Friday, July 7, 2017

अरुंधति के `द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस` पर शिवप्रसाद जोशी




अन्यतम ख़ुशी के अन्यतम संघर्ष की दास्तान

अरुंधति रॉय का नया उपन्यास: द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस

(मर गई बुलबुल कफ़स में कह गयी सय्याद से......)
-शिवप्रसाद जोशी

धीरे धीरे हर व्यक्ति बनकर.
नहीं.
धीरे धीरे हर चीज़ बनकर.
(उपन्यास से)

द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस का कैज़ुअल हिंदी अनुवाद भी थोड़ा मुश्किल है. क्या ये हो सकता हैः अन्यतम ख़ुशी की विज़ारत? या अन्यतम ख़ुशी का समूह? यहां मिनिस्ट्री ठीक ठीक मंत्रालय की ध्वनि में नहीं है. इस मिनिस्ट्री के तार आदिम ईसाइयत से भी जुड़े प्रतीत होते हैं. वो वंचितों का बसेरा है जहां से ख़ुशी को संजोए रखने की जद्दोजहद चलती है तो वो कोई मंत्रालय तो नहीं है. उपन्यास में ये तमाम ऐसे साधारण नागरिकों का एक बिखरा हुआ लेकिन किसी न किसी मोड़ पर एकजुट समूह है जो मुख्यधारा के समाज से अनाधिकारिक तौर पर बहिष्कृत हैं.

सामाजिक अलगाव ने उन्हे बाहरी किनारों पर फेंक दिया है. लेकिन किनारों को ही वे लोग अपना आशियाना बना चुके हैं और अपनी एक जन्नत उन्होंने बना ली है. उपन्यास में ये जन्नत गेस्ट हाउस ही है जो बेघरों, संदिग्धों, उत्पीड़ितों, हिजड़ों, नशेड़ियों, फक्कड़ों, ड्राइवरों, गायकों, लेखकों और एक्टिविस्टों का ठिकाना बन जाता है. वे अपनी निजी ज़िंदगियों की उथलपुथल से लड़ते भिड़ते हुए निकलते हैं और उम्मीद की मद्धम रोशनियों की दुनिया में दाखिल होते हैं. वे बहुत सारी भाषाएं बोलते हैं, बहुत सारे तरीकों से खुद को अभिव्यक्त करते हैं, वे विस्फोटक गालियां देते हैं, वे कब्रिस्तान को एक ऐसी जगह बना देते है जहां ख़ुशी, उत्सव और मोहब्बत का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला है, दुख और तकलीफ़े भी जैसी इस अन्यतम ख़ुशी की शाखाएं हैं. उसी से फूटी कुछ राहे हैं जो आगे जाकर लौट आती हैं. ख़ुशी यहां कोई स्थूल भाव नहीं है, वो किरदारों का आंतरिक सौंदर्य है. उनकी विचारधारा है. क्योंकि इसका जन्म एक अघोषित एकजुटता से हुआ है. अरुंधति इस तरह उपेक्षितों का सौंदर्यशास्त्र रचती हैं.

कथा के भीतर कथा और उसके भीतर भी एक कथा है और उसके भीतर भी एक कथा. उस सबसे भीतरी कथा की आंतरिकता भी एक कथा से बनी है जिसके उस कथा का बाह्य निर्मित हुआ है. इस तरह जैसे मात्र्युश्का का जादू हो. गुड़िया के भीतर गुड़िया. तहें. परतदार जीवन. दिल्ली की परत के ऊपर गुजरात की परत, उस परत पर कश्मीर की परत, उस परत पर मध्य भारत की परत, फिर तेलंगाना, आंध्रप्रदेश की परत. और भूगोल की परतें ही नहीं. किरदारों की भी. आफताब पर अंजुम की परत. मिस जेबीन प्रथम पर मिस जबीन द्वितीय की परत और उस जेबीन द्वितीय पर उदया की परत. विश्वास पर हर्बर्ट की परत. मूसा पर उसके विभिन्न रूपों की परत. ये रिश्तों का और किरदारों का जैसे एक नक्शा है. शहर भी एक किरदार की तरह शामिल है. लकीरें कहीं से खुलती कहीं उतरतीं और मुड़ती हैं. अरुंधति एक एक किरदार को जैसे पूछने बैठी हैं. वे अपनेआप उठते हैं और अपना रोल अदा करने निकल जाते हैं. लेखक उन्हें फॉलो कर रहा है. इस नॉवल की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसमें इतने सारे लोग, इतने सारे जीव, इतने सारे जानवर, पशु-पक्षी, फल-फूल और वनस्पति हैं कि जैसे कोई एक पूरी मुकम्मल पृथ्वी उन पन्नों पर फूट रही है.

अरुंधति अपनी कल्पना के यथार्थ में एक ऐसा सामूहिक जीवन देख रही हैं जहां सबके लिए जगह है. आवाजाही है. और सांस है. हमारी पाठक नज़र को इतनी सारी चीज़ें पहले शायद कभी नहीं मिली थीं. या वो तोल्स्तोय में ही मिली होंगी या मार्केस में. ये अनायास नहीं है कि आलोचक इतने किरदारों की आमद से बहुत प्रसन्न नहीं है. लेकिन ये जो हम लोग हैं, इतने बहुत सारे, इस वास्तविक जीवन में, इस विदग्ध समय में, हम कहां जाएं? अपनी आमद को वापस खींच लें?

प्रेम इस उपन्यास का केंद्रीय तत्व है. इस उपन्यास की धुरी. उसके आसपास सारी तबाहियां हैं. सारी खुराफातें सारे बुखार. इस प्रेम का निर्माण किया है एक अवर्णनीय उद्विग्नता है. उत्ताप सपने और बेचैनियां और अपनी कौम को बचाने की कामना, आसमान पर बिना हिलेडुले टंग गए कौवे की तक़लीफ़ की शिनाख्त, एक ऐसे नागरिक बोध के बारे में बताती है जो हम इधर अपने मध्यवर्गीय गुमानों में भूल गए हैं. हमारी एक नकली जन्नत है, अगर वो है कहीं. हमने अपने जीवन में कभी उसे नहीं देखा है. बेशक उसके लिए मालअसबाब जुटाए हैं, धार्मिकताएं और जुलस जलसे किए हैं, रोज बुदबुदाए हैं और घंटे घड़ियाल बजाए हैं. वो हमें नही मिली. अरुंधति के किरदारों ने उसे बनाया है. वो कहीं रखी नहीं मिली है. उसे अंजुम और सद्दाम हुसैन की बेचैन आत्माओं ने ढूंढा है और संवारा है. उनके साथ अराजकों का एक कुनबा है, तिलोत्तमा है, अंजुम की गोद ली बेटी जैनब, डॉ आज़ाद भारतीय, बूढ़ा मोची, निम्मो गोरखपुरी, उस्ताद हमीद, सईदा, इशरत, डॉ भगत, मिस जेबीन द्वितीय, इमाम ज़ियाउद्दीन और वे अपने हैं और अपनों को अपने हैं जो जन्नत गेस्टहाउस के इर्दगिर्द दफ़न हैं. उसमें उस्ताद हमीद का संगीत है. पहले जैनब और फिर मिस जेबीन द्वतीय की किलकारियां हैं, पायल घोड़ी की इतराहट है, बीरू कुत्ते का आलस है और कॉमरेड लाली की नरम भौंक. इस कब्रिस्तान में ही इस तरह का एक जीवन संभव है जहां मनुष्यों के साथ पशुओं पक्षियों फूलों और वृक्षों का वास है. यहां तक कि गेस्ट हाउस की दीवारें, कब्रें, छत, भी जैसे इस जीवित धड़कते संसार में एक प्राणयुक्त उपस्थिति हैं. एक अपरिहार्य सूत्र में सब बंधे हुए हैं. प्रेम का नहीं तो फिर किस चीज़ का ये सूत्र होगा. व्यक्तियों के बीच ही नहीं, जगहें और भूगोल भी इस सूत्र में गुंथे हुए हैं. अरुंधति शायद पहली लेखक होंगी जिनकी रचना में दिल्ली ख़ासकर पुरानी दिल्ली और राजधानी का हाशिया इतनी सूक्ष्म डिटेल्स के साथ आया है. ये ज़बर्दस्त ऑब्सर्वेशन है. और ये सिर्फ़ लेखकीय नोट्स का मामला नहीं है. इसे सहा गया है. हर धूल का ब्यौरा है. हर दीवार हर फुटपाथ हर गली हर झुग्गी. एक ऐसा समय जब, “महादेश की मूर्खता अविश्वसनीय दर से बढ़ती जा रही थी और उसे तब किसी सैन्य क़ब्ज़े की ज़रूरत भी नहीं थी.”

