Thursday, April 18, 2019

उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स : शिवप्रसाद जोशी


हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है
 (उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स)
शिवप्रसाद जोशी

उत्तरआधुनिकता यह नहीं कहती कि तुम आधुनिकता के ऊपर से छलांग लगाकर एक नये भाषा उत्पात में अपनी सनसनी के साथ दाखिल हो जाओ. वह छलांग जैसी फ़ुर्तीली कार्रवाई है ही नहीं. वह तो बहुत धीरे धीरे आधुनिकता में आ चुकी दरारों से रिस कर अंदर आती है और आधुनिकता के वृक्ष को भीतर से सोखने की तिकड़में करती है.

उत्तरआधुनिकता उत्तर-सत्य की जननी है. वह धर्मबहुल महानता और प्रकांडता वाले प्राचीन संसार के गल्पों, नैरेटिवों, मिथकों की पुनर्रचना भी है. वह एक प्राचीनता का निर्माण करती है और उस प्राचीनता के मिथ का निर्वहन. वह धर्म को एक नितांत निजी वृत्त से खींचकर ले आने वाली रस्सी है. वह तोड़फोड़ नहीं है जैसा कि उसके बारे में बहुप्रचारित है, वह व्यवस्थाओं का विपर्यय भी नहीं है जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है. वह न बेचैनी है न उलझन न गड्डमड्ड. जैसा कि उसका ग्राफ़िक प्रेजेन्टेशन है. वह एक होशियार फ़ितरत है. मॉर्डेनिज़्म का वह विचलन है. जैसे वाम का उत्तर वाम. नया वाम नहीं. उसका उत्तर. लेकिन न दिशा न जवाब. बस पोस्ट. लेकिन आगे का भी नही, न अग्रिम, न आगामी. वह पीड़ित व्यक्ति की आह को बुझाने का उपक्रम करती प्यास है. वह प्यासों को पानी नहीं देती- उसकी अपरिहार्यता बताती रहती है, बाज़दफ़ा वो कहती है- अरे यह प्यास भ्रम है या यह असत्य है! या हो सकता है वो व्याकरण में पानी के पर्यायवाची खोजने चले जाएः जब तक मैं इसे जल न कहूं/ मुझे इसकी कल-कल सुनाई नहीं देती/ मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं/ मेरे लोटे में भरा रहता है अंधकार. (असद ज़ैदी)

वह ख़ुद को, किसी निष्कर्ष पर न जाती हुई किसी लक्ष्य को असमर्पित, कहती है. लेकिन पोस्टमॉडर्निज़्म का लक्ष्य स्पष्ट है. वह मनुष्य की स्वाभाविकता का हरण है, एक अस्वाभाविक, सुन्न और मुग्ध मनुष्य की रचना उसका एक लक्ष्य है. नो मैन इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी मनुष्य द्वीप नहीं है)- जॉन डोन्ने ने कहा था. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी पाठ द्वीप नहीं है)- उत्तरआधुनिक कहते हैं. कोई भी पाठ अपने तई मुकम्मल या संपूर्ण नहीं है. हर पाठ अधूरा है. वो समस्त का अंश है. फिर वे ये भी कहते हैं कि हर पाठ का अपना अर्थ है. एक पाठ के कई अर्थ और आशय संभव है. सही तो कहते हैं, आप कहेंगे. इसमें कैसी परेशानी. सही तो कहते हैं लेकिन करते नहीं हैं. वे अधूरा कहते हैं. वे पाठों के सुनियोजित पुनर्पाठ के उतावले हैं. वे चुने हुए पाठ उठाते हैं. सेलेक्टड. उन्हें मनमाने ढंग से खोलते हैं और कहते हैं कि इस पाठ में यह कहां है और यह क्यों नहीं है. वे मार्क्स को उनकी जमीन से उखाड़ लेना परम समझते हैं. वे जानते हैं कि सत्य क्या है. लेकिन कुछ देर बाद वे कहेंगे कि सत्य कुछ और है. और नहीं सत्य अनेक हैं. इसे वह पाठ की गैर-रेखीयता कहते हैं. इस तरह बुनियादी सच्चाई उत्तरआधुनिक भंवरों में डूब जाती है या उलट कर कहें कि वहां सच्चाई की बुनियाद नहीं होती है. वह निर्वात में टंगा हुआ एक भ्रम है. इस तरह उत्तरआधुनिक सच्चाई के संहारक हैं और झूठ के प्रचारक- घोषित अघोषित. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड उनकी ढाल है. फ़्रेडरिक जेमसन ने कहाः उत्तरआधुनिकता, हालिया (द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर) पूंजीवाद की सांस्कृतिक दलील है. ज़ियाउद्दीन सरदार ने कहाः उत्तरआधुनिकता पश्चिमी संस्कृति का नया साम्राज्यवाद है. उत्तरआधुनिक कंधे उचकाएंगें: ये महज़ उद्धरण हैं. वे ऐसा क्यों करेंगें. क्योंकि उत्तरआधुनिकता उद्धरणों से बचती फिरती चलती है. उद्धरण उसकी शिनाख़्त करते हैं. वह सिर्फ़ अपना उद्धरण धारण करती है. उसे लगता है उसका अपना कोट पर्याप्त है.

उदीयमान दक्षिणपंथी कहते हैं यह मार्क्सवाद की बला है. पहले वे पूछते थेः यह मार्क्सवाद क्या बला है. कुछ अन्य निरपेक्षतावादियों का मत है कि उत्तरआधुनिकता नहीं रही- वो विलुप्त हो चुकी है. इसके उलट जब जब आधुनिकता अपने को बेहतर कर रही होती है तब तब वह दोगुने वेग से उस पर प्रहार करने आ जाती है. वह यही हैं. अपनी कृत्रिमता में. लेकिन अपने मक़सद में फलतीफूलती. उत्तरआधुनिकता एक समकालीन ऐंठन है. कोई इस तक नहीं पहुंचता, यह अपने शिकार चिह्नित करती है और फिर उनका वरण और फिर उन्हें लपेट देती है. उत्तरआधुनिक व्यक्तित्व एक सर्पीला और कई घुमावों और खांचों वाली कील की तरह होता है. वहीं पूरा होता जाता घुमाव. अगर कवि है तो उसके किरदार में, अगर लेखक है तो उसके विचार में, नेता है तो उसकी ज़बान में यह कील होगी. लेकिन वह दुख नहीं होगाः वह क्य़ा है जो इस जूते में गड़ता है/ यह कील कहां से रोज़ निकल आती है/ इस दु:ख को क्यों रोज़ समझना पड़ता है?” (रघुबीर सहाय). उत्तरआधुनिकता के पास आत्मा से टकराते ऐसे प्रश्न नहीं हैं. वह दुःख नहीं जानती. दुःख का उत्सव जानती है. निराशा को वह आत्मरुदन में बदल देती है और पता भी नहीं चलता. करुणा की उसे परवाह नहीं. प्रेम के लिए उसके जखीरे में एक से एक वार हैं. उत्तरआधुनिकता बस प्रतीकों में अपना सफ़र तय करती है. या उन्माद में. राष्ट्रीय झंडे में फड़फड़ाहट या फिसलन की तरह चिपकी है. अस्थियों, विसर्जनों और श्रद्धांजलियों में गोंद की तरह या लोटों में गेंद की तरह. यह चित्र भी है और भाव भी और संदेश भी. प्रणब मुखर्जी भूतपूर्व राष्ट्रपति हैं. उससे पहले एक संदेश हैं. वह एक सिंबल भी हैं. उनके पास जो संदेश है वही मीडियम यानी माध्यम है. मीडियम इज़ द मैसेज वाले मैकलुहानी दिन गए, अब संदेश ही माध्यम बना दिया जाता है. नाना स्वरूपों में विचरण करती हुई उत्तरआधुनिकता राम को खंजर बना देती है हनुमान को प्रचंड. वॉट्सऐप से भीड़ के बीचोंबीच वही है जो बम की तरह फटती है. उत्तर आधुनिकता एक भीड़ है जो आधुनिक जीवन पर हिंसक उतावली है. भीमा कोरेगांव के यथार्थ में अरबन नक्सली का नैरेटिव उसी का सजाया हुआ है. स्पर्शों को घात में बदल देती है. उसे आज़माया ही जाता है इसलिए कि नागरिक लड़ाइयां देश तोड़ने का षडयंत्र पेश हो सकें. देश का और उसके वजूद का  इतना काल्पनिकीकरण और वॉट्सऐपीकरण वो कर देती है. उसी की कृपा है कि देशभक्ति भाव नहीं चाशनी है. हमारे चेहरे टपके हुए और लिथड़े हुए हैं. अस्मिताएं डरी हुई हैं. भय अब प्रछन्न नहीं है, वह नागरिक होने का एक लक्षण है. सत्ता के उपकरणों से उत्तरआधुनिकता एक नया क़िला बनाने की ओर उन्मुख  है जिसे वो आगे चलकर राष्ट्र कहेगी.

उत्तरआधुनिकता एक महा-स्वप्न से उभरी क्रिटिकल धाराओं से पीछा छुड़ाने चली थी. उसे बहुत काम करने थे. भाषा और कला को पांडित्य से छुटकारा और दबेछिपे सांप्रदायिक मंतव्यों को फ़ाश करना था. उसे और इतालो काल्विनो बनाने थे और यथार्थ और स्मृति के नायाब शहरों में लेखक की तरह भटकना था. मिशेल फ़ूको को उसने क्या से क्या बना दियाः एक घाघ  नॉर्मेटिविस्ट (युर्गेन हाबरमास ने कहा). वह ऐन इस दुष्कर हिंदी पट्टी से एदुआर्दो गालियानो और टैरी एगल्टन की तलाश करती, उन्हें पहचानती. वोअपार ख़ुशी का घराना” (मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस) क्यों नहीं बना पाई जो इतने सारे नैरेशन में गुंथा हुआ है और जिन थरथराहटों से भरा हुआ है, वो उत्तरआधुनिकों को समझ क्यों न आईं? बाढ़ एक कुदरती फ़िनोमेना है, कुदरती आफ़त नहीं.’ लेकिन उत्तरआधुनिकता एक ग़ैर कुदरती आफ़त है, क्योंकि वह एक ग़ैर कुदरती फ़िनोमेना है. वह चालाकी से देरिदां के विखंडन में जा मिली, वहां उसका देर टिकना नामुमकिन था, उत्तर संरचना में दाख़िल हुई. वह उत्तरऔपनिवेशिक होकर प्रतिरोध, दमन, हाशिया, एलजीबीटी पर मुखर हुई, वह दलितों और उत्पीड़ितों के लिए आई थी लेकिन वह उत्तर इतिहास बनाने लगी और उत्तर सत्य गढ़ने लगी. उत्तरआधुनिकता ख़ुद को सबऑल्टर्न साबित करने कहां नहीं उतरी. लेकिन गायत्री स्पीवाक ने सही कहा कि अपने लिए जगह हासिल करने यानी सांस्कृतिक वर्चस्व में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेने वाली जद्दोजहद, सबऑल्टर्न होना नहीं है. उत्तरआधुनिकता का लंबी लड़ाई से वास्ता नहीं. उसमें उपलब्ध जीवन को ठुकराने’ (मंगलेश डबराल) की ताब नहीं है. और न ही उस दृश्य को बचाने का साहस जो चारों तरफ़ अदृश्य हुआ जाता है. आगे और आगे जाने की, ऊंचा और ऊंचा होने की, नया और नया होने की उसकी लालसा एक विकरालता में तब्दील हो गई. वह बाड़ों को गिराना चाहती थी- ठीक था, नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड- उसका कहना बनता था, वह भाषा की देहरियां ड़ना चाहती थी- ठीक था, वह ज़िद और साहस के नये प्रतिमान गढ़ना चाहती थी- ठीक था, वह मुख्यधारा नहीं मानती थी- ठीक था, वह नये मनुष्य के निर्माण को प्रतिबद्ध बताई जाती थी- ठीक था. लेकिन यह क्या. उत्तर आधुनिकता, तुम जो निशान मिटाती जाती हो, जो हुंकार और अहंकार तुमसे उठता है, जो धूल तुम उड़ाती हो- यह तो किसी बर्बरता के प्रवेश के संकेत हैं- तुम आततायी की आंधी क्यों बनी. 

