Friday, September 18, 2026

अशोक वाजपेयी को संस्कृति का मसीहा कोई मूर्ख ही कहेगा - भैरव प्रसाद गुप्त

भैरव प्रसाद गुप्त (वर्तमान साहित्य, अगस्त-90)

(सुप्रसिद्ध कथाकार भैरव प्रसाद गुप्त से विद्याधर शुक्ल की बातचीत)

भोपाल का भारत भवन अपने जन्म के साथ तमाम तरह के विवादों से ग्रस्त रहा। फोर्ड फाउंडेशन से अपने सम्बन्धों तथा मार्क्सवाद के प्रखर विरोध के कारण वाम से जुड़े लेखक काफी हद तक इससे कतराते रहे। हालांकि यह भी सच्चाई रही है कि बहुत से वामपंथी लेखक चाहे, वे जनवादी लेखक संघ के सदस्य हों अथवा प्रगतिशील लेखक संघ के, अपने व्यक्तिगत नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए अशोक वाजपेयी और भारत भवन के नजदीक या दूर आते-जाते रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने मार्क्सवाद के प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छिपाया, लेकिन उनसे और भारत भवन से जुड़ने पर जो फायदे मिलते, उनके कारण नयी-पुरानी पीढ़ी के तमाम मार्क्सवादी लेखक उनके करीब आने के बहाने ढूंढ़ते रहे हैं। हाल में मध्यप्रदेश में हुए सत्ता-परिवर्तन के बाद यह लगभग तय हो गया है कि अशोक वाजपेयी अब भारत भवन को निजी जागीर के रूप में नहीं चला पायेंगे। यद्यपि परिवर्तन की इस स्थिति में कई और भयंकर खतरे निहित हैं। इस बात की पूरी सम्भावना उत्पन्न हो गयी है कि हिन्दू पुनरुत्थानवादी फासिस्ट शक्तियां भारत भवन पर काबिज हो जायेंगी। अशोक वाजपेयी ने इस स्थिति का चालाकी के साथ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अपने निष्कासन को वे शहीदाना स्तर पर ले जाना चाहते हैं। स्वामीनाथन, त्रिलोचन या हुसेन जैसे लोगों से अपने पक्ष में इस्तीफे दिलाकर वे स्वयं को संस्कृति की रक्षा में धराशायी योद्धा का दर्जा दिलाना चाहते हैं। अभी हाल में अशोक वाजपेयी इलाहाबाद आये थे। यहाँ जिस तरह दूधनाथ और मार्कण्डेय जैसे जनवादी लेखक संघ के लोगों ने भक्तिभाव से उनकी सेवा की, उससे कई दिलचस्प सवाल पैदा हुए। ये सवाल मार्क्सवाद, अशोक वाजपेयी, भारत भवन और जनवादी लेखक संघ के रिश्तों की मनोरंजक पड़ताल करते हैं। इन्हीं सवालों पर भैरवप्रसाद गुप्त से व. सा. ने बात-चीत की जो इस अंक में दी जा रही है। अशोक वाजपेयी से भी इलाहाबाद के कुछ लेखकों ने बात-चीत की, वह भी इसी अंक में पढ़ें। इसके अतिरिक्त भारत भवन के बारे में अन्य सामग्री भी हम इस अंक में उपलब्ध करा रहे हैं—सम्पादक। विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी के इस बयान (संडे आब्जर्वर 20. 5. 90) पर आप क्या कहना चाहेंगे? - 'यह देखकर हैरानी होती है कि पिछले दिनों के उथल-पुथल के बाद हमारे यहाँ उन बौद्धिक-साहित्यिक हलकों में जहाँ सारा जीवनाधार ही प्रगतिशीलता और जनवादिता है, किसी तरह की बौद्धिक बेचैनी नजर नहीं आती, बल्कि कहा तो यह जा सकता है कि जिस अनुपात में यूरोप और ऐसे बुद्धिजीवियों के पितृदेश सोवियत रूस में खुलापन और बहुलता आयी है, उसी अनुपात में हिन्दी में कट्टरता और अन्य-आग्रह बढ़े हैं - ये लोग अपनी विचारधारा के बाड़े में कैद और सुरक्षित हैं।' भैरव प्रसाद गुप्त : मुझे लगता है कि पूर्वी यूरोप में और रूस में जो घटनायें घट रही हैं, उनसे जिस प्रकार बहुत जल्दबाजी में पूँजीवादी, साम्राज्यवादी हलके अति उत्साह में आ गये हैं और तरह-तरह की बातें करते जा रहे हैं, जैसे कि साम्यवाद समाप्त हो गया, मार्क्सवाद-लेनिनवाद समाप्त हो गया... पूँजीवाद की विजय हो गयी आदि आदि। उसी प्रकार हमारे देश में भी अशोक वाजपेयी जैसे कुछ बुद्धिजीवी हैं, जो अति उत्साह में इसी तरह की बातें करने लगे हैं। पहली बात जो मैं उनकी बातों के सम्बन्ध में कहना चाहता हूँ, वह यह कि हम प्रगतिशील अथवा जनवादी कट्टर नहीं हैं और हमारा यह संकल्प भी है कि हम कट्टर नहीं होंगे। सही मार्क्सवादी कभी भी कट्टर नहीं होता। अपने सिद्धान्तों के प्रति आस्थावान बनना, दृढ़ रहना कट्टरवाद नहीं होता। कट्टरवाद वहाँ होता है, जहाँ आदमी अपने सिद्धान्तों को मार्गदर्शक सिद्धान्त न समझकर उन्हें लेकर या उसकी पूँछ पकड़कर बैठ जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह केवल अपने सिद्धान्त को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि अपने को भी नष्ट कर देता है। अशोक वाजपेयी को यह जानना चाहिए कि प्रगतिवाद अथवा जनवाद कोई आज की चीज़ नहीं है, अशोक वाजपेयी को यह भी जानना चाहिए कि जनवाद का सच्चा पाठ साम्यवादी आंदोलनों ने ही पढ़ाया है। उनका जनवाद और हमारा जनवाद अलग अलग है, इसमें कोई संदेह नहीं है। बड़े-बड़े विचारकों ने, पूँजीवादी विचारकों ने भी स्वीकार किया है कि उन्होंने या पूँजीवादी व्यवस्था ने साम्यवादी विचारधारा से बहुत कुछ सीखा और लिया है। उदाहरण के लिए एक लोक कल्याण की ही बात लीजिए, लोक-कल्याण के लिए समाजवादी व्यवस्था जैसे काम करती है, उसी प्रकार आज पूँजीवादी व्यवस्था भी करने की घोषणा करती है। मैं जानता हूँ और अशोक वाजपेयी भी यह जानते होंगे कि पूँजीवादी व्यवस्था किस रूप में और कैसे समाजवादी व्यवस्था को प्रभावित करती है?

