Saturday, April 3, 2010

लाल्टू की एक कविता : हुसैन सागर

(दिल्ली से हैदराबाद लौटते हुए)



नहीं शहर के उस हिस्से में जहाँ मुझे जाना है दंगा नहीं हुआ है।
जहाँ हुआ है, ठीक ठीक किन कारणों से हुआ है, यह मुझे नहीं मालूम
पर सोचता हूँ कि हुसैन सागर पर आज शाम कोई न जाए

सागर के साथ हुसैन का जुड़ना हिंदुओं को नागवार लग सकता है
बीचोबीच बुद्ध की प्रतिमा होने पर
कोई मुसलमान परेशान हो सकता है कि हुसैन समंदर नहीं झील ही सही में ऐसा कैसे
बौद्धों की औकात मुल्क में कम ही है, उन्हें भी समस्या कोई तो हो ही सकती है
बाकी सब का भी रब या परम पिता ईश्वर कुछ कुछ तो कहला ही सकता है अपने भक्तों से

ऐ अप्रतिम विशाल नभ, ओ निर्मल, तू जो परंपराओं को सीने में लिए शाम अँधेरे चला गया
तूने तो हुसैन को दिखला दीं झील में समंदर की लहरें
अब बड़े वामपंथी कवि लेखक भी ढूँढ रहे जीवंत परंपराएँ और आस्थाएँ

और विशाल टैंकर ट्रक सब हिंद महासागर के पार कहीं फेंक आने हुसैन सागर को उठा ले जा रहे हैं
देखने वालों में से एक पूछता है कि आप रो तो खूब लिए हल नहीं बतलाते
एक हल है कि सुबह सुबह दो से चार ग्लास पानी पिया जाए
दिमाग को दुरुस्त रखा जाए
दूसरा यह कि हो जाए कविता गद्यमय
पर बंदूक चलानी सीखा जाए

तीसरा हल यह भी कि ऐलबर्ट आइन्स्टाइन को पढ़ा जाए
कि जितना आश्चर्य आस्थावादी विचारकों की भीड़ देखकर होती है आज
उतना ही हुआ था उस महान वैज्ञानिक को भिन्न कारणों से कभी गाँधी को जानकर

नहीं शहर के उस हिस्से में जहाँ मुझे जाना है दंगा नहीं हुआ है।
मैं ऐलबर्ट आइन्स्टाइन बार बार पढ़ सकता हूँ।

17 comments:

आशुतोष दुबे said...

bahut acchi rachna hai.
हिन्दीकुंज

अफ़लातून said...

हुसेन के सुन्दर चित्र के साथ लाल्टू की खूबसूरत रचना की प्रस्तुति ! क्या बात है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रचना में झकझोर देने वाली क्षमता है।

Anonymous said...

क्या इसे भी कविता कहते हैं?

Anonymous said...

Ji, bhala yh bhi koi kavita hai. ye to sampradaayikta par bhi pareshan hoti hai aur Vishnu khare jaise Vampanthiyon ke prampra aur astha ke moh par bhi.

Shekhar kumawat said...

ACHA LIKHTE HE

SHEKHAR KUMAWAT

Rangnath Singh said...
This comment has been removed by the author.
Rangnath Singh said...
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लाल्टू said...

मैंने तो सिर्फ अपनी मनस्थिति का बयान किया है। सवाल यह नहीं कि कौन अपराधी है, सवाल यह है कि बहुसंख्यक लोगों की संस्कृति(यों) और परंपराओं के वर्चस्व में जीते हुए हममें से कोई भी मुख्यधारा से अलग मुद्दों पर किस हद तक खुला दिमाग रख सकता है। कहने को हम किसी एक कवि या लेखक को निशाना बना सकते हैं, पर मेरा मकसद यह नहीं है, मैं एक तरह से खुद को निशाना बना रहा हूँ। किसी भी बड़े और सजग कवि से तो मैं सीख ही सकता हूँ। अगर एक सचेत कवि की किसी बात में हमें किसी प्रकार की संकीर्णता दिखती है, तो मैं या कोई और भी उस संकीर्णता से मुक्त हों, ऐसा नहीं हो सकता है। मैं चाहता हूँ कि हममें से हर कोई इस बात को सोचे कि हम कितनी ईमानदारी से जो कहते हैं उसको वाकई अपने जीवन में जीते हैं। मुझे लगता है कि हमें आपस की खींचातानी या किसी एक कवि या लेखक का नाम लेकर बहस करने से बचना चाहिए। मैं अक्सर देखता हूँ कि इस तरह की बहस से मूल बात हाशिए पर चली जाती है। अपनी कमजोरियों और पूर्वाग्रहों को समझते हुए और उन्हें स्वीकार करते हुए ही हम बेहतरी की ओर बढ़ सकते हैं।

