Thursday, November 15, 2018

टीएम कृष्णाः एक रचनाकार की तड़प और उसका संघर्ष - शिवप्रसाद जोशी



 मैं सोचता हूं कि मुझे संगीत पसंद है क्योंकि इसका नैतिकता से बहुत थोड़ा सा लेनादेना है. बाकी हर चीज़ नैतिक या अनैतिक है और मैं ऐसी चीज़ की तलाश में हूं जो नैतिक न हो. नैतिकता ने हमेशा मुझे तड़पाया ही है.
(जर्मन लेखक हरमन हेस्से के उपन्यास डेमिआन का प्रमुख किरदार)

टीएम कृष्णा बिना गाए कैसे रहेंगे. गाना उनके लिए धर्म से ज्यादा राजनीति है. वो उनकी पॉलिटिक्ल कार्रवाई है. सो ये तो तय है कि 17 तारीख वे गाएंगे. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने हाथ खींच लिए और स्पिक मैके को अकेला छोड़ दिया तो क्या हुआ- मनीष सिसोदिया और दिल्ली सरकार ने कृष्णा को बुला लिया. तो वे तो गाएंगे ही. वेबसाइट के मुताबिक यह प्राधिकरण भारत सरकार का मिनी रत्न है- श्रेणी एक.

सवाल यह है कि आख़िर यह कितने रोज चलेगा. संगीत करने नहीं देंगे, लिखने नहीं देंगे, पेटिंग नहीं बनाने देंगे, भाषण नहीं होने देंगे, खाने पहनने या सोने नहीं देंगे, बाहर निकलने नहीं देंगे, नमाज नहीं पढ़ने देंगे, दाढ़ी नहीं रखने देंगे, सिर उठाकर नहीं चलने देंगे, सिर झुकाकर नहीं चलने देंगे, गरज ये कि वो कुछ भी नहीं करने देंगे जो हम आप करना चाहते हैं- अपनी मर्जी से. मर्जी पर मालिकाना बदल रहा है. वे मार रहे हैं, गिरफ्तार कर रहे हैं, धमका रहे हैं, कपड़े फाड़ रहे हैं, आग लगा रहे हैं, पीछा कर रहे हैं, घेर रहे हैं, न बोलने न कहने दे रहे हैं. वे कह रहे हैं कि गाओ पर गाते हुए बोलो मत, वे कह रहे हैं लिखो लेकिन लिखते हुए सोचो मत, वे कह रहे हैं तस्वीरें खींचों लेकिन उनमें अर्थ न पकड़ो. वे कह रहे हैं पेंटिंगे बनाओ, नाटक करो, सिनेमा करो, फेसबुक या ट्वीट करो लेकिन ये अपने लिए नहीं खिदमत में करो. वे ये भी कहते हैं: अहिंसा?! यह क्या है, क्या होता है इससे?! इस तरह शायद ऐसा पहली बार हुआ जान पड़ता है कि देश की एक बड़ी आबादी संभावित या घोषित देशद्रोह के दायरे में है.

टीएम कृष्णा देशद्रोही हैं, राष्ट्रविरोधी बातें करते हैं- सोशल मीडिया कीटाणु कहते हैं. बहुत लंबे समय बाद भारतीय संगीत परंपरा में एक सचेत और साहसी ज्ञाता-गायक का उदय हुआ है. अपनी धुन के गायक तो बहुत हुए हैं, और अपनी रागकारी के उस्ताद भी- लेकिन 21वीं सदी का एक शास्त्रीय गायक आधुनिकता का ऐसा विलक्षण पैरोकार और ऐसी ज़िद्दी प्रकांड है कि किसी की सुनता नहीं. उसने कर्नाटक संगीत के मठों को हिला दिया, सवर्णवादी और ब्राह्मणवादी शास्त्रीय संरचनाओं में खलबली मचा दी. वो मंचो की श्वेतश्याम आभाओं और दिव्यताओं से खिन्न होकर उठा और अपने संगीत और अपने साज को लेकर साधारण जनों की बस्तियों में जाकर गाने लगा. एक आधुनिक फकीर. टीएम कृष्णा और मछुआरा समुदाय की मिलीजुली कोशिशों से संगीत का सालाना उर्स भारतीय शास्त्रीय और कर्नाटक संगीत की उल्लेखनीय घटना बनती है. उरुर ओल्कोट कुप्पम चेन्नई के पास मछुआरों का एक गांव है. जब कृष्णा को चंद साल पहले मैगसायसाय अवार्ड मिला था तो अतिरेकी मीडिया में आयाः संगीत को स्लम यानी झुग्गी झौपड़ियों तक ले जाने वाले को पुरस्कार. मछुआरा समुदाय ने ऐसी रिपोर्टिंग पर कड़ा एतराज जताया था. उनका कहना था भाई स्लम क्या होता है और क्या देखा है तुमने हमारा स्लम? खैर चालबाज मीडिया यही करेगा. उसे गोदी मीडिया भी नहीं कहना चाहिए. गोद एक पवित्र और संवेदनशील शब्द है, वह मातृत्व से जुड़ा एक कोमल भाव है. हमें विशेषण या क्रिया विशेषण बनाते हुए या नये वाक्यांश बनाने के मोह में ऐसे भटकावों से बचना चाहिए. लेकिन गोदी मीडिया कहने वाले भी तो कितने ठहरे. खैर..कृष्णा ने कह दिया कि स्टेज कहीं पर भी हो वे तो गाएंगें और ऐसी धमकियों से डरेंगे नहीं.

मान्य तौर पर उनके तेवर देखकर कोई कहेगा अरे कृष्णा तो विद्रोही है. लेकिन ये विद्रोह नहीं है पाठको, यही तो स्वाभाविकता है. एक कलाकार से अपेक्षित यही तो है- यह तो उसकी सामान्य चर्या है कि वो अपने मन का और अपने ढंग का गाए. हमारा समय इतना एकजैसा और इतना झुका हुआ और इतना डरा हुआ और इतना मेजोरिटेरियन बना दिया गया है कि हमें लगता है कृष्णा विद्रोही हुए, जैसे कि स्लम जाकर विद्रोही हुए. वे विद्रोही उतने नहीं जितने कि वैचारिक आलसी और वैचारिक अकर्मण्यता के शिकार हम हैं- हम में से ज्यादातर लोग. हम सुन्न हैं. और कृष्णा का स्टैंड हमें सन्न करता है. जर्मन उपन्यासकार हरमन हेस्से ने अपने विख्यात नॉवेल डेमिआन के बारे में लिखा थाः युवाओं के लिए ये एक कठिन समय है. लोगों की निजता को यथासंभव प्रतिबंधित करते हुए उन्हें एक जैसा बनाने की एक व्यापक आकांक्षा हर जगह दिखती है. मनुष्य आत्मा स्वाभाविक तौर पर इस धक्के के खिलाफ विद्रोह कर उठती है, डेमिआन की यात्रा की बुनियाद यही है. अरुंधति रॉय ने बांग्लादेशी फोटोग्राफर शहीदुल आलम की गिरफ्तारी के बाद उनके नाम एक खुली चिट्ठी रवाना की है. पेन नाम की अंतरराष्ट्रीय लेखन बिरादरी की पहल पर ये चिट्ठी अभियान पूरी दुनिया में चला है. और भी कई बंदी और मृत लेखकों को भी याद किया जा रहा है और एकजुटता की एक वैश्विक मिसाल देखने को मिलती है. अरुंधति ने चिट्ठी में बताया कि कैसे ये बुद्धिजीवियों पर नहीं बल्कि बुद्धिमानी पर- प्रज्ञा और सहज बुद्धि पर हमला हो रहा है.

और क्या बांग्लादेश क्या पाकिस्तान क्या भारत और क्या जापान क्या चीन क्या यूरोप क्या अमेरिका.. पूरी दुनिया की छत पर बूटों की धम्मधम्म सुनाई देती है. धूल उड़ाते हुए चुनाव हैं और इनके ठीक पीछे रथों का रेला है. उनके पीछे दस्ते हैं और सबसे पीछे घिसटती हुई निरीहताएं हैं. लेकिन धूल का ये गुबार छंटे और बवंडर जरा देर थमे तो दिखे कि दूर किनारों पर बहुत से लोग खड़े हैं. कोई लिख रहा है, कोई बोल रहा है, कोई चित्र बना रहा है, कोई पढ़ता और सुनाता है, कोई भाषण दे रहा है, कोई नृत्य कर रहा है कोई नाटक, कोई खाना पका रहा है कोई खा रहा है कोई खेल रहा है कोई बच्चों के बीच है कोई गा रहा है- वहीं कहीं टीएम कृष्णा और उन जैसे रचनाकार भी हैं. यानी बूटों और संगीनों की धम्म धम्म के नीचे प्रतिरोध की आवाज़ें 20वीं हो या 21वीं- सदी दर सदी कायम है.

