Thursday, June 17, 2021

ज़िंदा नहीं रहने दिया गया था आम्बेडकर से प्रभावित तिलक के बेटे को

 


(मशहूर बुद्धिजीवी सूरज येंगडे की किताब `कास्ट मैटर्स` से लिया गया टुकड़ा जिसका हिन्दी अनुवाद भारत भूषण तिवारी ने किया है।)

जानकर हैरत होगी, ऐसे आम्बेडकर के एक और सहयोगी थे श्रीधरपंत तिलक जो रूढ़िवादी बाल गंगाधरपंत तिलक के बेटे थे. आम्बेडकर की सामाजिक गतिविधियों में श्रीधरपंत ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 2 अक्टूबर 1927 को पूना में डिप्रेस्ड क्लास छात्रों की कांफ्रेंस की अध्यक्षता आम्बेडकर ने की और पी.एन.राजभोज और सोलंकी के अलावा तीसरे वक्ता श्रीधरपंत तिलक थे. कांफ्रेंस के बाद पूना के नारायण पेठ में गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर श्रीधरपंत तिलक ने आम्बेडकर के सम्मान में चाय पार्टी आयोजित की.

Babasaheb Amedkar (seated, front row, third from right) with members of the Samaaj Samata Sangh in Bombay in 1927. (Inset) Shridhar Balwant Tilak, son of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak. (HT PHOTO) यह फोटो और कैप्शन HT से साभार 


इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए श्रीधरपंत ने सहभोजन के लिए `अछूत` लड़कों के गायन समूह के लिए अपने घर के दरवाज़े खोल दिए. ऐसा उन्होंने समाज समता संघ की पहल का समर्थन करने के लिए किया जो गायकवाड़ वाड़ा में ही स्थित था. उन्हें आमंत्रित कर उन्होंने समूचे समुदाय ख़ासकर केसरी-मराठा ट्रस्ट के ब्राह्मण ट्रस्टियों के विरोध की परवाह न की. उनके घर लोकमान्य निवास में एक बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ´चातुर्वर्ण्य विध्वंसक समिति´. इसकी वजह से भी उन्हें अपने रिश्तेदारों और ब्राह्मण समाज का रोष सहना पड़ा. श्रीधरपंत पर अत्यंत दबाव डाला गया और केसरी, जो उनके पिता द्वारा ही शुरू किया गया अख़बार था, में भी उनका निरंतर अपमान किया गया.


कट्टरपंथी ब्राह्मण समुदाय और केसरी-मराठा ट्रस्ट के रूढ़िवादी गुट, जिसने श्रीधरपंत को सात साल तक एक मुक़दमे में फँसाए रखा, के बढ़ते दबाव के कारण 25 मई 1928 को बॉम्बे-पूना एक्सप्रेस ट्रेन के सामने कूदकर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ली. इस घटना के लिए आम्बेडकर ने केसरी के रूढ़िवादी सवर्ण हिन्दू गुट को दोषी ठहराया जिन्हें श्रीधरपंत गैंग ऑफ़ रास्कल्स कहा करते. आत्महत्या से पहले उन्होंने आम्बेडकर को सम्बोधित एक आखिरी पत्र लिखा था जिसकी प्रति 29 जून 1928 को समता में प्रकाशित हुई थी और नीचे दी जा रही है:



यह पत्र आपके हाथों में पड़े इससे पहले ही मेरे दुनिया छोड़कर जाने की ख़बर आपके कानों में पड़ चुकी होगी. समाज समता संघ के काम को आगे बढ़ाने के लिए पढ़ेलिखे और समाज सुधारवादी युवाओं को आन्दोलन की तरफ आकर्षित करना होगा. इस सिलसिले में आपके अथक प्रयासों को देखकर मैं बेहद प्रसन्न हूँ और मुझे भरोसा है कि ईश्वर आपको यश प्रदान करेंगे. महाराष्ट्रीय युवा अगर इस उद्देश्य का बीड़ा उठा ले तो छुआछूत की समस्या महज पाँच सालों में सुलझ जाएगी. उत्पीड़ित वर्गों के मेरे भाइयों के दुख-दर्दों को अपने इष्ट कृष्णदेव तक पहुँचाने मैं आगे जा रहा हूँ. मित्रों तक मेरा शुभकामनाएँ पहुँचाइएगा.


भवदीय

श्रीधर बलवंत तिलक

25/5/28


श्रीधरपंत की मृत्यु के बारे में सुनकर आम्बेडकर ने 26  मई 1928 को जलगाँव कांफ्रेंस में उनके योगदान को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया. अपने सम्पादकीय में उन्होंने श्रीधरपंत की मृत्यु पर शोक प्रगट किया: ¨मैं श्रीधरपंत से बहुत बड़े कार्य की उम्मीद कर रहा था लेकिन अब वे नहीं हैं.¨ समाज समता संघ के साथ श्रीधरपंत का जुड़ाव बढ़ने के बाद से आम्बेडकर उनके करीब आ गए थे. बहुत जल्द ही श्रीधरपंत आम्बेडकर के नज़दीकी मित्र समूह में शामिल हो गए थे. जब  भी वे मुम्बई जाते, आम्बेडकर से ज़रूर मिलते और अगर आम्बेडकर पुणे में होते तो तो उन्हें गायकवाड़ वाड़ा में स्थित अपने निवास पर लाने की कोशिश करते. श्रीधरपंत और उनके भाई रामभाऊ तिलक का केसरी-मराठा ट्रस्ट के साथ संघर्ष बेहद बढ़ गया. दोनों भाई अपने उदारवादी नज़रिये और सामाजिक सुधारवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे. तिलक बंधुओं और केसरी-मराठा ट्रस्ट के बीच के क़ानूनी झगडे में रामभाऊ ने वकील के तौर पर आम्बेडकर की सहायता लेने पर ज़ोर दिया था. मगर दीगर कारणों की वजह से आम्बेडकर यह ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं कर पाए.


1धनंजय कीर, डॉ. आम्बेडकर: लाइफ एंड मिशन, पृष्ठ 93-94

2शत्रुघ्न जाधव, श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर (नई दिल्ली: सम्यक 

प्रकाशन, 2012), पृ. 36.

3समता, 29 जून 1928, जाधव द्वारा लिखित श्रीधरपंत तिलक और बाबासाहेब आम्बेडकर में पृ 108 पर उद्धृत

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(सूरज येंगड़े की पुस्तक ´कास्ट मैटर्स´ के चैप्टर ´ब्राह्मिन्स अगेंस्ट ब्राह्मिनिज़्म´ सब-चैप्टर ´ब्राह्मिनएक्शन´ से उद्धृत) 

 

    


Wednesday, June 9, 2021

वाम आंदोलन में भी अपने ऊपर दबंग जातियों की शक्ति महसूस करते हैं दलित - सूरज येंगडे



नव-उदारवादी धज के पूँजीवाद ने जो वायदे किए थे उनमें से अधिकतर पूरे नहीं हुए बल्कि इसने भारत के सबसे अधिक हाशिए के लोगों की मृत्युसंख्या में वृद्धि ही की. 1980 के दशक में आया नव-उदारवादी कॉरपोरेट पूँजीवाद पूँजी बाज़ार पर जाति नियंत्रण को कमज़ोर नहीं कर पाया. आर्थिक वैश्वीकरण का जहाँ स्वागत किया गया, वहीं अभिव्यक्तियों के सांस्कृतिक स्वरूप मसलन मुक्त-बाज़ार के सन्दर्भ में स्व की अभिव्यक्ति, वैयक्तिक उदारवाद और लैंगिकता, जेंडर और वर्ग जैसे सांस्कृतिक चिह्नक गहरे धँसे हुए जातिवाद को हिला नहीं पाए. पूँजीवाद के पक्ष और विपक्ष में  होने वाली बहसों ने हाशिए के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर बेहद कम असर डाला क्योंकि वे पावर डायनामिक्स का शिकार हो गईं जिसके चलते वे चीज़ें सामने आईं जिन्हें तेलतुंबड़े ‘नापाक गठबंधन’ (अनहोली अलाइंसेस) कहते हैं.


