Showing posts with label शुभा. Show all posts
Showing posts with label शुभा. Show all posts

Saturday, September 6, 2014

शुभा की चार कविताएं


वरिष्ठ कवयित्री, लेखिका और एक्टिविस्ट शुभा का आज जन्मदिन है। इस मौके पर हम अपनी 60 साल की इस युवा साथी की चार कविताएं प्रकाशित कर रहे हैं।
1
एक लम्बी दूरी
एक अधूरा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता
फिर भी दिखती है मंज़िल

दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर
***

2
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा नहीं
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है।
***

3
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह भी नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं।
***

4
प्यासा आदमी
पानी को याद करता है
वह उसे पीना चाहता है

फिर प्यास बढ़ती है
तो वह उसे देखना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह उसकी आवाज़ सुनना चाहता है

और प्यास बढ़ती है
तो वह अपने और पानी के बीच की दूरी देखने लगता है

और प्यास बढ़ती है तो वह
इस दूरी को एक रास्ते की तरह देखता है

और दूरी बढ़ती है
तो वह रास्ते को प्यार करने लगता है

और प्यास बढ़ती है
तो हर क्षण पानी भी उसके साथ रहने लगता है

लोग न उसके पानी को देखते हैं न उसकी प्यास को

ऐसा आदमी कभी-कभी गूंगा हो जाता है।
-----------

Monday, January 21, 2013

शमशेर : कुछ निजी नोट्स - शुभा (अंतिम किस्त)


(पिछली दो कड़ियों से जारी)

शमशेर की कविता में गहरी आत्मीयता है। इस आत्मीयता के कारण उनके यहां प्रेम के अछूते चित्र और उमंग भरी कल्पना मौजूद है। सिकंदर पर लिखी उनकी एक अद्भुत कविता है। आर्यों के आने से पहले हिंदुस्तान के हमलावरों पर एक टिपण्णी के साथ वे कविता में हिंदुस्तान के बच्चों, सिकंदर, खीर, और रसमलाई का जो खुशनुमा रास रचाते हैं, उसमें हमलावर सिकंदर एक बड़े प्यारे मेहमान की तरह सामने आता है, जिसे बच्चे बड़े करीने से एक सबक़ भी देते हैं। बच्चों के गीत में कुछ यूनानी ध्वनियों के साथ वह एक समूह गान की रचना में शामिल होता है। इस समूह गान में लय के माध्यम से एक नृत्य की रचना भी शामिल है। सिकंदर को इस रूप में शमशेर ही देख सकते थे। शमशेर की कविता में बच्चों, स्त्रियों, मित्रों और मज़दूरों की प्रगाढ़ उपस्थिति है। इस उपस्थिति में संबंधों की मौलिक परिकल्पना मौजूद है। इस परिकल्पना में मानवीय संवेदना की जगह है, अपने से भिन्न को पहचानने की जगह है और सत्ता संबंधों का ढांचा इससे एक निश्चित दूरी पर रहता है। व्यक्तियों में शमशेर की दिलचस्पी उनकी आत्मीयता की आदत के कारण ख़ास है। उनकी कविता में सिकंदर, मदर टैरेसा से लेकर मुक्तिबोध तक अनके व्यक्ति-चरित्र ठोस रूप से मौजूद हैं। शमशेर ने व्यक्तियों पर जो कविताएं लिखीं, उनमें अज्ञेय, नागार्जुन, नेमिचंद्र जैन, रज़िया सज्जाद ज़हीर, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, भुवनेश्वर आदि शमशेर के साथ एक विशेष संबंध के साथ और अपने विशेष व्यक्तित्व के साथ मौजूद हैं। इन कविताओं में एक दौर के इतिहास की गूंजें मौजूद हैं। शमशेर की शोख़ी, छेड़ख़ानी और शरारत भी इन कविताओं में मौजूद है। अज्ञेय के जन्मदिन पर वे अज्ञेय को एक कविता भेंट करते हैं :


अज्ञेय- - एय
         तुम बड़े वो हो
         (क्या कहा मैंने)
         तुम बड़े वो हो
         (बड़े ध्येय)
         आधुनिक परिवेश में तुम
         बूर्ज़्वाज़ी का करुणतम व्यंग्य
         बहुत प्यारा सा
                        काव्य दक्षिण है तुम्हारा रूपाकार
                        कथा वाम (वामा)
                        कथा जो है अकथनीय
                        गेय जो अज्ञेय (ख़ूब)


और आख़िर में ये बिंब :
                            
                                 हाथी दांत के मीनार पर
                                 चांद का घोंसला


शमशेर मोटे विचाराधारात्मक विमर्श के बजाय एक वैकल्पिक मूल्य-व्यवस्था को सामने लाते हैं, जतन से बनाते हैं, जो उनकी पक्षधरता से मेल खाती है। यह चुनाव कविता के माध्यम के लिए उपयुक्त है और शमशेर की प्रकृति के अनुरूप है। शमशेर अपने समय की गुत्थियों को सत्ता संबंधों के बीच नहीं, अपने द्वारा रचे गये अपने इसी स्पेस में ले जाकर सुलझाते हैं।