दुनिया के वैचारिक, साहित्यिक, कला आंदोलनों में उत्तरआधुनिकता को एक अवस्था या एक चरण या एक दर्शन के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिशें भी जारी हैं. और ये काम आज से नहीं, 20वीं सदी के चौथे दशक से चला आ रहा है. जब दूसरा विश्व युद्ध ढलान पर था, बंटवारे हो चुके थे, हिंसाओ ने नरसंहार कर दिए थे, चार्ली चैप्लिन और सार्त्र पिकासो आदि से लेकर अपने यहां फैज और मुक्तिबोध तक आधुनिक मनुष्य की चीखें और संताप, आगामी लड़ाइयों की रूपरेखा बना रहे थे, आगे चलकर और अंदर दाखिल होकर भाषाओं में जाएं और अपनी हिंदी में जाएं तो लेखक कवि कहानीकार अपनी रचनाओं में एक उद्विग्न और जूझते मनुष्य के संकटों की शिनाख्त कर रहे थे, हां बेशक यही वह दौर भी था जब उत्तरआधुनिक अपनी छटाओं और प्रशस्ति बेलाओं के साथ आसपास मुखर थे. वे हरगिज़ नहीं चाहते थे कि भाषा और विचार की आधुनिकता अपना स्पेस बनाए. लेकिन ऐसा कहां होता है. ऐसा भी कहां होता है कि सच्चाई को लड़ना ही न पड़े. उत्तरआधुनिकता दरअसल एक थोपी हुई वैचारिकता है, वह चीज़ों का नुकसान करने आई है. हम अपने स्वप्न बना रहे होते हैं और वो इस स्वप्न को एक चटपटा विलास या एक आतुर याचना बना देती है. हिंदी जैसी भाषाओं में यह संकट आया है. गद्य और कविता में यह संकट दिखता है. प्रयोगों पर उत्तरआधुनिकता का कब्ज़ा तो खासा चिंताजनक है. और यह उतरकर सामाजिक व्यवहारों में भी दाखिल हो रहा है- भयावह है. आधुनिक मनुष्य की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अभी 21वीं सदी में भी उसकी लड़ाइयां जबकि जारी हैं और कठिन हैं, उसे उत्तरआधुनिक का लबादा पहनाकर शिथिल किया जा रहा है. इस विंडबना को तोड़ना भी उसका मौजूदा कार्यभार होना चाहिए. 

एक सच्चे, सजग और साहसी नागरिक के लिए तीन लड़ाइयां हैं. ख़ुद से लड़ना और दुष्टताओं से लड़ना है. आधुनिक मनुष्य को उत्तरआधुनिकता के कभी नाज़ुक कभी सख़्त आघातों से भी बचना है. उत्तरआधुनिकता नहीं जानती लेकिन इस तरह एक तत्पर और मुस्तैद नागरिक के निर्माण के काम आती है जैसे तानाशाह के भेस में हमारा चार्ली अपना विख्यात भाषण देने जाता है और उम्मीद पर उदास होता हुआ विकल मनुष्यता में पुकारता हैः बर्बरों की नहीं हमारी है यह दुनिया. अपनी विख्यात आत्मकथा में चैप्लिन ने कहाः ग़ैर-नात्सी होने के लिए यहूदी होना ज़रूरी नहीं है. एक नॉर्मल, डीसन्ट मनुष्य होना काफ़ी है. उन शब्दों को थोड़ा बदलकर कह सकते हैं: प्रतिबद्ध होने के लिए उत्तरआधुनिक होना ज़रूरी नहीं है. इस फ़िल्म से ठीक पहले साहित्य में उत्तरआधुनिकता को प्रस्थापित किया जा रहा था. कला और संगीत में वो पहले आ चुकी थी. उत्तरआधुनिकता झपटने आई थी. लेकिन....वे ऐतिहासिक पुकारें थीं, कठिन और जानलेवा समयों की. दक्षिण एशिया का भूगोल देखिएः मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं / सँवारती हुई मुझे / उठी सहास प्रेरणा. (मुक्तिबोध) दशक वही चालीस. या शायद कुछ ज़रा पहले नक्श-ए-फ़रियादीः अरसा-ए-दहर की झुलसी हुयी वीरानी में / हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है / अजनबी हाथों के बे-नाम गरांबार सितम / आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है...(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

उत्तरआधुनिकता अतीत में लौट नहीं सकती है. लौटना उसका लक्षण नहीं है. उसे गवारा नहीं है. लौटेगी तो वह अपनी परिभाषा से उतर जाएगी. ऐसा वह भला क्यों करेगी. वह अतीत से सीखती नहीं है उसे सोखती है. अतीत उसकी कामनाओं का कंकाल है. टकराव और वैमनस्य के नैरेटिवों में वह अतीत का विद्रूप कर उलीच देती है. चालीस का दशक आया ही चाहता था जब वह कला और संगीत में घुसपैठ करने पहुंची. पसीने, संघर्ष, ख़ून और जद्दोजहद से तरबतर आधुनिकता के रचनाकार जब नये संसार का स्वप्न देखते थे तब वह साहित्य पर अपना चोला डालने पहुंच गई थी.

उत्तरआधुनिकता हमारे स्वप्नदर्शियों के बीच से, हमारे साधारण जन के बीच से तुम जाओ, तुम बेशक राख उड़ाओ, अपनी भव्यताओं से हैरान करो, अपने ज्ञान और और मानमर्दन की अपनी ध्वंस-शक्ति पर उत्सव करो या अवैज्ञानिकता को अपने प्रणाम पर भयानक गदगद हो उठो- हमें बख़्श दो. हमें तुमसे भय नहीं है. हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है. अपनी आधुनिकता की विकृतियां दूर कर उसे बेहतर बनाना है, हिफ़ाज़त हर हाल में करनी है. मार्क्स ने कहाः “Mein Verhältnis zu meiner Umgebung ist mein Bewußtsein. (माइन फरहेल्टनिज त्सू माइनर उमगेबुंग इस्त माइन बिवुस्स्टज़ाइन) हिंदी रूपांतरण कुछ इस तरह से कि अपने पर्यावरण से मेरा संबंध ही मेरी चेतना है.इस आधुनिकतम विचार को फांद पाना उत्तरआधुनिकता के लिए मुमकिन नहीं. इसलिए नहीं कि यह दीवार है इसलिए कि यह बुलंदी है.

(नोटः इस निबंध में उत्तरआधुनिकता को शब्द द्वय की तरह नहीं लिखा गया है. यानी यहां उत्तर और आधुनिकता के बीच कोई हाइफ़न यानी समास चिन्ह नहीं रखा गया है. इसलिए कि इसे आधुनिकता की निरतंरता में आगे की कोई स्थिति या चरण या अवस्था मानने की अपेक्षा लेखक का मानना है कि यह आधुनिकता के समांतर एक प्रवृत्ति एक वैचारिक सैद्धांतिक और सामरिक पोज़ीशन है. वह उत्तरआधुनिक इसलिए नहीं है कि आधुनिकता के बाद उसका आना हुआ है, कि उसका कोई ऐतिहासिक काल है, वह उत्तरआधुनिक इसलिए है कि वह आधुनिकता की वैचारिक ज़मीन पर क़ब्ज़े की नीयत से कला, साहित्य, संस्कृति, दर्शन में लाई गई प्रविधि है. वह नयेपन का छद्म है.  इसकी सबसे अधिक चोट राजनीतिक चेतना पर पड़ रही है. यही चिंता है. हालांकि उत्तरआधुनिकता को लेकर ऐसे संदेहों या चिंताओं को कॉन्सपिरेसी थ्योरी से पीड़ित ग्रंथि बता देने का चलन है लेकिन आधुनिकों को हर तरह के हमले के लिए तैयार रहना चाहिए और भाषा और विचार और राजनीति में शैलीगत और व्यवहारिक परिवर्तनों का स्वागत एक सचेत आधुनिक की तरह करना चाहिए. इतालो काल्विनो ने जब एक अद्भुत भाषा और अद्भुत संरचना की तलाश की तो उन्होंने नहीं कहा कि वह उत्तरआधुनिक हैं, उत्तरआधुनिकों ने कहा कि वह उत्तरआधुनिक भाषा है. जबकि काल्विनो का गद्य, भाषा और विचार की महान आधुनिकता ही थी. और ऐसे काल्विनो अकेले लेखक नहीं थे. भारत समेत दक्षिण एशिया, लातिन अमेरिका, यूरोप- साहित्यिक सांस्कृतिक भूगोलों की यह लिस्ट बहुत लंबी तो नहीं लेकिन इतनी छोटी भी नहीं कि उत्तरआधुनिकता के कोट में समा जाए.)
-शिवप्रसाद जोशी

(समयांतर, अप्रैल 2019 में प्रकाशित)

Wednesday, April 10, 2019

बेटे, जब तक ये दलीप सिंह है, घबराने की ज़रूरत नहीं

ज़हूर साहब और निशात आपा

(डीयू से सेवानिवृत्त असोसिएट प्रफेसर ज़हूर सिद्दीक़ी प्रग्रेसिव मूवमेंट से जुड़े रहे हैं। वे रटौल में अपने पुश्तैनी घर में ग़रीब लड़कियों के लिए स्कूल चलाते हैं। इन दिनों बीमार हैं। फोन पर बात की तो वे मुज़फ़्फ़रनगर शहर जो मेरा भी शहर है, पहुंच गए। फिर एसडी इंटर कॉलेज जो मेरा भी स्कूल था। जब उन्होंने अपने टीचर दलीप सिंह को याद किया तो मैं रो पड़ा। यह लिखते हुए भी यही हाल है। दलीप सिंह की बहुत ज़रूरत है। ज़हूर साहब से हुई बातचीत यहां पोस्ट कर रहा हूँ।) 

