Wednesday, July 29, 2009

जेएनयू में नामवर - हैप्पी बर्थडे लीलाधर














निमंत्रण
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जे एन यू के हमारे गुरु और भारतीय साहित्य के गौरव पुरुष
डाक्टर नामवर सिंह
के जन्म दिन पर
आइए उनके साथ रात का भोजन करें.
हमारे निवास १५ लोधी स्टेट, नई दिल्ली-३ में
२९ जुलाई २००९ को शाम ७ बजे से आपके आने तक.

आपके
पुतुल सिंह
दिग्विजय सिंह
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नामवर सिंह ८३ के हो चुके हो चुके हैं। ८० के होने के बाद उनकी उपाधियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। `आलोचना का शीर्ष पुरुष` पहले `हिन्दी साहित्य का शीर्ष पुरुष` हुआ और अब `भारतीय साहित्य का गौरव पुरुष` हुआ। नया तमगा उन्हें पुतुल सिंह और दिग्विजय सिंह ने उनके सम्मान में दिए जा रहे रात्रिभोज के निमंत्रण पत्र में दिया है। जल्द वे `विश्व साहित्य के शीर्ष या गौरव पुरुष` कहलावें, ऐसी अपनी शुभकामना है। हैप्पी बर्थडे।
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दावत के मेजबान दिग्विजय सिंह वही ठाकुर साहेब हैं जो एक्स पी एम चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में शामिल थे। बाद में वे बीजेपी की सरपरस्ती में बनी सरकार में भी मंत्री रहे। कृपया तिल का ताड़ न बना दीजियेगा। ये किसी का भी निजी मसला है कि कोई किस सरकार में मंत्री बने और कोई किसे अपनी दावत का प्रायोजक बनाये। अपने प्रगतिशील लेखक संघ के `शीर्ष पुरुष` के फंडे तो यूँ भी साफ हैं और अब उन्होंने उदय प्रकाश सिंह के योगी आदित्यनाथ के हाथों `सम्मानित` होने के मसले में भी इसका सबूत इस तरह दिया है - `किसी लेखक का मूल्यांकन उसकी साहित्यिक कृतियों से ही होगा। तिल का ताड़ बनाना अच्छा नहीं।`
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नामवर सिंह के फंडे हमेशा ही साफ़ रहे हैं। शायद ही कभी किसी घड़ी में कोई फ़ैसला लेते उन्हें किसी तरह की झिझक रही हो। जाने कितने आपातकाल और कितने विध्वंस इस शीर्ष पुरुष ने आखिर यूँ ही खुशी-खुशी नहीं गुजर जाने दिए। २८ जुलाई को उनका हैप्पी बर्थडे दिल्ली में ही त्रिवेणी सभागार में मान्य गया, वहां उन्होंने कम से कम दो साल और जीने का संकल्प लिया और जनता ने उनसे कम से कम सौ साल जीने की गुजारिश की। इस मुश्किल वक्त में वे हर जटिल मसले पर हमेशा की तरह निश्चिंत रहें, द्वंद्व और बेचैनी को पास न फटकने दें तो निश्चय ही उनके सानिध्य से इस कलि काल में जनता को प्रेरणा मिलती रहेगी।