कश्मीर की दास्तान को सुनाने के लिए फिक्शन का सहारा लिया गया हो, बात ये नहीं है. बात ये है कि फिक्शन ही इस दास्तान के जरिए रचा गया है. एक ऐसे समय में जब, कवि मंगलेश डबराल के शब्दों में ‘यथार्थ बहुत ज्यादा यथार्थ’ हो तो कल्पना ही एक नया वैकल्पिक यथार्थ बन जाती है. नॉवल को पढ़ते हुए जादुई यथार्थ की जैसी बुनावट प्रतीत होती है लेकिन जैसा कि अरुंधति ने कहा है ये कुछ अलग ही यथार्थ है जो जादुई हो गया हो सकता है. द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स और द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस में 20 साल का फासला है. भाषा और बनावट का भी उतना ही बड़ा फासला है. या इस फ़ासले को आप किसी मेज़रमेंट में नहीं ला सकते हैं. लेकिन कुछ समानताएं हैं. सतह पर अस्पष्ट लेकिन मर्म में उद्घाटित. द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स, द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस में विलीन हो जाता है. मामूली चीज़ों का देवता, अन्यतम ख़ुशी के समूह में बाख़ुशी अपनी जगह पा जाता है. बाज़ दफ़ा ये मिनिस्ट्री ऑफ़ स्मॉल थिंग्स है. कब्रिस्तान में मामूली चीज़ें मामूली लोग मामूली देवता मामूली जानवर, मामूली वनस्पतियां, मामूली खुशियां मामूली दुख एक मामूली से मंत्रालय का सृजन करती हैं. जो एक गैरमामूली जीवन और गैरमामूली संघर्ष का प्रतीक है. अगर किसी को लगता है कि नये नॉवल में अरुंधति ने बड़े प्रतीकों का सहारा लिया है, तो वे शायद गलत होंगे. इसके लिए उपन्यास को एकबारगी पढ़कर किनारे रख देना काफ़ी नहीं होगा. नॉवल उन उपन्यास की दो या तीन रीडिंग्स चाहिए तब आपको सहज ही ये अंदाज़ा लग जाएगा कि मामूली चीज़ें और मामूली लोग ही इस उपन्यास की असाधारणता की हिफ़ाज़त करते हैं. यहां तक कि अमलतास का पेड़ भी भी दिल्ली की जानलेवा गर्मी और लू के थपेड़ों के ख़िलाफ़ उतप्त खड़ा है. “अमलतास का फूल खिलता है एक चमकदार, सुंदर, जिद्दी फूल. हर झुलसाती गर्मी में ये ऊपर उठता है और गरम भूरे आसमान को फुसफुसा कर कहता हैः फ़क यू.”

नॉवल एक सिनेमाई नैरेटिव की तरह भी हमारे भीतर गूंजता है. दृश्यों पर ये पकड़ बहुत विशिष्ट है. आपको व्यथा का वर्णन नहीं करना है, उसका दृश्य दिखाना है. ये ख़ूबी है. 2014, 2004, 2002, 1990 का दशक, यूपीए सरकार, तत्कालीन प्रधानमंत्री, कॉरपोरेट, इकोनमी, ठुंसा हुआ सब कुछः किताबों से लेकर कला तक और इन्हीं सब के बीच गुजरात का लल्ला, मंदिर, ईंटें और भगवा झंडे. भगवा जुलूस, भगवा हाहाकार, और भगवा सुग्गे (पैराकीट). लुटीपिटी और बरबाद अंजुम कब्रिस्तान का रुख़ करती है तो ये दृश्य जैसे पेज पर नहीं पर्दे पर घटित हो रहा है. “बूढ़े परिंदे मरने के लिए कहां जाते हैं?” नाम का पहला अध्याय इस तरह शुरू होता हैः

“वो कब्रिस्तान में एक पेड़ की तरह रहती थी. भोर में वो कौवों को विदा करती थी और चमगादड़ों के घर लौटने का स्वागत करती थी. सांझ में वो इसका ठीक उलटा करती थी. पालियों के दरम्यान, वो गिद्धों के प्रेतों से गप करती थी जो उसकी ऊंची शाखाओं में मंडराते रहते थे. उनके नाखूनों की नरम जकड़ को वो एक कटे हुए अंग पर दर्द की तरह महसूस करती थी. उसने पाया कि अलग होकर कहानी से निकल जाने को लेकर वे कुल मिलाकर नाख़ुश तो नहीं थे.”

“जब वो पहली बार आई, तो फ़ौरी क्रूरता के कुछ महीने उसने वैसे ही सहन किये थे जैसा एक पेड़ करता ही है- बेहिचक, अडिग.” वो ये देखने के लिए नही मुड़ती थी कि किस छोटे लड़के ने उसे पत्थर मारा, अपनी छाल पर अपमान की खरोंचों को पढ़ने के लिए वो गर्दन नहीं निकालती थी. जब लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया, उस पर फ़ब्तियां कसीं- बिना सर्कस की जोकर, बिना महल की रानी- तो वो अपनी चोट को अपनी शाखाओं के बीच से एक झोंके की तरह बहा देती थी और अपने सरसराते पत्तों के संगीत को दर्द कम करने वाले बाम की तरह इस्तेमाल करती थी.”

और जन्नत गेस्ट हाउस के वे उत्सव, वे मौजें, वे दावतें- फ़ेदेरिको फ़ेलिनी की “ला स्त्रादा” की याद दिलाती हैं. बरबादियों से उठकर जीवन राग फैल जाता है. भारतीय लेखकों में अरुंधति रॉय ने अपने फ़िक्शन को एक रोमानी कथानक से आगे दर्द और लड़ाई की तफ़्सील कुछ ऐसे निराले ढंग से बना दी है कि उनके साहस का अनुमान लगाया जा सकता है. वहां एक ऐसी फटकार है जिससे किसी को निजात नहीं. पुरानी दिल्ली के शाहजहांबाद में जहांआरा बेगम के घर, हजरत सरमद शहीद की दरगाह, उस्ताद कुलसुम बी की ख्वाबगाह, कब्रिस्तान और उसकी जन्नत, जंतरमंतर, मेजर अमरीक सिंह का यातना कक्ष, डल झील की हाउस बोट, नागराज हरिहरन यानी नागा का विशाल घर, या बिप्लब दासगुप्ता यानी गरसन होबार्ट का मकान और तिलो को किराए पर दिया कमराः हर जगह एक फटकार जैसे बरस रही है. और हिसाब मांग रही है. उत्पीड़ितों की आहें कभी हंसती है कभी रोती हैं चक्कर काटती रहती हैं, दिल्ली और सत्ता के दुष्चक्रों में फंसी हुई अंततः वे मानो पुराने परिंदों की तरह कब्रिस्तान के किसी पेड़ में जा अटकती हैं, वहां फड़फड़ाती हैं. जहां एक स्त्री है. “वो जानती थी कि वो लौटेगा. भले ही ये जटिल पहेली थी लेकिन उसने देखते ही अकेलेपन को पहचान लिया था.. उसने भांप लिया था कि कुछ अजीब ऊपरी तौर पर उसे उसकी छांह की उतनी ही ज़रूरत थी जितना कि उसे थी. और उसने अनुभव से जाना हुआ था कि ज़रूरत एक गोदाम थी जिसमें अच्छीख़ासी मात्रा में क्रूरता को भरा जा सकता था.”

शेक्सपियर के शुरुआती प्रभाव के बाद तोल्सतोय और जॉन बर्जर जैसे लेखकों से अरुंधति रॉय प्रेरित रही हैं. नॉन फ़िक्शन में उन्हें एडुआर्डो गालियानों का लेखन प्रभावित करता है. “ओपन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका,” इस उपन्यास में ओपन वेन्स ऑफ़ कश्मीर भी बन जाती हैं, और ओपन वेन्स ऑफ़ डेहली भी. फर्क यही है कि गालियानो का वो दस्तावेजी गद्य है जिसमें रक्तरंजित दास्तान और मूल निवासियों के संघर्ष की तफ़सील है और अरुंधति का ये फ़साना है जिसमें यथार्थ और कल्पना घुलमिल गए हैं. षडयंत्रों और मुठभेड़ों और हत्याओं और प्रदर्शनों की धमधम दिल पर गुजरती धमधम है. जैसे टूटा कोई एक पुल या घर नहीं बल्कि एक ख़्वाब है. कश्मीर पर सैन्य अतिवाद का सामना एक प्रेम कहानी करती है जो बंदूक के साए में ही नहीं बल्कि मजारों, कब्रों, बागीचों, फलों के बागानों, फूलों के पेड़ों और घाटी और नदी और झील के अंधेरों उजालों और झिलमिलाहटों और जगमगाहटों और करुण पुकारों के बीच मंडराती हुई सी है. कोई तितली अपने विशाल पंखों के साथ फड़फड़ाते हुए स्वप्न, स्मृति और यथार्थ के कश्मीर में यहां से वहां उड़ रही है. बमों, बारुदी सुरंगों, बंदूकों, और यातना गृहों की चीखों के गुबार को काटते हुए अपनी उड़ान बनाती हुई. सबसे ऊपर आख़िरकार मोहब्बत और जज़्बा और जुनून है. मेजर अमरीक सिंह की बर्बरता भी मानो इस मोहब्बत के आगे ढेर हो जाती है. वो दूर अमेरिका जाकर परिवार सहित अपनी जान लेता है. कोई दुश्मन नहीं कोई हमला नहीं कोई साज़िश नहीं फिर क्यों दुर्दांत अमरीक सिंह अपने ही हाथों मारा जाता है, ये जैसे किसी शाप से पीछा छुड़ाने की यातना का आखिरी जायज़ अंत है. अपनी ही क्रूरता का प्रेत.