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वरिष्ठ पत्रकार और प्रखर विचारक शिवप्रसाद जोशी विलक्षण गद्य लिखते हैं, उनके पास शानदार कविताएं हैं और अपने लिखे को छुपाए रखने की नैतिक जगह है। 

Thursday, October 25, 2018

विष्णु खरे—स्मरण : असद ज़ैदी



पंद्रह नवम्बर २०१७ की शाम दिमाग़ में नक़्श है। लोदी रोड श्मशान में कुँवर नारायण के अंतिम संस्कार के वक़्त अचानक दो लोगों पर नज़र पड़ी−−दीवार के सहारे रखी एक बेंच पर विष्णु खरे  अौर केदारनाथ सिंह बैठे थे, नीम अँधेरे में। दोनों बहुत दुर्बल, पस्त अौर लगभग प्राणहीन लग रहे थे, जैसे वहाँ हों ही नहीं, अौर कहते हों कि हमें भी मरा ही जानो। ख़ामोश अभिवादन किया, उन्होंने बड़ी बेज़ारी से सर हिलाया जैसे सरहद पार कर चुके हों। मुझे लगा अब पता नहीं इन्हें दुबारा देख पाऊँगा या नहीं। साल भी न गुज़रा अौर अब वे इस दुनिया में नहीं है। 

लेकिन यह विष्णु खरे से अंतिम ‘संवाद’ न था। इस जून के महीने में यह ख़बर सुनकर कि वह अाम अादमी पार्टी के तहत अाने वाली दिल्ली हिन्दी अकादमी के उप सभापति मनोनीत किये गए हैं, अौर इस तरह वह अपने अज़ीज़ शहर में रहने वापस अा पाएंगे, मैंने उन्हें यह संक्षिप्त ई-मेल संदेश भेजा (२३ जून)−−

“क़िबला, कुछ ख़बर सुनी है। उम्मीद है सच ही निकलेगी। लिहाज़ा बधाई... अौर ख़ुदा ख़ैर करे!” 

जल्दी ही उनका मुख़्तसर जवाब अाया−−

“इसमें ‘ख़ुदा ख़ैर करे’ ही operative part [काम की बात] है।” 

कम से कम पिछले चालीस साल से हमारे दरमियान संवाद की यही शैली बरक़रार रही। उनसे ऐसी वाक़फ़ियत मेरी ख़ुशक़िस्मती अौर दोस्ती की यह हालत मेरा अभिमान रही। यह ऐसा रिश्ता था जिसमें हम एक दूसरे से बोले कम, नाख़ुश ज़्यादा रहे।

नौ सितम्बर को उन्होँने अपने नये कार्यकाल का पहला काव्यपाठ कराया, जिसमें मैं भी अामंत्रित था। क़रीब दो-ढाई घंटे का साथ रहा। कुछ ख़ामोश लेकिन पुरसुकून नज़र अाते थे। कार्यक्रम के बाद वे जल्द ही अपने अावास के लिए निकल पड़े। दो दिन बाद पता चला ब्रेन हैमरेज के बाद वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। शरीर के एक हिस्से को लकवा मार गया था। हफ़्ते भर की बेहोशी के बाद वह इस दुनिया से चले गए। बहुत सारी बातें अधूरी छूट गईं।

हम जब कविता या कहानी लिखते हैं तो ऐसे कुछ ज़रूरी चेहरे दिमाग़ में रहते हैं जिनके बारे में या तो हमें यक़ीन होता है कि वे हमारे लिखे को पढ़ेंगे या कुछ चिंता होती है कि वे अगर पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे। कहीं किसी जगह एक अादमी नज़र रखे हुए है। विष्णु खरे न सिर्फ़ मेरी पीढ़ी के बहुत से कवि-लेखकों के लिए, बल्कि हिन्दी मे सक्रिय बहुत सारे दूसरे लोगों के लिए भी,  ऐसा ही एक ज़रूरी चेहरा थे। वह कभी हमारे ख़यालों से दूर न रहे। उनका जाना एक , ज़रूरी अादमी का जाना अौर एक दुखद ख़ालीपन का अाना है। मेरी पीढ़ी ने एक अाधुनिक दिमाग़, तेज़ नज़र काव्य-पारखी, अालोचक, दोस्त, स्थायी रक़ीब अौर नई पीढ़ी ने अपना एक ग़ुस्सेवर लेकिन ममतालु सरपरस्त खो दिया है। इस रूप में वह हमारे सबसे क़ीमती समकालीन थे। 

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर 
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच 
(मीर)

विष्णु खरे एक अौर घर ख़ाली कर गए हैं, वह घर जो सिर्फ़ उन्हीं के लिए बना था। उसमें कोई अौर नहीं रह सकेगा। कभी उस घर में मीर मेहमान होते थे, कभी मुक्तिबोध, कभी श्रीकांत अौर कभी रघुवीर सहाय। उस घर को बाहर से, उड़ती उड़ती नज़र से ही देखा गया, उस में दाख़िल होना सबके बूते की बात न थी। कविता के उस घर में अावाज़ें हैं, तस्वीरें हैं, बेचैन रूहें भटकती हैं, वहाँ विषाद है, अार्त्तनाद है, बार बार अपने ही से सामना है, जहाँ कल भी अाज है, अौर विस्मृति है ही नहीं। इस घर में बहुत जंजाल है, क्लेश है, पर कुछ भी अोझल अौर अमूर्त्त नहीं है। कुछ कमरे बंद पड़े हैं, जिन्हें खोलने से वह ख़ुद भी डरते थे, वो अब कभी नहीं खुलेंगे। वह इस मकान के मकीन होकर कम, पहरेदार होकर ज़्यादा रहे। इस घर का नक़्शा उनके जीवनीपरक ब्यौरों से कम उनकी कविताअों से ही झलकता रहेगा। 

वह अत्यंत भावुक, संवेदनशील अौर असुरक्षित व्यक्ति थे। अपने इस बुनियादी किरदार को, अपनी वेध्यता को, ढँकने के लिए उन्होंने एक रूखा, अाक्रामक अौर नाटकीय अंदाज़ अपनाया था। उनका यही सार्वजनिक रूप बन गया अौर इसी तर्ज़ के लिए वह जाने गए। उनके अंतरंग मित्र उनके इस स्वाभाव को समझते थे, लिहाज़ा उनकी बहुत सी बातों को नज़रअंदाज़ करते थे। सभी मित्र जहाँ तक बन पड़ता उनकी हिमायत में रहते थे, बेजा अाक्रमण से उनकी हिफ़ाज़त करते थे। वैसे भी विष्णु जी ने मुहब्बत अौर अदावत में कभी ज़्यादा फ़ासला न रखा। यह उन लोगों की कमनज़री है जिन्होंने उनकी ज़्यादतियाँ तो देखीं पर जो उनकी बेरुख़ी अौर ग़ुर्राहट में प्यार अौर हमदर्दी की झलक न देख सके। 

विष्णु खरे ने साहित्य जगत में एक तेज़-तर्रार विध्वंसक अालोचक की तरह प्रवेश किया अौर तत्काल ही अपनी प्रतिभा के लिए पहचाने गए। उनकी ताज़गी, खुले दिमाग़, ज़हानत अौर अध्यवसाय से लोग प्रभावित होते थे। वह अपेक्षाकृत युवा थे अौर उस दौर में युवा होना ख़ुशक़िस्मती की निशानी थी। ऐसा लगता था कि राजनीति, समाज, संस्कृति निर्णायक मोड़ पर है, जो बदलाव अाया चाहता है उसका कार्यभार १९४० के बाद जन्मी पीढ़ी पर है, उसमें अात्मविश्वास है, जोखिम उठाने का जज़्बा है, समस्या वही हल करेगी, उसके पास सारी चाबियाँ मौजूद हैं। १९६४ से १९७५ के बीच का काल भारतीय राजनीति अौर कलाअों में एक प्रकार का मुक्ति प्रसंग था अौर समाज की अंतरात्मा पर कई तरह की दावेदारियाँ सामने अा रही थीं। पहली बार संस्कृति में अवाँगार्द प्रवृत्तियाँ प्रधान प्रवृत्तियों की तरह स्थापित होने लगी थीं।  वाम में नव-स्फूर्ति अौर दूरगामी विघटन की प्रक्रियाएँ एक साथ चल रही थीं, गो यह बात उस वक़्त  इतनी स्पष्ट न थी। कालांतर में बहुत कुछ एक भोर का सपना ही साबित हुअा। वह दौर जिसे परिवर्तनकारी दौर की तरह देखा जा रहा था, एक लम्बे राष्ट्रीय दुखांत से पहले का अंतराल था। प्रतिभाशाली लोगों की यह पहली खेप नहीं थी जिसकी सामाजिक हस्तक्षेपकारी संभावनाएँ मूर्त्तिमान नहीं हो सकीं अौर उनकी अपनी क्षमता अौर ताक़त संस्थानों अौर प्रतिष्ठानों के भीतर ही जज़्ब होकर या अपना स्थान वहाँ बनाए रखने में ही ख़र्च होकर रह गई। विष्णु खरे इसका अपवाद न थे। 

विष्णु खरे हरदम संस्कृति अौर साहित्य की दुनिया में रमे रहकर खप जाना चाहते थे। उनके दौर के हालात साज़गार नहीं थे, अौर न सिर्फ़ उनका स्वभाव बल्कि उनकी वैचारिक प्रेरणाएँ भी रास्ते में अाती थीं। लेकिन सांस्कृतिक परिदृश्य में केन्द्रीय अौर निर्णायक भूमिका निभाने की उनकी तीव्र इच्छा उन्हें एक ग़लत जगह ले गई। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हस्तिनापुर कॉलेज (अब मोतीलाल नेहरू कॉलेज) में अंग्रेज़ी अध्यापक की स्थायी नौकरी छोड़कर साहित्य अकादमी के उप-सचिव पद के लिए अावेदन देने की ठान ली। भारतभूषण अग्रवाल ने भी उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया। एक रोज़ उन्होंने अपनी जीवनसाथी कुमुद को स्कूटर पर बिठाया अौर दोनों ख़ुशी ख़ुशी भारतभूषण जी के पास गए अौर उन्हीं को अावेदन देकर अा गए। वह एक संभावनामय, सार्थक अौर उज्ज्वल भविष्य की अोर नहीं, बल्कि अँधेरे में छलाँग लगा रहे थे। १९७६ में वह साहित्य अकादमी के उप-सचिव तैनात हुए। उस समय उनकी उम्र ३६ साल थी। मैं बाईस तेईस साल का था अौर उद्दंडता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था। उसी साल या शायद उससे अगले साल एक रोज़ मैंने उनसे पूछा, “अापको संस्कृति प्रशासक बनने का इतना शौक़ कैसे पैदा हुअा? अध्यापकी में जो अाज़ादी अौर गरिमा है उसे लात मारकर कहाँ ये साहित्य अकादेमी में अा फँसे? अापको बहुत समझौते करने पड़ेंगे।” विष्णु खरे ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखा अौर एक क्रुद्ध साँड की तरह डकराए—“हुँह!” ज़ाहिर है उन्हें कोई मलाल न था। उन्होंने कुछ इस इस तरह की बात कही कि तुम्हें क्या लगता है मैं यहाँ क्या करने बैठा हूँ? मैंने कहा, खरे जी, यह जगह अौसतपन (मीडियॉक्रिटी) का गढ़ है। अाप नष्ट हो जाएँगे। बोले, तुम कह रहे हो मैं यहाँ अौसत काम करूँगा। मैंने कहा, देख लीजिएगा। उन्होंने कुछ स्नेह अौर कुछ नाराज़ी से कहा, “तुम्हें तुम्हारी ये काली ज़बान बहुत कष्ट देगी। तुम जे एन यू में हो। वहाँ वो नामवर भी है... उससे बचके रहना।”