जब मुल्क़ का बंटवारा हुआ तो बहुत दिनों तक अफवाहों का बाज़ार गरम रहा करता था। मैं मुज़फ़्फ़रनगर में एसडी में पढ़ता था। अफ़वाह फैल गई कि कोई ट्रेन आई है जिसमें लोगों को मारकाट के भेजा गया है। मेरी माँ ने उस दिन मुझे स्कूल नहीं भेजा। अगले दिन...। वो गोल चेहरा, सुंदर..। वो पर्सनालिटी...एक दम से वो चेहरा पूरा का पूरा उभर आता है। वो हमारे टीचर...शानदार। दलीप सिंह। दलीप सिंह था उनका नाम। बोले, `कल क्यों नहीं आए?`  मैंने कहा कि अम्मी ने नहीं आने दिया। बोले, `बेटे जब तक ये दलीप सिंह है, घबराने की ज़रूरत नहीं है। जो होगा पहले दलीप सिंह को होगा, तब कोई किसी बच्चे तक पहुंचेगा।` 80 साल का हो गया हूँ। अब तक मेरे दिल पर उस बात का असर ज्यों का त्यों बना हुआ है। ऐसे लोग थे। ऐसे ऊंचे कि माहौल कैसा भी हुआ, डिगे नहीं।

मेरे पिता नुरुद्दीन अहमद सिद्दीक़ी मुज़फ़्फ़रनगर में पोस्टेड थे। डिप्टी कलेक्टर। एससडीएम जानसठ। अंग्रेज कलेक्टर को उनकी ईमानदारी पर यक़ीन था। बाहर से रिफ्युजी आ रहे थे। उनको सही सामग्री मुहैया कराने, उनके रहने की जगह का इंतज़ाम कराने जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी थी। मुज़फ़्फ़रनगर में ठीक रहा। इंतज़ामात ठीक रहे। दंगे नहीं हुए। सहारनपुर से दिल्ली तक रेलवे स्टेशनों के पास के शहरों-कस्बों में रिफ्युजीज की बड़ी तादाद थी। ज़्यादातर दुकानदार लोग थे। सौदागरी जानते थे। वे छोटी-छोटी चीज़ें बेचने लगे। बहुत कम रेट पर। जैसे मैं अपनी रिश्तेदारी में सहारनपुर था। मुझे याद है, वहां भी बाज़ार में छोटे-छोटे बच्चे छोटी-मोटी चीज़ें बेच रहे थे। मसलन, लड्डू। बाज़ार में डेढ़ रुपये-दो रुपये पाव मिलने वाला लड्डू चार आना पाव बेचते थे। कम से कम मुनाफा लेकर। कुछ क्वालिटी में समझौता करके। मसलन बेसन कुछ कम करके, चीनी कुछ ज़्यादा करके, देसी घी के बजाय वनस्पति घी का इस्तेमाल करके। रेट को काफ़ी कम रखके। टॉफियां, छोटी-छोटी मीठी गोलियां वगैराह। देहात से जो लोग शहर आते तो लौटते वक़्त बच्चों के लिए ये सस्ते दामों वाली चीज़ें पाकर ख़ुश होते। मतलब, मुश्किलों में इधर आए लोगों की बाज़ार में बहुत दिलचस्पी थी और मेहनत का जज्बा था।

आज़ादी के बाद इधर का ज़्यादातर मुसलमान आज़ादी की लड़ाई के नेताओं पर भरोसा करके यहीं रहना चाहते थे। जो जाने की चाहत रखते थे, वे 10 फीसदी होंगे। बहुत से हिस्सों में फ़सादात के बावजूद इधर देहात में, शहरों-कस्बों में भी भाईचारा बना रहा। कुछ बातें हो जाती थीं पर भरोसा बना रहा। देहरादून में मुसलमानों को दंगों का सामना करना पड़ा तो लोग इकट्ठा होकर सहारनपुर में मौलवी मंज़ूर उल नबी के पास आए। वे बड़े सादे शख़्स थे। लोगों में और नेताओं के बीच उनकी इज़्ज़त थी। लोगों ने उन्हें कहा कि हम तो आपके भरोसे पर हिंदुस्तान में रह गए पर अब क्या करें। आप ने तो कहा था कि आज़ादी के बाद एक नयी दुनिया होगी। कांग्रेस के राज में सब को एक नज़र से देखा जाएगा। मौलवी साहब ने कहा कि मैं तो कोई हाकिम नहीं, मेरे पास तो कोई ओहदा, कोई ताक़त नहीं, जो तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। लेकिन, मौलवी साहब लखनऊ रवाना हो गए। लखनऊ पहुंचे तो मुख्यमंत्री पंत सुबह-सुबह अचानक उन्हें देखकर हैरान रह गए। नाश्ता कराया, बात सुनी और कहा कि अच्छा, मौलवी साहब आप जाइए। उनके लौटने से पहले नये कलेक्टर रामेश्वर दयाल पहुंच चुके थे। नये कलेक्टर ने सुबह-सुबह गाड़ी लगाने के लिए कहा तो स्टाफ ने जानना चाहा कि जाना कहां है। लेकिन, उन्होंने किसी को बताया नहीं ताकि उनकी योजना लीक न हो। वे बाज़ार पहुंचे तो कुछ लोग दुकानों के ताले तोड़ रहे थे। कलेक्टर ने शूट एट साइट का हुक्म दिया। शूट एट साइट का मतलब पांवों के पास गोली चलाना ही हुआ करता था। फायरिंग हुई, दंगाई भाग खड़े हुए और दूर-दूर जिलों तक मैसेज चला गया।

चौ. चरण सिंह मंत्री बने। देहात में पढ़ाई को लेकर उत्साह पैदा हुआ। देहात से लोग चौधरी साहब के पास पहुंचते थे, बेटों के लिए नौकरियां मांगने। वे कहते थे कि पढ़ाई कीजिए। देहात के लोग अंग्रेजी तालीम में भी आगे बढ़े। बड़ी नौकरियों में जाने लगे। फ़ौज़ में सिपाही भी बने।

इतनी उम्र हो गई। ज़माना बदल गया पर उस ज़माने के दोस्त याद आते हैं। उनके नाम याद आते हैं। दोस्तों में, उनके घरवालों में हिंदू-मुसलमान का भेदभाव नहीं था।

अफ़सोस कि दलितों की स्थिति अच्छी नहीं थी। वे बहुत भेदभाव का सामना करते हुए, संघर्ष करते हुए आगे बढ़े हैं। 
ज़हूर साहब और निशात आपा के घर (जो लड़कियों का स्कूल है) पर हम  

Saturday, March 2, 2019

गाली और बुद्धिजीवी : अमोल सरोज





(देशभक्ति के नाम पर `संस्कारी टोले` सड़कों पर `दुश्मन` की माँ-बहन की गालियां निकालते हुए घूम रहे थे। हर प्रतिरोधी विचार को बल्कि हर असहमत को इस तरह गालियों से नवाज़ना उनका चलन है। हद की बात यह है कि गालियां देने का महिमामंडन करने में अनेक बुद्धिजीवी पीछे नहीं रहते हैं। वे बाकायदा `तर्कशास्त्र` के साथ पेश होते हैं। इस प्रवृत्ति पर अमोल सरोज का पढ़े जाने लायक़ व्यंग्य।)

गाली और बुद्धिजीवी 

संवाद एक 
श्रीमान आपने कमेंट में गाली लिखी हुई है, कृपया इसे हटा दीजिये। 
बुद्धिजीवी - ये इतना सहज और आसान मसला नहीं है। मैं एक दिन तफ़सील से लेख लिखूँगा गालियों पर। 

संवाद दो 
सर एक सार्वजानिक प्लेटफॉर्म पर गाली देना कितना सही है ?
बुद्धिजीवी- देखिये, इसके कई मायने हैं। मतलब क्या आप ये कहना चाहते हैं कि प्राइवेट स्पेस में गाली दी जा सकती हैक्या मैं आप से पूछ सकता हूँ कि प्राइवेट स्पेस में गाली देने की छूट क्यों देना चाहते हैंइसका मतलब तो ये है कि हम पब्लिक में कुछ हैं और प्राइवेट में कुछ औइसका मतल आप प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देना चाहते हैं।

सर मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा। 
बुद्धिजीवी - बिलकुल कहा। सरासर कहा। तुम्हें अभी नहीं समझ आएगा। मैं एक लम्बा लेख लिख कर समझाऊंगा। दरअसल गाली को पाद समझो। लोग तो पाद के वक़्त भी बुरा मुंह बनाते हैं। अब पाद आएगा तो करना पड़ेगा। ऐसे ही गाली का है। समझ आया कुछ?
जी समझ तो नहीं आया। बदबू ज़रूर आयी। 

संवाद तीन 
सर, ये गाली महिलाविरोधी... 
 बुद्धिजीवी - देखिये आप लोग अपनी एनर्जी बेवजह खर्च कर रहे हैं। गाली को नहीं, भावना को देखना चाहिए। ऐसे तो कुत्ता भी गाली होता है। आप लोग बोलते है या नहींदोस्तों में भावना देखी जाती है, गाली नहीं। 
सर कुत्ता और औरत में तो फ़र्क़ होता है। कुत्ता हमारी ज़ुबान नहीं समझता। उसे फ़र्क़ भी नहीं पड़ता। क्या आप ये कहना चाहते हैं कि स्त्री और पशु में फ़र्क़ नहीं है? 
बुद्धिजीवी - देखो तुम अब आउट ऑफ़ द कॉन्टेक्स्ट बात कहके मुझे घेरने की कोशिश कर रहे हो। निहायत ही वाहियात बात कही है तुमने। तुम्हें शर्म आनी चाहिए। शर्म ही नहीं तुम्हें तो डूब मरना चाहिए। तुम एक नंबर के मूर्ख होमूड होगधे हो  ऐसे किसी को घेर कर मॉब लिंचिंग करना कहाँ तक सही है
जी समझ गए। 

संवाद चार 

सर फिर भी... 
बुद्धिजीवी – देखिये, मैं आपकी भावना समझता हूँ पर आप अज्ञानता की बात कर रहे हैं। मैं आपको बताता हूँ। इस शब्द का मतलब वो नहीं है जो सारा देश समझता है। इस शब्द का भाषा विज्ञान देखोगे तो आपको बहुत कुछ मिलेगा। सं 550 इसवीं में इस का मतलब जो हुआ करता था, वो बिल्कुल अलग था। शब्द की उत्पति पर गौर करेंगे तो आप ये बात नहीं कह पाएंगे जो अभी कह रहे है। फिर भी अगर आपकी भावना हर्ट हुई है तो मैं उसके लिए माफ़ी मांगता हूँ। आप ये लेख पढ़िए, इससे आपके संदेह का निवारण हो जाना चाहिए। 