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त्रिवेणी सभागार में वक्ताओं को बोलने के लिए शीर्षक दिया गया था - `जेएनयू में नामवर सिंह`। मगर रामाधिकार कुमार यानी आर कुमार यानी जेएनयू के रेक्टर यानी नेक्स्ट टू वी सी कुछ ऐसे भावुक हुए कि नामवर सिंह को भूलकर जेएनयू के छात्रों और छात्र आन्दोलन पर बरसते रहे। अपने नॉन स्टॉप लंबे भाषण में वे आरक्षण की बखिया भी उधेड़ते चले। जेएनयू की जुझारू छात्र राजनीति का हिस्सा रहे कई भूतपूर्व छात्र इस प्रवचन के दौरान असमंजस में रहे (शर्मसार होते रहे? )। लीलाधर हमेशा की तरह निश्चिंत मंद-मंद मुस्कारते रहे । अलबत्ता जेएनयू के एक छात्र से न रहा गया और उसने झूठ बोल रहे रेक्टर को ललकारा. लीलाधर फिर भी मुस्कराते रहे, मानो कह रहे हों, `कैसी नादानी कर बैठे वत्स? मैंने भी छात्रों के साथ यही सुलूक किया था। विरोध करने वाले प्रतिभाशाली छात्रों का क्या हश्र हुआ और मलाई छात्रों की किस भक्त जमात को मिली, यह तो पहचानते वत्स`.
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रामाधिकार कुमार भले ही नामवर पर कम बोले पर जो कुछ वाक्य उन्होंने इस बारे में उच्चारित किए, काफी से ज्यादा ही थे। उन्होंने भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना से लेकर जेएनयू में जाने क्या-क्या रच देने का श्रेय नामवर के श्री चरणों में अर्पित किया। यह बात अलग कि भारतीय भाषा केन्द्र की स्थापना के पीछे सक्रिय रहे उस समय के छात्रों में से एक इस अर्पण पर गुस्से में जलते-भुनते रहे। नामवर बोलने उठे तो उन्होंने नीलकंठ की तरह झूठ के गरल को भी खुशी-खुशी यह कहकर स्वीकार किया कि मैं तो मात्र निमित्त हूँ।
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गुरुजी के शिष्यों ने अलबत्ता दक्षिणा देने में कंजूसी की। उन्होंने गुरुजी की ढेरों बड़ी उपलाब्धियों का जिक्र ही नहीं किया। किसी ने नहीं कहा कि नामवर जी राजस्थान से जेएनयू में सावित्री चंद्रा (जिनकी एकमात्र योग्यता थी यू जी सी के तात्कालीन चेयरमैन सतीश चंद्रा की पत्नी होना ) को रीडर नियुक्त करने के लिए बुलाये गए थे। बाद में नामवर जी जेएनयू के हो ही जाने थे। बताते हैं कि इन्हीं सावित्री चंद्रा ने अपने साहित्य शोध में किसी मिठाई बनाने की विधि भी लिखी थी.
किसी ने नामवर जी की गुरुभक्ति का भी जिक्र नही किया कि कैसे उन्होंने बनारस में अपने गुरुजी का मकान बनाने वाले चिंतामणि को जेएनयू में अध्यापक बनाकर गुरु दक्षिणा दी थी।
किसी ने यह भी नहीं बताया कि इन दो अध्यापकों की अयोग्यता से परेशान हिंदी के छात्रों ने उनकी क्लास का बहिष्कार किये रखा था। बाद में आपातकाल ने नामवर जी को ताकत दी तो इन `दुस्साहसी छात्रों` को `ठीक` किया गया। यह जिक्र खासा प्रेरक हो सकता था.
लेकिन शिष्य आख़िर क्या-क्या बताते- हरि अनंत, हरि कथा अनंता।