शमशेर के क़रीब जाने का तरीक़ा वही सबसे अच्छा है जिस तरीक़े से वे ख़ुद किसी को भी अपनी कविता में लाते हैं। कविता में आने से पहले हर चीज़ उनके दिल से गुज़रती है। एक रचनात्मक एकांत उनका ठिकाना है। वे पोलिमिक्स को बाहर छोड़ देते हैं लेकिन पक्षधरता को नहीं। पक्षधरता की ज़मीन पर ही उनके रचनात्मक एकांत का सुहावना, उदास और जीवट भरा ठिकाना है।

यह लेख `नया पथ- जुलाई-सितंबर-2011` अंक से साभार।
शुभा- 09896310916

Thursday, January 17, 2013

शमशेर : कुछ निजी नोट्स - शुभा (दूसरी किस्त)


(पिछली पोस्ट से जारी)
2

शमशेर अपने ढंग के मार्क्सवादी हैं। वे धर्म को बाई-पास नहीं करते। ख़ास तौर से इसलिए कि साम्प्रदायिक दंगे, विभाजन, हिंदी और उर्दू की त्रासदी उनके भावनात्मक ढांचे और संवेदना में घुल गयी थी। ये मामले उनके लिए सिर्फ़ वैचारिक मामले नहीं थे। उनके लिए उर्दू के छंद और हिंदी के छंद अलग नहीं थे। उनकी चेतना में हिंदी और उर्दू के बीच वह पार्थक्य नहीं था जो एक सामान्य बात होती जा रही है और लगभग सबने उसे ख़ामोशी से स्वीकार कर लिया है। शमशेर इसे जीवन भर स्वीकार नहीं कर सके। शमशेर को जीवन भर एक ही स्मृति आकर्षित करती है, जैसे यह शमशेर की स्मृति में बिंधा एक आद्य बिंब है :

                               जिसमें कल नहीं परसों
                               सब मिलकर हंसते थे किलकारी मारकर
                               हंसते थे
                               जब हमें दुनिया भर के बच्चे
                               अपने ही जैसे प्यारे
                               मासूम और पवित्र लगते थे


शमशेर के यहां अगला जनम, पिछला जनम, अल्लाह, ईश्वर, खुदा और भी बहुत से आध्यात्मिकता से जुड़े परिकल्पनात्मक शब्द एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़े हैं। `ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की तो` कविता में ईश्वर, प्रार्थना और आस्था आदि शब्दों का एक ठोस संदर्भ है :
                                  
                                आज वो नहीं है जो सुना
                                और कंठस्थ किया जाता है!
                                छपे काव्य / लिपि संबंधी
                                दंगे
                                संस्कृति
                                बनने लगे हैं
                                जिसका शोध मेरे लिए दुरुहतम
                                साहित्य है
                                जन्म भर की आस्था के
                                बावजूद।

इन पंक्तियों में धर्म और ज्ञान के उस दौर की भी स्मृति है जब काव्य छपता नहीं था और ऋचाएं व आयतें कंठस्थ की जाती थीं।


कहीं  बहुत दूर से सुन रहा हूं (प्रथम संस्करण, 1995, राधाकृष्ण) शमशेर की अनुपस्थिति में छपा पहला काव्य संग्रह है। इसमें संपादिका द्वारा शमशेर का एक नया प्रोजेक्शन है। कविताओं के चयन में भी यही दृष्टि सक्रिय है। भूमिका में लिखा गया है : `शमशेर जी भीतर से गहरे तक कहीं आध्यात्मिक थे। संपूर्ण रचना-रूप भी अंदर-बाहर से ऐसा ही था। आज तक मार्क्सवाद और रूपवाद की लड़ाई में उनकी असली कविता मानो हमारे हाथों से फिसल गयी।`
`असली` का अर्थ यहां जो भी लिया जाये, शमशेर समृद्ध आत्मपक्ष रखने वाले सारपूर्ण कवि हैं और वे स्मृति के बीच एक द्वंद्वपूर्ण तनाव की रचना करते हैं। वे ठोस और अमूर्त के बीच ऐसा द्वंद्वात्मक संबंध कायम करते हैं जो हमारे दौर की विडंबना, एक स्वपन को व स्वपन से दूरी को एक साथ सामने लाता है। उनके संदर्भ में, और वैसे तो अधिकांश कवियों के संदर्भ में, आध्यात्मिक होना न होना एक अप्रासंगिक बात है। मीरा की आध्यात्मिकता के बावजूद उनकी पार्थिवता उनके काव्य में मौजूद है, उनके काव्य में पार्थिव स्त्रियों की गूंज मौजूद है, वे स्त्रियां जो सामंती समाज में क़ैद रहीं, जिन्होंने आज़ादी की इच्छा की, जो अकेलेपन से घिरी रहीं लेकिन उन्हें अपना एकांत उपलब्ध नहीं हुआ। उस काव्य में विधवा स्त्री की पार्थिव इच्छाएं और उनके लिए ठोस संघर्ष मौजूद है। यह सारवस्तु इतनी पार्थिव है, सामाजिक है, ठोस है, संसारी है कि मीरा की आध्यात्मिकता ही नहीं आध्यात्मिकता मात्र को एक लौकिक परिप्रेक्ष्य में पुनः परिभाषित करने की जरूरत है। आध्यात्मिकता एक लौकिक परिघटना है। देश और काल के अंदर, एक इतिहास के अंदर, ठोस भूगर्भों में ठोस जातियों, प्रजातियों, समूहों और समाजों के बीच ही ईश्वर और आध्यात्मिकता का जन्म हुआ है। इसमें इतनी विविधता इसलिए है कि यह साधारण मनुष्यों के दुखों, खुशी, एकांत और इच्छाओं से बने हैं।