जब तक विश्व में एक साथ समाजवादी तथा पूँजीवादी व्यवस्था अस्तित्व में रहेंगी, तब तक वे एक दूसरे को प्रभावित करती रहेंगी, एक दूसरे पर क्रियाशील रहेंगी। यदि पूँजीवादी देश समाजवाद से प्रेरणा लेकर लोक-कल्याण की बात करते हैं और इसी प्रकार कुछ समाजवादी देश पूँजीवाद से प्रेरणा लेकर बाजार से सम्बद्ध आर्थिक नीति की बातें करने लगते हैं तो इसमें बेचैन होने की कौन सी बात है! कुछ समाजवादी देश ऐसी बातें करने लगे हैं इसलिए इस परिणाम पर पहुँचना कि साम्यवाद का अंत हो गया, मार्क्सवाद लेनिनवाद का अंत हो गया, क्या सरासर मूर्खतापूर्ण बात नहीं है? आखिर किस बात की बेचैनी? उन देशों में उथल-पुथल मच रहा है, इस बात की बेचैनी? वहाँ परिवर्तन आ रहे हैं, इस बात की बेचैनी? परिवर्तन तो हमारा नारा है। परिवर्तन तो मार्क्सवाद का मूल नारा है। परिवर्तन का सिद्धान्त मार्क्सवाद ने प्रतिष्ठित किया और मार्क्सवादी परिवर्तन के लिए आये तथा समाजवादी व्यवस्था परिवर्तन के लिये आयी। हम इस बात से बेचैनी का अहसास नहीं करते कि किस देश में क्या हो रहा है बल्कि हम उसको ठंडे दिमाग से समझने का प्रयत्न करते हैं कि क्या हो रहा है, हम इन्तज़ार करते हैं कि देखा जाय ऊँट किस करवट बैठता है। अभी इसी बीच जो कुछ पोलैंड में हुआ है, चैकोस्लोवाकिया में हुआ है या रूमानिया या अल्बानिया में हुआ है, क्या अशोक वाजपेयी इन चीज़ों को देख रहे हैं? वहाँ के परिवर्तनों को, वहाँ के चुनावों के नतीजों को उन्होंने देखा है। भाई, ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद एक दिन में आ गया और एक दिन में चला जायेगा।

मार्क्सवाद एक सतत् विकासशील प्रगतिशील सिद्धान्त है। मार्क्सवाद कोई जड़ सिद्धान्त नहीं है, मार्क्सवाद कोई जड़ आदर्श नहीं है, ऐसा दर्शन नहीं है जो एक दिन में आये और दूसरे दिन चला जाय। दुनिया में और कोई वाद है, और कोई दर्शन है, और कोई विचारधारा है जिसने इस तरह तेजी से विकास किया हो और सारी दुनिया में फैल गया हो। मार्क्स और एंगेल्स ने जो सिद्धान्त निरूपित किये थे, विकास के सिद्धान्त, सामाजिक विकास के सिद्धान्त, राजनीतिक विकास के सिद्धान्त, क्या वे आज उसी रूप में हैं? क्या लेनिन ने कुछ नहीं किया? क्या स्टालिन ने कुछ नहीं किया? क्या माओ ने कुछ नहीं किया? क्या होचीमिन्ह ने कुछ नहीं किया? क्या फिदेल कास्त्रो ने कुछ नहीं किया? अशोक वाजपेयी को कुछ पढ़ना चाहिए, कुछ समझना चाहिए। राजनीति मज़ाक नहीं है। इस तरह अशोक वाजपेयी जैसे बुद्धिजीवियों को बुलबुल नहीं उड़ाना चाहिए। उनको इस बात को समझना चाहिए और समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। हम इस बात का दावा नहीं करते कि समाजवादी व्यवस्था हमेशा सही काम ही करेगी। मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह ग़लती भी करता है। पार्टियों का स्वभाव भी ऐसा ही होता है। वे भी ग़लतियां करती हैं। हम अपने को सदा सही काम करने वाला नहीं मानते। हमसे भी ग़लतियां होती हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि मार्क्सवाद हमें सिखाता है कि अगर ग़लतियां करते हो और गलतियां सामने आ जाती हैं तो उसको समझो, उसको ठीक करो और यह ध्यान रखो कि आगे वे ग़लतियां न हों। क्या और भी ऐसी कोई पार्टी है, कम्युनिस्ट पार्टी के अलावे, जो यह काम करती हो?

आज ही देख लें, अपने देश में देख लें। राजीव गांधी क्या कर रहे हैं? कांग्रेस क्या कर रही है? सब उन्हीं लोगों का किया-दिया है, देश का सारा नाश उन्हीं लोगों ने किया है, लेकिन आज ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं कि नयी सरकार देश को कमज़ोर कर रही है, नई सरकार देश की समस्याएं हल नहीं कर पा रही है, पंजाब, कश्मीर की समस्या हल नहीं कर पा रही है। क्या कोई उनसे पूछने वाला है कि तुम लोगों ने क्या किया? क्या तुम लोगों ने हल कर दिया था? हल कर देते तो काहे को यह संकट आता, काहे को यह तक़लीफे़ं होतीं। लेकिन नहीं, हमारे यहां मुसीबत यही है कि जहां कहीं कुछ होता है, देश में या बाहर तो उसे लेकर ढपली बजाने लगते हैं और इस तरह की बातें करते हैं कि हम बेचैन क्यों नहीं होते। अरे भाई, हम जानते हैं, हम समाजशास्त्र के नियमों और सिद्धांतों को कुछ समझते हैं। परिवर्तन से हमें कोई घबराहट नहीं होती। लेकिन हमें एक बात का पूरा विश्वास है और अशोक वाजपेयी को यह जान लेना चाहिए कि वह विश्वास ही प्रमुख वस्तु है, क्योंकि इस विश्वास का आधार इतिहास है, इतिहास का आधार समाज का विकास है, मनुष्य का विकास है, मनुष्य के विवेक का विकास है, समझ का विकास है, उसके ज्ञान तथा चेतना का विकास है, कि परिवर्तन अवश्यंभावी है। कभी यह परिवर्तन ग़लत भी हो सकता है और कभी सही भी हो सकता है। अगर ग़लत है तो उसको सही करना चाहिए और अगर सही है तो उसको आगे बढ़ाना चाहिए। यह हम जानते हैं। इसलिए अशोक वाजपेयी से मेरा नम्र निवेदन यह है कि वह ऐसी जल्दबाजी न करें और हमें बेचैन होने का सबक न सिखाएं। बेचैनी दरअसल उन्हें होगी, क्योंकि वे जानते हैं कि यह जो कुछ हो रहा है, वह कुछ दिनों की बात है, क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा, समाजवादी सिद्धांत, मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत यों ही हवा से उतरकर नहीं आये हैं, मार्क्सवाद-लेनिनवादी सिद्धांत वे ठोस ज़मीन से, समाज-विकास के नियमों के एक वैज्ञानिक तरीके़ से निकाले गये हैं और लगातार आज तक विकसित होते गये हैं। क्या कोई ऐसा वाद है इस दुनिया में, जिसने इस तरह से अपना विकास-विस्तार किया हो, इतनी व्याप्ति से दुनिया के देश-देश में पहुँचा हो, इतना वेग से जनमानस को उद्वेलित किया हो, इतनी ही गहराई से लोगों को संघर्ष के लिए उत्प्रेरित किया हो, इतनी शिद्दत से बौद्धिकों को आंदोलित किया हो? मार्क्सवाद एक सर्वाधिक सशक्त विचारधारा के रूप में आज भी है और मैं यह कहना चाहता हूँ कि वह अंततः विकसित होता रहेगा। लेकिन मार्क्सवाद को उसी रूप में जो लोग आज भी देखते हैं, जिस रूप में उसका सूत्रपात हुआ था, वे बड़ी ग़लती करते हैं। मार्क्सवाद आज बहुत अधिक विकसित हो गया है और आगे बढ़ गया है। उसे समग्र रूप में समझना चाहिए, उसके भविष्य के रूपों की कल्पना करना चाहिए।

