत्रकार के साहस से यह छाप पाया था, उसे भी संपादक और उनके लग्गो-भग्गो (जो आज भी वहां ताकतवर हैं) का गुस्सा झेलना पड़ा था. खैर आप सरला महेश्वरी का इस बारे में लेख एक जिद्दी धुन पर पढ़ सकते हैं...

रूपकँवर प्रकरण में कुछ ख़ास किस्म के कलमघसीटू पोंगापंथियों ने अपने को बुरी तरह बेनकाब किया है. यद्यपि इन मामलों में वे काफी बढ़-चढ़ कर आदर्शों की बात करते हैं और ख़ुद के बारे में उनका इतना दावा है कि `जो आग से खेलते हैं उनके दिमाग में भूसा और हाथ में काठ की तलवार नहीं होती`. लेकिन हम इतना अवश्य कहेंगे कि जिनके दिमाग में भूसा और हाथ में काठ की तलवार नहीं होती, जरुरी नहीं कि वे अच्छे इंसान भी हों।
हमारा संकेत यहाँ बिल्कुल स्पष्ट है. पिछले दिनों जब इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप पर केन्द्रीय सरकार ने बदले की भावना से छपे मारे थे, तब जनसत्ता दैनिक के संपादक प्रभाष जोशी ने `दिमाग में भूसा और हाथ में काठ की तलवार` की बात कही थी. लेकिन उस घटना के चंद दिनों बाद ही दिवराला के रूपकँवर हत्याकांड ने उनके दिमाग की उस कुटिलता को अवश्य जाहिर कर दिया जो हर कर्मकांडी का जन्मजात गुन होता है।
लगभग १५० वर्ष पहले राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ जबरदस्त शास्त्रार्थ करके इस घिनौनी प्रथा को शास्त्र सम्मत बताने की सारी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था; परम्परा के नाम पर बर्बरता को अपनाने के तर्कों की धज्जियाँ उडा दी थीं. लेकिन, जो बहुत अधिक बौद्धिक बनते हैं, जो समाज और जनता के हित की क़समें खाते नहीं थकते, ऐसे लोग जब डेढ़ सौ बरसों बाद फ़िर ख़ुद को राममोहन के वक्त के कर्मकांडी घोंघा-बसंतों की कोटि में रखने में कोई हिचक नहीं दिखाते, तो इसे कुटिलता के सिवाय और क्या कहा जाएगा, क्योंकि इसके पीछे उनका सिर्फ़ यही विश्वास काम कर रहा होता है कि लोगों ने अब तक राममोहन के कामों को विस्मृत कर दिया है तथा आज अब `राम जन्मभूमि मुक्ति` युग का सूत्रपात हो गया है; उन्हें आदिम हिंस्र बर्बरता सिर्फ़ इसलिए कबूल क्योंकि हजारों लाखों लोगों की अंधश्रद्धा उसके पीछे है. कबीर ने ऐसे ही कलमघसीटुओं को देखकर शायद कहा होगा - `पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। `
रूपकँवर को सती बनाकर मार क्या डाला गया, प्रभाष जोशी की तो बांछें खिल गयीं. तत्काल जनसत्ता का एक सम्पादकीय आया - अंगरेजी पढ़े लिखे लोग इसकी महानता को कत्तई नहीं समझ सकेंगे. ``यह तो एक समाज के धार्मिक और सामाजिक विश्वासों का मामला है.`` इतिहास में पहले भी एक बार अंग्रेजी शिक्षा के असर वालों तथा ईसाई धर्म के प्रचारकों ने ``भारत के धर्म और परम्परा को बदनाम करने की कोशिश की.`` सतीप्रथा पर विचार किया जाए, लेकिन इसका अधिकार उन्हीं को है जो भारत के आम लोगों की आस्था और मान्यताओं को जानते समझाते हैं।
यह सब सतीप्रथा की नग्न वकालत नहीं तो और क्या है? शास्त्र इनकी नज़र में वही है जो सैकडों हज़ार वर्ष पहले देववाणी में कहा गया हो. विगत २०० वर्षों के बीच भारतीय चिंतन में जो नए विकास हुए हैं, राजा राममोहन राय से लेकर अन्य तमाम मनीषियों तथा प्रेमचंद तक ने हमारी मनीषा को जो कुछ दिया है, क्या वह सब किसी शास्त्र या जनता की आस्था के रूप में अपना कोई स्थान नहीं रखते? शास्त्रों की ऐसी जड़ व्याख्या किसी भी सच्चे वेदांती और तर्कशास्त्री को भी सचमुच स्तब्ध कर देगी!कुछ जनवादी महिलाओं ने जब महिला हत्या के ऐसे नग्न समर्थक को आदे हाथों लिया, तब प्रभाष जोशी ने अजीब ढंग से कलाबाजियां शुरू कर दी. तब उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया की सिर्फ़ बातों से क्या होगा, क्यों नहीं वे महिलाएं लाखों उन्मत्त लोगों के मुकाबले के लिए दिवराला में उसी वक्त मैदान में उतरीं. पैंतरा बदल कर अपनी सफाई में उन्होंने लिखा ``समस्या की पेंचीदगी और गंभीरता बताने के लिए ही हमने उसे धार्मिक और सामजिक विश्वासों का मामला बताया. अगर ऐसा न होता तो रूपकँवर के चून्दडी समारोह में लाखों लोग न उमड़ पड़ते.`` -जनसत्ता, २० सितम्बर
(यह अभी अधूरा है, इसे कल तक पूरा पढ़ सकते हैं )

Sunday, July 20, 2008

कवि और समाज

दोस्तों,
हमारे समय के बेहतरीन कवि असद जैदी और मंगलेश डबराल इन दिनों बेहद कुत्सित दिमागों द्वारा घृणित ढंग से निशाने पर हैं. पिछले दिनों सामान की तलाश शीर्षक से असद की एक महतवपूर्ण कविता आयी. १८५७ को लेकर लिखी गयी यह कविता तब और अब के व्यापक संकटों, तब और अब हमारे इलीट की गद्दारी आदि को भी सामने रखती है. ये इस कवि का कसूर ही मान लिया गया और पुराने नवजागरण में बाधा बने रहे वर्ग के वंशज उन्हें सांप्रदायिक और न जाने क्या-क्या करार देने लगे. सामान की तलाश शीर्षक से ही आए संग्रह की कई महत्वपूर्ण कविताओं का भी मुर्खता और धूर्तता के मिश्रण से कुपाठ परोसकर वितंडा खडा करनेकी कोशिश की गयी. हैरत की बात यह है कि इस अभियान की खुलकर अगुआई करने वाले शख्स ख़ुद को लेफ्ट केक्रन्तिकारी धडे से भी बताते रहे हैं जबकि उनका कुल योगदान पुनरुथानवाद को बेहद सामंती, जातिवादी और साम्प्रदायिक ढंग से हवा देने भर का रहा है, तो क्या यह नही माना जाय कि इस तरह कि प्रविर्त्ती आर एस एस में ही नहीं बल्कि हमारे उदार, वामपंथी और अति वामपंथी धडों के बीच भी बेहद आराम से पलती रहती है, बल्कि कहा जाय कि यदि हमारे भीतर जरा भी आत्म्शंश्य है तो हमें देखना चाहिए कि हमारे भीतर ही एक आर आर एस मजे मेंपलता रहता है. पुराना नवजागरण सिर्फ़ एक ओट होता है, जिसकी आड़ में हम अपने सामंती, जातिवादी और साम्प्रदायिक खेल खेलते रहते हैं. मुझे लगता है कि यह मसला किसी एक मंगलेश, किसी एक असद का नही है बल्कि पूरे हिन्दी समाज के संकट का है. कहने की जरुरत नहीं है कि इस पीढी के मंगलेश, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, मनमोहन, असद जैदी, अरुण कमल, राजेश जोशी आदिसभी ने अपने-अपने ढंग से कविता को समृद्ध किया,उसे नया मुहावरा दिया. दुखद यह भी है कि नए दौर ने विमर्श और आदान-प्रदान की जगह कम की हैऔर हमारे कई समझदार व् जिम्मेदार लोग भी ऐसे मसलों पर निजी बैर याद कर या तोचुप्पी साध बैठते हैं या फिर.....। देश और समाज जिस संकट से दो-चार है, उसके मद्देनज़र हमारे समर्थ और जिम्मेदार रचनाकारों से हम ज्यादा व्यापक एकजुटता की उम्मीद रखेंगे ही और संवेदनशील व् जागरूक लोगों से भी.

