Sunday, October 24, 2010

आधुनिक भारत की संकल्पना को एक धक्का

दीपंकर भट्टाचार्य

अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आने की पूर्व संध्या पर हमने कहा था कि यह निर्णय भारत की धर्मनिरपेक्षता,लोकतंत्र और न्याय की परीक्षा है. अब इस शर्मनाक निर्णय को ज़रा गौर से देखने पर हमें पता चलता है कि यह सभी कसौटियों पर असफल साबित हुआ है. 30 सितम्बर 2010 की तारीख अब 6 दिसंबर 1992 के साथ याद की जाएगी.बाबरी मस्जिद को कायराना तरीके से ढहाने के 18 साल बाद अब हम इसके न्यायिक विध्वंस के गवाह बन रहे हैं. इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय न्याय के बुनियादी सिद्धांतों व कानून के शासन की बुनियादी स्थापनाओं पर भी खरा नहीं उतरता और आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक विचार को ही चुनौती देता है.
हाईकोर्ट को विवादित जगह के मालिकाने के बारे में निर्णय देना था. ये सबको पता है कि भाजपा और संघ परिवार अरसे से मानते रहे कि यह पूरा मामला 'आस्था' से जुड़ा हुआ है और 'आस्था' के सवाल को न्यायालय के ज़रिये तय नहीं किया जा सकता. उन्हें पता था कि उनके दावों का कोई कानूनी आधार नहीं है, इसलिए उन्होंने पूरे देश को धोखा देने का रास्ता चुना. उन्होंने हर किसी को आश्वस्त किया था कि क़ानून का सम्मान किया जायेगा, लेकिन दिनदहाड़े मस्जिद को गिराकर वे अपने ही शब्दों से पलट गए.
आज संघ परिवार इस बात पर खुश है कि है हाईकोर्ट ने 'आस्था' को कानूनी जामा पहना दिया है. सभी तीनों जजों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि 22-23 दिसंबर 1949 की रात को राम,सीता और भरत की मूर्तियों को बाहर से षड्यंत्रपूर्वक अन्दर लाया गया था. फिर भी जजों ने 2-1 के बहुमत से 'विवादित ढांचे' को मस्जिद न मानने के फैला दिया, क्योंकि उनके मुताबिक़ यह ढांचा एक हिन्दू धार्मिक ढांचे को तोड़कर बनाया गया था और इसलिए इस्लाम के मतानुसार इसमें मस्जिद की पवित्रता नहीं हो सकती. ज़रूर तीसरे जज का मत उक्त दोनों मतों से भिन्न था, लेकिन बहुमत के दृष्टिकोण को तरजीह मिली.
ये फैसला मुख्यतया दो तत्वों पर आधारित था- पहला: 2003 में एएसआई की रिपोर्ट में दिए गए कथित 'पुरातात्विक साक्ष्य' जिनके अनुसार मस्जिद के बनने से पहले उस जगह पर हिन्दू मंदिर था. दूसरा: यह कि हिन्दुओं की 'आस्था' है कि यह विवादित क्षेत्र भगवान राम का जन्मस्थान है. एएसआई की इस रिपोर्ट पर कई सवाल खड़े हुए और ज़्यादातर इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं ने इसको खारिज कर दिया था. इस रिपोर्ट को भ्रामक साक्ष्यों और भ्रामक स्पष्टीकरण पर आधारित (काल्पनिक) अटकलबाजी से ज्यादा कुछ और नहीं कहा जा सकता. इसके दूसरे 'पहलू' आस्था के बारे में सच्चाई यह है कि स्वामित्व विवाद के मुक़दमे में फैसले के लिए आस्था को साक्ष्य के बतौर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
ज़मीन के मालिकाने के मुक़दमे में राम को एक 'विधिसम्मत व्यक्ति' के रूप में मान्यता देकर (गौरतलब है कि मुक़दमे में इन नाबालिग रामलला का प्रतिनिधित्व एक स्वनियुक्त 'अभिभावक' द्वारा किया गया) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्याय शास्त्र के साथ अंध आस्था और धर्म की आड़ लेकर पूर्वाग्रह को फेंटने की एक खतरनाक नज़ीर कायम की है. यहाँ गौर करना होगा कि इस मुक़दमे में सबसे कम उम्र वाले रामलला विराजमान, जिन्हें विवादित स्थल के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण केंद्रीय गुम्बद (ठीक जिस स्थान पर संघ ब्रिगेड वाले भगवान राम का जन्म होने दावा करते हैं) समेत एक तिहाई ज़मीन का हकदार बना दिया गया है. इस पक्ष को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री देवकी नंदन अग्रवाल द्वारा 1989 में खड़ा किया गया था. जिन्होंने संघ ब्रिगेड के मंदिर अभियान को 'कानूनी' मुक़दमे की शक्ल देने में प्रमुख भूमिका अदा की थी.