मुझे अाज तक इस बातचीत पर अफ़सोस अौर ग्लानि है। अपनी धृष्टता पर, अौर इस बात पर कि मेरी ‘काली ज़बान’ से अनायास जो बात निकली थी वह एक तरह की भविष्यवाणी साबित हुई। साहित्य अकादेमी के कार्यक्रम प्रभारी वाले अपने कार्यकाल में उनके सम्पर्क अखिल भारतीय साहित्यिक अभिजन या श्रेष्ठिवर्ग अौर देशी विदेशी साहित्य संस्थानों अौर मंडलियों से अौर दूतावासों से बढ़े, अनुवाद का काम तलाशते बेरोज़गारों को छिटपुट काम दिला सके, छोटे प्रकाशकों अौर छापेख़ानों के मालिक उनके चक्कर लगाते थे, इस रुसूख़ की वजह से नए कवियों के कविता संग्रह छपाने में मददगार हुए, कविता-कहानी लिखने वाले प्रशासनिक सेवाअों में सक्रिय  नौकरशाहों से बराबरी से बात करने की सुविधा प्राप्त हुई। सबसे बड़ी बात यह हुई कि साहित्य अकादेमी की अाला अफ़सरी की वजह से हिन्दी के अाचार्यगण अौर पिछड़ी समझ के लेखक कवि अब उनकी कविता को कुछ मान्यता देने लगे। लेकिन कुल मिलाकर उनके जीवन के इतने सारे वर्ष वहाँ बरबाद ही हुए। एक बुद्धिजीवी, चिंतक अौर लेखक के रूप में उनका विकास अवरुद्ध हुअा। अौर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों का अौर हिन्दी की व्यावसायिक दुनिया से संबंधों का यह जाल मायाजाल ही साबित हुअा। ये सम्पर्क अौर लगातार विस्तारमान दिखती दुनिया अंततः कामकाजी दुनिया थी, वे संबंध भी कामकाजी अौर रस्मी ही थे। वह उनकी कॉन्स्टीटुएन्सी थी ही नहीं। जब तक महफ़िल गर्म थी, उन्हें अच्छा लगता रहा। अकादेमी से जब हटे तो यह दुनिया सिकुड़ गई। संस्कृति के महाबली बनने का उनका सपना कब का ख़त्म हो चुका था। मातहती उन्हें अाती न थी, बिना मातहती के अाज की दुनिया में महाबली कोई बन नहीं सकता।

उनकी दूसरी भूल थी यह समझना कि वह हिन्दी पत्रकारिता में कुछ परिवर्तन ला पाएँगे। टाइम्स ग्रुप में वह ऐसे समय नौकरी करने लगे जब अख़बार की दुनिया में समीर जैन-विनीत जैन का अभ्युदय हो चुका था, अौर पत्रकारिता एक बुद्धिविरोधी, मुजरिमाना दौर में प्रवेश कर चुकी थी। एक पेशे के रूप में भी पत्रकारिता का महत्त्व गिर रहा था, संपादकी का दरजा घट रहा था अौर काम की शर्तें पत्रकारों के विरुद्ध बदली जा रही थीं। कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लागू किया जा रहा था। ऐसे समय में मैनेजमेंट के साथ होना इस प्रक्रिया की पैरोकारी करना अौर इसमें मालिकान का हाथ बटाना ही था, जो काम (मुझे खेद है कि) सुरेन्द्रप्रताप सिंह जैसे संपादकों ने जमकर किया। इस दौर में बहुत से उपयोगी लफंगे पत्रकारिता में घुसे, अौर अख़बारों में उनका महत्त्व बढ़ता गया। ऐसे ही दौर में दिल्ली, लखनऊ, जयपुर में सम्पादकी करने के बाद विष्णु खरे पत्रकारिता से बाहर अाए। ज़िंदगी के इतने साल फिर से बरबाद करके। वह ख़ुद कहते थै ‘मॉय ट्रिस्ट विद जर्नलिज़्म वाज़ अ फ़िअास्को।’ अौर सही ही कहते थे।

इस दौर के बाद का उनका जीवन एक फ़्री-लांसर का जीवन था, जो कि हिन्दी में कोई जीवन ही नहीं हैं। पेशेवरी के ऐतबार से अनुवादक का जीवन भी, जैसा कि सब जानते हैं, कोई जीवन नहीं है, अौर फ़िल्म समीक्षक या फ़िल्म अालोचक का जीवन भी कोई जीवन नहीं है। इस दौर में जो काम उन्होंने किये अच्छे ही किए, पर मुझे संदेह है कि अपनी प्राथमिकता से किए। इस सिलसिले में उन्होंने ऐसी अवांछनीय जिरहें भी कीं जो अगर वह न करते तो हिन्दी के एक रौशनख़याल, सेकुलर नज़रिए पर जीवन भर अडिग रहने वाले अादमी के रूप में उनकी छवि को नुक़सान न पहुँचता। मैं तो यही समझता हूँ कि पिछले पंद्रह बीस साल में उन्होंने साहित्यिक परिदृश्य, ख़ासकर काव्य परिदृश्य, में विराट हस्तक्षेप अौर कॉन्स्टीटुएन्सी बिल्डिंग की जो कोशिशें कीं, उनके पीछे कोई सुचिंतित ख़ाका, गहरी कल्पनाशीलता या गहन सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन न था। उनके व्यक्तित्त्व में एक मुक्तिबोधीय पहलू ज़रूर था, जिसकी मांग वह पूरी न कर सके। इसका उन्हें अहसास था, ऐसा मुझे लगता है।

मुझे उनको देखकर हमेशा श्रीकांत वर्मा की याद अाई। वही बेचैनी, वैसी ही महत्त्वाकांक्षा, वैसा ही फ़्रस्ट्रेशन। उन्हें ताक़त अाज़माना अाता था लेकिन ताक़त का माक़ूल इस्तेमाल नहीं कर सकते थे—उसके प्रदर्शन में ही उनका वक़्त निकल जाता था। न वह अच्छे बॉस थे, न अच्छे मातहत। पूरा जीवन संशय अौर दुविधा से भरा था पर वह कभी यह क़ुबूल नहीं करते थे।  ऐसा वक़्त भी था — अौर बीच बीच में अभी तक अाता रहा — जब विष्णु खरे को एक कम्युनिस्ट या मार्क्सवादी या सिक्काबंद वामपंथी की तरह देखा गया। अक्सर उन्हें ख़ुद भी शौक़ होता था कि उनको प्रतिबद्ध वामपंथी कहा जाए। पर इससे जो ज़िम्मेदारी अान पड़ती है उसे उठाना उनके बस में कभी न रहा। इन दोनों—श्रीकांत अौर विष्णु—पर मुक्तिबोध का साया पड़ा था। वह साया जीवन भर उनके साथ लगा रहा—वे जानते थे वे किसके प्रति जवाबदेह हैं। इनके अंतःकरण में मुक्तिबोध मौजूद थे। वे यह भी जानते है कि उनके लिए यह वरदान नहीं अभिशाप है। वे इसी अंतःकरण में मुक्तिबोधियन शाप झेलने को अभिशप्त हैं। यह कोई निन्दा नहीं, इनके व्यक्तित्त्व अौर कृतित्त्व के मर्म को समझने का प्रयास है। कम से कम विष्णु खरे को ख़ुद इस धारणा से ऐतराज़ न था। एक बार इसी ‘मुक्तिबोधियन कर्स’ पर कुछ बात हुई। वह अचानक विचलित हुए, ठंडी साँस भरकर बोले—‘हाँ भई…’ अौर चुप हो गए।

यह सब मैं इसलिए कहता हूँ कि १९७० के दशक में विष्णु खरे हिन्दी साहित्य अौर संस्कृति जगत के भावी अौर समर्थ नेता के रूप में देखे जाने लगे थे। ही वाज़ द नेक्स्ट बिग होप। वह मेरे  भी हीरो थे। वह एक अाला दर्जे का चिंतक, साहित्येतिहास लेखक, सिद्धांतकार हो सकते थे, किसी हद तक थे भी, लेकिन बेशतर काम वह किए बिना चल बसे। बेशक उनकी ये असफलताएँ या विवशताएँ हममें से बहुतों की सफलताअों से तो बेहतर ही हैं। उनकी समस्या यह थी कि वह सत्ता, रुतबे, सरपरस्ती या संस्थान से जुड़े बिना कुछ करना पसंद नहीं करते थे। सिर्फ़ अपने दम पर कुछ पहल लेने को वह अपने अात्मसम्मान के  ख़िलाफ़ समझते थै। एक तरह के विद्रोही होने के बावुजूद उन्हें सत्ता या इक़्तिदार का मोह भी था जो कि मेरी पीढ़ी के लोगों में भी कम नहीं हैं, अलबत्ता उनकी विष्णु खरे जैसी पहुँच नहीं है।  