Saturday, July 19, 2008

Three top scientists caution on deal

Sandeep Dikshit
NEW DELHI: Three of the country’s top nuclear scientists have said that once the nuclear deal is in place, India’s commercial nuclear interaction with other countries will be “firmly controlled” by Washington through the Hyde Act enforced through the U.S. “stranglehold” on the Nuclear Suppliers Group.
The scientists — P. K. Iyengar (former chairman, Atomic Energy Commission), A. Gopalakrishnan (former Atomic Energy Regulatory Board chief) and A.N. Prasad (former Bhabha Atomic Research Centre Director — have written a letter of appeal to Members of Parliament (MPs) on the Indo-U.S. civilian nuclear cooperation and pointed out several lacunae in the draft safeguards agreement with the International Atomic Energy Agency (IAEA).
“We are strongly of the opinion that the government should not seek the IAEA Board’s approval for the current draft safeguards agreement until its implications are debated more fully within the country and with a group of experts who were not party to the IAEA negotiations,” they observed, adding that analysts had convincingly refuted the government’s main reason for pushing the deal — energy security to the country.
The deal will not be governed by the bilateral 123 Agreement because it is anchored in U.S. domestic laws, including the Hyde Act, which contains several stipulations “extraneous to the issue of bilateral nuclear cooperation, including foreign policy behaviour which India needs to adhere to if the deal is to be kept alive.” “India-specific?”
The deal could also have other serious repercussions, including a potential weakening of India’s nuclear deterrent and an inability to protect & promote indigenous R&D efforts in nuclear technology.
They expressed doubts about the safeguards agreement being India-specific. For, it was “distinctly” clear from the Hyde Act and the 123 Agreement that no uninterrupted fuel supplies were guaranteed. “The government had assured that this defect will be corrected in the safeguards agreement but since the IAEA was all along known to be no fuel-supply guarantor, it is not surprising that Indian negotiators have failed to obtain any assurance in this regard.”
“The corrective measures mentioned in the preamble to the safeguards agreement have nothing that anchors them to any section in the operative part of the agreement.”
“The nation would like to know clearly what these corrective measures are, before plunging headlong into this deal. India being merely allowed to withdraw the Indian-built civilian [pressurised heavy water reactors] PHWRs from safeguards, and that too after stripping them of all spent & fresh fuel and components of foreign origin, is not a corrective step because this action does not ensure uninterrupted operation in the event of disruption of foreign fuel supplies.”
“Even here, Article 32 of the Safeguards Agreement appears to stand in the way of any such withdrawal. Besides, this relaxation does not apply to the imported power reactors, which will use up the bulk of our investments in nuclear power; these units will perpetually stay under safeguards, even after fuel supplies are denied,” noted the scientists.
The scientists also drew attention to the fact that the Hyde Act prohibits the U.S. administration from directly or indirectly assisting India with lifetime fuel supplies after suspension of the deal. “Therefore, the government owes a clarification to the Parliament and the public about how they intend to avoid the consequential huge economic loss from the non-operation of these extremely costly imported reactors, as a result of fuel denial.”
The government also needs to clarify its thinking on the Additional Protocol before entering into the safeguards agreement. The government had pledged to secure an unqualified right to reprocess spent-fuel and even termed India’s right to reprocess “non-negotiable.” But the 123 Agreement has an “empty theoretical right” to reprocess.
The actual permission will come after years, when a dedicated state-of-the art reprocessing plant is built anew to treat foreign fuel, along with a host of allied facilities.
Similarly, there are many other key safeguards-related issues which have been unaddressed in the draft safeguards agreement and none had been handled adequately or in an acceptable manner.
“We therefore appeal to the Members of the Lok Sabha to direct the government not to proceed further with the current safeguards agreement, and ask the Prime Minister to initiate wide-ranging and structured deliberations on the deal to develop a broad consensus among political parties,” they said।

(From - THE HINDU)

Tuesday, July 15, 2008

हीरा डोम की कविता

हमनी के रात दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेबे से मिनती कराइबी ।
हमनी के दुख भगवनवो न देखत जे
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबी
पदरी साहब की कचहरी में जाइबजा ।
बेधरम हो के अंगरेज बन जाइबी ॥
हाय राम धरम न हमसे छोड़त बाजे ।
बेशरम होके कहाँ मुहवाँ दिखाईबी ॥
खंभवा को फारी प्रह्लाद के बचवले जा ।
ग्राह के मुंह से गजराज के बचवले ॥
धोती जुरजोधना के भइया छोरत रहे ।
परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले ॥
मारले खानवा के पत ले विभीखना के ।
कानी उंगली पे धैके पथरा उठाइबे ॥
कहाँ लो सुतल बाटे सुनत न बाटे अब ।
डोम जानी हमनी के छुए से डेरइले ॥
हमनी के इनरा के निगीचे ना जाइबजा ।
पांकि में से भरी भरी पियतानी पानी ॥
पनही से पीटी पीटी हाथ गोड़ तोड़ ले हों ।
हमनी के इतना काहेको हलकानी
हमनी के रात दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेबे से मिनती कराइबी...

(1913 में हंस में प्रकाशित)

Tuesday, June 3, 2008

धीरेश का जिद्दी राग

परसों धीरेश से मुलाकात हुई। दफ्तर आया था। अपनी बीमारी को आधे से ज्यादा परास्त कर चुका है वह। चेहरे पर थकान तो थी, पर पहले के मुकाबले बेहद कम। अभी महीने भर और छुट्टी पर रहेगा।
उसने ब्लॉग पर लिखा भी था :

'साथियो! मनमोहन की ये टिपण्णी अधूरी है. कई दिन पहले मैंने खासी दिक्कत में टाइप की थी. अब आगे टाइप करने के आसार फिलहाल नहीं. अधूरी चीजों में भी सार महसूस किया जा सकता है यही सोचकर इसे पेस्ट कर रहा हूँ. गर ठीक होता हूँ तो लौटकर फिर सिलसिला शुरू करने की कोशिश करूंगा।'

सचमुच, उसका शरीर उससे दगा कर रहा था। पर मन और मस्तिष्क की हिम्मत उसके दगाबाज शरीर को वफादार बना रही है।