इस तरह पूर्णतः संदिग्ध आधार पर रामजन्मभूमि के दावे को मान लेने के बाद न्यायाधीशों ने इस पूरे मामले को सुलह की शक्ल में पेश करने के लिए विवादित स्थल को तीन समान हिस्सों में बाँट दिया जिसमें एक हिस्सा वक्फ बोर्ड को मिलेगा. जबकि सुलह हासिल करने की कोशिश केवल सत्य और न्याय के आधार पर ही हो सकती है. लेकिन इस मामले में सच्चाई (कम-से-कम इतिहास में दर्ज सच्चाई) और न्याय दोनों को इस नकली सुलह के सूत्र की बलिवेदी पर कुरबान कर दिया गया है. इसी कारण से यह फैसला सत्य, न्याय और सुलह तीनों का एक साथ मखौल उड़ाता है. क्या सत्य और न्याय की कुर्बानी देकर कोई सम्मानजनक समझौता कर पाना संभव है?
गुजरात के जनसंहार के बाद से भाजपा लगातार देश के अधिकांश हिस्सों में अपनी ज़मीन खोती जा रही है. 2009 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद - जो पिछले पांच वर्षों में उसकी लगातार दूसरी हार थी- भाजपा को कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था कि कैसे अपने गिरते मनोबल और हताशा को रोका जाये. अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने निराश-हताश भगवा शिविर में थोड़ी जान वापस डाली है. आडवाणी ने इसी बीच इस फैसले को देश की राष्ट्रीय अखंडता के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत बता डाला है. अब इस बात की पूरी संभावना है कि खोई हिम्मत जुटाकर भाजपा फिर से अपने समूचे 'निलंबित एजेंडा' का कपाट खोलेगी और अपने हिंदुत्व के अभियान में ईंधन डालेगी.
इस मामले में कानूनी गतिपथ अब सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज तक पहुंचेगा. यह देखना बाकी है कि सर्वोच्च न्यायालय किस हद तक कानून और न्याय के अनुरूप मामले को हल कर पाता है और देश की राजप्रणाली एवं गंगा-जमुनी संस्कृति को अयोध्या के बाद लगे ज़ख्म पर मरहम लगा पाता है जो ज़ख्म इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से गहरा और खतरनाक हो गया है. भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति एवं आधुनिक भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक दृष्टि, संघ ब्रिगेड द्वारा भारत को बहुसंख्यक-वर्चस्ववादी सोच के आधार पर पीछे की ओर धकेलने वाले षड्यंत्र को मात दे सके, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें पूरी कोशिश करनी होगी. अगर इस मुकाम पर अदालत के बाहर सुलह करने की संभावनाओं की तलाश की जाती है तो उस सुलह को तर्क और न्याय के बुनियादी उसूलों की कीमत पर नहीं किया जाना चाहिए.
भारत को आगे बढ़ना ही होगा इसी मकसद से तर्क-विरोधी और दकियानूसी शक्तियों को पीछे धकेलना होगा. 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' के बेहया पैरोकारों के साथ, जो तर्क और प्रगति की आवाजों को हर उपाय से खामोश करने की दुस्साहसिक कार्रवाई कर रहे हैं, उनके साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता.

(समकालीन जनमत से साभार; लेखक भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

टिप्पणी के लायक नहीं.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

हां…इतना सच्…इतना स्पष्ट और इतना तार्किक कि कुछ और कहे जाने की ज़रूरत नहीं…आपका आभार