`धार्मिक दंगों की राजनीति`, मुरादाबाद दंगों के संदर्भ में लिखी गयी `रुबाइयां`, `प्रेम की पाती (घर के बसंता के नाम)`, `आओ उनकी आत्मा के लिए प्रार्थना करें`, `हैवां ही सही`, `यह क्या सुना है मैंने` और `ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की तो` जैसी कविताओं, साम्प्रदायिक घटनाओं के संदर्भ में लिखी गयी कविताओं या दूसरी अनेक कविताओं में भी जगह-जगह साम्प्रदायिक परिघटना के संदर्भ और गूंज मौजूद हैं। इसके अलावा शमशेर के यहां हर कविता में लॉस (हानि) का जो एक अनुभव समाया हुआ है उसका एक महत्वपूर्ण केंद्र यह साम्प्रदायिक विभाजन है। `ओ मेरे घर` में पृथ्वी से शिकायत करते हुए वे कहते हैं :

                                         मुझे भगवान भी दिये कई-कई
                                                  मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह!

उर्दू और हिंदी का मामला शमशेर के यहां दो भाषाओं के बीच झगड़े की तरह नहीं आता, वह एक आत्मीय संबंध और उस पर हुई चोट की तरह आता है :
                                               
                                               वो अपनों की बातें, वो अपनों की ख़ू-बू
                                               हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू!
                                                
                                               ये कोयल्-ओ-बुलबुल के मीठे तराने
                                               हमारे सिवा इसका रस कौन जाने!


अपनों की बातें, अपनों की खू़-बू, कोयल और बुलबुल के मीठे तरानों की याद के साथ उस पर हुई चोट, उसका दर्द, उसकी हानि शमशेर की कविता की बुनावट में मौजूद है। `टूटी हुई, बिखरी हुई` उर्दू की ज़मीन पर लिखी गयी कविता है जिसमें एक रूमानी अनुभव और उसकी हानि हर रेशे में मौजूद है। ज़ाहिर है, यह रोमान और हानि का एक ऐतिहासिक संदर्भ है जिसमें शमशेर का `निजी` अनुभव भी शामिल है।



3

शमशेर की एक कविता है `कन्या`। शुरू होती है यूं :

                सूरज जो
                         गुलाब बनने के सपने के
                         बीच से झांक रहा था
                 वह अल्हड़पन कहां से लाता
                         वह प्यारा कन्या रूप

कविता शुरू होते ही कन्या को सूरज से इस तरह अलग किया गया है कि न सूरज का मूल्य कम हुआ है न कन्या का। सूरज में भी गति है, उसके भी नये-नये रूप हैं, यह उसका सबसे कोमल रूप है। सुबह का सूरज जो गुलाब बनने का सपना देखते हुए उसके बीच से झांक रहा है। सपना खुद एक झिलमिलाहट की तरह होता है। सूरज साफ़ सामने नहीं आया है अभी तो वह `झांक` रहा है। यह कविता उस सुबह, उस दुनिया की कविता है जहां सूरज अपनी गर्मी आदि की शेख़ी में नहीं है। ऐसा मानवीय समय जब सूरज और गुलाब के बीच एक सपना है या कहें कि सूरज गुलाब बनने के सपने के समय में है। और यह परी का चित्र है :

                    मगर वह कोमलता
                              जो किरन को घुला रही थी
                              धूप को पानी कर रही थी
                     जो हंस रही थी


                      वह देवी का गुड़िया रूप
                                 जो आंख झपकाता था
                       और मक्खन सी गहरी गुलाबी हथेलियों को
                                  मुंडेर पर टिकाये हुए था
                        जहां उसके नन्हे पवित्र वक्ष
                                   दीवार को कंपा रहे थे
                        और उसकी आंखों से फूल बरस रहे थे


लेकिन यह परी का चित्र नहीं है। परियों के पंखों की बात की जाती है। यहां हथेलियां हैं, मुंडेर पर टिकायी हुई और नन्हे पवित्र वक्ष हैं जिनमें ऐसा गुण है (मैं शक्ति शब्द छोड़ रही हूं) कि जो दीवार को कंपा रहा है। दीवार कांप नहीं रही, उसे कंपाया जा रहा है और यह `गुण` अकेला नहीं है। इसी गुण की अभिव्यक्ति आंखों से फूलों के बरसने में हो रही है, जो `अल्हड़पन` में भी अभिव्यक्त हो रहा है। और यह गुण है, ऐसी कोमलता जो किरणों को घुला रही है, धूप को पानी कर रही है यानी सभी को बदल रही है। जिसको कविता के शुरू में ही `वह प्यारा कन्या रूप` कहा गया या `देवी का गुड़िया रूप` कहा जा रहा है, लेकिन यह रूप `आंख झपकाता था`, इसलिए यह न देवी है न गुड़िया।