यह मुहब्बतनामा कुछ जल्दी में लिखा गया है। अौर अच्छा ही है कि जल्दी ने कुछ लिखवा लिया अौर दुबारा ग़ौर करने का मौक़ा संपादक ने न दिया। बहरहाल मौसूफ़ ज़िंदा होते तो इसमें मीन मेख़ ज़रूर निकालते, पर कुल मिलाकर इसे मुहब्बतनामा ही जानते।








(‘समयान्तर’ में `एक और खाली घर` शीर्षक से प्रकाशित। वहीं से साभार)


Thursday, September 20, 2018

विष्णु खरे - अपनी तरह के अलहदा

कवि पंकज चतुर्वेदी ने विष्णु खरे की रामचंद्र शुक्ल और मुक्तिबोध को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी का ज़िक्र किया तो किसी ने इस वक़्त ऐसा न करने की नसीहत देकर एतराज़ किया। 'इस वक़्त' यह अजीब कुतर्क है। पता नहीं क्यों खरे जी के बारे में सोचते हुए मुझे केदारनाथ सिंह याद आ रहे थे। कई वजहों से। डर यही था कि 'इस वक़्त' की नसीहत वाले चले आएंगे। बहरहाल, कृष्ण कल्पित ने एक टिप्पणी में अभी इन दोनों कवियों का ज़िक्र किया - "केदारनाथ सिंह की अनुकृति करने की कोशिश में जितने युवा कवि नष्ट हुये उससे कुछ अधिक ही विष्णु खरे की कविता की नक़ल करके हुये होंगे । जो कवि जितने युवा कवियों को बरबाद कर सके - वह उतना ही बड़ा कवि होता है । इस लिहाज़ से केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे दोनों ही बड़े कवि ठहरते हैं - कुछ थोड़ा कम तो कुछ थोड़ा ज़्यादा !"

मुझे लगता है कि केदारनाथ सिंह कविता और साहित्य की राजनीति में फूंक-फूंक कर सधे हुए कदम रखने वाले शख़्स थे। उनकी कविता अपने साफ़-सुथरेपन और एथनिक से कलापन की वजह से भी लोकप्रिय थी जिसकी नक़ल करके बर्बादी के साथ उनसे बड़ा कवि बन जाने की गुंजाइश भी मौजूद है।

खरे जी की कविता की नक़ल बर्बाद ही कर सकती थी। क्योंकि वह नक़ल कविता की लंबाई की हो सकती थी, स्टाइल की हो सकती थी जिससे बर्बादी के अलावा कुछ हाथ लगना सम्भव नहीं। उनकी कविताओं जैसी कविताएँ लिखने की कोशिशें ख़ूब हुईं। वे नक़ल ही थीं।
खरे जी की संवेदना और लगाव की नक़ल संभव नहीं क्योंकि ये चीज़ें नक़ल से हासिल हो ही नहीं सकती। जिस संवेदना और लगाव के साथ वे जिन जगहों और जिंदगियों में पहुंच जाते थे, वह दुर्लभ है। उनकी कविताओं में जो हाहाकार है, वह इसी संवेदना और मज़बूत लगाव की वजह से है। वह पक्षधरता, मनुष्यता और बारीक़ नज़र उनके पास ही थी जो उनके जैसी कविता के लिए ज़रूरी थी।

बड़े कवि तो खरे के आसपास हमेशा ही अनेक रहे। कुँवरनारायण और देवताले तो कुछ समय पहले ही विदा हुए। केदारनाथ सिंह भी। खरे किसी से बड़े कवि नहीं थे। केदारनाथ सिंह से तो कतई नहीं जिन्होंने अपना वैभव, ओरा और शिष्य संसार काफी बड़ा बनाया था। खरे तो अपनी कविताओं के बारे में न कभी ख़ुद कोई चर्चा आयोजित कर सकते थे और न प्रायोजित। पुराने और नये लेखकों-कवियों से उनके गहरे रिश्ते थे पर वे तोड़फोड़, फटकारना और फटकार खाना इतना करते थे कि कोई स्थायी मठ बनना उनके व्यक्तित्व में शामिल ही नहीं था। लेकिन, वे बड़ों से बड़े कवि इस तरह थे कि उन्होंने कविता में अपना एक नितांत नया रास्ता बनाया। रघुवीर सहाय जिस अति कला को छोड़कर शुष्क कही जाने वाली यथार्थवादी राह पर थे, उससे भी ज्यादा शुष्क गद्य सी राह। पर ऐसी शुष्क कि पाठक की आँखें और हृदय संवेदना से रो पड़ते हैं। एक सच्ची कविता ही ऐसा कर सकती है। जैसा कि कल्पित जी ने उन्हें मुक्तिबोध से जोड़ते हुए एक बात कही और जैसा कि असद जी अक्सर खरे जी की कविताओं पर बात करते हुए मुक्तिबोध के उस 'अपराध बोध' का जिक्र किया करते हैं, मुझे भी यही लगता है कि वे मुक्तिबोध और सहाय के वारिस थे। पर अपनी तरह के अलहदा।

Wednesday, June 20, 2018

मुक्तिबोध — उत्पीड़न और नायकत्व : असद ज़ैदी


('नया पथ' का मुक्तिबोध विशेषांक मुझे बहुत देरी से हासिल हो पाया। इस पत्रिका में छपा असद जी का यह लेख मुक्तिबोध के उत्पीड़न और हिंदी साहित्य व विचार की दुनिया में उनकी 'प्रधान उपस्थिति' का उल्लेख करते हुए 'नेहरू युग' को लेकर चली आ रही रुमानियत भरी छवि को भी ध्वस्त करता है,  'वामपंथी सांस्कृतिक धारा' की विडंबनाओं और को सामने लाता है और पुनर्विचार प्रोजेक्ट के नाम पर 'फ़ासिस्ट धमकी' से आगाह करता है। इस लेख में एक 'मर्मभेदी' ज़िक्र यह भी आया है कि मुक्तिबोध की एम्स में मृत्यु के बाद उनका शव उस शख़्स के सरकारी आवास पर रखा गया जिसने 'अंतरंग मित्र होते हुए उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी'। उनकी स्मृति में पहली गोष्ठी भी इसी ठिकाने पर हुई। लेख में उस शख़्स का नाम नहीं आया है पर एक ज़माने में 'इंडिया टुडे' की साहित्य वार्षिकी के पाठक रहे लोगों को याद होगा कि अशोक वाजपेयी ने इस सिलसिले में प्रभाकर माचवे का नाम लिखा था। -एक ज़िद्दी धुन)

सन 1964 में गजानन माधव मुक्तिबोध की मृत्यु अाधुनिक भारतीय साहित्य की केन्द्रीय घटना है। हिन्दुस्तान के सांस्कृतिक जीवन में पिछली सदी में किसी मृत्यु का इतना असर नहीं पड़ा। इसकी तुलना सिर्फ़ 1974 में कलकत्ते में उस्ताद अमीर ख़ाँ की अप्रत्याशित मृत्यु से ही की जा सकती है। अपने अपने रचना-क्षेत्र में ये दो हस्तियाँ लोगों की सामूहिक चेतना ही नहीं अवचेतन का हिस्सा — एक प्रधान उपस्थिति — बन गईं। इस मृत्यु के बाद ही से वह दौर शुरू हुअा, जिसे क़ायदे से हिन्दी साहित्य और संस्कृति-चिंतन में मुक्तिबोध-युग कहा जाना चाहिए। इस युग को कुछ और नाम देना ऐतिहासिक और साहित्य के समाजशास्त्र के ऐतबार से सही नहीं होगा। अगर ऐसा अक्सर नहीं कहा जाता तो इसका संबंध हिन्दी की दुनिया की शक्ति संरचना से है, न कि मुक्तिबोध की स्वतःसिद्ध केन्द्रीयता से। नौकरीपेशा प्राध्यापकीय तबक़े, साहित्य के कारोबार को नियंत्रित करने वाली संस्थाएँ अौर साहित्य-संस्कृति के दस-बीस स्वघोषित संरक्षक-पुरोहित मुक्तिबोध को लेकर शुरू ही से असहजता और दुचित्तेपन का इज़हार करते रहे हैं। न तो यह दुचित्तापन अाज तक ख़त्म हुअा है, और न ही हिंदी ‘रचना-संसार’ के अवचेतन पर मुक्तिबोध की हुकूमत ख़त्म होती नज़र अाती है।

मध्यवर्गीय दुचित्तेपन और उसके निहितार्थों पर काम करने वाले पहले अादमी मुक्तिबोध ही थे। उन्हें अपने दौर के बिगाड़ का, हर विचलन का पता था। वह उस समय की पेचीदगियों को भी समझते थे। यह नेहरू युग की निर्माणकारी और विध्वंसकारी दोनों प्रक्रियाओं पर गहरी नज़र रखते थे। नेहरू का दौर एक तरफ़ लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवास्था के पल्लवन, नई संस्थाओं के निर्माण और राष्ट्रीय विकास की अाधार रचना का दौर था, वहीं दूसरी तरफ़ वह कम्युनिस्ट अान्दोलन के अापराधिक दमन और शीतयुद्धीय नीति के तहत हर जगह से उनके बहिष्कार का दौर था। लोग अाज कुछ भी कहें, यह एक ऐतिहासिक सचाई है। पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस संगठन पर दक्षिणपंथियों का क़ब्ज़ा था, और नेहरू के पास इस दक्षिणपंथ का सीधे सामना करने का न हौसला था, न ताक़त। केन्द्र से लेकर प्रांतों तक (संयुक्त प्रांत/उत्तर प्रदेश, मध्य भारत/मध्यप्रदेश, बम्बई, महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार) कांग्रेस में दक्षिणपंथी नेताओं का बोलबाला था। शिक्षा, संस्कृति और हिंदी प्रतिष्ठान पूरी तरह प्रतिक्रियावादी के क़ब्ज़े में था।

