Monday, July 20, 2009

उदय प्रकाश प्रकरण : गू खाने को ट्रेंड बनाने की कोशिश

उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर उदय का निरंतर प्रलाप और उनके समर्थन में आई टिप्पणियों दोनों से जाहिर होता है। इतवारी जनसत्ता में भी उन्होंने एक ब्लॉगर से ऐसा ही कुछ लिखवाया है। इस ब्लॉगर का कहना है कि कई बड़े साहित्यकार अपने समय के तानाशाहों के कसीदे काढ़ चुके हैं, लेकिन उनके रचनाकर्म पर बात होती रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बहुत से लेखक हैं जिन्होंने भाजपा शासित राज्यों में साहित्यिक क्षेत्र के मुनाफे कमाये हैं। तो क्या कहने का मतलब है कि गू खाना पुरानी परम्परा है, सो हमने भी खा लिया और यही ट्रेंड के रूप में माना जाना चाहिए।
हैरत यह भी है कि जिस ब्लॉगर ने यह लेख लिखा है, वह पहले उदय प्रकाश की करतूत पर नाराजगी जता चुका है लेकिन फिर वो उदय प्रकाश के घर गया और उसे उनकी आंखों के कोर में अपने सही रास्ते का इलहाम हो गया। इस ब्लॉगर का कहने के मुताबिक यह मान लिया जाए कि उदय प्रकाश का विरोध करने वालों में कई बेदाग़ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस मुद्दे पर विरोध का अधिकार नहीं है। ऐसा है तो इस ब्लॉगर का निकट इतिहास ही बलात्कार के गंभीर आरोपों से बदनुमा है, फिर वो किस नैतिकता से यह फरमान जरी कर रहा है?
जनसत्ता के इस लेख में हिन्दी लेखकों को इस नाते असिह्ष्णु माना गया है कि उन्होंने उदयप्रकाश की चुप्पी को ग़लत ढंग से लिया और उनसे कुछ जानने की जरूरत नहीं समझी। अब इससे से बड़ा झूठ ही शायद कोई हो। उदय प्रकाश जब योगी के हुजूर से लौटे तो उनका ब्लॉग यह जानकारी नहीं दे रहा था। किसी भी तरह के करियरिज्म से दूर रहे बेमिसाल पत्रकार अनिल यादव (जो जनसत्ता के लेखक के मुताबिक नौजवान हैं और इस नाते लेखक दुधमुहाँ है ) ने इस बारे में गोरखपुर के अख़बारों में छपी ख़बर और फोटो को ब्लॉग पर छाप दिया था तो उदय प्रकाश हिंसा पर उतारू हो गए थे। पुरस्कार वो लाए थे और इस ख़बर को दूसरों की साजिश बता रहे थे, अनिल यादव को नौकरी से निकलवाने की धमकी दे रहे थे और इस घटना का विरोध करने वाले लेखकों को लांछित करा रहे थे। यह उनके परिवार के संघ की मजबूती के लिए उठा कदम था और योगी इस संघ की प्रेरणा शक्ति थे (हैं )। बाद में उनका सफाईनामा और उसके समर्थन में उनके द्वारा छापे जा रहे कमेन्ट भी गज़ब हैं। कई तो योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बना दे रहे हैं और लगभग सभी सेकुलरिज्म को गरियाते हुए उदय प्रकाश-आदित्यनाथ कंपनी को जायज ठहरा रहे हैं। उदय प्रकाश इन समर्थकों के शुक्रगुजार हैं।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि कभी अटल बिहारी और कभी सोनिया के कसीदे पढ़ चुके नट के हुनर से लोग जल रहे हैं. कमाल यह भी है कि इस भयानक मसले में असली मुद्दे को दरकिनार करने के लिए `कौन दूध का धुला है` और `विरोध करने वालों में कितने बिरहमन-कितने कायस्थ` आदि सवाल उठाने वालों में ऐसे लोग भी हैं जिनसे आदित्यनाथ जैसे मसले पर जिम्मेदारी की उम्मीद की जा सकती थी. कुछ लोग कह रहे हैं कि बात ठीक है पर व्यक्तिवादी बात न हो. तो क्या हिटलर को हिटलर कहना व्यक्तिवादी निंदा होगी?
कुछ लोगों को विरोध और गुस्से की भाषा पर एतराज है और वीरेन डंगवाल की टिप्पणी का खासकर ज़िक्र किया जा रहा है। नफरत और आतंकवाद के सरगना को लेकर कौन से शालीन भाव व् शब्द मन में उठते हैं, यह अशोक वाटिका और संघ परिवार के लोग ही बता सकते हैं। सवाल तो यह उठता है कि इस मसले पर संतुष्ट किस्म की चुप्पी साधे बैठे बहुत से बड़े लेखक जिनमें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव और दूसरे तमाम लेखक कब अपना रुख जाहिर करेंगे (`संतो कुछ तो कहो इस गाढ़े वक़्त में `)।
दरअसल यह मसला सांप्रदायिक ताकतों के उभार के बाद लेखकों के एक तबके में यह साफ़ हो जाने का है कि अब धर्मनिरपेक्षता से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। पहले लेखकों का हिन्दुवाद थोड़ा सफाई के साथ सामने आ रहा था, मगर अब उदय प्रकाश ने जरा आगे बढ़कर खुलेआम इस डेरे की शरण ले ली (हालाँकि निर्मल verma कुछ राह दिखा ही गए थे और कई दोयम पहले ही उस डेरे में बैठ भी चुके थे) । एक तरह से उन्होंने असमंजस में रहे लोगों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। वे साहित्य के जोर्ज फर्नाडीज कहे जा सकते हैं। देखना है कि अब उनके पीछे कितने लोग इस ट्रेंड का अनुसरण करते हैं।

