Sunday, March 7, 2010

औरतों की कविताएँ : शुभा

1.औरतें
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औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं

औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं

औरतों की इच्छाएं
बहुत दिनों में फलती हैं
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2.
औरत के हाथ में न्याय
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औरत कम से कम पशु की तरह
अपने बच्चे को प्यार करती है
उसकी रक्षा करती है

अगर आदमी छोड़ दे
बच्चा मां के पास रहता है
अगर मां छोड़ दे
बच्चा अकेला रहता है

औरत अपने बच्चे के लिए
बहुत कुछ चाहती है
और चतुर ग़ुलाम की तरह
मालिकों से उसे बचाती है
वह तिरिया चरित्तर रचती है

जब कोई उम्मीद नहीं रहती
औरत तिरिया चरित्तर छोड़कर
बच्चे की रक्षा करती है

वह चालाकी छोड़
न्याय की तलवार उठाती है

औरत के हाथ में न्याय
उसके बच्चे के लिए ज़रूरी
तमाम चीजों की गारंटी है।
***


3.
औरत के बिना जीवन
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औरत दुनिया से डरती है
और दुनियादार की तरह जीवन बिताती है
वह घर में और बाहर
मालिक की चाकरी करती है

वह रोती है
उलाहने देती है
कोसती है
पिटती है
और मर जाती है

बच्चे आवारा हो जाते हैं
बूढ़े असहाय
और मर्द अनाथ हो जाते हैं
वे अपने घर में चोर की तरह रहते हैं
और दुखपूर्वक अपनी थाली खुद मांजते हैं
***


4.
औरतें काम करती हैं
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चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की
दुनिया के बाहर
मालिकों की दुनिया के बाहर
पिताओं की दुनिया के बाहर
औरतें बहुत से काम करती हैं

वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती हैं
आटे को रोटी में
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े में बदल देती हैं।

वे खंडहरों को
घरों में बदल देती हैं
और घरों को कुंए में
वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं
और तमाम चीज़ें संवार देती हैं

वे बोलती हैं
और कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैं
कथाएं लोकगीत रचती हैं

बाहर की दुनिया के आदमी को देखते ही
औरतें ख़ामोश हो जाती हैं।
***

5.
निडर औरतें
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हम औरतें चिताओं को आग नहीं देतीं
क़ब्रों पर मिट्टी नहीं देतीं
हम औरतें मरे हुओं को भी
बहुत समय जीवित देखती हैं

सच तो ये है हम मौत को
लगभग झूठ मानती हैं
और बिछुड़ने का दुख हम
खूब समझते हैं
और बिछुड़े हुओं को हम
खूब याद रखती हैं
वे लगभग सशरीर हमारी
दुनियाओं में चलते-फिरते हैं

हम जन्म देती हैं और इसको
कोई इतना बड़ा काम नहीं मानतीं
कि हमारी पूजा की जाए

ज़ाहिर है जीवन को लेकर हम
काफी व्यस्त रहती हैं
और हमारा रोना-गाना
बस चलता ही रहता है

हम न तो मोक्ष की इच्छा कर पाती हैं
न बैरागी हो पाती हैं
हम नरक का द्वार कही जाती हैं

सारे ऋषि-मुनि, पंडित-ज्ञानी
साधु और संत नरक से डरते हैं

और हम नरक में जन्म देती हैं
इस तरह यह जीवन चलता है
***


6.
बाहर की दुनिया में औरतें
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औरत बाहर की दुनिया में प्रवेश करती है
वह खोलती है
कथाओं में छिपी अंतर्कथाएं
और न्याय को अपने पक्ष में कर लेती हैं
वह निर्णायक युद्द को
किनारे की ओर धकेलती है
और बीच के पड़ावों को
नष्ट कर देती है

दलितों के बीच
अंधकार से निकलती है औरत
रोशनी के चक्र में धुरी की तरह

वह दुश्मन को गिराती है
और सदियों की सहनशक्ति
प्रमाणित करती है
***

20 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सारी कविताएँ सुंदर और यथार्थ की जमीन पर हैं। समाज में औरत के साथ हो रहे अन्याय और उन की क्षमताओं को उद्घाटित करती हैं।

सुभाष नीरव said...

स्त्री विमर्श के दौर में एक स्त्री द्वारा स्त्रियों पर लिखी गई ये कविताएं नि:संदेह हमें कुछ सोचने को विवश करती हैं। बहुत अच्छी कविताएं लगीं। कवि/कवयित्री का संक्षिप्त परिचय भी दिया करें।

रवि कुमार, रावतभाटा said...

कई आयामों को एक साथ उदघाटित करती कविताएं...बेहतर द्वंद...
सहज और दिल को छूता हुआ...

आभार !!...

शरद कोकास said...

अच्छी कवितायें हैं

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी कवितायें… अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शुभकामनाओं सहित!

ali said...

अच्छी कवितायें ! सुभाष नीरव की बात ठीक है यदि हो सके तो कवि / कवियित्री का परिचय भी दिया जाये !

रंगनाथ सिंह said...

शानदार कविताएं।

Udan Tashtari said...

सभी कविताएँ अच्छी लगी..

pratibha said...

वाह! बहुत सुन्दर सार्थक कवितायें...

varsha said...

हम औरतें चिताओं को आग नहीं देतीं
क़ब्रों पर मिट्टी नहीं देतीं
हम औरतें मरे हुओं को भी
बहुत समय जीवित देखती हैं

sabhi kavitaen bahut samay tak yaad rakhe jane layak hain.

sushil said...

shubha ki ye kavitayen aj ke din ek bar phir se padh kar achha laga

प्रीतीश बारहठ said...

"औरत के हाथ में न्याय
उसके बच्चे के लिए ज़रूरी
तमाम चीजों की गारंटी है।"
***

attyant utkrisht

स्वप्नदर्शी said...

सुन्दर कवितायें...

Fauziya Reyaz said...

bahut hi khoobsurat rachna....

manav said...

bhut achi kwitaye hai inhe pdh kr bdha mja aya. Thanks you

पारूल said...

आभार!

प्रदीप कांत said...

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं


यहाँ तो दो पँक्तियों में ही पूरी कविता हो गई।

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

आपकी दो पोस्ट आज चर्चामंच पर हैं...
इसके अलावा लाल्टू की कविताएँ .. आप चर्चामंच में आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित करेंगे ... धन्यवाद

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

Zakir Ali 'Rajnish' said...

लाजवाब करने वाली रचनाएं।

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ध्‍यान का विज्ञान।
मधुबाला के सौन्‍दर्य को निरखने का अवसर।

कुश्वंश said...

सुन्दर अभिव्यक्ति .. औरतो को औरते कहने पर एतराज तो सभी को होगा ,मगर उस अहसास को महसूस करने की, उद्देलित करने हिम्मत आपने दिखाई.. साधुवाद