Tuesday, January 24, 2017

अतीत की सच्चाई का निर्धारण : रोमिला थापर






इंडियन सोसायटी ऐंड द सेक्युलर 
 
थ्री एसेस प्रकाशन से आई ये किताब प्रख्यात इतिहासविद् रोमिला थापर के लेखों और भाषणों का संकलन है. रोमिला थापर ने लाहौर लिटरेरी फेस्टिवल में अतीत और वर्त्तमान के संबंधों पर एक महत्त्वपूर्ण भाषण दिया था.पास्ट ऐज़ प्रजेंट और प्रजेंट ऐज़ पास्ट. मूल अंग्रेज़ी से इस भाषण के एक अंश का अनुवाद. थ्री एसेस से साभार. 
(अनुवाद और प्रस्तुति: शालिनी जोशी)

इतिहासकार ईएच कार ने कहा था कि इतिहास अतीत और वर्त्तमान के बीच वार्तालाप है. अवधारणा ये है कि हम अतीत को उसके परिप्रेक्ष्य में देखते हैं लेकिन उसकी विवेचना करते हुए हम वर्तमान से संचालित होते हैं. लेकिन शायद ये कहना बेहतर होगा कि इतिहास वर्त्तमान और एज्यूम्ड अतीत (पहले से मान्य) के बीच वार्तालाप है, जहां ये एजंप्शंस या मान्यताएं आंशिक रूप से वर्त्तमान की ज़रूरतों के हिसाब से प्रचलित की जाती हैं.
यहां हिस्टोरियोग्राफ़ी यानी कि इतिहासकारों के इतिहास की पड़ताल जरूरी हो जाती है. किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज के लेखक का परीक्षण करना आवश्यक है. उस लेखक का बौद्धिक फ्रेमवर्क क्या है? उसने किस डिग्री तक ऐसे प्रमाणों का उद्धरण दिया है जिन्हें विश्वसनीय माना जा सकता है?  क्या उसने ऐसे तर्कसंगत निष्कर्षों की व्याख्या की है जिनसे अतीत की घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में तर्कसिद्ध विवरण मिलते हैं? 
वर्त्तमान विचारधाराओं के निर्माण और उनको वैधानिक आधार देने के लिये इतिहास को जरिया बनाया जाता है. एरिक हॉब्सबाम ने इस प्रवृत्ति पर एक यादगार टिप्पणी की है- इतिहास राष्ट्रवादी, जातीय (एथनिक) और कट्टर विचारधाराओं के लिये कच्चा माल है ठीक उसी तरह से जैसे अफ़ीम के बीज हेरोइन के नशे के लिये कच्चा माल हैं. इन विचाराधाराओं के लिये अतीत एक अनिवार्य तत्त्व है. अगर एक अनुकूल अतीत नहीं है तो भी उसका हमेशा आविष्कार तो किया ही जा सकता है........
.......भारतीय उपमहाद्वीप में जिन विचारधाराओं ने राष्ट्र राज्य के निर्माण को प्रोत्साहन दिया उनके पुनर्आकलन की जरूरत है. आज वे राष्ट्र अस्तित्व में आ चुके हैं. इसलिये आज हमारी चिंता उन औपनिवेशिक स्टीरियोटाइप्स के पुनर्परीक्षण को लेकर होनी चाहिये, अब भी जिनके तयशुदा खांचे में ही हम ये तय कर रहे हैं कि हम कौन हैं और कहां जा रहे हैं. औपनिवेशिक नजरिये और अध्ययनों को इस लिहाज़ से देखना चाहिये कि उसके परिणाम क्या हुए. औपनिवेशिक दृष्टिकोण के स्थान पर आज ऐसी संवेदनशीलता को बढ़ावा देने की ज़रूरत है जिससे हम अतीत और वर्त्तमान के बीच वार्तालाप को सही परिप्रेक्ष्य में सुन सकें. अतीत की सच्चाई का निर्धारण कर सकें और साथ ही हम ये पहचान सकें कि कब अतीत का हवाला सिर्फ इस बात के लिये दिया जा रहा है कि वर्तमान उसका इस्तेमाल कर सके न कि अतीत को समझने के लिये उसका अन्वेषण किया जा रहा है.      
और सिर्फ हाल के अतीत को ही नई दृष्टि से देखने की ज़रूरत नहीं है. हमें ये भी समझना होगा कि आज की घटनाओं में भी ऐसे तत्त्व हैं जिनके बीज कई सदियों के कालक्रम में छुपे है. शायद हमें ये समझना ज़रूरी है कि अतीत और वर्त्तमान के बीच संबंधों की व्याख्या में दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित करने और एक दूसरे का अतिक्रमण करने की कोशिश करते हैं. ऐसी अंतर्दृष्टि सिर्फ अध्ययन के लिये ही ज़रूरी नहीं बल्कि इसी अंतर्दृष्टि से तय होगा कि हम भविष्य में कैसे दाखिल होंगे. 
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रोमिला थापर की इस किताब को इस लिंक के जरिये भी खरीद सकते हैं।