दफ्तर में जब वह आया, कई साथी उसे घेर कर हालचाल लेते रहे। इसी बीच उसने कागज के एक टुकड़े पर इस ब्लॉग का लॉगइन नेम और पासवर्ड लिखा और मुझे थमा गया। बीमारी के दौरान भी उसे इस ब्लॉग की चिंता लगी रहती थी। एक-दो दफे कहा भी, अनुराग भाई कुछ डाल देना। तभी मुझे लगा कि वह जिद्दी धुन है। वैसे, सही है कि वह जिद्दी भी है और धुनी भी।

बहरहाल, उससे इस बार मिलना और उसके चेहरे पर ताजगी देखना बहुत सुकून दे गया। उम्मीद है बेहद जल्द वह लौटेगा अपने इस ब्लॉग पर हमसबों के लिए अपने और हमारे टेस्ट की चीजों के साथ। फिलहाल, इस जिद्दी धुन की पसंद की कुछ पंक्तियां हमसबों के लिए :

तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर
अगर है कहीं स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर
सितम के ये चार दिन, ये गम के और चार दिन
ये दिन भी जाएंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन
कभी तो होगी इस चमन पर बहार की नजर
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर

Monday, April 14, 2008

मनमोहन की एक अधूरी टिपण्णी (नवजागरण के नायक)

यह एक विलक्षण लेकिन बड़ा ही अर्थपूर्ण ऐतिहासिक संयोग है कि १२ अप्रैल को सफदर के जन्मदिन (नुक्कड़ नाटक दिवस) के साथ ११ अप्रैल को ज्योति बा फुले और १४ अप्रैल को बाबा साहब भीमराव अम्बेडकरका भी जन्मदिन है। बीच में १३ अप्रैल को बैसाखी का दिन जलियांवाला बाग़ की याद दिलाता है। १३ अप्रैल हमारे इतिहास का ऐसा रक्तरंजित पन्ना है जिस पर हमारी आजादी की लड़ाई और साम्राज्यवाद की दिल दहला देने वाली दास्तान लिखी गई। इस घटना ने साम्राज्यवाद की न्रिशंस्ता और हृद्य्हीनता का नग्नतम रूप सामने ला दिया। जलियांवाला बाग़ का रक्तपात व्यर्थ नहीं गया। इसके बाद हिन्दुस्तान में क्रांतिकारी आन्दोलन की लौ रोशन हुई। आज़ादी की लड़ाई की लहर और ऊंची उठी। ऊधम संघ की शहादत अशफाकया उसके बाद अशफाक या या याबिस्मिल, अशफाक या उसके बाद भगत सिंह और उनके साथी युवाओं के बलिदानी संघर्ष के पीछे भी इस घटना की वेदना की अग्नि कहीं न कहीं मौजूद थी। गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन को जो अभूतपूर्व सफलता मिली, उसमें भी जलियांवाला बाग़ के खून का रंग मिला था।
ज्योति बा फुले दलित आन्दोलन के मसीहा हैं और भारतीय नवजागरण के अप्रतिम नायक हैं। ज्योति बा और उनके सत्यशोधक समाज ने बड़े ही बुनियादी ढंग से १९वीं शताब्दी में समाज-सुधार आन्दोलन के प्रश्नों को उठाया। ज्योति बा ने बताया कि हमारी आजादी का रास्ता हमारे सामाजिक रूपांतरण से होकर गुजरता है। धर्म और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों और दलितों को पैर की जूती बनाकर शेखियां बघारने वाला समाज इस लायक नहीं कि वह आज़ादी की किसी लड़ाई को लड़ सके या भारतीय संस्कृति की छत्रछाया में पलने वाली इस उत्पीड़क गुलामगीरी और बेगारी का अंत होना चाहिए तभी साम्राज्यवादी गुलामी से आज़ादी का कोई अर्थ है।
ज्योति बा फुले और सावित्री बाई फुले ने यह भी बताया कि दलितों के प्रश्न महिलाओं के प्रश्न के साथ अभिन्न रूप से जुड़े हैं। सामाजिक बराबरी की कोई भी लड़ाई स्त्रियों की बराबरी की लड़ाई के बिना निरा ढोंग सिद्ध होगी। १९वीं सदी के समाज-सुधार आन्दोलन में जो चेतना ज्योति बा में दिखाई दी थी.....
(साथियो! मनमोहन की ये टिपण्णी अधूरी है. कई दिन पहले मैंने खासी दिक्कत में टाइप की थी. अब आगे टाइप करने के आसार फिलहाल नहीं. अधूरी चीजों में भी सार महसूस किया जा सकता है यही सोचकर इसे पेस्ट कर रहा हूँ. गर ठीक होता हूँ तो लौटकर फिर सिलसिला शुरू करने की कोशिश करूंगा)

अम्बेडकर जयंती पर

भीमराव अम्बेडकर के विचार
-हिंदू धर्म में रहकर जातिप्रथा समाप्त करने का प्रयास मीठे जहर को चाटने के समान होगा।


-हिन्दूवाद आजादी, बराबरी और भाईचारे के लिए एक खतरा है। इसी कारण इसका लोकतंत्र से कोई मेल नहीं, यह उसका विरोधी है।



-हिंदू धर्म जो असमानता और अन्याय की विचारधाराओं पर आधारित है, गरिमा एवं उत्साह के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता।



-मैं घृणा करता हूँ अन्याय से, ज़ुल्म से, आडम्बर से व पाखण्ड से, छल कपट और बकवास से। जो लोग इनके अपराधी हैं, वे सभी मेरी घृणा की लपेट में आते हैं।



-हिंदू समाज एक ऐसी मीनार के समान है जिसमें अनेक मंजिलें हैं, पर उनमें प्रवेश के लिए कोई द्वार नहीं है। व्यक्ति उसी मंजिल में दम तोड़ेगा जिसमें वह पैदा हुआ।



-हिंदू समाज व्यवस्था की जड़ में वह धर्म है जो मनुस्मृति में निर्धारित है......जब तक स्मृति-धर्म की वर्तमान नींव को उखाड़कर कोई नवीन नींव नहीं डाली जाती, तब तक हिंदू समाज से असमानता का अंत सम्भव नहीं होगा...
-भीमराव अम्बेडकर

Saturday, April 12, 2008

नेपाल में सुर्ख सवेरा



यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से खल्क
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई
(फैज़)

Thursday, April 10, 2008

Who Would Wipe Professor Sanaullah Radoo's Tears ?