अरुंधति के उपन्यास के बारे में कहा जा सकता है कि ये बेसिरपैर का है. इसमें भावुकताएं और घिसापिटा तानाबाना है. ये एक तेज़ ड्रामा और थ्रिल वाली मसाला फिल्म है. जिसमें गालियां और सेक्स और उत्तेजना और एक्शन के छींटे हैं. इसमें भाषायी सजगता और गद्य का अनुशासन नहीं है. आख़िरी बातें इतनी जल्दी पूरी कर ली गई हैं मानो लेखिका उकता गई है, ब्यौरों और वर्णनों से और उसका धीरज टूटा है या अंत स्थिरता में नहीं हड़बड़ी का है. ये भी कह देना मुमकिन है कि अरुंधति ने एक “सेक्युलर” नॉवल लिखा है. एक सेट टार्गेट पाठक को ध्यान में रखकर. पश्चिम के पाठक को ध्यान में रखकर इसमें करुणा, अहिंसा, सर्वधर्म सद्भाव, पशु-पक्षी प्रेम और ईसाइयत की प्रचुरताएं जानबूझ कर हैं. ये भी कहा जा सकता है कि ये अरुंधति के अहम का उपन्यास है. इसमें उनका अहंकार बिखरा हुआ है. और ये भी कि कश्मीर पर रिपोर्ताज को नॉवल का हिस्सा बड़ी चतुराई से बनाकर अरुंधति ने एक तीर से दो निशाने या ज़्यादा या न जाने कितने निशाने साधने की कोशिश की है. क्या पुरस्कार भी कोई निशाना है. आदि आदि. उनके उपन्यास की आलोचना में ये कहा गया है कि इसमें बहुत सारे पात्र बहुत सारी आवाज़ें बहुत सारा शोर है. ये फंतासी, यथार्थ और साक्ष्यों का एक घोल सरीखा है. अरुंधति की आलोचना में ये भी कह दिया गया है कि इस उपन्यास पर उनकी निबंध शैली और उनके निबंध तेवरों का प्रभाव है. ये गल्प नहीं है. आलोचनाएं अपनी जगह हैं. निंदाएं भी. एक सही किताब एक सही आलोचना की हकदार है. आक्षेपों की नहीं. आलोचना, जब आक्षेप बन कर आती है तो वो हिसाब बराबर करने जैसा मामला बन जाता है. ठोस आलोचना ऐसी नहीं होती. उसमें जीवंतता और पारदर्शिता होती है. वो लेखक की छानबीन करती है. वो पंक्तियों से और विवरणों से साक्ष्य जुटाती है और औजार जुटाती है. वो सुपठित और व्यापक और तीक्ष्ण होती है. उसे इस उपन्यास की अंजुम की तरह खुरदुरा और नाजुक, सच्चा और साहसी, निर्भय और बेलौस होना होगा. हम आगे बढ़ते हैं.

द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस में उछाड़ पछाड़ है. औपन्यासिक पैटर्न को रिलीजियसली फॉलो नहीं किया गया है. कुछ आलोचक कहेंगे कि अरुंधति ने सबकुछ समेटने के चक्कर में भाषा और नैरेटिव का संतुलन खो दिया. लेकिन आप ध्यान से नॉवल की रीडिंग लेंगे तो आप जानेंगे कि ऐसा जानबूझकर होने दिया गया है. सेट पैटर्न नहीं है. तोड़फोड़ है. अरुंधति ने अपनी कहानी को पूरी तरह से उसके किरदारों के हवाले कर दिया है. ये एक बहुत बड़ा जोखिम है. उनके हाथ में डोर है तो सही लेकिन उसका लगता है कोई बहुत इस्तेमाल करने की इच्छा उनकी नहीं रही होगी.

उपन्यास ऐसे भी लिखा जा सकता है. अपनी आलोचना कराता हुआ. लेकिन अंदर ही अंदर अपना काम करता हुआ. आलोचना का भी ये कड़ा इम्तहान है. सब्र चाहिए. देखिए कि लेखिका ने आपके लिए जानबूझकर वे सवाल रख छोड़े हैं. क्या मक़सद हो सकता है. क्या चाहती हैं वो. क्या ये पाठ में डूबने का एक विलक्षण और अजीबोग़रीब सा न्यौता है. गहराई का अंदाज़ा लगाना है तो डूबिए. ऊपर से तो नादानियां और कमियां और लूपहोल्स हैं. लेखक ऐसा ‘जाल’ भी बिछाता है! सोचिए. मेहनत और जज़्बे और पाठ का जाल! किसी लेखकीय बाजीगरी का नहीं बल्कि उसे खींच लाने का. कुछ आलोचक इस ‘जाल’ में फंसते हैं और वे लिखते हैं जो आमफ़हम है. लेकिन चुनौती इस ‘जाल’ को हटाने की है. अब सवाल ये है कि आखिर इस ‘जाल’ की ज़रूरत ही क्या है. तो बात यही है जो इस नॉवल ने रचाई है. वो इतनी आसानी से पकड़ में नहीं आना चाहता जबकि है वो इतने ‘मामूली’ लोगों की तफ़्सील. अरुंधति इस लिहाज़ से नटखट हैं.

अरुंधति के नॉवल में ‘हड़बड़ी’ है. एकदम संज्ञा की तरह, जैसी कि वो होती ही है, और वो ज़रूरत से नहीं स्वाभाविक रूप से होती है. बेचैनियां बनाती हैं उसे. कौन ‘संवेदनशील’ नहीं चाहेगा तिलो की तरह उस विशाल विलासी इलीट पारिवारिक जीवन से निकलकर अपनी एक थरथराती ऊब में लौट आने को. ये एक मानवीय हड़बड़ी है. जल्दी से कहीं पहुंच जाने का भी और देर तक वहीं कहीं किसी कुर्सी या किसी कब्र के पास बैठ जाने का भी इंतज़ार है. कथाओं-उपकथाओं-अंतर्कथाओं का कोई छोर नहीं है. वे शुरू एक पेड़ से होती हैं और शहर की रोशनियों पर ख़त्म होती हैं. लेकिन ये भी देखिए कि वे एक स्त्री से शुरू होती हैं और अनेक स्त्रियों तक जाती हैं. पूरा कहना भी जैसे अधूरी बात कहना है क्योंकि कथाएं शहर के नक्शे की तरह हैं. उनके प्रवेश और निकास का किसी को अंदाज़ा नहीं. ख़ुद लेखक की भी जैसे कोई इच्छा नहीं. वो बाज़दफ़ा लापरवाह है, भटकता हुआ, घिसटता हुआ, कहीं न जाने कुछ न बताने की घुप्प चुप्पी से घिरा हुआ. लेकिन वो आगे बढ़ता तो है. वो भी किरदारों की रचाई जा रही करामात में भागीदार है. लेखक के तौर पर ये अरुंधति की कामयाबी है कि उन्होंने किरदारों से अपनी बात नहीं कहलवाई है, वे भुगतते हुए सहमे हुए वंचित लोग हैं, अपनी बात को अपने उखड़े हुए ढंग से कहते हैं. वे ज़बान से भी उखड़े हैं और जगह से भी. कश्मीर की दास्तान में नक्सल बेल्ट की दास्तान घुलमिल जाती है और गुजरात की भी. दिल्ली की भी और दिल्ली में रहने वाले किन्नर समुदाय की भी. ये कई सारी दास्तानों का मानो जंतरमंतर है. आपको खुद की तलाश करनी है और खुद को पाना है. इस तरह क्या अरुंधति ने दो उपन्यास, एक बुकर अवार्ड, एक पटकथा और नॉन फ़िक्शन में राजनैतिक निबंधों की सात तूफ़ानी और उत्पात मचाती किताबें लिखकर, अपने लिए और इस देश के लिए आगामी समयों के नोबेल दावे में जगह बना ली है, कहना मुश्किल है लेकिन ये मानना न दूर की कौड़ी है न अतिरंजना. इंतज़ार करना चाहिए.

इस उपन्यास की एक ओर ख़ूबी है. इसका लचीलापन. पहला अध्याय अनिवार्यतः पहला अध्याय नहीं है. न ही आखिरी अध्याय आखिरी. आख़िरी वाक्य भी जैसे उपन्यास की शुरुआत है. वो पुनर्पाठ की बेकली जगाता है. बीच से आप इस उपन्यास का कोई पन्ना खोले. वहां से कहानी उभरने लगती है. मिसाल के लिए, 438 पृष्ठों वाली किताब का मैं 181वां पेज खोलता हूं और मेरी नज़र एक शीर्षक पर पड़ती है- “नथिंग”- कुछ नहीं. “मैं उन परिष्कृत कहानियों में से कोई कहानी लिखना चाहती हूं जिसमें भले ही बहुत कुछ न होता हो तो भी लिखने को बहुत कुछ रहता है. कश्मीर मे ये नहीं किया जा सकता है. जो वहां होता है, वो सफ़िस्टिकेटड नहीं है. अच्छे साहित्य के सामने बहुत ज़्यादा ख़ून है.” यहीं पर हम एक बार फिर गालियानो को याद कर सकते हैः लातिन अमेरिका की उधड़ी हुई नसों से जिनका गद्य रिसता है. एक बच्ची जो आदमी की देह में एक औरत की तरह बड़ी हो रही है, हो रहा है, हो रही-हो रहा है. पता नहीं कैसे उस वेदना को समझाएंगे जिसे वो आफताब से अंजुम बनी किन्नर ही जानती है जिसकी एक अदम्य चाहत ये है कि वो, “नेल पॉलिश से सजा और चूड़ियों से भरी कलाई वाला हाथ निकाले और मोलभाव करने से पहले, नाज़ुक अंदाज़ में मछली का गलफड़ा उठाकर देखे कि वो कितनी ताज़ा है.” इस उपन्यास में घटनाओं और स्थितियों की बेचारगियों के बावजूद कोई भी किरदार दयनीय नहीं है. वे दया नहीं मांगते. दलित युवक दयाचंद उर्फ़ सद्दाम हुसैन निजी सिक्योरिटी एजेंसी का गार्ड रह चुका है. राष्ट्रीय कला संग्रहालय में इस्पात के एक इंस्टालेशन की एकटक सुरक्षा, और स्टील के चमकते विशाल पेड़ पर सूरज की रोशनी ने उसकी नज़र तबाह कर दी है. उसे रात में भी आंख में दर्द होता है और पानी बहता है लिहाज़ा वो हर वक्त काला चश्मा पहने रहता है. लेकिन काले चश्मे वाला ये हमारा सबसे बिंदास और बहादुर और चपल और चतुर नायक है. सफेद घोड़ी पायल पर सवार होकर वो मानो कोई अघोषित रॉबिनहुड या कोई आदिवासी देवता है. मध्य भारत के जंगलों में भटकती नक्सली कॉमरेड रेवती, बलात्कार की शिकार होकर भी और समूह से अलगाई जाने के बावजूद अंत में बंदूक के साथ ही मरना चाहती है. क्योंकि वही उसका अब सच रह गया है. बलात्कार से पैदा हुई बेटी को जन्म के कुछ समय बाद ही वो जंतरमंतर पर छोड़ आती है. जहां से उसे नाटकीय हालात में जन्नत गेस्ट हाउस में अंजुम मैडम के पास ले आया जाता है. मिस जेबीन द्वितीय का नाम धारण करते हुए, वास्तविकता पता चलने के बाद मिस उदया जेबीन कहलाती है. इंटेलिजेंस ब्यूरो में सरकारी कार्यभार से लस्तपस्त बिप्लब भी आखिरकार अपने से लड़ता है, अपने कमरे में प्रेम और विवशताओं में छटपटाता एकालाप करता है. आखिर में वो भी आगे बढ़ने के लिए कोई दया नहीं, एक ड्रिंक चाहता है. जहांआरा बेगम, जो बेटा चाहती है लेकिन उसकी कोख में आती है एक लड़की जिसकी योनि बंद है. वो भी आफ़ताब से अंजुम तक के सफ़र में कहीं भी आत्मदया से पीड़ित नहीं है. एक ख़ूबसूरत, खुद्दार साहसी बेलाग बिंदास किन्नर के रूप में ख्याति पाती है और एक दिन किन्नरों के प्रसिद्ध ठिकाने को छोड़कर अपना जहां बना लेती है. तिलोत्तमा, प्रेम करती है. सच्चाई का साथ देती है. नाइंसाफ़ी से अपने ही अंदाज़ में टकराती है. आरामदायक जीवन ठुकराती है और कब्रिस्तान के उस घर में शरण लेती है जहां उसे आख़िरकार लगता है कि उसके होने का कोई अर्थ है, उसकी एक आत्मा है और उस दिन वो एक बहुत लंबी रात की गिरफ़्त से मुक्त हुई है. “अपनी ज़िंदगी में पहली बार, तिलो को महसूस हुआ था कि उसकी देह में अपने तमाम अंगों को एकोमोडेट करने के लिए पर्याप्त जगह थी.”