पारम्परिक तौर पर सम्पन्न और ताक़तवर जातियों ने नव-उदारवादी युग में भारत में पूँजीवादी अन्वेषण के साथ बढ़िया संगति बिठा ली है. पश्चिमी और साम्राज्यवादी शोषणात्मक पूँजी के एजेंटों के तौर पर काम करते हुए व्यापारी जातियाँ मेहनतकश वर्ग और उत्पीड़ित जाति समूहों पर नव-उदारवादी मंशा थोपती हैं. भारत में नव-उदारवाद के ख़िलाफ़ बहसों में पश्चिमी पूँजीवादी संरचनाओं पर हमला करने से पहले देशी पूँजीवादी ताक़तों से निबटने की बात शायद ही कोई करता है. भारत में वाम आन्दोलनों की बहस सीधे-सीधे पश्चिमी साम्राज्यवादी व्यवस्था को केंद्रीय समस्या साबित कर नए पूँजीवादी जाति बाज़ार में किए जाने वाले रोज़मर्रा के जाति उत्पीड़नों की अनदेखी करती है. अन्य देशों के दीगर उत्पीड़ित समूहों के सिद्धांतों (थ्योरी) और अनुभवों को उधार लेकर यह मुमकिन किया जाता है. उनके अनुभवों को भारत के उत्पीड़ितों के अनुभवों के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. इसलिए एक दलित को एशिया, अफ्रीका और नॉर्थ अमेरिका में उस जैसों के पूँजीवादी शोषण का दर्द महसूस करना होता है. वाम विमर्श में दलित कर्तृत्वहीन (एजेंटलेस) बना रहता है. होना यह चाहिए  कि जब ज़मींदारों द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न के ख़िलाफ़ दलितों को संगठित किया जाता है तब जाति संरचनाओं के स्पष्ट वर्गीकरण को शुरुआत में ही स्वीकार किया जाना चाहिए जिनके अंतर्गत सामंती समाज परिचालित होता है. बजाय इसके होता यह है कि दलित के और संघर्ष के मनमस्तिष्क से जाति को मिटा दिया जाता है. इसलिए दलित दलित होने की वजह से कष्ट भुगतता है मगर दलित के तौर पर होने वाले उत्पीड़न को महसूस करने की अनुमति उसे नहीं होती. इसके बदले उसे एक ग़ैर-दलित, ग़ैर-जाति कर्ता बना दिया जाता है जो उसके श्रमजीवी स्वत्व मात्र तक सीमित है.


दलित कर्तृत्व (एजेंसी) के हनन से ऐसी चेतना-विहीन दलित कांस्टीट्यूएंसी का जन्म होता है जो अपने समुदाय के सामाजिक बदलाव के लिए काम करने में असमर्थ है. इसकी जगह वे अपने दबंग जाति कामरेडों के हितों के लिए लामबंद होते हैं जो दरअसल अपने ही समुदाय के बचाव का काम कर रहे होते हैं - उन्हें और उनके द्वारा होने वाले जातिगत उत्पीड़न को सामने न लाकर. वे ठीकरा फोड़ते हैं काल्पनिक-अवास्तविक बाहरी शै के सिर जिस तक एक दलित की पहुँच ही नहीं. यह उत्पीड़न एक दलित की कल्पना मात्र में बरकरार रहता होता है क्योंकि केवल एक ´कामगार´ के तौर पर उत्पीड़न का अनुभव एक दलित को विरले ही होता है. वाम आंदोलन में भी दलित अपने ऊपर दबंग जातियों की शक्ति महसूस करते हैं. इसी वजह से इन्क़लाबी प्रोजेक्ट में ठोस दलित सहभागिता कभी वास्तविक रूप नहीं ले पाती. दबंग जातियों के वामपंथियों ने अपने जाति भाइयों की उत्पीड़ित जाति-वर्ग जन की क्रांतिकारी परिणतियों से रक्षा की है. एक सचेत रैडिकल आम्बेडकरी दलित सहभागिता के बग़ैर वाम आन्दोलन एक नाकाम प्रोजेक्ट और मेहनतकश तबके की सच्ची मुक्ति के परिप्रेक्ष्य में भारत के इतिहास का दुखद अध्याय है.


इस प्रकार भारत में क्रोनी लेफ़्टिस्टों का विजन मार्क्स, लेनिन और माओ द्वारा प्रस्तुत सैद्धांतिक समझ तक सीमित रहा. भारतीय समाज के दुखों को कहीं गहरे तौर पर जीने और समझने वाले देशज क्रान्तिकारियों को उन्होंने आँख मूँद कर अस्वीकार कर दिया. भारत में मार्क्सवादी फ़्रेमवर्क में जाति-आधारित पूँजीवादी शोषण पर कम ही फ़ोकस है. फुले और आम्बेडकर उपेक्षित और तिरस्कृत हस्तियाँ रही आई हैं और निहित ब्राह्मणीय राज्यव्यवस्था से भारत को उबार पाने वाली असुविधाजनक रामबाण भी.


सबआल्टर्न जातियों (दलित और अन्य उत्पीड़ित जातियाँ) के शोषण का शिरोमणि साहूकार, ब्राह्मण के साथ-साथ पहला ‘वर्ग शत्रु’ है जो हमारी चेतना पर अपनी शर्तें थोपता आया है. दलितों से मानवी गरिमा और आत्मसम्मान छीन लेने के ब्राह्मणीय विचार-आरोपण द्वारा हुई दलित दासता से इस चेतना की दूरी ने हमारे दुखों को अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया को अवरुद्ध किया और इस तरह अंततः क्रान्ति की राह में रुकावट डाली है. सबआल्टर्न जातियों के होने को पहला विद्रोही ढाँचा प्रदान करने व्यक्ति थे फुले. सामूहिक उत्पीड़ित, जिसे बड़े प्यार से उन्होंने ‘बहुजन’ का नाम दिया था, के अंतर्गत व्यापक दलित, शूद्र, मुस्लिम और सभी जातियों की महिलाओं को शामिल कर उसकी चेतना का उन्होंने विन्यास किया. फिर आम्बेडकर ने इसमें साहसिक अमल जोड़ा और मानव अधिकारों और नागरिक अधिकारों की भाषा में प्रस्तुत किया. वे इतने पर ही नहीं रुके बल्कि यह दावा करने लगे कि राजनीतिक अधिकार उनके द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के केंद्र में है जो मुख्य रूप से सामाजिक परिवर्तन और भौतिक प्रक्रियाओं से सम्बद्ध है. भारत की समस्याओं के प्रति उनकी वर्ग-आधारित एप्रोच को कम करके आँका गया और यह एक ऐसा अवसर है जो बहुत पहले चूक गया. सारी दुनिया पर और इस प्रकार आम्बेडकर पर मार्क्स का गहरा प्रभाव ज़ाहिर है अनेकों मार्क्सवादी पुस्तकों से जो उनकी लाइब्रेरी में पाई गईं.