यह वास्तव में देवी नहीं, परी नहीं, गुड़िया नहीं बल्कि एक `सुकुमार स्वस्थ बाला` है जो `यों ही मुक्त अकारण हंसी हंस कर, अंदर चली गयी ओट में।` यहां एक किशोरी को देखने के सभी स्टीरियोटाइप्स को तोड़ दिया गया है तभी यह `स्वस्थ बाला` दिखायी पड़ रही है।

ज़ाहिर है, यह कोई आध्यात्मिक कविता नहीं है। एक युवा होती किशोरी लड़की की सुबह, उसका उल्लास, उसमें छिपी ऊर्जा और उसके गुणों की एक तस्वीर है। एक स्वस्थ बाला को ऐसी तटस्थता से देखकर शमशेर बड़ा ज़रूरी काम कर रहे हैं। यह 1959 में लिखी गयी कविता है। आज युवा लड़कियां जिस बड़े पैमाने पर हिंसा और यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं और कन्या भ्रूण हत्या के कारण लिंग अनुपात ही गड़बड़ा गया है, ऐसे समय में कविता का बड़ा भारी मूल्य है। एक रुग्ण समाज में `यह सुकुमार बाला` जनतंत्र के लिए एक चुनौती है।


इस कविता में मौजूद इंद्रियबोध न तो पुरुष-दंभ और उद्दंडता के रूप का है और न किसी भावभीने मानवतावादी गीतिवाद का। यह इंद्रियबोध ऐसे व्यक्ति का इंद्रियबोध है जो एक किशोरी की स्वतंत्रता का क़ायल है, जिसके यहां नैतिकता और इंद्रियबोध अलग-अलग अपवर्जी चीज़ नहीं है। यह सौंदर्य दृष्टि शमशेर की मौलिक देन है। वे मार्क्सवादी हैं और उनकी सौंदर्य दृष्टि एक `वल्नरेबिल`को उसके स्पेस में उसके गुण सहित दिखाती है और इस तरह दिखाती है कि वह प्रतिष्ठित हो जाये। यह जगह शमशेर की कविता कई तरह से बनाती है। `अमन का राग`, `टूटी हुई, बिखरी हुई`, `नीला दरिया बरस रहा है` जैसी कविताएं ही नहीं, शमशेर का अधिकांश काव्य यह काम करता है।


इस `वल्नरेबिल` की जो समृद्धि शमशेर के यहां मौजूद है, उसी के कारण शमशेर की कविता एक रंगशाला और चित्रशाला की तरह है। उसमें एकांत है उजाड़ नहीं। उसमें उदासी है निराशा नहीं। उसके सभी रंगों में एक लॉस का, खोने का रंग मिला है, इसलिए उनकी कविता किसी समाप्त हो गयी प्रेमकथा की तरह न होकर एक ऐसी प्रेमकथा की तरह है जिसमें आश्रय और आलंबन के बीच एक गहरा एवं गाढ़ा रिश्ता है। इसके रास्ते में मुश्किलें हैं जिन्हें हम कह सकते हैं अमल की मुश्किलें :

                     हक़ीकत को लाये तख़ैयुल से बाहर
                     मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाये

जारी (एक और क़िस्त बाक़ी)...
(शुभा का यह लेख `नया पथ` के जुलाई-सितंबर : 2011 से साभार) 