सारे पात्र जैसे अपने अपने युद्ध के लिए तैयार हैं. इस तरह ये नायकीय किरदारों का नॉवल है. अरुंधति से सीखना चाहिए कि स्त्री अधिकारों की सच्ची पुकार किसे कहते हैं. इसके लिए आपको उत्तर-नारीवादी नारों की आड़ में जाने की ज़रूरत नहीं है. आपको बस अपना जीवन देखना और जीना आना चाहिए. मुक्ति के मायने समझाने वाला नॉवल ये है. वो कैसे एक अमिट इच्छा बन जाती है. एक नया निशान. जहां ट्रांसजेंडर औरतों या हिजड़ों का उत्पाती या जघन्य ‘स्त्रीत्व’, जैविक वास्तविक औरतों के स्त्रीत्व से कमतर नहीं. उपन्यास में कुल 12 अध्याय हैं. द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस नाम से दसवां अध्याय है. अध्याय से पहले, नादेज़्दा मंदलस्ताम का एक कोट आता हैः “फिर मौसम बदलने लगे. ‘ये भी एक सफ़र है, एम ने कहा, ‘और वे इसे हमसे छीन नहीं सकते हैं.’

द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस, एक लगातार बनी हुई सिहरन है. या तो आप इश्क में कांपते हैं या ख़ौफ़ में या हमले में या अपना सच खोज लेने में या शांति पा लेने में या फिर नयी दुनिया बसा लेने की उम्मीद में. एमओयूएच, धकियाए गये खदेड़े गये लौटाए गये मारे गये सताए गये समुदायों में एक उम्मीद की कामना है. वे चीखते नहीं है चिल्लाते नहीं है रोकर बिखर नहीं जाते हैं. उन्हें तितर-बितर कर दिया जाता है. वे फिर जमा हो जाते हैं. वे आंतरिक एकजुटता के माहिर लोग हैं. मिट्टी के लाल. उन्हें एक सुंदर सहज जीवन की एक साधारण सी आकांक्षा हैं. उनकी दास्तानें हमें जख़्मी भी करती है. दिल पर एक भारी पत्थर बजता रहता है. धम धम. धम धम. किन्नर जीवन, दंगे, मुसलमानों पर हमले, जंतरमंतर से लेकर मध्य भारत के जंगलों के आंदोलनों तक की तपिश, आग और हिंसा, नफ़रत, विभाजन, प्रेम और त्रासदियां. ख़ुशी जैसे एक औजार भी है और आगामी लड़ाइयों के लिए एक हथियार भी. वो एक वासना नहीं है. वो चाहत है लेकिन उसमें एक निरर्थक खोखला नकली आशावाद नहीं है. वो एक बहुत दुर्लभ उम्मीद है जो उलटा आशावाद से आगाह ही कराती है. इस उम्मीद को नॉवल में दो महत्त्वपूर्ण उल्लेखों से समझ सकते हैं. आखिरी पेज में रात की रोशनियों में शहर घुमाने अंजुम, मिस जेबीन द्वितीय यानी मिस उदया जेबीन को ले जाती है, एक जगह उदया कहती है उसे सूसू लगी है. वो सड़क किनारे पेशाब कर खड़ी होती है तो उसके पेशाब के छोटे से तालाब में तारे और एक हज़ार साल पुराना शहर दमकने लगता है. नॉवल का एक्टिविस्ट और सरकार सेना गठजोड़ की फ़ाइलों में आतंकी मूसा, अलविदा कहने से पहले अपने पूर्व सहपाठी और आलोचक और पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारी बिप्लब को संबोधित हैः “एक रोज़ कश्मीर, भारत को आत्मविनाश पर विवश कर देगा. तुम हमें तबाह नहीं कर रहे हो हमें निर्मित कर रहे हो. तुम खुद को तबाह कर रहे हो.” जब वो धीरे धीरे मद्धम नीची आवाज़ में लेकिन पूरी गहराई और सघनता के साथ ये बात कहता है तो एक सिहरन दौड़ जाती है, फिर फ़्रायड का विख्यात कथन ख़्याल में आता हैः डि श्टिमे डेर फ़ेरनुन्फ्ट इस्ट लाइज़े, आबर ज़ी रूह्ट निश्ट एहे ज़ी सिश गेह्योर फरशाफ्ट हाट. (The voice of Reason is low, but it does not rest until it is heard.)

और आख़िर में एक शेर. ये जैसे नॉवल में बिखरे हुए कल्पनातीत आशावाद का झंडा थामे हुए है. ये हमारी अभिजात नरमदिली और भौतिक और बौद्धिक नफ़ासत और भद्रता को जैसे डंक मारता है. मिट जाने की गरिमा के सामने किसी तरह जिए जाने की फजीहत की पोल खोलता है. ये अपना मखौल उड़ाता है. ये एक निर्भीक देसीपना है. डॉ आज़ाद भारतीय ने जेल में पुलिस पूछताछ के दौरान ये शेर सुना दिया था. और हर सवाल और हर पिटाई के जवाब में वो यही शेर कहते गए. उनसे सीखकर बाद में तिलोत्तमा ने अपने प्रेमी मूसा को जन्नत गेस्ट हाउस में ये शेर उस रात सुनाया था जिसके बाद उन्हें फिर कभी नहीं मिलना थाः

“मर गई बुलबुल कफ़स में/ कह गई सय्याद से/ अपनी सुनहरी गांड में/ तू ठूंस ले फस्ले-बहार”
***

समयांतर से साभार

Monday, July 3, 2017

ये रही मैं, तुम्हारे सामने, तुमसे मुकाबला करने के लिए : अरुंधति रॉय


Photo by TARUN BHARTIYA

तीन विभिन्न अंग्रेजी साक्षात्कारों से ली गईं चुनिंदा टिप्पणियां


रूपांतर : शिवप्रसाद जोशी


•मैं अपने काम के भीतर रहती हूं. हालांकि मैं ये कहूंगी कि कभी मैं उन लेखकों के बारे में सोचती थी जो अज्ञात रहना चाहते है- लेकिन मैं ऐसी नहीं रही हूं. क्योंकि इस देश में ये महत्त्वपूर्ण है, खासकर औरत के लिए, ये कहना जरूरी हैः “सुनो, ये रही मैं, मैं तुम्हारे सामने हूं तुमसे मुकाबला करने के लिए, और मैं यही सोचती हूं और मैं छिपूंगी नहीं.” अगर मुझसे किसी को साहस मिला है....प्रयोग का...कतार को छोड़कर निकल आने का....तो ये प्यारी बात है. मैं सोचती हूं कि हमारे लिए ये कहना बहुत महत्त्वपूर्ण हैः “हम कर सकते हैं! हम करेंगे! हमसे न उलझना! समझे.”


•बात ये है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को उस कुख्यात खनन कंपनी से आर्थिक सहायता मिलती है जो आदिवासियों की आवाज़ों को ख़ामोश कर रही है, उन्हें उनके घरों से बेदख़ल कर रही है, और अब तो इसे ज़ी टीवी भी फंड कर रहा है, जो आधा समय तो मेरा शिकार करने के लिए पीछे पड़ा रहता है. तो सिद्धांत के तौर पर मैं ऐसे उत्सवों में नहीं जा सकती हूं. कैसे जा सकती हूं. मैं उनके खिलाफ लिख रही हूं. कहने का मतलब, बात ये नहीं है कि मैं कोई पवित्र या शुद्ध व्यक्ति हूं, जैसे हम सब में विरोधाभास होते हैं, हमारे कई मुआमले होते हैं, मेरे साथ भी यही है, मैं गांधी जी की तरह नहीं हूं, लेकिन सिद्धांत में, इसपर टिके रहती हूं. दुनिया के सबसे गरीब लोगों की आवाजों को बंद कर दबा कर आप आख़िर कैसे आप फ्री स्पीच का चमकदार मंच बन जाते हैं जहां लेखकों की चहलपहल और उड़ानें हैं. मुझे इससे समस्या है.


