Monday, July 23, 2012

पहाड़ों का विनाश और लीलाधर बुद्धिजीवियों की जुगाड़ी कलाबाजी


समाचार-संदर्भ : हिमालयः बसेगा तो बचेगा

hydropower-tunnel-based-projectsउत्तराखंड के पहाड़ों से इन दिनों खतरनाक आवाजें आ रही हैं। ये आवाजें एक ऐसे नापाक गठजोड़ की हैं जो प्राकृतिक संसाधनों के बीच रहने वाली जनता के हक को लील लेना चाहती हैं। बहुत जल्दी, बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए; विकास का जो सपना सरकारें दिखाती रही हैं उसकी आड़ में एक बड़ी आबादी को उजाड़कर मुनाफाखोर अब जनता को जनता के खिलाफ ही खड़े करने की साजिशें करने लगे हैं। टिहरी की लोककथाओं में आछरियों (परियां) का बहुत जिक्र आता है। ऐसी आछरियां जो गुफाओं से निकलकर युवाओं को हर लेती थीं। अब टिहरी में इस तरह की आछरियां नहीं दिखाई देतीं। अब आछरियां नए रूप में हैं। जो पहले गुफाओं में रहती थीं अब विशालकाय सुरंगों में हैं। जो पहले कुछ युवकों को अपने रूप-सौंदर्य के छलावे में फंसाती थीं अब विकास और बिजली की चकाचैंाध से भ्रमित कर रही हैं। लोककथाओं की आछरियों को भले ही किसी ने देखा न हो लेकिन आज पूरे पहाड़ में विकास की जानलेवा आछरियों ने जलविद्युत परियोजनाओं से पूरे गांवों को लीलना शुरू कर दिया है। ये अकेली नहीं हैं इनके साथ सरकार है। बांध परियोजनाओं के बड़े कारिंदे हैं। इससे भी बढ़कर वे लोग हैं जो विकास की इस साजिश के अभियान में साथ खड़े हैं।
बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए विकास का जो सपना सरकारें दिखाती रही हैं उसकी आड़ में एक बड़ी आबादी को उजाड़कर मुनाफाखोर अब जनता को जनता के खिलाफ ही खड़े करने की साजिशें करने लगे हैं। टिहरी की लोककथाओं में आछरियों (परियां) का बहुत जिक्र आता है, जो गुफाओं से निकलकर युवाओं को हर लेती थीं। अब वे नहीं दिखाई देतीं। अब आछरियां नए रूप में हैं। गुफाओं की जगह अब वे विशालकाय सुरंगों में रहने लगी हैं।
इन लोगों का न तो लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास है न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में। इन्होंने ने ऐलान कर दिया है कि जो भी जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध करेगा उसे पहाड़ में नहीं घुसने दिया जायेगा। जैसे पहाड़ इन्हीं की बपौती हो। अपने अभियान को इन्होंने अमली जामा पहनाना भी शुरू कर दिया है। जून के मध्यमें श्रीनगर में जीडी अग्रवाल, भरत झुनझुनवाला और राजेन्द्र सिंह के साथ इन कथित बांध समर्थकों ने जो किया उससे साबित होता है कि जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन के नाम पर की जा रही यह गुंडागर्दी कोई छोटी-मोटी स्वस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि सोची-समझी रणनीति है। इसलिए समय रहते इस गठजोड़ को समझना होगा जो निहित स्वार्थों के लिए अपने मुल्क को बर्बाद करने और बेचने में भी झिझक नहीं रहे हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में पिछले चालीस वर्षों से जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर वहां की जनता आंदोलन चलाती रही है। अपने संसाधनों को बचाने के लिए वह लगातार सड़कों पर है। टिहरी बांध से लेकर फलिंडा और अब पिंडर को बचाने तक के बहुत सारे आंदोलन स्वस्फूर्त जनता के आंदोलन रहे हैं वैसे ही जैसे उत्तराखंड राज्य का आंदोलन था। एक मामले में ये आंदोलन पृथक राज्य आंदोलनों से इसलिए जुड़ थे कि जनता को उम्मीद थी कि नए राज्य के शासक जो उन्हीं में से होंगे उनके दर्द को समझेंगे और उन पर इस तथाकथित विकास को नहीं थोपेंगे। पर हुआ उल्टा ही है। अपने ही लोगों ने विकास के दैत्याकार मॉडल को उन पर थोपा है। इससे लगातार टूटते पहाड़ों की आम जनता को चिंता है। पर इस बीच कुछ अजब ही हुआ है।
padmsree-return-drama-in-dehradunइधर कुछ समय से बांध समर्थकों की एक नई जमात सामने आई है जो पूरी बेशर्मी से बड़े बांधों का समर्थन कर रही है और जन आंदोलनों को नकारने में लगी है। कवि लीलाधर जगूड़ी ने अपने हाल में प्रकाशित लेख ‘प्रगति विरोधी इस पाखंड से लडऩा जरूरी’ में लिखा है कि ”इस समय उत्तराखंड में जनता पर्यावरण को विकास के विरुद्ध एक अड़ंगे की तरह अथवा एक पाखंड की तरह देख रही है।” तथ्यों को जैसे जी में आया तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। फलिंडा और पिंडर घाटी में क्या हो रहा है? अगर कहीं कुछ है ही नहीं तो धारी देवी में मारपीट की नौबत क्यों आ रही है? यह जमात सरकार, बांध बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों के गठजोड़ की है। इनमें इस बीच सरकार से नजदीकियां रखने के इच्छुक कुछ बुद्धिजीवी भी जुड़ गये हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अचानक बांधों के समर्थन में खड़ा हो गया है। ऐसा क्यों हो रहा है, समझना मुश्किल नहीं है। बांधों के साथ अपार पैसा जुड़ा है और उसका असर अखबार से लेकर सरकार तक में नजर आ रहा है। कौन भूल सकता है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पद संभालते ही पहला काम बांधों के समर्थन का किया।
ये तर्क देते हैं कि जलविद्युत परियोजनायें यहां की आर्थिकी और रोजगार के लिए जरूरी हैं। साधु-संत गंगा की अविरलता को लेकर बांधों के खिलाफ हैं। अगर गंगा की अविरलता नहीं रहेगी तो करोड़ों की आस्था की चिंता उन्हें है। स्वयंसेवी संगठनों को लगता है कि बांध बनने से पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। इसलिए वे बांधों का विरोध कर रहे हैं। इन सबके बीच पिछले चार दशक से अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्षरत लोगों की सुनने को कोई तैयार नहीं है। उनके पूरे आंदोलन को कभी आस्था, कभी विकास तो कभी पर्यावरण के नाम पर हाशिये पर धकेला जा रहा है। हम बार-बार यह दोहराना चाहते हैं कि असल में जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध आस्था और पर्यावरण का नहीं है, जैसा कि जगूड़ी अपने लेख में कहते हैं; बल्कि यह हिमालय को बचाने की लड़ाई है। आस्था और पर्यावरण भी तभी तक हैं जब तक हिमालय है। यह नहीं भुलाया जाना चाहिए कि हिमालय से पूरे गंगा-यमुना के मैदान का भविष्य जुड़ा है। विकास के नाम पर जिस तरह से हिमालय को सुरंगों के हवाले किया जा रहा है वह आने वाले दिनों में पूरे देश के लिए खतरे का संकेत है।
विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझा जाना बहुत आवश्यक है। मध्य हिमालय दुनिया का सबसे कच्चा पहाड़ है। इस पर भी उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से चालीस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने एक उपाय सुझाया विशालकाय जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का। इस समझ के तहत सत्तर के दशक में टिहरी बांध परियोजना की शुरुआत की गई थी। इसके बाद तो जलविद्युत परियोजनाओं को ही सरकारों ने ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत मान लिया। इसके बावजूद जबकि टिहरी जैसी बड़ी परियोजना अपने लक्ष्य में नाकाम रही है। इससे समझ जाना चाहिए था कि जिन परियोजनाओं को विकास के लिए जरूरी माना जा रहा है वे कितनी उपुयक्त हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि बांधों के निर्माण से राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कंपनियों के हित जुड़े हैं। ये कंपनियां कई तरह की हैं – सीमेंट उत्पादकों से लेकर बिल्डरों और टरबाईन बनानेवालों तक की। यह बात प्रचारित की गई कि टिहरी बांध तो बड़ा है, बाकी बांध छोटे होंगे। सच यह है कि उत्तराखंड में इस समय जितने भी बांध बन रहे हैं वे बड़े बांधों की श्रेणी में आते हैं। (देखें समयांतर, जून, 2012)
इसे नजरअंदाज कर इन दिनों कुछ बुद्धिजीवियों ने कहना शुरू कर दिया है कि बिना जलविद्युत परियोजनाओं के यहां का विकास संभव नहीं है। वे कहते हैं कि इन परियोजनाओं से रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा और प्रदेश में विद्युत आपूर्ति के अलावा बाहर भी बिजली बेची जा सकेगी। उन्होंने जो तर्क दिए हैं वे बचकाना हैं। दुनिया की कोई भी जलविद्युत परियोजना ऐसी नहीं है जो रोजगार पैदा करती हो। इस तरह की परियोजनायें ठेकेदार और दलाल तो पैदा करती हैं लेकिन रोटी पैदा नहीं करतीं। हर परियोजना पर्यावरणीय विनाश के साथ विस्थापन और पलायन लाती है। यही वजह है कि दुनिया के तमाम देश अपने यहां बने बांधों को तोड़ रहे हैं। वे अपने यहां ऊर्जा के नए स्रोत तलाश रहे हैं। यह तथ्य हम अपने ही आसपास कोरबा, सोनभद्र या उन अनेक उदाहरणों से पा सकते हैं जहां कोयला या बांधों से बिजली बनाई जाती है। छत्तीसगढ़ के कोरबा में तो अनेक बिजली घर हैं पर उस राज्य में उद्योग क्यों नहीं हैं सिवाय खनिज उद्योगों के जो प्राकृति संसाधनों के निर्मम दोहन से जुड़े हैं? विकास का यह विनाशकारी मॉडल हिमालय के संसाधनों की अंधी लूट की साजिश है जिसे यहां के सत्ताधारी वर्ग – नेताओं, अखबारों और अब बुद्धिजीवियों – के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है।
गंगा को बचाने के लिए विकास और पर्यावरण की इस बहस के बीच उन सवालों को तलाशना जरूरी है जो वहां के निवासियों के लिए परेशानी का कारण बने हैं। उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन में कुछ बुद्धिजीवी द्वारा चलाए जा रहे सुनियोजित षडयंत्रकारी अभियान इस बात का प्रमाण हैं कि हिमालय में मुनाफाखोरों की पैठ मजबूत हो चुकी है। विशेषकर दो-तीन कथित बुद्धिजीतियों की राष्ट्रीय मीडिया में बयानबाजी गौर करने लायक है। सच यह है कि उनके पास न कोई तथ्य हैं और न ही हिमालय और वहां के जीवन के बारे में कोई आधारभूत जानकारी। है भी तो वे उन पर बात नहीं करना चाहते। सबसे ज्यादा हास्यास्पद बातें पद्मश्री सम्मान को अपने सीने से लगाये कवि लीलाधर जगूड़ी ने दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका में लिखे लेख में की हैं। उन्होंने जलविद्युत परियोजनाओं पर एक प्रवक्ता की तरह बोलना शुरू कर दिया है। इससे कई तरह की शंकाएं होती हैं। यह वही जगूड़ी हैं जिन्होंने राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को ‘उत्तराखंड पिता’ कहा था। तब पहाड़ के लोगों ने कहा था कि स्वामी जगूड़ी के पिता हो सकते हैं, उत्तराखंड का ठेका वह न लें। उत्तराखंड की उस भाजपाई सरकार में उन्हें लालबत्ती से नवाजा गया था। एक बार फिर वह बांधों का समर्थन कर उत्तराखंड के स्वयंभू ठेकेदार बनना चाहते हैं।
अपने लेख में उन्होंने जो बेहूदे तर्क दिए हैं वे मजेदार हैं (देखें बाक्स) और इस बात का संकेत हैं कि जगूड़ी न आधुनिकता का अर्थ समझते हैं, न ही प्रकृति और पर्यावरण का महत्त्व। इसके बावजूद पूरे विश्वास के साथ तथाकथित विकास का समर्थन कर रहे हैं। होशो-हवाश का कोई आदमी उनकी इन बातों से सहमत हो सकता? क्या इस तरह की अवैज्ञानिक, अतार्किक और मूर्खतापूर्ण बातों को छापा जाना चाहिए था?
प्रमाणिकता को छोड़ दें तो भी स्पष्ट है कि जगूड़ी को जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभावों की सामान्य जानकारी तक नहीं है। लगता है उन्होंने शुरुआती भूगोल भी नहीं पढ़ा है।
इन वैज्ञानिक बातों को छोडिय़े। यहां सवाल कुछ और ही है। पहली बात यह कि गंगा का सवाल पर्यावरण और आस्था का बिल्कुल नहीं है। गंगा को बचाने की बात साधु-संत कैसे करते हैं यह उनका मसला है, इससे प्राकृतिक धरोहरों को बचाने का सवाल समाप्त नहीं हो जाता। विश्व हिंदू परिषद या उनकी जैसी कोई संस्था अपने हिसाब से गंगा की बात कर रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम बांधों के समर्थक बन जाएं। असल में यह जलविद्युत परियोजनाओं और विकास के नाम पर राज्य को लूटने और लोगों को बेघर करने की साजिश है। जगूड़ी को पता नहीं कहां से इलहाम हुआ कि सुरंगों (टनलों) में जाने के बाद पानी शुद्ध हो जाता है। विद्युत परियोजनाओं के लिए जितनी भी सुरंगें बनती हैं वे पानी को शुद्ध करना तो दूर पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को भी बिगाड़ती हैं। जब कभी भी नदी के पानी के उपयोग की बात आती है तो उसे रन ऑफ द रीवर के माध्यम से उपयोग में लाया जाना ही वैज्ञानिक माना जाता है। इस तरह की परियोजनाओं से किसी को कोई ऐतराज भी नहीं है। लेकिन अभी जिन परियोजनाओं की बात हो रही है वे सभी सुरंग आधारित हैं। सभी परियोजनाओं में लंबी दूरी की सुरंगें बनायी जा रही हैं।
सुरंगों में जाकर कोई पानी शुद्ध नहीं होता है। असलियत यह है कि सुरंगों से निकलने वाला पानी नए तरह के रासायनिक तत्व अपने साथ लाता है। हिमालय की भूगर्भीय स्थिति अभी रासायनिक और भूगर्भीय हलचलों की है इसलिए सुरंगों में पानी का जाना बहुत खतरनाक है। सुरंगों को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भारी मशीनों से यहां की भौगोलिक संरचना पर जो नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है वह छिपा नहीं है।
परियोजनाओं के समर्थकों का दूसरा बड़ा तर्क यह है कि इन विद्युत परियोजनाओं से गांवों को बिजली मिलेगी। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। राज्य में जो बिजली बनती है वह सेंट्रल ग्रिड में जाती है वहीं से बिजली का बंटवारा होता है। पावर हाउस से लोगों के घरों में सीधे तार नहीं खींचें जाते। कुल मिला कर राज्य को उसके हिस्से की बिजली ही मिलेती है जो बहुत कम होती है। इस संदर्भ में इस वर्ष गर्मियों में उत्तराखंड में बिजली की जो किल्लत हुई उसे याद किया जा सकता है। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में जो बिजली की कुल खपत होती वह संभवत: उतनी भी नहीं है जितनी कि देहरादून में होती होगी। पहाड़ों में मुश्किल से ही पंखे चलते हैं। एसी तो शायद ही कहीं होंगे। उद्योगों की तो बात ही अर्थहीन है। दूसरी ओर आज भी उत्तराखंड में जितनी बिजली का उत्पादन होता है उसका वह पांच प्रतिशत भी शायद ही उपभोग करने की स्थिति में हो। तब पूरे पहाड़ी क्षेत्र में बिजली क्यों काटी जा रही थी?
अब आते हैं नौकरी के सवाल पर।
उत्तराखंड में आजादी के बाद लगभग 37 लाख लोगों ने स्थायी रूप से पलायन किया है। राज्य बनने के इन 12 वर्षों में ही राज्य से 19 लाख लोग स्थायी रूप से पहाड़ छोड़ चुके हैं। राज्य के पौने दो लाख घरों में ताले लटके हैं। दो साल पहले आयी आपदा ने लगभग 3,500 गांवों को अपनी चपेट में लिया। पहाड़ पर जमीनों का टूटना जारी है। इससे पलायन और तेज हुआ है। पर्यावरण संबंधी परिवर्तनों ने कृषि को पूरी तरह अलाभ कारी बना दिया है। शेष जो भी छोटे-मोटे रोजगार थे सब घटे हैं। अब इन बांधों के निर्माण से पांच लाख लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। सिर्फ पंचेश्वर बांध से ही सवा लाख लोगों का विस्थापन होगा। ये स्थितियां नयी तरह के सोच और नियोजन की मांग करती हैं पर हमारे नेता सिर्फ एक बात जानते हैं और वह है बांध बनाने की। यह सवाल है आखिर ये पद्मश्री प्राप्त बुद्धिजीवी किन की लड़ाई लडऩे में लगे हैं?
दूसरा पक्ष है बांधों के विरोध करने वालों का। इनमें साधु-संतों के अलावा पर्यावरणविद हैं। साधु-संतों को गंगा अविरल चाहिए, स्वच्छ चाहिए। गंगा को वे अपनी मां मानते हैं। दुनिया और विशेषकर योरोप के देशों में नदियों को कोई अपनी मां नहीं मानता। वहां गाय और पेड़ भी पूजे नहीं जाते हैं। बावजूद इसके वहां की नदियों को साफ रखने की संस्कृति है। हर छोटे से छोटे नाले को भी उन्होंने प्रदूषण से मुक्त रखा है। वहां के लोगों ने अपने जंगलों और जैव विविधता को बनाये रखा है, उससे नदियों को मां और पेड़ों को भगवान मानने वाले संतों को सबक लेना चाहिए। संत-महात्माओं को अभी भी अपने आस्था के दरकने की चिंता है। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि जब लोग रहेंगे तभी आस्था रहेगी। वे गंगा को बचाने की बात तो करते हैं, धारीदेवी की चिंता उन्हें है लेकिन गंगा में आचमन करने और धारी देवी को पूजने वाले लोगों के बारे में वे नहीं सोचते। असल में नदियों के किनारे रहने वाले लोगों और हिमालय की जैव विविधता को बनाए रखने वाले गांवों और आबादी को बचाए रखना बहुत जरूरी है। यदि वहां के गांव खाली होते हैं तो हिमालय और गंगा को कोई नहीं बचा सकता। पिछले दो दशक से खाली होते गांवों ने इस बात को साबित भी किया है। तथ्य यह है कि कई वनस्पतियां और प्राणी ऐसे हैं जो बिना मनुष्य के नहीं रह सकते।
उत्तराखंड में मौजूदा समय में चालीस हजार से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं। ये सभी पर्यावरण संरक्षण, जंगलों को बचाने, जलस्रोतों के संरक्षण और नदियों पर काम कर रहे हैं। राज्य में सत्रह हजार गांव हैं। इस लिहाज से हर गांव में तीन एनजीओ का औसत बैठता है। इन्हें देश-विदेश से भारी पैसा मिलता है। दुर्भाग्य से जितना एनजीओ और उनके काम करने का क्षेत्र बढ़ा है उतना ही पहाड़ से पानी, जंगल और पर्यावरण गायब होता गया। इसलिए पहाड़, विकास, पर्यावरण और गंगा के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
मध्य हिमालय में बन रही सुरंगों को बनाने के लिए उपयोग की जा रही तकनीक ने पहाड़ों को हिला दिया है। प्रतिवर्ष मानवजनित आपदा से पहाड़ डरे-सहमे हैं। लगातार भूस्खलन और पहाड़ों के टूटने की घटनायें सामने आ रही हैं। उत्तराखंड में जहां भी बांध बन रहे हैं उसके चारों ओर 15 किलोमीटर की दूरी तक सारे जलस्त्रोत सूख गये हैं। टिहरी के पास प्रतापनगर का क्षेत्र प्रतिवर्ष अपने सैकड़ों जलस्त्रोतों को खोता जा रहा है। इन क्षेत्रों से पलायन लगातार जारी है। रही-सही कसर सरकारी योजनाओं ने पूरी कर दी है। अब पहाड़ इन बांधों से अपने ताबूत में अंतिम कील ठुकने के इंतजार में हैं। इसलिए गंगा और हिमालय के सवाल को यहां के लोगों की बेहतरी के साथ जोड़कर देखा जाना जरूरी है। सबको यह बात समझनी होगी कि हिमालय जब तक बसेगा नहीं वह बचेगा भी नहीं। गंगा को आचमन के लिए बचाने की लफ्फाजी, पर्यावरण की राजनीति और विकास के छलावे से बाहर निकलकर जनता के दर्द को समझते हुए गांवों को बचाने की पहल होनी चाहिए।

काव्य का स्वार्थ-विज्ञान
पद्मश्री अलंकृत और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी कवि लीलाधर जगूड़ी इन दिनों उत्तराखंड में विकास और प्रगति के झंडाबरदारों में हैं। उन्होंने केंद्रीय सरकार को धमकी दी है कि अगर प्रदेश में भगीरथी और उसकी सहायक नदियों पर बांध बनाने शुरू नहीं किए गए तो वह पद्मश्री लौटा देंगे। उनका एक लेख ‘प्रगति विरोधी इस पाखंड से लडऩा जरूरी’ शीर्षक से 15 जून के साप्ताहिक शुक्रवार में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका ने उन्हें उत्तराखंड में ”उन बुद्धिजीवियों में शामिल” बताया है ”जो जलविद्युत परियोजनाओं का समर्थन करते हैं। ”
यहां प्रस्तुत इस लेख के चुनिंदा अंश बतला देते हैं कि उत्तराखंड में विकास की बात करनेवाले वास्तव में वहां की स्थितियों और पर्यावरण को कितना जानते हैं। प्रश्न है तो फिर वह अपना पूरा व्यक्तिव्त क्यों दांव पर लगा रहे हैं? उनकी बातों के जवाब भी (इटालिक)में साथ दिए जा रहे हैं:
1. ”जो पानी चट्टानों से टकराता है, वह अगर बिजली घर की टरबाइन से भी टकरा जाए तो पानी की प्रत्येक टक्कर की सार्थकता बढ़ जाएगी। टरबाइन से टकराता हुआ नदी का पानी खुद के लिए स्वच्छ आक्सीजन (प्राणवायु) ग्रहण करता है और टरबाइन का पहिया घुमाकर विद्युत उत्पन्न कर देता है जिससे सामाजिक जीवन का अंधकार दूर हो जाता है।”
(वैज्ञानिकों का कहना है कि बांधों में रुके पानी में आक्सीजन कम हो जाती है। सुरंगों में तो आक्सीजन होती ही नहीं फिर वह उससे बहनेवाले पानी में कहां से आयेगी? मात्र टरबाइन से टकराने से उस आक्सीजन की पूर्ति कैसे हो जाएगी जो अन्यथा मीलों खुले में चलनेवाले पानी में होती है? वैसे सामाजिक जीवन का अंधकार ज्ञान से दूर होता है, बशर्ते वह सही हो।)
2. ”हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि खुले आसमान से भी ब्रह्मांडीय प्रदूषण नदियों में प्रविष्ट होते रहते हैं। ब्रह्मांड की धूल भी नदियों को प्रदूषित करती है। प्रकृति में कतिपय प्रदूषणों की अत्यंत रचनात्मक भूमिका है। जल-मल के बिना अंकुरण हो ही नहीं सकता। … सारे प्रदूषण तिरस्कार योग्य नहीं हैं बल्कि कुछ प्रदूषण तो बहुत ही जीवनदायी हैं। …”
( वह क्या कहना चाहते हैं कि नदी में मल-मूत्र को जाने दिया जाए? कहां किस तरह की स्थितियां हैं और कब क्या होना चाहिए का अंतर भी न किया जाए? क्या जगूड़ी अपने पीने के पानी में भी इसी तरह के तिरस्कार के अयोग्य प्रदूषण को रखना चाहेंगे?)
3. ”दुनिया की सारी नदियां समुद्रों में जाकर गिर रही हैं। क्या गंगा भी समुद्र में ही गिरने के लिए पृथ्वी पर आई है? नहीं, मैं तो कहूंगा बिहार और बंगाल के बीच गंगा को समुद्र में जाने से रोको और उसे पंजाब, राजस्थान और गुजरात की ओर मोड़ दो। भारत के पश्चिम से उसे कर्नाटक की तरफ मोड़ो और उसके बाद केरल, मुंबई और चेन्नई में ले जाकर धनुषकोटि के समुद्र में डाल दो। तब गंगा संपूर्ण भारत की भाग्यलिपि बन सकती है।”
(अगर जगूड़ी केरल से मुंबई और फिर चेन्नई जाना चाहते हैं तो हम उनके भौगोलिक ज्ञान पर कुछ कहना उचित नहीं समझते, पर यह प्रश्न जरूर पूछना चाहेंगे कि वह आखिर गंगा को सारे देश में क्यों ले जाना चाहते हैं? उन्हीं कारणों से जिनके चलते वह संतों के पाखंड की आलोचना कर रहे हैं? इस तरह की दुविधा के और भी संकेत उनके लेख में देखे जा सकते हैं। वरना क्या वह बतलाएंगे कि गंगा में कितना पानी है जो सारे भारत में जाता रहेगा? उन्हें पता नहीं है कि गंगा के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल ही नहीं बल्कि बांग्लादेश का जनजीवन चलता है? इसके बिना यह पूरा क्षेत्र रेगिस्तान में बदल जाएगा। आशा है उन्होंने सुंदरवन के बारे में सुना होगा।
इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रकृति की हर स्वाभाविक स्थिति का अपना महत्त्व है। कोई पहाड़ कहां है, कोई नदी किसी दिशा में क्यों बह रही है, इससे भौगोलिक ही नहीं मानव सभ्यता, उसका समाज और संस्कृति जुड़ी होती है। इस तर्क से तो वह कल को कहने लगेंगे कि नंदादेवी पर्वत को काटकर मध्यभारत में रोप दिया जाए इससे पूरा भारत ठंड का आनंद उठा सकेगा। कोई इस तरह की बेसिर-पैर की बातें कर सकता है ,यह अपने में आश्चर्यजनक है।)
4. ”नदी और पानी के बारे में कई तरह के अंधविश्वास दूर करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए गंगा को लें जो कि हिममूल (ग्लेशियर) से उत्पन्न होती है। हिमालय पर्वत का हिमाच्छादित भू-भाग बर्फ की शीतलता से जलकर काला पड़ जाता है। वहां तृण भी नहीं उग सकता। अब बताइए उसमें औषधीय गुण कहां से आ जाएंगे?”
(कवि जी यह कह रहे हैं कि गंगा में कोई विशिष्ट तत्त्व नहीं हैं। माना नहीं हैं। पर तब क्या यह गलत है कि अभी कुछ दशक पहले तक गंगा का पानी वर्षों रखने के बाद भी खराब नहीं होता था?
दूसरी बात, जिस पर रोना आता है, वह यह है कि गंगा चूंकि ग्लेशियर से निकलती है इसलिए उसमें कोई औषधीय गुण नहीं हैं। उसमें औषधीय गुण हैं या नहीं यह दीगर बात है, प्रश्न यह है कि क्या गंगा में सिर्फ वही पानी रहता है जो गोमुख के ग्लेशियर से निकलता है? या क्या इसमें सिर्फ वही नदियां मिलती हैं जिनका उद्गम ग्लेशियर हैं? बच्चा भी जानता है कि हर बड़ी नदी में कई तरह के छोटे-बड़े नदी-नाले मिलते हैं। इसलिए यह कहना कि चूंकि गंगा ग्लेशियर से निकलती है इसलिए इसमें औषधीय तत्त्व नहीं होते, बल्कि उन नदियों में होते हैं जो ग्लेशियरों से नहीं निकलतीं, क्या वाजिब बात है? क्या यह तर्क संगत है कि औषधीय तत्व सिर्फ वनस्पतियों में होते हैं विभिन्न किस्म की उन चट्टानों के खनिजों में नहीं, जिन से होकर पहाड़ी नदियां गुजरती हैं।)
5. ”टनलों में डालने से पानी ब्रह्मांडीय धूल के प्रदूषण से बचा रहता है। नहरों में आसपास का सारा कूड़ा उड़कर आ जाता है। सबसे स्वच्छ, निर्मल और पवित्र पावर हाउस की टरबाइन से निकलनेवाला जल होता है। उसमें प्रदूषण का एक भी कण नहीं होता। पॉवर हाउस की टनल और टरबाइन आधुनिक वैज्ञानिक विधि से बनाई जाती हैं।”
(इस तर्क से तो दुनिया की नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए टनलों में डाल दिया जाना चाहिए। अजीब बात है कि टनल और नहर का अंतर ही लेखक को मालूम नहीं है। नहरें सिंचाई के लिए होती हैं न कि टरबाइन चलाने के लिए। फिर आधुनिक विधि से बनी हर चीज बेहतर होती है यह कैसे मान लिया जाए? टरबाइन से ज्यादा आधुनिकता से तो परमाणु ऊर्जा पैदा करने के उपकरण बनते हैं, इस लिहाज से तो परमाणु संयंत्रों के कूड़े को जरा भी हानिकारक नहीं होना चाहिए।)

Friday, June 15, 2012

गुलों और दिलों में रंग भरकर चले गए मेहदी.....-शिवप्रसाद जोशी



भारत पाकिस्तान के बीच सियाचिन से सेनाएं लौटाने के स्थूल कूटनीतिक क़िस्म के प्रस्तावों और बातचीत की पेशकशों के बीच दोनों देशों के रिश्तों की तल्खी को मिटाने और एक दूसरे से फिर से जुड़ जाने की बड़ी कोशिश या कमसेकम उसका छोटा सा मुज़ाहिरा ये होता अगर मेहदी हसन साब को हिंदुस्तान इलाज के लिए ले आया जाता या दोनों देश संयुक्त रूप से उनका इलाज कराने की पेशकश करते हुए उन्हें किसी तीसरी बड़ी जगह भेजते.

लेकिन ऐसा हो न सका. लंबी बीमारी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप को अपनी रागदारी वाली ग़ज़ल गायकी से मोहित करते रहने वाले मेहदी न रहे. कई दशकों से वो गहरी बीमारियों से तड़प रहे थे. अगले महीने 18 जुलाई को वो 85 साल के हो जाते. गाना वो काफ़ी पहले छोड़ चुके थे, 2009 में अलबत्ता एक रिकॉर्डिंग में शामिल थे.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में हमारे समय के एक बहुत बड़े उस्ताद अमीर ख़ान ने संगीत के बारे में कहा था कि बिना पोएट्री के क्या गाना. मेहदी उनके इस कथन पर खरा उतरने वाले चुनिंदा गायकों में थे. भले ही वो विशुद्ध क्लासिक गायकी से अलग था लेकिन उन्होंने रागों से कभी परहेज़ नहीं किया बल्कि शास्त्रीय संगीत के अपने सबक को ग़ज़ल गायकी में ढाल दिया. शब्दों पर ज़ोर, उनके घुमाव और उनके रहस्य रोमांच और दर्द के क़रीब मेहदी हमें ले जाते थे. गुलों में रंग भरे...इसकी एक मिसाल है.

उनकी गायकी में रागों के रंग भरे थे. वो एक प्यास में भटकती हुई आवाज़ थी. एक इंतज़ार में. मेहदी इसी इंतज़ार को देखते रहे साधते रहे और इसी को बरतते रहे. वो हमारे वक़्तों की एक तड़प थी जो ग़ज़ल में नुमायां होती रही और हमें किसी कथित चैनोसुकून से ज़्यादा तड़पाती रहेगी. रचना के साथ ऐसा घुलमिल जाना और फिर सुनने वालों को भी उस अनुभव के भीतर ले आना, ये मेहदी साब की गायकी की ख़ूबी थी.

मेहदी हसन की आवाज़ सुनने वालों को लिए एक रुहानी अनुभव इसीलिए थी कि वो गहरे उतरकर वहां तैरती रहती थी. उसे सुनने के लिए आपको अपने भीतर तमीज़ पैदा करनी होती थी. आप यूं फ़ॉर्मूलाबद्ध पोप्युलिस्ट तरीक़ों आस्वादों से उससे रीझने उसपर झूमने जैसी कवायदें नहीं करते रह सकते. मेहदी हसन की गायकी में ऐसी दुर्लभ ईमानदारी थी कि वो सुनने वालों से भी एक अलग क़िस्म की नैतिकता और ईमानदारी चाहती थी. उसे दाद की कभी परवाह नहीं थी, दर्द उसका सबसे बड़ा हासिल था.


Sunday, June 10, 2012

हुसेन की पहली पुण्यतिथि और शर्मिंदगी गहरी -शिवप्रसाद जोशी



मक़बूल फ़िदा हुसेन को गुज़रे एक साल हुआ. कल्पना करें कि याद में एक खुली प्रदर्शनी लगाई है और हुड़दंगियों की धमकी भी आ गई है. वे कहेंगे हुसेन मत दिखाओ. आयोजन को भंग कर देंगे, हिंसा करेंगे. धमकाएंगें. फिर आने को कहेंगे. तो आप रस्मी तौर भी अगर हुसेन को याद करेंगे तो ज़रा देखसंभाल कर करना होगा. कहीं आपको या आपके आयोजन को चोट न आए. ये अच्छा हुआ और सोचिए कितना अच्छा हुआ कि हुसेन को यहां हिंदुस्तान में दफ़ना देने की कुछ नकली उत्साही प्रगतिशीलों की मांग न मानी गईं. वे कुछ कभी न करते अपमान हो जाने देते, मरकर भी पीछा करते रहने वालों के पीछे दुबक जाते या घर चले जाते. आवाजाही का ढोल बेशक बजता रहता. इस शोर में तो फेफड़े तक सिकुड़ जाते हैं. क्या ये महज़ किसी बीमारी का जानलेवा लक्षण है. 95 साल के हुसेन को फेफड़ों में संक्रमण हो गया था. बीमारियां और भी थीं. एक तरह का देश निकाला और अपमान- अफ़सोस और उदासी ने हुसेन को जकड़ लिया था.

हुसेन का कांटा इस राष्ट्र से निकल गया. जुनूनियों को ये सुकून हो चला था. लेकिन उसे हमारी सामुहिक स्मृतियों से कैसे निकालेंगे. उस बूढ़े दाढ़ी वाले नंगे पांवों वाले लंबी कूची हाथ में लेकर डोलते से रहने वाले शख़्स को. उसकी छवि ही समाई हुई है याद में ही नहीं परंपरा में लोक में कला में जीवन में मिट्टी में. कहां कहां से क्या क्या उखाड़ेगें. फेंकेंगे. उसके रंग तो जहांतहां बिखरे हैं. अपना पीछा करने वालों का पीछा अब हुसेन कर रहा है. अपनी उम्र से भी लंबी ख़ामोशी में और एक बहुत गहरी निश्चल नींद में.

ये करेंगे संवाद. हुसेन को देश छोड़ने पर विवश कर देंगे, उन्हें जान से मारने की फ़िराक में घूमेंगे और कहेंगे हम तो सभी विचारों सभी विवादों पर संवाद करने वाली जमात हैं. विराट हिंदु दर्शन के हम प्रतिनिधि. कितना नकली भोथरा और बेशर्मी से भरा हुआ समय है. अश्लील. सरेआम घिनौना. मंचों पर आवाजाही की बात करते हैं. कि बात बनेगी, नवसाम्राज्यवाद का मुक़ाबला होगा. विचारों की धूल छंटेगी. विचारों का विकास होगा. एक ही धुन में क्यों बोले चले जा रहे हैं. सांप्रदायिकता पर चोट करेंगे या छोड़ो कल देखते हैं कहेंगे. एक साल पहले देश के एक सम्मानित बुज़ुर्ग रचनाधर्मी के निधन की वजहें गिनने जाएंगे तो हमारी कायरता का भी नंबर आता है.

किस प्रतीक की रक्षा पहले करेंगे. धार्मिक या आस्था का भावनापरक होगा वो प्रतीक या वो आत्मा का प्रतीक होगा. नैतिकता का. मनुष्यता के प्रतीक की रक्षा होगी या नहीं. एक साल बाद कहां से कहां पहुंच गए हम. अग्नि पांच हो गई. आईपीएल पांच हुआ. इतने नामुराद घोटाले हो गए. चंद गिरफ़्तारियां और रिहाइयां हो गईं. सरकारें बदल गईं, अण्णा आंदोलन का मोह हुआ फिर भंग हो गया. बड़े हिस्से में लाचारी और वेदना बढ़ गई तो एक हिस्से में खुमारी और डकारें घनी हुई.

लिहाज़ा ऐसे इस बेरहम वक़्त में हुसेन की इस पहली पुण्यतिथि पर उनका ख़ामाख़्वाह शोक और भाषण न करें, आवाजाही रोक दें, ख़ातिर जमा रखें और कुछ इतना भर ऐसा करें कि हुसेन की बनाई छवियों को फिर से देखें दिखाएं, समझे समझाएं. हमसे छूटती जाती हुई मनुष्यता शायद इस तरह कुछ रुके. शायद हमारे पास ही रह जाए.
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(हुसेन की पहली पुण्यतिथि कल 9 जून को थी। शिवप्रसाद जोशी कई दिन पहले ही यह लेख मेल कर चुके थे पर मेल देरी से देख पाने की वजह से यह पोस्ट एक दिन की देरी से लगा पा रहा हूं।- धीरेश)

Saturday, June 2, 2012

कार्टून विवाद और एक कट्टरपंथी दलित के मन की हलचल : अनूप कुमार


“मेरा दिमाग खुला है पर खाली नहीं. खुले दिमाग वाला आदमी हमेशा ही स्वागत योग्य होता है. पर जब मै ऐसा कह रहा हूँ वहाँ आपको यह भी समझना होगा कि खुला दिमाग कभी खाली भी हो सकता है. यदि एक खुला दिमाग खुशहाल स्थिति में है तो वह मानव के लिए घातक हो सकता है. वह किसी दुर्घटना का शिकार भी हो सकता है. ऐसा व्यक्ति बिना पतवार की नाव पर सवार हैं. उसके पास कोई दिशा नहीं. वह बह सकता है पर यदि वह चट्टान की दिशा में बहने लगे तो वह इससे टकरा कर नष्ट हो जायेगा.”
- डॉ. बी आर आंबेडकर उनकी किताब ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इण्डिया की प्रस्तावना का अंत करते हुए.

करीब एक महीने पहले की बात है मेरे कुछ दलित मित्रों ने मुझे एन.सी.ई.आर.टी की टेक्स्ट बुक के एक कार्टून के बारे में बताया कि उसमें डॉ. आंबेडकर पर एक अपमानजनक कार्टून है. उन्होंने मुझे इस किताब का पीडीएफ फोर्मेट भी ईमेल किया और कहा कि हम दलितों को इस  किताब के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए.
पर मैंने उनके इस सुझाव को तवज्जो नहीं दिया, क्योंकि मुझे यह विश्वास था कि  एन.सी.ई.आर.टी  जैसी संस्था अपनी किसी किताब में डॉ. आंबेडकर को अपमानित करने वाला कोई कार्टून शामिल नहीं करेगी, खासकर ऐसे समय जब दलित आंदोलन अपने उफान पर है. यही सब सोच कर मैंने इस कार्टून पर विशेष ध्यान नहीं दिया.
ईमानदारी से कहूँ तो मैंने इसमें ना पंडित नेहरु को देखा था ना उनके हाथ के कोड़े को. इसलिए मेरे मन में यह ख्याल ही नहीं आया कि एक ‘कश्मीरी ब्राह्मण डॉ आंबेडकर पर कोड़े चला रहा है’ (जैसा कि इस कार्टून पर टिपण्णी करने वाले लोग मज़ाकिया अंदाज़ में कहते हैं).
मुझे तो इस कार्टून में डॉ आंबेडकर एक घोंघे पर बैठे भर दिखाई दिए और स्वभाविकतः मन में ख्याल आया कि शायद संविधान निर्माण में होने वाली देरी की तुलना घोंघे की चाल से की गई है. वास्तव में, यदि एन.सी.ई.आर.टी. की मंशा अगर इतना भर ही दिखाने की होती तो इसे बर्दाश्त किया जा सकता था. आखिर,कुछ आलोचनाओं के साथ, संविधान निर्माण समिति पर धीमी रफ़्तार से काम करने का एक प्रमुख आरोप तो तब लगा ही था. शायद यह चित्र हमारे विद्यार्थियों को यह बात बताने में सफल हो सकता था. इस आरोप का उत्तर स्वयं डॉ. आंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 को अपने ऐतिहासिक वक्तव्य में दिया भी था.
हालांकि मुझे इसमें डॉ आंबेडकर को अपमानित करने वाला कुछ नहीं लगा, फिर भी व्यक्तिगत तौर मुझे यह कार्टून पसंद नहीं आया क्योंकि, भले ही  एन.सी.ई.आर.टी के विद्वान, इस माध्यम से, हमारे विद्यार्थियों को सविधान-निर्माण प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब के कारणों से ही अवगत कराना चाहते हो, लेकिन संविधान निर्माण की प्रक्रिया की तुलना घोंघे की चाल से करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है.
मेरी नज़र में, फिलहाल, वह स्थिति ही आदर्श होगी कि स्कूली टेक्स्ट बुक में (मैं दोहरा रहा हूँ किसी भी टेक्स्टबुक में) डॉ आंबेडकर के संघर्ष और उनकी उपलब्धियों के अतिरिक्त कोई अन्य कुछ भी किसी भी रूप में ना हो.
आप चाहे इसे मेरी हठधर्मिता कहें या नायक-पूजा या फिर दोनों ही, पर इस विरोध के पीछे मेरी तरह सोचने वाले अन्य दलितों के अपने कारण है, जिसे मानने के लिए  एन.सी.ई.आर.टी  पर कोई बाध्यता नहीं है. उसे हमसे ज्यादा ऑब्जेक्टिव होने की आज़ादी है.
भारतीय अकेडीमिशिंअस ने डॉ. आंबेडकर को ‘ऑब्जेक्टिव तरीके से’ देखने का जो आह्वान किया है, यदि हम उस आह्वान के खिलाफ खड़े दलितों के विरोध को नज़रंदाज़ कर दें तो भी आप पाएंगे कि दलितों ने तो पिछले पांच दशकों से स्कूली पुस्तकों के सन्दर्भ में डॉ आंबेडकर की अनदेखी पर धारण मौन के खिलाफ कभी कोई विरोध प्रगट नहीं किया है. हम लोग तो आरक्षण, शिक्षा, नौकरी, सामजिक भेदभाव हिंसा और शोषण जैसे ज़रुरी मुद्दों पर विभिन्न प्रकार के राजनीतिक और सांस्कृतिक  संघर्षों से ही जूझ रहे थे. इसलिए स्कूल और कॉलेज का पाठ्यक्रम तो कभी भी दलितों की प्राथमिकता बन ही नहीं पाया, हालाँकि दलितो के मन में हमेशा ही इस बात का क्षोभ रहा है कि डॉ. आंबेडकर को कभी भी किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया. इसलिए आज जब हमारे महापुरुषों को  एन.सी.ई.आर.टी  की पाठ्यपुस्तकों में स्थान मिलने लगा है तो यह हमारे लिए हर्ष का विषय है.

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इस कार्टून से जुड़ी मेरी व्यक्तिगत असहमति मुझे कार्टून को  एन.सी.ई.आर.टी  की किताबों में शामिल करने से नहीं रोकती है. ना ही मुझे इस कमेटी से जुड़े अकेदेमिशियनो की मंशा पर कोई शक है.
लेकिन एक दशक से अधिक समय से उच्च शिक्षा एवं दलित और आदिवासी विद्यार्थियों से भेदभाव के मुद्दों पर कार्य करने के अनुभव के चलते इस कार्टून पर मेरी कुछ वाजिब चिंताए हैं. इनमें सबसे अहम चिंता इस बात की है कि इस कार्टून पर कक्षा के गैर-दलित छात्रों और शिक्षकों का क्या रुख होगा? क्या यह कार्टून इन्हें डॉ आंबेडकर पर कोई घटिया कमेन्ट करने के लिए बाध्य तो नहीं करेगा? क्या वे लोग संविधान निर्माण में हुई इस देर के लिये डॉ. आंबेडकर को ‘घोंगा’ मानते हुए ज़िम्मेदार तो नहीं ठहराएंगे? क्या यह कार्टून, छात्रों और अध्यापकों के मन में व्याप्त जातिगत पूर्वग्रहों को बाहर तो नहीं ले आएगा? हमारे दलित विद्यार्थी जो वैसे ही सवर्ण छात्रों के अनुपात में बेहद कम संख्या में होते हैं, ये उनके मन पर क्या प्रभाव छोड़ेगा! ऐसे में वे इसका सामना कैसे कर पायेंगे? क्या इस कार्टून के साथ लिखा टेक्स्ट विद्यार्थियों के मन में उपजी धारणा को हटा पाएगा जो इस कार्टून से व्यक्त हो रही है?
एक दलित के रूप में मैंने गैर-दलितों के मन में डॉ आंबेडकर के प्रति व्याप्त द्वेष देखा है. उनकी यह दुर्भावना डॉ. आंबेडकर के हर कार्य को ख़ारिज करने के रूप में प्रकट होती है और अक्सर डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने की घटना के रूप में हमारे समाज में, वैसे भी, प्रो. योगेन्द्र यादव और प्रो. सुभाष पल्शिकर जैसे बुद्धिजीवियों की कमी है जो डॉ आंबेडकर के कार्य से वाकिफ  हो. लेकिन यदि हमारे पाठयक्रमों में पिछली पीढ़ी के समय ही डॉ. आंबेडकर के संघर्ष और दलित हकीकतों को शामिल कर लिया जाता तो माहौल कुछ और होता. ऐसी स्थिति में, निश्चित ही, हमारे पास वास्तविकता को व्यक्त करने वाले प्रोफ़ेसर बड़ी संख्या में होते.
देश को आज़ाद हुए पांच दशक बीत चुके हैं लेकिन समाज में ये द्वेष और दुर्भावना कम होने के बजाय ना केवल बढ़ी बल्कि और मज़बूत हुई है. मैं इस बात का गवाह रहा हूँ कि कैसे डॉ आंबेडकर के प्रति घृणा, आसानी से, दलितों के प्रति द्वेष में बदल जाती है और कैसे दलितों के प्रति घृणा डॉ. आंबेडकर के प्रति द्वेष में तब्दील होती है. इसके पीछे पहचान-की-राजनीति काम करती है. इस सम्बन्ध में, एम ऍफ़ हुसैन के चित्रों से उपजी घृणा को हम आम मुस्लमान के प्रति फलती नफरत के रूप में देख चुके हैं.
आप ज़रा अगस्त 1991 में घटी आंध्र प्रदेश के सुंदरू की घटना को याद कीजीये कि किस तरह डॉ. आंबेडकर की मूर्ति लगाने के प्रयास में लेकिन यह तो सिर्फ एक भोला-भाला कार्टून है. परन्तु क्या कक्षा में पड़ने वाले इसके संभावित परिणाम को नज़रंदाज़ किया जा सकता है? बहरहाल, इस परिणाम को आप मेरी कट्टरता की उपज मान सकते है. लेकिन इस पर सोचिये ज़रूर!
इन्हीं सब बातों के बीच मैं अपने, क्लास रूम में हुए, एक अनुभव को बांटना चाहता हूँ. यह वर्ष 1995 की बात है जब मायावती ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप कार्यभार ग्रहण किया था. इसी साल अगस्त में अपनी बारहवीं पास करने के बाद मैंने देश के एक पुराने व् प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया. यहाँ के विद्वान प्रोफेसरों में से एक ने हमारे इंट्रोडक्शन के समय 80 विद्यार्थियों की क्लास में हम 8 दलित और आदिवासी छात्रों की ओर उंगली दिखाते हुए कहा, “नंबर हासिल करने के लिए तुम्हें ठीक से पढना होगा. तुम्हें नंबर मायावती नहीं, मै दूँगा.” इस पर मुझे और उस प्रोफ़ेसर को छोड़ कर पूरी क्लास हंसने लगी. मै अपने बाकि दलित-आदिवासी सह्पाठियों से नहीं पूछ सका कि वे भी उस हँसी के साझीदार बने या नहीं? मै यह भी नहीं समझ पाया कि प्रोफ़ेसर का यह मजाक कोई कटाक्ष था या कुछ  और! लेकिन इतना तय है कि यह, मेरे अलावा, सभी विद्यार्थियों को हंसी दिलाने में कामयाब रहा. इस एक कथन ने मुझे स्पष्ट कर दिया था कि मैं बाकी क्लास से अलग हूँ. यहाँ मेरी पहचान को इन्होंने एक ऐसी राजनेता के साथ जोड़ दिया जिससे वह प्रोफ़ेसर नफरत किया करता था, इसीलिए उस नफरत का तार स्वाभाविक रूप से मुझसे भी आ जुड़ा, भले ही उस वक्त मेरा मायावती से कोई सम्बन्ध नहीं था.
गौरतलब है कि उस समय मायावती ने मूर्तियां और आंबेडकर पार्क नहीं बनवाये थे. तब उन पर किसी किस्म के भ्रष्टाचार के आरोप भी नहीं लगे थे और ना ही उन्होंने नोटों की कोई माला ही पहनी थी. फिर भी, ऐसी किसी भी कथित बदनामी के ना चलते हुए भी मायवती आज की तरह वहाँ, मेरे इंजीनियरिंग के बाद के वर्षों में क्या हुआ, वह बताने में मुझे बहुत वक़्त लगेगा. लेकिन इस पर मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि यह एक  बुरा अनुभव था और किसी दलित और आदिवासी विद्यार्थी को ऐसे अनुभव से नहीं गुज़रना चाहिए.
[दरअसल जाति की समस्या को एक ‘समस्या’ के रूप में तब तक नहीं देखा जाता जब तक कि इसके तार आरक्षण या मायावती के भ्रष्टाचार या उसकी मूर्तियों से न जुड़ जाएँ. अधिकांश लोग तो जाति-समस्या, जाति-भेदभाव से जुड़े तजुर्बों और दलित-मुद्दों से मुहँ मोड़ कर चुप्पी ही साधे रहते हैं. इस कार्टून विवाद से तीन साल पहले तहलका द्वारा प्रकाशित एक आलेख को आप देख सकते हैं.]

जी हाँ, पिछले 15 वर्षों के मेरे अनुभव और अगर इसमें डॉ आंबेडकर के ज़माने को भी शामिल कर लिया जाए तो भारत में दलितो के प्रति माहौल क्या आज हमारे क्लास रूम जाति पूर्वग्रह से मुक्त हो गए है? 
क्या अब वहाँ गैर-दलित विद्यार्थी और शिक्षक, डॉ.आंबेडकर और संविधान निर्माण जैसे विषय पर क्रिटिकल विचार रख सकते है?

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जहाँ हमारे सांसद इस बात पर एकमत थे कि इस उम्र में विद्यार्थी परिपक्व नहीं होते इसलिए उनके पाठ्यक्रम में ऐसे कार्टून शामिल करना उचित नहीं. वहीँ हमारे अकेडेमिशिअनों ने भी एकमत से संसद का विरोध करते हुए इस कार्टून को शिक्षा पाठ्यक्रम में नया उत्साह और समझ  तथा आलोचनात्मक बुद्धि को विकसित करने के लिए ज़रूरी बताया.
मै ना ही ग्याहरवी क्लास के बच्चों को इतना कच्चा मानता हूँ कि उन्हें किसी संरक्षण की ज़रूरत है. ना ही मुझे उनकी या उन्हें पढ़ाने वालों की ‘जाति’ और ‘डॉ. आंबेडकर’ से जुड़ी उनकी आलोचनात्मक समझ पर कोई खास विश्वास है. हालाँकि इस बात पर मुझे पूरा यकीन है कि कार्टूनों को शामिल किये जाने से पढ़ाने की विधा में ताज़गी आएगी और स्कूली पाठ्यक्रम की नीरसता खत्म होगी तथा स्कूली-बच्चे किताबों को निजी जीवन के यथार्थ से साथ जोड़ पाएंगे.
और यहीं से मेरे फ़िक्र भी उठते हैं. फ़िक्र यह कि जब विद्यार्थी इस कार्टून को देखकर इसे अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़कर देखेंगे तब क्या वैसे भी ग्याहरवी की कक्षा या इस उम्र के छात्र जाति को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं. उन्हें जातिप्रथा में निहित ऊंच-नीच की जानकारी होती है. उन्हें छुआछूत के नियमों की भी खासी जानकारी होती है, तथा वे अपने क्षेत्र के सरनेम से भी भली-भांति परिचित होते हैं
कि कौन सा सरनेम किस जाति का होता है, और साथ ही वे जाति के आधार पर बंटे मोहल्लों और बस्तियों से भी वाकिफ़ होते है.
हमारे अकेडेमिशियंस की सोच के विपरीत ये बच्चे नादान नहीं होते हैं. वे महज विद्यार्थी नहीं होते, बल्कि हकिक़त ये भी है कि वे सभी, किसी न किसी जाति के भी होते हैं और उन्हें दैनिक जीवन में हो रही जातिगत उठापटक की भी ठीकठाक जानकारी होती है. दलित विद्यार्थियों के लिए क्लास रूम ही एक ऐसी जगह होती है जहाँ वे गैर-दलित विद्यार्थियों के साथ वक्त साझा करते हैं अन्यथा शेष कहीं भी इन दोनों तबको का कोई मेल नहीं होता है.
यदि कोई दलित-अनुभवों को सुने तो उनमें उनके स्कूली दिनों की जाति-पीड़ा की ध्वनि अक्सर सुनाई देती है - कि कैसे सहपाठी, अध्यापक उनसे भेदभावपूर्ण व्यवहार किया करते थे!
[यदि कोई इनकी जानकारी चाहता हो तो वह Dalits & Adivasi students’ portal में उपलब्ध युवा दलित-आदिवासी विद्यार्थियों के साक्षात्कारों को पढ़ सकता है जिसमे उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें, अपने सहपाठियों और शिक्षकों से, जातिगत भेदभाव का शिकार होना पड़ा. आज ये सभी युवा अपने-अपने क्षेत्रो में सफल हैं. लेकिन वहीँ कुछ विद्यार्थी ऐसे भी हैं जो इस पीड़ा को नहीं झेल पाए और
मजबूरन उन्हें अपनी जान गंवाने पर मजबूर होना पड़ा. ऐसे कुछ प्रकरणों की जानकारी The Death of Merit in India पर उपलब्ध है]

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इस सन्दर्भ में हमें समझना होगा कि जहाँ हमारा समाज वैसे ही जाति-पूर्वग्रह की आग से ग्रस्त है उसपर यह कार्टून घी डालने का काम कर सकता है. जाहिर है कि इस मानसिकता से हमारे समाज का महत्वपूर्ण तबका - छात्र और शिक्षक - भी ग्रसित है. पंडित नेहरु या अन्य राजनेताओं पर बने कार्टून इन नेताओं की जाति से आने वाले विद्यार्थियों के मन पर कोई विपरीत असर नहीं डालेंगे पर 
क्या प्रो. योगेन्द्र यादव और सुभाष पल्शिकर मुझे और दलित समुदाय को इस बात का आश्वासन देंगे कि डॉ आंबेडकर के सन्दर्भ में ऐसा क्या वे मुझे आश्वस्त करेंगे कि इस कार्टून से विद्यार्थियों में दलितों के प्रति जातिगत पूर्वग्रह नहीं बढ़ेगा? क्या उन्हें अब डॉ. आंबेडकर को कोसने के लिए एक और मुद्ददा नहीं मिलेगा कि इसी व्यक्ति के कारण हमारे संविधान निर्माण में इतनी देरी हुई? क्या अब गैर-दलित  छात्रों को दलित विद्यार्थियों को चिढ़ाने का एक और अवसर नहीं मिलेगा?
क्या ये फ़िक्र आपको ‘कट्टरवाद’ लगती हैं? क्या यह चिंताए आपको डॉ. आंबेडकर को पैगम्बर मानने से उपजी लगती हैं? क्या ये चिंताए डॉ. आंबेडकर के प्रति व्याप्त मेरी असहनशीलता से उभरी है?
क्या ये चिंताए इसलिए उभरी हैं कि मैं इस कार्टून को डॉ आंबेडकर का अपमान मानता हूँ और यह समझता हूँ कि इस 63 वर्षीय कार्टून से डॉ. आंबेडकर के योगदान और कार्यों पर कोई प्रभाव पड़ेगा?
इस कार्टून पर मेरी इतनी सारी चिंताओं के बावजूद भी मै इसे  एन.सी.ई.आर.टी  की पाठ्य पुस्तकों में शामिल किये जाने का विरोध नहीं करूँगा. पर समाज में डॉ. आंबेडकर और दलितो के विरोध में इतनी घृणा और इतने द्वेष को देखकर मै इतना ज़रूर कहूँगा कि यदि इसे शामिल करने से बचा जाता तो मुझे इस कार्टून से ज्यादा चिंता इस बात की है कि प्रो योगेन्द्र यादव और प्रो सुभाष पल्शिकर भारत के क्लास रूम की सच्चाई से अवगत  ही नहीं हैं और उन्हें दलित और दलित-प्रेरको की सामाजिक सच्चाई की तो थोड़ी भी जानकारी नहीं है, जबकि वे एक अच्छे शोधार्थी हैं और जाति मुद्दे पर लंबे समय तक कार्य कर चुके है.

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बहरहाल, मुझे ये कार्टून, डॉ. आंबेडकर के प्रति मेरी नायक-पूजा के बावजूद, जातीय हिन्दुओं की दलितों के प्रति असंवेदनशीलता का एक और उदहारण मानते हुए,  एन.सी.ई.आर.टी  की टेक्स्ट बुक में बर्दाश्त करना होगा. पिछले दिनों संसद के इस प्रस्ताव के खिलाफ जो तीखी प्रतिक्रिया हुई, और हमारे अकेडेमिशिअनों, पत्रकारों और टिप्पणीकारों ने यह कहकर जो गुस्सा दिखाया कि वे इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर करारी चोट मानते हैं, उनकी नजरो में डॉ. आंबेडकर, असहनशील लोगों के पैगम्बर हो गए. उन्हें संसद का यह कदम वोट बैंक पोलिटिक्स लगने लगा. उन्होंने इसे दलित-कट्टरवाद का उभार और जाने क्या क्या नाम दे अखबारों ने इन आवाज़ों को खूब स्पेस दिया. राष्ट्रिय स्तर की मैगज़ीनों ने भी इसे अपनी कवर स्टोरी बनाया जिसमें कि डॉ. आंबेडकर को पैगम्बर के रूप में दर्शाया गया. इन्टरनेट ने गुस्से भरे संदेशो को अपने फेसबुक, ब्लॉग, और ईमेल के माध्यम से खूब फैलाया. हर जगह इस  कुछ लोग तो इतने अधिक आक्रोशित हो गए कि उन्होंने दलितों द्वारा कार्टून विरोध को खाकी-चड्डी वालों से भी घटिया बता डाला. एक व्यथित अकेमिडीशियन, जो अपना ब्लॉग भी चलाते हैं, ने एक कदम आगे बढ़ कर यहाँ तक कह डाला कि अब तो दलितों को ही आंबेडकर की धरोहर का विवेचन करने दो. दलितों के लिए यह दिन लगभग, माया केलेंडर अनुसार वर्ष 2012 के, संसार विनाश के किसी विशेष दिन सरीखी ही बन गया.
लेकिन जिस तरह हर बुराई में भी कहीं न कहीं, कुछ न कुछ अच्छाई छिपी रहती है. उसी तरह इन विवादों और चर्चाओं से मुझे ऐसा लगा मानो अंततः इस देश में डॉ आंबेडकर स्थापित हो गए.
गौरतलब है कि असंख्य दलितों ने डॉ आंबेडकर की मूर्तियों का निर्माण कर अपने संघर्ष का सूत्रपात किया और उन्होंने अपने सभी दर्द, तकलीफों और विद्रोह को दलित साहित्य में प्रस्फुटित किया. डॉ आंबेडकर के जन्म और परिनिर्वाण के अवसर पर उमडने वाली लाखों लोगों की भीड़, उनके नाम पर बने अनेक राजनीतिक और सामाजिक समूह, छात्र संगठन और कर्मचारी संगठन उनके कारवां को आगे बढ़ा रहे हैं.
सभी प्रयास कर रहे हैं उन सार्वजनिक स्थानों पर दावेदारी के लिए, जहाँ से उनको अब तक मना किया जाता रहा था. आज, उनके यह सब प्रयास डॉ आंबेडकर को सीमान्त दायरे से बाहर लाकर उन्हें राष्ट्रिय नेताओ, चिंतकों और महान क्रांतिकारियों की श्रेणी से भी ऊपर लाने साक्ष्य एकदम साफ़ हैं. इस विवाद पर आज हर एक लेखनी चाहे वह अख़बारों या मैगजीनों में कोई लेख हो या टीवी और इन्टरनेट पर इस
बारे में बातचीत, सबकुछ निरपवाद रूप से, डॉ आंबेडकर को आभामयी श्रद्धांजलि से शुरू हो रही है. अब हर कोई इस मुल्क को बनाने में उनके किरदार, उनकी विरासत की महत्ता और उनके महत्वपूर्ण दृष्टिकोण, किसी भी नायक-पूजा के खिलाफ उनकी फटकार और सविधान में उनकी भूमिका पर बात कर रहा है. वहीँ लगातार ये भी दोहराया जा रहा है कि ‘कट्टरपंथी’ दलितो को डॉ आंबेडकर के नाम पर ऐसी शर्मनाक हरकत  कर पाठ्य पुस्तक से कार्टून हटवाकर उन्हें अपमानित नहीं करना चाहिए.
यहाँ तक कि वे अकेदेमिशियन, जिन्होंने डॉ. आंबेडकर को कभी पाठयक्रमों में शामिल नहीं होने दिया और हमेशा ही उनका विरोध करते हैं, आज अपना राग बदल कर अचानक डॉ. आंबेडकर द्वारा तस्दीक ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की बात याद दिलाने लग गए हैं. वैसे उनकी पिछली लेखनी देखने के बाद अब उनके मुहँ से डॉ. आंबेडकर के कार्यों की तारीफ! सच कहे तो बहुत सुकून दे रही है. 
मै यह भी समझता हूँ कि अभी जो भी शोधार्थी जाति विषय पर कार्य कर रहे हैं उनके लिए हमारे अकेडेमिशिअनों के इन तर्कों का डाक्यूमेंनटेशन करना उचित होगा कि आज दलित प्रतिरोध के दौर में इन लोगों के विचारों में आखिर कितनी ईमानदारी है!

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जब कोई युवा दलित किसी प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी जैसे आई.ए.एस. के लिए इंटरव्यू की तैय्यारी करता है तो उसके मन में हमेशा ही दो प्रश्न पूछे जाने का भय रहता है. इनमे एक आरक्षण से जुड़ा है और दूसरा संविधान के जनक के रूप में डॉ.  आंबेडकर के मुद्दे के समकालीन होने और दलितों के जीवन से सीधे जुड़े होने के कारण ऐसा पूछा जाना स्वाभाविक है, पर संविधान निर्माण में डॉ आंबेडकर की भूमिका के बारे में पूछने के पीछे भला क्या तर्क है?
आप किसी दलित प्रतियोगी से पूछिए कि वह इस तरह के व्याप्त माहौल में अपने आप को कैसे तैयार करता है - कि उसे गलती से भी डॉ. आंबेडकर को संविधान का जनक या निर्माता नहीं कहना है, बल्कि ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमेन भर कहना डॉ. आंबेडकर को संविधान के जनक कहलवाने का मिथक तो कांग्रेस ने पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से गढा है, जिसके पीछे उसकी सोच थी कि हमारे छात्र डॉ. आंबेडकर के जाति के खिलाफ क्रांतिकारी विचारों से अवगत न हो सकें और वे डॉ. आंबेडकर-गांधी विवाद से भी अनभिज्ञ ही रहें.
हालाँकि डॉ. आंबेडकर के अनुयायी, कांग्रेस के इस प्रचार को बहुत खूबसूरती के साथ उनकी हर मूर्ति, जिसमें उनके हाथ में सविधान है, बनाकर प्रदर्शित करने में कामयाब रहे हैं. डॉ. आंबेडकर के अन्य संघर्ष को याद दिलाते हुए उन्होंने इस मिथक  का देश पर अपने अधिकार के लिए भरपूर इस्तेमाल किया. कुछ हद तक यह प्रतीक सवर्णों की मेरिट को भी चुनौती देने में वैसे ऐसा नहीं कि गैर-दलितो ने डॉ. आंबेडकर के संविधान निर्माता के रूप में प्रदर्शित किये जाने का विरोध नहीं किया बल्कि इस सन्दर्भ में प्रो. योगेन्द्र यादव और प्रो. सुहास पल्शिकर के द्वारा तैयार टेक्स्ट और कार्टून पर दलितों की संवेदनशीलता इस आलेख  मैं इस मुद्दे के बहुत से भागों पर अपने विचार रखना चाहता हूँ- जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दलित नेताओं का रुख, दलित कट्टरवाद का उदय, कार्टून पर वोट बैंक पोलिटिक्स, दलितो का डॉ. आंबेडकर को उनके पैगम्बर मानने के चलते उन्हें आलोचनाओ से ऊपर रखना, एन.सी.ई.आर.टी  सलाहकार समिति से कुछ लोगों का इस्तीफा आदि.
इस बीच मै पाठकों से उन्नामती स्याम सुन्दर के कार्टून पर नज़र डालने का अनुरोध करता हूँ. मै समझता हूँ कि उनकी कार्टून कला और राजनीतिक मुद्दों पर कटाक्ष उन्हें सही रूप में शंकर पिल्लई का उत्तराधिकारी बनाता है. मै समझता हूँ कि यदि इस कार्टून को भी ने इस बात के खिलाफ खासे लेख भी लिखे. पाठ्यपुस्तक का अंग बनाया जाए तो यह समकालीन भारत की वास्तविकता का सही प्रदर्शन होगा. जय भीम!



(इस आलेख का संक्षिप्त/सम्पादित रूप जनसता, 1 जून 2012 में 'कार्टून विवाद और दलित' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है; मूल अंग्रेजी आलेख यहाँ है)

Wednesday, May 16, 2012

कार्टून विवादः एक मानवीय अवलोकन : लाल्टू


भारतीय समाज दलित और गैर-दलित दो तबकों में बँटा है। एक इंसान को औरों से अलग कर देखना मानव मूल्यों की दृष्टि से ग़लत है। पर सामाजिक गतिकी के स्रोत न्याय अन्याय के वांछित-अवांछित कारण हैं। इस आलेख में मुख्यतः गैर-दलितों से संवाद करने की कोशिश है। एक प्रताड़ित तबके के बारे में संवेदना की बात करना अहंकार हो सकता है। इसलिए एक सीमित परिप्रेक्ष्य में ही इस आलेख को पढ़ा जाना चाहिए। यहाँ जिन विद्वानों से असहमति प्रकट की गईं हैउनके प्रति हमारे मन में सम्मान है। वे जागरुक और सचेत हैंसमाज के लिए पथ-प्रदर्शक हैंऐसा हम मानते हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा जारी ग्यारहवीं कक्षा की इतिहास की पाठ्य-पुस्तक में संविधान पर चर्चा के साथ छपे नेहरू-अंबेदकर कार्टून पर जो विवाद छिड़ा हैउससे बुद्धिजीवियों में ध्रुवीकरण बढ़ा है। इसके पहले प्रेमचंदगाँधी बनाम अंबेदकरअंग्रेज़ी शासन के दौरान दलितों की स्थिति में बदलाव जैसे कई विषयों पर ऐसा ही विवाद काफी तीखे तेवरों के साथ हुआ है।

दलित चिंतकों ने इन बहसों में जो रुख अपनाया हैवह सही या ग़लत हैयह तो इतिहास तय करेगापर उनमें एक तरह की लामबंदी दिखती है। पर निरपेक्ष दृष्टि से देखा जाए तो गैर-दलित भी लामबंद दिखते हैं साधारण संवेदनाहीन लोगों में दलित विरोधी मान्यताओं का होना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करतापर उदारवादी चिंतक जो आम तौर पर दलितों के साथ उनके संघर्षों में कंधा मिलाकर चलते हैंवे भी इन मुद्दों पर एकतरफा और दलित चिंतकों से भिन्न राय ही रखते हैं और अक्सर अपनी असहमति पुरजोर आवाज़ में सामने रखते हैं।

कार्टून वाला मौजूदा मामलाप्रेमचंद पर हुई बहस से अलग है। सामाजिक विसंगतियों और दलितों के निपीड़न पर संवेदना जगाने में जिन साहित्यकारों की सबसे अहम भूमिका रहीउनमें प्रेमचंद अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं में से चुनी हुई पंक्तियों को प्रसंग से बाहर रख कर नहीं पढ़ा जाना चाहिए। कार्टून प्रसंग ऐसा नहीं है। नए नए आज़ाद हुए मुल्क का संविधान लिखे जाने में हो रही देर पर बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया के प्रतीक के रूप में शंकर का 1949 में बनाया कार्टून 2006 में पाठ्य-पुस्तक में डाला गया। पहले महाराष्ट्र और फिर राष्ट्रीय स्तर पर दलित चिंतकों ने आपत्ति जताई कि इस कार्टून में अंबेदकर का अपमान किया गया है। संसद में शोरगुल के बाद सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए इस कार्टून को हटाने का निर्णय लिया। दलित नेतृत्व की इस माँग को भी सरकार ने मान लिया कि जिस समिति के तत्वावधान में यह पुस्तक तैयार की गई थीउसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इसे अकादमिक समुदाय ने अपनी स्वायत्तता पर हस्तक्षेप मानते हुए हर तरह से विक्षोभ प्रकट किया है। जिस समिति के तत्वावधान में यह पुस्तक तैयार की गई थीइसके दो सदस्योंयोगेंद्र यादव और सुहास पालसिकर ने समिति से इस्तीफा दे दिया है। पालसिकर ने इस बारे में संवाद और सहयोग की कोशिश की हैपर उनके साथ कुछ दलित युवकों ने हिंसात्मक व्यवहार किया है। योगेंद्र यादव ने संसद में हुई बहस का खुला विरोध करते हुए बयान दिए हैं। पत्र-पत्रिकाओं मेंअंतर्जाल में गैर-दलित टिप्पणीकारों ने सरकार और दलित नेताओं की कट्टर आलोचना की है।

यहाँ कई मुद्दे हैं। क्या सरकार को अकादमिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिएक्या गैर-दलितों का एक कार्टून पर दलितों की असहमति पर इतना शोर मचाना ठीक हैक्या दलित समाज में अंबेदकर को एक मसीहे की तरह माननाजिसपर कोई उँगली न उठा सकेयह ठीक है?

भारतीय राजनीति में मुख्यधारा की पार्टियों के नेतृत्व से जनता का विश्वास उठ चुका है। यहाँ हम मानकर चलेंगे कि सांसदों के हल्ले-गुल्ले को गंभीरता से लेने का कोई तुक नहीं है। कार्टून से संबंधित जो बड़े मुद्दे हैंउनको और समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण को समझने की कोशिश हम करें। कार्टून में शंकर का जो उद्देश्य था और पाठ्य-पुस्तक समिति के सदस्यों ने उसे जैसे देखाउससे अलग हटकर इसे देखने की कोशिश करें।

कार्टून में अंग्रेज़ी भाषा में प्रचलित मुहावरे 'स्नेल्स पेस (घोंघे की गति)' से चल रहे संविधान लेखन के काम पर कटाक्ष है। जनता अपेक्षारत है,संविधान लेखन समिति के अध्यक्ष अंबेदकर घोंघे पर सवार हैं और पीछे से नेहरू चाबुक चलाते हुए घोंघे को आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं। कल्पना कीजिए कि एक आम स्कूल में यह पाठ पढ़ाया जा रहा है। कक्षा में सवर्ण और दलित दोनों पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। अंबेदकर का घोंघे पर सवार होना किसी सवर्ण बच्चे को हास्यास्पद लग सकता है। वह इस कार्टून का इस्तेमाल किसी दलित बच्चे को तंग करने के लिए कर सकता है। अंबेदकर के ठीक पीछे नेहरू का चाबुक लिए खड़े होना कार्टून को और भी जटिल बना देता है। सही है कि काल्पनिक स्थितियों से घबराकर हमें निर्णय नहीं लेने चाहिए। पर किशोरों के लिए पाठ्य-पुस्तक तैयार करते हुए सचमुच इन सवालों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?सुविधासंपन्न लोग अपने बच्चों की पाठन सामग्री के बारे में आमतौर पर सचेत रहते हैं। ज़रा भी शक हो तो हम सवाल उठाते हैं। यहाँ कोई चूक तो नहीं हो गई है? 1949 में शंकर के सामने ये सवाल न थेपर 2006 में समिति सदस्यों कोखास तौर को उनको जो दलितों की समस्याओं के बारे में हम सबको आगाह करते रहे हैंयह खयाल नहीं आया कि इस कार्टून में समस्या हैयह हमें सोचने को मजबूर करता है। योगेंद्र और सुहास विद्वान हैंवे प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता भी हैं। यह कार्टून पुस्तक में शामिल कैसे हुआ?

मान लें कि कार्टून को इस तरह से देखना ग़लत हैपर अगर किसी ने इसे ऐसे देखा और आपत्ति जताई तो इसे हटाने से कितना नुकसान होता हैयह कोई आस्था पर आधारित आपत्ति नहींसंभव है ऐसा होता तो हम इसे सहानुभूति के साथ देखतेयह तो हजारों वर्षों से चल रही हिंसा और बहिष्कार के अनुभव पर आधारित प्रतिक्रिया है। गैर-दलित इस बात को नहीं समझ पाते तो गड़बड़ दलितों में नहींहम ही में है। अक्सर दलितों की प्रतिक्रिया सही नहीं होती हैपर क्या यह आश्चर्य की बात है कि दलित बौखलाहट भरी प्रतिक्रियाएं भी देते हैं। निरंतर बहिष्कार की पीड़ा हमारी मानवता को हमसे छीन लेती है।

एक कार्टून वहीं तक सीमित होता हैजो दृश्य वह प्रस्तुत करता है। वह प्रेमचंद की कहानी नहीं होताजिसे पूरी पढ़कर ही हम सामान्य निष्कर्षों तक पहुँच सकते हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि दलित बुद्धिजीवी आलोचना झेल नहीं सकते। उन्हें लगता है कि अंबेदकर को खुदा बनाने की कोशिश चल रही है। वे कहते हैं कि आखिर कार्टून तो गाँधी नेहरू पर भी बनते रहे हैं। प्रताड़ित जन की प्रतिक्रिया कैसी होती हैविश्व इतिहास में इसके बेशुमार उदाहरण हैँ। साठ के दशक मेंजब अमेरिका में काले लोगों को बराबरी का नागरिक अधिकार देने का आंदोलन शिखर पर थाजिसमें कई गोरे लोग भी शामिल थेप्रसिद्ध अफ्रो-अमेरिकी कवि इमामु अमीरी बराका (मूल ईसाई नामः लीरॉय जोन्सने लिखाः- 'ब्लैक डाडा निहिलिसमुस। रेप द ह्वाइट गर्ल्स। रेप देयर फादर्स। कट द मदर्स थ्रोट्स।कोई भी इस हिंसक अभिव्यक्ति को सभ्य नहीं कहेगा। आर्थिक वर्ग आधारित निपीड़न भी हिंसक प्रतिक्रिया पैदा करता है। हाल तक कोलकाता शहर में दीवारों पर सुकांतो भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं - 'आदिम हिंस्र मानव से यदि मेरा कोई नाता हैस्वजन खोए श्मशानों में तुम्हारी चिता मैं जला कर रहूँगा।बराका की कविता आज भी यू ट्यूब पर संगीत के साथ सुनी जा सकती है। गोरों ने इसका विरोध किया या नहींइसका कोई दस्तावेज नहीं हैपर अफ्रो-अमेरिकी स्त्रियों ने प्रतिवाद कियायह इतिहास है। गोरों से आया विरोध निरर्थक हैपर अफ्रो-अमेरिकी समुदाय के अंदर से आया विरोध सार्थक हो गया। क्या भारतीय समाज में गैर दलितों को भी ऐसे ही धीरज रखना नहीं चाहिए?

दलित चिंतकों में यह समझ क्या हमसे कम है कि अंबेदकर को खुदा नहीं बनाना हैऐसी कोई वजह तो है नहीं कि वे हमसे कम समझदार हों। यह तो उन्हें भी पता है कि गाँधी नेहरू पर भी कार्टून बनते रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम निजी अनुभवों से आहत होकर यह मानने लगे हों कि दलित चिंतक सही निर्णय ले ही नहीं सकतेउनके लिए सही निर्णय सिर्फ हम ही ले सकते हैंनिश्चित ही ऐसी संकीर्ण सोच के शिकार योगेंद्र या सुहास नहीं हैं। तो फिर हमें इन प्रक्रियाओं के मनोविज्ञान को सहानुभूति और संवेदना के साथ समझने की ज़रूरत है। गाँधी नेहरू को खुदा मानने वाले लोग भी हमारे समाज में हैंपर अंबेदकर उन लोगों का खुदा है जिनके लिए और किसी मान्य खुदा के पास जाना हजारों वर्षों तक वर्जित था। 1949 में ही अफ्रो-अमेरिकी कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ ने लिखा - 'ह्वाट हैपेन्स टू अ ड्रीम डिफर्डदरकिनार किए गए सपने का क्या हश्र होता है? / क्या वह किसमिस के दाने की तरह धूप में सूख जाता है? / या वह घाव बन पकता रहता है? / क्या उसमें सड़े माँस जैसी बदबू आ जाती है?/ या वह मीठा कुरकुरा बन जाता है....? शायद उसमें गीलापन आ जाता है और वह भारी होता जाता है या फिर वह विस्फोट बन फूटता है?'

इतना तो कहा ही जा सकता है कि निपीड़ितों का मनोविज्ञान जटिल है। इस जटिलता में हमारी भागीदारी कितनी हैहम यह समझ लें तो गैर-बराबरी की इस दुनिया में हम अपनी मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। और दूसरी ओर जो विस्फोट हैंउनको झेलने की ताकत हममें होइसकी कोशिश हम कर सकते हैं। अपनी मुक्ति के बिना किसी और की मुक्ति का सपना कोई अर्थ नहीं रखता।

जहाँ तक संसद की बहस का सवाल हैवहाँ शोरगुल होता रहता है। उससे परेशान होकर योगेंद्र और सुहास समिति से निकल गए हैंयह दुखदायी है। उनके खिलाफ जो हिंसक बयान आए हैं और पुणे में हुई घटना की निंदा हर सचेत व्यक्ति कर रहा है। उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है कि वे वापस अपना काम सँभालें और गंभीरता से हमारे बच्चों को सही पाठ सिखाने का काम करते रहें।

(लाल्टू जी का यह लेख जनसत्ता में `विवाद के बीच एक संवाद` शीर्षक से छपा है।)

Wednesday, May 9, 2012

याकोब का मुर्ग़ा


(अपने समय के विख्यात चेक बाल कथा लेखक मिलोश मात्सोउरेक (1926-2002) की 'प्राणिशास्त्र' नाम की बाल कथा सीरीज़ से कुछ कहानियों का अनुवाद असद ज़ैदी ने पैंतीस साल पहले किया था जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से निकलने वाली पत्रिका 'कथ्य' में छपा था। 'कथ्य' का एक ही अंक निकल सका। इसी लेखक की कुछ और बाल कहानियों के ताज़ा अनुवाद 'जलसा' के आगामी संकलन - 'जलसा - - में आने जा रहे हैं। 'जलसा' के मुफ़्त इश्तिहार व अग्रिम झाँकी के बतौर एक कहानी यहाँ दी जा रही है।)

याकोब का मुर्ग़ा
मिलोश मात्सोउरेक की एक बाल कथा

मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही होता है, वह कैसा दिखता है तुम सब जानते हो, जानते हो न, तो फिर मुर्ग़े का चित्र बनाओ, अध्यापिका ने बच्चों से कहा, अौर सब बच्चे अपनी पेंसिल अौर क्रेयॉनों को चूसते हुए मुर्ग़े का चित्र बनाने में जुट गए, काले क्रेयॉन अौर भूरे क्रेयॉन से उनमें काला अौर भूरा रंग भरने लगे, लेकिन तुम तो जानते ही हो याकोब को, देखो ज़रा उसे, क्रेयॉन के बॉक्स में जितने रंगों के क्रेयॉन अाते हैं सब उसने इस्तेमाल कर लिए, फिर लॉरा से भी उधार लेकर कुछ अौर रंग भर डाले, इस प्रकार याकोब का जो मुर्ग़ा बना उसका सर नारंगी था, डैने नीले, जाँघें लाल, देखकर टीचर बोली अरे ये कैसा अजीबो-ग़रीब मुर्ग़ा है ज़रा देखो तो बच्चो, कक्षा के सारे बच्चे हँसी से लोटपोट हैं अौर टीचर कहे जा रही है कि यह सब लापरवाही का नतीजा है, कक्षा में याकोब का ध्यान कहीं अौर होता है, अौर सच तो यह है कि याकोब का मुर्ग़ा मुर्ग़ा नहीं पीरू या मुर्ग़ाबी की तरह नज़र अाता है, नहीं, बल्कि मोर की तरह, अाकार में बटेर के बराबर अौर अबाबील की तरह दुबला, मुर्ग़ा है कि अजूबा, याकोब को उसके प्रयास के लिए एफ़ मिलता है अौर उसके बनाए मुर्ग़े को दीवार पर टाँगने के बजाए टीचर की अल्मारी के ऊपर दूसरी रद्दी अौर बेमेल चीज़ों के बीच पटक दिया जाता है, बेचारे मुर्ग़े की भावनाअों को इससे बड़ी ठेस पहुँचती है, टीचर की अल्मारी के ऊपर धूल फाँकने के ख़याल से ही उसे घबराहट होती है, भला यह भी कोई ज़िन्दगी है, वह हिम्मत करके पर तौलता है अौर ज़ोर लगाकर खुली खिड़की के रास्ते उड़ जाता है।

लेकिन मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही हुअा न, वह ज़्यादा दूर तक उड़ नहीं सकता, लिहाज़ा उसकी उड़ान स्कूल के बग़ल में बने घर के बाग़ीचे में ख़त्म होती है, क्या ही शानदार ये बाग़ीचा है, चारों तरफ़ सफ़ेद चेरी के पेड़, नीले अंगूर की बेलें, बाग़बान की मेहनत अौर प्यार की गवाही देती जगह, अौर बाग़बान भी कोई ऐसे वैसे नहीं, प्रोफ़ेसर कापोन, जाने माने पक्षी-विज्ञानी जो पक्षियों पर सात ग्रंथों की रचना कर चुके हैं अौर अब अाठवीं किताब को पूरा करने में लगे हैं, वह उसका आख़िरी पैरा लिखना शुरू करते हैं कि अचानक उन्हें थकान घेर लेती है, अौर वह उठकर थोड़ी सी बाग़बानी अौर चहलक़दमी के लिए बाग़ीचे में अा जाते हैं, इससे उन्हें आराम मिलता है अौर चिड़ियों के बारे में सोचने का वक़्त भी, दुनिया में इतनी चििड़याँ हैं, बेशुमार, प्रोफ़ेसर कापोन अपने अाप से कहते हैं, लेकिन आह बदक़िस्मती कि एक भी चििड़या को खोजने का श्रेय मुझे नहीं जाता, वह उदास हो जाते हैं, फिर बेखुदी के अालम में सपना देखने लगते हैं कि अब तक अज्ञात रही एक चिड़िया को उन्होंने खोज निकाला है, तभी उनकी नज़र उस मुर्ग़े पर पड़ती है जो उनके दुलारे नीले अंगूरों को चुगे जा रहा है, उन दुर्लभ अंगूरों को, बताइये क्या ये अंगूर इसलिए लगाए गए थे कि मुर्ग़े-मुिर्ग़यों का दाना बनें, देखकर किसका ख़ून नहीं खौल उठेगा, प्रोफ़ेसर को ग़ुस्सा आ जाता है, ग़ुस्से में वह आपे से बाहर हो जाते हैं, उनकी इच्छा होती है कि पकड़कर मुर्ग़े की गरदन मरोड़ दें, पर अंत में वह उसे पकड़कर अहाते से बाहर फेंक देते हैं, मु्र्ग़ा घबराता हुआ उड़ जाता है, पर अरे यह क्या, प्रोफ़ेसर उसके पीछे पीछे भागने लगे हैं, अपने अहाते की दीवार फाँद जाते हैं, जैसे तैसे करके उसे फिर पकड़ने में सफल हो जाते हैं अौर प्यार से घर ले अाते हैं, काफ़ी अजीब सा यह मुर्ग़ा है, शर्त बद सकता हूँ आज तक किसी ने ऐसा मुर्ग़ा नहीं देखा होगा, नारंगी सर, नीले पंख अौर सुर्ख़ जाँघें, प्रोफ़ेसर यह सब काग़ज़ पर दर्ज कर रहे हैं, दिखने में कुछ पीरू या मुर्ग़ाबी जैसा, पर कुछ गौरैया की अौर कुछ मोर की याद दिलाता, बटेर की तरह गोल मटोल अौर अबाबील की तरह दुबला, अौर इस तरह अपनी अाठवीं किताब के लिए ये तफ़सील दर्ज करके प्रोफ़ेसर रोमांच से थरथराते हुए मुर्ग़े का नामकरण अपने नाम पर कर देते हैं अौर मुर्ग़े को ले जाकर काँपते हाथों से चििड़याघर में सौंप आते हैं।

मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही होता है, अाप सोचते हैं किसे दिलचस्पी होगी एक मुर्ग़े से, पर इस मुर्ग़े ने तो पूरे चिड़ियाघर में तहलका मचा दिया है, ऐसी दुर्लभ चीज़ बीस-पच्चीस साल में एकाध बार प्रकट हो तो हो, चिड़ियाघर का डाइरेक्टर उत्तेजना में हाथ मल रहा है, कर्मचारी पिंजरा बनाने में लगे हैं, पेन्टर मसरूफ़ है अौर डाइरेक्टर कह रहा है पिंजरा शानदार होना चाहिए अौर बिस्तर ज़रा नर्म, अौर लीजिए यह नामपट्ट भी बनकर आ गया, कापोनी मुर्ग़ा -- गलीना कापोनी -- अच्छा नाम है न, कानों को भला लगने वाला, क्या ख़याल है अापका ... उधर मुर्ग़े की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं, ऐसा स्वागत ऐसा सत्कार देखकर उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं, उसे अब इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं, वह चिड़ियाघर का मुख्य आकर्षण है, सबकी आँखों का तारा, चिड़ियाघर में कभी इतने दर्शक नहीं आये, कैशियर कह रहा है, जनता उमड़ पड़ी है, टिकट खिड़की पर लाइन लम्बी होती चली जा रही है, अौर लीजिए हमारी वही अध्यापिका पूरी कक्षा के साथ पिंजरे के सामने हाज़िर है बच्चों को बताती हुई कि अभी अभी तुमने प्रेवाल्क्स्की अश्व को देखा था, अौर अब तुम्हारे सामने है एक अौर दुर्लभ जीव, गलीना कापोनी यानी कापोनी मुर्ग़ा जो देखने में कुछ पीरू या मुर्ग़ाबी जैसा लगता है, पर कुछ गौरैया अौर कुछ मोर से मिलता जुलता है, देखो यह कैसे बटेर की तरह गोल मटोल भी है अौर अबाबील की तरह दुबला भी, ज़रा देखो तो कैसा हसीन नारंगी सर है इसका, नीले पंख, लाल-सुर्ख़ जंघाएँ, बच्चे विस्मित हैं, ज़ोर से साँस छोड़ते हुए कहते हैं अाह कितना सुन्दर मुर्ग़ा है, है न टीचर, पर लॉरा को जैसे करंट लग गया हो, वह टीचर की आस्तीन खींचती है अौर कहती है, ये तो याकोब का मुर्ग़ा है, सच में टीचर ये वही मुर्ग़ा है, टीचर झल्लाती है ये बेवक़ूफ़ लड़की क्या बकबक कर रही है याकोब का मुर्ग़ा याकोब का ... अरे याद आया देखना ये याकोब कहाँ गया, उसका ध्यान फिर कहीं अौर है, देखो कहाँ पहुँच गया एंटईटर के पिंजरे के सामने, कापोनी मुर्ग़े को देखने के बजाय चींटीख़ोर पशु को देखता हुआ, याकोब, अपने फेफड़ों की पूरी ताक़त के साथ ऊँचे सुर में टीचर चीख़ती है, अगली बार से मैं तुम्हें घर वापस भेज दूँगी, तुम्हारा बरताव अब बरदाश्त के बाहर हो चुका है याकोब, सही बात है टीचर की, यह सब देखकर किसी भी ख़ून खौल सकता है। 
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मात्सोउरेक की एक अंग्रेज़ प्रशंसिका ने, जो निश्चय ही अध्यापिका रही होगी, इस कहानी के अपने अनुवाद के साथ बच्चों के लिए निम्नलिखित प्रश्नावली भी अपनी तरफ़ से जोड़ दी थी।


प्रश्न
. याकोब के मुर्ग़े के जीवन को कम से कम चार चरणों में बाँटते हुए वर्णित कीजिए।
. अपने बाग़ीचे में बेमेल पक्षी को देखकर पक्षी-विज्ञानी ने क्या किया अौर क्यों?
. अगर आपके मुर्ग़े को चिड़ियाघर में रख दिया जाए तो आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी?
. अध्यापिका ने मुर्ग़े को देखकर दो भिन्न अवसरों पर -- () क्लासरूम में () चिड़ियाघर में -- जो भाव व्यक्त किए, उनका तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
. चिड़ियाघर में अपने मुर्ग़े को देखकर याकोब की अंतिम प्रतिक्रिया क्या थी?
. इस प्रसंग के आधार पर याकोब के भविष्य के बारे में अनुमान लगाइए।


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