      

Thursday, January 5, 2017

जॉन बर्जरः वक़्त को टटोलती निगाह - शिवप्रसाद जोशी

John Berger (5 November 1926 – 2 January 2017)

अरुंधति रॉय 2009 के दरम्यान जॉन बर्जर से मिलने गई थीं. बर्जर ने बस उनसे पूछा कि तुम अभी अपना कम्प्यूटर खोलो और अपना लिखा कुछ फ़िक्शन मुझे पढ़कर सुनाओ. अरुंधति के मुताबिक, “ऐसा पूछ सकने वाला वो दुनिया का शायद अकेला शख़्स था, मैंने एक छोटा सा पीस पढ़कर सुनाया जिसे सुनकर बर्जर ने लगभग आदेश देते हुए कहा, तुम फ़ौरन दिल्ली लौटो और ये किताब पूरी करो.”इस धक्के के क़रीब आठ साल बाद अब  2017 में बहुप्रतीक्षित उपन्यास आ रहा है अरुंधति का जिसका नाम है- “द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस.” अगर जॉन बर्जर न होते तो शायद ये उपन्यास न आ पाता या पता नहीं कब तक आ पाता जिसका बेसब्री से इंतज़ार अरुंधति के पाठक प्रशंसक एक्टिविस्ट करते रहे हैं जो उनके लेखन के ताप, उद्विग्नता और एक्टिविज़्म के साथ साथ बड़े हुए या निखरे हैं.
अरुंधति के साथ साथ पंजाबी कवि और सार्वजनिक बुद्धिजीवी, चिंतक अमरजीत चंदन का ज़िक्र करना यहां ज़रूरी है. उनकी कविता पुस्तक आ गयी है, “सोनाटा फ़ॉर फ़ोर हैंड्स.” अमरजीत ब्रिटेन में रहते हैं और यूरोप-अमेरिका-एशिया के साहित्यिक-सांस्कृतिक हल्कों में जानेमाने हैं. उनकी कविताओं के पहले फ़ुललेंथ कलेक्शन की एक सबसे ख़ास बात ये है कि इसकी भूमिका जॉन बर्जर ने लिखी है जो अमरजीत की कविता और विचार के मुरीदों में शामिल हैं. अगर आप यूट्यूब पर जाने की ज़हमत उठाएं तो वहां आपको बर्जर, लसन- गार्लिक (लहसुन) कविता का पाठ करते दिखेंगे. ये अमरजीत चंदन की एक प्रतिनिधि कविता है. बर्जर, चंदन की कविता के बारे में कहते हैं कि, “उनकी कविता अपने श्रोताओं या पाठकों को समयहीनता के विस्तार में ले जाती है. समय वहां एक कामदार पर्दे की तरह है. उनका कविता अभ्यास बताता है कि दिक् काल की चार विमाओं, जिन्हें हम आदतन पहचानते हैं, के अलावा और भी विमाएं हैं.”
ये दो ज़िक्र लाने का मक़सद ये दिखाने का था कि 90 साल की भरीपूरी उम्र के बाद इस दुनिया से रुख़्सत हुए जॉन बर्जर का देखने का तरीक़ा कितना अलग और ख़ास था. ये कोई लेखकीय और अप्रतिम या दैवीय विशिष्टता नहीं थी जो बर्जर को हासिल थी, ये एक बहुत ही साधारण जन की नज़र थी जो पिछली 20वीं सदी और इधर 21वीं सदी के शुरुआती डेढ़ दशकों में तेज़ी से परिदृश्य से धकेली जाती रही. इतना तीव्र भूमंडलीकरण और नया पूंजीवादी हमला हुआ है (ज़ाहिर है फ़ाशीवाद के साथ ये गठजोड़ पूरी रंगत में है.)
1926 में ब्रिटेन में पैदा हुए बर्जर कला की पढ़ाई पूरी कर मार्क्स की ओर मुड़े. अपने मशहूर उपन्यास “जी” के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार भी मिला और इनाम की आधा रकम उन्होंने कैरेबिया के आंदोलनकारी समूह ब्लैक पैंथर्स को दान कर दी. शेष राशि अपनी एक वृहद रिसर्च परियोजना में खर्च की. 1962 में लंदन छोड़ा और फ़्रांस के पेरिस के पास क्विऩज़ी नाम के देहात में 1974 में अपनी रिहायश बनाई, वहीं से लिखते पढ़ते सोचते और देखते रहे. वहां के किसानों कामगारों के साथ काम किया, घुलेमिले. वहीं पर उन पर एक वृहद वृत्तचित्र बनाया गया, “द सीज़न्स इन क्विनज़ी” के नाम से टिल्डा स्विंटन और कोलिन मैककेब की बनाई चार अलग अलग छोटी फ़िल्मों का एक सेट है. इस फ़िल्म का हमें इंतज़ार है. कुछ लोग शायद देख भी चुके हों. सात महीने पहले इसका ट्रेलर जारी हुआ. अद्भुत दृश्य हैं. इसी में लगभग मंत्र की तरह जॉन बर्जर ने कहा था, अगर मैं किस्सागो (स्टोरीटेलर) हूं तो इसलिए कि मैं सुनता हूं.