ऊपर- शमशेर की तस्वीर लक्ष्मीधर मालवीय के कैमरे से जो असद ज़ैदी के जरिये मिली।

नीचे - शुभा की करीब 30-35 बरस पुरानी तस्वीर।

Monday, January 14, 2013

शमशेरः कुछ निजी नोट्स - शुभा


शमशेर के बारे में हिंदी जगत में जैसे एक रूढ़ि बन गई है कि वे बड़े मुश्किल कवि हैं या वे रूपवादी हैं या वे मार्क्सवादी हैं, या वे प्रयोगवादी और सुर्रियलिस्ट हैं या वे चित्रकला के बोध और औज़ारों का प्रयोग कविता में करते हैं। यह धारणा भी है कि वे प्रणय-चित्रो के कवि हैं। और भी बहुत सी धारणाएं शमशेर  के बारे में प्रचलित हैं। इनमें से अधिकतर धारणाओं में सच्चाई के अंश भी मौजूद हो सकते हैं लेकिन शमशेर हिंदी कविता के बड़े प्रतिष्ठित और आदरणीय कवि होते हुए भी बहुत कम समझे गये कवि हैं। बने-बनाये सांचों (स्टीरियोटाइप) की नज़र से देखने की प्रवृत्ति के चलते शमशेर की समग्रता और उनकी रचना का केंद्र सामने नहीं आ पाया है। हिंदी कविता को उसकी कुछ पुरानी सीमाओं से मुक्त करने वाले कवि के तौर पर शमशेर की पहचान अभी नहीं हो सकी है। खंडित दृष्टि, वितंडा और पंडिताऊपन की प्रवृत्तियां भी शमशेर को समझने में बड़ी बाधाएं हैं। शमशेर के काव्य की विषय वस्तु पर भी शिल्प के मुक़ाबले कम चर्चा हुई है। मुक्तिबोध ने हिंदी में `सामान्यीकरण` की `बुरी आदत` की चर्चा शमशेर पर लिखी अपनी टिपण्णी में की है। शमशेर व्यंजना या ध्वनि के कवि हैं। इस ध्वनि के संदर्भ बहुत अधिक ठोस व ऐतिहासिक हैं, वे सामान्यीकृत और औसत न होकर विशेष हैं। संभवतः इस कारण भी शमशेर को समझना अभी तक मुश्किल बना हुआ है। शायद इसीलए आलोचकों ने शमशेर पर जमकर नहीं लिखा।

1

शमशेर एक बड़े पाक-साफ़ व्यक्ति और कवि हैं। यह पाक़ीज़ग़ी किसी सती-सावित्री की पाक़ीज़ग़ी नहीं है, एक आशिक़ की पाक़ीज़ग़ी है। वे हमारे समय के सरमद हैं। क्या खुशनसीबी है! इस कमबख़्ती के दौर में, आलम-ए-नापायेदार में ऐसा साबुत क़दम हमारे बीच हुआ।

सबसे पहले, शमशेर हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी हिंदी चेतना विभाजित नहीं है। वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं जो हिंदी-उर्दू के ऐसे सम्मिलित प्रवाह में रहते हैं जो हिंदी प्रदेश कहे जाने वाले इलाक़े की कोख से ही संभव हुआ। हिंदी और उर्दू जुड़वां भ्रूण की तरह इसकी कोख में आये और रहे। हमारे साबुत दिल आशिक़ शमशेर भी इसी गुनगुनी कोख के जीवनदायी द्रव में, उसके प्रवाह और झंझाओं में रहते आये। इस कोख़ के क्षतिग्रसत किये जाने के बाद भी वह शमशेर की स्म़ति में रहती आयी। शमशेर खुद उस कोख में तब्दील हो गये।

शमशेर हमारे इलाक़े के मार्क्सवादी सूफ़ी कवि हैं। बदहाली के बावजूद इस इलाक़े के समाज और समृद्ध संस्कृति के ख़ज़ाने को समझने में न जाने कितनी नयी विश्लेषणकारी श्रेणियां सामने आयेंगी। सूफ़ियों की तरह शमशेर सच्चे रोमांटिक हैं और मार्क्सवादी की तरह कठोर यथार्थवादी हैं। वे ऐसी मधुमक्खी हैं जो नीम के फूल से बड़ा मीठा शहद बनाती है। वे शहद के छत्ते की रक्षा के लिए मधुमक्खी वाला डंक भी रखते हैं। इसीलिए हिंदी आलोचक उनके प्रति एक तरह की उदासीनता बरतते हैं। वैसे भी सदगृहस्थ सच्चे आशिक़ों से सुरक्षित दूरी बनाकर रहते हैं और चोरी छुपे तथाकथित प्रेम-प्रसंग पकाया करते हैं।

शमशेर प्रेममार्गी हैं। उन्होंने प्रेममार्ग को मध्ययुगीन आध्यात्मिकता के झुटपुटे से निकालकर यथार्थवाद की रोशनी में खड़ा कर दिया। औद्योगिक युग के उत्पीड़ितों-वंचितों, बिखरे अकेले उदास मज़दूरों और कम्युनिस्टों की तड़प से इस रास्ते को आबाद किया। वह पक्षधरता जो इकतरफ़ा लगती है, होती नहीं। एक ऐतिहासिक विफलता के भीतर छिपे सबसे क़ीमती मानवीय सार को रंग और रूप सहित शमशेर ने विलक्षण अभिव्यक्ति दी है। एक समग्र या कहना चाहिए पूरी तरह संगत सेंसिबिलिटी आश्चर्यजनक है, खासतौर से एक रोमेंटिक अंतर्प्रवाह की लगातार गाढ़ी होती उपस्थिति के बीच। मुक्तिबोध के अलावा इस तरह की समग्र सेंसिबिलिटी का कोई दूसरा उदाहरण नहीं, हालांकि मुक्तिबोध ज्ञानमार्गी हैं। मुक्तिबोध और शमशेर दोनों एक साथ हमारे पास हैं। एक के पास वैज्ञानिक की बेचैनी है, साहस है; दूसरे के पास आशिक़ की तड़प है, धैर्य है। यह हिंदी साहित्य में हमारी पिछली सदी का सबसे ख़ूबसूरत चित्र है, उपलब्धि है। यह एक मशाल की तरह है।