कट्टर हिन्दू धर्म-सिद्धांतों के खिलाफ आम्बेडकर की लड़ाई और उसके साथ-साथ चलाया गया जाति-प्रेरित वर्ग संघर्ष उन्हें विशिष्ट जगह प्रदान करता है. वे एक परिष्कृत विचारक की जीती-जागती मिसाल और अंतर्विरोधों से ग्रस्त भारतीय समाज के लिए गंभीर ख़तरा थे. शायद यही वजह है कि आम्बेडकर एक ऐसी शख्सियत है जिससे सबसे ज़्यादा प्यार भी किया जाता है और नफ़रत भी. आम्बेडकर के प्रति भावनाएं, चाहे सकारात्मक हों या नकारात्मक, यथास्थिति को बदलने या बनाए रखने की इच्छा से ही उपजती हैं.


(सूरज येंगड़े की किताब ´कास्ट मैटर्स´ के चैप्टर ´दलित कैपिटलिज़्म´ सब-चैप्टर ´कास्ट इन दि निओलिबेरल एजेंडा´ से उद्धृत.)


हिन्दी अनुवाद : भारत भूषण तिवारी


Sunday, September 27, 2020

आलोचना की आलोचना : फ़ासीवाद सम्बंधी अंक पर कृष्ण मोहन की समीक्षा

 


पिछले दिनों नामवर सिंह पर हिन्दी के `विद्वानों` के ताबड़तोड़ लाइव कार्यक्रमों के दौरान किसी ने उनके संपादन में `आलोचना` का पुनर्प्रकाशन शुरू होने पर पहला अंक (फ़ासीवाद और संस्कृति का संकट') फ़ासीवाद पर केंद्रित किए जाने को उनकी प्रमाणिकता के तौर पर पेश किया था। इस अंक पर 2000 में छपी आलोचक कृष्ण मोहन की विस्तृत समीक्षा (उदारवादी भ्रमों का पुलिंदा - आलोचना का फ़ासीवादी अंक) पढ़ी। यह अंक `फ़ासीवाद संबंधी लेखों का दिशाहीन और भ्रामक ढेर` क्यों है, इस पर उन्होंने गंभीरता से विभिन्न लेखों के उदाहरण सामने रखते हुए विचार किया है। यूँ यह एक ज़रूरी बात है कि लेखक जैसा समझता है, उसे ईमानदारी से लिखे पर जैसा कि साहित्य की दुनिया का पावर स्ट्रक्चर है और जवाब में विमर्श के बजाय हिसाब चुकता करने का रिवाज़ है, एक साथ इतने सारे प्रभावशाली और फ़ितरती लेखकों से बेबाकी के साथ तीखी असहमति व्यक्त करन साहस की बात है।

बेहतर तो यह होता कि इस लेख से एक के बाद एक कई हिस्से यहाँ उद्धृत करता या पूरा लेख ही यहाँ देता। फ़िलहाल, लंबा टाइप न कर पाने की स्थिति से यह संभव नहीं है। आलोचना के फ़ासीवादी अंक में एजाज़ अहमद के एक पूर्व प्रकाशित लेख को भी शामिल किया गया था जिसे कृष्ण मोहन सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय मानते हैं और पर विस्तार से बात करते हुए अपनी असहमतियां भी जताते हैं। लेकिन खिन्नता पैदा करने वाले वे हिस्से हैं जिन्हें हिन्दी के विद्वानों के लेखों से लिया गया है। यह अंक `आलोचना` का है लेकिन जो विशेषांक लेखक संगठनों द्वारा निकाले जाते रहे हैं, उनमें भी यही लेखक अपनी फ़ासिस्ट समर्थक, कम्युनल, सेमी-कम्यूनल या सवर्ण अवधारणाओं के साथ उपस्थित रहते आए हैं और सर्व-स्वीकार्य रहे हैं। कृष्ण मोहन इस अंक के संपादक और प्रभाष जोशी के `रेनेसां पर्सन` नामवर सिंह की `मासूम` शिकायत का ज़िक्र भी करते हैं कि पटेल तो नेहरु की बात मान लेते थे पर अटल की बात आड़वाणी नहीं मानते। जसम के विचारक रविभूषण आरएसएस द्वारा ही पेश किए जाते रहे जुमले `वस्तुत; संघ परिवार जिस `हिन्दुत्व``को धर्म मानता है, वह एक जीवन-शैली है`, दोहरा रहे हैं उनके लेख से ऐसे वाक्य उद्धृत कर कृष्ण मोहन जो सवाल उठाते हैं, वे असल में हिन्दी के पूरे बौद्धिक समाज से हैं। प्रभाष जोशी फ़ासीवाद से लड़ने के लिए सनातन धर्म का सहारा लेने और संघ के स्वयंसेवकों से प्रेरणा लेने की सीख देते हैं।

खगेंद्र ठाकुर के लेखन का अद्भुत कमाल तो जलेस के `1857 पर आए विशेषांक` में देखा था। भारतेंदु की जिन पंक्तियों को फेरबदल कर रामविलास शर्मा ने 1857 से जोड़ दिया था, उनका असल रूप वीरभारत तलवार सप्रमाण हिन्दी वालों के सामने रख चुके थे पर खगेंद्र ठाकुर ने उन्हें बदले हुए रूप में ही इस्तेमाल किया। अकारण नहीं कि ऐसे झूठे उद्धरणों और विवादित अवधारणाओं से भरा वह (खगेंद्र ठाकुर का) लेख, उस अंक के कुछ बेहतरीन लेखों का प्रतिपक्ष ही था। फ़ासीवाद सम्बंधी `आलोचना` में छपे खगेंद्र ठाकुर के लेख से कृष्ण मोहन ने कुछ उद्धरण देते हुए लिखा है,-

``खगेंद्र ठाकुर और उनके भाकपाई मित्रों की यह पुरानी कमज़ोरी है कि वे शासक वर्ग से बार-बार उसका अंध-राष्ट्रवादी हथियार उधार मांगते हैं ताकि वे उनसे भी बड़े `राष्ट्रवादी` दिखें और एक ही झटके में पूरे राष्ट्र के नेता बन जाएँ।``

राजकिशोर के लेख से उद्धृत अंश देखिए- ``दुर्भाग्य यह है कि इतिहास फ़ासीवादियों के साथ है। भारत में मुस्लिम शासन के बारे में सेकुलरवादियों का नज़रिया साफ़ नहीं है। वे यह नहीं देख पाते कि शासन जैसा भी रहा हो, मूलत: एक अल्पसंख्यक शासन था। भारत की बहुसंख्या हिन्दुओं की थी, अत: यहाँ का सामंतवाद भी हिन्दू सामंतवाद होना चाहिए।``