अशोक वाजपेयी से मैं यह पूछना चाहूँगा कि उनके पास जनता की ग़रीबी का क्या हल है? उनके पास मज़दूरों की बदहाली का क्या हल है? उनके पास बेकारों की समस्या का क्या हल है? क्या पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर सकता है? अगर कर सकता है तो अमरीका में बेकारी क्यों है, इंग्लैण्ड में बेकारी क्यों है, पश्चिमी जर्मनी में बेकारी क्यों है, खु़द हमारे हिन्दुस्तान में इतनी बड़ी बेकारी क्यों है? 48 साल से हम आज़ाद हैं। क्या हमने इन समस्याओं को हल कर लिया? हमें कर लेना चाहिए था। अशोक वाजपेयी बतायें कि ये समस्याएँ क्यों दिन प्रतिदिन और विकराल होती चली जा रही हैं? क्या रूस में भी ऐसी ही समस्याएँ हैं? क्या चीन में भी ऐसी बेकारी है? क्या क्यूबा में भी ऐसी ही ग़रीबी है? क्या वियतनाम में भी ऐसी ही बदहाली है? हमें तो ख़ुशी होगी अगर पूँजीवाद इन समस्याओं को हल कर दे। जनता की भलाई और सुख-शांति के लिए काम करने लगे। तब क्या मुझे उसमें बेचैनी होगी कि अरे, यह पूँजीवाद क्या करने लगा? लेकिन नहीं, पूँजीवाद के बस की यह बात है ही नहीं। अशोक वाजपेयी जैसे लोग आज भी उसका पूँछल्ला बनकर उसका गीत गाये जा रहे हैं। पूर्वी यूरोप में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर उनका ख्याल है कि पूँजीवाद की विजय हो रही है। इस खु़शफ़हमी में वे जश्न मनायें, जैसे उन्होंने गैस-त्रासदी के दौरान भारत-भवन में मनाया था। जनता के सुख-दुःख से उन्हें क्या लेना? कुलीन संस्कृति वालों का नाच-गान चलता रहे, देव जावे भाड़ में।

विद्याधर शुक्ल : अशोक वाजपेयी की बात चली तो इन्हीं से संदर्भित एक और प्रश्न। विगत दिनों इलाहाबाद में जनवादी लेखक संघ के तीन पदाधिकारियों-मार्कडेय, शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह ने भारत भवन के सिरमौर अशोक वाजपेयी के सम्मान में 'कथा' की ओर से काव्य संध्या (18.4.90) का आयोजन किया। 'संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा' के रूप में उनका परिचय दिया गया। ज्ञातव्य है कि जलेस के ही रमेश कुंतल मेघ का विगत दिनों `पूर्वग्रह` में अशोक वाजपेयी के नाम लिखा गया एक पत्र छपा था, जिसका आशय यह था कि भारत-भवन के आयोजन में अवश्य आता (पूर्व स्वीकारोक्ति भी भेज चुका था) लेकिन 'जलेस' की अनुमति न होने के कारण मैं नहीं आ पाऊँगा। क्या भारत भवन के जलसों में शरीक न होने हेतु जलेस का कोई ऐसा निर्देश था? यदि था तो क्या अब उस पर से पाबन्दी हटा ली गयी है?

भैरव प्रसाद गुप्त : रमेश कुंतल मेघ ने जो बात लिखी थी, वो सही है। जलेस की कार्यकारिणी की एक बैठक में भारत भवन की गतिविधियों के सम्बन्ध में चर्चा हुई थी और यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या जलेस के सदस्य उसके समारोहों में सम्मिलित हों? काफी बहस-मुबाहिसे के बाद यह तय हुआ था कि भारत भवन की गतिविधियां, भारत भवन का फोर्ड फाउंडेशन के साथ सम्बन्धित होना और स्वयं अशोक वाजपेयी की विचारधारा ऐसी है, जिससे हमारा कोई भी सहयोग नहीं हो सकता। अगर उनसे हमारा कोई सम्बन्ध हो सकता है तो वह विरोध का ही हो सकता है। ऐसी स्थिति में जलेस के सदस्यों को उसके समारोहों से या उन्हें किसी भी प्रकार का सहयोग देने से बचना चाहिए। इलाहाबाद में 'कथा' की ओर से अशोक वाजपेयी के लिए जो जलसा किया गया, उसके सम्बन्ध में मुझे यह कहना है कि 'कथा' जलेस की पत्रिका नहीं है। हाँ, उसके सम्पादक मार्कण्डेय और जलसे के आयोजकों में शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह जलेस के पदाधिकारी हैं। इन लोगों ने 'कथा' की ओर से जो जलसा किया, मेरा ख्याल है, कि यह समझकर किया होगा कि वे लोग अपनी व्यक्तिगत हैसियत से यह काम कर रहे हैं। उसका सम्बन्ध जलेस से कुछ भी नहीं है। फिर भी इस सम्बन्ध में यह कहना चाहूँगा कि जलेस के जिम्मेदार सदस्यों को, विशेषकर उसके पदाधिकारियों को, ऐसा काम नहीं करना चाहिए था। मुझे यह सुनकर, अन्य लोगों से जिन लोगों ने शिरकत की थी जलसे में, बड़ा आश्चर्य और दुःख हुआ कि इस तरह की बातें जैसी कि आपने अपने प्रश्न में की है, कैसे कहीं गयीं? क्या कोई यह मानने को तैयार होगा कि अशोक वाजपेयी संस्कृति का समय लाने वाले मसीहा है? संस्कृति का भी क्या कोई समय होता है, जिसे कोई एक लाता हो? संस्कृति को कोई सम्पन्न कर सकता है, संस्कृति का कोई उन्नयन कर सकता है, संस्कृति के प्रति कोई जनता को जागरूक बना सकता है, यह सब तो सही है। क्या अशोक वाजपेयी ने इन कामों में से कोई काम किया? तथाकथित कुलीन संस्कृति का पोषण वे जनता के धन से कर रहे हैं, उससे कुछ कलाकारों का पोषण भले हो, जनता की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा है?

