Saturday, April 27, 2019

समझौता एक्सप्रेस: न्याय की गाड़ी पटरी से कैसे उतरी?- धीरेश सैनी

`हालांकि ऐसा हो सकता है कि उनका मामला लंबा खिंचे लेकिन उन्हें जरूर रिहा कर दिया जाएगा।`
`द कैरवैन` में फरवरी 2014 में छपी लीना रघुनाथ की स्टोरी के मुताबिक असीमानंद ने उनके साथ इंटरव्यू में आतंकी गतिविधियों में अपनी संलिप्तता और इस बारे में आरएसएस लिंक की बात स्वीकार करने के साथ यह उपरोक्त पंक्ति भी बोली थी। स्वामी असीमानंद को समझौता एक्सप्रेस विस्फोट केस में भी एनआईए कोर्ट ने 21 मार्च 2019 को बरी कर दिया है। इस केस के चारों आरोपियों असीमानंद, कमल चौहान, राजिंदर चौधरी और लोकेश शर्मा के बरी हो जाने के साथ ही आतंक की इतनी बड़ी वारदात `अनसुलझी` रह गई है। लेकिन, इस `राष्ट्र-राज्य` और सरकार के लिए इस केस की शुरुआती जांच से खड़े हुए सवाल जस के तस बरक़रार हैं। इनकी वजह से ही एक नया सवाल पैदा होता है कि असीमानंद और इस केस के दूसरे आरोपी बरी हुए या सरकार के इशारे पर नैशनल इनंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें बरी होने दिया। जिस समय यह लेख प्रेस में जाने के लिए तैयार है, स्पेशल एनआईए कोर्ट के जज जगदीप सिंह के फैसले का सार अखबार में शाया हो चुका है कि एनआईए ने केस के ज़रूरी साक्ष्यों को दबा दिया। उन्हें रिकॉर्ड पर लाया ही नहीं गया।

गौरतलब है कि इस आतंकवादी वारदात में जांच जिन नामों तक पहुंची थी, उनमें से कई आरएसएस से जुड़े बड़े नाम थे। खास बात यह है कि केस की शुरुआती जांच करने वाली हरियाणा पुलिस की इस एसआईटी के प्रमुख रहे सीनियर आईपीएस (अवकाश प्राप्त) विकास नारायण राय भी इस केस में जुडिशल ट्रायल को लेकर संतुष्ट होने के बावजूद एनआईए की भूमिका को लेकर सवाल खड़े करते हैं। हरियाणा पुलिस की एसआईटी की लाइन ऑफ इन्वेस्टीगेशन पर क़ायम विकास कहते हैं कि सरकार यूपीए की रही हो या एनडीए की और जांच एजेंसी सीबीआई रही हो या एनआईए, जांच की लाइन वही रही जो उनके नेतृत्व वाली हरियाणा पुलिस की एसआईटी ने इस्टेबलिश की थी। चार्जशीट भी उसी पर जारी हुई और गवाहियां भी उसी पर हुईं।

समझौता एक्सप्रेस केस में असीमानंद समेत चारों आरोपियों के बरी हो जाने के बावजूद फैसले में जज ने जो कहा, वह सरकार और उसकी जांच एजेंसी एनआईए दोनों के लिए शर्मनाक है। स्पेशल एनआइए कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने 160 पन्नों के अपने फैसले में साफ़ कहा है कि अभियोजन पक्ष द्वारा दबा लिए गए सबूत रिकॉर्ड पर नहीं लाए गए। जिन स्वतंत्र गवाहों का हवाला दिया गया, उनसे पूछताछ नहीं कि गई। अभियोजन पक्ष को सपोर्ट न करने वाले गवाहों से जिरह तक नहीं की गई। आरोपियों की किसी मीटिंग, अपराध को लेकर किसी तरह की सहमति या अपराध में उनके शामिल होने को लेकर कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। अपनी स्टोरी के पक्ष में एनआईए ने न सीसीटीवी फुटेज खंगालकर पेश करने की ज़रूरत महसूस की, न उन डोरमेट्रीज के रेकॉर्ड जुटाए गए जहां आरोपियों के ठहरने की बात कही गई थी। आरोपियों की यात्रा का भी कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। यहां तक कि मौका ए वारदात से मिले सूटकेस के कवर इंदौर की जिस दुकान पर सिले होने की बात जांच में सामने आई थी, उस महत्वपूर्ण साक्ष्य को भी सुचारु जांच प्रक्रिया के अभाव में बेकार जाने दिया गया। प्रज्ञा ठाकुर, सुनील जोशी, संदीप डांगे और असीमानंद के बीच फरवरी-मार्च 2007 में होती रही बातचीत के कॉल रिकॉर्ड का दावा तो किया गया पर इस सम्बंध में न कॉल रिकॉर्ड, न मोबाइल फोन या कोई सम्बंधित साक्ष्य ही अदालत में पेश किया गया। (देखें, Indian Express 29 मार्च 2019)

गौरतलब है कि पाकिस्तान जा रही समझौता एक्सप्रेस में हरियाणा के पानीपत शहर के पास 18 फरवरी 2007 को किए गए विस्फोट में 68 लोग मारे गए थे जिनमें से अधितर पाकिस्तान के नागरिक थे। इस विस्फोट में ट्रेन के दो डिब्बे पूरी तरह जल गए थे। इस बात को लेकर कभी कोई दोराय नहीं रही कि यह एक बड़ी आतंकी वारदात थी। सवाल यह था कि इस वारदात के पीछे कौन सा आतंकी संगठन है। `हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता पर हर आतंकवादी मुसलमान क्यों होता है` जैसे सवाल उछालकर आरएसएस से जुड़े उग्र हिंदुत्ववादी तत्व मुसलमानों को आतंकवाद का पर्याय प्रचारित करते ही रहे थे। यूं भी विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों के नाम आते रहे थे। हरियाणा पुलिस की जांच में आरएसएस से जुड़े लोगों के नाम सामने आने से पहले तक इस विस्फोट के पीछे भी सिमी या किसी अन्य मुस्लिम कट्टरवादी संगठन की भूमिका की आशंका जताई जा रही थी।

हरियाणा पुलिस के पूर्व महानिदेशक विकास नारायण राय उस समय पानीपत से लगे करनाल जिले के मधुबन में स्थित हरियाणा पुलिस एकेडमी के डायरेक्टर थे। यह संयोग था कि केस की जांच के लिए गठित की गई हरियाणा पुलिस की एसआईटी के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। विकास बताते हैं कि जब यह वारदात हुई थी, उसके दो दिनों बाद दिल्ली में भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश मंत्रियों के स्तर की वार्ता प्रस्तावित थी। उन्हें भी लगा था कि यह विस्फोट इस बातचीत को पटरी से उतारने के लिए ही किया गया है और इसके पीछे पाकिस्तानी सेना के इशारे पर आईएसआई या उसके द्वारा संचालित किसी ग्रुप का हाथ है। विकास मौके पर पहुंचने वाले पहले अफसर थे और रात में ही की गई छानबीन में उन्हें महत्वपूर्ण सुराग हासिल हो गया था। यह एक अटैची में डिवाइस इंटेक्ट था जो फटा नहीं था। इसे डिस्मेंटल किया गया। इसकी ट्यूब की प्लेट पर लिखे कंप्यूडटर फार्मूले के आधार पर एसआईटी इस तरह की अटैची के ठिकानों की तलाश करते हुए इंदौर की एक दुकान तक जा पहुंची थी। आख़िरकार इस केस में हिंदुत्ववादी संगठन के सुनील जोशी, डांगे और रामचंद्र कलसांगरा का नाम उभरने लगा था। इनमें से सुनील जोशी तो मध्य प्रदेश में आरएसएस से जुड़ा रह चुका जाना-पहचाना नाम था। यह बेहद चौंकाने वाली और आँखें खोल देने वाली जानकारी थी और इसने एक अजीब किस्म का सन्नाटा पैदा कर दिया था। ऐसा सन्नाटा कि मध्य प्रदेश पुलिस केस में सहयोग करने के लिए तैयार नहीं थी।

समझौता एक्सप्रेस विस्फोट केस में हरियाणा पुलिस की एसआईटी की जांच में शुरू में सामने आए तीन लोगों में से एक सुनील जोशी की 29 दिसंबर 2007 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। बाकी दोनों सुनील डांगे और रामचंदर कलसांगरा रहस्यमय ढंग से गायब हो गए थे। (यह भी याद रखना होगा कि सुनील जोशी की हत्या के आरोप में मध्य प्रदेश की स्वयंसेवक शिवराज सिंह की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के दौरान वहां की पुलिस ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया था। यह प्रज्ञा ठाकुर की पहली गिरफ्तारी थी।) समझौता एक्सप्रेस केस बाद में एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया था। विकास नारायण राय कहते हैं कि सुनील जोशी की हत्या हो जाने के बावजूद डांगे और कलसांगरा को गिरफ्तार कर पूछताछ की जाती तो केस का नतीज़ा कुछ और होता। सवाल यह है कि डांगे और कलसांगरा कहां गायब हो गए। विकास कहते हैं कि एनआईए को दोनों का ट्रेस मिलता रहा था। बाद में दोनों को रहस्यमय ढंग से छुपा दिया गया। अपने प्रफेशनल रवैये के लिए मशहूर इस अवकाश प्राप्त आईपीएस का मानना है कि डांगे और कलसांगरा को `बाई डिजाइन` न छुपाया जाए तो उनके पकड़ में न आने का सवाल ही पैदा नहीं होता। आखिर कोई कहां गायब हो सकता है?
गौरतलब है कि विकास नारायण राय के नेतृत्व में हरियाणा पुलिस की जांच ने हडकंप मचा दिया था। आतंकवाद से जुड़े विभिन्न मामलों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय की कॉआर्डिनेशन मीटिग में भी इस बात को लेकर हैरानी थी। भारतीय गृह मंत्रालय को पाकिस्तान से बातचीत में अपमैनशिप (अपना हाथ ऊपर रखने) के लिहाज से पाकिस्तानी एंगल की तलाश थी। कॉआर्डिनेशन मीटिंग्स के दौरान ही उन्होंने पाया कि 2006 के मालेगांव ब्लास्ट, 2007 के मक्का मस्जिद ब्लास्ट और  अजमेर शरीफ ब्लास्ट का तरीक़ा ए वारदात (मोडस ऑपरेंडी) ठीक समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट जैसा था। मालेगावं ब्लास्ट के सिलसिले में महाराष्ट्र एटीएस के चीफ हेमंत करकरे को अहम सुराग हाथ लग चुके थे और उनकी जांच में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित और असीमानंद के नाम सामने आए थे। ये तीनों अभिनव भारत नाम के संगठन के सदस्य बताए जा रहे थे। असीमानंद आरएसएस में भी बड़ी हैसियत रखते थे। आरएसएस के वनवासी कल्याण आश्रम के विस्तार में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। प्रज्ञा सिंह ठाकुर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रह चुकी थीं। करकरे अपनी जांच की उपलब्धियों के चलते भारी दबाव में थे और उन पर हिंदुत्वविरोधी साजिशों के आरोप लगाए जा रहे थे। विकास नारायण राय ने हेमंत करकरे से बात की थी। इससे पहले कि काफी हद तक एक से सुराग हासिल कर रहे इन दोनों पुलिस अधिकारियों की बैठक हो पाती, मुंबई आतंकी हमले में 27 नवंबर 2008 को करकरे की हत्या हो गई थी।