फ़िल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है कि देखने पर ज़ोर देने वाले बर्जर ने सुनने पर ज़ोर आख़िर किन संदर्भों में दिया होगा. एक अनुमान ये है कि सुनते हुए को भी देखने की बात वो कर रहे हों, बात अटपटी लग सकती है कि लेकिन आधुनिक क्लासिक्स में शुमार बर्जर की “द वेज़ ऑफ़ सीइंग” पढ़ने के बाद आपको ये बात शायद उतनी अटपटी न लगे. इसलिए इसे पढ़ने से पहले बीबीसी की 1972 की वो ऐतिहासिक सीरिज़ देखना भी महत्त्वपूर्ण है जिसके बाद ये किताब आ गई और जॉन बर्जर न सिर्फ़ कला आलोचना में बल्कि एक राजनैतिक बुद्धिजीवी के रूप में दुनिया में मान लिए गए. अरुंधति रॉय कहती हैं, “जॉन बर्जर हमें सिखाते हैं कि कैसे सोचना है. कैसे महसूस करना है. कैसे चीज़ों को टकटकी लगाए देखते रहना है जब तक हम ये देख लें कि जो हम सोच रहे थे वो वहां नहीं है. सबसे बढ़कर वो हमें सिखाते हैं कि विपत्ति के हालात में हम कैसे प्रेम करें. वो मास्टर हैं.”
90वें साल के अवसर पर उन्हें सलाम करते हुए दो किताबें आईं. इनके विमोचन के लिए वो मौजूद नहीं हैं. “द लॉंग व्हाइट थ्रेड ऑफ़ वर्ड्स” जिसमें उनके चाहने वाले विश्व कवियों की रचनाएं शामिल हैं. इस किताब की संपादक त्रयी में अमरजीत चंदन, गैरेथ इवांस और यास्मीन गुनारत्नम हैं. दूसरी किताब है,  “अ जार ऑफ़ वाइल्ड फ़्लावर्स” जिसमें नामचीन लेखकों के निबंध शामिल हैं. इसके संपादक अमरजीत चंदन और यास्मीन गुनारत्नम हैं. 2016 की ये अंग्रेज़ी किताबें विकट ऑनलाइन बाज़ार में हैं, हिंदी एक बहुत दूर का बिंदु है.
“वेअज़ ऑफ़ सीइंग” को कला, संस्कृति और राजनीति के अंर्तसंबंधों पर एक दस्तावेजी किताब माना जाता है. बर्जर की दृष्टि के निर्माण में इन तीनों अवधारणाओं का योगदान है. बर्जर ने कला के स्थापित आलोचना कर्म और देखने के पैमानों को भारी चोट पहुंचाई. उन्होंने अपने अकाट्य तर्कों के सहारे साबित किया कि एक पेंटिग क्योंकर एक बुर्जुआ गतिविधि है और क्योंकर वो अभिजात हितो और स्वार्थों की हिफ़ाज़त करती हुई रह जाती है. बर्जर ने देखने के तरीके से इलीटिज़्म का चश्मा उतारने को कहा. उन्होंने ये नहीं बताया कि आप इस तरह किसी चित्र को देखो या इस तरह न देखो. उन्होंने बस ये बताया कि आप कैसे देखो, क्या देखो. मिसाल के लिए स्त्री शरीर की नग्न चित्र परंपरा पर बर्जर ने ये कहकर हमला किया कि ये सिर्फ मर्दवादी यौनेच्छा की भूख है. वो दर्शक के सामने पेश की गई स्त्री की देह है. उन्होंने कला में नेकड और न्यूड के फ़र्क को समझाया.
अपनी इसी अवधारणा को बर्जर कला से आगे भूमंडलीकृत पूंजीवाद की अन्य विडम्बनाओं और विज्ञापन और उपभोक्तावाद की आततायी संस्कृति तक ले गए और बताया कि स्त्री देह का जो चित्रण कला में था वो विज्ञापन में उस भूख को एक नये विस्तार की ओर ले गया. ये एक भीषण चाक्षुष अनुभव से भीषण उपभोग के अनुभव की ओर जाने की तीव्र फ़िसलन थी. इस तरह बर्जर ही हमें सबसे पहले ये बताते हैं कि कलाएं पहले अपने प्रदर्शन में फिर अपने निरूपण में और फिर अपने आगामी इस्तेमालों में कितनी मनुष्यविरोधी, अमानवीय और पतन की ओर ले जाने वाली हो सकती हैं.
लेकिन बर्जर सिर्फ़ इस नैतिक विचलन को नोट करने वाले या उस पर चोट करने वाला या उससे सावधान करने वाले चिंतक नहीं थे, उन्होंने कला को एक मानवीय और एक मार्क्सवादी सौंदर्यबोध के रास्ते से समझने के तरीक़े भी समझाए हैं. उनके पास बदलाव के टूल्स थे. उन्होंने दुनिया को बदलने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों को मनुष्य चेतना से जोड़ने के तरीक़े भी बताए. उन्होंने बताया है कि कला से हम कैसे राजनीति की ओर रुख़ कर सकते हैं. हम कैसे कला को मानवीय चेष्टा का हथियार बना सकते हैं. भूमंडलीय पूंजीवाद के प्रतीकों की बर्जर की प्रखर छानबीन ही हमें और जागरूक और सचेत बनाती है.  
जॉन बर्जर ने कहा था, “आधुनिक विश्व में जहां राजनीति की वजह से हर घंटे हज़ारों लोग मारे जाते हैं, वहां कोई भी लेखन प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं होगा अगर वो राजनैतिक जागरूकता और सिद्धांतों से सचेत लेखन न हो.” आख़िरकार जॉन बर्जर एक उपयोगी द्वंद्व के हवाले से ही कह देते हैं और हमें भी उसके साथ छोड़ देते हैं कि, जो हम देखते हैं और जो हम जानते हैं, इनके बीच का संबंध कभी निर्धारित नहीं होता है. हर शाम हम सूरज को डूबता देखते हैं. हम जानते हैं कि पृथ्वी उससे दूर जा रही है. फिर भी ये ज्ञान और ये व्याख्या, हमारे देखने को और उस दृश्य को मुकम्मल नहीं बना पाती.”