इस पर कृष्ण मोहन टिप्पणी करते हैं-

``मध्यकाल के बारे में औपनिवेशिक इतिहास लेखन की इसी साम्प्रदायिक दृष्टि में साझा करने के कारण उदारवाद अपने को कट्टरवाद के सामने कुंठित पाता है। उसे लगता है कि एक बार इस दृष्टि को सर्वस्वीकृति मिल जाए तो वह अपने ही जैसे उदार हिन्दू मन को भूल जाने और माफ़ करने के लिए मना लेगा। उसका सरल चित्त यह नहीं समझ पाता कि वह जितनी बार इस झूठ को शिरोधार्य करता है, उतनी ही बार कट्टरवादी शक्तियों को बल प्रदान करता है। उसकी वह मांग संघ परिवार की उस बुनियादी मांग से अलग नहीं है कि अगर अयोध्या, काशी, मथुरा पर उनका दावा मान लिया जाए तो वे बाकी मसले छोड़ देंगे। सामंतवाद सिर्फ़ सामंतवाद होता है। वह हिन्दू या मुस्लिम नहीं होता। और वह अनिवार्यत: अल्पसंख्यक का शासन होता है। राजकिशोर आधुनिकता की बातें बहुत करते हैं लेकिन धर्म के परदे के पार कुछ देख नहीं पाते। उनकी उदारता उन्हें बहुसंख्यकवाद की वक़ालत तक ले जाती है जो फ़ासीवादियों का एक प्रिय तर्क है। वे इतिहास की न्यूनतम आवश्यक छानबीन भी नहीं करते वरना उनके विश्वास भी ख़ुद ब ख़ुद खंडित हो जाते। संख्या की दृष्टि से उन्हें लगता है कि शासन तंत्र में मुसलमानो का बहुमत होता होगा जबकि मध्यकाल के सबसे मजहबी माने जाने वाले शासक औरंगेजेब के समय उसके सामंतों में लगभग अस्सी प्रतिशत हिन्दू थे।``  

कृष्ण मोहन के लेख से ही हमें विष्णु खरे के इस `जागरूक समर्थन` का पता चलता है - ``सिनेमा, टी.वी. में भारतीय मानव-मूल्य बनाए रखने का बीजेपी का नारा भी प्रबुद्धता से फ़ासिज़्म-विरोध के पक्ष में लेने में कोई हर्ज नहीं है। उनका हिंसा और सेक्स में डूबी अमेरिकी फिल्मो के विरोध का हमें जागरूक समर्थन करना चाहिए।``

खरे के इस आह्वान पर कृष्ण मोहन लिखते हैं, ``इसे कहते हैं प्रबुद्धता और जागरूकता। सिनेमा में `भारतीय` मूल्यों को बचाने के भाजपाई नारे का समर्थन! हिंसा और अश्लीलता अमरीकी मूल्य हैं, भारतीय समाज में हिंसा और अश्लीलता कहाँ। भारतीय संस्कृति के स्वयंभू, लंपट ठेकेदारों के सुर में सुर मिलाने वाले खर साहब किसे धोखा देने चले हैं। सवाल यह है कि भारतीय फ़ासीवाद के सांस्कृतिक एजेंडे का समर्थन करने वाला यह लेख कहीं आलोचना की संपादकीय नीति का हिस्सा तो नहीं है।``

जाहिर है कि इस अंक के संपादक नामवर सिंह की नीति तो कहीं ज़्य़ादा भयानक रही ही है। खरे के बाद के हुसेन पर लिखे गए हमलावर लेख को `अरे, उन्हें क्या हुआ` कहकर हैरान होने वालों को इस टिप्पणी में उनके दिल-दिमाग़ को समझने की कोशिश करनी चाहिए। मीर पर उनके लिखे को भी। इस टिप्पणी में उनके तर्क के आधार पर तो यह भी लगता है कि वे आज होते तो बॉलीवुड में दीपिका वगैराह के ख़िलाफ़ चल रही कार्रवाइयों के `जागरूक समर्थन` में भी खड़े मिल सकते थे।

भगवान सिंह हिन्दी के वामपंथियों के प्रिय लेखक रहे हैं और अपने खुले साम्प्रदायिक लेखन के बावजूद अभी भी हैं। नामवर के फ़ासीवाद सम्बंधी अंक में वे न हों और अपने इसी रंग में न हों तो इस अंक की सार्थकता ही भला क्या होती? कृष्ण मोहन लिखते हैं-

``भगवान सिंह ने अपने लेख में मार्क्सवाद को दुनिया का सबसे नया, वैज्ञानिक और प्राधिकारवादी धर्म माना है तथा `एक ही सामाजिक वातावरण में उपजे होने के कारण` इसे ईसाइयत औऱ इस्लाम के समतुल्य कहा है। साम्प्रदायिकता की आलोचना करने के लिए उन्होंने मार्क्सवादियों की खिंचाई की है। उनका ख़याल है कि इसी वजह से साम्प्रदायिक पार्टियों की ताक़त बढ़ी है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को वे दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं, लेकिन `राजनीतिक लाभ` के लिए उसकी बरसी मनाने को उससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण। वे मुसलमानों को भारत में अल्पपसंख्यक नहीं मानते और चिंता व्यक्त करते हैं कि अगर यही रवैया रहा तो भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे। यह लेख शुरू से अंत तक ऐसी ही भ्रामक अवधारणाओं और आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी से भरा पड़ा है।``

असल में भगवान सिंह के लेख की ये अवधारणाएं और `आत्ममुग्ध लफ़्फ़ाज़ी` उनकी अपनी हैं ही नहीं। `मार्क्सवाद भी ईसाइयत और इस्लामियत के समतुल्य धर्म है` या `भारत में ख़ुद हिन्दू ही अल्पसंख्यक हो जाएँगे` जैसी बातें आरएसएस के प्रचारकों के `बौद्धिकों` में प्रमुखता से बताई जाती रही हैं। यहाँ तक कि ऐसे वचनों की कवरेज मैंने ही कई बार की है। यह बात अलग है कि हिन्दी के वामपंथी कवि-लेखक यह जानना-मानना नहीं चाहते हैं।

एक ज़माने के वामपंथी और साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यशालओं के आयोजक पुरुषोत्तम अग्रवाल इन दिनों मुख्य रूप से कबीर विशेषज्ञ हैं। नामवर सिंह पर लाइव श्रृंखला में ही कुछ महीने पहले रामजन्मभूमि शिलान्यस की वेला में उन्होंने घोषणा की थी कि `गुरुजी` की इच्छा के अनुरूप उनकी अगली किताब तुलसी पर होगी। यूँ, कबीर भी उनके लिए तुलसी ही हैं। इस बात को आलोचना के फ़ासीवाद अंक के कबीर खंड में छपे पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेख पर कृष्ण मोहन की यह टिप्पणी पढ़कर समझा जा सकता है-

पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर की कविता को दलितों की पहचान के साथ जोड़ने को अस्मितावाद क़रार देते हुए उसे मूलत: आध्यात्मिक अनुभव की कविता कहते हैं। ``कवि कबीर की संवेदना का सत्य है वह अमरलोक जिसकी कसौटी पर वे जगत के तथ्य को कसते हैं…इस असीमित ब्रह्मांड में अपनी असीमित सत्ता के साथ होने का अनुभव;इस सीमित सत्ता के निस्सीम ब्रह्मांड के साथ सम्बद्ध होने की महिमा का अनुभव। ` `शंभुनाथ ने अपने लेख में समग्र का अंश होने के जिस अनुभव को सामाजिक अनुभव माना है और कबीर की कविता की रहस्यवादी व्याख्या से इनकार किया है, उस श्री अग्रवाल अध्यात्म की चाशनी में लपेटते हैं। इसका नतीज़ा निकालते हुए वे कहते हैं, ``कबीर अपने ख़ास दो-टूक ढंग से बताते हैं कि अनुभव का अपरिहार्य, अंतिम सत्य है मृत्यु। एक नाम-अनाम ही नित्य है बाक़ी सब अनित्य।`` श्री अग्रवाल ने अपने लेख में जिन यथास्थितिवादी आचार्यों को बार-बार कबीर निंदा का दोषी ठहराया है उनका भी विरोध कबीर के सामाजिक सरोकारों से ही था। हाँ, वे इतने कुशल अवश्य ही नहीं थे कि कबीर के नख-दंत तोड़कर उन्हें अपने ब्राह्मणवादी प्रोजेक्ट में शामिल करने की सोचते।