जी मैं बिना पढ़े ही समझ गया। बहुत शुक्रिया। 

संवाद 

- सर पर ग़लत तो है ना? 
बुद्धिजीवी – देखिये, गाली गुस्से में दी जाए तो ज़रूर ग़लत है पर अगर मैं अपने दोस्त को दे रहा हूँ, प्यार से दे रहा हूँ, दोस्त को भी मेरी इंटेंशन पता है, तो? हमारे यहाँ की तो तहज़ीब में ही गालियाँ शामिल हैं। क्या तहजीब ही ग़लत है? यहाँ तो जो गाली देकर बात न करे तो उसे दोस्त ही नहीं समझा जाता। जितनी ज़्यादा गाली दी जाती है, दोस्ती उतनी ही क़रीबी होती जाती है। हाँ, लड़ाई-गुस्से में आप किसी को गाली दो, वो तो ग़लत है। 

-सर आप शायद ग़लत समझ रहे हैं। हम इसलिए ग़लत नहीं कह रहे हैं कि हमें आपके दोस्त के लिए बुरा लगा है। नहीं, बात आपके दोस्त  की नहीं है, इंसानियत की है। जितनी भी गालियां भारत में हैं, वे या तो  औरतों को लेकर हैं या दलित-दमित जातियों के नाम पर। तो ये गालियां आप मज़ाक में, प्यार में, कैसे भी दें, मनोबल उन्हीं का तोड़ने का काम करती हैं जो सबसे निचले पायदान पर हैं। आप ही सोचिये ना सर, हमने औरत के भाई को भी गाली बना लिया है। उस औरत का घर में आत्मविश्वास क्या रहा होगा? उस औरत के योनांग को गाली बना लिया है। आप को एक उदारहण से समझाता हूँ। पड़ोसी का एक पांच साल का बच्चा आपके बच्चे के साथ खेल रहा है। आपने अपने बच्चे को जातिसूचक गाली देते हुए कुछ कहा। अब पड़ोसी की वही जाति है जिसको गाली बना कर आप अपने बच्चे को दे रहे हो। इससे आपके बच्चे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा जबकि पडोसी के बच्चे का मनोबल टूट जाएगा। हालांकि, आपने तो अपनी समझ में उसे कुछ नहीं कहा। आसपास अपने बारे में इतनी निगेटिव बातें सुनकर जीना आसान नहीं होता है, सर। 
बुद्धिजीवी - देखिये आप जो बातें कर रहे हैं, वह अतिवाद है। इतना सोचकर कोई गाली नहीं देता। जैसे आप कह रहे हैं, वैसे कुछ नहीं होता है। बहुत दलित भी गाली देते हैं। औरतें भी गाली देती हैं।हम गाली दे देते है लेकिन इसका कोई सीरियस मतलब नहीं होता है। 

सर सभी गालियां औरतों और दलितों पर ही क्यों हैं? आप प्यार में सबको साला क्यों बोलते हैं, जीजा क्यों नहीं बोलतेदेवर क्यों नहीं बोलते? 
 बुद्धिजीवी - देखिये अब आप कुतर्क कर रहे हैं। और मुझसे ये सब बहस क्यों कर रहे हैं? मैं फेमिनिस्ट नहीं हूँ। 

सर फेमिनिस्ट की बात कहाँ से आई? 
बुद्धिजीवी - मैं दलित चिंतक भी नहीं हूँ। 

- बिलकुल नहीं हैं। पर, सर, आप हैं क्या
 बुद्धिजीवी  - मैं संसार का आठवाँ अजूबा हूँ। 

सर आप इतने हर्ट क्यों हो रहे हैं? सोचिए, एक अच्छे इंसान के नाते आप गाली नहीं देते हैं तो...
 बुद्धिजीवी - तो मेरी साँसे रुकने लगती हैं। दिल धड़कने से मना कर देता है। 
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Friday, January 25, 2019

कृष्णा सोबती : चान्नण मीनार जो लफंगों का चैन छीनती है


उस चान्नण मीनार कृष्णा सोबती के होने से हिंदी साहित्य के लफंगे, लम्पट, छिपे और खुले दक्षिणपंथी, फासिस्टों के चम्पू ख़ुद को कितना विचलित और अपमानित महसूस करते थे, किसी से छिपा हुआ नहीं है। इन नये-पुराने कवि-लेखक तत्वों की हालत चोरों-डाकुओं की तरह रौशनी को गालियां देकर ख़ुद को तसल्ली देने जैसी थी। इतने मजमों और तमाशों में रहने वाले वे घूम-फिर कर एक शब्द उछाला करते थे - 'ओवररेटेड'। यह उन्हें उनके वैचारिक पूर्वजों/आक़ाओं से हासिल हुआ था और अकेले में वे कभी आँखें फैलाकर, कभी नज़रें झुकाकर, कभी हथेली घुमाकर और कभी ताली बजाकर इस तरह कहा करते थे, जैसे वे अभी किसी महीन आलोचक की तरह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हों। उन्होंने एक-दो नाम कृष्णा सोबती बनाम अलां-फलां करने के लिए रट रखे थे जो न उन्हें कहीं ले जा पाते थे और न वे उन नामों को कहीं ले जा सकते थे।

इस गिरोह की समस्या ख़ुद अपनी कायरता और बेईमानी थी। बूढ़े मसीहा शीर्ष पुरुष उस फिल्मी सितारे अमिताभ की तरह फासिस्टों के चरणों में बिछकर और साम्प्रदायिक बातें कर लम्पटों को राह दिखा रहे थे तो कृष्णा सोबती अपनी वृद्धावस्था और अपनी ज़ईफ़ी के बावजूद फासिस्टों के ख़िलाफ़ मज़बूत स्टैंड लेती रही थीं। इस भयानक राजनीतिक परिदृश्य में उनके विवेक और उनके साहस ने आख़िरी वक़्त तक उनका साथ नहीं छोड़ा। उनका यह व्यक्तित्व, उनकी यह बेबाकी और उनकी यह राजनीति कायरों और दलालों के हृदय में शूल सी गड़ती थी। यह चुभन ऐसे बहुतेरों के मुँह से सार्वजनिक बकवासों से लेकर निजी बातचीत तक में हम सुनते ही रहे हैं और तसल्ली पाते रहे हैं कि एक वृद्ध और बीमार बुद्धिजीवी लेखिका साहित्य में फैले समाजशत्रुओं के लिए किस तरह कांटा बनी हुई हैं।

इसीलिए, कृष्णा सोबती के लिए प्यार और एहतराम के साथ मेरे मन से 'चान्नण मीनार' निकला। रौशनी की मीनार। लाइट हाउस।