Wednesday, December 28, 2016

मनमोहन की मशहूर कविता ‘आ राजा का बाजा’


‘आ राजा का बाजा’ कविता के बारे में
-मनमोहन
पिछले दो-ढाई साल से इस कविता का एक अजीबोगरीब पाठ फेसबुक पर घूम रहा है और जो कभी भी, कहीं भी प्रकट हो जाता है, उसके बारे में मैंने कई बार स्पष्टीकरण दिया है कि यह कविता का मूल पाठ नहीं है। लेकिन यह फिर भी जारी है। अरसे तक मेरे लिए यह गुत्थी ही बनी रही कि कविता के इस पाठ का स्रोत क्या है? बहुत बाद में पता चला कि कविता-कोश में यह कविता इसी तरह दर्ज है और वहीं से लोग इसे उठाते हैं। मेरे कहने पर अनिल जनविजय ने इसे कविता-कोश से हटा दिया। लेकिन अभी भी कविता का यही पाठ सर्कुलेशन में है। इसमें यकीनन कुछ दोष मेरा भी है कि मैं इसके मूल पाठ को पेश न कर सका।
यह कविता आपात्काल की दहशत भरी परिस्थिति में लिखी गई थी और घोर आपात्काल के दिनों में ही ‘उत्तरार्ध’ के संभवतः ग्यारहवें फासीवाद विरोधी अंक में अन्य कुछ कविताओं के साथ प्रकाशित हुई थी। उन दिनों इसका अनेक ढंग से उपयोग हुआ। आपात्काल खत्म होने के बाद के वर्षों में जन नाट्य मंच ने ‘राजा का बाजा’ नाम से बेरोजगारी पर एक नाटक किया, जिसका शीर्षक के अलावा कविता से सिर्फ इतना लेना-देना था कि उसमें इस कविता की चंद पंक्तियों को अपने ढंग से बदलकर और एक आरती की धुन में ढालकर पैरोडी की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था। वही पंक्तियाँ शायद किसी विधि से कविता कोश वालों के हाथ लग गईं।
देश की मौजूदा परिस्थिति आपात्काल के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर और भयावह है। आपात्काल के तुरंत बाद के समय की मानसिकता से तो यह और भी उलट है। ऐसे में इस कविता के नाम पर चल रहा पैरोडी पाठ और उसकी उत्फुल्ल ‘जय जगदीश हरे’ धुन मुझे खासतौर पर परेशान कर रही थी।
‘उत्तरार्ध’ के अनेक पुराने अंक नापैद हो गए हैं। मैंने उन्हेें हासिल करने की कोशिश कई बार की लेकिन नाकामयाब रहा। अचानक करीब आठ-दस साल पहले अपनी ही पत्रिकाओं में आपात्काल के दौर का एक क्षत-विक्षत जर्जर अंक हाथ लगा, तभी यह और कुछ अन्य कविताएँ किसी तरह फोटोकाॅपी कराकर रख ली थीं। उन्हीं को ढूँढ़कर निकाला है और अब (रिकाॅर्ड ठीक करने के लिए) यह पोस्ट कर रहा हूँ।