•जब मैं किताब लिख रही थी, तो सामयिक मामलात ज्यादा नहीं देख पाई. मैं फेसबुक आदि पर भी नहीं हूं. यूं मुझे इससे कोई समस्या भी नहीं है, लेकिन मुझे एडवर्ड स्नोडेन ने एक बात बताई थी. कि जब फेसबुक शुरु हुआ था तो सीआईए ने उसका जश्न मनाया था क्योंकि उन्हें बिना कुछ किए एक साथ सारी सूचनाएं मिल गई थीं. इससे अलग, बात ये भी है कि जब आप लिख रहे होते हैं, तो पढ़ने के बारे में थोड़ा विचित्र से हो जाते हैं- कभी कभी मैं पूरी किताब नहीं पढ़ रही होती हूं, सिर्फ़ कुछ डुबकियां लगा लेती हूं, अपने विवेक को परखने के लिए.


•मैं मानती हूं कि नायपॉल एक मुकम्मल सिद्ध लेखक हैं, हालांकि अपने वैश्विक नजरिए को लेकर हम दो छोरो पर हैं. लेकिन वास्तव में, मुझ पर उस रूप में किसी लेखक का उतना प्रभाव नहीं है. मुझे कहना पड़ेगा कि मुझे ये बात अविश्वसनीय लगती है कि भारत में लेखकों, और कमोबेश समस्त भारतीय लेखकों, या कमसेकम जानेमाने लेखकों.....चलिए लेखक न भी कहें, लेकिन उनमें उन चीज़ों को छिपा लेने का एक स्तर है जो यहां समाज के मर्म में अवस्थित हैं, जैसे जाति. आप देखिए कि यहां कुछ भारी गड़बड़ है. ये इस तरह से है कि रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका में लोग, रंगभेद का ज़िक्र किए बिना लिखते रहें.


•जो कुछ मैं जानती हूं, वो यहां है, जिस किसी को मैं जानती हूं, और वास्तव में बाहर मैं कभी रही नहीं हूं, विदेश में, तो किसी अजनबी देश में अकेले रह लेने का ख़्याल आतंकित भी करता है. लेकिन इस समय मैं मानती हूं कि भारत एक अत्यधिक ख़तरनाक जगह पर ठिठका हुआ है, मैं नहीं जानती कि किस के साथ क्या हो सकता है- मेरे साथ या किसी के साथ भी. ये कुछ उपद्रवी हैं जो ये तय करते हैं कि किसे मारा जाना है, किसे गोली मारी जानी है, किसे पीट पीटकर मार डालना है. मैं सोचती हूं कि शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि भारत में लोग, लेखक और अन्य लोग, उस तरह का संत्रास महसूस कर रहे है जैसे लोगो ने चिली और लातिन अमेरिका में झेला था. एक तरह का आतंक निर्मित हो रहा है जिसका हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं है. ऐसे मौके आते हैं जब आप बहुत चिंतित हो जाते हैं, फिर गुस्सा, और फिर आप एक निडर ज़िद्दी बन जाते हैं. मैं मानती हूं कि ये कहानी अभी खुल ही रही है.


•ये किताब के बारे में नहीं है या वे क्या पढ़ते हैं क्या नहीं. ये उन कुछ निरंकुश नियमों के बारे में है जो उन्हें बना लिए हैं कि क्या कहना है, क्या नहीं कहना है, कौन क्या कह सकता है, कौन किसे मार सकता है. ये सब. मैं यहां रहती हूं, यहां लिखती हूं और ये किताब भी यहां के बारे में है. लेकिन स्थिति यहां बेकाबू है, नीचे ही. ये महज़ मार दिए जाने की बात नहीं है. ये कुछ ऐसा हैः अगर आप मुसलमान हैं तो जोखिम उठाए बगैर आप ट्रेन या बस में बैठ भी कैसे सकते हैं. तो मेरे साथ क्या होता है, मुझे नहीं पता है. मैंने एक किताब लिख दी है जिसे लिखने में मुझे दस साल लगे हैं, और दुनिया के 30 देशों में दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशक इसे छाप रहे है. मैं कुछ मूर्खों को इस बात की इजाज़त नहीं दे सकती कि वे आएं और इसमें खलल डालें और तमाम हेडलाइनें उड़ा ले जाएं. मैं ऐसा क्यों करूं. बात उनके छोटे दिमागों के बारे में नहीं है, ये बात साहित्य की है. इसकी हिफ़ाज़त की जानी चहिए और इस पर्यावरण में तो समझबूझ कर की जानी चाहिए.


•इस उपन्यास को लिखने में दस साल लगे हैं. लेकिन मैं समझती हूं कि द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स और आज के बीच पिछले बीस साल में, मैंने यात्राएं की हैं, और इतनी सारी चीज़ों में मुब्तिला रही हूं, उनके बारे में लिखती रही हूं. जब मैं राजनैतिक निबंध लिख रही थी तो उनमें एक तरह की बड़ी अरजेंसी थी, हर बार आप एक स्पेस को या एक मुद्दे को खोल देना चाहते थे. लेकिन फिक्शन अपना समय लेता है और ये परतदार होता है. कश्मीर जैसी जगह में जो उन्माद प्रकट हो रहा हैः आप वहां की फ़िज़ां में निहित आतंक का वर्णन किस तरह करेंगे. बात सिर्फ किसी मानवाधिकार रिपोर्ट की नहीं है कि कि कितने लोग कहां कहां मरे. जो वहां हो रहा है उसके साइकोसिस का वर्णन कैसे करेंगे आप. फ़िक्शन के सिवाय.....मैंने फिक्शन इसलिए नहीं चुना क्योंकि मैं कश्मीर के बारे में कुछ कहना चाहती थी, लेकिन फिक्शन आपको चुनता है. मैं नहीं समझती कि ये बात इतनी सरल होती होगी कि मेरे पास देने के लिए कुछ सूचना है और इसलिए मैं एक किताब लिखना चाहती थी. ये ये तो देखने का एक तरीका है. सोचने का एक तरीका. ये एक प्रार्थना है, ये एक गीत है.

(दहिंदू डॉट कॉम में जास ओयाह से बातचीत)


`गल्प कभी घोषणापत्र नहीं हो सकता...`


•जो यात्राएं मैंने की हैं, जिन लोगों से मिली हूं, जो जीवन मैंने जिया है, और जो राजनैतिक निबंध मैने पिछले बीस साल में लिखे हैं वे सब द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस के स्वप्न निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं. लेकिन निबंध और नॉवल दो बिल्कुल अलग विधाएं हैं. फ़िक्शन लिखते हुए मैं रिलेक्स रहती हूं, लगभग स्वप्न में. मैं किसी तरह की जल्दी में नहीं हूं. मैं उन सब लोगों और प्राणियों (दुष्ट भी) के साथ रहना चाहती थी जो दस साल पहले मेरे पास आने लगे थे....देखने के लिए हम आपस में एक दूसरे को पसंद करते हैं या नहीं. फ़िक्शन कभी घोषणापत्र नहीं हो सकता, ढकाछिपा राजनैतिक निबंध, जिसमें कृत्रिम किरदार आपकी तरफ से बोलें, ये एक ऐसा यूनिवर्स बनाने की बात है जहां लोग घूमते भटकते रह सकें, मैं ऐसी कहानी लिखना चाहती थी कि जिसमें मैं किसी के पास से यूं ही न गुज़र जाऊं किसी छोटे से छोटे किरदार के साने से भी, बल्कि रुकं, एक बीड़ी जलाऊं और वक्त पूछूं. ऐसी कहानी जिसमें बैकग्राऊंड अचानक फ़ोरग्राउंड बन जाता है. शहर एक व्यक्ति बन जाता है...मेरे लिए फ़िक्शन लिखना, प्रार्थना के सबसे करीब है.

(स्क्रॉल डॉट इन)



`समयांतर` से साभार

(अरुंधति की तस्वीर The MINISTERY of UTMOST HAPPINESS के बारे में तरुण भारतीय की परिचयात्मक फिल्म से)

Sunday, July 2, 2017

गैर राजनीतिक उपन्यास एक मिथक है : अरुंधति रॉय

तीन विभिन्न अंग्रेजी साक्षात्कारों से ली गईं चुनिंदा टिप्पणियां - 1

रूपांतर : शिवप्रसाद जोशी

-गैर राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखा जा सकता है. ये एक मिथक है. मैं मानती हूं कि हर छोटी परी कथा भी किसी न किसी रूप में राजनीतिक होती है. जब आप किसी चीज़ से परहेज़ करते हैं, तो वो भी उतना ही राजनीतिक है जितना कि उस चीज़ को संबोधित करना.
*
-मेरे लिए, कहानी कहने का तरीका भी कहानी जितना ही महत्त्वपूर्ण है. जब आप कश्मीर जैसी जगहों के बारे में लिखते हैं, या मध्य भारत के जंगलों में जो हो रहा है उसके बारे में लिखते हैं, जिस किसी चीज़ के बारे में.....मैं कहती रही हूं कि फ़िक्शन एक सत्य है. क्योंकि इन जगहों में जो घटित हो रहा है, उस आतंक को सिर्फ़ रिपोर्ताज और प्रमाण आधारित रिपोर्टिंग या फुटनोट्स से समझाना, कभीकभार मुमकिन नहीं होता है. ख़ुद फ़िज़ां और वो लोगों को क्या करने करे लिए विवश करती है और आपको उस ख़ौफ़ के साथ कैसे बसर करनी होती है, सालोंसाल उसके साथ कैसा एडजस्ट करना होता है, तो ये दास्तान वास्तव में सिर्फ़ फ़िक्शन ही सुना सकता है.
*
-अपने राजनीतिक लेखन में अक्सर ही मैं वास्तव में अपने लेखन से ज़्यादा आक्रोश महसूस करती हूं. जब मैं फ़िक्शन लिखती हूं तो मैं अपनी देह में बिल्कुल अलग व्यक्ति की तरह होती हूं. फ़िक्शन लिखते हुए मुझमें एक बड़ी शांति रहती है. हो सकता है ये अवचेतन में हो, लेकिन ऊपरी तौर पर मैं किसी ऑडियंस या पाठक या किसी और चीज़ के बारे में नहीं जानती हूं. मैं उसके स्वागत को लेकर बहुत ज़्यादा नहीं सोच रही होती हूं.
*