Professor Sanaullah Radoo, Principal of a Degree College in Sopore, Jammu-Kashmir still remembers the day when his youngest son Pervez had reached the airport in Srinagar in a hurry to catch the next Spice Jet flight to Delhi.(12 September 2006). The moment the flight landed in Delhi, he had even made a call to his Abboo ( father in colloquial terms - as he used to fondly call him) informing him that he is rushing to get the boarding pass to the next connecting flight for Pune. Little did he could have any prenomition then that what was in store for him.
It has been more than nineteen months that Pervez is in detention and right now lodged in Jail no 01, Ward no 01, Barrack no. 02, Tihar, Delhi. And as of now all his dreams to undertake research on the variety of rice found in Kashmir stands suspended. Young Pervez Ahmad Radoo, who had already finished his post-graduation in Zoology from Modern College in Pune was seeking admission to Ph.D. for which he was going to Pune.
In fact, the moment Pervez approached the airline staff to get his boarding pass at Delhi airport, he experienced that he has been surrounded by seven-eight people who held him firmly and took away his luggage and straightaway drove him to Lodhi Colony Special Cell office. In a letter (Combat Law, March-April 2008) he provides details of the manner in which he was 'tortured and interrogated severly' and how he was 'beaten up ruthlessly' and was given 'electric shocks'.
If one were to believe Special Cell of the Delhi Police, Pervez was arrested on October 15, 2006 from Azadpur Mandi in the city with "three kgs of RDX and Rs 10 lakh as hawala money along with other incriminating evidence" proving him to be a "Jaish-e-Mohammed terrorist".
Professor Sanaullah has been running from pillar to post for the last around eighteen months so that his youngest son gets a 'fair trial' and comes out of jail unscathed and is able to resume his research work. The fact is that for around one month Professor did not know that Pervez has not landed in Pune rather he was in detention. He has also presented a memorandum to the National Commission on Minorities ( NCM) to press harder for their intervention. Mohammad Shafi Qureshi, Chairperson of NCM, who has looked into the case and has also written to the Delhi police was candid enough to share his views on the subject with a reporter ('Mail Today' , Delhi, March 6, 2008 - NCM fights for release of J & K youth in Tihar) :
"It is hard to believe the police version when one sees the clean chits given by the police superintendent and additional district magistrate of Sopore, his native town, and from the local resident welfare association (RWA)। Most importantly, the certificate given by Spicejet for the same day shows him as boarding the plane for Delhi from Srinagar and then also bound to travel further to Pune. These facts have been completely ignored by the Special Cell.'

Trying to control his tears Professor Sanaullah Radoo tells the reporter the manner in which police have turned a promising young scientiest into a 'bomb-man' 'He should be completing his research on a rice species in Kashmir valley, instead he is inside prison facing charges of terrorism.' He clearly says the police 'are lying'. He is also not sure whether his son would receive a fair trial or not and whether he has been provided an able prosecution to defend his case or not.
Pervez's jail diary, which has appeared in a section of the media, puts further light on his plight. In his letter asking to 'Save My Career, As I Am Innocent' he poignantly asks 'Am I not Indian, if I am Kashmiri. Why this discrimination. When tall claims are being made by the govt of India, by media, that before law all citizens are equal.'
Of course it would not be cliche to state that the story of the metamorphosis of a student of Zoology into a 'bomb-man' is not the only one of its kind. In fact not a day passes when one does not hear about the illegal detention of a youth from the minority community on some frivolous charges.
Just a day before 'Mail Today' carried the above mentioned story about Pervez, it had provided details of a case involving a 'terrorist' gutkha manufacturer getting bail ( Mail Today, March 5, 2008). According to the report filed by Piyush Srivastava, ' Barely six months ago, 35 year old Imran Ismail Memon was termed as a terrorist, gangster, a hawala racketeer, a smuggler and a manufacturer of adulterated Gutkha.' Imran Ismail Memon, a resident of Thane in Maharashtra was arrested by the Rae Bareli police on August 25, 2007. Police said he was part of a "terrorist module" and had started a "illegal and adulterated gutkha factory" as a cover-up to stay in the district. Lucknow bench of the Allahabad highcourt granted bail to him because of lack of evidence. It also added that ' the police could not even prove the power theft charge against him.'
May it be the case of Aftab Alam Ansari, an employee of the Calcutta Electricity Supply Corporation who was arrested on 27 th December 2007 as 'main accused behind the serial blasts in no of courts in UP' or for that matter the case of a poor fruit vendor from Kashmir who was presented before the media as a 'prize catch' responsible for blasts on the eve of Diwali in Delhi two years back, it is clear to any layperson that with the ascendance of the Hindu right forces in the Indian polity and in the ambience which has been created the world over post 9/11 such targetting of innocents from the minority community has become all the more common.
All of us were witness to the travails of Aftab Alam Ansari who was tortured for 22 days that he spent in police custory after his arrest on December 27, 2007 in order to make him confess that he was Mukhtar alias Raju, resident of Malda district in West Bengal and had Rs. 6 crores in his bank account.
A biggest irony of the whole situation is that while terrorist acts committed by Hindutva organisations are not even reported or all attempts are done to cover them up, innocents from the minority community are apprehended claiming them to be associates of this or that dreaded terrorist organisation. The media which is supposed to be a watchdog of democracy also joins the malicious campaign where it has no qualms in calling all such people as terrorists rather than accused awaiting trial in court. It does not bother it that such trial by media is not only unethical but also violates the basic ethics of responsible and fair journalism.
To be very frank, this is not to condone any of such terrorist acts if they occur in any part of the country, rather one would want that the law of the land should be equally applicable in all such cases and it should not appear that it is favouring/targetting a particular community.
Things have reached such a pass that it would not be an exaggeration to say that it is a new trend where 'terrorisation' and 'stigmatisation' of the minority community is reaching menacing proportions. The pattern of mindless arrests for the sake of branding innocent persons as terrorists and resorting to relentless torture is coming under increasing scrutiny. And it is quite natural that it is giving rise to perceptible anger all across the country.
Perhaps the recent decision of the UP government asking a retired judge to ascertain whether two persons arrested for the court blasts in state are indeed terrorists or not, is an indicator of the pressure governments are facing over repeated complaints that the state police is implicating Muslims as terrorists. The case involves the arrest of Khalid Mujahid and Tariq, claiming them to be members of Harkat-Ul-Jehadi (HUJI) who were implicated for executing the serial blasts that left 14 people dead. If one searches the record of the Jamia Tul-Salahat Madarsa in Jaunpur where Khalid use to teach, it tells us that not only he was present on the day (23 Nov) in the Madarsa but had also checked the copies of the students.The judge has been asked to cross-check the UP police story which says that Khalid landed in Lucknow in a bus on November 23 morning, met other accomplices, bought new cycles, planted bombs in Lucknow court premises and returned immediately to Jaunpur.
One can just go on narrating instances of the highhandedness of the police and the callousness of the polity in turning a blind eye towards continuous stigmatisation of a particular community.As already mentioned this is an understanding which has received a new boost in the aftermath of 9/11 and the ‘war against terror’ unleashed by the US regime, to further its imperialist ambitions.
Any impartial enquiry into the state of affairs would make it clear that the need of the hour is to understand that ‘terrorism’ cannot be the monopoly of a particular community. It is a product of the typical circumstances which societies encounter or find themselves in and the nature of the dominant or dominated forces in operation in those societies and their larger worldview.
There is no denying the fact that civil society at large at some level has accorded legitimacy to all such actions by the police. If that would not have been the case there would have a uproar at the national level when it was revealed that how 'intelligence bureau operatives colluded with Delhi police to brand two of its own informers as dreaded terrorists'. It was sheer coincidence that the matter reached CBI which exposed the dark machinations of the dirty tricks brigade.
A writeup in Times of India 'IB, cops in murky frame-up' (By Sachin Parashar, New Delhi, 13 September 2007) had presented all relevant details of the case.
New Delhi: The CBI has found that Intelligence Bureau operatives colluded with Delhi Police special cell sleuths to ‘plant’ RDX on two youths who were arrested as ‘Al Badr terrorists’, TOI has learnt. The shocking conclusion comes a month after the agency told the Delhi High Court that the special cell’s probe into the murky affair “didn’t inspire confidence”.
Top CBI sources told TOI on Wednesday that the seized RDX appeared to have been planted on the two ‘terrorists’ Mohd Moarif Qamar and Irshad Ali. The agency will submit its report, which indicts officers of IB and Delhi Police special cell, to the court on October 24.
While similar episodes in the past have hurt the credibility of the anti-terror agencies, this one stands out because it marks a rare instance where Intelligence Bureau operatives collaborated in the plot hatched by Delhi Police’s special cell against its former informers.
Few months back one was witness to a furore over the violation of human rights and dignity of Dr Haneef in Australia. Thanks to the support provided by international media and human rights organisations and the concern expressed in the polity here, it did not take much time for either the Australian judiciary and executive to release Dr Haneef. We were also told then that our honourable Prime Minister Manmohan Singh personally felt disturbed over the plight of Dr Haneef and could not sleep that night.
Perhaps it is high time that the honourable Prime Minister is told that 'Dr Haneef' is not just the name of doctor who was wrongly apprehended in Australia rather it is another name for a phenomenon which is quite rampant in this part of the earth.
And the case of Pervez Ahmad Radoo is one such important case which demands his immediate intervention. Such a move only can bring back the smile on Professor Sanaullah's face !
-subhash gatade, H 4 Pusa Apts, Rohini Sector 15, Delhi 110085. Ph - 01127876523