आ  राजा  का  बाजा  बजा

ता ऽ थे ई  ता ऽ
ता ऽ  गा ऽ
रो टी  खा ... न  खा ...
गा ऽ
आ ...
आ  रा जा  का  बा जा  ब जा

स च  म त  क ह
चु प   र ह...  चु प  र ह ...
स ह  स ह  स ह

रा श न
न न ... न न ...
ईं ध न ...
न न ... न न ...
ब र त न   ठ न  ठ न
चु प... चु प...
श ठ   सु न...
सु न...  चा बु क  च म का र
ज न  ग न  म न
अ धि ना य क.... ना य क ...
उ न्ना य क...     प त वा र
जी व न   खे व न हा र

त न  म न  वे त न
स ब  अ र प न  क र
तु र त   तु र त
भ ज  उ त्पा द न ... पा द न...
के व ल

मू क  ब धि र  बन
व ध  ल ख
म त  क र
कु न मु न

झु ल स न  ठि ठु र न  स ब
म न  की  त न  की  पी...
पी... जी...

ल ब  रँ ग  चु न  ज प
अ नु शा स न
शा स न
के व ल

मु ड़  तु ड़  नि चु ड़  नि चु ड़
इ त   उ त  उ ड़  म त
लु ट  पि ट  बि क
धि क्  उ फ  म त  क र

जु त    च ल  उ ठ
झ ट प ट  क र
श्र म  से  न  ड र
श्र म  से  न  ड र
श्र म  से  न  ड र

ड ग  में  ड ग म ग  म त  क र
म ग में  म त  क र  ह र क त
ब क  ब क  ब स  क र
च ट  प ट  क र  क र त ल
सं भ ल  सं भ ल  च ल
आ ता  है  र थ
ल थ प थ  ज न प थ  प र

छ म...छ म...
ल क द क     स ज ध ज
आ ता  है  रा ज कुं व र  को म ल
ओ  रे  ख ल  ब न  ट म ट म

इ ठ  म त
ह ठ  त ज
च ल  उ ठ
झ ट प ट  क र

आ ... गा...
ता ... थे ई ...ता ...ऽ ऽ
आ ऽ

आ  रा जा  का  बा जा  ब जा।

Saturday, November 5, 2016

कम्बख़्त दस्तावेज़ `पासपोर्ट` और नानी का इंतिक़ाल



(सईद नक़वी की पुस्तक ‘बीइंग दि अदर: दि मुस्लिम इन इण्डिया` (अलिफ़ बुक कंपनी, 2016) के एक अध्याय ‘ग्रोइंग अप इन अवध’’ का हिस्सा )
अनुवाद और प्रस्तुति : भारतभूषण तिवारी


हमारे समरसतापूर्ण अस्तित्व और मुक्त सांस्कृतिक अंतर्मिश्रण के चलते 1947 में हुए बँटवारे का दर्द कुछ गहरा था क्योंकि घनिष्ठता से जुड़े कुनबे भी अकस्मात् बंट गए. यह ज़िन्दगी की एक दर्दनाक विडम्बनाओं में से एक है कि हमारी इतनी अच्छी ख़ाला-नानी, नानी अम्मी, जिन्होंने हमेशा मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाए जाने का ख़्वाब देखा था, लाहौर में अल्लाह को प्यारी हुईं. उनका शरीर हिंदुस्तान वापिस नहीं लाया जा सका और हम उनके जनाज़े में शरीक नहीं हो सके. आज के दौर में,  जहाँ छोटे परिवार बढ़ते जाते हैं, ख़ाला-नानी शायद दूर की रिश्तेदार लगे, मगर हमारे परिवार में ऐसा नहीं था जो कि पारम्परिक संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आधारित था. मेरी अम्मी की अम्मी अपने कुनबे में सबसे बड़ी थीं और नानी अम्मी सबसे छोटी. मेरी अम्मी से उनका ख़ास लगाव था जिनकी निगहबानी में वह बड़ी हुई थीं. इसका नतीजा यह नहीं हुआ कि नानी अम्मी के अपने बच्चों का ख़याल न रखा गया हो; एक दूसरे पर अत्यधिक आश्रित रहने वाली उस व्यवस्था में उनके अपने बच्चों का ख़याल औरों ने रखा. दरअसल, जैसा कि मैंने पहले बताया, मुस्तफ़ाबाद का हमारा घर ममेरे-फ़ूफ़ेरे-मौसरे भाई-बहनों, मामियों-मौसियों-फूफियों और मामाओं-फ़ूफ़ाओं-मौसियों से भरा रहता (जिनकी तादाद मुहर्रम, बच्चा पैदा होने, किसी की मौत होने या शादी-ब्याह के मौकों पर सौ तक पहुँच जाती).