चलिए एक मशहूर शेर का यह मिसरा याद करें -
"पहुँची वहीं पे ख़ाक जहाँ का ख़मीर था."

18 comments:

Anonymous said...

Bipin Chandra or Satish Chandra ?

Pl. Clarify .

रंगनाथ सिंह said...

is post ke liye dhanyavad. namvar chalisa ke kuchh aur panne palat dete to humare hindi gyan me thoda aur ijafa ho jata. ye jankariya hindi sahitya ke pahle dusare ya tisare ya kisi bhi itihas me nhi di h...isliye aapka aabhar

अशोक कुमार पाण्डेय said...

उदय चालिसा ले बाद अब नामवर चालीसा।

जिन चीज़ों पर आपने/हमने उदय प्रकाश को इतना लताडा था वह सब थोडे फेरबदल के साथ नामवर जी पर नहीं कहा जा सकता?

वह अपार प्रतिभासंपन्न लेखक हैं जिन्होंने साहित्यालोचना से अधिक समय उठापठक और पुरस्कार प्रबंधन को दिया।

Ek ziddi dhun said...

एनोनीमस जी, धन्यवाद! वह सतीश चन्द्र ही थे. भूल सुधार ली गयी है.

Ashutosh Kumar said...

kripya sher poora likh den

pankaj said...

प्रिय धीरेश भाई ,
आपने ग़ज़ब का लेख लिखा है. अल्बेयर काम्यू ने कहा था-----'मुझे वे लोग ज़्यादा पसंद हैं, जो साहित्य की
बजाए अपनी ज़िन्दगी में पक्ष लेते हों.' जीवन , सभ्यता और संस्कृति नष्ट हो जायें , तो क्या साहित्य बचा रह पायेगा ? मगर हिन्दी के आचार्य सोचते हैं -----सिर्फ़ साहित्य बचा लो. किसी ज़माने में चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने अपने मशहूर निबन्ध 'कछुआ -धरम' में लिखा था -----'शुतुरमुर्ग रेत में अपनी गर्दन डालकर सोचता है-----ख़तरा टल गया !' रही बात आचार्य जी के "निमित्त मात्र " होने की , तो जिस 'गीता' के आधार पर यह तथाकथित विनम्र स्थापना की गयी है ; उसकी विनम्रता की कलई 'गीता ' में ही कृष्ण के इस वक्तव्य से उतर जाती है----------

"चातुर्वर्न्यम मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः
तस्य कर्तारमपि माम् विद्ध्यकर्तार्मव्ययम ! "
( चारों वर्ण , यानी ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र मेरे द्वारा ही "गुण और कर्म के आधार पर विभाजित करके" सृजित किये गये हैं . इनका मैं कर्ता हूँ , इसके बावजूद तुम मुझे "अकर्ता " ही जानो ! )
इसके बाद भी किसी को सत्ता-प्रतिष्ठान की दुरभिसंधियों का अंदाज़ा न हो पाये , तो वह या तो बहुत भोला है या फिर महा-धूर्त .
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

Anonymous said...

pankaj ka teer to dron ke hridy ko chhalnee kar dega? lekin vahan koi hridy nahi hai. likha to sahi gaya hai phir bhi adhura hai. agli-pichhli kisi pidhi ke shishy pura karenge kya?

Ek ziddi dhun said...

प्रिय आशुतोष जी (क्षमा करें आप शायद छद्म नाम इस्तेमाल कर रहे हैं),

व्यापक पूछताछ और खोजबीन के बाद पूरा शेर मिल पाया. शेर इस प्रकार है:

आखिर को गिल सर्फ़े-दरे-मैकदा हुई
पहुँची वहीं पे ख़ाक जहां का खमीर था.

[गिल का अर्थ है मिट्टी या कोई बुनियादी तत्व]

आपको जानकर अचरज होगा कि यह शेर मुग़ल बादशाह जहाँदार शाह का लिखा हुआ है. इसका रचनाकाल १६८६ से १७१२ के बीच का है. जहाँदार शाह औरंगजेब का पोता था और केवल एक-डेढ़ वर्ष ही गद्दी पर टिक पाया था.

Sunil said...

प्रिय जिद्दी धुन, जब नामवर-काशी-केदार-उदय खुली नंगई कर रहे हैं, यानी अपने दलाल चरित्र का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए लज्जित नहीं होते, तो उनपर यह मीठी-मीठी चुटकी लेने वाले लोगों का आपके ब्लॉग पर anonymous का मुखौटा लगाकर प्रकट होना कहाँ तक उचित है? बुरा न मानियेगा! सुनील

Ek ziddi dhun said...

सभी साथियों से एक विनम्र निवेदन :

जब तक ख़ास मजबूरी न हो, जहां तक हो सके, anonymous भेस धर कर या छद्म नाम से प्रतिक्रिया न दें. और अगर ऐसा करना ही पड़े तब या तो अपना परिचय न छिपाकर ब्लॉग मोडरेटर से विशेष आग्रह कर लें, या anonymous नाम से ही मोडरेटर को ऐसा करने का कारण बता दें.

