Saturday, September 11, 2010

नूर ज़हीर से एक मुलाकात : दहलीज़ के सफ़र की विचारोत्तेजक शुरुआत

नूर ज़हीर से एक मुलाकात : दहलीज़ के सफ़र की विचारोत्तेजक शुरुआत

--रोहित कौशिक

मौसम बहुत नास्टेल्जिक था. सुबह से हो रही बारिश थम चुकी थी.रविवार ५ सितम्बर की शाम में दिल्ली महानगर के कुछ अदीब, कुछ कलाकार उस 'दहलीज़' के अन्दर अपने ख्वाब, अपनी फ़िक्र के साथ दाखिल हुए जो अभी चंद रोज पहले तामीर हुआ था. पहली मुलाकात तय थी कथाकार, पत्रकार, नाटककार, डांसर और रिसर्चर नूर ज़हीर से. वे आयीं तो जैसे आम आदमी के जबान की खुशबू फ़ैल गयी हर सिम्त. उन्होंने अपने नावेल 'बड़ उरैया' से एक अंश सुनाया. जिसमे एक भोलेभाले किसान मम्दू के सहज गुस्से और उसके द्वारा पडोसी के खच्चर को मार देने के इलज़ाम में चल रहे मुकदमे की दास्तान थी. इस दास्तान में आम आदमी के जबान का जादू तो था ही, उसके ईमान का जबरदस्त रंग भी था. मम्दू जिसकी गेहूं की फसल दीन मुहम्मद से झगडे की वजह से बर्बाद हो गयी थी, क्योंकि उसने उसके खेत तक पानी जाने नहीं दिया था और आम को आंधी ने बर्बाद कर दिया था. एक तरकारी का खेत बचा था, जब उसे भी खच्चर बर्बाद करने लगा तो गुस्से में उसने उसे मार दिया. उसे समझ में नहीं आता कि इसमें गलत क्या है. वकील जिनका धंधा झूठ बोलने पर ही चलता है वे उसे झूठ बोलने को कहते हैं. अदालत में वह कोशिश करता है झूठ बोलने की, लेकिन चूँकि उसने सच बोलने की कसम भी खाई थी, इस वजह से सच बोल देता है. उसे समझ में नहीं आता कि वकील साहब लाल-पीले क्यों हो रहे हैं. आगे उसे बताया जाता है कि अदालत का ईमान और घर का ईमान अलग-अलग होता है. उसे लगता है कि यह तो धोखा है. ईमान तो इन्सान का होता है.
मम्दू के जबान और ईमान से फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ, जो हमारे समय में मौजूद कई जरूरी सवालों तक पंहुचा. विचारो और बहसों की आंच में बारिश के बाद की वह शीतल शाम सुलग उठी और सबको गहरी सार्थकता का एहसास हुआ. नूर ज़हीर ने इस पर चिंता ज़ाहिर की कि हमारे यहाँ कोई जबान ढंग से नहीं सिखाई जा रही है. प्रोग्रेसिव तहरीक के अगुआ रहे सज्जाद ज़हीर और रजिया ज़हीर कि छोटी बेटी नूर ज़हीर ने बताया कि घर का जो अदबी और कल्चरल माहौल था उसमें लिखने कि शुरुआत उन्होंने बहुत डरते हुए की. हालाँकि प्रोत्साहन बहुत मिला. बच्चो के लिए नाटक करने, डांस का प्रशिक्षण पाने और बौद्ध मठों पर अपने शोध के अनुभव को भी उन्होंने साझा किया. उन्होंने एक विचारोत्तेजक बात कही कि बौद्ध काल में पितृसत्ता मजबूत हुई और जो इस्लाम में तो बहुत ताकतवर है. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वे नहीं मानतीं कि भारत में मुस्लिम समाज इतने खौफ और असुरक्षाबोध में घिरा है कि मुस्लिम औरतों की आज़ादी और बराबरी की लड़ाई को उसके बहाने धीमा किया जाए या रोक दिया जाए. पत्रकार भाषा सिंह ने इससे सहमति जाहिर करते हुए कहा कि गुजरात में सारी लड़ाई औरतें ही लड़ रही हैं. समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने याद दिलाया कि वहां हिन्दू औरतों ने हमले भी किये इसे भी नहीं भूलना चाहिए. हालाँकि उन्होंने जोर देकर कहा कहा कि इस वक्त महत्वपूर्ण लड़ाइयों की कमान औरतों ने सँभाल रखी है. मेघा पाटेकर से लेकर अरुंधती तक इसका उदाहरण हैं. सुधीर सुमन ने नूर ज़हीर और यशपाल की एक कहानी का हवाला देते हुए कहा कि दरअसल पूरी जद्दोजहद ऐसे लोकतान्त्रिक मूल्यों के निर्माण के लिए है, जिसमे कोई स्त्री पुरुष खुद को न शोषित समझे न किसी का शोषण करे. आज़ादी और बराबरी के मूल्य दोनों के लिए समान हों. आलोचक- व्यंग्यकार प्रेमपाल शर्मा ने हिंदी पट्टी की सामन्ती सामाजिक संरचना को बदलने की जरूरत पर जोर दिया.आलोचक आशुतोष ने इज्जत के नाम पे होने वाली हत्याओं के मामले में छात्रों की राय का जिक्र करते हुए समाज के लोकतान्त्रिक रूपांतरण के सवाल को लेकर चिंताजनक सवाल खड़ा किया. फिर जेंडर इश्यू पर जम के चर्चा हुई. खाप पंचायतों, हिंदी साहित्य में स्त्री लेखन और कुछ पत्रिकाओं द्वारा चलाए जा रहे स्त्री विमर्श के तौर तरीके पर गर्मागर्म बहसें चलीं. नूर ज़हीर ने कहा कि हिंदी कि तुलना में देखें तो उर्दू अदब में तो जेंडर इश्यू उठा पाना बहुत मुश्किल है.
सेकुलरिज्म और हिन्दू मुस्लिम रिश्तों के सबंध में भी बातें हुई. पत्रकार भूपेन ने कहा कि मजहब को मानते हुए सेकुलरिज्म संभव नहीं है. नूर ज़हीर ने अपने दादा की दो हिन्दू बहनों का हवाला देते हुए कहा कि उन लोगों को अपने अपने धर्म और रिवाज में आस्था थी, पर इसके बावजूद रिश्ते बहुत मधुर थे, बल्कि वे एक दूसरे के हितों की फ़िक्र करते थे. एक खास तरह की राजनीति ने दोनों सम्प्रदायों के बीच जो दूरी बढाई है, जिस तरह का अविश्वास और नफरत पैदा किया है उसे लेकर भी चिंता जाहिर की गयी. नूर जहीर ने कहा कि लेफ्ट idealogy के बिना आजाद हिंदुस्तान को देखना उनके लिए संभव ही नहीं है. पंकज बिष्ट ने कहा कि कोई अगर डेमोक्रेटिक है तो वह एंटी वुमेन या एंटी सेकुलर नही हो सकता. उन्होंने कहा कि इस वक्त भारतीय स्टेट अपना रोल प्ले करने में असफल रहा है, कई समस्याएँ इस वजह से भी बनी हुई हैं. बहस में कवि कुमार मुकुल, मुकुल सरल, पत्रकार श्याम सुशील ने भी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया. इस मौके पर खालीद. उपेन्द्र स्वामी, सीरज सक्सेना, मुकुल पन्त, वंदना, सुलेखा और मनीषा भी मौजूद थे.