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जनसत्ता शायद हर न्यायकारी आवाजों पर हमले करने का मंच बन गया है. पांचजन्य का `बौद्धिक` वहां छपता ही रहता है. सरकारी हत्यारे गिरोह सलवा जुडूम द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान आयोजित करने के नाटक और उसमें कई लेखकों के शामिल होने का कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने विरोध किया था। इस कदम का न्याय की पक्षधर शक्तियों ने स्वागत किया है पर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। यह पुराने अफसर का स्वाभाविक अफसर प्रेम भी है और उनका हमेशा परगतिशील जनपक्ष का विरोधी होने का शगल भी।

Friday, July 17, 2009

उदयप्रकाश का सफाईनामा और संसद में रोना आदित्यनाथ का

दोस्तों, उदय प्रकाश बड़े लेखक हैं. उनके पास शब्दों की जादूगरी है और दुनिया भर का साहित्य उन्होंने पढ़ा है. वे अपनी उपलब्धियों और बेबसी व यंत्रणाओं का अनंत किस्सा अपने ब्लॉग पर ही लगभग आत्मरति के अंदाज में पढ़ाते ही रहते हैं. वे महान भी हैं और कुंवर भी, अति लोकप्रिय भी हैं और हाशिये के बेहद उत्पीडित साधारण जन भी. ऐसा सब उनका ब्लॉग लगातार बोलता है. इन दिनों उन्हें बेहद दुःख है कि आखिर वर्चुअल सर्च के जरिये क्यों उनका आदित्यनाथ के हुजूर में सलाम का फोटो पेश कर दिया गया. फिर यह उनका पारिवारिक मसला था जिसके राजनीतिक अर्थ तलाश लिए गए. इस यंत्रणा के दौरे में उन्होंने अनिल यादव को इस गुस्ताखी के लिए धमकियाँ भी दे डालीं, और जिस-तिस को जातिवादी और भ्रष्ट भी करार दे डाला. उनके समर्थकों ने तमाम अफवाहें भी फैलायीं और इस कृत्य का विरोध कर रहे लेखकों पर भी सवाल खड़े किए - कि विरोध करने वाले क्या दूध के धुले हैं आदि, आदि. यानी हमने जो किया, सही किया. अब अचानक उनकी आत्मा में नई हलचल हुई है और उन्होंने अपने ब्लॉग पर गज़ब का स्पष्टीकरण दिया है. अंदाज़ वही पुराने हैं. चाहें तो संसद में योगी आदित्यनाथ को रोते हुए याद कर सकते हैं.

Wednesday, July 15, 2009

आदित्यनाथ-उदयप्रकाश एंड कंपनी उर्फ़ प्रतिरोध अभी मरा नहीं है

हिन्दी साहित्य जगत में इधर कई हलचलें मची हुई हैं. एक लम्बे अरसे के बाद कवि, लेखक और विचारकगण एकजुट होकर दक्षिणपंथी खेमे की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षा का मुँहतोड़ जवाब देते दिख रहे हैं. हाल ही गोरखपुर में हिन्दी कहानीकार और कवि उदय प्रकाश द्वारा बदनाम फाशिस्ट योगी आदित्यनाथ के हुज़ूर में उपस्थित होकर "नरेंद्रप्रताप सिंह स्मृति सम्मान" प्राप्त करने की निर्लज्ज करतूत से हिन्दी साहित्य जगत में सनसनी फैल गयी. वरिष्ठ और युवा लेखकों और बुद्धिजीवियों ने एक स्वर से इसकी निंदा की, और निम्नलिखित प्रस्ताव पास किया. प्रस्ताव पढ़कर और हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची देखकर ढाढस बंधता है कि अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है. आप भी पढ़ें. ('कबाड़खाना' से साभार)


विरोध-पत्र
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हमें इस घटना से गहरा आघात पहुँचा है कि कुछ दिन पहले हिन्दी के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय साहित्यकार उदय प्रकाश ने गोरखपुर में पहला "कुँवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान" योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिन्दुत्ववादी, सामन्ती और साम्प्रदायिक सांसद के हाथों से ग्रहण किया है, जो 'उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है' जैसे फ़ाशीवादी बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं . हम अपने लेखकों से एक ज़िम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं .


ज्ञानरंजन,
विद्यासागर नौटियाल,
विष्णु खरे,
मैनेजर पाण्डेय,
लीलाधर जगूड़ी,
भगवत रावत,
राजेन्द्र कुमार,
राजेन्द्र राव,
चंचल चौहान,
आनंदस्वरूप वर्मा,
पंकज बिष्ट,
इब्बार रब्बी,
नीलाभ,
वीरेन डंगवाल,
आलोक धन्वा,
मंगलेश डबराल,
त्रिनेत्र जोशी,
मनीषा पाण्डेय,
रविभूषण,
प्रदीप सक्सेना,
अजय सिंह,
जवरीमल्ल पारख,
वाचस्पति,
अतुल शर्मा,
विजय राय,
मनमोहन,
असद ज़ैदी,
मदन कश्यप,
रवीन्द्र त्रिपाठी,
नवीन जोशी,
अजेय कुमार,
वीरेन्द्र यादव,
देवीप्रसाद मिश्र,
कुमार अम्बुज,
कात्यायनी,
निर्मला गर्ग,
अनीता वर्मा,
योगेन्द्र आहूजा,
शुभा,
बोधिसत्व,
संजय खाती,
नवीन कुमार नैथानी,
कृष्णबिहारी,
विनोद श्रीवास्तव,
प्रणय कृष्ण,
राजेश सकलानी,
इरफ़ान,
मुनीश शर्मा,
विजय गौड़,
आशुतोष कुमार,
मनोज सिंह,
सुन्दर चन्द ठाकुर,
नीलेश रघुवंशी,
आर. चेतनक्रान्ति,
पंकज चतुर्वेदी,
शिरीष कुमार मौर्य,
रामाज्ञा शशिधर,
प्रियम अंकित,
अंशुल त्रिपाठी,
प्रेमशंकर,
अशोक कुमार पाण्डेय,
रविकांत,
मृत्युंजय,
धीरेश सैनी,
अनुराग वत्स,
व्योमेश शुक्ल.

आदित्यनाथ की करतूतों को सामने लाने के लिए सुभाष गाताडे ने महत्वपूर्ण काम किया है. उदयप्रकाश द्वारा आदित्यनाथ के हाथों `सम्मानित` होने की खबर सुनकर उन्हें भी गहरा दुःख हुआ और उन्होंने भी इस विरोध में अपना नाम शामिल कराया है.

Thursday, June 18, 2009

गोरा आदमी (अफ्रीकी कविता)

गोरे आदमी ने मेरे बाप को मार डाला
मेरा बाप अभिमानी था

गोरे आदमी ने मेरी माँ को धर दबोचा
मेरी माँ सुंदर थी

गोरे आदमी ने दिन दहाड़े मेरे भाई को जला डाला
मेरा भाई शक्तिशाली था

अश्वेत रक्त से लाल अपने हाथ लिए
गोरा आदमी फिर मेरी तरफ़ मुड़ा
और विजेता के स्वर में चिल्लाया
ब्वॉय! एक कुर्सी...एक नैपकिन...एक बोतल
(अज्ञात)

१९७४ के आसपास जेएनयू से एक पत्रिका निकली थी `कथ्य'। बहुत सारे प्रतिभाशाली युवा साहित्यकार इससे जुड़े थे पर दुर्भाग्य से इसका एक ही अंक निकल पाया था। यह कविता उसी पत्रिका से ली है।

Monday, June 8, 2009

बेमिसाल हबीब


आज सुबह हबीब तनवीर नहीं रहे. अपने विशुद्ध थियेटर के काम की लिहाज़ से भी वे लिविंग लीजैंड थे पर उन्होंने सेक्युलर मूल्यों को बचाने के लिए जिस कदर संघ परिवार और उसकी साम्प्रदायिक बिरादरी से मोर्चा लिया, वैसे उदाहरण दुनिया भर में कम ही मिलते हैं. फिर अपने यहाँ तो साहित्यकारों-कलाकारों में संघ के फासीवाद तक को सांस्कृतिक शब्दावली से गौरवान्वित करने की लम्बी परम्परा है. जल्द ही हबीब साहब पर अलग से एक पोस्ट देने की कोशिश करूँगा, फ़िलहाल श्रद्धांजलि स्वरूप इसी ब्लॉग से ये पुरानी पोस्ट (5सितम्बर 2008) चस्पा कर रहा हूँ-


1सितंबर को महान रंगकर्मी हबीब तनवीर का जन्मदिन था। इस मौके पर वीपी हाउस, दिल्ली में सहमत ने हबीब के चाहने वालों और अदीबों से उनकी बातचीत का इंतजाम किया था। मैं इसके कुछ हिस्से को पोस्ट करना चाहता था कि इस बीच वेणुगोपाल नहीं रहे। इस नाते इस पोस्ट को स्थगित करना पड़ा। इस बीच इसका बड़ा हिस्सा मुझसे खो भी गया.....बहरहाल जो है, उसका लुत्फ लीजिए-

मासूमियत या मजबूरी
कीमतें आसमान छू रही हैं। एक तरफ गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी है और दूसरी तरफ कुछ लोग लाखों रुपये महीना कमा रहे हैं। यह खाई पटना जरूरी है। कैसे पटेगी मोटेंक अहलूवालिया या चिदंबरम से, नहीं जानता। या तो मासूमियत है या मजबूरी कि वो किसी और तरीके से सोच नहीं सकते। ...मां के पेट से झूठ बोलते हुए कोई नहीं आता सोसायटी से ही सीखते हैं...

अंधेरे में उम्मीद भी
जो थिएटर छोड़कर फिल्मों, सीरियलों की तरफ जा रहे हैं, वहां काम की तलाश में जूतियां चटकाते हैं। कुछ चापलूसी, कुछ जान-पहचान काम करती है। मुझे उनसे कुछ शिकायत नहीं है। क्या करें पेट पर पत्थर रखकर काम मुश्किल है। हमारे जमाने में दुश्मन बहुत साफ नजर आता था। सामराजवाद से लड़ाई थी। एक मकसद (सबका) - अंग्रेजों को हटाओ, रास्ते कितने अलग हों (भले ही)। अब घर के भीतर दुश्मन है, उसे पहचान नहीं सकते। विचारधारा बंटी है। पार्टियों की गिनती नहीं, हरेक की मंजिल अलग-अलग। इस अफरातफरी में क्या किसी से कोई आदर्श की तवक्को करे। हां, मगर लिबरेलाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन, नए कालोनेलिज्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं सब तरफ से। खुद उनके गढ़ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन में भी। तो ये उम्मीद बनती है।

जवाब से कतराता हूं
मैं अपने डेमोक्रेटिक मिजाज का शिकार रहा हूं। मेरी अप्रोच डेमोक्रेसी रही है, मैं प्रचारक या उपदेशक थिएटर में यकीन नहीं रखता। ये कोई जम्हूरी बात नहीं (शायद यही शब्द बोला था) कि आपने सब कुछ पका-पकाया दे दिया, कि मुंह में डालकर पी जाना है। अगर आप समझते हैं कि दिल-दिमाग वाला दर्शक आता है तो उकसाने वाला सवाल देना काफी होता है। ये नहीं कि मैं सवाल भी और जवाब भी पेश कर दूं। जवाब से कतराता हूं। हां, इसका हक नुक्कड़ नाटक को है, वहां जरूरी है जवाब भी देना। उनकी प्रोब्लम्स हैं। हड़ताल वगैरह होती हैं, सड़कों पर भी निकलना पड़ता है (नुक्कड़ नाटक वालों को)।

हुसेन के मिजाज की कद्र करता हूं
मैं दोनों काम करता हूं, सड़कों पर भी निकलता हूं, न निकलने वालों पर एतराज नहीं। हुसेन नहीं निकलते। उनका मिजाज अलग है। उसकी मैं कद्र करता हूं। उन्होंने (हुसेन ने) कहा, जो मेरे खिलाफ बातें हो रही हैं, सैकड़ों मुकदमे बना दिए गए हैं, इसलिए नहीं आ रहा हूं। ये भी एक तरीका है रेजिस्टेंस का। हर आर्टिस्ट अपने-अपने मिजाज के तहत काम करता है।मैं यहां कोई फारमूला पेश नहीं करता। मैंने अपने नाटकों में कई तरह के प्रयोग किए। ये आप लोग रियलाइज करें, चाहें तो उड़ाएं, चाहें तो सराहें। इस बारे में पूछकर आप मुझे थका रहे हैं। मैं अपने काम की व्याख्या से इंकार करता

दिल को तनहा भी छोड़िए
(मख्दूम के एक शेर का हवाला देते हुए रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कुछ कहते हैं। शायद अंतरात्मा जैसा कुछ )...वो इकबाल का शेर है- अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल, कभी-कभी इसे तनहा भी छोड़िए। सिर्फ अक्ल से क्रिएट करना संभव नहीं है। दिल से भी बातें होती हैं। (मख्दूम का - शहर में धूम है एक शोलानवां की मख्दूम को पूरा पढ़ते हैं।) बाल्जक से पूछा गया था कि एक प्रास्टीच्यूट की एसी तस्वीर क्यों बनाई, उन्होंने कहा, एमा इज मी। एलन्सबर्ग ने भी कहा कि आप करक्टर क्रिएट जरूर करते हैं लेकिन वो अपनी कहानी खुद कहता है। आपका उसमें कोई कंट्रोल नहीं रहता।
देखिए आप उसमें शऊर घुसाएंगे तो वो कुछ हो जाएगी- उपदेश, अखबारनवीसी या कुछ न कुछ मगर कला नहीं रहेगी।

मौत के सौदागर कर रहे हैं रूल
ग्लोबलाइजेशन सब कुछ सपाट कर रहा है। सिस्टेमेटिक ढंग से सोचने के आदी हो गए हैं। आराम इसी में है कि सिस्टम बनाएं, उसके पीछे छिप जाएं। इन लोगों के लिए ये मुमकिन नहीं है कि आदिवासी सभ्यता को समझ कर लोकेट किया जाए या हर तबके के लिए अलग ढंग से सोचें। एक सिस्टम बना है शोषण-दमन का, बंटवारे का, कि लोगों को डिवाइड करो। यही क्लासिकल तरीका था, अब इसमें नए-नए तरीके जुड़ गए हैं। पालिटिशन, गवर्मेंट्स रूल नहीं कर रहे हैं, मर्चेंट्स आफ वार, मर्चेंट आफ डेथ, ड्रग मर्चेंट (कुछ और भी जुमले कहे), यही सब डिक्टेट कर रहे हैं। होम, फारन, इकानमी, सब पालिसी वही तय कर रहे हैं। हमारे यहां इसकी शुरुआत है। हम ग्लोबलाइजेशन के चौराहे पर हैं।

खतरे के रास्ते से मिलता है खजाना
पुराने जमाने में किस्से यूं थे कि एक हीरो निकला, दो रास्ते आए। एक मुश्किलों भरा, जिस पर न जाने के लिए उसे सलाह दी जाती है लेकिन वो उसी मुश्किलों भरे रास्ते पर निकलता है। और खजाना उसी रास्ते पर जाकर मिलता है। हीरोइन भी खतरे भरे रास्ते के आखिर में ही मिलती है।

(कार्यक्रम में कई बड़े आर्टिस्ट थे, अलग-अलग फील्ड के। सबने कुछ पूछा। लंबी बातें जो नोट कीं, मुझसे खो गईं। जोहरा सहगल से किसी ने कहा, आपा कुछ पूछेंगी, हबीब साहब से। उन्होंने कहा, मैं क्या पूछूंगी, मैं तो उनकी आशिक हूं। उन्होंने हबीब के 25 साल और जीने की तमन्ना भी की। एक सवाल के जवाब में हबीब ने कहा कि बहादुर कलारिन तैयार करने में सबसे ज्यादा मुश्किल आई। पोंगा पंडित पहले से होता आया। मैंने खेला तो संघ वालों ने खूब पत्थर फेंके और मुझे मशहूर कर दिया। इस सब के बीच कुछ करने का दबाव भी हमेशा रहा। गुमनामी अच्छी है या नामवरी...जैसे कई गीत भी हबीब की मंडली ने सुनाए।)

Sunday, May 24, 2009

आबिद आलमी की गज़ल

जब य` मालूम है कि बस्ती की हवा ठीक नहीं
फिर अभी इसको बदल लेने में क्या ठीक नहीं
मेरे अहबाब की आँखों में चमक दौड़ गई
हँस के जब मैंने कहा हाल मेरा ठीक नहीं
दिल का होना ही बड़ी बात है कैसा भी हो
मैं नहीं मानता यह टूटा हुआ ठीक नहीं
अपनी आँखों से जो हालत की देखी तस्वीर
एक भी रंग य ` मालूम हुआ ठीक नहीं
ज़हर मिल जाए दवा में तो ज़ायज़ है यहां
हाँ मगर ज़हर में मिल जाए दवा ठीक नहीं
उसकी फ़ितरत ही सही चीख़ना चिल्लाना मगर
मैं समझता हूँ नगर में वो बला ठीक नहीं
ख़ुद ही डसवाता था इक सांप से लोगों को वो
ख़ुद ही कहता था कि ये खेल ज़रा ठीक नहीं
खैंच लेते हैं ज़बां पहले ही मुंसिफ़ `आबिद`
कहने सुनने की अदालत में वबा ठीक नहीं

आबिद आलमी यानी रामनाथ चसवाल (४ जून १९३३ - ९ फरवरी १९९४).
बेहद कठिन और संघर्षशील जीवन जिया. खुद को शायर मानने का दंभ कभी नहीं रहा. हरियाणा में शिक्षकों के संगठन और वामपंथी आन्दोलन में आखिरी साँस तक सक्रिय रहे. प्रदीप कासनी की कोशिशों से उनका संग्रह `अलफाज़' आधार प्रकाशन से साया हुआ है. इस ब्लॉग पर उनकी दो अन्य गज़लें देखें-http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/11/blog-post_08.html

Monday, May 4, 2009

इक़बाल बानो - जुझारू स्त्री-स्वर : असद ज़ैदी


एक लम्बी बीमारी के बाद इक़बाल बानो (1935-2009) पिछली 21 अप्रैल को चल बसीं. लाहौर के इत्तेफ़ाक़ अस्पताल में दोपहर बाद उन्होंने आख़िरी साँस ली. उस वक़्त उनकी बेटी मलीहा और बेटे हुमायूँ उनके क़रीब थे. दूसरे बेटे अफ़ज़ल उसी रोज़ सुबह उनके अस्पताल ले जाए जाने से पहले सऊदी अरब रवाना हो चुके थे. उन्हें उनके घर के पास ही गार्डन टाउन क़ब्रिस्तान में शाम को दफ़ना दिया गया. दफ़न के वक़्त उनके परिवार और पड़ोसियों के अलावा ज़्यादा लोग नहीं थे. संगीत और फ़िल्म की दुनिया से कोई भी वहाँ नहीं पहुँच सका – लोक-गायक शौकत अली के अलावा. बाद में पाकिस्तान की नैशनल असेम्बली और सिंध की प्रांतीय असेम्बली में उनके लिए फ़ातिहा (मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना) ज़रूर पढ़ी गयी. पर यह स्पष्ट नहीं है कि हमारे 'ग़ज़लप्रेमी' प्रधानमंत्री के मुँह से कोई बोल फूटा हो, या रोहतक में पली बढ़ी और दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खाँ की निगरानी में परवान चढ़ी इस गायिका के गुज़र जाने का कोई अहसास हरियाणा के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में देखा गया हो.

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उनका जन्म सन 1935 में रोहतक के एक साधारण हैसियत वाले मुस्लिम परिवार में हुआ. पिता परम्परावादी तो थे पर रौशन ख़याल भी थे. इक़बाल की आवाज़ छुटपन से ही सुरीली थी. एक रोज़ उनके पिता से उनके हिन्दू पड़ोसी ने कहा : बेटियाँ मेरी भी ठीक ठाक गाती हैं पर इक़बाल की आवाज़ तो देवी का वरदान है. इसे संगीत की तालीम दिलाओ, यह बहुत आगे जाएगी. नेकदिल पड़ोसी की सलाह सुनकर और इक़बाल की ज़िद देखकर पिता राज़ी हो गए. रोहतक में इक़बाल की संगीत की तालीम शुरू कराने के रास्ते में कई अड़चनें थीं, इसलिए पिता उन्हें दिल्ली ले गए और दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खां ने उन्हें ठुमरी और दादरे के गायन का प्रशिक्षण देना शुरू किया (ग़ज़ल गायकी उस दौर में किसी गंभीर पेशेवर गायक या गायिका का लक्ष्य नहीं हो सकती थी). उनकी सिफ़ारिश पर इक़बाल छोटी उम्र में ही आल इंडिया रेडियो के कार्यक्रमों में गाने भी लगीं. उस्ताद चाँद खां इस ख़याल से बेखबर थे कि हिन्दुस्तान पाकिस्तान का बटवारा कुछ और ही गुल खिलाएगा और दिल्ली घराने का दिल्ली ही से आबदाना उठ जाएगा.

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1950 में खुद इक़बाल का परिवार मुल्तान में जाकर बस गया. 1952 में सिर्फ़ 17 साल की उम्र में एक ज़मींदार से उनकी शादी कर दी गई. उनके पति ने यह शर्त मान ली और ता-उम्र इसका पालन भी किया कि वह इक़बाल के गायन में रुकावट नहीं डालेंगे. 1957 में उन्होंने पहली बार लाहौर में एक बड़े मंच से गाया और तभी से उनकी शोहरत होने लगी. जल्द ही वह उपशास्त्रीय गायकों की अग्रिम पंक्ति में मानी जाने लगीं. साठ के दशक में वह अपने ठुमरी, दादरा गायन के लिए मशहूर थीं. उन्होंने कई फ़िल्मों ('गुमनाम', 'क़ातिल', 'इंतिक़ाम', 'सरफ़रोश', 'इश्क़े लैला', 'नागिन') में पार्श्व-गायिका के रूप में भी काम किया और उस दौर के कई गाने अभी तक याद किए जाते हैं. उन्होंने फ़ैज़ और नासिर काज़मी की नज़्मों और ग़ज़लों को भी गाने के लिए चुना.

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यह वह दौर था जब उपमहाद्वीप में ग़ज़ल गायकी उरूज पर आया चाहती थी. सिनेमा, माइक्रोफोन और रिकार्डिंग टेक्नोलाजी के विकास, स्पूल टेप रिकार्डर्स, ट्रांज़िस्टर, 45 और 33 आर पी एम रिकार्डों की सहज और व्यापक उपलब्धि ने नई आज़ादी और लोकतांत्रिक संभावनाओं और अवाम के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक बेचैनियों के साथ मिल कर नई फ़िज़ा और नई ज़रूरत पैदा कर दी थी. इस ज़रूरत को फ़िल्म-गीत का पुख्ता और मोतबर उद्योग पूरा नहीं कर पा रहा था. इसका जवाब सेमी-क्लासिकल और पक्के गाने वालों की दुनिया से आया. हिन्दुस्तान में बेगम अख्तर और पाकिस्तान में बरकत अली खां और अमानत अली खां इस नए मंच के सच्चे संस्थापक थे.

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संगीत की दुनिया में गंभीर ग़ज़ल गायकी का महान उभार दरअसल उपमहाद्वीप के बटवारे के बाद की घटना है. 1960 और 1970 के दशक से पूरे उपमहाद्वीप बल्कि पूरी दुनिया में जहाँ भी दक्षिण एशियाई बसते हैं उनके बीच उसको मिली असाधारण सफलता इस युग की एक केन्द्रीय सांस्कृतिक-सामाजिक परिघटना है. इस से पहले संगीत की एक विधा के बतौर ग़ज़ल गायकी एक हल्की-फुल्की चीज़ मानी जाती थी. संगीत की यह वह विधा है जिसे हमारे या हमसे पिछली पीढ़ी के देखते देखते महज़ अवाम के उत्साह और गर्मजोशी ने एक ऊंचे पाये तक पहुँचाया, और ग़ज़ल-गायकी की क़िस्मत थी कि इस दौर में उस्ताद अमानत अली खाँ, बेगम अख्तर, इक़बाल बानो, मेंहदी हसन, फ़रीदा खानम और नय्यरा नूर जैसी हस्तियाँ मौजूद थीं. कश्मीर से कन्याकुमारी तक और सिंध तथा बलोचिस्तान से लेकर ढाका और रंगून तक दक्षिण एशिया के अवाम ने मेंहदी हसन, इक़बाल बानो और नुसरत फ़तेह अली की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाकर उन तमाम विभाजनकारी राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक बदनसीबियों का खुले दिल से प्रतिकार किया जो पिछली एक सदी में हुक्मरान तबकों और उनके ताबेदारों ने लोगों के सर पर लादी हैं. यह एक बहुत बड़ा आलमी सांस्कृतिक प्रतिरोध था और एक ऐतिहासिक एकता की पुकार थी. यह बटवारे का जवाब थी. इस लोकतांत्रिक पुकार के ठीक केंद्र में इक़बाल बानो की आवाज़ मौजूद है. जो शुद्धतावादी ग़ज़ल गायन को उपशास्त्रीय गायन की एक उपेक्षणीय और हीनतर कोटि में रखते हैं वे इतिहास और संस्कृति दोनों का नुक़सान करते है और अँधेरे को बढ़ाते हैं.