`परख` में छपा यह लेख `आलोचना` में छपता तो क्या हिन्दी विद्वानों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों का नज़रिया अपने इन विद्वानों को लेकर कुछ अलग होता? नहीं, क्योंकि ऐसी बातें या तो कही नहीं जातीं और कही जाती हैं तो उन पर चर्चा नहीं की जाती। यह भी कह दिया जाता है कि ऐसी बातें लड़ाई को कमज़ोर करती हैं। हालांकि, रघुवीर सहाय की पंक्ति ``अगर वही हो तुम जिससे तुम लड़ते हो तो लड़ते क्यों हो`` उनके सामने होती है। इस लेख का महत्व यही है कि बातें कही ज़रूर गई थीं। नामवर सिंह और उनके संपादन में निकले उस अंक की याद में `आलोचना` के वर्तमान संपादक चाहें तो इस लेख को अब प्रकाशित कर सकते हैं।

Thursday, August 13, 2020

अमर शायरों की सफ़ में है राहत इंदौरी की जगह -धीरेश सैनी

 


अपनी विद्वता के `आइवरी टावर्स` में बैठे कवि-बुद्धिजीवी जो भी समझें, पर सच यही है, इत्ते बड़े मुल्क में, एक सीधी सी बात को ऐसे खरेपन से कह देना, राहत इंदौरी के ही हिस्से में आया था। हिर्स करो, पारसाई भी तो हासिल करो। बे-शक, उन्हें आप लोगों के मेयार से नहीं तौला जा सकता है, पर वे जिस सफ़ में हैं, उस में वे ग़ैर-मामूली शायर हैं, जिनके पास प्रतिरोध की कोई एक ही सही, पर ला-ज़वाल लाइन है।


शायर राहत इंदौरी ने मर कर बहुत से लोगों के लिए अजीब मुश्किल पैदा कर दी है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इस शायर को लेकर ऐसी दीवानगी क्यों है। दीवानगी, एक अलग चीज़ है जो बहुत सारे घटिया और जनद्रोहियों को भी अक्सर नसीब हो जाया करती है। राहत इंदौरी से परेशानी की वजह कुछ और है। इसमें कोई शक नहीं है कि वे मुशायरों में बेहद पॉपुलर थे। उनके अपने लटके-झटके थे, एक पूरा ड्रामाई अंदाज़ भी था जो बहुत से लतीफ़-नफ़ीस लोगों के लिए झुंझलाहट का बाइस भी हुआ करता था। राहत इंदौरी को पॉपुलर स्पेस में ही बेतरह याद किया जा रहा होता, तो मेयारी अदीबों को तकलीफ़ न हुई होती। रंज यही है कि बुद्धिजीवियों को भी इस शायर के जाने का इतना ग़म क्यों है। हालत यह है कि एक तरफ़, सोशल मीडिया पर शायर से मुहब्बत करने वाले हैं तो दूसरी तरफ़ उन्हें लेकर ज़हर उगला जा रहा है। इसी के बीच में ऐसे झुंझलाए बौद्धिक स्वर हैं जो कह रहे हैं कि बौद्धिक हलक़े में राहत को इतना महत्व क्यों या उनकी क्या साहित्यिक औक़ात।


साहित्यिक श्रेणियों में राहत इंदौरी का स्थान तय करने की हड़बड़ी वाले लोग असल में भूल कर रहे हैं। वे हल्कापन कहें या प्रतिक्रियावाद कहें या मामूली- ग़ैर मामूली की बहस में उलझे रहें, इस शायर को उनकी एक ग़ज़ल ने, एक शेर ने या एक लाइन ने ही अमरत्व प्रदान कर दिया है। इतने बड़े मुल्क में यह कहना उन्हीं के हिस्से में आया था - ``सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में/किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है``। एक सच को कहने की यह सलाहियत, यह मोराल और यह बेधड़क अंदाज़ उन्होंने ही पाया था। इस लिहाज़ से उनका कोई हमवार है तो वो हबीब जालिब हैं। आंदोलनों में उनकी लाइनें हबीब जालिब की लाइनों के साथ ही दिखाई देती रहेंगी।


बे-शक, हबीब जालिब की तरह राहत इंदौरी लाठियां खाते हुए सड़कों पर नहीं थे, न उनका वक़्त जेलों में बीता था, पर ऐसे अशआर के लिए दिल को जिस बेकली और जिस अज़ीयत से गुज़रते रहना होता है, वे उसी में जी रहे थे। वे 1950 के शुरुआती दिन पैदा हुए थे और एक मुसलमान होने के नाते 11 अगस्त 2020 तक अपने शहर और अपने मुल्क में क्या कुछ देखते-महसूस करते हुए नहीं गए? बात यह थी कि जो बात एक मुसलमान के लिए कहनी मुश्किल होती है, उसे वे बेख़ौफ़ कहते रहे। यह समझने के लिए एक साफ़ दिल ज़रूरी है। 1992 के बाद वे एक शेर पढ़ा करते थे- ``टूट रही है हर दिन मुझमें एक मस्जिद/इस बस्ती में रोज़ दिसम्बर आता है``। हर दिन का यह जो टूटना है, वे इसे कभी कलंदराना अंदाज़ में, कभी सिर्फ़ अफ़सोस में और कभी रेटरिक और चुनौती में तब्दील कर शायरी में दर्ज कर अवाम के बीच ले जाते थे। ज़ुल्म-ओ-सितम के बीच बेसहारा छोड़ दिए गए लोगों के लिए यह कितनी बड़ी राहत होती थी, कितना बड़ा सहारा, यह महसूस करने के लिए शास्त्रीय आलोचकों को हिक़ारत छोड़ कर मज़लूमों की भीड़ तक जाना पड़ेगा। यह बात अलग है कि वे साहित्य के मसीहाओं से भी न यह मांग करते हैं, न उम्मीद, न कोई ऐसा विद्वान उन्हें किसी महान शायर के रूप में देख रहा था। जो उन्हें करना था, वे खुद ही कर रहे थे, एक पॉपुलर स्पेस में कर रहे थे और असरदार ढंग से कर रहे थे। उन का एक शेर है - ``हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे / कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते``। उनके मक़ाम को तय करने के लिए ज़ल्दी में लग रहे हिन्दी के बुद्धिजीवी चाहें तो उनके इस शेर को देख सकते हैं और सोच सकते हैं कि अपनी `अच्छाइयों` के साथ वे लोग कैसे-कैसे खल-पत्थरों को राह के पहाड़ जैसे महानायक स्थापित करने में मदद करते रहे है।