अगर ऐसा कहने का उद्देश्य अशोक वाजपेयी को मस्का लगाना हो, तो मेरा दुःख और भी बढ़ जायेगा। इस तरह की ग़लत और ऊल-जलूल बातें करना ठीक नहीं है। और जलेस के अधिकारियों को तो इस तरह की बातें करनी ही नहीं चाहिए।

अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से, 'पूर्वग्रह' के माध्यम से जो कुछ कर रहे हैं, उन्होंने आज तक जो कुछ किया है और आगे, अगर वे बने रहे तो, जो कुछ करेंगे, हम जानते हैं। बड़े-बड़े जलसे सरकारी पैसे से (म० प्र० सरकार भारत- भवन को पचास लाख रुपये प्रति वर्ष देती है) कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। करोड़ों रुपये खर्च कर इतना बड़ा 'अपना उत्सव' राजीव गांधी ने किया था, उसका क्या परिणाम हुआ? क्या उससे हमारी लोक-संस्कृति का कोई विकास हो गया? क्या उससे दुनिया को मालूम हो गया कि हमारी लोक-संस्कृति क्या है? नहीं भाई, इस तरह संस्कृति के साथ खेलवाड़ पूंजीवादी ही करते हैं। उनके पास धन है, वे जो चाहें कर सकते हैं। उनके पास साधन है, जितना चाहें प्रचार कर सकते हैं। किन्तु हम तो देखेंगे कि उसका परिणाम क्या होता है? यह सही है कि अशोक वाजपेयी ने कुछ लेखकों को, कुछ चित्रकारों को, कुछ अभिनेताओं गायकों को अपने आस-पास इकट्ठा कर लिया है। लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अशोक वाजपेयी के पास जो शक्ति है, वह तंत्र की शक्ति है, धन की शक्ति है, जिसके बल पर लेखकों को चित्रकारों और गायकों को उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जमा कर रखा है। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत भवन लाखों रुपये इन जलसों पर, कलाकारों पर खर्च करता है और यह जानकर कि ये रुपये केवल सही मार्ग से नहीं आते हैं, ग़लत मार्ग से भी आते हैं, फोर्ड फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं से आते हैं, कोई मार्क्सवादी, प्रगतिशील या जनवादी चित्रकार अथवा कलाकार कैसे इनसे सहयोग करेगा? हमें यह देखना चाहिए और समझना चाहिए कि अशोक वाजपेयी क्या कर रहे हैं, अशोक वाजपेयी कोई भारत कला भवन के निर्माता रायकृष्ण दास नहीं हैं, जिन्होंने भारत कला भवन के निर्माण में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। अशोक वाजपेयी एक बड़े नौकरशाह हैं, बहुत मोटी तनख्वाह पाते हैं और भारत-भवन के पदाधिकारी तथा उससे जुड़े लेखक, चित्रकार तथा गायक भी काफी मोटी तनख्वाहें अथवा सुविधा पाते हैं। ये लोग कला तथा संस्कृति की सेवा के नाम पर क्या कर रहे हैं? उनके कामों का जनता के सांस्कृतिक जीवन पर क्या असर पड़ रहा है? हमें यह भी देखना चाहिए कि उन लोगों की इन कामों के पीछे मंशा क्या है, वे किस प्रकार के साहित्य, कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं?

वाजपेयी बार-बार मार्क्सवाद पर आक्रमण करते हैं, साम्यवाद पर आक्रमण करते हैं, प्रगतिवादियों और जनवादियों से हमेशा खार खाये रहते हैं। ऐसे अशोक वाजपेयी को संस्कृति का समय लाने वाला मसीहा, मेरा ख्याल है, कोई प्रगतिवादी या जनवादी तो नहीं कह सकता। ऐसा वही आदमी कह सकता है, जिसका स्वार्थ किसी न किसी रूप में अशोक वाजपेयी से जुड़ा हो, जुड़ने वाला हो या जो चाहता हो कि जुड़े। अशोक वाजपेयी के पास लाभ पहुँचाने के बहुत से साधन हैं। वे लेखकों को, कलाकारों को हवाई जहाज का किराया देकर बुलाते हैं और उनके आतिथ्य में लाखों रुपये खर्च करते हैं। जो इन सब सुविधाओं का भोग करना चाहते हैं, वे निश्चित रूप से उनके पास जायेंगे। उनके लिए अशोक वाजपेयी संस्कृति के मसीहा हो सकते हैं।अशोक वाजपेयी से या किसी से भी हमारी कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। लड़ाई तो उनकी तथा हमारी विचारधारा के बीच है। वे अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं और हम अपनी विचारधारा के अनुसार काम करते हैं। विचारधाराओं के बीच यह संघर्ष जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। हमारी विचारधारा के मसीहा तो मार्क्स हैं, उनकी विचारधारा के मसीहा कौन हैं, लोगों को साफ़-साफ़ बतायें तो? यदि वे स्वयं मसीहा हैं, तो यही कहें।

विद्याधर शुक्ल : `भारत-भवन के पीछे फोर्ड फाउन्डेशन का भी हाथ है। भारत भवन के क्रिया-कलापों में जनता के पैसे का दुरुपयोग किया जाता रहा है।' इस प्रकार की बातें प्रारम्भ से ही सुनने को मिलती रही हैं। फोर्ड फाउन्डेशन आखिर भारत भवन पर ही क्यों मेहरबान हुआ? भारत भवन के कार्य-कलापों से जन साधारण को क्या लाभ हुआ है? अशोक वाजपेयी भारत भवन, संस्कृति विभाग म० प्र० के अब तक के कार्य-कलापों के बारे में आपकी क्या राय है?