मुक्तिबोध ने स्पष्ट रूप से नेहरू युग के समझौते, अवसरवाद और जनद्रोह की प्रवृत्तियों को पनपते हुए देखा था।  वह जानते थे कि भारतीय राजनीति का वह दौर दरअसल एक तरफ़ कांग्रेस के भीतर नेहरू धड़े की अाधुनिक, उदार प्रगतिशील वृत्ति और दूसरी तरफ़ ज़्यादा वर्चस्वशाली कठोर दक्षिणपंथी धड़ों की विचारधारा के बीच सुलह और समन्वय पर टिका है। लिहाज़ा ‘नेहरू युग’ को एकतरफ़ा ढंग से सेकुलर राजनीति, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक विवेक से संचालित समाज और राष्ट्रनिर्माण का दौर कहना एक रोमानी और ग़लत क़िस्म की समझ का नतीजा है। नेहरू युग का जो अर्थ अाज हम लेते हैं, उस अर्थ में वह नेहरू युग था ही नहीं, न मुक्तिबोध ने उसे इस तरह देखा था।  नेहरू ख़ुद कितने ही प्रगतिशील और अंतर्राष्ट्रीयतावादी रहे हों, और समाजवादी देशों में उनकी जितनी भी स्वीकृति रही हो, भारतीय वामपंथी संगठनों के उतने ही दुश्मन थे जितना कि हिन्दू महासभा और अार एस एस के। कोई भी तन्ज़ीम जो कांग्रेस के बाहर प्रगतिशील काम करती हो, उसे वह कांग्रेस का, और देश का दुश्मन ही समझते थे।

ख़ुद साम्यवादी — अाज के साम्यवादी — भूल गए हैं कि नेहरू-युग में एक साम्यवादी का जीवन कितना कठिन था। जब कोई संकट में पड़ता था उस समय जाति, रिश्तेदारी, मित्रता या पहुँच कुछ काम न अाती थी। वामपंथियों को लेकर नेहरू सरकार की गृह और अांतरिक सुरक्षा नीति मैकार्थीवादी नीति थी, जिसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ पटेल जैसे लोग ही न थे, वह पूरी राज्य-व्यवस्था भी थी जो अंग्रेज़ों ने सप्रेम उन्हें सौंप दी थी।  कोई साम्यवादी न होगा जिसपर राज्य की, पुलिस की और मुख़बिरों की नज़र न हो,  जो राजकीय कोप का शिकार न हुअा हो। मुक्तिबोध का अपना जीवन इसकी मिसाल है। लगभग सभी कम्युनिस्टों ने समाज में लम्बे अरसे तक पर्सीक्यूशन झेला जिसकी छाया उनकी जीविका पर, उनके परिवारों पर, और उनकी अगली पीढ़ियों तक पड़ी। इस दौर में एक प्रगतिशील के लिए छिपने की एक ही जगह थी, कि वह कांग्रेसियों से सम्पर्क में रहे, अपनी वफ़ादारी साबित करे और कांग्रेस में अा मिले, और ज़िल्लत की रोटी खाकर गुज़ारा करे। लेकिन यह विकल्प भी सबके लिए उपलब्ध न था। नेहरू का लोकतंत्र कम्युनिस्टों के लिए नहीं बना था। कांग्रेस के बाहर का परिदृश्य और भी ख़राब था जहाँ या तो रामराज्य परिषद, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी जैसी घोर प्रतिक्रियावादी पार्टियाँ थीं या फिर ग़ैर कांग्रेसवाद के पैरोकार लोहिया और उनका समाजवादी दल जो हरदम कांग्रेस के विरुद्ध सबको एकजुट करने के पक्षधर थे, लेकिन कम्युनिस्टों के जानी दुश्मन थे। मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म-विरोध का जो काम दक्षिण और धुर दक्षिण किया करते हैं, वह भारत में लोहियावादियों ने जी-जान से सम्पन्न किया।

मुक्तिबोध ने अपनी प्रगतिशीलता  इन कठिन परिस्थिति में अर्जित की थी, और एक असुरक्षित जीवन की क़ीमत पर उसकी अाबरू बनाए रखी। वह इसी युग में चल बसे, और अागे अाने वाली और भी टेढ़ी और संदिग्ध परिस्थितियों को न देख सके। उनकी छवि एक शहीद की सी छवि की तरह अाज तक बहुत लोगों के दिलो-दिमाग़ में है। उनका जीवन और चिंतन अाज उतना ही प्रासंगिक है जितना नेहरू युग में था।


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मुक्तिबोध के वैचारिक और रचनात्मक विकास का दौर शीतयुद्ध का दौर था। हिन्दी में  अज्ञेयवाद, प्रयोगवाद, नई कविता अौर लोहियावादी संस्कृति चिंतन का बोलबाला था। इन प्रवृत्तियों से स्वस्थ बहस के लिए मुक्तिबोध हमेशा तैयार अौर व्याकुल रहते थे। लेकिन यही दौर हिन्दी के वामपंथी साहित्य चिंतन के भीतर बढ़ते परम्पराप्रेम और दक्षिणोन्मुखता का दौर भी था, जिसे कम्युनिज़्म की शब्दावली में संशोधनवाद का दौर भी कहा जाता है। इस दौर में मुक्तिबोध को एक वैचारिक अौर रचनात्मक अकेलेपन में काम करना पड़ा। कोई बराबरी की संगत न थी। उनका मन वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ताअों, छात्रों, वामपंथी पत्रकारों, कुछ साथी शिक्षकों के बीच लगता तो था, लेकिन साहित्य, संस्कृति अौर मार्क्सवाद से जुड़े मसलों पर गहन बहस करें ऐसे जानकारों की कमी थी। उनकी कुछ गहरी दोस्तियाँ थीं, जिनमें से एक दोस्त तो ऐसे थे जो उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी किया करते थे, उनकी गतिविधियों की जानकारी सरकार को भेजा करते थे। मुक्तिबोध को इसकी जानकारी हो गई थी अौर उनका दिल बहुत टूटा था। फिर भी वह ख़ुशक़िस्मत थे कि अपने कुछ अौर अंतरंग मित्रों अौर उनसे प्रेरित युवकों को रंग बदलने और अपने निश्चयों के ख़िलाफ़ व्यवस्था में घुल-मिल जाने के करुण दृश्य देखने से बच गए।

वामपंथी सांस्कृतिक  धारा के भीतर मुक्तिबोध की स्वीकृति और अस्वीकार दोनों शुरू ही से मौजूद रहे हैं। रामविलास शर्मा और उनकी शिष्य परम्परा में उनका कोई सम्मान या सही पहचान दूर दूर तक देखने को नहीं मिलती। उनके समकालीन वामपक्षीय लेखकों में हरिशंकर परसाई और शमशेर बहादुर सिंह ही उनके सबसे महत्वपूर्ण हिमायती थे। शमशेर जी ने एक बार धीमे से कहा था कि मुक्तिबोध की मृत्यु में ही उनके पुनर्जीवन की (हिन्दी की दुनिया में) चाबी मौजूद है। जब मैंने इस का अाशय जानना चाहा तो वह बोले, “वी अाल शेयर हिज़ अाफ़्टरलाइफ़।”

मुक्तिबोध के जीवन की विडम्बना दो मर्मभेदी घटनाअों के ज़रिए सामने अाती है। 11 सितंबर 1964 के  दिन अखिल भारतीय अायुर्विज्ञाना संस्थान में जब उनकी मृत्यु हुई तो अंत्येष्टि से पहले उनके शव को दिल्ली में उसी शख़्स के सरकारी अावास पर लाकर रखा गया जिसने अंतरंग मित्र होते हुए उनके ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी। कुछ ही दिन बाद उनकी याद में दिल्ली में पहली गोष्ठी उनके मित्रों और प्रशंसकों ने की, वो भी उसी अादमी के अावास पर हुई! अफ़सोस की बात यह है कि किसी को भी यह अापत्तिजनक न लगा। उस अादमी के दामन का दाग़ किसी को दिखाई न दिया! न तब, न बाद में। दूसरा वाक़या मक़बूल फ़िदा हुसेन से जुड़ा है। हुसेन मुक्तिबोध की अंतिम यात्रा में शरीक थे। वह उनके मित्रों के मित्र थे और मुक्तिबोध के महत्व से कुछ हद तक वाक़िफ़ थे। शवयात्रा में चलते हुए उनके दिल में ख़याल अाया कि इतना बड़ा लेखक और बुद्धिजीवी कितने अभाव, उपेक्षा और लगभग गुमनामी की हालत में दुनिया से रुख़सत हो रहा है, और हम उसके लिए कुछ न कर सके। उन्होंने वहीं अपने जूते छोड़ दिये और तमाम रास्ते श्मशान तक नंगे पाँव चले। हुसेन का कहना था, “मुझे लगा कि इतना तो मैं कम-अज़-कम कर ही सकता हूँ।” उनके नंगे पाँव चलने में  पश्चात्ताप, शोक और अक़ीदत का मिला-जुला जज़्बा था। हुसेन साहब ने ख़ुद मुझसे कहा कि जिस चीज़ को (यानी नंगे पैर चलने को) उनकी एक जानी-पहचानी ‘अदा’ कहा जाता है, उसकी शुरुअात मुक्तिबोध की मौत के सदमे से हुई थी। ये दो मामूली घटनाएँ मुझे नेहरू युग की गहरी नैतिक फाँक का प्रतिनिधि रूपक लगती हैं।


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अाज विभिन्न प्रकार के सैद्धान्तिक दूर-दूर ही से मुक्तिबोध को रहस्यवादी, खंडित चेतना का चितेरा इत्यादि कहते रहते हैं, या कुछ ज़्यादा निर्लज्ज तत्व बार-बार उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि (महाराष्ट्रियन ब्राह्मण) में ही उनकी मूल सृजनात्मक चेतना का उत्स देखते हैं अौर उन्हें वामपंथियों से ‘मुक्त’ करके अपना लेना चाहते हैं। उधर वामपंथ के कई पहरेदारों ने भी (ख़ासकर रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने) मुक्तिबोध को डिसओन किया हुअा है। मुक्तिबोध के इस अपहरण, ‘लिबरेशन’ या बरख़ास्तगी की योजना का दिलचस्प पक्ष यह है कि मुक्तिबोध के घर पर कोई पहरा तो है नहीं, द्वार खुले हैं और मुक्तिबोध वहाँ मौजूद हैं — संगत को तैयार। सवाल यह है कि क्या मुक्तिबोध के ये अपहरणकर्ता उनकी बग़ल में बैठने को तैयार हैं? क्या उनकी सोहबत इन्हें गवारा होगी?