अपने इंतकाल के दिन तक नानी अम्मी को पासपोर्ट नामके दस्तावेज़ को समझने में बेहद मुश्किल हुई. वह इस इल्म के साथ बड़ी हुई थीं कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए फ़क़त रेलगाड़ी के टिकट की दरकार होती है.  यह बात आसानी से समझ में आती है क्योंकि पहले की उनकी सारी यात्राएँ यूपी में अवध तक सीमित रहीं. वह बाराबंकी में पैदा हुईं, बिलग्राम में ब्याहीं और मुस्तफ़ाबाद या लखनऊ मेरे माता-पिता से मिलने आती रहीं. फिर बँटवारा हुआ, उसके बाद ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा और फिर उनके शौहर का इंतकाल जो एक छोटे-मोटे  सामंत थे. बाराबंकी और बिलग्राम के घर जीण-शीर्ण हालात में थे. नानी अम्मी हमारे साथ रहने आ गईं और मुस्तफ़ाबाद और लखनऊ के बीच आना-जाना करती रहीं.

पासपोर्ट की ज़रूरत इसलिए आन पड़ी थी कि उनकी दो बेटियाँ पाकिस्तान में ब्याहीं और वहीं रह गईं. उनकी कश्मकश उतनी ही शदीद थी जितनी टोबा टेक सिंह की (सआदत हसन मंटो का एक काल्पनिक चरित्र) जो यह नहीं  समझ पाया कि बँटवारा होने पर उसका गाँव पाकिस्तान में कैसे ‘जा’ सकता है; उसी तरह नानी अम्मी नहीं समझ पाईं कि उनकी बेटियाँ दूसरे मुल्क कैसे ‘जा’ सकती हैं. कोई अपना घरबार हमेशा के लिए कैसे छोड़ सकता है? उन्हें दिलासा देने की कोशिश में यह बतलाया गया कि उनकी बेटियाँ, सुग़रा  और सकीना, वाकई घर छोड़ कर नहीं जा रही हैं. बम्बई में उनकी लड़कियों के वास्ते दो ‘बहुत अच्छे लड़के’ थे, मगर लाहौर लखनऊ से बेहद करीब था. तिस पर वे ‘लड़के’ (जिन्हें पाकिस्तान के कुछ कज़िन ने ढूँढा था) बहुत अच्छी ‘ज़ात’ के थे. ( उपमहाद्वीप के मुसलमानों पर हिन्दू जाति प्रथा के असर को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सैयद, शेख़, पठान अब भी ऊँची जातियाँ हैं और जुलाहे और दीगर पेशेगत श्रेणियों को नीचा माना जाता है.)
    
हिंदुस्तान का नक्शा निकाल कर बिछाया गया. नानी अम्मी को दिखाया गया कि कैसे त्रिवेंद्रम, मद्रास, बैंगलोर, हैदराबाद, बम्बई ये सब हिंदुस्तान में होते हुए भी लखनऊ से लाहौर क्या कराची से भी ज़्यादा दूर थे. उन्हें बतलाया गया की हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सरहद महज एक बनावटी सरहद थी जिसे चंद हफ़्तों में एक ‘अंग्रेज़’ सर सिरिल रैडक्लिफ ने जल्दी-जल्दी में खींच दिया था, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की सरहद का फैसला करने के लिए मुकर्रर लिए गए दो कमीशनों के मुखिया थे. वक़्त के साथ-साथ सरहद ख़त्म हो जाएगी और वह  उसे एक अस्थायी असुविधा के तौर पर ही  लें.

इसलिए नानी अम्मी सुग़रा और सकीना को पाकिस्तान के ‘लड़कों’ से ब्याहने को राज़ी हो गईं. मगर जल्दी ही वह  उनके शुरूआती शुबहों से रूबरू हुईं जो शुरुआत थी मोहभंग की. उनकी हसरत थी कि वह अपनी बेटियों के पास लाहौर जाएं और उन्हें पासपोर्ट हासिल करने को कहा गया. अगर लाहौर और कराची हिंदुस्तान के दीगर बड़े शहरों के मुकाबले लखनऊ से नज़दीक थे तो फिर क्यों उन्हें रेलगाड़ी के टिकट के अलावा एक और ‘टिकट’ लेने के लिए क्यों कहा जा रहा है. इस ‘अजीब’ ज़रूरत के पीछे की वजहों को उन्हें समझाने की कोशिशें की गईं, फिर पासपोर्ट के फॉर्म लाए गए और उन्होंने अचरज के साथ अपनी साफ़ उर्दू लिखावट में उन्हें भरा. मोहभंग  का दूसरा मौक़ा आया. मेरे पिता के मुंशी ने उन्हें बतलाया कि अगर फॉर्म हिंदी या अंग्रेज़ी में भरा जाए तो उन्हें पासपोर्ट जल्दी मिल जाएगा. क्या उर्दू का कोई मोल नहीं रहा? उन्होंने पूछा.