भैरव प्रसाद गुप्त : फोर्ड फाउन्डेशन के साथ भारत भवन का सम्बन्ध स्थापित करने में कृष्ण बलदेव वैद का हाथ होगा। वैद कई वर्षों से भारतीय साहित्य के सम्बन्ध में अमेरिका के सलाहकार थे। मेरा ख्याल है कि उन्हीं के माध्यम से अशोक वाजपेयी का सम्बन्ध फोर्ड फाउन्डेशन से बना होगा, यह सन्देह मुझे इसलिए हो रहा है कि जैसे ही कृष्ण बलदेव वैद अमेरिका की सेवा से मुक्त होकर भारत आये, उन्हें अशोक वाजपेयी ने अपने यहाँ एक बहुत बड़ी जगह दे दी, जहाँ वे अब भी हैं। फोर्ड फाउन्डेशन हमेशा ऐसी संस्थाओं की खोज में रहता है जिनके माध्यम से वह अमेरिकी संस्कृति का प्रचार और समाजवादी संस्कृति का विरोध कर सके। 'इनकाउन्टर' पत्रिका इसका एक उदाहरण है। 'इनकाउन्टर' के सम्पादक को कई वर्षों तक यह पता ही नहीं चला कि 'इनकाउन्टर' किसके पैसे से चल रहा है। 'इनकाउन्टर' लगातार निकलता रहा और रूस का, सोवियत साहित्य का सदा विरोध करता रहा, मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र का विरोध करता रहा, लेकिन सम्पादक को यह पता ही नहीं था कि यह सब कौन करा रहा है। कई वर्षों बाद उसे मालूम हुआ कि 'इनकाउन्टर' सी. आई. ए. के पैसे से चल रहा है। सी. आई. ए. का पैसा हो या फोर्ड फाउन्डेशन का पैसा हो या और भी किसी पूँजीवादी देश या समाजवादी देश का पैसा हो, यह यूँ ही किसी को नहीं दिया जाता। यह पैसा उन संस्थाओं और व्यक्तियों को दिया जाता है जो समाजवाद विरोध का कार्य करते हैं। अशोक वाजपेयी भारत भवन के माध्यम से सच कहा जाय तो समाजवादी विचारधारा का लगातार विरोध ही कर रहे थे। ऐसी संस्था फोर्ड फाउन्डेशन को बहुत उपयोगी लगी होगी और उसने खु़शी से उन्हें धन दिया होगा ताकि वह अपना काम आगे बढ़ा सकें। मैं तो नहीं जानता कि भारत भवन के क्रिया-कलापों से मध्य प्रदेश के जन साधारण को कोई लाभ पहुँचा। भारत भवन में जो कुछ होता है, उससे चंद लोगों को कुछ लाभ भले ही हुआ हो, वहाँ की जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है। भारत भवन का जिस रूप में प्रचार हुआ है, वैसा भारत भवन है नहीं। भारत भवन जैसी ही या उससे बड़ी कई सांस्कृतिक संस्थाएं भारतवर्ष में काम कर रही हैं और भारत भवन से कहीं अधिक लाभकारी काम कर रही हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में इस तरह की तेरह संस्थाएं हैं। उत्तर प्रदेश में भारत कला भवन ही है। भारत भवन को लेकर जितना शोर किया गया सच पूछिये तो उतना काम नहीं हुआ। काम बहुत थोड़ा हुआ है। कुछ संग्रह किये गये हैं वहाँ कुछ कला-चित्रों के, कुछ मूर्तियों के और कुछ काव्य ग्रंथों के। संग्रह से हो सकता है कि वहाँ के जो लोग मूर्तिकार हैं, उनको कुछ लाभ हुआ हो या कला-दीर्घा के चित्रों से हो सकता है कुछ कलाकारों को कुछ लाभ हुआ हो। यह भी हो सकता है कि भारत भवन के प्रचार से प्रभावित होकर कुछ लोग भारत भवन देखने जाते हों लेकिन सचमुच भारत भवन के क्रिया-कलापों से म. प्र. के आम लोगों को कुछ लाभ हुआ हो या उनका सांस्कृतिक जीवन किसी भी रूप में बेहतर हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता। यूँ भी सामान्य लोगों की दिलचस्पी भारत-भवन में केवल इसलिए हो सकती है कि चलो यह भी एक देखने की जगह है, इससे अधिक कुछ नहीं।

अशोक वाजपेयी ने जिस तरह भारत भवन या म. प्र. सरकार के संस्कृति विभाग का कार्य चलाया है, मेरा ख्याल है कि उन्होंने अपनी मर्जी से, अपनी समझ के अनुसार एक विशिष्ट विचारधारा के अन्तर्गत चलाया है। सरकार और फोर्ड-फाउंडेशन का, और सम्भव है कि कुछ अन्य माध्यमों से भी भारत भवन को धन मिलता हो, से जिस तरह के कार्य उन्होंने किये है और जिस तरह के जश्न उन्होंने मनाये है, उनमें अकूत धन खर्च हुआ है। मुझे नहीं मालूम और मैंने देखा भी नहीं है अभी तक, भारत भवन के आय-व्यय के विवरण का लेखा-जोखा अगर वह सामने आये तो मालूम होगा कि उन्होंने इन वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं। यहाँ इतने भारी खर्चे से उन्होंने म. प्र. के सांस्कृतिक जीवन में कौन सा परिवर्तन किया है, यह समझ में आने वाली बात नहीं है। भारत-भवन के माध्यम से उन्होंने कुछ संस्कृति-कर्मियों को इकट्ठा किया है, उनमें प्रमुख स्वामीनाथन हैं। उन्हें उन्होंने आजीवन ट्रस्टी बनाया था और कला दीर्घा का निदेशक भी। भारत भवन से सम्बद्ध होने से पहले स्वामीनाथन दिल्ली की सड़कों पर घूमते नजर आते थे। स्वामीनाथन, निर्मल वर्मा और कभी-कभी श्रीकांत वर्मा नाम को वहाँ किसी होटल में एक साथ दिखाई पड़ते थे, स्वामीनाथन का हाल यह था कि वह दिन में कहीं न कहीं कोई काम करके विशेषकर लिंक हाउस में 'लिंक' का आवरण बनाकर कुछ पैसा बनाकर लाते थे और उसे शाम को वे खर्च कर देते थे, लेकिन जब से भारत भवन के साथ उनका सम्बन्ध हुआ, उनका जीवन ही बदल गया, उनकी कला के बारे में यही कहा जा सकता है कि वह असामाजिक है, उनका कोई भी कार्य मैंने नहीं देखा जिसका कोई मतलब हो, यों भी उनकी मान्यता है कि एक चित्रकार को कुछ सोचकर चित्रकारी नहीं करनी चाहिए बल्कि ब्रश उठाना चाहिए और उसे कैनवस पर चला देना चाहिए। जो चित्र बनेगा वही चित्र होगा, वे बोहेमियन हैं और ऐसा एक बोहेमियन चित्रकार कलादीर्घा में क्या कर सकता था, उसका नमूना भारत भवन की कला दीर्घा है, इसी तरह कई लेखक और रंग-कर्मी भारत भवन से सम्बद्ध हुए जैसे निर्मल वर्मा हैं, पहले नामवर सिंह का भी सम्बन्ध भारत भवन से बना था जो काफी दिन तक चला। नेमिचंद जैन तो लिखित रूप से किसी रूप में भारत भवन से संबद्ध नहीं थे लेकिन प्रायः वे भारत भवन के कार्यक्रमों में भाग लेने जाते रहे, अब इधर नामवर सिंह का सम्बन्ध टूटा है, रघुवीर सहाय को तो अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता सम्मेलन में हिन्दी का प्रतिनिधि कवि बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, जो हो, कुछ न कुछ लेखक सदा भारत भवन की ओर जाते रहे हैं और इस तरह से भारत भवन का काम चलता रहा।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी, जैसा आपने कहा कि ये लोग लाभ उठाते हैं लेकिन लाभ उठाने वालों में आपने मार्क्सवादी लोगों का नाम नहीं लिया जैसे त्रिलोचन जी, शमशेर बहादुर जी पीठ पर बैठे। इन लोगों में दो दूसरे तरह के लोग हैं, जैसे- नरेश मेहता, निर्मल वर्मा हैं, जिक्र तो ऐसे लोगों का करना है जो लोग अपने को वामपंथी तेवर का लेखक कहते हैं और उसकी भुनाते हैं। असल में मैं इन्हीं मुद्दों पर आपसे कुछ जानना चाहता हूँ।