हिंदी के साहित्यिक दक्षिणपंथी और उनकी देखादेखी कुछ उदारवादी मुक्तिबोध पर पुनर्विचार की बात किया करते हैं।  विचारशील लोगों को विचार अथवा 'पुनर्विचार' के लिए किसी ऐलान या आयोजन की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। विचार अपने में एक जारी सिलसिला है जो इन्सान की ज़ेहनी फ़िज़ा और बौद्धिक कार्यव्यापार को आन्दोलित किये रहता है। हर नए विचार, अकुलाहट या आकलन को पुनर्विचार कहा भी नहीं जाता। यह अधकचरापन और ख़ामख़याली है। अनुभव, प्रयोग, दिमाग़ी मेहनत, और संवाद की मंज़िलों से गुज़रकर और अपने वक़्त के हालात से मानूस होकर, उनसे गहरी जद्दो-जहद करते हुए कभी कभी लोगों का सामूहिक आलोचनात्मक श्रम और रचना-कर्म अपने कुल जमा (कुमुलेटिव) असर से पुनर्विचार की ज़मीन तैयार करता है। साहित्य और कलाओं की दुनिया में बड़े परिवर्तन साल में दो बार, ख़ुद से और इतनी आसानी से, नहीं आते। मुक्तिबोध पर 'पुनर्विचार' एक संदेहास्पद अकुलाहट का नतीजा लगती है। कुछ लोग विचार से पहले पुनर्विचार के लिए बेताब है। सौवाँ साल (२०१७) पूरा हो रहा है। यानी अगले तीन-चार साल मुक्तिबोध पर सघन ‘पुनर्विचार’ के साल होंगे। चूँकि उसी साल रूसी क्रांति की सौंवी सालगिरह भी पड़ रही है, तो लाज़िम है कि यह एक दोहरा पुनर्विचार हो। इन पुनर्विचारकों के विचार वही हैं जो वे दशकों से — शीतयुद्ध काल से — बताते आ रहे हैं, वे बस नए सिरे से धावा बोलने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें लगता है परिस्थिति अब ज़्यादा अनुकूल है। कोशिश है कि फिर से मरहूम पर दावा पेश किया जाए और मुक्तिबोध जन्म शताब्दी वर्ष के आते आते भारतीय वाम-परंपरा के इस महान विचारक, कवि और लेखक की स्मृति पर नरम दक्षिण-अति दक्षिण गठबंधन के तहत एक भगवा-श्वेत दुरंगा फहरा दिया जाए। प्रतिगामिता कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ती। उसे भगत सिंह की 'घर वापसी' चाहिए और गजानन माधव मुक्तिबोध की भी। भारत में पूँजी हर जगह अपनी ताक़त दिखा रही है। दूसरी ही तरह के ‘पुनर्विचार’ के युग में हम आ गये हैं। पिछले संसदीय चुनाव में सिक्काबन्द हिन्दुत्ववादी राजनीतिक गठबंधन की जीत के बाद उनके सांस्कृतिक प्रवक्ताओं ने सार्वजनिक मंचों से बोलकर भी और लिखकर भी ऐलान कर दिया है कि शिक्षा, संस्कृति, नागरिक आचार और अधिकार व्यवस्था, लोगों के रंग-ढंग और जीवन शैली हर चीज़ पर पुनर्विचार और उसके आमूल-चूल पुनर्गठन का वक़्त आ गया है, और यह कि अब उन्हें जनादेश प्राप्त है। यह पुनर्विचार नहीं, समाज के फ़ासिस्ट पुनर्गठन की माँग और धमकी है। मुक्तिबोध का वाक़या भी अजीब है। उनके मरणोपरांत जिन लोगों ने उनके साहित्यिक उद्धार का ज़िम्मा लिया, उनके हाथ से वह मरहूम बहुत जल्दी छूट निकले। उनमें से जो उद्धारक बचे रह गए हैं आज तक हाथ मलते हैं। अब नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में फ़िज़ा साज़गार हुई है। उन्हें अपनी ‘जागीर’ वापस चाहिए।
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Monday, May 14, 2018

बेटे के नाम चिट्ठी -चार्ल्स मंगोशी

Charles Mungoshi


।।बेटे के नाम चिट्ठी।।

अब कद्दू पक गए हैं.
साल की पहली मकई की फसल से हम
कुछ ही दिन दूर हैं.
यहाँ गाएँ भरपूर दूध दे रही हैं.
अगर तुम्हारे पिता की बात न हो तो
यह साल कोई ख़ास खराब नहीं रहा
तुम्हारे पिता की पीठ का दर्द दोबारा
लौट आया है और सारे कामकाज आ
पड़े हैं मेरे कन्धों पर.
तुम्हारे छोटे भाई-बहन स्कूल में ठीक-ठाक ही
पढ़ रहे हैं, सिर्फ़ रिंदई, तुम्हारी बहन,
समस्या बनती जा रही है. तुम्हें याद
होगा कि यह सब तुम्हें लिखा गया था.
क्या तुम्हें वह चिट्ठी मिली? - तुमने जवाब नहीं दिया।
अब देखो, जब से तुम्हारे पिता का पीठ दर्द शुरु हुआ तब से
हम तुम्हारी बहन रिंदई को स्कूल भेजने के लिए
पर्याप्त रुपये नहीं जुटा पाए हैं.
अपना
ज़्यादातर वक़्त रिंदई कुएँ के पास बैठी
रोकर गुज़ारती है और सिर्फ़ उसी की
वजह से यह चिट्ठी तुम्हें लिख रही हूँ.
मैंने सोचा था कि बीते क्रिसमस में
तुम हमारे संग होंगे, फिर मैंने सोचा कि
हो सकता है तुम बेहद व्यस्त हो और
शायद ईस्टर की छुट्टियों में आओ
और तभी तुम्हारे पिता लगभग हमें छोड़ कर चले ही गए थे, बेटे।
फिर मैंने सोचा कि सर्दियों से पहले
मैं तुम्हारे पास आऊँ. तुम्हें पता ही है कि साल
के उस मौसम में मुझे कितनी कोफ़्त होती है
लेकिन फिर तुम्हारे पिता ने बिस्तर पकड़
लिया और इस बार पहले से ज़्यादा
बदतर हालत हुई. हमने यह सोचना शुरु
कर दिया कि वे अगली बोवनी का मौसम
नहीं देख पाएँगे।

मैंने तुम्हारी बहन रिंदई
से कहा कि वह तुम्हें चिट्ठी लिखे लेकिन
तुम्हारे पिता ने साफ़ मना कर दिया। तुम्हें
पता है कि सारा दिन बिस्तर पर पड़े
वे कितने ज़िद्दी हो जाते हैं या जब उन्हें
वहम होता है कि हर एक उन्हें नज़रअंदाज़
किए जा रहा!
अब, टाम्बू, मेरे बेटे यह मत सोचना
कि मैं रुपयों की माँग कर रही हूँ
हालाँकि थोड़ा-बहुत हमें उनसे उधार लेना पड़ा
जो तुम्हारे पिता को अस्पताल ले गए थे
और तुम जानते हो कि कर्ज़ लेने से तुम्हारे पिता को कितनी घृणा होती है!
यही सब है जो मैं तुम्हें बतलाना चाहती थी.


मुझे उम्मीद है कि इस जुलाई में तुम हमारे संग होंगे।
तुम्हारा जवाब आए एक लम्बा अर्सा बीत गया
उम्मीद करती हूँ कि उसी पुराने पते पर यह चिट्ठी तुम्हें पाएगी।
सिर्फ वही एक पता है जो हमें मालूम है.