राहत इंदौरी के पास और शायरी किस स्तर की है, ऐसे सवालों में सिर खपाने के बजाय मुशायरों की यादों को ताज़ा कर लेना चाहिए। हिन्दी कवि सम्मेलनों की भी। हिन्दी कवि सम्मेलन पूरी तरह फूहड़ चुटकुलों और उन्मादी तुकबाजियों के अड्डे बनते गए पर मुशायरों में शायरी का एक स्तर हमेशा क़ाएम रहा। यही वज़ह है कि एक पॉपुलर और एक प्रोपर शायर के बीच में एक फ़र्क़ होते हुए भी हिन्दी कविता की दुनिया जैसा फ़र्क़ कभी नहीं रहा। बाकी, हिन्दी कवि सम्मेलन के उन्मादी आह्वानों को लेकर जोश में रहने वाले लोग मुशायरों में सियासी सवाल उठा देने वाले एकाध शायर को कट्टर या साम्प्रदायिक बताते घूमा ही करते हैं। हिन्दी की लिबरल दुनिया के बीच यह मर्ज़ इस हद तक न भी हो पर दुचित्तेपन या बेलैंसवाद के रूप में तो वहाँ भी पलता ही रहा है।


“मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना/लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना", इस शेर को जिस धूम के साथ राहत इंदौरी की हिन्दुस्तानियत के प्रमाण की तरह पेश किया जा रहा है, असल में वह भी एक बीमारी का ही नतीजा है। बेधड़क और बेख़ौफ़ लगने वाले राहत इंदौरी को भी ऐसे शेर कहने पड़ते रहे। यह वही विडंबना है जिसमें एक मुसलमान को हमेशा जीना पड़ता है। उनके इस शेर को सेकुलर बुद्धिजीवियों ने भी उत्साह से कोट किया है । बाज़ लोगों ने तो फोटोशॉप के जरिये शायर की तस्वीर में माथे पर इसे चिपका भी दिया।


आगे मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले मूलत: गाज़ीपुर निवासी युवा बुद्धिजीवी सुनील यादव की फेसबुक वॉल से उनकी एक पोस्ट उद्धृत कर रहा हूँ-

(राहत इंदौरी साहब की ये पंक्तियां मुझे बिलकुल पसंद नहीं हैं, जैसे महान कथाकार गुलशेर खान शानी को राही मासूम रज़ा का बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय को गुदगुदाने वाली सेकुलरिज्म पसंद नही आता था। शानी ने लिखा है कि ''अगर आप भारतीय मुसलमान हैं और चाहते हैं कि आपकी बुनियादी ईमानदारी पर शक न किया जाए तो देश प्रेम और राष्ट्रीयता का झुनझुना बहुत ज़रूरी है ।’’ शानी ने इसी छद्म सेक्युलरिज़्‍म के लिए राही मासूम रज़ा की आलोचना करते हुए लिखा था कि ''भूख, भय, असुरक्षा, आतंक, नफ़रत और विभेदीकरण जैसे सच आपके अपने सच नहीं थे-ये रूमान के पंखों से उड़कर ऊपर से उतारे हुए दूसरे की सोच थे। विभाजित भारत में मुसलमान के लिए यह बहुत चमकीला और अभेद्य कवच होता है। उस पर कोई संदेह नहीं करता। वह सेक्यूलर कहलाने लगता है। उसे राष्ट्रीयता का प्रमाण पत्र अपने आप मिल जाता है। बहुसंख्य‍क समाज में अल्संख्यसक की तरह जनमने और जीने की नियति में ऐसे कवच बहुत काम आते हैं मासूम भाई।’’ वास्तव में ऐसी सेक्यूलर विचारधारा जो जीवन की वास्तविकता से कटकर सेक्यूलर होने का डंका बजाती है, वह कहीं न कहीं व्यापक स्तर पर हिंदू सांप्रदायिकता को गुदगुदाने का काम ही करती है। किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के राष्ट्रीय अस्मिता के सवाल उसके अपने अंतर्विरोधों के भीतर ही सुलझाए जा सकते हैं। इसीलिए शानी लिखते हैं कि ''अगर दस-पाँच पीढ़ियों से हमारा परिवार हिंदुस्तान में रह रहा है तो मैं उतना ही राष्ट्रीय हूँ जितने कि आप। फिर क्या ज़रूरी है कि आप तभी मुझे अपनाएंगे जब मैं आपके कानों में राष्ट्रीयता का झुनझुना बजाऊँ। यदि मैं सांप्रदायिक हूँ तो आप मुझसे ज्यादा सांप्रदायिक हैं जिन्होंने मुझे सांप्रदायिक बनाया है।`` दरअसल राहत इंदौरी साहब कई मौकों पर इस तरह की बातें लिख जाते थे। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि मैं राहत इंदौरी साहब का कोई विरोधी हूँ। वे मेरे प्रिय फ़नकार रहे हैं, जैसे राही मासूम रज़ा मेरे प्रिय फ़नकार रहे हैं। - सुनील यादव की पोस्ट)


(जनचौक वेबसाइट पर प्रकाशित होने के बाद वहाँ से साभार)

Sunday, August 9, 2020

रैना महाराज के हाथों प्रेमचंद का शुद्धिकरण!

प्रेमचंद की एक बड़ी मज़े की कहानी है, 'बड़े भाई साहब'। थियेटर वालों को भी यह काफ़ी पसंद रही है। दो अभिनेताओं के द्वारा बिना किसी तामझाम के, बल्कि बिना किसी प्रॉप के, इस कहानी के शानदार मंचन भी देखे हैं और इन दिनों एक्सप्लोर के नाम पर ज़बरन कुछ भी जोड़कर टीम और तामझाम वाली प्रस्तुतियां भी। दूरदर्शन आर्काइव्ज के सौजन्य से भी इस कहानी की नाट्य प्रस्तुति बल्कि फिल्मांकन यूट्यूब पर उपलब्ध है। मशहूर रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी एम. के. रैना के निर्देशन में।

'बड़े भाई साहब' कहानी के बारे में हिन्दी के पाठक जानते ही हैं। शहर में पढ़ने के लिए भेजे गए दो भाइयों में बड़ा किताब से चिपका रहने वाला गम्भीर युवक है पर फेल होता जाता है। छोटा लापरवाह, खेल-कूद में रमने वाला मगर होशियार है और इम्तिहान में अव्वल आता है। बड़े भाई साहब पर बड़े होने के नाते छोटे को नसीहतें देते रहने और बिगड़ने से बचाए रखने की जिम्मेदारी है। तंज़-ओ-मिज़ाह की शैली में लिखी गई यह कहानी आज भी जीवंत है। रैना ने दूरदर्शन के लिए इस कहानी पर जो कुछ तैयार किया है, उसकी क्वालिटी की बात छोड़ कर उनकी कल्पना की उस उड़ान को देखते हैं जो प्रेमचंद की  कहानी के साथ भद्दे मज़ाक़ की तरह है। रैना ज़बरन कुछ दृश्य अपनी तरफ़ से ठूंसते हैं। वे जो स्कूल पेश करते हैं, वह कहानी से मेल नहीं खाता। बेहतर होता कि वे किसी ज़िले के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में शूटिंग कर लेते। लेकिन यह इतनी बड़ी बात नहीं है। बात यह है कि रैना स्कूल प्रार्थना सभा का दृश्य क्रिएट करते हैं और पूरे गायत्री मंत्र का पाठ कराते है।

प्रेमचंद की कहानी से कहीं अहसास नहीं होता कि विद्यार्थी बंधु किसी आर्य समाज के स्कूल के विद्यार्थी हैं। कहानी ऐसे किसी 'धार्मिक-आध्यात्मिक' उद्देश्य का संकेत तक नहीं करती है। इस दृश्य का कहानी के साथ कोई मेल भी नहीं है। फिल्मांकन में विधा के लिहाज से छूट की मांग अक्सर की जाती है पर ऐसा भी कोई तर्क यहाँ महसूस नहीं होता। तो फिर रैना को गायत्री मंत्र का पाठ कराने की क्या खुड़क उठी होगी? प्रेमचंद को ज़रा आध्यात्मिक टच देना चाहते होंगे? कहानी में शिक्षा व्यवस्था को महान भारतीय आर्य संस्कृति से जोड़कर संदेश देना चाहते होंगे? प्रेमचंद का, उनकी कहानी का या उनके बहाने भारतीय समाज का सांस्कृतिक परिष्कार करना चाहते होंगे? आखिर, प्रेमचंद सहज पहुँच वाले कहानीकार हैं और दूरदर्शन इस पहुंच की रेंज को बहुत बढ़ा देता है। रैना इस तरह इस रेंज का क्या इस्तेमाल करना चाह रहे होंगे?