Wednesday, April 2, 2008

सिमोन द बउआर से पहले स्त्री विमर्श का भारतीय मुहावरा महादेवी वर्मा की कलम से निकला था

महादेवी वर्मा को अध्यापकों-आलोचकों की बदौलत पीडा, वेदना, आंसुओं की, विरह की कवयित्री कहा जाता रहा है. `नीर भरी दुःख की बदली' का जिक्र कर उन्हें अपने ढंग से याद कर लिया जाता है. उन्हें आधुनिक युग की मीरा भी कहा जाता है. जाहिर है कि पितृसत्ता को चुनौती देने निकली मीरा की तरह ही महादेवी को भी रिड्युस करने की कोशिश लगातार हुई है. पिछले कुछ समय से इस लम्बी साजिश के खिलाफ महादेवी के पुनर्पाठ की जरूरत महसूस की जाने लगी है. हाल-फिलहाल में साहित्य अकादेमी ने तीन दिन की गोष्ठी महादेवी पर की. यों तो वहाँ (खासकर शुरू के दिन) हिन्दू सम्मेलन सा माहौल रहा. चुटियाधारियों की पा-लागी की महिमा और चलताऊ या यथास्थितिवादी और मास्टरनुमा बातें छाईं रहीं (असद जैदी की इस अकादमी के हिन्दुकरण की तस्वीर वाली कविता वाजिब ही है). हालांकि बाद के सत्रों में गौरतलब लोगों ने गौरतलब बातें कीं. उनमें से कुछ के हिस्से या सार आपके लिए दे रहा हूँ.
शुरुआत मैत्रेयी पुष्पा के पर्चे के एक टुकड़े से-
...और महादेवी वर्मा की `श्रृंखला की कडियाँ'? रोमानियत के बरक्स ठोस आधार बनाती है. आज `स्त्री विमर्श' कितनी-कितनी सहायता ले सकता है, उस पुस्तक से. खुद महादेवी ने अवसाद के गीत छोड़ दिए. अकेला पथ अब व्याकुल नहीं करता क्योंकि अपना बनाया हुआ रास्ता है. हमने अपने स्त्री-अध्ययन के दौरान यह भी पड़ताल की कि सभी की स्थिति का जैसा वर्णन `सिमोन द बउआर' ने किया है या नहीं किया, कि प्रमाणित हो जाये, स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है. मगर हमने पाया कि `श्रृंखला की कडियाँ' निश्चित ही उस अबूझ से निकली जाग्रत चेतना का वह पुंज है, जिसे हम केवल देख ही नहीं सकते, छूकर महसूस कर सकते हैं. महादेवी वर्मा, अपने रूप में वीतरागिनी, कुछ ऐसे वाक्य लिखकर अपने समाज के सामने रख सकती हैं, जिनकी उम्मीद हम सिमोन से ही कर सकते हैं. और समय जानकार आश्चर्य हुआ कि `श्रृंखला की कडियाँ' छपने का साल `द सेकेंड सेक्स' से बहुत पहले का है. सन् १९४२ में महादेवी क्रूर और बर्बर कबीलाई सामंती समाज के सामने आयीं थीं. समाज को यह बताने कि- `स्त्री का सम्पूर्ण रूप क्या होता है? कब होता है, होता भी है या नहीं?' वैसे इन बातों का निर्णय कौन करेगा? मान लीजिए एक सिपाही युद्ध क्षेत्र में है, जिसके नेत्रों में मृत्यु की छाया नाच रही है। उस सैनिक के निकट एक स्त्री है, केवल स्त्री. उस स्त्री के त्याग, तपस्या, प्रेम आदि गुणों का वह क्या करेगा? इन गुणों का विकास तो साहचार्य से ही संभव है. सवेरे तलवार के घाट उतरने या उतारने वाला तो स्त्री की रूप-मदिरा का केवल एक घूँट चाहता है. वह उसके दिव्य गुणों का मूल्य अंकन का समय कहाँ पावे? यदि पा सके तो उनको कितने क्षण अपने पास रख सकेगा?
महादेवी वर्मा हमारी चेतना को और भी जगाती हुई कहती हैं- बाहरी क्षेत्र संघर्ष का क्षेत्र है, उसे स्त्री आंसुओं से गीला नहीं करती, पुरुष के सामने कर्तव्य-अकर्तव्य का अंतर स्पष्ट करती है। बेशक उसकी ऐसी बौधिक चुनौती पुरुष को रास न आये. क्या पुरुष भी बिना स्त्री के जीवन की रुक्षता को वहन कर पाएगा?
`नीर भरी बदली' में बिजली ने प्रवेश कर लिया और विस्फोट सा हुआ की - रोम-रोम विधाता से प्रतिशोध लेने के लिए जल उठा। जो अस्त्र निष्ठुर संहार के कारण त्याज्य जान पड़ते थे, आभूषण हो गए. और महादेवी ने ऐलान कर दिया- स्त्री को अपनी अनेक इच्छाओं को कुचलकर रहना पड़ता है. राजनैतिक अधिकारों से पहले उसे ऐसी सामजिक व्यवस्था की आवश्यकता है, जिससे से जीवन में स्वावलंबन आए. आत्मविश्वास जागे. आज इतने साल बाद हमारी धरती पर महादेवी का सपना इबारत लिख रहा है- शासन व्यवस्था में स्त्री को स्थान मिले. लेकिन उसे केवल पुरुष परिषदों को अलंकृत करने के लिए नहीं रखा जाए. उसके अस्पष्ट विचारों को स्पष्ट करना और उन्हें क्रियात्मक रूपरेखा देना ही समाज के लिए हितकर होगा.आज हम धुंधलके में नहीं, २१वीं सदी चल रही है, इस के उजाले में साफ देख पा रहे हैं की महादेवी को अपने करुण तरल गीतों के लिए जितना याद किया जाएगा, उससे ज्यादा `श्रृंखला की कडियाँ' का अवदान माना जाएगा. `नीर भरी दुःख की बदली' की जगह `श्रृंखला की कडियाँ' को पाठ्यक्रम में लगाया जाए तो बात बने. सनद रहे की सिमोन द बउआर से पहले स्त्री विमर्श का भारतीय मुहावरा महादेवी वर्मा की कलम से निकला था.