तुम्हारी माँ


(अंग्रेज़ी से अनुवाद- नरेन्द्र जैन

चार्ल्स मंगोशी Charles Mungoshi जिम्बाबवे के प्रतिष्ठित लेखक हैं। उन्होंने अंग्रेजी और अपनी नेटिव लेंग्वेज Shona दोनों में प्रचुर लेखन किया है।

नरेन्द्र जैन हिंदी के कवि हैं। उनकी ख़ासियत यह है कि वे `सेलिब्रिटी हुए बग़ैर` हिंदी के बड़े कवि हैं। इन दिनों उज्जैन में रहते हैं।

Saturday, May 5, 2018

नामवरी में कोई कमी नहीं - धीरेश सैनी



प्राइम टाइम में नामवर
रवीश कुमार की वजह से एनडीटीवी इंडिया कई मामलों में अनूठा है। 4 मई 2018, शुक्रवार रात के प्राइम टाइम में हिंदी के किसी बड़े साहित्यकार को देखना इस दौर के लिहाज से कोई मामूली बात नहीं थी। अमितेश ने हिंदी आलोचना के `शीर्ष पुरुष` कहे जाने वाले 90 पार के नामवर सिंह से उनके घर जाकर बड़ी विनम्रता के साथ बातचीत की थी जिसे दिखाने से पहले रवीश ने भी नामवर के नाम पर पूरे सम्मान और विनम्रता के साथ रोशनी डाली। मीडिया घरानों में जब `हिंदी साहित्य और विचार` से नाक-भौं सिकोड़ने का चलन हो तब एक बड़े हिंदी पत्रकार का एक वरिष्ठ-बुजुर्ग हिंदी साहित्यकार के प्रति ऐसा भाव सुखद था। रवीश जेएनयू में `धोती-धज-बनारस` को लेकर अतिशय भावुक भी थे और नामवर की रीढ़ को लेकर अतिश्यक्ति में भी। उन्होंने कहा, ``नामवर की पीठ और रीढ़ आज भी उसी तरह तनी हुई है जैसे स्टील की बनी हो।`` 90 साल की स्टील की यह रीढ़ केंचुए की तरह लिजलिजी होकर केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा से `बूढ़े बैल` का खिताब व `संरक्षण` की आशवस्ति पा रही थी और मैनेजर पांडे इस `महान` निर्लज्ज परंपरा का सच्चा अनुयायी होने का परिचय दे रहे थे तो तब आलोचना से भक्तमंडली अग़र थोड़ा-बहुत आहत हुई होगी, अब रवीश के शब्दों से तर गई होगी।

हमारा ईश्वर उनसे कमज़ोर है?
बहरहाल, 90 पार के नामवर सिंह को देखना `भारतीय परंपरा` के लिहाज से किसी पुरुष के इस आयु में इस तरह स्वस्थ और चेतन दिखाई देने पर आनंदित होने जैसा रहा। वे धीमे-धीमे चल पा रहे थे। आवाज़ मद्धम पड़ जाने के बावजूद बिल्कुल पुराने अंदाज़ में शेर सुना रहे थे, गीत के बोल उद्धृत कर रहे थे। उन्होंने बेशक एक लंबा सफल, निर्द्वंद्व, सदैव सत्ता समर्थक, सुविधावादी, करियरवादी जीवन जिया है पर ऐसी ज़िंदगी जीने वाले भी इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर स्मृतिलोप का शिकार हो जाया करते हैं या बहकी-बहकी बात करने लग जाते हैं। यह सुखद आश्चर्य की बात थी कि नामवर पूरी तरह चेतन दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा भी कि ``भगवान की कृपा से मेरी याददाश्त बहुत अच्छी है। पढ़ी हुई किताबें याद हैं।`` वाकई, उनकी बातों में उनकी जानी-पहचानी `वैचारिक परंपरा` और `प्रतिबद्धता` खुलकर अभिव्यक्त हुई। आश्चर्य नहीं हुआ, जब उन्होंने साक्षात्कार ले रहे अमितेश से ही जोर देकर सवाल किया, ``हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से (उन लोगों के ख़ुदा से) कमज़ोर है? ख़राब है?``

स्टील की रीढ़, मनुष्य की रीढ़ 
इस उम्र में भी यह पुरुष उतना ही निर्लज्ज और सामप्रदायिक है, ऐसा कुछ सोचकर मैं तो सो गया था पर यह सब लिखने की वजह सुबह वॉट्सएप पर एक मुग्ध भक्त का भेजा लिंक रहा। रात के कार्यक्रम का लिंक भेजते हुए, उसने अद्भुत-अद्भुत करते हुए `नामवर जी` की बेबाकी के कसीदे भी काढ़ रखे थे। ख़ैर, उसे बताने के लिए ही कि ऐसी बेशर्म और निरापद बेबाकी तो नामवर के यहां हमेशा ही रही है, कुछ बातें दोहराना ज़रूरी लग रहा है। सबसे पहले नामवर से बातचीत की प्रस्तुति से पहले रवीश की भूमिका की विनम्र शुरुआत, ``मैं हिंदी साहित्य का व्यक्ति नहीं हूँ। साहित्य से बहुत दूर भी नहीं हूँ और बहुत पास भी नहीं रहता। मगर इस बात का अहसास जरूर रहा कि हिंदी के पास दो ही चीज़ें श्रेष्ठ हैं- हिंदी भाषी मज़दूर और हिंदी के साहित्यकार। यही हमारे हीरो हैं।`` मज़दूरों के प्रति पक्षधरता की कोशिश मेरी भी रही है और अरसे तक साहित्यकार अतार्किकता की हद तक मेरे लिए हीरो रहे हैं। दिलचस्पी अब भी है पर नायक-पूजा का पुराना भाव नहीं बचा है। रवीश तो हिंदी साहित्य के व्यक्ति हैं। किताब भी आ चुकी है और बतौर पत्रकार फिलहाल उनकी जो भूमिका है, किसी सच्चे लेखक, पत्रकार और मनुष्य की भूमिका वही होनी चाहिए। `स्टील की रीढ़` वाले हजार नामवरों के मुकाबले अपने लिए रवीश की यह `मनुष्य की रीढ़` सम्मान के काबिल है।


हे ईश्वर!
``हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से (उन लोगों के ख़ुदा से) कमजोर है? ख़राब है?``
नामवर कहते हैं, ``उम्र अब 90 के पार है हमारी। जी गए, ये भगवान की कृपा है।`` अमितेश कहते हैं, ``अब लोग कहेंगे कि आप भगवान को याद कर रहे हैं। आप तो सर किसी ज़माने में कम्युनिस्ट और प्रगतिशील...।`` नामवर - ``मुहावरा है ये।`` अमितेश- ```मने किसी न किसी को तो धन्यवाद कहना है...।`
नामवर- ``वो ही। किसी के मुंह से निकलता है, माय गॉड। निकल जाता है न? या ख़ुदा। मुसलमान कहता है। कहता है न? कहते हैं न? बोल पड़ते हैं न, ऑह माय गॉड, या ख़ुदा? तो हम हे ईश्वर कहते हैं, तो क्या बुरा? (हमारा) ईश्वर कोई उन लोगों से कमज़ोर है? ख़राब है? तो इसलिए, हे ईश्वर।``
नामवर सिंह कहते कि उन्हें भगवान में विश्वास है तो भी कोई बुराई नहीं थी। मान सकते थे कि ठीक है, वे सीपीआई पर आजीवन लदे रहे, चुनाव लड़े और प्रगतिशील लेखक संघ के भी अगुआ (अगवा?) रहे पर भगवान की परिकल्पना को लेकर आस्तिक रहे। वे  कहते कि आदतन जबान पर चढ़ा मुहावरा है तो भी ठीक। लेकिन, वे यहां मुसलमानों को लाते हैं। `माय गॉड` और `या ख़ुदा` से `हे ईश्वर` को तौलते हैं और कहते हैं, `` हमारा ईश्वर कोई उन लोगों से कमज़ोर है? ख़राब है? तो इसलिए, हे ईश्वर।``

शीर्ष पुरुष की परंपरा 
यह `हिंदी की परंपरा` के `शीर्ष पुरुष` का `सुसंगत` और `तार्किक` कथन है। (कोई चाहे तो जैसा कि नामवर के मामले में आम हिंदी वालों और अधिकतर प्रगतिशीलों का चलन है, मुग्ध भाव से इसकी भक्ति भरी व्याख्या में गोते लगा सकता है।) नामवर से बातचीत के दौरान उनके लिए जो पट्टियां चलाई जा रही थीं, उनमें एक पट्टी थी- `भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की`। संयोग नहीं है कि नामवर की इस बातचीत में छलक रही साम्प्रदायिक घृणा जेएनयू के उस केंद्र में उनकी भूमिका में भी इसी तरह छलकती रही थी। अव्वल तो जिस तरह उन्हें केंद्र का संस्थापक घोषित कर दिया गया, वह एक कोरा झूठ है। इस केंद्र में नामवर सिंह के पदार्पण से पहले इसका ब्लू प्रिंट ही तैयार नहीं हो चुका था बल्कि छात्रों का पहला बैच भी मौजूद था। नाम से ही बड़े फलक वाले भारतीय भाषा केंद्र (सेंटर ऑफ इंडियन लेंग्वेजेज) की शुरुआत मोटे तौर पर हिंदी-उर्दू के केंद्र के रूप में हुई थी। दोनों भाषाओं का एक कॉमन पेपर भी तैयार किया गया था। इस दौरान नामवर सिंह का रुख न तब और न अब कोई छुपी चीज़ रहा है। उनकी खुली भूमिका इस केंद्र में भाषाई साम्प्रदायिक घृणा के आधार पर दरार डालने की थी। वे कॉमन पेपर को क्रेडिट कोर्स न होने देने पर आमादा थे और केंद्र के `पाकिस्तान` बन जाने तक की टिप्पणी करने से नहीं चूके थे। लेकिन, तब जमाना जरा कुछ और था और रेक्टर मुनीस रज़ा से लेकर स्टूडेंट्स तक उनसे सहमत नहीं थे। नामवर के रवैये को लेकर बाद की पीढ़ी के जिस किसी को कोई शक हो, वह `हंस` में नामवर का लिखा `बासी भात में ख़ुदा का साझा` भी तलाश कर पढ़ सकता है। आनंद स्वरूप वर्मा, राजेंद्र शर्मा आदि काफी लेखकों ने तब नामवर को कड़े जवाब भी दिए थे।