कम्युनिस्ट आंदोलन में बिखराव के बाद शमशेर ने पहला काम यह किया कि तमाम फ़ालतू चीज़ें जीवन से निकालकर एक अवकाश तैयार किया, एक फुर्सत, एक परिस्थिति, अपने लिए, अपने भीतर, अपने आस-पास ताकि रचना की जा सके। शमशेर ने व्यर्थ की उठापटक और संबंधों से अपने को अलग किया। यह उनकी `स्ट्रेटजी` थी जो उन्हें अकेले ही बनानी थी। यह शमशेर की पॉलिटिक्स भी है, गहरी पॉलिटिक्स। शमशेर के बिंब, रंग और ध्वनियां उनके एकांत में ही जीवित होती हैं। शमशेर का यह रचनात्मक एकांत एक वैकल्पिक दुनिया है जो भागने से या मिथ्याकरण से नहीं, यथार्थ के बीच एक सलेक्शन से बनी है। यहां शमशेर बड़े आज़ाद व्यक्ति हैं, तात्कालिक बाहरी दबावों से मुक्त. ऊंची-नीची सीढ़ियों और फांकों में बंटी चेतना से अलग, अपने भीतरी दबावों को जगह देते हुए वे एक पक्षधरता की रचना करते हैं। इस पक्षधरता के कारण शमशेर की कविता में हर क्षण एक मानवीय उपस्थिति है, एक साक्षी की उपस्थिति है। इस कविता में हर रंग, शब्द ध्वनि और ख़ामोशी एक सटीकता और भिन्नता (डिस्टिंक्शन) पैदा करती है। यह भिन्नता जैसे स्वयं एक प्रमाण की तरह है। यहां किसी चीज़ का औसतीकरण नहीं होता, हर चीज़ विशेष है, हर संबंध विशेष है। यहां कोई संबंध, कोई संवेदना, कोई रेखा फ़ालतू जगह नहीं लेती। जैसे यहां हर चीज़ वस्तुगत है, अपनी धड़कन और अपनी सांसों सहित अपने अवकाश में उपस्थित है। अगर किसी को शमशेर अतिवादी लगते हैं तो इसलिए कि उनकी वैकल्पिक दुनिया में बदले हुए अनुपातों के द्वारा वस्तुगत को या कहें एक संवेदन-सत्य को हासिल किया गया है। शमशेर का `महीन-युग-भाव` उनके ऐसे बटख़रे हैं जो मिलीमीटर और मिलीलीटर के सौंवे हिस्से को भी पूरा पकड़ लेते हैं। यह महीन पकड़ एक न्याय चेतना है जो बोध में घुली हुई है और सेंसिबिलिटी की संगत में व्यक्त होती है। इसमें बोध और विचार के बीच झोल नहीं है, असंगति नहीं है, कोई दोग़लापन नहीं है, कुछ भी दूसरों को दिखाने के लिए बाहर से नहीं बटोरा गया है, हर चीज़ संवेदना से छनकर आयी है। इसीलिए शमशेर की हर कविता में प्रेम मौजूद है। इस कविता में कोई `अन्य` नहीं है। इस कविता में संवेदना का प्रक्षेपण बहुत है, प्रदर्शन बिल्कुल भी नहीं। शमशेर की आत्मस्थता री गुणवत्ता के कारण ही उनकी कविता ऐसी है जैसे अपने से बात कर रहे हों, जैसे अपने बिल्कुल क़रीबी से बात कर रहे हों। कोई अतिरिक्त ऊंची आवाज़, कोई झल्लाहट, कोई चिल्लाहट उनके वातावरण में नहीं है। हालांकि वे सत्ता संबंधों को स्वीकार नहीं करते थे, साम्प्रदायिक परिस्थिति से वे लगातार दुखी रहे, उस पर कविताएं लिखीं, उन कविताओं में अथाह दुख और अथाह प्रेम मौजूद है। शमशेर की कविता में ंमौजूद अविभाजित दुख और अविभाजित प्रेम ही सूफ़ियों वाले गुण पैदा करता है। सुर्रियलिस्टिक शैली उनकी तात्कालिक कार्यनीति है जो लंबी स्ट्रैटेजी को बनाए रखने के काम आती है। शमशेर कोई भोले-भाले प्रेमी नहीं हैं। वे सत्ता संबंधों को समझते हैं, उन्हें निश्चित दूरी पर रखते हैं, वर्ग-विषमता को पहचानते हैं, वे  कम्युनिस्टों के संघर्ष और ऐतिहासिक विफलता को समझते हैं, वे उनसे निकली इच्छाओं, आदर्शों, दुखों के साथ हैं, साम्राज्यवाद के मंसूबे वे समझते हैं और एक अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक चेतना रखते हैं। वे यथार्थ को स्वीकार करते हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन के बिखराव पर पूंजीवादी व्यवस्था में लोगों के अंदर पैदा होने वाले बेग़ानेपन (सेल्फ एलिनेशन) के ख़िलाफ़ वे एक सजग व्यक्ति-चेतना से प्रतिबद्ध रहे। यह व्यक्ति चेतना `इंसानियत की तलछट में छोड़े गए स्वाद` से `शराब` खींचती है और आत्मविस्मृति, बेग़ानेपन और अवमूल्यन को परे धकेलती हुई एक मनुष्य व्यक्ति की स्मृति को क़ायम रखती है। यह पूंजीवादी जनतंत्र में ऐतिहासिक रूप में पैदा हुआ मनुष्य व्यक्ति है जिसने आज़ादी का स्वाद कुछ समय के लिए चख़ा है और यह स्वाद उससे छिन गया है;