Rangnath Singh said...

यह कविता एक तरफ साम्प्रदायिक लोगों को निशाने पर रखती है, दूसरी तरफ विष्णु खरे को और तीसरी तरफ उन सभी पाठकों को जो कविता को गद्यमय किए जाने से असहज महसूस करते हैं।

इस तीसरे तरफ में तो मैं स्वयं को भी खड़ा पा रहा हूँ। मैं यह नहीं कह रहा कि यह कविता लोगों को निशाने पर रखने के लिए लिखी गई है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ निशाने पर रखने के खतरे से बचने के लिए यह गद्य 'कवितामय' हो गया है। मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि यह जो कुछ भी है उसने मुझे और मुझ जैसे बहुत से पाठकों को निशाने पर ले लिया है !

manav said...

aap dono ko laaltu ji ko aur dhiresh bhai ko aisi rachna ke liye bhut bhut dhnywad. laatu ji ko isliye ki unhone ise likha aur dhiresh bhai ko iss kvita ko meri phunch tk laane ke liye

अशोक कुमार पाण्डेय said...

लाल्टू जी से सहमत!

ज़रूरी कविता है… बस इतना कहुंगा अभी

शरद कोकास said...

लाल्टू जी आपको इतना स्पष्टिकरण देने की क्या आव्श्यकता है । सही तो कह रहे है आप ।

प्रदीप कांत said...

तीसरा हल यह भी कि ऐलबर्ट आइन्स्टाइन को पढ़ा जाए
कि जितना आश्चर्य आस्थावादी विचारकों की भीड़ देखकर होती है आज
उतना ही हुआ था उस महान वैज्ञानिक को भिन्न कारणों से कभी गाँधी को जानकर

मृत्युंजय said...

लाल्टू जी !
बेहतर कविता के लिए उदास बधाई!
क्यूँ उदास नहीं होना चाहिए?
दंगे का कम से कम भी जो मतलब होता है
वह सिर्फ उदास और बे इंतिहा परेशान कर देता है.

ऐसे में जहाँ से इसके खिलाफ आवाज़ क़ी उम्मीद हो,
वही से आस्था के तर्क हाथ लगें तो रोने का ही मन होगा!

सर्वेश्वर ने कुमार गन्धर्व के लिए एक बार लिखा था
"जलते हुए वन में छटपटाता हुआ हिरन"
हमारी हालत ऐसी ही है
इस वक्त हैदराबाद में होना यातना क़ी ढेरो खिड़कियाँ खोल देता होगा
गुजरात अयोध्या और हुकूमते!

प्रीतीश बारहठ said...

@ रंगनाथ जी !

आपके साथ मैं भी निशाने पर हूँ।
कविता निशाने भी साधती है और गोली भी चलाती है।
कविता की बंदूक के शिकार को यह सुविधा होती है कि उसकी इच्छा हो तो गोली से घायल हो और न होतो न हो। बहुत से लोग कविता के पद्य से खुशी-खुशी और शीघ्र घायल होते हैं। कविता के गद्य से शायद उतने नहीं..
और सर ! गोली तो पद्य से क्या ग़ज़ब की निकलती है...

Anonymous said...

"doosra yeh ki ho jaae kavita gadyamaya
par bandook chalaanee seekha jaae"

laltu ki zayada kavitayen nahin parhi, par jo parhi unhe zayada sarah nahi paaya. Is kavita main yeh do pankityaan is kavita ko saarthak banaati hai, meri samajh main.