तिकड़म, पतन और पतन
बहरहाल, उस भारतीय भाषा केंद्र जिसकी स्थापना का श्रेय नामवर सिंह को दिया गया, उसमें उनके आगमन की कथा भी भ्रष्टाचार का कोई मामूली उदाहरण नहीं है। असल में यह `गिव एंड टेक` अपॉइंटमेंट था। जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में अपनी नियुक्ति से पहले नामवर सिंह को सावित्री चंद्रा को रीडर नियुक्त करने के लिए जोधपुर से बुलाया गया था। सावित्री चंद्रा की एकमात्र योग्यता यह थी कि वे यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन सतीश चंद्रा की पत्नी थी। इस तरह की नियुक्ति के लिए जेएनयू और यूजीसी दोनों पर ही लानत है और इस तिकड़म में शामिल नामवर पर भी। जेएनयू के इस प्रतिष्ठित भारतीय भाषा केंद्र का दुर्भाग्य था कि उसके पहले ही बैच के लिए ऐसी रीडर को नियुक्त कर दिया गया जो पढ़ा ही नहीं सकती थी। नामवर को इससे क्या, उन्हें तो यूजीसी के चेयरमैन और जेएनयू प्रशासन को एक साथ उपकृत करने का मौका मिल गया और सौदेबाजी के रूप में इस केंद्र में प्रफेसर बनकर आ गए। क्या इस बात से नामवर के भक्त भी इंकार कर सकेंगे कि पढ़ा पाने में पूरी तरह अयोग्य-अक्षम सावित्री चंद्रा को लेकर छात्रों को आंदोलन चलाना पड़ा और नामवर सिंह बेशर्मी से छात्रों के खिलाफ खड़े हो गए। इसी केंद्र में उनके हाथों एक ऐसी नियुक्ति (चिंतामणि) से भी सभी वाकिफ हैं जिसकी योग्यता नामवर सिंह के गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी का मकान तैयार करना थी। अफसोस कि हिंदी के इस `शीर्ष पुरुष` का जीवन ऐसी ही तिकड़मबाजियों, मुखर और योग्य छात्रों के उत्पीड़न, सत्ता के साथ खड़े होकर प्रतिरोधी परंपरा के दमन, वामपंथ के साथ गलबहियां करते हुए दक्षिणपंथी रास्ते के निर्माण जैसी नीच हरकतों से भरा पड़ा है जो इतना कामयाब है कि उसे किंवदंती की तरह पेश कर वैसा होने की चाह रखने वालों की कमी नहीं है।

पावर स्ट्रकचर के साथ
जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र की शुरुआत का दौर ही देश में इमरजेंसी का दौर भी है। सौभाग्य से जेएनयू ने और उसके हिंदी-उर्दू के भी बहुत से स्टूडेंट्स ने करियर की परवाह किए बिना दमनकारी सत्ता से लोहा लिया था। नामवर सिंह उस समय सत्ता के साथ खड़े थे। जब छात्रों की धरपकड़ के लिए जेएनयू में पुलिस के छापे लगा करते थे, नामवर सिंह अपनी तिकड़मों को निर्विरोध संपन्न करने के लिए छात्रों को गिरफ्तारी का भय दिखाया करते थे। उनका यह अवसरवाद और पावर स्ट्रकचर के साथ खड़े होने की आदत हमेशा बनी रही। वे इतने, इतने, इतने बड़े थे कि शीर्ष पुरुष थे और शीला संधु के जमाने से ही हिंदी के `शीर्ष प्रकाशक` के प्रिय थे। पर क्या मजाल कि वे कभी प्रकाशक और लेखक के बीच किसी मसले में लेखक के साथ खड़े हुए हों! हिंदी के `शीर्ष पुरुष` और `शीर्ष प्रकाशक` दोनों एक-दूसरे के लिए हिंदी साहित्य की सत्ता को नियंत्रित करने के टूल बने रहे। नामवर को राजा राममोहन राय फाउंडेशन का चेयरमैन होने का मौका मिला तो चहेते प्रकाशक के वारे-न्यारे करने के लिए किस हद तक बदनामी उठाने से नहीं झिझके थे, उसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मालिनी भट्टाचार्य को यह मामला संसद तक में उठाना पड़ा था।
यह सत्ता की छतरी के नीचे रहने की नामवर सिंह की पुरानी अदा थी या बदले जमाने में खुलकर संघ के आगे समर्पण की चाह कि वे 90 साल की उम्र में `ज़लील` होने के लिए  `इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र` में पहुंच गए थे। केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने वहां कहा था कि बूढ़े बैलों के संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी `कभी मार्क्सवादी थे` नामवर सिंह के लिए `मर्यादा का कभी अतिक्रमण नहीं करसकते` कहा था तो सही ही कहा था। ख़ामोशी से यह सब सुनकर, `सम्मानित` होकर लौटे हिंदी के शीर्ष पुरुष नामवर और उनके अनुचर वामपंथी मैनेजर पांडे के अलावा वहां विश्वनाथ त्रिपाठी थे जिनको लेकर इतनी भी आलोचना का कोई मतलब नहीं बनता है।


यात्राओं के सरोकार
नामवर सिंह ने जब अपनी देश-विदेश की यात्राओं की बात कर रहे थे तो उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वे कभी कहीं अपने पैसे से नहीं गए। लोगों ने प्यार से बुलाया। हवाई यात्रा का भी किराया दिया और जहां रेल का रास्ता हुआ, वहां रेल का किराया दिया। वास्तव में यह बड़ी बात है। लेकिन, ठीक इसी वक़्त यह कहना चाहता हूँ कि इसमें उनके आलोचक की नहीं, जेएनयू शक्तिपीठ और उसके जरिये साहित्य की तमाम शक्तिपीठों से उनके रिश्तों की भूमिका ज्यादा बड़ी है। देश भर में हिंदी विभागों की नियुक्तियों और सेमिनारों आदि का स्तर इन यात्राओं से शायद उन्होंने रद्दीपन से ऊपर खींचा हो? पर मेरे लिए एक दूसरी बात महत्वपूर्ण है कि वे इतनी ठसक से कैसे कह सकते हैं कि कभी अपने पैसे से नहीं गया। क्या उन्हें कभी मज़दूर संगठनों ने नहीं बुलाया? अपने तो परिचित कई लेखक ऐसे आयोजनों में अपने किराये से दौड़े चले आए। हम भी ऐसे आयोजनों में अपने किराए से ही गए और यथासंभव सहयोग राशि भी देकर आए। विष्णु नागर सिरसा में ऐसे ही एक कार्यक्रम में बस में बैठकर ही गए जबकि उन्हें गाड़ी से आने का प्रस्ताव दिया गया था। सुभाष गाताडे तो कितनी बार इसी तरह हमारे बुलावे पर दौड़ते रहे। उनके पास न इस तरह के वेतन रहे, न आय के दूसरे साधन।

सवर्ण-सामंती सोच
रवीश ने नामवर सिंह के `विवादित और मर्यादित` होने की बात का भी जिक्र उसी ग्लेमरस अंदाज में किया है जिस अंदाज में पहले भी किया जाता रहा है। लेकिन, ऐसा कर पाना हर किसी के लिए इतना सरल नहीं है। नामवर के साम्प्रदायिक, जातिवादी, स्त्रीविरोधी, सामंती और तिकड़मी व्यक्तित्व पर लिखा भी जा चुका है और उनके भक्त भी निजी महफिलों में इन किस्सों को कभी प्रशंसा भाव से और कभी चटखारे लेकर सुनाते रहे हैं। लेकिन, प्रगतिशील परंपरा के साथ दिखते रहकर चतुर रेहटरिक का इस्तेमाल करते हुए धीरे-धीरे दक्षिणपंथी राह बनाते रहे नामवर के एक के बाद एक चलाए जाने वाले शब्द बाणों से बिंधा हुआ महसूस करते रहे हमारे जैसे लोग कैसे मुग्ध हो सकते हैं? यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है, जब उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में ही आरक्षण के खिलाफ जहर उगला था और कहा था कि इस तरह तो ब्राह्मणों-ठाकुरों के लड़के भीख मांगा करेंगे। कब, क्या बोलना है, इसमें माहिर माने जाने वाले नामवर का यह बयान मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान की तरह दिल से निकला हुआ पर पूरी तरह केलकुलेटेड बयान था। साहित्य के बहुत से सवर्णवीरों को आपसी बातचीत में उनके इस बयान पर रीझते हुए भी पाया जाता ही है।

दांत और मनुष्यता
और अंत में नामवर सिंह के दांत का दिलचस्प जिक्र यूं ही। बाबरी मस्जिद को लेकर लखनऊ खंडपीठ का फैसला आया था तो मैंने उस पर हिंदी के कुछ लेखकों से `समयांतर` के लिए प्रतिक्रियाएं ली थीं। नामवर सिंह को जब भी फोन किया, उन्होंने बताया कि उनके दांत में दर्द है। तब `दांत का निरंतर दर्द` ही `समयांतर` में उनकी प्रतिक्रिया थी। रात एनडीटीवी पर `भगवान विश्वनाथ की नगरी` के पान खाने के शौक का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इस कुटेव का दांत पर असर हुआ है, टूटा-फूटा भी है। ``लेकिन मैंने दांत नया नहीं बनवाया है। सारे बिल्कुल मेरे ही हैं। मैंने ये काम नहीं किया। नकली दांत बनवाकर जवान दिखना ये मनुष्यता का अपमान है।`` सुनकर बहुत हंसी आई। पिताजी भी याद आए जो दांतों के दर्द से कराहते रहते थे पर मॉडर्न डेंटिस्ट्री में दांत बचाने और नये बनाने के बेहतर तरीकों के नाम पर वे तरह-तरह के बहाने तलाशते थे। नामवर सिंह के मुंह में काफी दांत मौजूद हैं और मैं इसे खुशी और प्रशंसा के रूप में ही देखता हूँ पर नकली दांत बनवाकर लगवाना न जवान दिखने का ही मसला है और न मनुष्यता का अपमान है। बहुत से बुजुर्ग और कम उम्र के लोग भी डेंचर के सहारे खाना खा रहे हैं तो यह मेडिकल साइंस की प्रशंसनीय देन है।
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नामवर सिंह का चित्र `Opinion Post` से साभार।