ये कैसा समर्थन

अपरिहार्य कारण से कई दिन ब्लॉग पर गैरहाजिर रहा। ये अपरिहार्य शायद अभी परेशान करे। बहरहाल एक बात मुझे परेशान कर रही है। शिवानी की हत्या के आरोप में आर के शर्मा ने अम्बाला में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी दी थी। उसने एक गिलास में कुछ (शायद पानी) पीया और फिर उसकी बेटियों ने उससे घूँट लीं, फिर उसके वहां जमा समर्थकों ने (अफसरों के समर्थक कौन लोग होते हैं , मैंने तब अनुमान लगाया था )। बात यह कि इस तरह की कारगुजारियों के बाद भी पत्नी, बेटियाँ और माँ क्यों बचाव में खडी होती हैं। अमेरिका में हाल में जो गवर्नर सेक्स स्कंडल में फंसा, उसके साथ भी प्रेस के सामने उसकी पत्नी (भले ही मुरझाये चेहरे से आयी, खडी थी )। और भी ऐसे तमाम मसलों में ऐसा देखा गया। ये क्या है?

Wednesday, March 26, 2008

आरके, राजबीर, गिल आदि-आदि के रेकॉर्ड

हरियाणा काडर का सीनियर पुलिस अफसर आर के शर्मा आखिरकार पत्रकार शिवानी की हत्या के केस में दोषी करार दिया गया। अखबारों के मुताबिक उसके चेहरे पर राहत थी और वह ख़बरों में संयम बरतने की नसीहत भी दे रहा था। ज़ाहिर है, उसे मिली उम्रकैद राहत की तरह ही है। मानकर चला जाता है कि अगली कोर्ट में इसके कम हो जाने की गुंजाइश रहती है। गौरतलब है अदालत की यह टिपण्णी कि शर्मा का आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और उसका सर्विस रेकॉर्ड भी अच्छा रहा है। ज़ाहिर है कि पुलिस के ऐसे अफसरों का आपराधिक रेकॉर्ड हो भी कैसे सकता है। सर्विस रेकॉर्ड भी अजब चीज है। पुलिसअफसर का रेकॉर्ड तो और भी ज़्यादा। कई अफसरों का रेकॉर्ड तो `अपराधियों' को कथित एन्कोउन्टर में मारकर चमकता रहता है। जो लोग सच को झुठलाना नहीं चाहते, वे जानते हैं कि लगभग ९९ फीसदी एन्कोउन्टर फर्जी होते हैं और कई बार एक पुलिस अफसर अपने इलाके के किसी आपराधिक रेकॉर्ड के आदमी को दूसरे प्रदेश के अपने दोस्त अफसर को सौंप देता है ताकि वह उसे मारकर अपना रेकॉर्ड चमका सके, आउट ऑफ़ टर्न परमोशन पा सके। हद तो तब होती है, जब एन्कोउन्टर स्पेशलिस्टकहे जाने वाले पुलिस अफसर बाकायदा अपराधियों के टूल की तरह काम करने लगते हैं। ऐसे पुलिस अफसर एक माफिया से मोटा पैसा लेकर उसके दुश्मन का कत्ल कर देते हैं। इस तरह की आपराधिक करतूतों को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की जाती है कि आख़िर बदमाश तो मारा ही गया । ऐसा कहने वाले लोग यह समझने की कोशिश नहीं करते कि एक पुलिस अफसर का माफिया का शूटर बन जाना कैसी बात है। जहाँ तक आम आदमी के आपराधिक रेकॉर्ड की बात है तो वह मामूली मुकदमों से ही लगातार ख़राब होता रह सकता है। अक्सर पुलिस किसी एक केस में फंस गए आदमी पर ही तमाम केस थोपती रहती है।

बहरहाल, मैं आर के शर्मा के बेहतर रेकॉर्ड के बारे में सोच ही रहा था कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले दिल्ली के पुलिस अफसर राजबीर के कत्ल की ख़बर आयी। जिस तरह गुडगाँव के एक प्रोपर्टी डीलर के यहाँ राजबीर का कत्ल हुआ, उसी से काफी बातें साफ हो जाती हैं। नेचुरल जस्टिस जैसी बात कहने वाले भी हैं। लेकिन हम आर के शर्मा की बात कर रहे थे जिसका सर्विस रेकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है और जिसने शिवानी के साथ प्रेम सम्बन्ध बनाये और माँ बनने पर वह शादी के लिए दबाव देने लगी तो उसका कत्ल करा दिया। ज़ाहिर है ऐसे कत्ल बेहद ठंडे दिमाग से कराये जाते हैं और इतने बड़े अफसर के फंसने के चांस यानि रेकॉर्ड ख़राब होने के चांस भी कम ही होते हैं।

इन दिनों होकी को `सुधारने' में जुटे गिल साहब का रेकॉर्ड तो पंजाब में आतंकवाद खत्म करने का है। ऐसे में उन्हें किसी भी महिला कि बेइज्जती करने का हक़ मिल जाता है क्या? जिस महिला से उन्होंने छेड़खानी की थी, वह अफसर ही थी लेकिन उस पर कितना दबाव रहा, केस न लड़ने का, यह सभी को मालूम है। गिल को लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद दोषी तो माना गया, लेकिन महज जुर्माना किया गया। पैसे वाले लोग तो यों भी औरतों को पैसे से खरीदना चाहते हैं...औरत की डिग्निटी की कीमत रुपयों का जुर्माना ? लेकिन मामला मर्द अफसरों के रेकॉर्ड का है...मर्दों का रेकॉर्ड ही काफी होता है, फिर मर्द अफसर....

Thursday, March 20, 2008

होली, हुसैन और नज़ीर


हुसैन दुनिया के बड़े चित्रकार हैं, पर वह हिंदुस्तान में पैदा हुए हैं, यहाँ की मिट्टी में पले-बढे हैं, और यही मिट्टी उनके चित्रों में ढंग-ढंग से खिल उठती है। भारतीय त्यौहार, मिथ और तमाम सांस्कृतिक अनूठेपन उनके यहाँ और भी ज्यादा जीवंत, और भी ज्यादा मानीखेज, और भी ज्यादा उत्सवधर्मी हो उठते हैं। जाहिर है, होली हिन्दुस्तान का एक निराला त्यौहार है-रंगों का त्यौहार. तो यह भी स्वाभाविक है कि रंगों के इस उस्ताद के यहाँ होली का उत्सव भी मिलेगा। उसकी एक बानगी होली के मौके पर आपके लिए- (इस अफ़सोस के साथ कि इस त्यौहार के मौके पर वो निर्वासन की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं, उन की वजह से जिन्होंने देश में खून की होलियाँ खेली हैं और जिन्होंने देश की तबाही के मंज़र के सिवा कभी कुछ नही रचा है )।
नज़ीर अकबराबादी भी हुए हैं एक शायर, इसी मिटटी के..होली की मस्ती का रंग उनके यहाँ भी निराला है..उसका भी लुत्फ़ लीजिये (अब क्या कीजे, वो मरहूम हैं, वर्ना `संस्कृति` के कोतवाल उन्हें भी देशनिकाला दिला देते ) ...
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली क

परियों के रंग दमकते हों
खूँ शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
तब देख बहारें होली की