Saturday, December 22, 2018

मेघालय: मुख्यधारा की राजनीति, खनन माफिया और उजड़ता जनजातीय जीवन

Photo: Tarun Bhartiya

इस साल फरवरी में मेघालय विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह की आशंका की खबरें छपी थीं कि चुनाव में खनन माफिया का पैसा इस्तेमाल हो रहा है। पुलिस ने उस दौरान काफी कैश बरामद भी किया था। मेघालय के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एसबी सिंह से भारतीय जनता पार्टी नाराज थी और चुनाव आयोग से उन्हें पद से हटाने की मांग भी कर रही थी। कोल माइनिंग पर नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के बैन को लेकर कोई रास्ता निकालने का आश्वासन भी भाजपा ने चुनाव के दौरान दिया था। भाजपा कहने को अकेली चुनाव लड़ रही थी पर सभी जानते थे कि नैशनल पीपल्स पार्टी के चुनाव के पीछे भाजपा है। इस अघोषित गठबंधन का ही नतीजा था कि भाजपा सिर्फ़ दो विधायकों के बूते एनपीपी के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही थी। (राज्यपाल की भूमिका तो महत्वपूर्ण थी ही।) बहरहाल, चुनाव अभियान के दौरान जो हालात थे, उनके मद्देनज़र यह साफ हो रहा था कि नई सरकार में खनन माफिया बेलगाम होने जा रहा है। 8 नवंबर को जानी-मानी एक्विस्ट एग्नेस खारशियेंग, उनकी साथी अमिता संगमा और उनके ड्राइवर पर कोल माफिया के हमले ने इस आशंका को सच साबित कर दिया। कोयला माफिया और सत्ता के नेक्सस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आरोपियों में सत्तारूढ़ एनपीपी का एक बड़ा नेता निदामन चुलेट शामिल है जिसकी गिरफ्तारी में टालमटोल जारी है। इस वारदात की सीबीआई की जांच कराने की विपक्ष की मांग को भी सरकार ठुकरा चुकी है।
Agnes Kharshiing
एग्नेस और अमिता पर जानलेवा हमला एक सनसनीखेज आपराधिक वारदात भर नहीं है। यह वारदात मेघालय के खनन माफिया खासकर कोयला माफिया, सत्ता खासकर मौजूदा सत्ता के चरित्र, ट्राइबल्स इलाकों की जीवन व रोजगार की मुश्किलों, तेजी से नष्ट किए जा रहे प्राकृतिक संसाधनों, जनता के सवालों को लेकर सत्ता के प्रतिरोध में खड़े होने वाले नागरिक संगठनों पर भविष्य के खतरों को लेकर गंभीरता से विचार करने की मांग करती है। सिविल सोसायटी वीमेन्स ऑर्गेनाइजेशन (सीएसडब्लूओ) की अध्यक्ष एग्नेस जिस तरह की शख़्सियत हैं, उन पर किसी बड़े संरक्षण के बिना हमला करने की सोचना आसान नहीं था। वे एक बेलौस जन-बुद्धिजीवी और जुझारू ईमानदार एक्टिविस्ट हैं। महिलाओं-बच्चों के दफ़्न कर दिए जाने वाले यौन शोषण के मसले हों, गरीबों, वंचित तबकों के रोजी-रोटी और आवास के सवाल हों, मानवाधिकारों के दमन का मामला हो, सत्ता केंद्रों में व्याप्त करप्शन के केस हों, यूरेनियम माइनिंग जैसा हाई प्रोफाइल मसला हो, एग्नेस हमेशा संघर्ष में आगे मिलेंगी। जुलूसों से लेकर उत्पीड़ितों के बचाव में गांवों तक दौड़ती हुईं, गांव-गांव में पीडीएस के तहत सामग्री का ईमाननदारी से वितरण सुनिश्चित कराती हुईं, मीटिगें करती हुईं, फाइलें लिए प्रशासनिक कार्यालयों से लेकर कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटती हुईं, आरटीआई लगाती हुईं...। जाहिर है कि मेघालय के ताकतवर कोल माफिया की निरंकुश कारगुजारियों के प्रतिरोध में भी वे एक खरी आवाज़ हैं। जब उन पर हमला किया गया तो वे ईस्ट जयंतिया हिल्स जिले के तुबेर सोशरे में कोल माइनिंग साइट पर ही सबूत जुटाने के लिए विडियो बना रही थीं। एक दिन पहले ही उनकी शिकायत पर शिलॉन्ग में कोयले से लदे ट्रक सीज़ किए गए थे। बताया जाता है कि उन्हें चुप कराने के लिए कोई शख़्स उनके घर पैसे का ऑफर लेकर भी पहुंचा था लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे खींचने से इंकार कर दिया था। वे कोयला खनन पर एनजीट के बैन के बाद भी अवैध खनन जारी होने के अनेक मामले पुलिस की निगाह में ला चुकी हैं और कोल माफिया की नज़रों में खटकती रही हैं। आखिर, उन्हें रास्ते से हटा देने के लिए बर्बर हमला किया गया। एग्नेस और अमिता को मरा जानकर जंगल में फेंक दिया गया था। होश में आने पर अमिता किसी तरह घिसटते हुए सड़क पर पहुंचकर मदद हासिल करने में कामयाब रहीं। बाद में एग्नेस को जंगल से ढूंढकर बेहोशी की हालत में अस्पताल भेजा गया।
Angela and Agnes 
मेघालय में लेफ्ट की मौजूदगी सिर्फ़ कागजों पर है। पॉपुलर पॉलिटिक्स के विभिन्न धड़े आम जनता से जुड़े जेनुइन मुद्दों पर बेरुखी रखते हैं या जनद्रोही स्टेंड लेते हैं। इसके बावजूद वहां एक प्रग्रेसिव नज़र वाले जन प्रतिरोध की जगह `थमा उ रांगली-जुकी` (तुर) संगठन के रूप में लगातार असरदार ढंग से विस्तार लेती रही है। दो साल शिलॉन्ग में रहते हुए तुर की उपस्थिति सड़कों पर जलसों-जुलूसों की शक्ल में और कई बड़े बदलावों में बार-बार महसूस हुई। प्रभुत्वशाली तबकों की आम सहमति के आधार पर सड़कों-फुटपाथों से खदेड़ दिए गए हॉकर्स-वेंडर्स के लिए टकरातीं तुर की नेतृत्व पंक्ति की एंजला रांगेड की छवियां मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। अपने ठीयों पर वापसी का यक़ीन शायद हॉकर्स-वेंडर्स को भी न रहा हो पर महिलाओं की बहुसंख्या वाले तुर के उस आंदोलन ने यह संभव कर दिखाया। आरएसएस के स्वयंसेवक वी षडमुखनाथन की राजभवन में यौन अराजकता के विरोध में यही एक्टिविस्ट सड़कों पर न उतरतीं तो गवर्नर पद से उसकी छुट्टी न हुई होती। ऐसे बहुत से कामयाब कारनामों में तुर का एक अविश्वसनीय कारनामा सरकारी और गैर सरकारी विभागों/दफ्तरों में 14 यूनियनें खड़ी कर दिखाना रहा। देशभर में यूनियनों के खत्म होने या अप्रासंगिक होने के दौर पर इन यूनियनों का अस्तित्व में आना और तमाम मसलों पर सक्रिय रहना अलग से लिखे जाने की मांग करता है। फिलहाल कहना यह कि एग्नेस खारशियेंग ऐसे हर संघर्ष में साथ रही हैं। मेघालय की निवर्तमान कांग्रेस सरकार के समय के शिक्षा विभाग के भर्ती घोटाले को सामने लाने में एग्नेस और एंजला की ही मुख्य भूमिका रही है। इस घोटाले में पिछली सरकार के मंत्रियों की गर्दनें फंसी हुई है। लेकिन, पूर्ववर्ती सरकारों में इन एक्टिविस्टों के लिए जेल और मुकदमे तो थे, मार डालने की इस तरह की कोशिशें न थीं।
8 नवंबर को एग्नेस पर हमले की ब्रेकिंग न्यूज देखते ही तुरंत यही बात मेरे मन में आई कि क्या मेघालय में प्रतिरोध की ऐसी आवाज़ों को हिंसक दमन के साथ ख़ामोश कराने की शुरुआत हो चुकी है। क्या यह मेघालय में एक नयी राजनीतिक संस्कृति का आगाज़ है? इस वारदात में सत्तारूढ़ पार्टी के नेता का नाम आने से ऐसी आशंकाओं को बल मिलना लाज़िमी था। विपक्ष के तमाम नेताओं ने सरकार को निशाने पर लिया, कुछ गिरफ्तारियां हुईं पर सीबीआई जांच की मांग को सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया। तुर की नेता एंजला रांगेड ने कहा कि एग्नेस के संघर्ष और प्रतिरोध की संस्कृति को धीमा नहीं पड़ने दिया जाएगा। जाहिर है कि प्रगतिशील नागरिक संगठनों के लिए मेघालय में एक नया रणक्षेत्र खुलने जा रहा है। एक हद तक माँ को महत्व देने वाले खासी समाज की विरासत में मर्दवादी नजरिये से बदलाव जैसे मसलों में सरकार की दिलचस्पी से भी लगता है कि नागरिकों की बेहतरी के सवालों को दक्षिणपंथी-पितृसत्तात्मक तौर-तरीकों से पीछे धकेलने की कोशिशें होंगी और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए दमन तेज होगा।
Photo: Tarun Bhartiya
मेघालय में कोयले के अवैध और अनियंत्रित खनन का मसला बेहद जटिल है। अप्रैल 2014 में एनजीटी ने इस खनन पर रोक लगा दी थी तो कोयला खदानों के मालिकों, उनके दलालों और सत्ताकेंद्रों से जुड़े ताकतवर लोगों के नेक्सस ने इसे ट्राइबल्स के मूल अधिकारों और हितों पर हमले के रूप में प्रचारित किया था। बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए थे। खासकर जयंतिया हिल्स में जन-असंतोष जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिशें हुई थीं। जयंतिया हिल्स अवैध कोयला खनन की मुख्य केंद्र हैं। मेघालय घूमने जाने वाले अधिकतर लोग खासी हिल्स में आने वाली राजधानी शिलॉन्ग से चेरापूंजी के आसपास के इलाके घूमकर आते हैं।एक लोकप्रिय टूरिस्ट स्पॉट डाउकी है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर जयंतिया हिल्स से गिरने वाले झरने मैदान में नदी की शक़्ल लेकर बांग्लादेश चले जाते हैं। जाड़ों के मौसम में झरने शांत हो जाते हैं तो नदी का पानी थिर हो जाता है। जरा सी ट्रिक फोटोग्राफी इस साफ-शफ्फाक पानी में नावों को हवा में दिखाने लगती है। इस सुदंर जगह को प्रदूषित कर आने वाले कथित पर्यटकों को गुमान भी न होगा कि कुछ उनकी वजह से और खासतौर से कोल माइनिंग की वजह से इस नदी की दुर्लभ प्रजाति की मछलियां संकट में पड़ चुकी हैं।
Jaiantia Hills
अवैध-अनियंत्रित कोल माइनिंग के कुख्यात इलाकों की झलक शिलॉन्ग से सिलचर (असम का कछार जिला) जाने वाले हाइवे पर यात्रा करने भर से मिल सकती है। ये पॉपुलर टूरिस्ट इलाके नहीं हैं। इसी सप्ताह मुझे सिलचर यूनिवर्सिटी के प्रफेसर और हिंदी कवि कृष्णमोहन झा की बदौलत उनके साथ इस हाइवे पर लौट-फेर करने का मौका मिला। खासी हिल्स से निकलकर जयंतिया हिल्स में प्रवेश के कुछ देर बाद ही इन खूबसूरत रहे पहाड़ी इलाकों पर कोल माइनिंग के दुष्प्रभाव दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। पहाड़ियां की पहाड़ियां खत्म हो चुकी हैं और एनजीटी के बैन के बावजूद कोयला ढोते ट्रक सड़कों पर दौड़ते मिलते हैं। जंगल और उसकी खासियतें कोयले के लालची सौदागरों की भेंट चढ़ चुकी हैं। असम के कछार जिले की तरफ से न्यू कछार हिल्से (एनकेपी) के सिलसिले के साथ मेघालय की जयंतिया हिल्स में प्रवेश करें तो ऊंचे परबतों सी वनाच्छादित पहाड़ियां मन मोह लेती हैं। छोटी-छोटी नदियां और पानी के सोते भी नज़र आते चलते हैं। गो के उनका संकट भी नज़र आता है। लेकिन हिल्स की यह खूबसूरती ज्यादा साथ नहीं देती है। कोल माइनिंग से पैदा हुई बरबादी चिंता में डालती है कि ये जंगल और ये पहाड़ियां इंसान के सामने कितने दिन टिक सकती हैं? कि किस्सों में `अनटच नेचर` का घर नोर्थ ईस्ट भी उत्तराखंड बनने की राह पर है।
इस अनियंत्रित, अनियोजित और अवैध कोल माइनिंग पर बैन को ट्राइबल्स के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले ट्राइबल्स की ज़िंदगी पर खतरे का जिक्र नहीं करते हैं। बेतहाशा हुई कोल माइनिंग ने जलस्रोतों और छोटी-छोटी नदियों को या तो खत्म कर दिया है या बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है। खनन को ट्राइबल्स का अधिकार बताने वाले धनपशु इसकी वजह से पेड़-पौधों, जलीय जीवों और ट्राइबल्स पर भयंकर संकट के स्पष्ट प्रमाणों को नज़रअंदाज करते हैं। मेघालय-असम की सीमा की न्यू कछार हिल्स (एनकेएच) की दिमासा ट्राइब्स के लोगों ने जब देखा कि उनकी कोपिली नदी का पानी पीने लायक नहीं रहा है और उसमें मछलियां भी दम तोड़ रही हैं तो उन्हें पता चला कि इसकी वजह जयंतियां हिल्स में हो रहा अंधाधुंध कोयला खनन है। इस अवैध खनन पर एनजीटी की रोक का श्रेय असम की ऑल दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमा हासाऊ डिस्ट्रिक्ट कमेटी की ओर से दायर की गईं पिटीशन्स को भी है।
कोयला खनन को ट्राइबल्स के अधिकारों का हनन बताने वाली कहानी का सबसे बड़ा छल यह है कि आम ट्राइबल्स इन कोयला खदानों के मालिकान न होकर निरीह मज़दूर हैं। उत्तर भारत और बांग्लादेश के निरीह मज़दूरों के साथ अपनी जान-जोखिम में डालकर, जरूरी सावधानियां बरते बिना मामूली पैसों के लिए काम करने वाले मज़दूर। खनन माफिया और उसके संरक्षक सत्ता केंद्र न तो इस अवैध खनन के दौरान हुए भयानक हादसों पर बात करना चाहते हैं, न मजदूरों के वास्तवित हितों पर। कॉरपोरेट को प्राकृतिक संसाधन लुटाने के लिए तैयार रहने वाली ट्राइबल लीडरशिप गरीब ट्राइबल जनता की गरिमा और उनके लिए रोजगार के दूसरे साधनों को मुहैया कराने में कोई रुचि नहीं लेती है। बुरी तरह हाशिये पर धकेली जा रही जनता ऐसे में इस अवैध खनन में खटने, छोटी-मोटी चा-चावल-समोसे की दुकान चला लेने को ही खुशकिस्मती मान लेती है और अवैध खनन पर बैन को रोजगार छिन जाने की तरह देखती है।
हिल्स पर मालिकाना हक़ का मामला भी काफी जटिल है। शिलॉन्ग में रहने वाले बेहतरीन फिल्मकार, कवि, विचारक और सोशल एक्टिविस्ट तरुण भारतीय अक्सर बताते हैं कि ट्राइबल्स इलाकों में भूमि का मालिकाना हक़ पूरे कबीले का रहता आया है। निजी संपत्ति की अवधारणा आने के बाद कई तरह की जो मुश्किलें आई हैं, उसे कोयला खनन मामले में भी देख सकते हैं। स्थानीय चतुर लोगों और बाहरी लोगों ने सांठगांठ के जरिये कोल हिल्स हासिल कर ली हैं। मामूली रकम देकर बेनामी मालिकाना हक़ भी पा लिए गए हैं। एक छोटे से हिस्से को संपन्न बनाने वाला यह खेल बाकी लोगों को और ज्यादा बेबस बनाकर ही नहीं छोड़ देता बल्कि इस सामुदायिक जनजीवन वाले समाज में तरह-तरह से लेयर्स पैदा करता है। उनके खेती और मछली पालन के परंपरागत पेशों को भी नष्ट करता है।
इस अन्याय पर पलने वाली राजनीतिक ताकतों की इस घिनौने खेल को रोकने में कोई रुचि नहीं है। यह समस्या लाइम स्टोन आदि के खनन से भी जुड़ी है और खासी व गारो हिल्स भी इससे अछूते नहीं है। ट्राइबल्स के इलीट और संपन्न हो चुके छोटे से तबके को भी प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट और आम ट्राइबल्स के संकट से बेचैनी नहीं पैदा होती है। उसे दूसरे राज्यों के कथित पर्यटकों की तरह बड़ी गाड़ियों के लिए हिल्स काटकर चौड़ी सड़कें बनते चले जाने से खुशी मिलती है और लूट में थोड़ी हिस्सेदारी से।
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November 2018 के आख़िरी हफ़्ते में लिखा गया मेरा यह लेख समयांतर के December 2018 अंक में छप चुका है।-धीरेश