इस तरह दहलीज़ के सफ़र की शुरुआत हुई. दहलीज़ एक कोशिश है अदब, कला और विचार को जीवन शैली का हिस्सा बनाने की. इस कोशिश के तहत हर महीने के पहले रविवार को १३३, कला विहार, मयूर विहार फेज १ में रचनाकारों से मुलाकात और बात होगी. दहलीज़ का ईमेल है- dahleez@rediffmail.com, mobile n. 9818999500. संयोजक हैं रोहित कौशिक.

4 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह दहलीज की स्वागत योग्य पहल है। नूर ज़हीर से शुरुआत इसे एक अलग अर्थ देती है…हमारी तरफ़ से शुभकामनायें।

अजेय said...

ईद मुबारक़!

आज पहला एस एम एस नूर जी का आया, ईद और गणेशोत्सव पर... मैं विचलित था.

फिर उदय प्रकाश जी और शिरीष कुमार मौर्य का आया, विना गेणेश का ज़िक़र किए, तो ... आश्वस्त हुआ.

फिर अपनी सोच जम कर कुंठित हुआ.
सॉरी मैं भटक रहा हूँ . सुन्दर पोस्ट ज़िद्दी भाई.

शिरीष कुमार मौर्य said...

भूपेन ने सही कहा.
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सारे मित्र सोचें ...कि भारत में एक हिन्दू , हिन्दू रहते हुए भी देशभक्त हो सकता है....पर एक मुसलमान को देशभक्त कहलाने के लिए सेक्यूलर होने का सर्टिफिकेट लेना होता है.
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दहलीज़ की शुरूआत बहुत अच्छी है. उन्हें मेरी बधाई.

ali said...

स्वागतेय !