नाच रंगीली परियों का
कुछ भीगी तानें होली की
कुछ तबले खड़कें रंग भरे
कुछ घुँघरू ताल छनकते हों
तब देख बहारें होली की

मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अंगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों
तब देख बहारें होली की
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली क

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आप नजीर की होली यहाँ सुन भी सकते हैं-http://www.dhaiakhar.blogspot.com/

Thursday, March 13, 2008

हमीं हम हमीं हम---कुछ बातें

पिछले दिनों ठाकरे परिवार की करतूतों ने सभी संवेदनशील लोगों को झकझोर दिया। इस बारे में उत्तर भारत के प्रतिनिधि बनने वालों के बयान भी अजीब ही थे। इसी बीच अखबार में ठाकरे का एक कार्टून छपा जिसमें मुम्बई पर अकेले बैठा यह शख्स बोलते दिखाया गया कि यहाँ में अकेला रहूँगा। इसी बीच मुझे एनएसडी के दोस्त से मनमोहन की ये कविता मिली जो काफी पहले सांप्रदायिक ताकतों को ही लक्ष्य करके लिखी गई थी. मैं इसे ब्लॉग पर देना चाह रहा था पर इस बीच ब्लॉग की दुनिया में आए प्रगतिशीलों को ही बचकाने ढंग से लड़ते पाकर और दुःख हुआ। लगा वहां भी, वैचारिक विमर्श और संकट में मिलजुलकर बड़ी लड़ाई के लिए तैयार होने के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने का भाव गहरा हो रहा है। एक तरफ़ पूंजीवादी, साम्राज्यवादी और सांप्रदायिक ताकतों ने मिलकर आम आदमी से लेकर न्याय के पक्षधर लोगों को भयंकर ढंग से अकेला कर दिया है और उस पर जिन्हें कुछ करना था, वे आपस में हमीं हम पर उतर आए हैं। बहरहाल यह कविता सांप्रदायिक ताकतों को लक्ष्य करके ही दे रहा हूँ पर आत्मालोचना और आत्मसंघर्ष हम सबके लिए लाजिमी है.....

हमीं हम हमीं हम

हमीं हम हमीं हम
रहेंगे जहाँ में
हमीं हम हमीं हम
ज़मीं आसमां में
हमीं हम हमीं हम
नफीरी ये बाजे
नगाडे ये तासे
कि बजता है डंका
धमाधम धमाधम
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

ये खुखरी ये छुरियां
ये त्रिशूल तेगे
ये फरसे में बल्लम
ये लकदम चमाचम
ये नफरत का परचम
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

ये अपनी ज़मीं है
ये खाली कर लो
वो अपनी ज़मीं है
उसे नाप डालो
ये अपनी ही गलियां
ये अपनी ही नदियाँ
कि खूनों के धारे
यहाँ पर बहा दो
यहाँ वहां तक
ये लाशें बिछा दो
सरों को उड़ाते
धडों को गिराते
ये गाओ तराना
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

न सोचो ये बालक है
बूढा है क्या है
न सोचो ये भाई है
बेटी है माँ है
पड़ोसी जो सुख दुःख का
साथी रहा है
न सोचो कि इसकी है
किसकी खता है
न सोचो न सोचो
न सोचो ये क्या है

अरे तू है गुरखा
अरे तू है मराठा
तू बामन का जाया
तो क्या मोह माया
ओ लोरिक की सेना
ओ छत्री की सेना
ये देखो कि बैरी का
साया बचे ना

यही है यही है
जो आगे अडा है
यही है यही है
जो सिर पर चढ़ा है
हाँ ये भी ये भी
जो पीछे खडा है
ये दायें खडा है
ये बाएं खडा है
खडा है खडा है
खडा है खडा है
अरे जल्द थामो
कि जाने न पाए
कि चीखे पै कुछ भी
बताने न पाए
कि पलटो, कि काटो
कि रस्ता बनाओ
अब कैसा रहम
और कैसा करम, हाँ
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम
रहेंगे जहां में
हमीं हम ज़मीं पे
हमीं आस्मां पे।
-मनमोहन

Tuesday, March 11, 2008

गाजा की शहीद रशेल कूरी

क्या आपको गाजा की शहीद रशेल कूरी की याद आ रही है? भगत सिंह की उम्र की ये लड़की करीब 6 बरस पहले गाज़ा में इस्रायल के बुलडोज़रों को रोकने की कोशिश में शहीद हुई थी। अमेरिका के साम्राज्यवादी निरंकुश शासकों के जूतों को भी चाटने को उतावले रहने वालों को हैरानी हो सकती है कि यह न्याय की चाहत रखने वाली और उसके लिए गाज़ा में शहादत देने वाली युवा लड़की अमेरिका की ही रहने वाली थी। एक पूरी आबादी को उजाड़ने की मुहिम को देख कर उसने शहादत से पहले अपने परिवार को जो मेल भेजे थे, उनमें भी उसकी न्याय के प्रति क़ुर्बानी और संवेदनशीलता की झलक थी। इसे आत्मतुष्ट, फर्जी लोग नहीं समझ सकते, वे तो गुजरात में भी जश्न मनाते हैं।
.......दरअसल मोहल्ला ब्लॉग पर फिलिस्तीन में हो रहे दमन के खिलाफ एकजुटता दर्शाने की अपील की गई थी। अब बहुत से लोगों को इस पर एतराज हो गया और वे बेशर्म जुमलों के साथ प्रतिकिरिया में आ गए। मैंने बेहद दुखी मन से ये याद दिलाने के लिए कि अन्याय का विरोध करना सिर्फ़ फिलिस्तीन के लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है। वे लड़ ही रहे हैं क्योंकि ये लड़ाई उनके हिस्से में आई है पर अमेरिकाजिसने ये कत्ल-ओ-गारत थोप राखी है, के रहने वाले न्यायप्रिय लोग भी अपने शाशकों के स्टैंड की परवाह किए बिना न्याय के पक्ष में खड़े होते हैं। और मैंने रशेल कूरी को याद किया। मोहल्ला ने इस टिपण्णी के साथ रशेल कूरी का वीडियो भी जोडा है, और हम इससे से प्रेरणा ले सकते हैं।

Saturday, March 8, 2008

आदमखोर - शुभा


एक स्त्री बात करने की कोशिश कर रही है
तुम उसका चेहरा अलग कर देते हो धड़ से
तुम उसकी छातियां अलग कर देते हो
तुम उसकी जांघें अलग कर देते हो

तुम एकांत में करते हो आहार
आदमखोर! तुम इसे हिंसा नहीं मानते


आदमखोर उठा लेता है
छह साल की बच्ची
लहूलुहान कर देता है उसे

अपना लिंग पोंछता है
और घर पहुँच जाता है
मुंह हाथ धोता है और
खाना खाता है

रहता है बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह
शरीफ आदमियों को भी लगता है
बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह।
-शुभा

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच - शुभा

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
मानवीय सार पर बात करना ऐसा ही है
जैसे मुजरा करना
इससे कहीं अच्छा है
जंगल में रहना पत्तियां खाना
और गिरगिटों से बातें करना।
-शुभा

अकलमंदी और मूर्खता - शुभा

स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए
पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है

पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए
स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि
स्त्रियों में भी मूर्खताएं होती हैं और पुरुषों में भी

सच तो ये है
कि मूर्खों में अक्लमंद
और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं
मनुष्यता ऐसी ही होती है

फिर भी अगर स्त्रियों की
अक्लमंदी पहचाननी है तो
पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फोकस करना होगा।
- शुभा

महिला दिवस?