Thursday, November 15, 2018

टीएम कृष्णाः एक रचनाकार की तड़प और उसका संघर्ष - शिवप्रसाद जोशी



 मैं सोचता हूं कि मुझे संगीत पसंद है क्योंकि इसका नैतिकता से बहुत थोड़ा सा लेनादेना है. बाकी हर चीज़ नैतिक या अनैतिक है और मैं ऐसी चीज़ की तलाश में हूं जो नैतिक न हो. नैतिकता ने हमेशा मुझे तड़पाया ही है.
(जर्मन लेखक हरमन हेस्से के उपन्यास डेमिआन का प्रमुख किरदार)

टीएम कृष्णा बिना गाए कैसे रहेंगे. गाना उनके लिए धर्म से ज्यादा राजनीति है. वो उनकी पॉलिटिक्ल कार्रवाई है. सो ये तो तय है कि 17 तारीख वे गाएंगे. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने हाथ खींच लिए और स्पिक मैके को अकेला छोड़ दिया तो क्या हुआ- मनीष सिसोदिया और दिल्ली सरकार ने कृष्णा को बुला लिया. तो वे तो गाएंगे ही. वेबसाइट के मुताबिक यह प्राधिकरण भारत सरकार का मिनी रत्न है- श्रेणी एक.

सवाल यह है कि आख़िर यह कितने रोज चलेगा. संगीत करने नहीं देंगे, लिखने नहीं देंगे, पेटिंग नहीं बनाने देंगे, भाषण नहीं होने देंगे, खाने पहनने या सोने नहीं देंगे, बाहर निकलने नहीं देंगे, नमाज नहीं पढ़ने देंगे, दाढ़ी नहीं रखने देंगे, सिर उठाकर नहीं चलने देंगे, सिर झुकाकर नहीं चलने देंगे, गरज ये कि वो कुछ भी नहीं करने देंगे जो हम आप करना चाहते हैं- अपनी मर्जी से. मर्जी पर मालिकाना बदल रहा है. वे मार रहे हैं, गिरफ्तार कर रहे हैं, धमका रहे हैं, कपड़े फाड़ रहे हैं, आग लगा रहे हैं, पीछा कर रहे हैं, घेर रहे हैं, न बोलने न कहने दे रहे हैं. वे कह रहे हैं कि गाओ पर गाते हुए बोलो मत, वे कह रहे हैं लिखो लेकिन लिखते हुए सोचो मत, वे कह रहे हैं तस्वीरें खींचों लेकिन उनमें अर्थ न पकड़ो. वे कह रहे हैं पेंटिंगे बनाओ, नाटक करो, सिनेमा करो, फेसबुक या ट्वीट करो लेकिन ये अपने लिए नहीं खिदमत में करो. वे ये भी कहते हैं: अहिंसा?! यह क्या है, क्या होता है इससे?! इस तरह शायद ऐसा पहली बार हुआ जान पड़ता है कि देश की एक बड़ी आबादी संभावित या घोषित देशद्रोह के दायरे में है.

टीएम कृष्णा देशद्रोही हैं, राष्ट्रविरोधी बातें करते हैं- सोशल मीडिया कीटाणु कहते हैं. बहुत लंबे समय बाद भारतीय संगीत परंपरा में एक सचेत और साहसी ज्ञाता-गायक का उदय हुआ है. अपनी धुन के गायक तो बहुत हुए हैं, और अपनी रागकारी के उस्ताद भी- लेकिन 21वीं सदी का एक शास्त्रीय गायक आधुनिकता का ऐसा विलक्षण पैरोकार और ऐसी ज़िद्दी प्रकांड है कि किसी की सुनता नहीं. उसने कर्नाटक संगीत के मठों को हिला दिया, सवर्णवादी और ब्राह्मणवादी शास्त्रीय संरचनाओं में खलबली मचा दी. वो मंचो की श्वेतश्याम आभाओं और दिव्यताओं से खिन्न होकर उठा और अपने संगीत और अपने साज को लेकर साधारण जनों की बस्तियों में जाकर गाने लगा. एक आधुनिक फकीर. टीएम कृष्णा और मछुआरा समुदाय की मिलीजुली कोशिशों से संगीत का सालाना उर्स भारतीय शास्त्रीय और कर्नाटक संगीत की उल्लेखनीय घटना बनती है. उरुर ओल्कोट कुप्पम चेन्नई के पास मछुआरों का एक गांव है. जब कृष्णा को चंद साल पहले मैगसायसाय अवार्ड मिला था तो अतिरेकी मीडिया में आयाः संगीत को स्लम यानी झुग्गी झौपड़ियों तक ले जाने वाले को पुरस्कार. मछुआरा समुदाय ने ऐसी रिपोर्टिंग पर कड़ा एतराज जताया था. उनका कहना था भाई स्लम क्या होता है और क्या देखा है तुमने हमारा स्लम? खैर चालबाज मीडिया यही करेगा. उसे गोदी मीडिया भी नहीं कहना चाहिए. गोद एक पवित्र और संवेदनशील शब्द है, वह मातृत्व से जुड़ा एक कोमल भाव है. हमें विशेषण या क्रिया विशेषण बनाते हुए या नये वाक्यांश बनाने के मोह में ऐसे भटकावों से बचना चाहिए. लेकिन गोदी मीडिया कहने वाले भी तो कितने ठहरे. खैर..कृष्णा ने कह दिया कि स्टेज कहीं पर भी हो वे तो गाएंगें और ऐसी धमकियों से डरेंगे नहीं.

मान्य तौर पर उनके तेवर देखकर कोई कहेगा अरे कृष्णा तो विद्रोही है. लेकिन ये विद्रोह नहीं है पाठको, यही तो स्वाभाविकता है. एक कलाकार से अपेक्षित यही तो है- यह तो उसकी सामान्य चर्या है कि वो अपने मन का और अपने ढंग का गाए. हमारा समय इतना एकजैसा और इतना झुका हुआ और इतना डरा हुआ और इतना मेजोरिटेरियन बना दिया गया है कि हमें लगता है कृष्णा विद्रोही हुए, जैसे कि स्लम जाकर विद्रोही हुए. वे विद्रोही उतने नहीं जितने कि वैचारिक आलसी और वैचारिक अकर्मण्यता के शिकार हम हैं- हम में से ज्यादातर लोग. हम सुन्न हैं. और कृष्णा का स्टैंड हमें सन्न करता है. जर्मन उपन्यासकार हरमन हेस्से ने अपने विख्यात नॉवेल डेमिआन के बारे में लिखा थाः युवाओं के लिए ये एक कठिन समय है. लोगों की निजता को यथासंभव प्रतिबंधित करते हुए उन्हें एक जैसा बनाने की एक व्यापक आकांक्षा हर जगह दिखती है. मनुष्य आत्मा स्वाभाविक तौर पर इस धक्के के खिलाफ विद्रोह कर उठती है, डेमिआन की यात्रा की बुनियाद यही है. अरुंधति रॉय ने बांग्लादेशी फोटोग्राफर शहीदुल आलम की गिरफ्तारी के बाद उनके नाम एक खुली चिट्ठी रवाना की है. पेन नाम की अंतरराष्ट्रीय लेखन बिरादरी की पहल पर ये चिट्ठी अभियान पूरी दुनिया में चला है. और भी कई बंदी और मृत लेखकों को भी याद किया जा रहा है और एकजुटता की एक वैश्विक मिसाल देखने को मिलती है. अरुंधति ने चिट्ठी में बताया कि कैसे ये बुद्धिजीवियों पर नहीं बल्कि बुद्धिमानी पर- प्रज्ञा और सहज बुद्धि पर हमला हो रहा है.

और क्या बांग्लादेश क्या पाकिस्तान क्या भारत और क्या जापान क्या चीन क्या यूरोप क्या अमेरिका.. पूरी दुनिया की छत पर बूटों की धम्मधम्म सुनाई देती है. धूल उड़ाते हुए चुनाव हैं और इनके ठीक पीछे रथों का रेला है. उनके पीछे दस्ते हैं और सबसे पीछे घिसटती हुई निरीहताएं हैं. लेकिन धूल का ये गुबार छंटे और बवंडर जरा देर थमे तो दिखे कि दूर किनारों पर बहुत से लोग खड़े हैं. कोई लिख रहा है, कोई बोल रहा है, कोई चित्र बना रहा है, कोई पढ़ता और सुनाता है, कोई भाषण दे रहा है, कोई नृत्य कर रहा है कोई नाटक, कोई खाना पका रहा है कोई खा रहा है कोई खेल रहा है कोई बच्चों के बीच है कोई गा रहा है- वहीं कहीं टीएम कृष्णा और उन जैसे रचनाकार भी हैं. यानी बूटों और संगीनों की धम्म धम्म के नीचे प्रतिरोध की आवाज़ें 20वीं हो या 21वीं- सदी दर सदी कायम है.

