Monday, January 21, 2013

शमशेर : कुछ निजी नोट्स - शुभा (अंतिम किस्त)


(पिछली दो कड़ियों से जारी)

शमशेर की कविता में गहरी आत्मीयता है। इस आत्मीयता के कारण उनके यहां प्रेम के अछूते चित्र और उमंग भरी कल्पना मौजूद है। सिकंदर पर लिखी उनकी एक अद्भुत कविता है। आर्यों के आने से पहले हिंदुस्तान के हमलावरों पर एक टिपण्णी के साथ वे कविता में हिंदुस्तान के बच्चों, सिकंदर, खीर, और रसमलाई का जो खुशनुमा रास रचाते हैं, उसमें हमलावर सिकंदर एक बड़े प्यारे मेहमान की तरह सामने आता है, जिसे बच्चे बड़े करीने से एक सबक़ भी देते हैं। बच्चों के गीत में कुछ यूनानी ध्वनियों के साथ वह एक समूह गान की रचना में शामिल होता है। इस समूह गान में लय के माध्यम से एक नृत्य की रचना भी शामिल है। सिकंदर को इस रूप में शमशेर ही देख सकते थे। शमशेर की कविता में बच्चों, स्त्रियों, मित्रों और मज़दूरों की प्रगाढ़ उपस्थिति है। इस उपस्थिति में संबंधों की मौलिक परिकल्पना मौजूद है। इस परिकल्पना में मानवीय संवेदना की जगह है, अपने से भिन्न को पहचानने की जगह है और सत्ता संबंधों का ढांचा इससे एक निश्चित दूरी पर रहता है। व्यक्तियों में शमशेर की दिलचस्पी उनकी आत्मीयता की आदत के कारण ख़ास है। उनकी कविता में सिकंदर, मदर टैरेसा से लेकर मुक्तिबोध तक अनके व्यक्ति-चरित्र ठोस रूप से मौजूद हैं। शमशेर ने व्यक्तियों पर जो कविताएं लिखीं, उनमें अज्ञेय, नागार्जुन, नेमिचंद्र जैन, रज़िया सज्जाद ज़हीर, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, भुवनेश्वर आदि शमशेर के साथ एक विशेष संबंध के साथ और अपने विशेष व्यक्तित्व के साथ मौजूद हैं। इन कविताओं में एक दौर के इतिहास की गूंजें मौजूद हैं। शमशेर की शोख़ी, छेड़ख़ानी और शरारत भी इन कविताओं में मौजूद है। अज्ञेय के जन्मदिन पर वे अज्ञेय को एक कविता भेंट करते हैं :


अज्ञेय- - एय
         तुम बड़े वो हो
         (क्या कहा मैंने)
         तुम बड़े वो हो
         (बड़े ध्येय)
         आधुनिक परिवेश में तुम
         बूर्ज़्वाज़ी का करुणतम व्यंग्य
         बहुत प्यारा सा
                        काव्य दक्षिण है तुम्हारा रूपाकार
                        कथा वाम (वामा)
                        कथा जो है अकथनीय
                        गेय जो अज्ञेय (ख़ूब)


और आख़िर में ये बिंब :
                            
                                 हाथी दांत के मीनार पर
                                 चांद का घोंसला


शमशेर मोटे विचाराधारात्मक विमर्श के बजाय एक वैकल्पिक मूल्य-व्यवस्था को सामने लाते हैं, जतन से बनाते हैं, जो उनकी पक्षधरता से मेल खाती है। यह चुनाव कविता के माध्यम के लिए उपयुक्त है और शमशेर की प्रकृति के अनुरूप है। शमशेर अपने समय की गुत्थियों को सत्ता संबंधों के बीच नहीं, अपने द्वारा रचे गये अपने इसी स्पेस में ले जाकर सुलझाते हैं।


शमशेर के क़रीब जाने का तरीक़ा वही सबसे अच्छा है जिस तरीक़े से वे ख़ुद किसी को भी अपनी कविता में लाते हैं। कविता में आने से पहले हर चीज़ उनके दिल से गुज़रती है। एक रचनात्मक एकांत उनका ठिकाना है। वे पोलिमिक्स को बाहर छोड़ देते हैं लेकिन पक्षधरता को नहीं। पक्षधरता की ज़मीन पर ही उनके रचनात्मक एकांत का सुहावना, उदास और जीवट भरा ठिकाना है।
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यह लेख `नया पथ- जुलाई-सितंबर-2011` अंक से साभार।
शुभा- 09896310916

3 comments:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त
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स्वप्नदर्शी said...

teeno kistein padhi, shukriya!

रणधीर सिंह सुमन said...

nice