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं इस बात पर आना ही चाहता था। यह अच्छा हुआ कि आपने मुझे टोक दिया। अशोक वाजपेयी एक तपे हुए नौकरशाह है। वे अपना काम किस तरह करें, उन्हें मालूम है। वे प्रत्यक्ष रूप से यह प्रगट करना कभी भी नहीं चाहेंगे कि दरअसल वे क्या करना चाहते हैं। वे बहुत ही गोपनीय या यों कहिए कि छद्म रूप से अपना काम करते हैं। वे यह कभी प्रगट करना नहीं चाहते हैं कि वे किसी विशिष्ट धारा के मानने वाले और पोषक हैं। वे प्रगट यह करना चाहते हैं कि वे सभी विचारधाराओं के लेखकों और कलाकारों को भारत-भवन से सम्बद्ध करना चाहते हैं। जाहिर है कि एक बहुत ही चतुर नौकरशाह यह काम कर सकता है और बखू़बी निभा सकता है। बहुत दिनों तक वाजपेयी ने यह मुखौटा धारण किया और इसी के तहत उन्होंने कुछ प्रगतशिलों को, जैसे विशेषकर नामवर सिंह को, हरिशंकर परसाई को तथा अन्य लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। हम लोगों को स्वयं बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि क्या बात है, क्योंकि नामवर जी को मैं किसी भी रूप में ऐसे मार्क्सवादी के रूप में स्वीकार नहीं करता कि वह कोई भी काम ऐसा करें जो उनकी विचारधारा के विरुद्ध हो। लेकिन वह बार-बार उनके जंजालों में जाते थे। उसी तरह हरिशंकर परसाई हैं, वे भी अपने को मार्क्सवादी और शायद कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी कहते थे, कैसे वे उनके जाल में फँस जायेंगे। लेकिन ये चीजें चलती रही। ये एक नौकरशाह के काम करने का अपना तरीका था। वह यह दिखलावा लोगों के सामने करता था कि उसका कोई विशिष्ट विचार नहीं है। वह सभी लोगों को आमंत्रित करता है। वह मार्क्सवादियों को आमंत्रित करता है, वह गैर मार्क्सवादियों को भी आमंत्रित करता है और उसकी कोशिश यह है कि सब लोग मिलकर किसी विशिष्ट विषय पर बात करें और लोगों का यह सोचने का मौका दे कि क्या सही है और क्या गलत है, दरअसल अशोक वाजपेयी जो काम करते थे, उसमें चाहे परचाई हो या नामवर हो या इनके जैसे और कोई म. प्र. के लोग हों, वे देखें और समझें कि अशोक वाजपेयी किसी विशेष विचारधारा के साथ पक्षपात नहीं कर रहे हैं लेकिन अशोक वाजपेयी इस परदे के पीछे अपना काम सही रूप में कर रहे थे। इनके जश्न की जो रिपोर्ट आती थी, उससे स्पष्ट होता था कि किस विचारधारा का पलड़ा भारी रहता था। नामवर सिंह ने अपने भाषणों में, जहाँ तक मैंने पढ़ा है, सुनने का तो मुझे कोई अवसर नहीं मिला। क्योंकि मैं भारत भवन तक तो नहीं गया। मैं बार-बार जश्न का नाम ले रहा, इसलिये कि मैं समझता हूँ कि वो जश्न ही थे। इस माने में जश्न थे कि जैसे दरबारों में पहले कभी हुआ करते थे, जहाँ राजाओं के, नवाबों के दरबारी इकट्ठा होते थे उसी तरह से अशोक वाजपेयी के दरबार में ये लेखक, चित्रकार गायक, अभिनेता, रंगकर्मी एकत्रित होते थे और अपनी बातें करते थे। मेरे कहने का मतलब यह है कि अशोक वाजपेयी ने कभी भी एक क्षण के लिए यह नहीं सोचा कि संस्कृति का कोई संबंध जनता से भी है। वे हमेशा सफेदपोशों के बीच घिरे रहे या यों कहना चाहिये कि अपने चारों ओर सफेद पोश कलाकारों को एकत्रित करते रहे। जैसा कि मैंने पहले कहा कि नामवर जी के भागीदारी के सम्बन्ध में हम लोगों को बराबर आश्चर्य होता रहता कि ये क्यों जाते हैं। ये क्यों भारत भवन के आयोजनों में हिस्सा लेते हैं जब कि ये जानते हैं कि अशोक वाजपेयी की विचारधारा क्या है और वे भारत-भवन द्वारा कौन सा काम करना चाहते हैं, फिर भी क्यों जाते हैं, आखिर वो दिन आया जब कि नामवर सिंह ने अपना सम्बन्ध पूर्णरूप से विच्छेद कर लिया और वहाँ जाना-आना बन्द कर दिया। जहाँ तक निर्मल वर्मा और रघुवीर सहाय का सम्बन्ध है या विजय मोहन सिंह का सम्बन्ध है—ये लोग तो सचमुच अशोक वाजपेयी की विचारधारा के ही लोग हैं। इन लोगों का वहाँ बने रहना या जब तक अशोक वाजपेयी वहाँ रहेंगे, उस वक्त तक बने रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जहाँ तक कि शमशेर बहादुर सिंह और त्रिलोचन शास्त्री का सवाल है—शमशेर बहादुर सिंह आजीवन बहुत ही दुखी और परेशान व्यक्ति रहे हैं। शमशेर बहादुर सिंह से मेरा सम्बन्ध बहुत पुराना और बहुत दिनों का है। उन्होंने मेरे सहयोगी के रूप में जिसे अब वे स्वीकार करने के लिए कहीं भी किसी भी रूप में तैयार नहीं हैं, कई वर्षों तक काम किया। उनके काम करने का ढंग और काम करने की समझ के बारे में मैं जानता हूँ और मैं यह कह सकता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह कवि चाहे जैसे हों जहाँ तक काम का सम्बन्ध है, वे बिल्कुल बेकार के आदमी हैं।