सवाल यह है कि हेमंत करकरे या विकास नारायण राय जैसे अपवाद माने जा सकने वाले अफसर इन मामलों की जांच से न जुड़े होते तो? समझौता एक्सप्रेस विस्फोट की जांच विकास नारायण राय न कर रहे होते तो क्या कोई दूसरा आसान रास्ता न अपना लिया जाता? मसलन जैसा कि विकास खुद शुरू में इस केस में सिमी या ऐसे किसी संगठन का हाथ मान कर चल रहे थे, कोई और अफसर गहन जांच के फेर में पड़ने के बजाय किन्हीं मुसलमान युवकों को दबोच कर केस खोल देने का दावा नहीं कर सकता था?
विकास कहते हैं कि सिमी से जुड़े लोगों से भी पूछताछ की गई थी। सुरागों और सबूतों के आधार पर तफ़्तीश करते हुए नतीज़े तक पहुंचना पुलिस ट्रेनिंग का हिस्सा होता है और किसी भी पुलिस अधिकारी को इसी रास्ते पर चलना ही चाहिए था। हाँ, बहुत से मामलों की तरह मक्का मस्जिद केस में उसी शाम मुस्लिम मुहल्ले के लड़के उठा लिए गए थे। विरोध खड़ा होने पर पुलिस फायरिंग में 6-7 लोग मारे भी गए थे। अजमेर शरीफ केस में भी जांच की यही लाइन थी। बाद में स्थिति बदलती गई। समझौता एक्सप्रेस केस में हमें गिरफ्तारियों की जल्दी नहीं थी। हम सामने आ रहे सुरागों के सहारे पुख़्ता ढंग से गहराई तक जाना चाहते थे।

लेकिन, क्या हर पुलिस अधिकारी इतना प्रतिबद्ध और सेक्युलर हो सकता है, विकास कहते हैं कि ऐसा होना पुलिस की ट्रेनिंग का हिस्सा है। देश का सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य जिस तरह का है, क्या चाहकर भी ऐसे केस में हर कोई अफसर अपनी जान पर खेल कर प्रतिबद्ध रह सकता है? इस सवाल पर विकास कहते हैं कि दबाव हमेशा होते हैं पर अगर पुलिस अधिकारी संविधान और अपने दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध है तो वह अपना काम करेगा ही। लेकिन तथ्य यह भी है कि विकास खुद इस केस में भयंकर असहयोग का सामना कर चुके थे। हरियाणा पुलिस की एसआईटी को इंदौर में पूछताछ के बाद हिंदुत्व लिंक के सुराग हासिल होते ही मध्य प्रदेश पुलिस ने पूरी तरह असहयोग का रवैया अख्तियार कर लिया था। यहां तक कि डांगे और कलसांगरा के फोटो तक उपलब्ध नहीं कराए जा रहे थे। समकालीन तीसरी दुनिया पत्रिका को दिए गए एक इंटरव्यू (मीडिया विजिल वेबसाइट पर उपलब्ध) में विकास ने बताया था कि इंदौर की सूटकेस की दुकान के दो लड़कों जिनमें एक हिंदू था और एक मुसलमान, को पकड़ कर पानीपत में एक महिला मजिस्ट्रे ट के सामने पेश कर रिमांड मांगी गई तो `बड़ा अजीब अनुभव हुआ। हमारी समझ में आया कि वो दबाव में थी। उसने कहा तुम लोग किसी को भी पकड़ लाते हो और रिमांड मांगते हो। उसे लगा कि हम लोग तो इससे पहुंच जाएंगे वहां… ये बता देंगे उस लड़के का नाम कि कौन आया था। उसने आखिर में हमारा अप्लिकेशन पढ़ा और रिमांड दे दी क्योंयकि कोई चारा था नहीं। उन लड़कों ने सहयोग किया, फिर हमने उन्हेंे डिस्चार्ज कर दिया। उसी दौरान सुनील जोशी, सुनील डांगे और कलसांगरा का नाम आना शुरू हो गया।`

विकास नारायण राय इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनकी टीम की इन्वेस्टीगेशन लाइन में गड़बड़ी होती तो उसे बदल देना दूसरी जांच एजेंसियों के लिए आसान हो जाता। शुरू में सीबीआई की मॉनिटरिंग के बाद केस एनआईए के पास चला गया था। विकास मानते हैं कि यह उचित ही था क्योंकि एनआईए का गठन इस तरह के केसेज देखने के लिए ही किया गया था। उनकी जांच टीम ने जो लाइन तय की थी, सीबीआई और एनआईए उसी पर बढ़ीं। यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही नहीं बल्कि एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी। असीमानंद की या दूसरे आरोपियों की गिरफ्तारियां भी हरियाणा पुलिस की एसआईटी ने नहीं की थीं बल्कि उसकी इन्वेस्टीगेशन लाइन को फॉलो करते हुए एनआईए ने ही की थीं। बाद में जांच की लाइन को डीरेल करने की कुछ कोशिशें जरूर हुईं। मसलन, अटारी बोर्डर पर पकड़े गए किसी आदमी का हवाला दिया गया जिससे पूछताछ में कुछ हासिल नहीं हुआ था या फिर किसी नये डॉक्यूमेंट का दावा किया गया। लेकिन सवाल यह है कि इन्वेस्टीगेशन लाइन को बदल देने वाला कोई नया सबूत या अहम सुराग था तो सरकार या एनआईए ने सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश किए जाने में दिलचस्पी क्यों नहीं ली। विकास कहते हैं कि इस केस के जुडिशल ट्रायल में कोई कमी नहीं रही पर लगता है कि एनआईए ने केस को जान-बूझकर खराब किया।
 
आतंकवादी वारदातों के हिंदुत्व लिंक के सबूतों को लेकर यूपीए सरकार के दौरान ही उतनी मुस्तैदी नहीं बरती जा रही थी जितनी कि इस तरह के मामलों में अपेक्षित थी। जांच एजेंसियों के असीमानंद तक पहुंच जाने के बाद आरएसएस के एक महत्वपूर्ण नेता इंद्रेश कुमार को लेकर भी तमाम तरह की आशंकाएं जताई जा रही थीं। सीबीआई ने उनसे पूछताछ भी की थी। हालांकि, उन्होंने आरोपों को निराधार बताते हुए आक्रामक तेवर बनाए रखे थे और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर व स्वामी असीमानंद आदि पर लगे आरोपों को भी साजिश करार दिया था। लेकिन सवाल संघ की टॉप लीडरशिप को लेकर भी उछल रहे थे। दावा तो यह भी किया गया था कि मोहन भागवत को भी इस बारे में जानकारी थी। असीमानंद के चार साक्षात्कारों के आधार पर `कैरवान` में प्रकाशित हुई लीना रघुनाथ की चर्चित स्टोरी में भी दावा किया गया है कि असीमानंद ने उन्हें इस बारे में जानकारी दी थी। लीना रघुनाथ की इसी स्टोरी के मुताबिक, कोर्ट के सामने अपने इक़बालिया बयान में भी असीमाननंद ने कहा था कि `हमलों का षडयंत्र आरएसएस के एक वरिष्ठ सदस्य को जानकारी में रखकर किया गया था`।
` दिसंबर 2010 और जनवरी 2011 में असीमानंद ने कोर्ट के सामने दो अपराधों की स्वीकारोक्ति की। ये बयान दिल्ली और हरियाणा की कोर्ट में हुए जिनमें उन्होंने हमले की योजना बनाने की बात स्वीकारी। उन्होंने कानूनी सहायता लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने न्यायिक हिरासत में 48 घंटे गुजारे थे और इस दौरान उन्हें जांच एजेंसियों से दूर रखा गया था जिसके बाद उन्होंने ये बयान दिए थे। इसका अभिप्राय ये था कि उनके ऊपर कोई दबाव न रहे और उन्हें मन बदलने का मौका मिल सके। दोनों बार असीमानंद ने तय किया कि वे अपने अपराध स्वीकारेंगे और इसी के तहत कोर्ट में अपने बयान दर्ज करवाए। उनके और उनके दो साथी षडयंत्रकारियों के गुनाह कबूलने में एक समान बात सामने आई जिसमें कहा गया था कि इन हमलों का षडयंत्र आरएसएस के एक वरिष्ठ सदस्य को जानकारी में रखकर किया गया था।` (लीना रघुनाथ/कैरवान)

कांग्रेस की तरफ से `भगवा आतंकवाद`की बात भी उठाई गई थी पर आरएसएस और उसके संगठन आक्रामक तेवर में आ गए थे तो सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन गड़बड़ा जाने के डर से कांग्रेस घबराकर चुप हो गई थी। लेकिन, जांच एजेंसियों के पास जिस तरह के सबूत लग रहे थे, आरएसएस उनकी गंभीरता को समझ रहा था। 2010 में आरएसएस और हिंदुत्व पर आतंक का तमगा लगाने की साजिश का आरोप लगाते हुए आरएसएस नेताओं ने देशभर में प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। लखनऊ में मोहन भागवत खुद धरने में शामिल हुए थे।

जाहिर है कि मीडिया में आए असीमानंद के इंटरव्यू का अदालती लिहाज से कोई महत्व नहीं था। असीमानंद ने कोर्ट में दिए गए इक़बालिया बयान से भी
28 मार्च 2011 को पलटते हुए दावा किया था ये बयान दबाव का नतीजा थे। लीना रघुनाथ के मुताबिक, उन्होंने ट्रायल कोर्ट के सामने एक अर्जी दी थी जिसमें लिखा था, “असीमानंद के कथित स्वीकारोक्ति को मीडिया को लीक किया गया। ये चौंकाने वाला है और जानबूझकर किया गया लगता है। ये एक डिजाइन का हिस्सा लगता है जिसके तहत मामले का राजनीतिकरण करके इसका प्रचार किया जा सके। इससे ये भी लगता है कि इसका मीडिया ट्रायल किए जाने की भी योजना है जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदू आतंक की धारणा को बल दिया जा सके और इससे देश की सरकार चला रही पार्टी को फायदा पहुंचाया जा सके।”  गौरतलब है कि लीना रघुनाथ ने यह भी जिक्र किया था कि उन्हें दिए गए इंटरव्यू में असीमानंद ने किसी तरह के टॉर्चर से इंकार किया था। बाद में असीमानंद ने कैरवान मैगजीन की रिपोर्टर से मिलने की बात तो स्वीकार की थी पर उसकी खबर को झूठा और बनावटी बताया था।

यूं भी आरएसएस अपने सदस्यों यहां तक कि पदाधिकारियों के कामों के लिए सुविधानुसार खुद को जोड़ने या अलग करने की नीति पर चलता रहा है। आरएसएस इस बात पर जोर देता रहा है कि वह उससे जुड़े रहे किसी व्यक्ति के कामों के लिए जिम्मेदार नहीं होता है। विकास नारायण राय कहते हैं कि यह बात जरूर है कि ब्लास्ट की जांच में सामने आए कई नाम संघ से जुड़े रह चुके थे लेकिन सिर्फ़ इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता था कि संघ किसी योजना में शामिल था।
 
2014 में आरएसएस की राजनीतिक विंग भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में ताकतवर सरकार बनाने में कामयाब हो गई तो यूं भी स्थितियां बदल चुकी थीं। मालेगांव विस्फोट केस में विशेष सरकारी वकील रोहिणी सालियन ने अक्तूबर 2015 में दावा किया था कि केंद्र में नई सरकार बनने के बाद एनआईए उन्हें `भगवा आतंक` के मामलों में नरम रुख अख्तियार करने के लिए कह रही है। एनआईए की कार्यशैली को लेकर विकास नारायण राय ने सितंबर 2016 में `समकालीन तीसरी दुनिया`पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू में भी सवाल उठाए थे। रिटायर होने जा रहे एनआईए के तत्कालीन चीफ के कार्यकाल में विस्तार को लेकर भी सवाल उठा था। जाहिर है कि ऐसी स्थितियों में कोर्ट में इन मामलों की पैरवी कमजोर पड़ जाने की आशंकाएं स्वाभाविक रूप से जोर पकड़ रही थीं।

गौरतलब है कि समझौता एक्सप्रेस केस का फैसला आने से पहले मक्का मस्जिद विस्फोट केस में भी इसी तरह का फैसला आ चुका है। असीमानंद का नाम मक्का मस्जिद केस में भी शामिल था और एनआईए के पास जो सबूत थे, उन्हें काफी मजबूत माना जाता था। इसके बावजूद एनआईए ने फैसले को लेकर ऊपरी अदालत में अपील की जरूरत नहीं समझी थी। समझौता एक्सप्रेस केस में भी सरकार या उसकी जांच एजेंसी एनआईए फैसले के खिलाफ अपील करेगी, ऐसी किसी भी संभावना को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। भले ही इससे आतंकवाद से लड़ने की भारतीय सरकार की प्रतिबद्धता के दावे कमज़ोर पड़ते हों और पाकिस्तान पर आतंकवाद के मामलों में दबाव बनाने की रणनीति पर भी असर पड़ता हो।

समझौता एक्सप्रेस का फैसला आने के बाद संघ और उसके सहयोगी संगठनों की खामोशी हैरान करने वाली थी। इस बार इन संगठनों से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी जैसी कि मक्का मस्जिद केस के फैसले के बाद रही थी। तब फैसले को भगवा और हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश नाकाम हो जाने के रूप में प्रचारित किया गया था। हो सकता है कि मीडिया की मुख्यधारा के अनुकूल होने के बावजूद इस केस की जांच से जुड़ी बातों को तत्काल नये सिरे से चर्चा में न आने देने के लिए यह रणनीति अपनाई गई हो। लेकिन, 29 मार्च को फैसले की कॉपी सार्वजनिक हो जाने जिसमें साक्ष्यों को रोकने के मामले में एनआइए पर सवाल हैं, भाजपा को अपनी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली को आगे करना पड़ा। बाद में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इस बारे में बयान दिए। जेटली ने कहा `कांग्रेस ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए 'हिंदू आतंकवाद' की थ्योरी को गढ़ा था और इसे स्थापित करने के लिए फर्जी सबूतों के आधार पर बेगुनाह लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए थे। लेकिन, अब अदालत के आदेश आने के बाद इसका पटाक्षेप हो गया है। यूपीए सरकार के कदम से धमाके को अंजाम देने वाले वास्तविक गुनहगार बच निकले।` जेटली के इस बयान के खोखलेपन और सरकार की संदिग्ध भूमिका को जाहिर करने के लिए फैसले से जज की इस टिपप्णी को दोहराना ही काफी होगा कि एनआईए ने कारगर सबूतों को रेकॉर्ड पर आने से रोक दिया था। जहां तक बेगुनाहों के बच निकलने का सवाल है तो `आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत सरकार` पांच साल पूरा कर लेने के बावजूद क्यों `वास्तविक गुनहगारों` तक नहीं पहुंच पाई। वास्तविकता यही है कि इस केस में शुरू में ही इस्टेबलिश हुई जांच की लाइन को सरकार बदल जाने के बावजूद बदल पाना मुमकिन नहीं हो सका। वास्तविकता यह भी है कि इस केस में जिस तरह के एविडेंस हासिल हो रहे थे, उन्हें अंज़ाम तक पहुंचाने के लिए जांच एजेंसी को अपेक्षित आज़ादी यूपीए सरकार के दौरान भी नहीं थी। कांग्रेस का गुनाह असल में यह है।
(समयांतर, अप्रैल 2019 में प्रकाशित) 

Thursday, April 18, 2019

उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स : शिवप्रसाद जोशी


हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है
 (उत्तरआधुनिकता (पोस्टमॉडर्निज़्म) के बारे में नोट्स)
शिवप्रसाद जोशी

उत्तरआधुनिकता यह नहीं कहती कि तुम आधुनिकता के ऊपर से छलांग लगाकर एक नये भाषा उत्पात में अपनी सनसनी के साथ दाखिल हो जाओ. वह छलांग जैसी फ़ुर्तीली कार्रवाई है ही नहीं. वह तो बहुत धीरे धीरे आधुनिकता में आ चुकी दरारों से रिस कर अंदर आती है और आधुनिकता के वृक्ष को भीतर से सोखने की तिकड़में करती है.

उत्तरआधुनिकता उत्तर-सत्य की जननी है. वह धर्मबहुल महानता और प्रकांडता वाले प्राचीन संसार के गल्पों, नैरेटिवों, मिथकों की पुनर्रचना भी है. वह एक प्राचीनता का निर्माण करती है और उस प्राचीनता के मिथ का निर्वहन. वह धर्म को एक नितांत निजी वृत्त से खींचकर ले आने वाली रस्सी है. वह तोड़फोड़ नहीं है जैसा कि उसके बारे में बहुप्रचारित है, वह व्यवस्थाओं का विपर्यय भी नहीं है जैसा कि अक्सर मान लिया जाता है. वह न बेचैनी है न उलझन न गड्डमड्ड. जैसा कि उसका ग्राफ़िक प्रेजेन्टेशन है. वह एक होशियार फ़ितरत है. मॉर्डेनिज़्म का वह विचलन है. जैसे वाम का उत्तर वाम. नया वाम नहीं. उसका उत्तर. लेकिन न दिशा न जवाब. बस पोस्ट. लेकिन आगे का भी नही, न अग्रिम, न आगामी. वह पीड़ित व्यक्ति की आह को बुझाने का उपक्रम करती प्यास है. वह प्यासों को पानी नहीं देती- उसकी अपरिहार्यता बताती रहती है, बाज़दफ़ा वो कहती है- अरे यह प्यास भ्रम है या यह असत्य है! या हो सकता है वो व्याकरण में पानी के पर्यायवाची खोजने चले जाएः जब तक मैं इसे जल न कहूं/ मुझे इसकी कल-कल सुनाई नहीं देती/ मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं/ मेरे लोटे में भरा रहता है अंधकार. (असद ज़ैदी)

वह ख़ुद को, किसी निष्कर्ष पर न जाती हुई किसी लक्ष्य को असमर्पित, कहती है. लेकिन पोस्टमॉडर्निज़्म का लक्ष्य स्पष्ट है. वह मनुष्य की स्वाभाविकता का हरण है, एक अस्वाभाविक, सुन्न और मुग्ध मनुष्य की रचना उसका एक लक्ष्य है. नो मैन इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी मनुष्य द्वीप नहीं है)- जॉन डोन्ने ने कहा था. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड (कोई भी पाठ द्वीप नहीं है)- उत्तरआधुनिक कहते हैं. कोई भी पाठ अपने तई मुकम्मल या संपूर्ण नहीं है. हर पाठ अधूरा है. वो समस्त का अंश है. फिर वे ये भी कहते हैं कि हर पाठ का अपना अर्थ है. एक पाठ के कई अर्थ और आशय संभव है. सही तो कहते हैं, आप कहेंगे. इसमें कैसी परेशानी. सही तो कहते हैं लेकिन करते नहीं हैं. वे अधूरा कहते हैं. वे पाठों के सुनियोजित पुनर्पाठ के उतावले हैं. वे चुने हुए पाठ उठाते हैं. सेलेक्टड. उन्हें मनमाने ढंग से खोलते हैं और कहते हैं कि इस पाठ में यह कहां है और यह क्यों नहीं है. वे मार्क्स को उनकी जमीन से उखाड़ लेना परम समझते हैं. वे जानते हैं कि सत्य क्या है. लेकिन कुछ देर बाद वे कहेंगे कि सत्य कुछ और है. और नहीं सत्य अनेक हैं. इसे वह पाठ की गैर-रेखीयता कहते हैं. इस तरह बुनियादी सच्चाई उत्तरआधुनिक भंवरों में डूब जाती है या उलट कर कहें कि वहां सच्चाई की बुनियाद नहीं होती है. वह निर्वात में टंगा हुआ एक भ्रम है. इस तरह उत्तरआधुनिक सच्चाई के संहारक हैं और झूठ के प्रचारक- घोषित अघोषित. नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड उनकी ढाल है. फ़्रेडरिक जेमसन ने कहाः उत्तरआधुनिकता, हालिया (द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर) पूंजीवाद की सांस्कृतिक दलील है. ज़ियाउद्दीन सरदार ने कहाः उत्तरआधुनिकता पश्चिमी संस्कृति का नया साम्राज्यवाद है. उत्तरआधुनिक कंधे उचकाएंगें: ये महज़ उद्धरण हैं. वे ऐसा क्यों करेंगें. क्योंकि उत्तरआधुनिकता उद्धरणों से बचती फिरती चलती है. उद्धरण उसकी शिनाख़्त करते हैं. वह सिर्फ़ अपना उद्धरण धारण करती है. उसे लगता है उसका अपना कोट पर्याप्त है.

उदीयमान दक्षिणपंथी कहते हैं यह मार्क्सवाद की बला है. पहले वे पूछते थेः यह मार्क्सवाद क्या बला है. कुछ अन्य निरपेक्षतावादियों का मत है कि उत्तरआधुनिकता नहीं रही- वो विलुप्त हो चुकी है. इसके उलट जब जब आधुनिकता अपने को बेहतर कर रही होती है तब तब वह दोगुने वेग से उस पर प्रहार करने आ जाती है. वह यही हैं. अपनी कृत्रिमता में. लेकिन अपने मक़सद में फलतीफूलती. उत्तरआधुनिकता एक समकालीन ऐंठन है. कोई इस तक नहीं पहुंचता, यह अपने शिकार चिह्नित करती है और फिर उनका वरण और फिर उन्हें लपेट देती है. उत्तरआधुनिक व्यक्तित्व एक सर्पीला और कई घुमावों और खांचों वाली कील की तरह होता है. वहीं पूरा होता जाता घुमाव. अगर कवि है तो उसके किरदार में, अगर लेखक है तो उसके विचार में, नेता है तो उसकी ज़बान में यह कील होगी. लेकिन वह दुख नहीं होगाः वह क्य़ा है जो इस जूते में गड़ता है/ यह कील कहां से रोज़ निकल आती है/ इस दु:ख को क्यों रोज़ समझना पड़ता है?” (रघुबीर सहाय). उत्तरआधुनिकता के पास आत्मा से टकराते ऐसे प्रश्न नहीं हैं. वह दुःख नहीं जानती. दुःख का उत्सव जानती है. निराशा को वह आत्मरुदन में बदल देती है और पता भी नहीं चलता. करुणा की उसे परवाह नहीं. प्रेम के लिए उसके जखीरे में एक से एक वार हैं. उत्तरआधुनिकता बस प्रतीकों में अपना सफ़र तय करती है. या उन्माद में. राष्ट्रीय झंडे में फड़फड़ाहट या फिसलन की तरह चिपकी है. अस्थियों, विसर्जनों और श्रद्धांजलियों में गोंद की तरह या लोटों में गेंद की तरह. यह चित्र भी है और भाव भी और संदेश भी. प्रणब मुखर्जी भूतपूर्व राष्ट्रपति हैं. उससे पहले एक संदेश हैं. वह एक सिंबल भी हैं. उनके पास जो संदेश है वही मीडियम यानी माध्यम है. मीडियम इज़ द मैसेज वाले मैकलुहानी दिन गए, अब संदेश ही माध्यम बना दिया जाता है. नाना स्वरूपों में विचरण करती हुई उत्तरआधुनिकता राम को खंजर बना देती है हनुमान को प्रचंड. वॉट्सऐप से भीड़ के बीचोंबीच वही है जो बम की तरह फटती है. उत्तर आधुनिकता एक भीड़ है जो आधुनिक जीवन पर हिंसक उतावली है. भीमा कोरेगांव के यथार्थ में अरबन नक्सली का नैरेटिव उसी का सजाया हुआ है. स्पर्शों को घात में बदल देती है. उसे आज़माया ही जाता है इसलिए कि नागरिक लड़ाइयां देश तोड़ने का षडयंत्र पेश हो सकें. देश का और उसके वजूद का  इतना काल्पनिकीकरण और वॉट्सऐपीकरण वो कर देती है. उसी की कृपा है कि देशभक्ति भाव नहीं चाशनी है. हमारे चेहरे टपके हुए और लिथड़े हुए हैं. अस्मिताएं डरी हुई हैं. भय अब प्रछन्न नहीं है, वह नागरिक होने का एक लक्षण है. सत्ता के उपकरणों से उत्तरआधुनिकता एक नया क़िला बनाने की ओर उन्मुख  है जिसे वो आगे चलकर राष्ट्र कहेगी.

उत्तरआधुनिकता एक महा-स्वप्न से उभरी क्रिटिकल धाराओं से पीछा छुड़ाने चली थी. उसे बहुत काम करने थे. भाषा और कला को पांडित्य से छुटकारा और दबेछिपे सांप्रदायिक मंतव्यों को फ़ाश करना था. उसे और इतालो काल्विनो बनाने थे और यथार्थ और स्मृति के नायाब शहरों में लेखक की तरह भटकना था. मिशेल फ़ूको को उसने क्या से क्या बना दियाः एक घाघ  नॉर्मेटिविस्ट (युर्गेन हाबरमास ने कहा). वह ऐन इस दुष्कर हिंदी पट्टी से एदुआर्दो गालियानो और टैरी एगल्टन की तलाश करती, उन्हें पहचानती. वोअपार ख़ुशी का घराना” (मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस) क्यों नहीं बना पाई जो इतने सारे नैरेशन में गुंथा हुआ है और जिन थरथराहटों से भरा हुआ है, वो उत्तरआधुनिकों को समझ क्यों न आईं? बाढ़ एक कुदरती फ़िनोमेना है, कुदरती आफ़त नहीं.’ लेकिन उत्तरआधुनिकता एक ग़ैर कुदरती आफ़त है, क्योंकि वह एक ग़ैर कुदरती फ़िनोमेना है. वह चालाकी से देरिदां के विखंडन में जा मिली, वहां उसका देर टिकना नामुमकिन था, उत्तर संरचना में दाख़िल हुई. वह उत्तरऔपनिवेशिक होकर प्रतिरोध, दमन, हाशिया, एलजीबीटी पर मुखर हुई, वह दलितों और उत्पीड़ितों के लिए आई थी लेकिन वह उत्तर इतिहास बनाने लगी और उत्तर सत्य गढ़ने लगी. उत्तरआधुनिकता ख़ुद को सबऑल्टर्न साबित करने कहां नहीं उतरी. लेकिन गायत्री स्पीवाक ने सही कहा कि अपने लिए जगह हासिल करने यानी सांस्कृतिक वर्चस्व में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेने वाली जद्दोजहद, सबऑल्टर्न होना नहीं है. उत्तरआधुनिकता का लंबी लड़ाई से वास्ता नहीं. उसमें उपलब्ध जीवन को ठुकराने’ (मंगलेश डबराल) की ताब नहीं है. और न ही उस दृश्य को बचाने का साहस जो चारों तरफ़ अदृश्य हुआ जाता है. आगे और आगे जाने की, ऊंचा और ऊंचा होने की, नया और नया होने की उसकी लालसा एक विकरालता में तब्दील हो गई. वह बाड़ों को गिराना चाहती थी- ठीक था, नो टेक्स्ट इज़ ऐन आईलैंड- उसका कहना बनता था, वह भाषा की देहरियां ड़ना चाहती थी- ठीक था, वह ज़िद और साहस के नये प्रतिमान गढ़ना चाहती थी- ठीक था, वह मुख्यधारा नहीं मानती थी- ठीक था, वह नये मनुष्य के निर्माण को प्रतिबद्ध बताई जाती थी- ठीक था. लेकिन यह क्या. उत्तर आधुनिकता, तुम जो निशान मिटाती जाती हो, जो हुंकार और अहंकार तुमसे उठता है, जो धूल तुम उड़ाती हो- यह तो किसी बर्बरता के प्रवेश के संकेत हैं- तुम आततायी की आंधी क्यों बनी. 

दुनिया के वैचारिक, साहित्यिक, कला आंदोलनों में उत्तरआधुनिकता को एक अवस्था या एक चरण या एक दर्शन के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिशें भी जारी हैं. और ये काम आज से नहीं, 20वीं सदी के चौथे दशक से चला आ रहा है. जब दूसरा विश्व युद्ध ढलान पर था, बंटवारे हो चुके थे, हिंसाओ ने नरसंहार कर दिए थे, चार्ली चैप्लिन और सार्त्र पिकासो आदि से लेकर अपने यहां फैज और मुक्तिबोध तक आधुनिक मनुष्य की चीखें और संताप, आगामी लड़ाइयों की रूपरेखा बना रहे थे, आगे चलकर और अंदर दाखिल होकर भाषाओं में जाएं और अपनी हिंदी में जाएं तो लेखक कवि कहानीकार अपनी रचनाओं में एक उद्विग्न और जूझते मनुष्य के संकटों की शिनाख्त कर रहे थे, हां बेशक यही वह दौर भी था जब उत्तरआधुनिक अपनी छटाओं और प्रशस्ति बेलाओं के साथ आसपास मुखर थे. वे हरगिज़ नहीं चाहते थे कि भाषा और विचार की आधुनिकता अपना स्पेस बनाए. लेकिन ऐसा कहां होता है. ऐसा भी कहां होता है कि सच्चाई को लड़ना ही न पड़े. उत्तरआधुनिकता दरअसल एक थोपी हुई वैचारिकता है, वह चीज़ों का नुकसान करने आई है. हम अपने स्वप्न बना रहे होते हैं और वो इस स्वप्न को एक चटपटा विलास या एक आतुर याचना बना देती है. हिंदी जैसी भाषाओं में यह संकट आया है. गद्य और कविता में यह संकट दिखता है. प्रयोगों पर उत्तरआधुनिकता का कब्ज़ा तो खासा चिंताजनक है. और यह उतरकर सामाजिक व्यवहारों में भी दाखिल हो रहा है- भयावह है. आधुनिक मनुष्य की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अभी 21वीं सदी में भी उसकी लड़ाइयां जबकि जारी हैं और कठिन हैं, उसे उत्तरआधुनिक का लबादा पहनाकर शिथिल किया जा रहा है. इस विंडबना को तोड़ना भी उसका मौजूदा कार्यभार होना चाहिए. 

एक सच्चे, सजग और साहसी नागरिक के लिए तीन लड़ाइयां हैं. ख़ुद से लड़ना और दुष्टताओं से लड़ना है. आधुनिक मनुष्य को उत्तरआधुनिकता के कभी नाज़ुक कभी सख़्त आघातों से भी बचना है. उत्तरआधुनिकता नहीं जानती लेकिन इस तरह एक तत्पर और मुस्तैद नागरिक के निर्माण के काम आती है जैसे तानाशाह के भेस में हमारा चार्ली अपना विख्यात भाषण देने जाता है और उम्मीद पर उदास होता हुआ विकल मनुष्यता में पुकारता हैः बर्बरों की नहीं हमारी है यह दुनिया. अपनी विख्यात आत्मकथा में चैप्लिन ने कहाः ग़ैर-नात्सी होने के लिए यहूदी होना ज़रूरी नहीं है. एक नॉर्मल, डीसन्ट मनुष्य होना काफ़ी है. उन शब्दों को थोड़ा बदलकर कह सकते हैं: प्रतिबद्ध होने के लिए उत्तरआधुनिक होना ज़रूरी नहीं है. इस फ़िल्म से ठीक पहले साहित्य में उत्तरआधुनिकता को प्रस्थापित किया जा रहा था. कला और संगीत में वो पहले आ चुकी थी. उत्तरआधुनिकता झपटने आई थी. लेकिन....वे ऐतिहासिक पुकारें थीं, कठिन और जानलेवा समयों की. दक्षिण एशिया का भूगोल देखिएः मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं / सँवारती हुई मुझे / उठी सहास प्रेरणा. (मुक्तिबोध) दशक वही चालीस. या शायद कुछ ज़रा पहले नक्श-ए-फ़रियादीः अरसा-ए-दहर की झुलसी हुयी वीरानी में / हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है / अजनबी हाथों के बे-नाम गरांबार सितम / आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है...(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

उत्तरआधुनिकता अतीत में लौट नहीं सकती है. लौटना उसका लक्षण नहीं है. उसे गवारा नहीं है. लौटेगी तो वह अपनी परिभाषा से उतर जाएगी. ऐसा वह भला क्यों करेगी. वह अतीत से सीखती नहीं है उसे सोखती है. अतीत उसकी कामनाओं का कंकाल है. टकराव और वैमनस्य के नैरेटिवों में वह अतीत का विद्रूप कर उलीच देती है. चालीस का दशक आया ही चाहता था जब वह कला और संगीत में घुसपैठ करने पहुंची. पसीने, संघर्ष, ख़ून और जद्दोजहद से तरबतर आधुनिकता के रचनाकार जब नये संसार का स्वप्न देखते थे तब वह साहित्य पर अपना चोला डालने पहुंच गई थी.

उत्तरआधुनिकता हमारे स्वप्नदर्शियों के बीच से, हमारे साधारण जन के बीच से तुम जाओ, तुम बेशक राख उड़ाओ, अपनी भव्यताओं से हैरान करो, अपने ज्ञान और और मानमर्दन की अपनी ध्वंस-शक्ति पर उत्सव करो या अवैज्ञानिकता को अपने प्रणाम पर भयानक गदगद हो उठो- हमें बख़्श दो. हमें तुमसे भय नहीं है. हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है. अपनी आधुनिकता की विकृतियां दूर कर उसे बेहतर बनाना है, हिफ़ाज़त हर हाल में करनी है. मार्क्स ने कहाः “Mein Verhältnis zu meiner Umgebung ist mein Bewußtsein. (माइन फरहेल्टनिज त्सू माइनर उमगेबुंग इस्त माइन बिवुस्स्टज़ाइन) हिंदी रूपांतरण कुछ इस तरह से कि अपने पर्यावरण से मेरा संबंध ही मेरी चेतना है.इस आधुनिकतम विचार को फांद पाना उत्तरआधुनिकता के लिए मुमकिन नहीं. इसलिए नहीं कि यह दीवार है इसलिए कि यह बुलंदी है.

(नोटः इस निबंध में उत्तरआधुनिकता को शब्द द्वय की तरह नहीं लिखा गया है. यानी यहां उत्तर और आधुनिकता के बीच कोई हाइफ़न यानी समास चिन्ह नहीं रखा गया है. इसलिए कि इसे आधुनिकता की निरतंरता में आगे की कोई स्थिति या चरण या अवस्था मानने की अपेक्षा लेखक का मानना है कि यह आधुनिकता के समांतर एक प्रवृत्ति एक वैचारिक सैद्धांतिक और सामरिक पोज़ीशन है. वह उत्तरआधुनिक इसलिए नहीं है कि आधुनिकता के बाद उसका आना हुआ है, कि उसका कोई ऐतिहासिक काल है, वह उत्तरआधुनिक इसलिए है कि वह आधुनिकता की वैचारिक ज़मीन पर क़ब्ज़े की नीयत से कला, साहित्य, संस्कृति, दर्शन में लाई गई प्रविधि है. वह नयेपन का छद्म है.  इसकी सबसे अधिक चोट राजनीतिक चेतना पर पड़ रही है. यही चिंता है. हालांकि उत्तरआधुनिकता को लेकर ऐसे संदेहों या चिंताओं को कॉन्सपिरेसी थ्योरी से पीड़ित ग्रंथि बता देने का चलन है लेकिन आधुनिकों को हर तरह के हमले के लिए तैयार रहना चाहिए और भाषा और विचार और राजनीति में शैलीगत और व्यवहारिक परिवर्तनों का स्वागत एक सचेत आधुनिक की तरह करना चाहिए. इतालो काल्विनो ने जब एक अद्भुत भाषा और अद्भुत संरचना की तलाश की तो उन्होंने नहीं कहा कि वह उत्तरआधुनिक हैं, उत्तरआधुनिकों ने कहा कि वह उत्तरआधुनिक भाषा है. जबकि काल्विनो का गद्य, भाषा और विचार की महान आधुनिकता ही थी. और ऐसे काल्विनो अकेले लेखक नहीं थे. भारत समेत दक्षिण एशिया, लातिन अमेरिका, यूरोप- साहित्यिक सांस्कृतिक भूगोलों की यह लिस्ट बहुत लंबी तो नहीं लेकिन इतनी छोटी भी नहीं कि उत्तरआधुनिकता के कोट में समा जाए.)
-शिवप्रसाद जोशी

(समयांतर, अप्रैल 2019 में प्रकाशित)

Wednesday, April 10, 2019

बेटे, जब तक ये दलीप सिंह है, घबराने की ज़रूरत नहीं

ज़हूर साहब और निशात आपा

(डीयू से सेवानिवृत्त असोसिएट प्रफेसर ज़हूर सिद्दीक़ी प्रग्रेसिव मूवमेंट से जुड़े रहे हैं। वे रटौल में अपने पुश्तैनी घर में ग़रीब लड़कियों के लिए स्कूल चलाते हैं। इन दिनों बीमार हैं। फोन पर बात की तो वे मुज़फ़्फ़रनगर शहर जो मेरा भी शहर है, पहुंच गए। फिर एसडी इंटर कॉलेज जो मेरा भी स्कूल था। जब उन्होंने अपने टीचर दलीप सिंह को याद किया तो मैं रो पड़ा। यह लिखते हुए भी यही हाल है। दलीप सिंह की बहुत ज़रूरत है। ज़हूर साहब से हुई बातचीत यहां पोस्ट कर रहा हूँ।) 

जब मुल्क़ का बंटवारा हुआ तो बहुत दिनों तक अफवाहों का बाज़ार गरम रहा करता था। मैं मुज़फ़्फ़रनगर में एसडी में पढ़ता था। अफ़वाह फैल गई कि कोई ट्रेन आई है जिसमें लोगों को मारकाट के भेजा गया है। मेरी माँ ने उस दिन मुझे स्कूल नहीं भेजा। अगले दिन...। वो गोल चेहरा, सुंदर..। वो पर्सनालिटी...एक दम से वो चेहरा पूरा का पूरा उभर आता है। वो हमारे टीचर...शानदार। दलीप सिंह। दलीप सिंह था उनका नाम। बोले, `कल क्यों नहीं आए?`  मैंने कहा कि अम्मी ने नहीं आने दिया। बोले, `बेटे जब तक ये दलीप सिंह है, घबराने की ज़रूरत नहीं है। जो होगा पहले दलीप सिंह को होगा, तब कोई किसी बच्चे तक पहुंचेगा।` 80 साल का हो गया हूँ। अब तक मेरे दिल पर उस बात का असर ज्यों का त्यों बना हुआ है। ऐसे लोग थे। ऐसे ऊंचे कि माहौल कैसा भी हुआ, डिगे नहीं।

मेरे पिता नुरुद्दीन अहमद सिद्दीक़ी मुज़फ़्फ़रनगर में पोस्टेड थे। डिप्टी कलेक्टर। एससडीएम जानसठ। अंग्रेज कलेक्टर को उनकी ईमानदारी पर यक़ीन था। बाहर से रिफ्युजी आ रहे थे। उनको सही सामग्री मुहैया कराने, उनके रहने की जगह का इंतज़ाम कराने जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी थी। मुज़फ़्फ़रनगर में ठीक रहा। इंतज़ामात ठीक रहे। दंगे नहीं हुए। सहारनपुर से दिल्ली तक रेलवे स्टेशनों के पास के शहरों-कस्बों में रिफ्युजीज की बड़ी तादाद थी। ज़्यादातर दुकानदार लोग थे। सौदागरी जानते थे। वे छोटी-छोटी चीज़ें बेचने लगे। बहुत कम रेट पर। जैसे मैं अपनी रिश्तेदारी में सहारनपुर था। मुझे याद है, वहां भी बाज़ार में छोटे-छोटे बच्चे छोटी-मोटी चीज़ें बेच रहे थे। मसलन, लड्डू। बाज़ार में डेढ़ रुपये-दो रुपये पाव मिलने वाला लड्डू चार आना पाव बेचते थे। कम से कम मुनाफा लेकर। कुछ क्वालिटी में समझौता करके। मसलन बेसन कुछ कम करके, चीनी कुछ ज़्यादा करके, देसी घी के बजाय वनस्पति घी का इस्तेमाल करके। रेट को काफ़ी कम रखके। टॉफियां, छोटी-छोटी मीठी गोलियां वगैराह। देहात से जो लोग शहर आते तो लौटते वक़्त बच्चों के लिए ये सस्ते दामों वाली चीज़ें पाकर ख़ुश होते। मतलब, मुश्किलों में इधर आए लोगों की बाज़ार में बहुत दिलचस्पी थी और मेहनत का जज्बा था।

आज़ादी के बाद इधर का ज़्यादातर मुसलमान आज़ादी की लड़ाई के नेताओं पर भरोसा करके यहीं रहना चाहते थे। जो जाने की चाहत रखते थे, वे 10 फीसदी होंगे। बहुत से हिस्सों में फ़सादात के बावजूद इधर देहात में, शहरों-कस्बों में भी भाईचारा बना रहा। कुछ बातें हो जाती थीं पर भरोसा बना रहा। देहरादून में मुसलमानों को दंगों का सामना करना पड़ा तो लोग इकट्ठा होकर सहारनपुर में मौलवी मंज़ूर उल नबी के पास आए। वे बड़े सादे शख़्स थे। लोगों में और नेताओं के बीच उनकी इज़्ज़त थी। लोगों ने उन्हें कहा कि हम तो आपके भरोसे पर हिंदुस्तान में रह गए पर अब क्या करें। आप ने तो कहा था कि आज़ादी के बाद एक नयी दुनिया होगी। कांग्रेस के राज में सब को एक नज़र से देखा जाएगा। मौलवी साहब ने कहा कि मैं तो कोई हाकिम नहीं, मेरे पास तो कोई ओहदा, कोई ताक़त नहीं, जो तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। लेकिन, मौलवी साहब लखनऊ रवाना हो गए। लखनऊ पहुंचे तो मुख्यमंत्री पंत सुबह-सुबह अचानक उन्हें देखकर हैरान रह गए। नाश्ता कराया, बात सुनी और कहा कि अच्छा, मौलवी साहब आप जाइए। उनके लौटने से पहले नये कलेक्टर रामेश्वर दयाल पहुंच चुके थे। नये कलेक्टर ने सुबह-सुबह गाड़ी लगाने के लिए कहा तो स्टाफ ने जानना चाहा कि जाना कहां है। लेकिन, उन्होंने किसी को बताया नहीं ताकि उनकी योजना लीक न हो। वे बाज़ार पहुंचे तो कुछ लोग दुकानों के ताले तोड़ रहे थे। कलेक्टर ने शूट एट साइट का हुक्म दिया। शूट एट साइट का मतलब पांवों के पास गोली चलाना ही हुआ करता था। फायरिंग हुई, दंगाई भाग खड़े हुए और दूर-दूर जिलों तक मैसेज चला गया।

चौ. चरण सिंह मंत्री बने। देहात में पढ़ाई को लेकर उत्साह पैदा हुआ। देहात से लोग चौधरी साहब के पास पहुंचते थे, बेटों के लिए नौकरियां मांगने। वे कहते थे कि पढ़ाई कीजिए। देहात के लोग अंग्रेजी तालीम में भी आगे बढ़े। बड़ी नौकरियों में जाने लगे। फ़ौज़ में सिपाही भी बने।

इतनी उम्र हो गई। ज़माना बदल गया पर उस ज़माने के दोस्त याद आते हैं। उनके नाम याद आते हैं। दोस्तों में, उनके घरवालों में हिंदू-मुसलमान का भेदभाव नहीं था।

अफ़सोस कि दलितों की स्थिति अच्छी नहीं थी। वे बहुत भेदभाव का सामना करते हुए, संघर्ष करते हुए आगे बढ़े हैं। 
ज़हूर साहब और निशात आपा के घर (जो लड़कियों का स्कूल है) पर हम  

Saturday, March 2, 2019

गाली और बुद्धिजीवी : अमोल सरोज





(देशभक्ति के नाम पर `संस्कारी टोले` सड़कों पर `दुश्मन` की माँ-बहन की गालियां निकालते हुए घूम रहे थे। हर प्रतिरोधी विचार को बल्कि हर असहमत को इस तरह गालियों से नवाज़ना उनका चलन है। हद की बात यह है कि गालियां देने का महिमामंडन करने में अनेक बुद्धिजीवी पीछे नहीं रहते हैं। वे बाकायदा `तर्कशास्त्र` के साथ पेश होते हैं। इस प्रवृत्ति पर अमोल सरोज का पढ़े जाने लायक़ व्यंग्य।)

गाली और बुद्धिजीवी 

संवाद एक 
श्रीमान आपने कमेंट में गाली लिखी हुई है, कृपया इसे हटा दीजिये। 
बुद्धिजीवी - ये इतना सहज और आसान मसला नहीं है। मैं एक दिन तफ़सील से लेख लिखूँगा गालियों पर। 

संवाद दो 
सर एक सार्वजानिक प्लेटफॉर्म पर गाली देना कितना सही है ?
बुद्धिजीवी- देखिये, इसके कई मायने हैं। मतलब क्या आप ये कहना चाहते हैं कि प्राइवेट स्पेस में गाली दी जा सकती हैक्या मैं आप से पूछ सकता हूँ कि प्राइवेट स्पेस में गाली देने की छूट क्यों देना चाहते हैंइसका मतलब तो ये है कि हम पब्लिक में कुछ हैं और प्राइवेट में कुछ औइसका मतल आप प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देना चाहते हैं।

सर मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा। 
बुद्धिजीवी - बिलकुल कहा। सरासर कहा। तुम्हें अभी नहीं समझ आएगा। मैं एक लम्बा लेख लिख कर समझाऊंगा। दरअसल गाली को पाद समझो। लोग तो पाद के वक़्त भी बुरा मुंह बनाते हैं। अब पाद आएगा तो करना पड़ेगा। ऐसे ही गाली का है। समझ आया कुछ?
जी समझ तो नहीं आया। बदबू ज़रूर आयी। 

संवाद तीन 
सर, ये गाली महिलाविरोधी... 
 बुद्धिजीवी - देखिये आप लोग अपनी एनर्जी बेवजह खर्च कर रहे हैं। गाली को नहीं, भावना को देखना चाहिए। ऐसे तो कुत्ता भी गाली होता है। आप लोग बोलते है या नहींदोस्तों में भावना देखी जाती है, गाली नहीं। 
सर कुत्ता और औरत में तो फ़र्क़ होता है। कुत्ता हमारी ज़ुबान नहीं समझता। उसे फ़र्क़ भी नहीं पड़ता। क्या आप ये कहना चाहते हैं कि स्त्री और पशु में फ़र्क़ नहीं है? 
बुद्धिजीवी - देखो तुम अब आउट ऑफ़ द कॉन्टेक्स्ट बात कहके मुझे घेरने की कोशिश कर रहे हो। निहायत ही वाहियात बात कही है तुमने। तुम्हें शर्म आनी चाहिए। शर्म ही नहीं तुम्हें तो डूब मरना चाहिए। तुम एक नंबर के मूर्ख होमूड होगधे हो  ऐसे किसी को घेर कर मॉब लिंचिंग करना कहाँ तक सही है
जी समझ गए। 

संवाद चार 

सर फिर भी... 
बुद्धिजीवी – देखिये, मैं आपकी भावना समझता हूँ पर आप अज्ञानता की बात कर रहे हैं। मैं आपको बताता हूँ। इस शब्द का मतलब वो नहीं है जो सारा देश समझता है। इस शब्द का भाषा विज्ञान देखोगे तो आपको बहुत कुछ मिलेगा। सं 550 इसवीं में इस का मतलब जो हुआ करता था, वो बिल्कुल अलग था। शब्द की उत्पति पर गौर करेंगे तो आप ये बात नहीं कह पाएंगे जो अभी कह रहे है। फिर भी अगर आपकी भावना हर्ट हुई है तो मैं उसके लिए माफ़ी मांगता हूँ। आप ये लेख पढ़िए, इससे आपके संदेह का निवारण हो जाना चाहिए। 

जी मैं बिना पढ़े ही समझ गया। बहुत शुक्रिया। 

संवाद 

- सर पर ग़लत तो है ना? 
बुद्धिजीवी – देखिये, गाली गुस्से में दी जाए तो ज़रूर ग़लत है पर अगर मैं अपने दोस्त को दे रहा हूँ, प्यार से दे रहा हूँ, दोस्त को भी मेरी इंटेंशन पता है, तो? हमारे यहाँ की तो तहज़ीब में ही गालियाँ शामिल हैं। क्या तहजीब ही ग़लत है? यहाँ तो जो गाली देकर बात न करे तो उसे दोस्त ही नहीं समझा जाता। जितनी ज़्यादा गाली दी जाती है, दोस्ती उतनी ही क़रीबी होती जाती है। हाँ, लड़ाई-गुस्से में आप किसी को गाली दो, वो तो ग़लत है। 

-सर आप शायद ग़लत समझ रहे हैं। हम इसलिए ग़लत नहीं कह रहे हैं कि हमें आपके दोस्त के लिए बुरा लगा है। नहीं, बात आपके दोस्त  की नहीं है, इंसानियत की है। जितनी भी गालियां भारत में हैं, वे या तो  औरतों को लेकर हैं या दलित-दमित जातियों के नाम पर। तो ये गालियां आप मज़ाक में, प्यार में, कैसे भी दें, मनोबल उन्हीं का तोड़ने का काम करती हैं जो सबसे निचले पायदान पर हैं। आप ही सोचिये ना सर, हमने औरत के भाई को भी गाली बना लिया है। उस औरत का घर में आत्मविश्वास क्या रहा होगा? उस औरत के योनांग को गाली बना लिया है। आप को एक उदारहण से समझाता हूँ। पड़ोसी का एक पांच साल का बच्चा आपके बच्चे के साथ खेल रहा है। आपने अपने बच्चे को जातिसूचक गाली देते हुए कुछ कहा। अब पड़ोसी की वही जाति है जिसको गाली बना कर आप अपने बच्चे को दे रहे हो। इससे आपके बच्चे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा जबकि पडोसी के बच्चे का मनोबल टूट जाएगा। हालांकि, आपने तो अपनी समझ में उसे कुछ नहीं कहा। आसपास अपने बारे में इतनी निगेटिव बातें सुनकर जीना आसान नहीं होता है, सर। 
बुद्धिजीवी - देखिये आप जो बातें कर रहे हैं, वह अतिवाद है। इतना सोचकर कोई गाली नहीं देता। जैसे आप कह रहे हैं, वैसे कुछ नहीं होता है। बहुत दलित भी गाली देते हैं। औरतें भी गाली देती हैं।हम गाली दे देते है लेकिन इसका कोई सीरियस मतलब नहीं होता है। 

सर सभी गालियां औरतों और दलितों पर ही क्यों हैं? आप प्यार में सबको साला क्यों बोलते हैं, जीजा क्यों नहीं बोलतेदेवर क्यों नहीं बोलते? 
 बुद्धिजीवी - देखिये अब आप कुतर्क कर रहे हैं। और मुझसे ये सब बहस क्यों कर रहे हैं? मैं फेमिनिस्ट नहीं हूँ। 

सर फेमिनिस्ट की बात कहाँ से आई? 
बुद्धिजीवी - मैं दलित चिंतक भी नहीं हूँ। 

- बिलकुल नहीं हैं। पर, सर, आप हैं क्या
 बुद्धिजीवी  - मैं संसार का आठवाँ अजूबा हूँ। 

सर आप इतने हर्ट क्यों हो रहे हैं? सोचिए, एक अच्छे इंसान के नाते आप गाली नहीं देते हैं तो...
 बुद्धिजीवी - तो मेरी साँसे रुकने लगती हैं। दिल धड़कने से मना कर देता है। 
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Friday, January 25, 2019

कृष्णा सोबती : चान्नण मीनार जो लफंगों का चैन छीनती है


उस चान्नण मीनार कृष्णा सोबती के होने से हिंदी साहित्य के लफंगे, लम्पट, छिपे और खुले दक्षिणपंथी, फासिस्टों के चम्पू ख़ुद को कितना विचलित और अपमानित महसूस करते थे, किसी से छिपा हुआ नहीं है। इन नये-पुराने कवि-लेखक तत्वों की हालत चोरों-डाकुओं की तरह रौशनी को गालियां देकर ख़ुद को तसल्ली देने जैसी थी। इतने मजमों और तमाशों में रहने वाले वे घूम-फिर कर एक शब्द उछाला करते थे - 'ओवररेटेड'। यह उन्हें उनके वैचारिक पूर्वजों/आक़ाओं से हासिल हुआ था और अकेले में वे कभी आँखें फैलाकर, कभी नज़रें झुकाकर, कभी हथेली घुमाकर और कभी ताली बजाकर इस तरह कहा करते थे, जैसे वे अभी किसी महीन आलोचक की तरह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हों। उन्होंने एक-दो नाम कृष्णा सोबती बनाम अलां-फलां करने के लिए रट रखे थे जो न उन्हें कहीं ले जा पाते थे और न वे उन नामों को कहीं ले जा सकते थे।

इस गिरोह की समस्या ख़ुद अपनी कायरता और बेईमानी थी। बूढ़े मसीहा शीर्ष पुरुष उस फिल्मी सितारे अमिताभ की तरह फासिस्टों के चरणों में बिछकर और साम्प्रदायिक बातें कर लम्पटों को राह दिखा रहे थे तो कृष्णा सोबती अपनी वृद्धावस्था और अपनी ज़ईफ़ी के बावजूद फासिस्टों के ख़िलाफ़ मज़बूत स्टैंड लेती रही थीं। इस भयानक राजनीतिक परिदृश्य में उनके विवेक और उनके साहस ने आख़िरी वक़्त तक उनका साथ नहीं छोड़ा। उनका यह व्यक्तित्व, उनकी यह बेबाकी और उनकी यह राजनीति कायरों और दलालों के हृदय में शूल सी गड़ती थी। यह चुभन ऐसे बहुतेरों के मुँह से सार्वजनिक बकवासों से लेकर निजी बातचीत तक में हम सुनते ही रहे हैं और तसल्ली पाते रहे हैं कि एक वृद्ध और बीमार बुद्धिजीवी लेखिका साहित्य में फैले समाजशत्रुओं के लिए किस तरह कांटा बनी हुई हैं।

इसीलिए, कृष्णा सोबती के लिए प्यार और एहतराम के साथ मेरे मन से 'चान्नण मीनार' निकला। रौशनी की मीनार। लाइट हाउस।

Saturday, December 22, 2018

मेघालय: मुख्यधारा की राजनीति, खनन माफिया और उजड़ता जनजातीय जीवन

Photo: Tarun Bhartiya

इस साल फरवरी में मेघालय विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह की आशंका की खबरें छपी थीं कि चुनाव में खनन माफिया का पैसा इस्तेमाल हो रहा है। पुलिस ने उस दौरान काफी कैश बरामद भी किया था। मेघालय के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एसबी सिंह से भारतीय जनता पार्टी नाराज थी और चुनाव आयोग से उन्हें पद से हटाने की मांग भी कर रही थी। कोल माइनिंग पर नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के बैन को लेकर कोई रास्ता निकालने का आश्वासन भी भाजपा ने चुनाव के दौरान दिया था। भाजपा कहने को अकेली चुनाव लड़ रही थी पर सभी जानते थे कि नैशनल पीपल्स पार्टी के चुनाव के पीछे भाजपा है। इस अघोषित गठबंधन का ही नतीजा था कि भाजपा सिर्फ़ दो विधायकों के बूते एनपीपी के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही थी। (राज्यपाल की भूमिका तो महत्वपूर्ण थी ही।) बहरहाल, चुनाव अभियान के दौरान जो हालात थे, उनके मद्देनज़र यह साफ हो रहा था कि नई सरकार में खनन माफिया बेलगाम होने जा रहा है। 8 नवंबर को जानी-मानी एक्विस्ट एग्नेस खारशियेंग, उनकी साथी अमिता संगमा और उनके ड्राइवर पर कोल माफिया के हमले ने इस आशंका को सच साबित कर दिया। कोयला माफिया और सत्ता के नेक्सस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आरोपियों में सत्तारूढ़ एनपीपी का एक बड़ा नेता निदामन चुलेट शामिल है जिसकी गिरफ्तारी में टालमटोल जारी है। इस वारदात की सीबीआई की जांच कराने की विपक्ष की मांग को भी सरकार ठुकरा चुकी है।
Agnes Kharshiing
एग्नेस और अमिता पर जानलेवा हमला एक सनसनीखेज आपराधिक वारदात भर नहीं है। यह वारदात मेघालय के खनन माफिया खासकर कोयला माफिया, सत्ता खासकर मौजूदा सत्ता के चरित्र, ट्राइबल्स इलाकों की जीवन व रोजगार की मुश्किलों, तेजी से नष्ट किए जा रहे प्राकृतिक संसाधनों, जनता के सवालों को लेकर सत्ता के प्रतिरोध में खड़े होने वाले नागरिक संगठनों पर भविष्य के खतरों को लेकर गंभीरता से विचार करने की मांग करती है। सिविल सोसायटी वीमेन्स ऑर्गेनाइजेशन (सीएसडब्लूओ) की अध्यक्ष एग्नेस जिस तरह की शख़्सियत हैं, उन पर किसी बड़े संरक्षण के बिना हमला करने की सोचना आसान नहीं था। वे एक बेलौस जन-बुद्धिजीवी और जुझारू ईमानदार एक्टिविस्ट हैं। महिलाओं-बच्चों के दफ़्न कर दिए जाने वाले यौन शोषण के मसले हों, गरीबों, वंचित तबकों के रोजी-रोटी और आवास के सवाल हों, मानवाधिकारों के दमन का मामला हो, सत्ता केंद्रों में व्याप्त करप्शन के केस हों, यूरेनियम माइनिंग जैसा हाई प्रोफाइल मसला हो, एग्नेस हमेशा संघर्ष में आगे मिलेंगी। जुलूसों से लेकर उत्पीड़ितों के बचाव में गांवों तक दौड़ती हुईं, गांव-गांव में पीडीएस के तहत सामग्री का ईमाननदारी से वितरण सुनिश्चित कराती हुईं, मीटिगें करती हुईं, फाइलें लिए प्रशासनिक कार्यालयों से लेकर कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटती हुईं, आरटीआई लगाती हुईं...। जाहिर है कि मेघालय के ताकतवर कोल माफिया की निरंकुश कारगुजारियों के प्रतिरोध में भी वे एक खरी आवाज़ हैं। जब उन पर हमला किया गया तो वे ईस्ट जयंतिया हिल्स जिले के तुबेर सोशरे में कोल माइनिंग साइट पर ही सबूत जुटाने के लिए विडियो बना रही थीं। एक दिन पहले ही उनकी शिकायत पर शिलॉन्ग में कोयले से लदे ट्रक सीज़ किए गए थे। बताया जाता है कि उन्हें चुप कराने के लिए कोई शख़्स उनके घर पैसे का ऑफर लेकर भी पहुंचा था लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे खींचने से इंकार कर दिया था। वे कोयला खनन पर एनजीट के बैन के बाद भी अवैध खनन जारी होने के अनेक मामले पुलिस की निगाह में ला चुकी हैं और कोल माफिया की नज़रों में खटकती रही हैं। आखिर, उन्हें रास्ते से हटा देने के लिए बर्बर हमला किया गया। एग्नेस और अमिता को मरा जानकर जंगल में फेंक दिया गया था। होश में आने पर अमिता किसी तरह घिसटते हुए सड़क पर पहुंचकर मदद हासिल करने में कामयाब रहीं। बाद में एग्नेस को जंगल से ढूंढकर बेहोशी की हालत में अस्पताल भेजा गया।
Angela and Agnes 
मेघालय में लेफ्ट की मौजूदगी सिर्फ़ कागजों पर है। पॉपुलर पॉलिटिक्स के विभिन्न धड़े आम जनता से जुड़े जेनुइन मुद्दों पर बेरुखी रखते हैं या जनद्रोही स्टेंड लेते हैं। इसके बावजूद वहां एक प्रग्रेसिव नज़र वाले जन प्रतिरोध की जगह `थमा उ रांगली-जुकी` (तुर) संगठन के रूप में लगातार असरदार ढंग से विस्तार लेती रही है। दो साल शिलॉन्ग में रहते हुए तुर की उपस्थिति सड़कों पर जलसों-जुलूसों की शक्ल में और कई बड़े बदलावों में बार-बार महसूस हुई। प्रभुत्वशाली तबकों की आम सहमति के आधार पर सड़कों-फुटपाथों से खदेड़ दिए गए हॉकर्स-वेंडर्स के लिए टकरातीं तुर की नेतृत्व पंक्ति की एंजला रांगेड की छवियां मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। अपने ठीयों पर वापसी का यक़ीन शायद हॉकर्स-वेंडर्स को भी न रहा हो पर महिलाओं की बहुसंख्या वाले तुर के उस आंदोलन ने यह संभव कर दिखाया। आरएसएस के स्वयंसेवक वी षडमुखनाथन की राजभवन में यौन अराजकता के विरोध में यही एक्टिविस्ट सड़कों पर न उतरतीं तो गवर्नर पद से उसकी छुट्टी न हुई होती। ऐसे बहुत से कामयाब कारनामों में तुर का एक अविश्वसनीय कारनामा सरकारी और गैर सरकारी विभागों/दफ्तरों में 14 यूनियनें खड़ी कर दिखाना रहा। देशभर में यूनियनों के खत्म होने या अप्रासंगिक होने के दौर पर इन यूनियनों का अस्तित्व में आना और तमाम मसलों पर सक्रिय रहना अलग से लिखे जाने की मांग करता है। फिलहाल कहना यह कि एग्नेस खारशियेंग ऐसे हर संघर्ष में साथ रही हैं। मेघालय की निवर्तमान कांग्रेस सरकार के समय के शिक्षा विभाग के भर्ती घोटाले को सामने लाने में एग्नेस और एंजला की ही मुख्य भूमिका रही है। इस घोटाले में पिछली सरकार के मंत्रियों की गर्दनें फंसी हुई है। लेकिन, पूर्ववर्ती सरकारों में इन एक्टिविस्टों के लिए जेल और मुकदमे तो थे, मार डालने की इस तरह की कोशिशें न थीं।
8 नवंबर को एग्नेस पर हमले की ब्रेकिंग न्यूज देखते ही तुरंत यही बात मेरे मन में आई कि क्या मेघालय में प्रतिरोध की ऐसी आवाज़ों को हिंसक दमन के साथ ख़ामोश कराने की शुरुआत हो चुकी है। क्या यह मेघालय में एक नयी राजनीतिक संस्कृति का आगाज़ है? इस वारदात में सत्तारूढ़ पार्टी के नेता का नाम आने से ऐसी आशंकाओं को बल मिलना लाज़िमी था। विपक्ष के तमाम नेताओं ने सरकार को निशाने पर लिया, कुछ गिरफ्तारियां हुईं पर सीबीआई जांच की मांग को सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया। तुर की नेता एंजला रांगेड ने कहा कि एग्नेस के संघर्ष और प्रतिरोध की संस्कृति को धीमा नहीं पड़ने दिया जाएगा। जाहिर है कि प्रगतिशील नागरिक संगठनों के लिए मेघालय में एक नया रणक्षेत्र खुलने जा रहा है। एक हद तक माँ को महत्व देने वाले खासी समाज की विरासत में मर्दवादी नजरिये से बदलाव जैसे मसलों में सरकार की दिलचस्पी से भी लगता है कि नागरिकों की बेहतरी के सवालों को दक्षिणपंथी-पितृसत्तात्मक तौर-तरीकों से पीछे धकेलने की कोशिशें होंगी और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए दमन तेज होगा।
Photo: Tarun Bhartiya
मेघालय में कोयले के अवैध और अनियंत्रित खनन का मसला बेहद जटिल है। अप्रैल 2014 में एनजीटी ने इस खनन पर रोक लगा दी थी तो कोयला खदानों के मालिकों, उनके दलालों और सत्ताकेंद्रों से जुड़े ताकतवर लोगों के नेक्सस ने इसे ट्राइबल्स के मूल अधिकारों और हितों पर हमले के रूप में प्रचारित किया था। बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए थे। खासकर जयंतिया हिल्स में जन-असंतोष जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिशें हुई थीं। जयंतिया हिल्स अवैध कोयला खनन की मुख्य केंद्र हैं। मेघालय घूमने जाने वाले अधिकतर लोग खासी हिल्स में आने वाली राजधानी शिलॉन्ग से चेरापूंजी के आसपास के इलाके घूमकर आते हैं।एक लोकप्रिय टूरिस्ट स्पॉट डाउकी है। भारत-बांग्लादेश सीमा पर जयंतिया हिल्स से गिरने वाले झरने मैदान में नदी की शक़्ल लेकर बांग्लादेश चले जाते हैं। जाड़ों के मौसम में झरने शांत हो जाते हैं तो नदी का पानी थिर हो जाता है। जरा सी ट्रिक फोटोग्राफी इस साफ-शफ्फाक पानी में नावों को हवा में दिखाने लगती है। इस सुदंर जगह को प्रदूषित कर आने वाले कथित पर्यटकों को गुमान भी न होगा कि कुछ उनकी वजह से और खासतौर से कोल माइनिंग की वजह से इस नदी की दुर्लभ प्रजाति की मछलियां संकट में पड़ चुकी हैं।
Jaiantia Hills
अवैध-अनियंत्रित कोल माइनिंग के कुख्यात इलाकों की झलक शिलॉन्ग से सिलचर (असम का कछार जिला) जाने वाले हाइवे पर यात्रा करने भर से मिल सकती है। ये पॉपुलर टूरिस्ट इलाके नहीं हैं। इसी सप्ताह मुझे सिलचर यूनिवर्सिटी के प्रफेसर और हिंदी कवि कृष्णमोहन झा की बदौलत उनके साथ इस हाइवे पर लौट-फेर करने का मौका मिला। खासी हिल्स से निकलकर जयंतिया हिल्स में प्रवेश के कुछ देर बाद ही इन खूबसूरत रहे पहाड़ी इलाकों पर कोल माइनिंग के दुष्प्रभाव दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। पहाड़ियां की पहाड़ियां खत्म हो चुकी हैं और एनजीटी के बैन के बावजूद कोयला ढोते ट्रक सड़कों पर दौड़ते मिलते हैं। जंगल और उसकी खासियतें कोयले के लालची सौदागरों की भेंट चढ़ चुकी हैं। असम के कछार जिले की तरफ से न्यू कछार हिल्से (एनकेपी) के सिलसिले के साथ मेघालय की जयंतिया हिल्स में प्रवेश करें तो ऊंचे परबतों सी वनाच्छादित पहाड़ियां मन मोह लेती हैं। छोटी-छोटी नदियां और पानी के सोते भी नज़र आते चलते हैं। गो के उनका संकट भी नज़र आता है। लेकिन हिल्स की यह खूबसूरती ज्यादा साथ नहीं देती है। कोल माइनिंग से पैदा हुई बरबादी चिंता में डालती है कि ये जंगल और ये पहाड़ियां इंसान के सामने कितने दिन टिक सकती हैं? कि किस्सों में `अनटच नेचर` का घर नोर्थ ईस्ट भी उत्तराखंड बनने की राह पर है।
इस अनियंत्रित, अनियोजित और अवैध कोल माइनिंग पर बैन को ट्राइबल्स के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले ट्राइबल्स की ज़िंदगी पर खतरे का जिक्र नहीं करते हैं। बेतहाशा हुई कोल माइनिंग ने जलस्रोतों और छोटी-छोटी नदियों को या तो खत्म कर दिया है या बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है। खनन को ट्राइबल्स का अधिकार बताने वाले धनपशु इसकी वजह से पेड़-पौधों, जलीय जीवों और ट्राइबल्स पर भयंकर संकट के स्पष्ट प्रमाणों को नज़रअंदाज करते हैं। मेघालय-असम की सीमा की न्यू कछार हिल्स (एनकेएच) की दिमासा ट्राइब्स के लोगों ने जब देखा कि उनकी कोपिली नदी का पानी पीने लायक नहीं रहा है और उसमें मछलियां भी दम तोड़ रही हैं तो उन्हें पता चला कि इसकी वजह जयंतियां हिल्स में हो रहा अंधाधुंध कोयला खनन है। इस अवैध खनन पर एनजीटी की रोक का श्रेय असम की ऑल दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमा हासाऊ डिस्ट्रिक्ट कमेटी की ओर से दायर की गईं पिटीशन्स को भी है।
कोयला खनन को ट्राइबल्स के अधिकारों का हनन बताने वाली कहानी का सबसे बड़ा छल यह है कि आम ट्राइबल्स इन कोयला खदानों के मालिकान न होकर निरीह मज़दूर हैं। उत्तर भारत और बांग्लादेश के निरीह मज़दूरों के साथ अपनी जान-जोखिम में डालकर, जरूरी सावधानियां बरते बिना मामूली पैसों के लिए काम करने वाले मज़दूर। खनन माफिया और उसके संरक्षक सत्ता केंद्र न तो इस अवैध खनन के दौरान हुए भयानक हादसों पर बात करना चाहते हैं, न मजदूरों के वास्तवित हितों पर। कॉरपोरेट को प्राकृतिक संसाधन लुटाने के लिए तैयार रहने वाली ट्राइबल लीडरशिप गरीब ट्राइबल जनता की गरिमा और उनके लिए रोजगार के दूसरे साधनों को मुहैया कराने में कोई रुचि नहीं लेती है। बुरी तरह हाशिये पर धकेली जा रही जनता ऐसे में इस अवैध खनन में खटने, छोटी-मोटी चा-चावल-समोसे की दुकान चला लेने को ही खुशकिस्मती मान लेती है और अवैध खनन पर बैन को रोजगार छिन जाने की तरह देखती है।
हिल्स पर मालिकाना हक़ का मामला भी काफी जटिल है। शिलॉन्ग में रहने वाले बेहतरीन फिल्मकार, कवि, विचारक और सोशल एक्टिविस्ट तरुण भारतीय अक्सर बताते हैं कि ट्राइबल्स इलाकों में भूमि का मालिकाना हक़ पूरे कबीले का रहता आया है। निजी संपत्ति की अवधारणा आने के बाद कई तरह की जो मुश्किलें आई हैं, उसे कोयला खनन मामले में भी देख सकते हैं। स्थानीय चतुर लोगों और बाहरी लोगों ने सांठगांठ के जरिये कोल हिल्स हासिल कर ली हैं। मामूली रकम देकर बेनामी मालिकाना हक़ भी पा लिए गए हैं। एक छोटे से हिस्से को संपन्न बनाने वाला यह खेल बाकी लोगों को और ज्यादा बेबस बनाकर ही नहीं छोड़ देता बल्कि इस सामुदायिक जनजीवन वाले समाज में तरह-तरह से लेयर्स पैदा करता है। उनके खेती और मछली पालन के परंपरागत पेशों को भी नष्ट करता है।
इस अन्याय पर पलने वाली राजनीतिक ताकतों की इस घिनौने खेल को रोकने में कोई रुचि नहीं है। यह समस्या लाइम स्टोन आदि के खनन से भी जुड़ी है और खासी व गारो हिल्स भी इससे अछूते नहीं है। ट्राइबल्स के इलीट और संपन्न हो चुके छोटे से तबके को भी प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट और आम ट्राइबल्स के संकट से बेचैनी नहीं पैदा होती है। उसे दूसरे राज्यों के कथित पर्यटकों की तरह बड़ी गाड़ियों के लिए हिल्स काटकर चौड़ी सड़कें बनते चले जाने से खुशी मिलती है और लूट में थोड़ी हिस्सेदारी से।
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November 2018 के आख़िरी हफ़्ते में लिखा गया मेरा यह लेख समयांतर के December 2018 अंक में छप चुका है।-धीरेश