नानी अम्मी का उर्दू से लगाव इस वजह था क्योंकि यही इकलौती लिपि उन्हें सिखाई गई थी, हालांकि जो भाषा वह बोलती थीं वह थी खालिस अवधी या देहाती. दरअसल, बोली के मामले में लिंगभेद था. ज़्यादातर ख़वातीन अवधी या देहाती बोलतीं  मगर औपचारिक मौकों पर उर्दू या हिंदुस्तानी बोल लेतीं. हज़रात उर्दू या हिंदुस्तानी में गुफ़्तगू  करते और अनौपचारिक मौकों पर अवधी या देहाती पर आ जाते.

पासपोर्ट, जो नानी अम्मी के लिए हमेशा एक बेहद नापसंद दस्तावेज़ रहा, के बिना ही वह सिधार गईं इस बात में कुछ प्रतीकात्मकता शायद होगी. वह  लाहौर में अपनी बेटियों के पास थीं, छह महीनों से बीमार. उनका  हिंदुस्तानी पासपोर्ट एक्सपायर हो चूका था. वह चाहती थीं कि उसे रिन्यू करवाया जाए क्योंकि वह चाहती थीं कि उन्हें मुस्तफ़ाबाद में दफ़नाया जाए. उनकी बेटियों ने उनसे कहा कि यह काम जल्दी ही करवाया जाएगा. मगर बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया. वह एक बेहद ग़मगीन  दौर के रूप में मेरी यादों में बसा है. नानी अम्मी के इंतिकाल से हम उबरे ही थे  कि अखबारों ने  मुरादाबाद (उ.प्र) में 1980 में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बारे में दुनिया को बताया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हमेशा की तरह ‘हज़ारों’ बेघर हुए.

Wednesday, September 28, 2016

सुधीश पचौरी और संपादक की बीमार मानसिकता का विरोध

फोटो 5 अक्तूबर 2013 के उसी कार्यक्रम का है जिसे सुधीश पचौरी बर्दाश्त नहीं कर सका था। 

हमारे प्यारे कवि वीरेन डंगवाल की बीमारी को लेकर 6 अक्तूबर 2013 को `दैनिक हिंदुस्तान` में सुधीश पचौरी की घिनौनी टिप्पणी प्रकाशित हुई थी तो पचौरी और अख़बार के संपादक की चारों तरफ निंदा हुई थी। मेल बॉक्स की सफाई करते हुए यह मेल भी सामने आया जो उस बीमार मानसिकता के विरोध में HT Media ltd की Chairperson शोभना भरतिया को भेजा गया था।


श्रीमती शोभना भरतिया
अध्यक्षा
एच. टी. मीडिया लि.
हिंदुस्तान टाइम्स भवन
नई दिल्ली


प्रिय महोदया,
हम आपका ध्यान आपके संस्थान द्वारा प्रकाशित हिंदी के लोकप्रिय दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को प्रकाशित एक व्यंग्य की ओर दिलाना चाहते हैं। यह व्यंग्य एक ऐसे व्यक्ति पर है जो कि कैंसर से पीड़ित है। हद यह है कि व्यंग्य उस व्यक्ति के बीमार होने पर है।  इसके लेखक हैं सुधीश पचौरी। इस बीच पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में इस की भर्त्सना करते हुए टिप्पणी भी प्रकाशित हुई है। (कृ. देखें संलग्न टिप्पणी)

हिंदी के जिस जानेमाने कवि का मजाक उड़ाया गया है, उस अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि का नाम है, वीरेंद्र डंगवाल। इस के बावजूद कि कवि के संदर्भ को शब्दों के चातुर्य से ढका हुआ है पर सारा हिंदी जगत जानता है कि किस की मजाक उड़ाई गई है। इस लेख के पीछे छिपी अमानुषिकता और निर्ममता का कोई सानी नहीं है। दुनिया के किसी भी समाचारपत्र में साहित्य या व्यंग्य के नाम पर शायद ही कहीं ऐसा देखने को मिलता हो। सच यह है कि कोई भी सभ्य समाज इस तरह की बेहूदगी और बर्बरता नहीं दिखला सकता जैसी कि आपके अखबार के माध्यम से सामने आई है। हम आपसे अपेक्षा करते हैं कि आप इस को एक बार देखें और विचार करें कि क्या इस तरह की हरकत किसी अखबार को शोभा देती है?