वो बहारों के मंच
वो जब हम ख़ुद एक
गुलाब का
पर्दा थे गोया
दहकता हुआ, और वो गीत
हैरान, ख़ामोश; और वो जोश से फड़फड़ाते
आज़ाद बुलबुलों के तराने ये सब

          क्यों आज याद आये ही जा रहे हैं
                        याद आये ही जा रहे हैं

हमें इस नुचे-खुचे
            बुच्चे आशियाने में
            आज?

यह स्मृति और यह हानि ही शमशेर की कविता का केंद्र है। यह स्मृति किसी ख़त्म हो गई चीज़ की स्मृति नहीं है, यह बिछड़ी हुई चीज़ की स्मृति है। इस बिछड़े हुए स्वपन का रंग और सौंदर्य, हानि और दुख शमशेर के यहां छाया हुआ है।यह स्वपन और यह हानि `बारीक़ शमशेरीय छन्नी से छाना हुआ मार्क्सवाद` है जिसे शमशेर स्वयं `शराब, यानी इंसानियत की तलछट का छोड़ा हुआ स्वाद` कहते हैं।

मुक्तिबोध का एकांत सत्ता केंद्रों के ध्वंस की गहरी इच्छा और आत्माभिव्यक्ति की दुर्निवारता से बना है, जबकि शमशेर का एकांत बेग़ानेपन के ध्वंस और मनुष्य व्यक्ति के अनुसंधान से बना है। यह मनुष्य व्यक्ति ठोस है, ऐतिहासिक है। इसका अंतर्जगत शमशेर के यहां खुलता है, यही वह रंगशाला है, जिसके सौंदर्य, गरिमा, दुख और प्रेम को देखकर, उसकी आत्मीयता, उसकी तीक्ष्णता के बीच साक्षी की उपस्थिति को देखकर हम बार-बार चकित होते हैं। शमशेर की कविता ऐसा आईना है जो हमें हमारा अंतर्जगत दिखाता है, इसे शमशेर `समाज-सत्य का मर्म` कहते हैं। इस समाज-सत्य के मर्म को देखने से बहुत सारी ज़िम्मेदारियां आयद होती हैं, अपनी सतही-खोखली जगह नज़र आती है, अपनी हानि नज़र आती है और अपना ही ऐसा जगमग रूप नज़र आता है जिसे धारण करने से हम डरते हैं। इसीलिए हम शमशेर की कविता से भी बचते हैं और आसान चीज़ों को अपनाये रखते हैं।

कवयित्री-एक्टिविस्ट शुभा का यह लेख नया पथ (जुलाई-सितंबरः 2011) से साभार। ऊपर शमशेर का फोटो लक्ष्मीधर मालवीय के कैमरे से (इसके लिए असद ज़ैदी और जलसा का आभार)
शुभा की तस्वीर कुलदीप कुणाल के कैमरे से।

Sunday, March 7, 2010

औरतों की कविताएँ : शुभा

1.औरतें
----------


औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं

औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं

औरतों की इच्छाएं
बहुत दिनों में फलती हैं
***


2.
औरत के हाथ में न्याय
-----------------------------


औरत कम से कम पशु की तरह
अपने बच्चे को प्यार करती है
उसकी रक्षा करती है

अगर आदमी छोड़ दे
बच्चा मां के पास रहता है
अगर मां छोड़ दे
बच्चा अकेला रहता है

औरत अपने बच्चे के लिए
बहुत कुछ चाहती है
और चतुर ग़ुलाम की तरह
मालिकों से उसे बचाती है
वह तिरिया चरित्तर रचती है

जब कोई उम्मीद नहीं रहती
औरत तिरिया चरित्तर छोड़कर
बच्चे की रक्षा करती है

वह चालाकी छोड़
न्याय की तलवार उठाती है

औरत के हाथ में न्याय
उसके बच्चे के लिए ज़रूरी
तमाम चीजों की गारंटी है।
***


3.
औरत के बिना जीवन
---------------------------


औरत दुनिया से डरती है
और दुनियादार की तरह जीवन बिताती है
वह घर में और बाहर
मालिक की चाकरी करती है

वह रोती है
उलाहने देती है
कोसती है
पिटती है
और मर जाती है

बच्चे आवारा हो जाते हैं
बूढ़े असहाय
और मर्द अनाथ हो जाते हैं
वे अपने घर में चोर की तरह रहते हैं
और दुखपूर्वक अपनी थाली खुद मांजते हैं
***