पिछले कई दिन मैं इस बारे में सोचता रहा हूँ। एनएसडी से निकले रैना लेफ्ट के ख़ासकर सीपीआइएम के सांस्कृतिक संगठनों के प्रिय इंटलेक्चुअल और संस्कृतिकर्मी हैं। एक तरह से लेफ्ट-एडॉप्टेड। 'सहमत' के तो मुख्य चेहरों में से माने जाते हैं। 'सहमत' द्वारा ज़ारी किए गए प्रेमचंद के पोस्टरों का उपयोग उन्होंने अपने इस कार्यक्रम में भी किया है। वे प्रेमचंद का ऐसा अपमान क्यों करेंगे?

आज मैंने यूँ ही गूगल पर खोज़ कर उनका परिचय पढ़ा। महाराज कृष्ण रैना, कश्मीरी पंडित। तो मसला संस्कारों का है जो प्रेमचंद को भी अपने रंग में रंगना चाहते हैं? 'बड़े भाई साहब' की शुरुआत में डायरेक्टर एमके रैना से पहले दो और प्रमुख सहयोगी रैना लिखे हुए आए। एक जोशी, एक झा और एक शर्मा। तो क्या यह ब्राह्मण आर्टिस्ट्स का ब्राह्मणद्रोही कहे गए प्रेमचंद से अपनी तरह का बदला है? हेजेमनी ऐसे ही काम करती है।

एक अकेली प्रस्तुति, हालांकि भयानक, को लेकर मैं शायद न लिखता। लेकिन, आज रैना के ही निर्देशन में 'दूरदर्शन' के ही लिए तैयार की गई 'मंत्र' कहानी की प्रस्तुति देखी तो लगा कि यह निश्चय ही प्रग्रेसिव रैना के ब्राह्मण संस्कारों का ही मसला है। 'मंत्र' कहानी में डॉ. चड्ढा एक ग़रीब आदमी के बीमार बेटे को अपने खेलने के वक़्त का हवाला देकर देखने से इंकार कर देता है। ग़रीब दंपती की सात बेटों में से अकेली जीवित बची यह संतान भी मर जाती है। एक वक़्त आता है, जब डॉ. चड्ढा के जवान बेटे कैलाश को साँप डस लेता है और उसे बचाने के सारे उपाय बेकार हो जाते हैं। जिस ग़रीब आदमी के मरणासन्न बेटे को कभी डॉ. चड्ढा ने एक नज़र देखने तक से मना कर दिया था, वही 'भगत' अपनी 'विद्या' से चड्ढा के बेटे को बचा लेता है। 

मंत्र फूँक कर सर्प दंश के इलाज के नाते कहानी पूरी तरह अवैज्ञानिक है और यह सवाल भी उठता है कि कहानी एक ऐसे अंधविश्वास को मज़बूत करती है जो लोगों की जान लेता है। बहरहाल, बेहद ख़ूबसूरती से लिखी गई यह कहानी मनुष्य के अंतर्द्वंद्व को दिखाती है और उसकी अच्छाई को स्थापित करती है। 

सभी जानते हैं कि ब्राह्मणों की 'विद्या' के समानांतर झाड़-फूंक कमज़ोर तबकों की 'विद्या' रही है। पिछड़े-दलित तबकों के ये 'भगत' सभी इलाक़ो में रहे हैं। इनके 'मंत्र' वेदों-शास्त्रों के 'मंत्र' नहीं होते थे। शास्त्रों के मंत्रों के उच्चारण की उन्हें अनुमति भी नहीं थी। कहानी में 'भगत' कहारों से पानी मंगवाने के लिए कहता है। कैलाश की प्रेमिका मृणालिनी भी कलश से पानी ढोती है। भगत मंत्र पढ़ता है और कोई जड़ी कैलाश के सिर पर रखता है। 

रैना के यहाँ यह दृश्य विशुध्द ब्राह्मणवादी अनुष्ठान में बदल जाता है। पानी का काम तो एक लोटे से चल जाता है। भगत के हाथ में आरती का एक भव्य थाल सा पकड़ा दिया जाता है जिसमें ज्योति और धूपबत्तियां प्रज्ज्वलित हैं। भगत इसे लिए कैलाश की परिक्रमा करता है। इस दौरान पीछे से मंत्रोच्चार होता रहता है। वैदिक मंत्रोच्चार, इस दृश्य का जो कहानी से विपरीत अनुष्ठान है, सबसे प्रभावी हिस्सा है।

वही सवाल, रैना ऐसा क्यों कर रहे हैं? मैं तो वही जवाब समझता हूँ जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है। सवाल यह है कि प्रग्रेसिव हलकों में सरकारी पैसे से ये कैसी प्रगतिशीलता फैलाई जा रही थी। यब सवाल आप उस प्रग्रेसिव सांस्कृतिक धारा से पूछिए जिसकी ग्रांट्स तक पहुंच थी और जिसके आइकन ऐसा कर रहे थे।

-धीरेश

Sunday, August 2, 2020

अपने विद्वेषी पूर्वजों के मोह में धूर्तता कर रहे हैं अपूर्वानंद?