हमें आशा थी कि अखबार के संपादक मामले की गंभीरता को देखते हुए इस बीच इस पर जरूर कार्रवाई करेंगे। पर अफसोस की बात यह है कि दो माह से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद संपादक ने कुछ नहीं किया बल्कि वह यह उम्मीद किए बैठा लगता है कि लोग इस आमानुषिकता को भूल जाएंगे। इससे जाहिर होता है कि इस व्यंग्य के छापने में आपके संपादक का पूरा-पूरा हाथ है।

आप इस मामले में क्या कार्रवाई करती हैं और क्या नहीं, यह आपका सरोकार है पर हिंदी से जुड़ा होने और हिंदी समाज का हिस्सा होने के नाते हमें आपका ध्यान इस ओर दिलाना जरूरी लगा है। हम इस तरह के कृत्य से अपनी असहमति और विरोध अभिव्यक्त करते हैं।
सधन्यवाद
भवदीय

1. आनंद स्वरूप वर्मा

2. असद जै़दी

3. रामशरण जोशी

4. पंकज बिष्ट

5. अजय सिंह

6. प्रकाश चौधरी

7. अशोक पाण्डे

8. शिरीष मौर्य

9. धीरेश सैनी



To
Smt. Shobhana Bhartia
The Chairperson
H T Media Ltd.
New Delhi

Dear Madam
We the following Hindi Writers would like to draw your attention to an item published by your well known Hindi daily Hindustan on 6th Oct. 2013. This so called humer or satir is on a man suffering from the dreded desease of Cancer. This 'pice of humer' is written by a man called Sudheesh Pachauri.

For your information a number of Hindi magaziesns and social media sites have taken note of it and commented on this dasderdly act. (Pl see the encolsed clipping).

This sort of inhumanity and heartlessness in the name of freedom of the press is unthinkable and unheard of. It is neither literature nor journalism. The fact is that no civilised society can allow this sort of indecency and barbarianism. The name of the poet who has been reduculed in this piece is Virendre Dangwal, a recipent of Sahitya Academi award. We request you to just have a look at it and decide of your own whether this is justified by any yardstick? Through this letter we would also like to express our displeasure as well as our opposition to this sort of writing.

with best wishes

1. A. S. Verma
2. Asad Zaidi
3. R. S. Joshi
4. Pankaj Bisht
5. Ajay Singh
6. Dheeresh Saini
7. Prakash Chaudhri
8. Shirish Morya
9. Ashok Panday




शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता
पहले यह टिप्पणी देख लीजिए:
''एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब 'फेस रीडिंग` है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर) हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं। लेकिन 'चमचई` में ऐसे सवाल पूछना मना है।`` यह टुकड़ा 'ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!` शीर्षक व्यंग्य का हिस्सा है जो दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को छपा था। इस व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति को निशाना बनाता है जो एक दुर्दांत बीमारी से लड़ रहा है। हिंदी के अधिकांश लोग जानते हैं कि वह कौन व्यक्ति है। दुनिया में शायद ही कोई लेखक हो जो बीमार पर व्यंग्य करने की इस तरह की निर्ममता, रुग्ण मानसिकता और कमीनापन दिखाने की हिम्मत कर सकता हो।
पर यह कुकर्म सुधीश पचौरी ने किया है जिसे अखबार 'हिंदी साहित्यकार` बतलाता है। हिंदीवाले जानते हैं यह व्यक्ति खुरचनिया व्यंग्यकार है जिसकी कॉलमिस्टी संबंधों और चाटुकारिता के बल पर चलती है।
इस व्यंग्य में उस गोष्ठी का संदर्भ है जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन जन कवि वीरेन डंगवाल को लेकर दिल्ली में अगस्त में हुई थी। वह निजी व्यवहार के कारण भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि कवि के रूप में। वीरेन उन साहसी लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी बीमारी के बारे में छिपाया नहीं है। वह कैंसर से पीडि़त हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। पिछले ही माह उनका आपरेशन भी हुआ है।
हम व्यंग्य के नाम पर इस तरह की अमानवीयता की भर्त्सना करते हैं और हिंदी समाज से भी अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की, जो आजीवन अध्यापक रहा है,  निंदा करने से चूके। यह सोचकर भी हमारी आत्मा कांपती है कि यह अपने छात्रों को क्या पढ़ाता होगा। हम उस अखबार यानी हिंदुस्तान और उसके संपादक की भी निंदा करते हैं जिसने यह व्यंग्य बिना सोचे-समझे छपने दिया। हम मांग करते हैं कि अखबार इस घटियापन के लिए तत्काल माफी मांगे और इस स्तंभ को बंद करे।
- समयांतर, नवंबर 2013 में छपी टिप्पणी
(पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लेखकों के फोन नंबर भी दिए गए थे जो यहां पोस्ट में हटा दिए गए हैं।)