4.
औरतें काम करती हैं
----------------------------


चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की
दुनिया के बाहर
मालिकों की दुनिया के बाहर
पिताओं की दुनिया के बाहर
औरतें बहुत से काम करती हैं

वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती हैं
आटे को रोटी में
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े में बदल देती हैं।

वे खंडहरों को
घरों में बदल देती हैं
और घरों को कुंए में
वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं
और तमाम चीज़ें संवार देती हैं

वे बोलती हैं
और कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैं
कथाएं लोकगीत रचती हैं

बाहर की दुनिया के आदमी को देखते ही
औरतें ख़ामोश हो जाती हैं।
***

5.
निडर औरतें
----------------


हम औरतें चिताओं को आग नहीं देतीं
क़ब्रों पर मिट्टी नहीं देतीं
हम औरतें मरे हुओं को भी
बहुत समय जीवित देखती हैं

सच तो ये है हम मौत को
लगभग झूठ मानती हैं
और बिछुड़ने का दुख हम
खूब समझते हैं
और बिछुड़े हुओं को हम
खूब याद रखती हैं
वे लगभग सशरीर हमारी
दुनियाओं में चलते-फिरते हैं

हम जन्म देती हैं और इसको
कोई इतना बड़ा काम नहीं मानतीं
कि हमारी पूजा की जाए

ज़ाहिर है जीवन को लेकर हम
काफी व्यस्त रहती हैं
और हमारा रोना-गाना
बस चलता ही रहता है

हम न तो मोक्ष की इच्छा कर पाती हैं
न बैरागी हो पाती हैं
हम नरक का द्वार कही जाती हैं

सारे ऋषि-मुनि, पंडित-ज्ञानी
साधु और संत नरक से डरते हैं

और हम नरक में जन्म देती हैं
इस तरह यह जीवन चलता है
***


6.
बाहर की दुनिया में औरतें
-----------------------------


औरत बाहर की दुनिया में प्रवेश करती है
वह खोलती है
कथाओं में छिपी अंतर्कथाएं
और न्याय को अपने पक्ष में कर लेती हैं
वह निर्णायक युद्द को
किनारे की ओर धकेलती है
और बीच के पड़ावों को
नष्ट कर देती है

दलितों के बीच
अंधकार से निकलती है औरत
रोशनी के चक्र में धुरी की तरह

वह दुश्मन को गिराती है
और सदियों की सहनशक्ति
प्रमाणित करती है
***

Saturday, March 8, 2008

आदमखोर - शुभा


एक स्त्री बात करने की कोशिश कर रही है
तुम उसका चेहरा अलग कर देते हो धड़ से
तुम उसकी छातियां अलग कर देते हो
तुम उसकी जांघें अलग कर देते हो

तुम एकांत में करते हो आहार
आदमखोर! तुम इसे हिंसा नहीं मानते


आदमखोर उठा लेता है
छह साल की बच्ची
लहूलुहान कर देता है उसे

अपना लिंग पोंछता है
और घर पहुँच जाता है
मुंह हाथ धोता है और
खाना खाता है

रहता है बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह
शरीफ आदमियों को भी लगता है
बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह।
-शुभा

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच - शुभा

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
मानवीय सार पर बात करना ऐसा ही है
जैसे मुजरा करना
इससे कहीं अच्छा है
जंगल में रहना पत्तियां खाना
और गिरगिटों से बातें करना।
-शुभा

अकलमंदी और मूर्खता - शुभा

स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए
पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है

पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए
स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि
स्त्रियों में भी मूर्खताएं होती हैं और पुरुषों में भी

सच तो ये है
कि मूर्खों में अक्लमंद
और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं
मनुष्यता ऐसी ही होती है

फिर भी अगर स्त्रियों की
अक्लमंदी पहचाननी है तो
पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फोकस करना होगा।
- शुभा

Thursday, November 8, 2007

शुभा की कविता

लाडले
(1)

कुछ भी कहिये इन्हें
दूल्हा भाई या नौशा मियां

मर चुके पिता की साइकिल पर दफ्तर जाते हैं

आज बैठे हैं घोडी पर नोटों की माला पहने
कोशिश कर रहे हैं सेनानायक की तरह दिखने की

(2)
१८ साल की उम्र में इन्हें अधिकार मिला
वोट डालने का
२४ की उम्र में पाई है नौकरी
ऊपर की आमदनी वाली
अब माँ के आँचल से झांक-झांक कर
देख रहे हैं अपनी संभावित वधु

(3)
सुबह छात्रा महाविद्यालय के सामने
दुपहर पिक्चर हॉल में बिताकर
लौटे हैं लाडले

उनके आते ही अफरातफरी सी मची घर में

बहन ने हाथ धुलाये
भाभी ने खाना परोसा
और माताजी सामने बैठकर
बेटे को जीमते देख रही हैं

देख क्या रही हैं
बस निहाल हो रही हैं

(4)
अभी पिता के सामने सिर हिलाया है
माँ के सामने की है हांजी हांजी
अब पत्नी के सामने जा रहे हैं
जी हाँ जी हाँ कराने