अशोक वाजपेयी को ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी जो परेशान हों। हमारे त्रिलोचन शास्त्री भी उसी तरह एक परेशान व्यक्ति हैं। बिहार की किसी पत्रिका में यह पढ़कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और दुख भी। दुख इसलिये कि त्रिलोचन शास्त्री को मैं एक स्वाभिमानी कवि के रूप में देखता और समझता था। केदारनाथ सिंह किसी गोष्ठी में जिसकी रिपोर्ट बिहार की एक पत्रिका में छपी थी, उसमें यह कहा कि एक दिन मैं त्रिलोचन शास्त्री के यहाँ सुबह-सुबह पहुँचा तो देखा कि त्रिलोचन सूखी रोटी गुड़ के साथ खा रहे हैं। मुझे यह देखकर बड़ा दुख हुआ। जाहिर है कि केदार सिंह को तो दुख होता है क्योंकि......

विद्याधर शुक्ल : क्योंकि सामंत किस्म के आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : वे जवाहर लाल नेहरू वि. वि. में प्राध्यापक हैं।

विद्याधर शुक्ल : और घर के भी सम्पन्न आदमी हैं।

भैरव प्रसाद गुप्त : घर के सम्पन्न आदमी हैं। जमींदार किस्म के परिवार के रहने वाले हैं। उनको तो दुख होता ही क्योंकि रोटी के साथ गुड़ तो आमतौर पर आम लोगों के जलपान की चीज़ है लेकिन उन्हें दुख हुआ क्योंकि वे समझते थे कि त्रिलोचन शास्त्री जैसा महान कवि यह क्या यह नाश्ता कर रहा है। इसे तो ऐसा नाश्ता करना चाहिए जो कि केदारनाथ स्वयं अपने घर में करते हैं। केदारनाथ सिंह का कहना यह था कि मैंने तुरन्त अशोक वाजपेयी को पत्र लिखा कि—हे अशोक वाजपेयी, एक महान कवि जिसका नाम त्रिलोचन शास्त्री है, वह इस परिस्थिति में पड़ा हुआ है कि वह रोटी गुड़ का जलपान करता है फिर उन्होंने कहा कि अशोक वाजपेयी इतने उदार हैं, इतने महान हैं कि उन्होंने त्रिलोचन को एक पीठ पर आसीन कर दिया। वैसे ही शमशेर बहादुर सिंह को भी एक पीठ पर अशोक वाजपेयी ने आसीन किया था। शमशेर बहादुर भी त्रिलोचन शास्त्री से कहीं अधिक परेशान थे। इलाहाबाद में जो उनकी स्थिति थी, हम लोग अच्छी तरह से जानते हैं फिर वे दिल्ली गये। दिल्ली में भी उनकी हालत बदतर रही। मतलब ये कि शमशेर बहादुर सिंह हमेशा दूसरों की सहायता, दूसरों की मदद, दूसरों की कृपा पर अपना जीवन व्यतीत करते रहे। मैं कहूँगा कि उनमें स्वयं ऐसी योग्यता नहीं थी कि वे अपनी कमाई अपनी योग्यता की या अपने काम की कमाई खा सकते। कभी प्रभाकर माचवे ने कृपा कर दी, कही कोई काम दिला दिया, कभी मैंने कृपा कर दी, उन्हें अपने पास रख लिया। इसी प्रकार कभी अज्ञेय ने कृपा कर दी, कुछ रुपये दे दिये। मतलब, इसी तरह से उनका जीवन निर्वाह होता रहा। लेकिन अशोक वाजपेयी ने उन्हें एक पीठ पर आसीन करके उन्हें कुछ वर्षों के लिये स्थायी जगह दे दी। फिर तो साहब कमाल ही हो गया। कमाल ये हो गया कि उन्हें दो-दो बड़े पुरस्कार अशोक वाजपेयी ने दिया और उनके बुढ़ापे का पूरा इन्तजाम कर दिया। इतना ही करते तो कोई बात नहीं, उन्होंने यहभी सिद्ध कर दिया कि वे भारतवर्ष के सबसे महान कवि हैं। मुझे आश्चर्य होता है, एक पुरस्कार 51 हजार का पहले दिया,जो बाद में त्रिलोचन को भी मिला, फिर कबीर पुरस्कार। खैर! पुरस्कार उनके पास पैसा है, किसी को भी दें। मैं तोहमेशा यह कहता हूँ कि कोई मालिक अपने गधे को मलीदा खिलाये तो हमको क्या आपत्ति हो सकती है, बहुत अच्छा है। कम से कम गधे को मलीदा खाने को तो मिल रहा है। लेकिन मुझे आश्चर्य उस सम्बन्ध में होता कि पुरस्कार समिति के बहुत सारे अहिन्दी भाषा-भाषी कवियों और लेखकों की रिपोर्टों में कहा गया कि उन सबों ने यह भी स्वीकार किया कि शमशेर बहादुर भारत के सबसे महान कवि हैं। मुझे नहीं मालूम कि इन प्रादेशिक भाषाओं के कवियों ने शमशेर बहादुर सिंह की एक पंक्ति भी पढ़ी है या नहीं।