-हाल में, विदेशी संवाददाताओ के एक दल के साथ, मैं दिल्ली में थी. भारत में जो कुछ हो रहा है और उसे कम्यूनिकेट करने की असमर्थता से वे लगभग सदमे में थे. क्योंकि वो चीज़ बॉलीवुड और मुक्त बाज़ार और बढ़ती इकोनमी के शोर में दबी हुई है....(उधर)..सैकड़ों हजारों राजनैतिक कार्यकर्ता भारत को उस बिंदु पर ले आ रहे हैं जहां उसे लगभह हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया गया है. मैं लोगों से कहती थी कि अगर भारतीय बाजार पूरी तरह खुला न होता, और भारत एक बड़ी वित्तीय ठिकाना न होता, तो हम आज जनसंहार और रासायनिक हथियारों और सड़कों में पीट पीटकर मार डालने की वारदातों, दलितों पर चाबुक बरसाने की वारदात के बारे में लिख रहे होते. अभी तो ऐसी भीड़ और ऐसे विजिलांटी हैं जो मुसलमानों की दाढ़ी खींच रहे हैं, उन्हें हिंदू नारे कहने पर मजबूर कर रहे हैं, लोगों को पीट पीटकर खत्म कर रहे हैं.
*

-मुक्त बाज़ार इस सब के लिए जिम्मेदार नहीं है लेकिन मुक्त बाजार इस सब को शक्ति मुहैया कराता है. जो अवसर वो हासिल कराता है, अंतरराष्ट्रीय वित्त, ये उस तथ्य को धीरे धीरे ढक देते हैं कि क्रूरता और धर्मांधता का एक स्तर है.. अगर किसी दूसरे देश में, हजारों लोगों के कत्ल की कोई अगुवाई कर रहा होता, मुसलमानों को शरणार्थी शिविरों में धकेला जा रहा होता, तो बाहरी दुनिया में इसे अलग ढंग से लिया जाता. लेकिन अब भारत मार्केट फ्रेंडली, बॉलीवुडीय, धुंधला सा नाज़ुक गुदगुदा खिलौना है.
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-अमेरिका में बेलगाम पूंजीवाद के लिए कच्चा माल दूसरे देशों पर युद्ध थोपकर निकाला जा सकता है. भारत जैसे देशों में हम खुद का उपनिवेशीकरण कर ऐसा कर रहे हैं. मैं सिर्फ रूपक में नहीं कह रही हूं. मैं कहती हूं कि मध्य भारत के जंगल, अर्धसैनिक बलों से भरे हुए हैं जो स्थानीय लोगों को अपनी जमीन से बेदख़ल करने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार के बहुत नजदीक एक व्यक्ति ने कहा कि “अफ्रीकी लोग सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, मार डाले जा रहे हैं, भारत को नस्ली बताया जा रहा है,” तो उसने कहा, “हम नस्ली कैसे हो सकते हैं. हम इन काले दक्षिण भारतीयों के साथ भी तो रहते हैं.” हजारों किसान और आदिवासी जन, देशद्रोह के आरोप में जेल में बंद है क्योंकि वे अपनी जमीन को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं और वे जमीनें खनन कंपनियों को सौंपी जा रही हैं. जो वहां हो रहा है और बाहर भारत की जो छवि है, उन दोनों में एक गहरा विच्छेद है.
*
(स्लेट डॉट कॉम में इसाक शोटनर से बातचीत के अंश)
`समयांतर` से साभार

Wednesday, March 29, 2017

महादेवी- स्‍त्री होने का अर्थ : कात्‍यायनी





स्‍त्री पक्ष पर महादेवी के चिन्‍तन का जो गहन, मौलिक और बहुआयामी चरित्र था, उस पर समाजशास्त्रियों ने तो एकदम ध्‍यान नहीं दिया, हिन्‍दी साहित्‍य के सुधी आलोचको ने भी काफी कम लिखा है। यह सचमुच एक दुखद विडम्‍बना है और विचार का प्रश्‍न भी। स्‍त्री प्रश्‍न पर महादेवी का चिन्‍तन अपने समाज के दिक्-काल परिप्रेक्ष्‍य में स्‍त्री होने के अर्थ का नितान्‍त मौलिक संधान है। उल्‍लेखनीय है कि स्‍त्री-अस्मिता पर सोचते हुए महादेवी का चिन्‍तन नारीवाद की अधुनातन अस्मितावादी विचार-सरणियों से सर्वथा अलग है। बीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में ही नारीवाद की जो लहर यूरोप में पैदा हुई थी और जिसकी विभिन्‍न रूपों में गत शताब्‍दी के सातवें दशक तक सक्रियता बनी रही या जो पुन:संस्‍कारित होकर स्‍वयं को नये-नये रूपों में प्रस्‍तुत करती रही, उसकी अधिकांश उपधाराओं में स्‍त्री की स्‍वतंत्र अस्मिता के प्रश्‍न को ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि और सामाजिक-आर्थिक संरचना में निहित कारक-प्रेरक उपादानों से काटकर देखने की प्रवृत्ति निहित थी। गत शताब्‍दी के अन्तिम दशकों में सक्रिय उत्‍तरआधुनिकतावादी नारीवाद तो इस प्रवृत्ति से और भी बुरी तरह ग्रस्‍त था।

 


इस मायने में महादेवी ने सर्वथा भिन्‍न रुख अपनाया। स्‍त्री की स्‍वतंत्रता के प्रश्‍न पर विचार करते हुए उन्‍होंने इस प्रश्‍न को स्त्रियों के अर्थ स्‍वातंत्र्य के प्रश्‍न से, उनकी सामाजिक-पारिवारिक पराधीनता के प्रश्‍न से, पुरुषवादी सामाजिक-सांस्‍कृतिक मूल्‍यों से और स्‍वयं स्‍त्री-समुदाय में व्‍याप्‍त बद्धमूल रूढ़ संस्‍कारों की दिमागी गुलामी से जोड़कर देखा। इस मायने में महादेवी का‍ चिन्‍तन मौलिकता और वैज्ञानिक तर्कणा की दृष्टि से उन्‍हें बीसवीं शताब्‍दी से पूरी दुनिया की अग्रणी स्‍त्री चिन्‍तकों के बीच स्‍थान पाने का हकदार बना देता है। स्‍त्री-प्रश्‍न पर महादेवी के जो ग्‍यारह निबन्‍ध 'श्रृंखला की कडि़यां' संकलन में संकलित हैं, वे बीसवीं शताब्‍दी के चौथे दशक में लिखे गये थे। इन निबंधों में महादेवी पुरुषसत्‍तात्‍मक समाज में स्त्रियों को सामाजिक-आर्थिक-सांस्‍कृतिक-पारिवारिक गुलामी और उनके कारणों का सन्‍तुलित विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती हैं, स्‍त्री की स्‍वतंत्र अस्मिता और पहचान के प्रश्‍न को उसकी सामाजिक चेतना के विस्‍तार की आवश्‍यकता को रेखांकित करती हैं, सामाजिक रूढि़यों से संघर्ष के जटिल पक्षों को उद्घाटित करती हैं, तथा स्त्रियों की आर्थिक स्‍वावलंबिता की अनिवार्यता पर बल देती है। इन निबंधों में महादेवी ने राष्‍ट्रीय जागरण-काल के नारी प्रबोधन की जनवादी मुक्ति-चेतना को स्‍वर दिया है। कभी-कभी यह सोचकर अफसोस होता है कि गद्य के दुर्लभ सौन्‍दर्य और जीवन-पर्यवेक्षण की सूक्ष्‍मग्राही दृष्टि के बावजूद, महादेवी ने कोई उपन्‍यास नहीं लिखा। यदि वे ऐसा करतीं तो निस्‍संदेह हिन्‍दी साहित्‍य में भी आज शायद आशापूर्णा देवी की सत्‍यवती और स्‍वर्णलता जैसी, या चेर्नीशेव्‍स्‍की की वेरा पाव्‍लोना जैसी प्रतिनिधि स्‍त्री-चरित्र मौजूद होती। कहा जा सकता है कि अपने देशकाल में उमा नेहरू और कमला देवी चौधरी से लेकर स्‍वयं महादेवी तक जो स्‍त्री चरित्र थे और राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन में भागीदारी करने तथा सामाजिक रूढि़यों से टकराने वाली स्त्रियों का जो विशाल समुदाय मौजूद था, उनका प्रतिनिधित्‍व करने वाले प्रतिनिधि स्‍त्री-चरित्र अपने परिवेश और जद्दोजहद के साथ तत्‍कालीन स्‍त्री-लेखन के पटल पर सही ढंग से अपनी उपस्थिति नहीं दर्ज करा सके। लेकिन जहाँ तक वैचारिक लेखन का प्रश्‍न है, स्‍त्री-प्रश्‍न पर उस समय काफी कुछ लिखा गया। महादेवी का लेखन इसी समृद्ध परम्‍परा की अग्रतम कड़ी था।

 


उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्‍दी के प्रारम्भिक वर्षों में हिन्‍दी की आदि स्‍त्री कथाकार बंग महिला ने साहस के साथ अपनी कहानियों और लेखों में पुरुष वर्चस्‍व के खिलाफ और स्‍त्री-उत्‍पीड़क रूढि़यों-मान्‍यताओं के खिलाफ आवाज़ उठाई। बंग महिला ने पुराणपंथी साहित्‍य-पण्डितों और सम्‍पादकों के कोप का ही नहीं, बल्कि कई बार तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचन्‍द्र शुक्‍ल की तीव्र असहमतियों और विरोध का सामना करते हुए भी स्त्रियों पर लादे जाने वाले नैतिक नियमों के बंधनों, विधवाओं की स्थिति, स्‍त्री-शिक्षा सम्‍बन्‍धी वर्जनाओं और पुरुष-प्रधान पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे में स्‍त्री की पराधीनता पर प्रश्‍न उठाये।

 


विशेषकर प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान हिन्‍दी प्रदेश में स्‍त्री स्‍वातंत्र्य की नयी चेतना की जो लहर दिखायी देती है, वह बंग महिला की स्‍त्री-मुक्ति चेतना और सामाजिक सरोकारों का ही विस्‍तार थी। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के पुरुष समाज सुधारकों ने स्त्रियों की दुरवस्‍था पर करुणा और सहानुभूति के साथ विचार किया था और सुधार पर बल दिया था। इसके विपरीत, स्‍त्री-मुक्ति चेतना की जो नई लहर बीसवीं शताब्‍दी के दूसरे दशक में उठी, वह स्‍त्री समुदाय के भीतर से उठी मुक्ति की नयी आकांक्षा की परिणति थी। इस लहर ने स्त्रियों की पराधीनता और पुरुष-वर्चस्‍ववाद के हर रूप को ज्‍़यादा प्रखरता से उजागर किया और इसके विरुद्ध मुखर विद्रोह का स्‍वर ऊँचा उठाया। उस दौर की हिन्‍दी पत्र-पत्रिकाओं के सर्वेक्षण से यह बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि इस आन्‍दोलनात्‍मक सांस्‍कृतिक-सामाजिक लहर पर राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन की विभिन्‍न धाराओं-उपधाराओं का स्‍पष्‍ट प्रभाव मौजूद था। 1909 में प्रयाग से रामेश्‍वरी नेहरू के सम्‍पादन में शुरू हुई पत्रिका 'स्त्री दर्पण' हिन्‍दी प्रदेश में स्‍त्री आन्‍दोलन की पहली और सबसे महत्‍वपूर्ण पत्रिका थी। इसमें तत्‍कालीन वामपंथी विचारक सत्‍यभक्‍त, राधामोहन गोकुल, रमाशंकर अवस्‍थी आदि के साथ हिन्‍दी की पहली नारीवादी विचारक उमा नेहरू और हृदयमोहनी, हुक्‍मा देवी, सत्‍यवती और सौभाग्‍यवती आदि लेखिकाएँ स्त्रियों की पराधीनता के विविध पक्षों पर नियमित रूप से लेख लिखती थीं तथा स्त्रियों के सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों का मुद्दा प्रखरता के साथ उठाती थीं। गत शताब्‍दी के शुरुआती तीन दशकों के दौरान 'स्‍त्री दर्पण', 'गृहलक्ष्‍मी', महिला सर्वस्‍व', और 'चाँद' के अतिरिक्‍त 'सरस्‍वती', 'प्रभा', 'प्रताप', 'अभ्‍युदय', 'मर्यादा', 'सुधा', 'माधुरी' आदि सभी अग्रणी पत्रिकाओं में स्‍त्री प्रश्‍न पर विचारोत्‍तेजक लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते थे और नारी जीवन विषयक सामाजिक प्रश्‍नों और सैद्धान्तिक मुद्दों पर गम्‍भीर एवं लम्‍बी बहसें चलती थीं जिनमें बहुतेरी लेखिकाएँ भागीदारी करती थीं। उस समय स्‍त्री प्रश्‍न पर चिंतन की एक धारा वह सुधारवादी-उदारवादी धारा थी जो आर्यसमाज के सामाजिक आन्‍दोलन और गाँधी के विचारों से प्रभावित थीं। एक दूसरी धारा उमा नेहरू जैसी रेडिकल नारीवादियों की थी जो मध्‍यवर्गीय रैडिकलिज़्म और यूरोपीय नारी आन्‍दोलन से, विशेषकर 1905 से चल रहे नारी मताधिकार आन्‍दोलन से प्रभावित थी। तीसरी धारा देशज चरित्र वाली क्रान्तिकारी जनवादी एवं प्रगतिशील धारा थी, जो स्‍वतंत्राता-समानता-भातृत्‍व के जनवादी सिद्धान्‍तों को स्त्रियों के ऊपर भी लागू करने पर बल देती थी तथा यह मानती थी कि पुरातनपंथी सामाजिक रूढि़यों से मुक्‍त होकर स्त्रियों को बराबरी एवं सम्‍मान का दर्जा दिये बिना राष्‍ट्रीय मुक्ति की परियोजना अपने समग्र एवं वास्‍तविक रूप में कभी भी साकार नहीं हो सकती। इस धारा के अग्रणी चिन्‍तक राधामोहन गोकुल थे, जो एक प्रचण्‍ड, निर्भीक, जुझारू, भौतिकवादी चिन्‍तक थे। तीसरे दशक से लेकर चौथे दशक के प्रारम्‍भ तक स्‍त्री प्रश्‍न पर लिखे गये गोकुलजी के लेख अपने निर्भीक एवं सूक्ष्‍म विश्‍लेषण की दृष्टि से आज भी अतुलनीय प्रतीत होते हैं।

 


स्‍त्री-प्रश्‍न पर महादेवी के चिन्‍तन में हमें उपरोक्‍त तीनों धाराओं के सकारात्‍मक पक्षों का संश्‍लेषण नजर आता है। राजनीतिक विचारों की दृष्टि से महादेवी राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन की मुख्‍य धारा के निकट थीं लेकिन सहानुभूति क्रान्तिकारियों के साथ भी थी। इस दृष्टि से उनके विचार गणेश शंकर विद्यार्थी के निकट प्रतीत होते हैं। राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन और सामाजिक जीवन में भागीदारी विषयक विचारों में उनकी निकटता गाँधी के साथ दिखती है, लेकिन दूसरी ओर सामाजिक रूढि़यों के ध्‍वंस के मामले में उनके विचार एकदम अडिग एवं स्‍पष्‍ट थे। स्‍त्रियों की स्थिति के मामले में अतीत एवं धर्म के आदर्शीकरण की प्रवृत्ति उनमें लेशमात्र भी देखने को नहीं मिलती। वे नये के निर्माण के लिए पुरातन के ध्‍वंस का पक्ष लेती हैं और अतीतोन्‍मुखता की बजाय भविष्‍योन्‍मुख दृष्टि की बात करती हैं। उमा नेहरू का यूरोप-प्रेरित नारीवाद उच्‍चमध्‍यवर्गीय अभिजात स्त्रियों के बीच ही सहज स्‍वीकार्य हो सकता था। महादेवी जब स्‍त्री जीवन की समस्‍याओं की बात करती हैं तो उच्‍च मध्‍य वर्गीय शिक्षित स्त्रियों, परम्‍परापाश में जकड़ी आम मध्‍यवर्गीय घरेलू स्त्रियों और किसान-मज़दूर परिवारों की स्त्रियों - इन तीनों ही की अलग-अलग समस्‍याओं और साझा समस्‍याओं की चर्चा करती हैं। उनकी सैद्धान्तिक विवेचना व्‍यावहारिकता की जमीन से कभी पृथक नहीं होतीं। उनकी विषयवस्‍तु अमूर्त नारी प्रश्‍न नहीं है। उसे वे अपने समय व समाज के सन्‍दर्भ-चौखटे में अवस्थित करके देखती है। स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक महादेवी का चिन्‍तन मुख्‍यत: अपने समाज की आन्‍तरिक गति से पैदा हुआ है। स्‍वतंत्रता और समानता के यूरोपीय प्रबोधनकालीन विचार यहाँ बाह्य प्रभाव के रूप में नहीं बल्कि पुन-संस्‍कारित देशज और लोकग्राह्य रूप में नजर आते हैं। इस मायने में महादेवी के विचारों की निकटता उमा नेहरू की अपेक्षा राधामोहन गोकुल की धारा के साथ अधिक प्रतीत होती है। बाह्य वैचारिक समानता की यदि बात करें तो स्‍त्री मुक्ति विषयक महादेवी केविचारों की निकटता यूरोपीय स्‍त्री-चिन्‍तकों की अपेक्षा उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के जुझारू भौतिकवादी और क्रान्तिकारी जनवादी रूसी चिन्‍तक निकोलाई चेर्नीशेव्‍स्‍की के साथ बनती है जिन्‍होंने 'क्‍या करें' उपन्‍यास में अप्रतिम स्‍वतंत्र व्‍यक्ति एवं स्‍वप्‍नद्रष्‍टा संघर्षशील स्‍त्री चरित्र के रूप में अपनी नायिका वेरा पाव्‍लोना की सृष्टि की।

 


महादेवी ने न केवल स्त्रियों की सामाजिक-पारिवारिक पराधीनता का प्रश्‍न उठाते हुए सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी तथा उनके आर्थिक स्‍वातंत्र्य पर बल दिया और इससे जुड़ी सभी बाधाओं-समस्‍याओं की चर्चा की। उन्‍होंने न केवल स्त्रियों की पराधीनता के चलते हुई सामाजिक-सांस्‍कृतिक विकृतियों की चर्चा की, बल्कि इसके साथ ही उन्‍होंने इस स्थिति से उत्‍पन्‍न स्त्रियों के आत्मिक-वैचारिक संकुचन और अस्मिता के लोप की ऐतिहासिक त्रासदी को भी रेखांकित किया। स्त्रियों की स्‍वतंत्र पहचान के अभाव या व्‍यक्तित्‍वहीनता की विडम्‍बना या अस्मिता के लोप पर विचार करते हुए अस्मितावादी राजनीति के विचारकों-पक्षधरों के समान, महादेवी अनैतिहासिक रुख नहीं अपनातीं। स्‍वतंत्र अस्मिता के अभाव के प्रश्‍न की पड़ताल वे सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और सामाजिक-सांस्‍कृतिक रूढि़यों की ऐतिहासिक निरन्‍तरता से जोड़कर करती हैं। इसलिए महादेवी का स्‍त्री मुक्ति विषयक चिन्‍तन अपार आक्रोश वाला अकर्मक नारीवाद नहीं, बल्कि तर्कसंगत प्रतिरोध की गम्‍भीरता से युक्‍त सकर्मक चिन्‍तन है। निश्‍चय ही, वे बने-बनाये नुस्‍खे-फार्मूले नहीं सुझातीं या मुक्ति का कोई यूटोपिया नहीं प्रस्‍तुत करती हैं। इसके बजाय वे सामने उपस्थित समस्‍याओं का ऐसा सांगोपांग विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती हैं, जिनके बीच से स्‍त्री मुक्ति की एक परियोजना और उसका एक मार्ग आकार लेता प्रतीत होता है।

 


स्‍त्री-पुरुष समानता का अर्थ महादेवी के लिए यह कदापि नहीं है कि स्त्रियाँ हर मायने में पुरुषों के जैसा होने का प्रयास करें। वे एकाधिक स्‍थानों पर स्त्रियों और पुरुषों की अलग-अलग विशेषताओं को रेखांकित करती हैं। उत्‍पीड़न को जन्‍म देने वाली सामाजिक असमानताओं और स्त्रियों को हेय बताकर उस उत्‍पीड़न का पक्ष-पोषण करने वाले सांस्‍कृतिक मूल्‍यों के निर्मूलन के बाद भी स्‍त्री-पुरुष की जैविक भिन्‍नता से उत्‍पन्‍न स्‍वभावगत भिन्‍नताएँ व विशिष्‍टताएँ तो मौजूद रहेंगी ही। बल्कि यूँ कहा जा सकता है कि इन भिन्‍नताओं की समाप्ति तो समाज से वैविध्‍य एवं प्रतिकूलता के सौन्‍दर्य की समाप्ति होगी। महादेवी का स्‍पष्‍ट विचार है कि समानता के लिए संघर्ष का यह अर्थ कदापि नहीं है कि स्त्रियाँ हर मायने में पुरुषों जैसा होने की कोशिश करें। वह अनुकरण उन्‍हें उनकी स्‍वतंत्र अस्मिता की स्‍थापना की दिशा में नहीं बल्कि एक अन्‍य रूप में लोप की दिशा में ही ले जायेगा। यहाँ स्‍त्री की अस्मिता के प्रश्‍न को महादेवी बुर्जुआ नारीवाद की मुख्‍य धाराओं से एकदम अलग रूप में देखती हैं और अपने अलग तरीके से स्‍त्री होने के अर्थ का संधान करती प्रतीत होती हैं।

 


ऊपरी तौर पर देखने पर यह एक अजीब-सी बात लगती है कि स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक निबन्‍धों में जहाँ महादेवी का एक प्रखर स्‍वतंत्रचेता रूप सामने आता है, वहीं छायावादी नारी-बोध वाली उनकी कविताएँ स्त्रियों के एकात्‍म प्रेम, उनकी पीड़ा, असहायता और अवसाद की अभिव्‍यक्ति में आगे नहीं जा पातीं। पहले मुझे भी वह अन्‍तरविरोध विचित्र और अव्‍याख्‍येय प्रतीत होता था। लेकिन गहराई से सोचने पर लगता है कि यह कोई विसंगति नहीं है। यह अन्‍तरविरोध एक एकल विचार-सरणि के दो प्रतिकूल पक्षों के अन्‍तरसंघर्ष के रूप में देख जाना चाहिए। इन्‍हीं प्रतिकूल पक्षों का टकराव महादेवी की विचार-प्रक्रिया की आन्‍तरिक गति है। अन्‍तरविरोध हर बड़े रचनाकार के कृतित्‍व में होता है और ये अन्‍तरविरोध वस्‍तुत- युगीन सामाजिक अन्‍तरविरोधों को परिवर्तित कर रहे हैं। तोल्‍स्‍तोय ओर दोस्‍तायेव्‍स्‍की हों, प्रेमचंद और निराला हों या महादेवी हों कोई भी इन अन्‍तरविरोधों से मुक्‍त नहीं रहा। महादेवी ने एक स्‍त्री के लिए समय और समाज द्वारा बाँधी गयी चौहद्दी में जीते और रहते हुए स्‍त्री होने के अर्थ का सन्‍धान किया और और मुक्ति के प्रश्‍न पर हर पहलू से विचार किया। उनके जीवन के समक्ष युगीन रंगमंच की अवश करने वाली सीमाएँ थीं और विचारों के लिए उड़ान भरने को भविष्‍य का क्षितिज। कहा जा सकता है कि इन्‍हीं में से पहला पक्ष महादेवी के काव्‍यबोध को जन्‍म देता है और दूसरा पक्ष उनके स्‍त्री प्रश्‍न विषयक निबन्‍धों की वैज्ञानिक, वस्‍तुपरक एवं निर्भीक तर्कसंगति में अभिव्‍यक्‍त होता है। एक अन्‍य धरातल पर सोचते हुए यह भी कहा जा सकता है कि स्‍त्री-जीवन की त्रासदी एवं विडम्‍बना की अनुभूति या अवबोध का पक्ष (परसेप्‍चुअल आस्‍पेक्‍ट) यदि महादेवी की कविताओं में सामने आता है तो उनका अवधारणात्‍मक पक्ष (कंसेप्‍चुअल आस्‍पेक्‍ट) उनके निबंधों में प्रकट होता है।

 


अब महोदवी के इस अन्‍तरविरोध को समझने के लिए एक तीसरे सन्‍दर्भ चौखटे का सहारा लें। हमें कबीर और कई अन्‍य निर्गुण सन्‍तों में भी एक अन्‍तरविरोध देखने को मिलता है जो वास्‍तव में एक ही चिन्‍तन सरणि की आन्‍तरिक गति के दो पक्षों को प्रकट करता है। कहीं तो वे इहलोक की ठोस समस्‍याओं-रूढि़यों, पाखण्‍ड, अन्‍धविश्‍वास और अन्‍याय से टकराते हुए चुनौती की भाषा में बात करते हैं, फिर कहीं मानो स्‍वयं को निरूपाय-सा महसूस करते हुए, अवसाद या विरक्ति में डूबे हुए पारलौकिक दुनिया का संधान करते हुए रहस्‍यवाद में शरण ढूँढ़ते प्रतीत होते हैं। हर सामाजिक-वैचारिक संघर्ष में हार-जीत, आशा-निराशा के अवरोह आते हैं और सच्‍चे और बड़े रचनाकार वही हैं जिनका रचना-जगत इन दोनों पक्षों की इन्‍दराजी करे। महादेवी की कविताओं के मूल स्‍वर और उनके स्‍त्री-प्रश्‍न विषयक निबंधों के बीच के अन्‍तरविरोध को इसी रूप में देखा जा सकता है।

 


और अन्‍त में इस अन्‍तरविरोध को देखने का चौथा कोण प्रस्‍तावित है। महादेवी की कविताओं का छायावादी नारीबोध, स्त्रियों के एकात्‍म प्रेम, पीड़ा, असहायता और अवसाद की केन्‍द्रीय अभिव्‍यक्ति के बावजूद ऐतिहासिक दृषि से स्‍त्री होने के अर्थ के सन्‍धान, स्‍त्री के स्‍वतंत्र वजूद की तलाश के उसी व्‍यापक उपक्रम का एक अंग है, जिसके अन्‍तर्गत महादेवी का वैचारिक गद्य लेखन आता है। इन कविताओं की स्‍त्री रीतिकालीन नायिका नहीं है, न ही इनका सौन्‍दर्यबोध और विधान ही रीतिकालीन है। ये अभिव्‍यक्तियाँ एक स्‍वतंत्र व्‍यक्तित्‍व वाली स्‍त्री की प्रेमानुभूतियों की, कामनाओं की, पीड़ाओं की अभिव्‍यक्तियाँ हैं। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में यूरोपीय स्‍वच्‍छन्‍दवादी काव्‍यधारा की प्रेमकविताएँ जिन ऐतिहासिक अर्थों में प्रगतिशील थीं, उन्‍हीं अर्थों में छायावादी दौर की प्रेम की कविताओं में भी प्रगतिशीलता का पहलू था। महादेवी के समय और समाज में वैयक्तिकता का बोध और प्रेम की अभिव्‍यक्ति भी एक सामाजिक विद्रोह था और एक स्‍त्री के लिए तो खासतौर पर। महादेवी की कविताओं का मूल स्‍वर आकुल प्रतीक्षा, सघन अवसाद, गहन पीड़ा और यदा-कदा असहायता की अभिव्‍यक्ति के बावजूद एक ऐसी स्‍त्री का स्‍वर है जिसका अपना वजूद है और जिसमें अपने प्रेम को, अपनी आशा-निराशा को प्रकट करने का साहस है। वह रीतिकालीन नायिका नहीं है। इन कविताओं का सौन्‍दर्य विधान भी रीतिकाल जैसा नहीं, बल्कि उसके ठीक विपरीत है। इस दृष्टि से आज महादेवी की कविताओं के भी पुनर्पाठ की आवश्‍यकता है। महादेवी ने स्‍त्री होने के अर्थ का जो सन्‍धान अपने युगीन सन्‍दर्भों में किया, उसी व्‍यापक उपक्रम के अलग-अलग पक्ष हमें उनके काव्‍य और गद्य में देखने को मिलते हैं।


('अदहन' के नवम्‍बर-दिसम्‍बर 2016 अंक में प्रकाशित)