***
वरिष्ठ पत्रकार और प्रखर विचारक शिवप्रसाद जोशी विलक्षण गद्य लिखते हैं, उनके पास शानदार कविताएं हैं और अपने लिखे को छुपाए रखने की नैतिक जगह है। 

Thursday, October 25, 2018

विष्णु खरे—स्मरण : असद ज़ैदी



पंद्रह नवम्बर २०१७ की शाम दिमाग़ में नक़्श है। लोदी रोड श्मशान में कुँवर नारायण के अंतिम संस्कार के वक़्त अचानक दो लोगों पर नज़र पड़ी−−दीवार के सहारे रखी एक बेंच पर विष्णु खरे  अौर केदारनाथ सिंह बैठे थे, नीम अँधेरे में। दोनों बहुत दुर्बल, पस्त अौर लगभग प्राणहीन लग रहे थे, जैसे वहाँ हों ही नहीं, अौर कहते हों कि हमें भी मरा ही जानो। ख़ामोश अभिवादन किया, उन्होंने बड़ी बेज़ारी से सर हिलाया जैसे सरहद पार कर चुके हों। मुझे लगा अब पता नहीं इन्हें दुबारा देख पाऊँगा या नहीं। साल भी न गुज़रा अौर अब वे इस दुनिया में नहीं है। 

लेकिन यह विष्णु खरे से अंतिम ‘संवाद’ न था। इस जून के महीने में यह ख़बर सुनकर कि वह अाम अादमी पार्टी के तहत अाने वाली दिल्ली हिन्दी अकादमी के उप सभापति मनोनीत किये गए हैं, अौर इस तरह वह अपने अज़ीज़ शहर में रहने वापस अा पाएंगे, मैंने उन्हें यह संक्षिप्त ई-मेल संदेश भेजा (२३ जून)−−

“क़िबला, कुछ ख़बर सुनी है। उम्मीद है सच ही निकलेगी। लिहाज़ा बधाई... अौर ख़ुदा ख़ैर करे!” 

जल्दी ही उनका मुख़्तसर जवाब अाया−−

“इसमें ‘ख़ुदा ख़ैर करे’ ही operative part [काम की बात] है।” 

कम से कम पिछले चालीस साल से हमारे दरमियान संवाद की यही शैली बरक़रार रही। उनसे ऐसी वाक़फ़ियत मेरी ख़ुशक़िस्मती अौर दोस्ती की यह हालत मेरा अभिमान रही। यह ऐसा रिश्ता था जिसमें हम एक दूसरे से बोले कम, नाख़ुश ज़्यादा रहे।

नौ सितम्बर को उन्होँने अपने नये कार्यकाल का पहला काव्यपाठ कराया, जिसमें मैं भी अामंत्रित था। क़रीब दो-ढाई घंटे का साथ रहा। कुछ ख़ामोश लेकिन पुरसुकून नज़र अाते थे। कार्यक्रम के बाद वे जल्द ही अपने अावास के लिए निकल पड़े। दो दिन बाद पता चला ब्रेन हैमरेज के बाद वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। शरीर के एक हिस्से को लकवा मार गया था। हफ़्ते भर की बेहोशी के बाद वह इस दुनिया से चले गए। बहुत सारी बातें अधूरी छूट गईं।

हम जब कविता या कहानी लिखते हैं तो ऐसे कुछ ज़रूरी चेहरे दिमाग़ में रहते हैं जिनके बारे में या तो हमें यक़ीन होता है कि वे हमारे लिखे को पढ़ेंगे या कुछ चिंता होती है कि वे अगर पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे। कहीं किसी जगह एक अादमी नज़र रखे हुए है। विष्णु खरे न सिर्फ़ मेरी पीढ़ी के बहुत से कवि-लेखकों के लिए, बल्कि हिन्दी मे सक्रिय बहुत सारे दूसरे लोगों के लिए भी,  ऐसा ही एक ज़रूरी चेहरा थे। वह कभी हमारे ख़यालों से दूर न रहे। उनका जाना एक , ज़रूरी अादमी का जाना अौर एक दुखद ख़ालीपन का अाना है। मेरी पीढ़ी ने एक अाधुनिक दिमाग़, तेज़ नज़र काव्य-पारखी, अालोचक, दोस्त, स्थायी रक़ीब अौर नई पीढ़ी ने अपना एक ग़ुस्सेवर लेकिन ममतालु सरपरस्त खो दिया है। इस रूप में वह हमारे सबसे क़ीमती समकालीन थे। 

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर 
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच 
(मीर)

विष्णु खरे एक अौर घर ख़ाली कर गए हैं, वह घर जो सिर्फ़ उन्हीं के लिए बना था। उसमें कोई अौर नहीं रह सकेगा। कभी उस घर में मीर मेहमान होते थे, कभी मुक्तिबोध, कभी श्रीकांत अौर कभी रघुवीर सहाय। उस घर को बाहर से, उड़ती उड़ती नज़र से ही देखा गया, उस में दाख़िल होना सबके बूते की बात न थी। कविता के उस घर में अावाज़ें हैं, तस्वीरें हैं, बेचैन रूहें भटकती हैं, वहाँ विषाद है, अार्त्तनाद है, बार बार अपने ही से सामना है, जहाँ कल भी अाज है, अौर विस्मृति है ही नहीं। इस घर में बहुत जंजाल है, क्लेश है, पर कुछ भी अोझल अौर अमूर्त्त नहीं है। कुछ कमरे बंद पड़े हैं, जिन्हें खोलने से वह ख़ुद भी डरते थे, वो अब कभी नहीं खुलेंगे। वह इस मकान के मकीन होकर कम, पहरेदार होकर ज़्यादा रहे। इस घर का नक़्शा उनके जीवनीपरक ब्यौरों से कम उनकी कविताअों से ही झलकता रहेगा। 

वह अत्यंत भावुक, संवेदनशील अौर असुरक्षित व्यक्ति थे। अपने इस बुनियादी किरदार को, अपनी वेध्यता को, ढँकने के लिए उन्होंने एक रूखा, अाक्रामक अौर नाटकीय अंदाज़ अपनाया था। उनका यही सार्वजनिक रूप बन गया अौर इसी तर्ज़ के लिए वह जाने गए। उनके अंतरंग मित्र उनके इस स्वाभाव को समझते थे, लिहाज़ा उनकी बहुत सी बातों को नज़रअंदाज़ करते थे। सभी मित्र जहाँ तक बन पड़ता उनकी हिमायत में रहते थे, बेजा अाक्रमण से उनकी हिफ़ाज़त करते थे। वैसे भी विष्णु जी ने मुहब्बत अौर अदावत में कभी ज़्यादा फ़ासला न रखा। यह उन लोगों की कमनज़री है जिन्होंने उनकी ज़्यादतियाँ तो देखीं पर जो उनकी बेरुख़ी अौर ग़ुर्राहट में प्यार अौर हमदर्दी की झलक न देख सके। 

विष्णु खरे ने साहित्य जगत में एक तेज़-तर्रार विध्वंसक अालोचक की तरह प्रवेश किया अौर तत्काल ही अपनी प्रतिभा के लिए पहचाने गए। उनकी ताज़गी, खुले दिमाग़, ज़हानत अौर अध्यवसाय से लोग प्रभावित होते थे। वह अपेक्षाकृत युवा थे अौर उस दौर में युवा होना ख़ुशक़िस्मती की निशानी थी। ऐसा लगता था कि राजनीति, समाज, संस्कृति निर्णायक मोड़ पर है, जो बदलाव अाया चाहता है उसका कार्यभार १९४० के बाद जन्मी पीढ़ी पर है, उसमें अात्मविश्वास है, जोखिम उठाने का जज़्बा है, समस्या वही हल करेगी, उसके पास सारी चाबियाँ मौजूद हैं। १९६४ से १९७५ के बीच का काल भारतीय राजनीति अौर कलाअों में एक प्रकार का मुक्ति प्रसंग था अौर समाज की अंतरात्मा पर कई तरह की दावेदारियाँ सामने अा रही थीं। पहली बार संस्कृति में अवाँगार्द प्रवृत्तियाँ प्रधान प्रवृत्तियों की तरह स्थापित होने लगी थीं।  वाम में नव-स्फूर्ति अौर दूरगामी विघटन की प्रक्रियाएँ एक साथ चल रही थीं, गो यह बात उस वक़्त  इतनी स्पष्ट न थी। कालांतर में बहुत कुछ एक भोर का सपना ही साबित हुअा। वह दौर जिसे परिवर्तनकारी दौर की तरह देखा जा रहा था, एक लम्बे राष्ट्रीय दुखांत से पहले का अंतराल था। प्रतिभाशाली लोगों की यह पहली खेप नहीं थी जिसकी सामाजिक हस्तक्षेपकारी संभावनाएँ मूर्त्तिमान नहीं हो सकीं अौर उनकी अपनी क्षमता अौर ताक़त संस्थानों अौर प्रतिष्ठानों के भीतर ही जज़्ब होकर या अपना स्थान वहाँ बनाए रखने में ही ख़र्च होकर रह गई। विष्णु खरे इसका अपवाद न थे। 