शमशेर बहादुर सिंह अपने बारे में जब कुछ लिखते हैं तो बहुत सारी झूठी बातें लिखते हैं यहाँ से वहाँ तक। वे भैरवप्रसाद गुप्त को नहीं याद करते हैं क्योंकि भैरव प्रसाद गुप्त तो हमेशा प्रगतिशील रहा है और हमेशा रहेगा। इसी सन्दर्भ में, मैं शमशेर बहादुर सिंह के सम्बन्ध में एक बात और कह देना जरूरी समझता हूँ। शायद यही कारण हो जिससे शमशेर बहादुर सिंह ने अशोक वाजपेयी जैसे मार्क्सवाद विरोधीसे सम्पर्क किया। मेरे साथ उन्होंने कई वर्षों तक काम किया। वे लिखते हैं कि माया का मैं सहायक-सम्पादक था। असल में सहायक सम्पादक नहीं, उप सम्पादक थे। मैंने उन्हें यह काम दिया था कि वे कहानियाँ पढ़ें और कहानियों के बारे में अपनी नोटिंग दें। आज मैं बता रहा हूँ और आपको सुनकर आश्चर्यहोगा कि जिन कहानियों पर शमशेर बहादुर सिंह 'एवन' की नोटिंग करते थे, उन कहानियों को भी मैं कभी नहीं छाप सका। खैर शमशेर काम करते रहे, तनख्वाह लेते रहे लेकिन मालिक तो काम देखते हैं, लेकिन मेरी आदत शुरू से है कि मैं अपने मातहतों के विरुद्ध मालिक को कोई रिपोर्ट नहीं देता था कभी भी। जब मालिक कभी पूछते थे तो मैं कह देता था ठीक है, काम चल रहा है, कोई परेशानी की बात नहीं। लेकिन मालिक की एक नजर होती है। वह देखता रहता है। मैंने बता दिया था कि मेरे पास 'कहानी' में सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। पर शमशेर बहादुर सिंह माया प्रेस से निकाल दिये गये। फिर वे जैसे रहते थे, रहने लगे। काफी परेशानी में वे बेचारे। क्योंकि उनकी कुछ आदतें ऐसी थी, कुछ शौक ऐसे थे कि वे हमेशा परेशानी में रहते थे। आमदनी नहीं देखते थे, खर्चा करते जाते थे।

विद्याधर शुक्ल : भैरव जी असली सवाल पर आवें। शमशेर बहादुर सिंह तो कवियों के कवि हैं जैसा कि बहुत से लोग और मैं भी मानता हूँ। मैं आप से पूछ सकता हूँ कि क्या शमशेर बहादुर सिंह की कोई कविता या उसके कुछ अंश भी आपको याद हैं या अन्य किसी कवि-लेखक की कोई कविता याद है? नागार्जुन की कविताएँ लोगों की जुबान पर हैं कुछ अंशों तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ लोगों के याद हैं, सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने किस तर्क पर उन्हें सबसे बड़ा कवि मान लिया। उन्हें जनकवि तो कहा नहीं जा सकता। विगत वर्षों में प्रगतिशीलों ने और अशोक वाजपेयी ने केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह को और मजबूरन नागार्जुन को माना लेकिन इन तीनों की श्रेणी में शमशेर बहादुर सिंह कहाँ आते हैं। सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी ने ऐसे कवि को सबसे महान कवि घोषित किया, अशोक वाजपेयी के इस गैर साहित्यिक रवैये पर आप का कहना चाहेंगे?

भैरव प्रसाद गुप्त : मैं कहना यह चाहता हूँ कि शमशेर बहादुर सिंह एक कवि के रूप में मध्य प्रदेश में ही प्रतिष्ठित रहे हैं जबसे उनका सम्बन्ध अशोक वाजपेयी से बना, पूर्वग्रह और 'साक्षात्कार' में जिस रूप में शमशेर पर प्रचार किया गया, वह निश्चय ही शमशेर बहादुर सिंह के सही रूप में कवि की हैसियत नहीं थी। उसके पीछे अशोक वाजपेयी के कुछ अपने मन्तव्य थे, कुछ लक्ष्य थे जिसके अनुसार उन्होंने शमशेर बहादुर के साथ व्यवहार किया और शमशेर को चूँकि जीवन में एक तरह से पहला अवसर मिला आराम का, जब कि वे आराम से रह सकते थे,उन्होंने इसे स्वीकार किया था और अब भी स्वीकार करते हैं और अब उसी को भोग रहे हैं। मैं जो कहने जा रहा था आपके उसी प्रश्न के सन्दर्भ में है। जब वे माया प्रेस छोड़कर फिर उसी बेकारी के जीवन में आ गये। बेकारी का जीवन यानी परेशानी का जीवन। जैसे एक बोहेमियन होता है जिसको कोई भी परवाह नहीं होती, क्या आमदनी है, क्या खर्चा है? वे जीवन को व्यवस्थित ढंग से चलाने की कोई परवाह या प्रयास भी नहीं करते। कर्ज हो जाय या कोई परेशानी हो जाय, वे उसकी परवाह नहीं करते। जैसे चल रहा है, जीवन चल रहा है, चलने दो। जैसे वह चले, चलेगा। उन्हीं दिनों एक दिन अचानक मुझसे शमशेर बहादुर सिंह की इलाहाबाद चौक में नीम तले मुलाकात हो गयी। नमस्कार के बाद बिना किसी अन्य बातचीत के उन्होंने कहा—'कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर अगर मैं बना रहता तो मेरा कवि मर जाता। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर मैंने अपने कवि को बचा लिया।' अचानक उन्होंने ये बात कही। जवाब में मेरे मुँह से निकल गया कि मैं देखूँगा कि आप कैसे कवि बनते हैं। आप इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि अब तक आप जिस कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुये हैं, उसका बहुत सारा श्रेय कम्युनिस्ट पार्टी को है। आपके बम्बई के जीवन को है, इलाहाबाद के जीवन को है। उसके बाद हमारी कोई बातचीत नहीं हुई। वे अपनी राह चले गये, मैं अपनी राह। बाद में जो भी बातें उनके बारे में सुनने को मिलीं। मैं उनमें नहीं जाना चाहता। वे मध्य प्रदेश पहुँचे, अशोक वाजपेयी की उन पर कृपा हुई। उनके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था हो गई। अशोक वाजपेयी को ऐसे लोगों की तलाश रहती है, किसी जमाने में अज्ञेय को भी ऐसे कवियों, ऐसी प्रतिभाओं की तलाश रहती थी। ऐसे कवियों की सहायता करने के लिये वे तैयार रहते थे। जैसे रघुवीर सहाय हैं, अब भूल गये होगें, अज्ञेय ने उनकी मदद की। खैर, इस प्रकरण में मैं नहीं जाना चाहता। हरि अनंत, हरि कथा अनंता। मुझे इन लोगों का बड़ा अनुभव रहा है। यह सब मैं कहने लगूँ तो लम्बा प्रसंग हो जायगा। मेरे कहने का लब्बो-लबाब यह है कि ये लोग कभी भी नहीं सोच सकते कि संस्कृति का सम्बन्ध जनता से होता है। अशोक वाजपेयी ने सफेदपोशों को ही संस्कृति का कर्ता-धर्ता मान लिया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि संस्कृति के सारे स्रोत आम जनता से ही निकलते हैं।

(जनवादी लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष भैरव प्रसाद गुप्त का यह साक्षात्कार वर्तमान साहित्य के अगस्त 1990 अंक से साभार।)




No comments: