Sunday, August 2, 2009

यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है

आशुतोष कुमार


अशोक वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार', 19 जुलाई, 2009, जनसत्ता) कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है.

यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ.

बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर सम र्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सह योगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस -अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.

क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है?

अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था :'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है. आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.'

विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन.

क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि  'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम' जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?

'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों' (एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं ! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे.

'सलवा-जुडूम' क्या है? countercurrents.org पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.

'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था. इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा -हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों' (एसपीओज़ ) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं.

स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है – महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W.) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है.

'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.

छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं. वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीसी, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त ... अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं.

राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है.

नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' ( एसपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है.
 
सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है. अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार' लिख गये. नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि  'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े.

इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़' में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर ". घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर!

अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा!
  
यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो..

गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग "?


(जनसत्ता, दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार )

9 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

क्षमा करें छत्‍तीसगढ के डीजीपी विश्‍वरंजन जी, 'सलवा जुडूम' के समर्थक है, एक कवि भी हैं. किन्‍तु 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका है इसका हम समर्थन नहीं करते. 'सलवा जुडूम' राज्‍य सरकार का कार्य और दायित्‍व दोनों है.

Anonymous said...

Ashutosh Kumar ne apna bandobast kar liya hai is baar ka Devi Shankar Avasthi Samman unko mile yah tay kar liya hai. Ashok Vajpeyi kee nigah mein aa gaye hain. Yeh hai aslee salva judum, chhupa hua agenda.

Kapil said...

बहुत दिनों बाद कोई धारदार लेख पढ़ने को मिला। कल जनसत्ता में पढ़कर हम इसपर बातचीत ही कर रहे थे। बहुत अच्‍छे ढंग से छत्तीसगढ़ में चल रहे सलवा जुडूम और उसके इर्दगिर्द की चीजों को एकदम साफ ढंग से पेश कर दिया है। आशुतोष को इतने अच्‍छे लेख के लिए बधाई जरूर देना चाहूंगा।

Sunil said...

तिवारी जी और एनोनीमस जी, आशुतोष कुमार के इस लेख पर आपकी जो प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, वह लेख में उठाए गए मुद्दों से भागने की तरकीबें हैं. दुराग्रहों को दोहराने और बेतुके लांछन लगाने से कोई स्वस्थ बहस नहीं बनती. आप इस चक्कर में खुद अपने ठस-पन और पिछड़ेपन को उद्घाटित कर रहे हैं. सलवा जुडूम जैसे जन-विरोधी फ़ासिस्ट अभियान और राजकीय आतंकवाद के प्रवक्ताओं के प्रति आपका प्रेम देखते ही बनता है. अपने को हत्यारों के हाथों नाचती कठपुतली बनाने से बचाइये.

सुनील कुमार राय

Ashutosh Kumar said...

शुक्रिया संजीव जी, आप ने ताईद की ki सलवा जुडूम राज्य सरकार का कार्य और दायित्व है. सरकारी लोग तो उसे स्वतः स्फूर्त जन आन्दोलन बताते फिरते हैं. एनोनीमस जी , आप ध्यान दें ki मैं विश्वरंजन जी की नज़रों में भी आ गया हूँ.अगला प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान भी शायद mujhe मिल जाए. आप की सद्भावना के लिए धन्यवाद्.
कपिलजी और सुनील जी, आप की और बहुत सारे दोस्तों की प्रतिक्रियाओं से लगता है ki हमारी पीढी अब अपनी जंग के लिए सचमुच taiyar हो रही है.आप सब का शुक्रिया. और धीरेश जी का भी. अपनी जमीन पर मुझे जगह देने के लिए.

पंकज चतुर्वेदी said...

आशुतोष कुमार का यह लेख सत्ता-प्रतिष्ठान-----भारतीय सत्ता-प्रतिष्ठान से हिंदी सत्ता-प्रतिष्ठान तक-----के मस्तक पर चोट करते हुए एक भारी हथौड़े की मानिंद है . छत्तीसगढ़ मुद्दे से लेकर उदय प्रकाश-योगी आदित्यनाथ मुद्दे तक पर तमाम ब्लोग्स और अन्य माध्यमों पर जितनी भी बहसें अब तक हुई हैं और विभिन्न लेखकों द्वारा जितने भी लेख लिखे गये हैं ; आशुतोष का यह लेख उन सबका मानो सबसे अर्थ-सघन ,
'इंटेंस ' और सारभूत कथन है . इसी मानी में यह लेख इन बहसों का उत्कृष्टतम मक़ाम है . कलात्मक दृष्टि से भी आप देखिये , तो कम-से-कम शब्दों के ज़रिए ज़्यादा-से-ज़्यादा अर्थों को ध्वनित करने के कारण यह अपने वक़्त के अनिवार्यतम मुद्दों से संबोधित किसी श्रेष्ठ कविता से कम नहीं है . ऐसे लेख पढ़ पाना कभी-कभी ही और बड़े नसीब से मुमकिन होता है . यही वजह है कि आशुतोष कुमार के इस सशक्त , दुर्लभ और
अमूल्य रचनात्मक तथा वैचारिक हस्तक्षेप की गूँज आज पूरे देश-----ख़ास तौर पर छत्तीसगढ़ -----के प्रबुद्ध हिंदी हल्क़े में सुनी जा रही है .
-----पंकज चतुर्वेदी
कानपुर

संदीप said...

वाकई में जनसत्ता में लेख को पढ़ कर लगा है कि कई दिनों बाद किसी ने व्‍यक्तिगत आरोप-प्रत्‍यारोप से ऊपर उठकर, पूरे तर्कों के साथ जनविरोधी-राज्‍य समर्थित राजनीति पर हमला किया है। आशुतोष इसके लिए तारीफ के क़ाबिल हैं।
बाकी जहां तक तिवारी जी और अनामियों का सवाल है, इनकी टिप्‍पणियों से इनकी मानसिकता का स्‍वयं ही खुलासा हो जाता है।

ali said...

विचारपरक आलेख ! आभार !

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यार ऐसा लेख जनसत्ता ने छापा कैसे?
तरुन विजय से सेटिंग गडबडा गई का?