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1985 – जनरल ज़ियाउल हक़ की ग्यारह साल लम्बी तानाशाही का आठवाँ साल. इस काले दौर का एक बड़ा हिस्सा लेबनान और भारत में आत्मनिर्वासन में गुज़ारकर फ़ैज़ 1982 में थके थके पाकिस्तान लौटे थे और 1984 में उनकी वफ़ात हो गयी थी. उनकी शायरी पर सरकारी प्रतिबन्ध था और सैनिक शासन फ़ैज़ को दुश्मन क़रार देता था. 1985 में उनके जन्मदिन पर लाहौर में फ़ैज़ मेले का आयोजन किया गया. सर्दी का मौसम था और फ़ैज़ की प्रिय गायिका इक़बाल बानो को इसमें फ़ैज़ का कलाम गाना था. देखते देखते पचास हज़ार लोग जमा हो गए. पाकिस्तान में ज़िया शासन के खिलाफ़ चौतरफ़ा ग़ुस्सा था ही, इक़बाल बानो ने पहले तो तय किया कि वह अपने दस्तूर के मुताबिक साड़ी पहनकर मंच पर बैठेंगी (ज़िया काल में लिबास के बतौर साड़ी को ठीक नहीं समझा जाता था) और फ़ैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे / वो दिन कि जिसका वादा है, जो लौहे-अज़ल पे लिक्खा है' गाएंगी. ये एक विस्फोटक फैसला था. उस प्रस्तुति की गूँज आज तक लोगों के कानों में है – उन कानों में भी जो उस वक़्त वहाँ नहीं थे. ऐसी हंगामाखेज़ सांगीतिक प्रस्तुति इस उपमहाद्वीप ने अपने बीसवीं सदी के इतिहास में कभी नहीं देखी. छः-सात से बारह-तेरह मिनट तक गई जा सकने वाली इस ग़ज़ल को इक़बाल बानो क़रीब एक घंटे या शायद इस से भी ज़्यादा देर तक गाती रहीं, और श्रोता समुदाय का यह आलम था कि (एक चश्मदीद गवाह ने बाद में कहा) लगता था कि ज़िया शासन के खिलाफ़ क्रान्ति शुरू हो गयी है. उस रोज़ से इस नज़्म को अवाम ने बेदार पाकिस्तानियत का तराना क़रार दे दिया इक़बाल बानो के लिए यह असंभव हो गया था कि इसे गाए बिना किसी कार्यक्रम से उठ जाएँ.

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हर बड़े कलाकार के साथ कुछ न कुछ चला जाता है. इक़बाल बानो ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में बहुत लोकप्रिय थीं क्योंकि वह फ़ारसी की क्लासिकल ग़ज़लें बहुत अच्छी तरह गाती थीं. अपनी मातृभाषा के महान शायरों की रचनाएं इक़बाल बानो की आवाज़ में सुनने के लिए ईरान में लोग बड़ी तादाद में जमा हो जाते थे. 1979 तक हर साल जश्ने-काबुल में भी फ़ारसी और दारी की ग़ज़लें गाती रहीं. कहती थीं कि उन्होंने 72 ऐसी ग़ज़लें गाईं. पता नहीं इन ग़ज़लों की रिकार्डिंग कहीं मौजूद भी है या नहीं.

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इक़बाल बानो की कहानी ग़ज़ल तक ही महदूद नहीं है. उनके निधन से उपशास्त्रीय और फ़िल्म गायकी में गर्वीले, जुझारू और अकुंठित तेवर से गाने वाले स्त्री-स्वर की पुरानी परम्परा अब लगभग समाप्त हो गयी है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, शमशाद बेगम, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली, राजकुमारी दुबे, सुरय्या जैसी विभाजन-पूर्व की गायिकाएँ इस धारा की प्रमुख अलमबरदार थीं. जैसा कि फ़िल्म-चिन्तक अशरफ़ अज़ीज़ कहते हैं, यह धारा किसी न किसी तरह आज़ादी की लड़ाई में औरतों के सक्रिय और जुझारू योगदान के समानांतर चल रही थी. उस दौर के पुरुष स्वर इनके मुकाबले संयत और दबे दबे लगते थे. विभाजन के बाद से हवाएँ पलटीं और ऐसी आवाज़ की ज़रूरत हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी मध्यवर्ग को होने लगी जिसमें कोइ चुनौती, बग़ावत या उच्छृंखलता का निशान न हो, बल्कि जो चुनौती-विहीन कर्णप्रियता, शील और संकोच से लबालब हो. इक़बाल बानो की एक खूबी यह थी कि नए युग में भी उन्होंने स्त्री-स्वर के उस पुराने जुझारूपन की याद बनाए रखी.

('पब्लिक एजेंडा' के नए अंक से साभार)
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