जब हम पृथ्वी की आधी आबादी के ऊपर अनचाही विकलांगता मढ़ने के दोहरे दुष्प्रभावों को देखते हैं - एक तरफ उनसे जीवन का सबसे सहज, स्वाभाविक और ऊंचे दर्जे का आनंद छीन जाता है; और दूसरी तरफ जीवन उनके लिए उकताहट, निराशा और एक गहरी असंतुष्टि का पर्याय बन जाता है - तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि पृथ्वी पर एक बेहतर जिंदगी के मानवीय संघर्ष में स्त्रियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक प्रमुख और बहुत महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए। इस सम्बन्ध में पुरुषों के खोखले भय सिर्फ़ स्त्रियों को ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता को ही बन्धनग्रस्त किए हुए हैं - क्योंकि मानवीय प्रसन्नता के आधे झरनों के सूखने से पूरे वातावरण के स्वास्थ्य, सम्पन्नता और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। - जॉन स्टुअर्ट मिल की किताब `द सब्जेक्शन ऑफ़ विमेन` के हिन्दी अनुवाद `स्त्री और पराधीनता से`

Wednesday, March 5, 2008

देश हमारा

देश हमारा कितना प्यारा
बुश की भी आँखों का तारा

डंडा उनका मूंछें अपनी
कैसा अच्छा मिला सहारा

मूंछें ऊंची रहें हमारी
डंडा ऊंचा रहे तुम्हारा

ना फिर कोई आँख उठाए
ना फिर कोई आफत आए

बम से अपने बच्चे खेलें
दुनिया को हाथों में लेलें

भूख गरीबी और बेकारी
खाली-पीली बातें सारी

देश-वेश और जनता-वनता
इन सबसे कुछ काम न बनता

ज्यों-ज्यों बिजिनिस को चमकाएं
महाशक्ति हम बनते जाएँ

हम ही क्यों अमरीका जाएँ
अमरीका को भारत लाएं

झुमका, घुंघटा, कंगना, बिंदिया
नंबर वन हो अपना इंडिया

हाई लिविंग एंड सिम्पिल थिंकिंग
यही है अपना मोटो डार्लिंग

मुसलमान को दूर भगाएं
कम्युनिस्ट से छुट्टी पाएं

अच्छे हिंदू बस बच जाएँ
बाकी सारे भाड़ में जाएँ
-मनमोहन

Tuesday, March 4, 2008

अमरीकीकरण

मैं कभी अमरीका नहीं गया, बुलाया भी नहीं गया
इसकी संभावना कम है कि बुलाया जाऊँ
मेरे बच्चों की भी फिलहाल वहां जाने या बसने की
कोई योजना नहीं है
मेरा कोई नाती-रिश्तेदार, दोस्त भी संयोग से वहां नहीं है
तब भी मैं अमरीकी नज़र से दुनिया को देखता हूँ

मुझे अमरीकी हित, अंतर्राष्ट्रीय हित लगते हैं
कई बार लगता है कि अमरीका के साथ
अन्याय हो रहा है
जिसे और कोई नहीं तो इतिहास जरूर दुरुस्त करेगा
बल्कि जब नोम चोम्स्की अपनी सरकार की नीतियों
का कडा विरोध करते हैं
तो मुझे लगता है कि एक अमरीकी इस तरह अपने देश
के साथ ज्यादती कर रहा है
क्योंकि यह आदमी मेरे देश का होता तो आज तक जिंदा नहीं बचता
मुझे तो कभी-कभी यह भी लगने लगता है कि मेरा रंग गोरा है
मैं जार्ज बुश को राष्ट्रपति कहते हुए यह नहीं सोचता
कि सौभाग्य से वे मेरे राष्ट्रपति नहीं हैं

क्या मैं ऐसा इसलिए हो चुका हूँ कि मैं अमरीकी
अखबारों में छपे लेख और खबरें पढता हूँ
टाइम और न्यूजवीक पढता हूँ , बीबीसी और सीएनएन देखता हूँ
या मुझे उम्मीद है कि मेरे वर्ग के दूसरे बच्चों की तरह
किसी दिन मेरे बच्चे भी अमरीका में बस जाएँगे
और मुझे दस साल का अमरीकी वीसा मिल जाएगा
बिना अमरीकी कपड़ा पहने, बिना अमरीकी खाना खाए
मैं इतना अमरीकी बन चुका हूँ कि
जब कभी दुनिया में कहीं भी अमरीकी हितों को चोट पहुँचती है तो मुझे बुरा लगता है
जिस बात पर अमरीकी सरकार को गुस्सा आता है
मुझे भी आता है
जब अमरीकी दुविधा से गुजरते हैं तो मैं भी गुजरता हूँ

मैं सद्दाम को फांसी देने से इसलिए परेशान नहीं हुआ
क्योंकि अमरीका यही चाहता था
मैं फिदेल कास्त्रो की मौत का
बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ
क्योंकि अमरीका भी यही कर रहा है
ह्यूगो शावेज मुझे इसलिए अच्छे नहीं लगते
क्योंकि अमरीका इन्हें अच्छा नहीं लगता
मैं इसराइल के साथ इसलिए हूँ कि
वह अमरीका के साथ है
मुझे वे सब दयनीय, समय से पिछडे,
गए बीते लगते हैं
जो अमरीका के साथ नहीं हैं
और ग्लोबलाईजेशन का विरोध करते हैं

हालांकि अमरीका मेरे देश के हितों के खिलाफ भी अक्सर जाता है
लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए है कि मेरे
देश के शासक पूरे मन से अमरीका के साथ नहीं हैं
हालांकि मैं जब अमरीकी नीतियों के साथ नहीं भी होता
तब भी मुझे लगता है कि ये मेरे देश की सरकार की ही ग़लत नीतियां हैं
इसलिए इनका मुझे विरोध करना चाहिए

जब अमरीका अन्तरिक्ष में घातक हथियार स्थापित करता है
या इराक पर हमला करता है या ग्लोबल वार्मिंग पर टस से मस नहीं होता
तो मुझे लगता है कि मेरे अमरीका को ज़्यादा मानवीय होना चाहिए
उसे यह नहीं करना चाहिए
ताकि मैं उसे ज़्यादा प्यार कर सकूं

हालांकि मैं तो उसे वैसे भी और ज़्यादा प्यार करना चाहता हूँ
यहाँ तक कि अमरीका के विरुद्ध प्रदर्शनों में शामिल होने
और अमरीका विरोधी के रूप में शिनाख्त किए जाने पर
भी मैं महसूस करता हूँ
क्योंकि अमरीका है इसलिए विरोध है

जब कभी मुझे लगता है कि अमरीका पूरी दुनिया के लिए खतरा है
तो भी मैं इस खतरे को
एक सच्चे अमरीकी की तरह महसूस करता हूँ
और जब कभी मुझे लगता है कि
अमरीका बर्बर है
तब मैं अपने से पूछता हूँ कि आख़िर
मैं अमरीकी क्यों हूँ
और कुछ देर बाद यह सोचकर मुस्कुरा पड़ता हूँ कि
मेरे पास इसका विकल्प भी क्या है।
-विष्णु नागर