पिछली पोस्ट से आगे 
अपूर्वानंद से बात कर रहे युवकों ने एक सीधे सवाल के जवाब में `कलाकार के अपने भीतर रहने` जैसी तमाम बातें झेलने के बाद फिर से अपने सवाल पर लौटने की कोशिश की। दब्बूपन से ही सही पर अपना सवाल और साफ़ करने की कोशिश करते हुए मेजबान युवा ने पूछा, ``…हम लोग एक्चुअली सवाल के जरिये जानना चाहते थे कि जहाँ कुछ लोग इस पर सवाल उठाते हैं कि वो एक फेक राष्ट्रवाद था, उन्होंने क्यों लिखा, लोग ये देखना भूल जाते हैं कि उस वक़्त और भी लेखक थे जो बिल्कुल जैसा आपने कहा, खुद में जीकर, आर्ट में छुपकर जो उस समय की सरकार थी, उस समय अंग्रेज थे, उनको बढ़ावा देने वाली, उस समय की जो पार्टी इन्वॉल्व थी, उनको बढ़ावा देने वाला लिटरेचर लिख रहे थे…``
सवाल में और भी तमाम बातें थीं पर शायद अपूर्वानंद के सीने में लगने वाली बात यही थी। वे बोले, देखिए पहले तो हम इसको समझ लें कि ऐसा शायद ही कोई लेखक था जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए काम कर रहा हो। ब्रिटिश हुक़ूमत के बारे में हम अभी जैसा सोचते हैं, उस वक़्त के सारे लोग उसी तरह नहीं सोचते थे। यह कहकर अपूर्वानंद का हृदय अपने `पूर्वजों` से एकमेक होने लगा और वे मुग़ल सल्तनत में जा पहुंचे। अपूर्वानंद बोले, जैसे मुग़लिया-मुग़ल सल्तनत थी  या कोई और राज्य, वो तो आख़िर राज की ही चीज़ थी। बादशाह की चीज़ थी। उसमें जनता की तो भागीदारी नहीं थी। फिर उन्होंने तुलसी द्वारा मंथरा के मुँह से बुलवाई गई उस मशहूर पंक्ति का सहारा लिया कि कोई भी नृप हो, हम को क्या फ़र्क़ पड़ता है। अपूर्वानंद बोले कि मैं तो तय नहीं कर सकता कि राज्य कैसा हो। तो मुग़ल बादशाहों की जगह अगर अंग्रेज आ गए तो उसे हमारे गाँव की ज़िंदगी, बाकी ज़िंदगियों पर बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ा।
यह एक ऐसा आदमी बोल रहा था जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी विभाग का प्रोफेसर है और जिसने हिन्दी के बाहर अपनी अच्छी-ख़ासी नेटवर्किंग करके अपनी पहचान एक बड़े सुलझे हुए विद्वान की बना रखी है। आख़िर उसे यह बताने में क्या दिक्कत थी कि प्रेमचंद राष्ट्रीय आंदोलन में घुसे हुए थे। मुग़ल शासन और अंग्रेजी राज के बीच 1857 की क्रांति भी हुई थी। जनता में गहरा उबाल था और उसे राजनीतिक नेतृत्व भी मिल रहा था। आंदोलन की भी कई धाराएं थीं और अंग्रेजों के पिट्ठुओं की भी जमात थी। हिन्दी लेखक भी थे जो अपूर्वानंद जैसी ही बातें करते थे और मुगल सल्तनत जैसे धूर्त तर्कों के जरिये अंग्रेजों के राज को फायदा पहुँचाने वाली साम्प्रदायिक और विद्वेषी चालें चला करते थे। प्रेमचंद ऐसे अभियानों से भी गुत्थमगुत्था थे। अपूर्वानंद ने धूर्तता और निर्लज्जता का अपूर्व परिचय देते हुए पहले मुगल काल में छलांग लगाई और फिर राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ही चल रहे समाज सुधार आंदोलनों को सवाल के बरक्स खड़ा करने लगे। राजा राममोहन राय और ईश्वर चंद्र विद्या सागर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि बाल विवाह समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करने या विधवा विवाह शुरू करने की प्रक्रिया अंग्रेजी राज के बाद लोगों ने उनकी सहायता से ही शुरू की। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के साथ थे या नहीं थे, इस तरह देखने से महात्मा फुले, रमाबाई, आंबेडकर आदि के साथ अन्याय होगा। सवाल को उसकी जगह से हटाकर कहीं और ले जाने के पीछे अपूर्वानंद का मकसद क्या था? हिन्दी में प्रेमचंद अपने लेखन के जरिये राष्ट्रीय आंदोलन में मुब्तिला थे और उनके समकालीन क्या कर रहे थे या नहीं कर रहे थे, इस पर बात करने के बजाय सवाल को ही संदिग्ध बनाकर जो ओट लेने की कोशिश अपूर्वानंद ने की, वह इतनी धूर्तता भरी थी कि समझ तो बातचीत कर रहे युवा भी गए होंगे पर अपने ही सीनियर्स के द्वारा गोबर को देवता बना कर खड़ा कर देने की वजह से बोल नहीं पा रहे थे।
क्या मेजबान युवाओं का सवाल और अपूर्वानंद के जवाब में कोई तअल्लुक़ बनता है? अगर प्रेमचंद राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा थे तो क्या वे समाज सुधार आंदोलनों या बराबरी के दूसरे संघर्षों के ख़िलाफ़ खड़े थे या अगर उनके कोई समकालीन विभाजनकारी राह पर चलकर राजसत्ता को फायदा पहुँचा रहे थे तो क्या इसलिए कि राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आंबेडकर, फुले, रमाबाई आदि शख़्सियतें विभिन्न मसलों पर सक्रिय थीं? प्रेमचंद के यहाँ तो उनकी समझ और सीमाओं के साथ सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, साम्प्रदायिकता, स्त्रियों की स्थिति आदि सवाल केंद्रीयता पा रहे थे। राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भागीदारी का मतलब भी इन सभी बातों से मिलकर बनता है। अपूर्वानंद को बताना चाहिए था कि हिन्दी में वे कौन लोग थे जो साम्प्रदायिकता, छुआछूत, स्त्री शोषण आदि मसलों पर प्रेमचंद्र के ही विरोध में खड़े थे। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनके वे कौन पूर्वज थे जो बाल विवाह और विधवा विवाह का उग्र विरोध कर रहे थे। हिन्दी की गौरवाशाली परंपरा के ज़िक्र से उन्हें सांप क्यों सूंघ गया और विभाजनकारी `पुरोधाओं` के बचाव में वे शातिराना कुतर्कों पर क्यों उतर आए? और अपूर्वानंद फिर से उसी ज्ञान पर लौट आए कि प्रेमचंद की दिलचस्पी ज़िंदगी में थी। लोग कैसे जी रहे हैं, वे बहुत रुचि के साथ देख रहे थे और उनका चित्रण करने की कोशिश कर रहे थे। उस जीवन के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास कर रहे थे।

अपूर्वानंद ने प्रेमचंद की कहानी `मंदिर और मस्जिद` पर चर्चा करते हुए अज्ञेय वगैराह के हवाले दिए और कहा कि प्रेमचंद को इंसानियत की अच्छाइयों में यक़ीन है। कोई अपने धर्मस्थल की नहीं बल्कि दूसरे के धर्मस्थल की भी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त न करे, खून खौल उठे। अगर ऐसा हो सकता है तो आप पूरे इंसान हैं और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो आप की इंसानियत में कुछ कमी है। यह है ज़िंदगी का वो पैमाना है जो प्रेमचंद पेश करते हैं।  लेखिका सुसेन का हवाला देकर उन्होंने कहा कि इतना ऊंचा पैमाना जिस पर खरा उतरना मुमकिन न हो, उससे लोग चिढ़ जाते हैं और कहते हैं कि ऐसा करने वाला या तो मूर्ख है या इलीट। इस से वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों लोग चिढ़ जाते हैं। आखिर, अपूर्वानंद अपने इन दिनों के अपने मुख्य एजेंडे पर आए और बोले कि (बहुत लोग मानते हैं) जो मेरे मुताबिक नहीं होता तो उसे मारना ही पड़ेगा न! मेजबान युवा ने मूर्खता से हामी में सिर हिलाते हुए कहा, और कोई रास्ता ही नहीं है। अपूर्वानंद ने कहा कि सत्ताएं निरंकुश हो जाती हैं, वो लेनिन की हों, स्टालिन की हों, माओजेजोंग की हों या हिटलर की हों। वे विश्वास करतीं हैं कि मैं जिस तरह देख रहा हूँ, आपको जिस ढांचे में डाल रहा हूँ, आप बस वही हैं। चूंकि मैं अच्छा हूँ और आप अच्छे नहीं हैं तो आपको खत्म होना चाहिए। प्रेमचंद कहते हैं कि मनुष्य वह है जिसको अहसास है कि वह अधूरा है…।
तो इस धूर्तता भरे प्रवचन के आयोजन के लिए और ऐसे धूर्तों के लिए सीढ़ी बनते रहने वाले वाम बुद्धिजीवियों को बधाई देनी चाहिए?
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