पुनश्चः यह एक आग्रह है, न कि अल्टीमेटम.

Ashutosh Kumar said...

ziddi bhai

mujh se aisee kya khataa huyi ki apko mera naam chhadm lag rahaa hai?

is adbhut sher kaa ek hee misraa ab tak sunte aaye the.isee karan jigyasa kee thee.

shukriya aap ka. aap kee mehnat se n kewal sher pooraa mil gaya, balki uske aitihasik mahtva kaa bhee pataa chala.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भाई इन अनजानोका डर समझिये।
आप देखिये नामवर---परमानंद- केदार -- विष्णु खरे के पास कितने पुरस्कारों की चाभी है।

pankaj said...

प्रिय धीरेश जी ,
श्री आशुतोष कुमार हिन्दी के सुप्रसिद्ध युवा आलोचक हैं . अभी ही उनकी एक अहम किताब 'शिल्पायन' से प्रकाशित हुई है-----"समकालीन कविता और मार्क्सवाद ". वह अलीगढ़
मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में associate प्रोफ़ेसर हैं . उन्होंने हिन्दी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका 'आशय ' के प्रेम - विशेषांक "प्रेम का स्त्री-अर्थ " का अतिथि-सम्पादन किया है. वह 'जन संस्कृति मंच ' की उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव हैं . उन्होंने अपने नाम से (anonymous नहीं ) आपके ब्लॉग पर आपसे यह जिज्ञासा की थी की आपने अपने लेख
में जिस शेर के एक मिसरे को उद्धृत किया है , उसका दूसरा मिसरा क्या है. आपने खोज-बीन करके बता भी दिया , जो सराहनीय है ; मगर आपने उन पर यह इल्ज़ाम भी लगा दिया की वह ये पूछताछ anonymous रहकर कर रहे हैं . आपने ऐसा किस संभ्रम के चलते किया ? शायद आप उनसे परिचित नहीं हैं . मैं आपका मित्र हूँ , इसलिए सोचा -----कवि त्रिलोचन के शब्दों में कहूँ तो-----'परिचय की यह गाँठ लगा दूं !'
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

Ek ziddi dhun said...

इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया भेजने वाले सभी मित्रों का आभार.

आशुतोष जी से क्षमा याचना और नमन. उनकी पोस्ट से मेरा उत्साहवर्धन हुआ कि मेरी मेहनत कुछ काम आई.

पंकज भाई को यह सफाई दे दूं कि मैं ने आशुतोष जी पर anonymous मेल भेजने का इल्जाम नहीं लगाया था, बल्कि उनकी पोस्ट को उनकी न समझ कर किसी छद्मनामधारी की समझ बैठा था (क्योंकि ऐसे लोगों की इंटरनेट माध्यम और खासकर ब्लॉग विधा में बहुतायत है). बहरहाल दोष मेरा है. आपका बिरादराना हस्तक्षेप सर-माथे पर.

Sunil said...

अशोक भाई,

आप विष्णु खरे जी को इस कीचड़ में क्यों घसीट लाए? आचार्यप्रवर के कारनामों से उनकी क्या तुलना!

Hitendra Patel said...

धीरेश भाई (अगर यह सही नाम है जिद्दी धुन का), इस ब्लाग को आज ही देखा. नामवर जी पर अच्छा लिखा है आपने. बधाई. खबर सबको हो तो भी इतने रोचक तरीके से इस बात को शायद ही कोई पेश कर सके. आपके बारे में जानने की उत्सुकत बढ गयी. खासकर पंकज चतुर्वेदी के कमेंट को पढकर.

Hitendra Patel said...

धीरेश भाई,
आपको दुबारा कमेंट भेज रहा हूं. पहले में विस्तार से तारीफ की थी नामवर जी का इतना सटीक चित्र खींचने के लिए. अब और दुबारा फिर लिखा नहीं जा रहा.

Anonymous said...

:)