विष्णु खरे हरदम संस्कृति अौर साहित्य की दुनिया में रमे रहकर खप जाना चाहते थे। उनके दौर के हालात साज़गार नहीं थे, अौर न सिर्फ़ उनका स्वभाव बल्कि उनकी वैचारिक प्रेरणाएँ भी रास्ते में अाती थीं। लेकिन सांस्कृतिक परिदृश्य में केन्द्रीय अौर निर्णायक भूमिका निभाने की उनकी तीव्र इच्छा उन्हें एक ग़लत जगह ले गई। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हस्तिनापुर कॉलेज (अब मोतीलाल नेहरू कॉलेज) में अंग्रेज़ी अध्यापक की स्थायी नौकरी छोड़कर साहित्य अकादमी के उप-सचिव पद के लिए अावेदन देने की ठान ली। भारतभूषण अग्रवाल ने भी उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया। एक रोज़ उन्होंने अपनी जीवनसाथी कुमुद को स्कूटर पर बिठाया अौर दोनों ख़ुशी ख़ुशी भारतभूषण जी के पास गए अौर उन्हीं को अावेदन देकर अा गए। वह एक संभावनामय, सार्थक अौर उज्ज्वल भविष्य की अोर नहीं, बल्कि अँधेरे में छलाँग लगा रहे थे। १९७६ में वह साहित्य अकादमी के उप-सचिव तैनात हुए। उस समय उनकी उम्र ३६ साल थी। मैं बाईस तेईस साल का था अौर उद्दंडता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था। उसी साल या शायद उससे अगले साल एक रोज़ मैंने उनसे पूछा, “अापको संस्कृति प्रशासक बनने का इतना शौक़ कैसे पैदा हुअा? अध्यापकी में जो अाज़ादी अौर गरिमा है उसे लात मारकर कहाँ ये साहित्य अकादेमी में अा फँसे? अापको बहुत समझौते करने पड़ेंगे।” विष्णु खरे ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखा अौर एक क्रुद्ध साँड की तरह डकराए—“हुँह!” ज़ाहिर है उन्हें कोई मलाल न था। उन्होंने कुछ इस इस तरह की बात कही कि तुम्हें क्या लगता है मैं यहाँ क्या करने बैठा हूँ? मैंने कहा, खरे जी, यह जगह अौसतपन (मीडियॉक्रिटी) का गढ़ है। अाप नष्ट हो जाएँगे। बोले, तुम कह रहे हो मैं यहाँ अौसत काम करूँगा। मैंने कहा, देख लीजिएगा। उन्होंने कुछ स्नेह अौर कुछ नाराज़ी से कहा, “तुम्हें तुम्हारी ये काली ज़बान बहुत कष्ट देगी। तुम जे एन यू में हो। वहाँ वो नामवर भी है... उससे बचके रहना।”

मुझे अाज तक इस बातचीत पर अफ़सोस अौर ग्लानि है। अपनी धृष्टता पर, अौर इस बात पर कि मेरी ‘काली ज़बान’ से अनायास जो बात निकली थी वह एक तरह की भविष्यवाणी साबित हुई। साहित्य अकादेमी के कार्यक्रम प्रभारी वाले अपने कार्यकाल में उनके सम्पर्क अखिल भारतीय साहित्यिक अभिजन या श्रेष्ठिवर्ग अौर देशी विदेशी साहित्य संस्थानों अौर मंडलियों से अौर दूतावासों से बढ़े, अनुवाद का काम तलाशते बेरोज़गारों को छिटपुट काम दिला सके, छोटे प्रकाशकों अौर छापेख़ानों के मालिक उनके चक्कर लगाते थे, इस रुसूख़ की वजह से नए कवियों के कविता संग्रह छपाने में मददगार हुए, कविता-कहानी लिखने वाले प्रशासनिक सेवाअों में सक्रिय  नौकरशाहों से बराबरी से बात करने की सुविधा प्राप्त हुई। सबसे बड़ी बात यह हुई कि साहित्य अकादेमी की अाला अफ़सरी की वजह से हिन्दी के अाचार्यगण अौर पिछड़ी समझ के लेखक कवि अब उनकी कविता को कुछ मान्यता देने लगे। लेकिन कुल मिलाकर उनके जीवन के इतने सारे वर्ष वहाँ बरबाद ही हुए। एक बुद्धिजीवी, चिंतक अौर लेखक के रूप में उनका विकास अवरुद्ध हुअा। अौर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों का अौर हिन्दी की व्यावसायिक दुनिया से संबंधों का यह जाल मायाजाल ही साबित हुअा। ये सम्पर्क अौर लगातार विस्तारमान दिखती दुनिया अंततः कामकाजी दुनिया थी, वे संबंध भी कामकाजी अौर रस्मी ही थे। वह उनकी कॉन्स्टीटुएन्सी थी ही नहीं। जब तक महफ़िल गर्म थी, उन्हें अच्छा लगता रहा। अकादेमी से जब हटे तो यह दुनिया सिकुड़ गई। संस्कृति के महाबली बनने का उनका सपना कब का ख़त्म हो चुका था। मातहती उन्हें अाती न थी, बिना मातहती के अाज की दुनिया में महाबली कोई बन नहीं सकता।

उनकी दूसरी भूल थी यह समझना कि वह हिन्दी पत्रकारिता में कुछ परिवर्तन ला पाएँगे। टाइम्स ग्रुप में वह ऐसे समय नौकरी करने लगे जब अख़बार की दुनिया में समीर जैन-विनीत जैन का अभ्युदय हो चुका था, अौर पत्रकारिता एक बुद्धिविरोधी, मुजरिमाना दौर में प्रवेश कर चुकी थी। एक पेशे के रूप में भी पत्रकारिता का महत्त्व गिर रहा था, संपादकी का दरजा घट रहा था अौर काम की शर्तें पत्रकारों के विरुद्ध बदली जा रही थीं। कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लागू किया जा रहा था। ऐसे समय में मैनेजमेंट के साथ होना इस प्रक्रिया की पैरोकारी करना अौर इसमें मालिकान का हाथ बटाना ही था, जो काम (मुझे खेद है कि) सुरेन्द्रप्रताप सिंह जैसे संपादकों ने जमकर किया। इस दौर में बहुत से उपयोगी लफंगे पत्रकारिता में घुसे, अौर अख़बारों में उनका महत्त्व बढ़ता गया। ऐसे ही दौर में दिल्ली, लखनऊ, जयपुर में सम्पादकी करने के बाद विष्णु खरे पत्रकारिता से बाहर अाए। ज़िंदगी के इतने साल फिर से बरबाद करके। वह ख़ुद कहते थै ‘मॉय ट्रिस्ट विद जर्नलिज़्म वाज़ अ फ़िअास्को।’ अौर सही ही कहते थे।

इस दौर के बाद का उनका जीवन एक फ़्री-लांसर का जीवन था, जो कि हिन्दी में कोई जीवन ही नहीं हैं। पेशेवरी के ऐतबार से अनुवादक का जीवन भी, जैसा कि सब जानते हैं, कोई जीवन नहीं है, अौर फ़िल्म समीक्षक या फ़िल्म अालोचक का जीवन भी कोई जीवन नहीं है। इस दौर में जो काम उन्होंने किये अच्छे ही किए, पर मुझे संदेह है कि अपनी प्राथमिकता से किए। इस सिलसिले में उन्होंने ऐसी अवांछनीय जिरहें भी कीं जो अगर वह न करते तो हिन्दी के एक रौशनख़याल, सेकुलर नज़रिए पर जीवन भर अडिग रहने वाले अादमी के रूप में उनकी छवि को नुक़सान न पहुँचता। मैं तो यही समझता हूँ कि पिछले पंद्रह बीस साल में उन्होंने साहित्यिक परिदृश्य, ख़ासकर काव्य परिदृश्य, में विराट हस्तक्षेप अौर कॉन्स्टीटुएन्सी बिल्डिंग की जो कोशिशें कीं, उनके पीछे कोई सुचिंतित ख़ाका, गहरी कल्पनाशीलता या गहन सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन न था। उनके व्यक्तित्त्व में एक मुक्तिबोधीय पहलू ज़रूर था, जिसकी मांग वह पूरी न कर सके। इसका उन्हें अहसास था, ऐसा मुझे लगता है।

मुझे उनको देखकर हमेशा श्रीकांत वर्मा की याद अाई। वही बेचैनी, वैसी ही महत्त्वाकांक्षा, वैसा ही फ़्रस्ट्रेशन। उन्हें ताक़त अाज़माना अाता था लेकिन ताक़त का माक़ूल इस्तेमाल नहीं कर सकते थे—उसके प्रदर्शन में ही उनका वक़्त निकल जाता था। न वह अच्छे बॉस थे, न अच्छे मातहत। पूरा जीवन संशय अौर दुविधा से भरा था पर वह कभी यह क़ुबूल नहीं करते थे।  ऐसा वक़्त भी था — अौर बीच बीच में अभी तक अाता रहा — जब विष्णु खरे को एक कम्युनिस्ट या मार्क्सवादी या सिक्काबंद वामपंथी की तरह देखा गया। अक्सर उन्हें ख़ुद भी शौक़ होता था कि उनको प्रतिबद्ध वामपंथी कहा जाए। पर इससे जो ज़िम्मेदारी अान पड़ती है उसे उठाना उनके बस में कभी न रहा। इन दोनों—श्रीकांत अौर विष्णु—पर मुक्तिबोध का साया पड़ा था। वह साया जीवन भर उनके साथ लगा रहा—वे जानते थे वे किसके प्रति जवाबदेह हैं। इनके अंतःकरण में मुक्तिबोध मौजूद थे। वे यह भी जानते है कि उनके लिए यह वरदान नहीं अभिशाप है। वे इसी अंतःकरण में मुक्तिबोधियन शाप झेलने को अभिशप्त हैं। यह कोई निन्दा नहीं, इनके व्यक्तित्त्व अौर कृतित्त्व के मर्म को समझने का प्रयास है। कम से कम विष्णु खरे को ख़ुद इस धारणा से ऐतराज़ न था। एक बार इसी ‘मुक्तिबोधियन कर्स’ पर कुछ बात हुई। वह अचानक विचलित हुए, ठंडी साँस भरकर बोले—‘हाँ भई…’ अौर चुप हो गए।

यह सब मैं इसलिए कहता हूँ कि १९७० के दशक में विष्णु खरे हिन्दी साहित्य अौर संस्कृति जगत के भावी अौर समर्थ नेता के रूप में देखे जाने लगे थे। ही वाज़ द नेक्स्ट बिग होप। वह मेरे  भी हीरो थे। वह एक अाला दर्जे का चिंतक, साहित्येतिहास लेखक, सिद्धांतकार हो सकते थे, किसी हद तक थे भी, लेकिन बेशतर काम वह किए बिना चल बसे। बेशक उनकी ये असफलताएँ या विवशताएँ हममें से बहुतों की सफलताअों से तो बेहतर ही हैं। उनकी समस्या यह थी कि वह सत्ता, रुतबे, सरपरस्ती या संस्थान से जुड़े बिना कुछ करना पसंद नहीं करते थे। सिर्फ़ अपने दम पर कुछ पहल लेने को वह अपने अात्मसम्मान के  ख़िलाफ़ समझते थै। एक तरह के विद्रोही होने के बावुजूद उन्हें सत्ता या इक़्तिदार का मोह भी था जो कि मेरी पीढ़ी के लोगों में भी कम नहीं हैं, अलबत्ता उनकी विष्णु खरे जैसी पहुँच नहीं है।  


यह मुहब्बतनामा कुछ जल्दी में लिखा गया है। अौर अच्छा ही है कि जल्दी ने कुछ लिखवा लिया अौर दुबारा ग़ौर करने का मौक़ा संपादक ने न दिया। बहरहाल मौसूफ़ ज़िंदा होते तो इसमें मीन मेख़ ज़रूर निकालते, पर कुल मिलाकर इसे मुहब्बतनामा ही जानते।








(‘समयान्तर’ में `एक और खाली घर` शीर्षक से प्रकाशित। वहीं से साभार)