Tuesday, October 1, 2013

लाल सिंह दिल की कविताएं



कुत्ते पुकारते हैं
`मेरा घर, मेरा घर`
जगीरदार
`मेरा गाँव, मेरी सल्तनत`
लीडर
`मेरा देश, मेरा देश`
लोग सिर्फ कहते हैं
`मेरी क़िस्मत, मेरी क़िस्मत`
मैं क्या कहूँ?
 (दिल की कविता का एक अंश)

लाल सिंह दिल की कविताओं को पढ़ने के लिए जीवट चाहिए। तल्ख़ हकीकतों में सने इक़लाब के ख़्वाब, इन ख़्वाबों की तामील के लिए संघर्ष, कड़े संघर्षों और लगभग न जी सकने के हालात में भी ज़िंदगी की दुर्लभ छवियां, एक ऐताहिसक पराजय की विडंबनाओं का गहरा बोध...। उम्मीदों और अवसादों का एक अटूट सिलसिला। एक क्लासिक कविता जिसकी भाषा और शिल्प में एक सुच्चा अनगढ़पन है और पुख़्तापन भी, वैचारिक संज़ीदगी है, अद्भुत सौंदर्यबोध है, मुहब्बतों, ख़्वाबों से भरी आग है और झूठी तसल्लियों के लिए कोई जगह नहीं है। फूल, पत्ती, कुहुक, गांव-गांव चिल्लाकर लोक-लोक करने के बजाय यहां गांव, किसानी, मजूरी, जात और इनसे जुड़ी ज़िल्लतों, कमबख्तियों के बीच संघर्षों का असली लोक है।
नक्सल आंदोलन के असर में उभरे पंजाबी कवियों पाश, अमरजीत चंदन, सुरजीत पातर आदि के समकालीन दिल की ज़िंदगी की दास्तान कम कमबख़्तियों से भरी नहीं है। लेकिन, उसका जिक्र बाद के लिए, हालांकि वह हमारे समाज के टुच्चेपन की भी दास्तान है। वे दलित थे और इस सच ने इंकलाबी होने, बड़ा कवि होने और इस्लाम कबूल करने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ा, इस दास्तान का एक मार्मिक पहलू है। एक लंबी इंतजार और कवि के जाने के बाद ही सही, आधार प्रकाशन ने उनकी कविताओं के हिंदी अनुवाद के प्रकाशन का ऐतिहासिक काम कर दिखाया है। अनुवाद का `आग का दरिया दिल से` गुजारने जैसा काम संवेदनशील हिंदी कवि सत्यपाल सहगल ने किया है। और उनकी कविताओं के मिजाज सा ही कवर डिजाइन कवि भूपेंद्र सिंह बराड़ का है। 
संग्रह से कुछ कविताएं-


मातृभूमि

प्यार का भी कोई कारण होता है?
महक की कोई जड़ होती है?
सच का हो न हो मकसद कोई
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता!

तुम्हारे नीले पहाड़ों के लिए नहीं
न नीले पानियों के लिए
यदि ये बूढ़ी माँ के बालों की तरह
सफेद-रंग भी होते
तब भी मैं तुझे प्यार करता
न होते तब भी
मैं तुझे प्यार करता
ये दौलतों के खजाने मेरे लिए तो नहीं
चाहे नहीं
प्यार का कोई कारण नहीं होता
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता

खजानों के साँप
तेरे गीत गाते हैं
सोने की चिड़िया कहते हैं।


लहर

वह
साँवली औरत
जब कभी बहुत खुशी से भरी
कहती है
``मैं बहुत हरामी हूं!``

वह बहुत कुछ झोंक देती है
मेरी तरह
तारकोल के नीचे जलती आग में
मूर्तियाँ
किताबें
अपनी जुत्ती का पाँव
बन रही छत
और
ईंटें ईंटें ईंटें।



हृढ़

वे तो हमें वहाँ फेंकते हैं
जहाँ शहीद गिरा करते हैं
, गिरते आये हैं
नहरों दरियाओं में जो, वही हमारे हैं
, कानून की चिताओं में
जो वही, अंग्रेंज वाले हैं
वहाँ लाखों करोड़ों देशभक्तों की राख है
उन्होंने सरमायेदार तो
एक भी नहीं जलाया
उन्होंने तो जट्टों सैणियों के लड़के
, झीवर पानी ढोते ही जलाये हैं
, भट्टों में कोयला झोंकने वाले लोग
काले काले प्यारे नैन-नक्श वाले पुरबीए।

वे तो हमें फेंकते हैं
हरी लचकीली काही* में
या पहाड़ी कीकरों की महक में, हम उनको
नालियों में
गोबरों में
कुत्तों के बीच से
लोगों की जूतियों के नीचे से घसीटेंगे

 * काही- नदियों, नहरों के किनारे उगने वाले सरकंडे



प्रतिकांति के पैर

सपना ही रह गया
कि फंदा पहनायेंगे
बुरे शरीफज़ादों को
वे लकीरें निकालेंगे नाक के साथ
हिसाब देंगे लोगों के आगे।

प्रतिक्रांति के पैर
हमारी छातियों पर आ टिके
ज़लील होना ही हमारा
जैसे एकमात्र
पड़ाव रह गया।


गैर विद्रोही कविता की तलाश


मुझे गैर विद्रोही
कविता की तलाश है
ताकि मुझे कोई दोस्त
मिल सके।
मैं अपनी सोच के नाखून
काटना चाहता हूँ
ताकि मुझे कोई
दोस्त मिल सके।
मैं और वह
सदा के लिए घुलमिल जायें।
पर कोई विषय
गैर विद्रोही नहीं मिलता
ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।


हमारे लिए

हमारे लिए
पेड़ों पर फल नहीं लगते
हमारे लिए
फूल नहीं खिलते
हमारे लिए
बहारें नहीं आतीं
हमारे लिए
इंकलाब नहीं आते


जात

मुझे प्यार करने वाली
पराई जात कुड़िये
हमारे सगे मुरदे भी
एक जगह नहीं जलाते
 -------

लाल सिंह दिल (1943-2007) 

आधार प्रकाशन
एस.सी.एफ. 267, सेक्टर-16
पंचकूला-134113 हरियाणा।

5 comments:

अजेय said...

अद्भुत और बेहद फ्रेश . भाषा / कहन में प्रखरता है . और ज़ाहिर है अंनुवाद में उस तेवर को पकड़ लिया गया है . सत्यपाल सहगल जी को बधाई. और धीरेश को भी . शायद हिन्दी ब्लॉग्ज़ मे6 पहली बार आए हैं दिल .

प्रफुल्ल कोलख्यान said...

लाल सिंह दिल की कविताओं को पढ़ने से भाव, भाषा, आवेग और यथार्थ के सांजस्य से कविता के सौष्ठव से संबंध का पता चलता है... बेहतर कविताएँ.. अभी इतना ही..

kailash said...

प्यार का भी कोई कारण होता है ?
महक की कोई जड़ होती है ?
सवालनुमा पंक्तियों से गुजरता रहा और लालसिंग लाल की कविताओं में उलझता रहा सुलझता रहा.दर्द मुहब्बत वक्त जाति और समाज की विसंगति के अहसास के साथ यात्रा करते हुए पहाड़ चढ़ जाता हु.आसमान का नीलापन नजर नहीं आता....

Vcadantewada Kawalnar Ashram said...

wah

navneet sharma said...

अद्भुत कविताएं....उल्‍लेखनीय किताब.....बधाई सहगल जी को और भूपेंद्र बराड़ साहब को।