Thursday, November 28, 2013

अपने से डरा हुआ बहुमत : असद ज़ैदी



क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बन्दगी में मिरा भला न हुआ (ग़ालिब)

नमरूद बाइबिल और क़ुरआन में वर्णित एक अत्याचारी शासक था जिसने ख़ुदाई का दावा किया और राज्याज्ञा जारी की कि अब से उसके अलावा किसी की मूर्ति नहीं पूजी जाएगी। पालन न करने वालों को क़त्ल कर दिया जाता था। नरेन्द्र मोदी ने, जिनके नाम और कारनामे सहज ही नमरूद की याद दिलाते हैं, अब अपने आप को भारत का प्रधानमंत्री चुन लिया है। बस इतनी सी कसर है कि भारत के अवाम अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी भारतीय जनता पार्टी को अगर स्पष्ट बहुमत नहीं तो सबसे ज़्यादा सीट जीतने वाला दल बना दें। इसके बाद क्या होगा यह अभी से तय है। पूरी स्क्रिप्ट लिखी ही जा चुकी है। इस भविष्य को पाने के लिए ज़रूरी कार्रवाइयों की तैयारी एक अरसे से जारी है । मुज़फ़्फ़रनगर में मुस्लिम जनता पर बर्बर हमला, हत्याएँ, बलात्कार, असाधारण क्रूरता की नुमाइश और बड़े पैमाने पर विस्थापन इस स्क्रिप्ट का आरंभिक अध्याय है। यह उस दस-साला खूनी अभियान का भी हिस्सा है जिसके ज़रिए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ हिन्दुस्तानी राज्य और समाज पर अपने दावे और आधिपत्य को बढ़ाती जा रही हैं।

यह आधिपत्य कहाँ तक जा पहुँचा है इसकी प्रत्यक्ष मिसालें देना ज़रूरी नहीं है -- क्योंकि जो देखना चाहते हैं देख ही सकते हैं -- पर जो परोक्ष में है और भी चिंताजनक है। मसलन, लेखक कवियों और कलाकारों के बीच विमर्श को जाँचिए, उस स्पर्धा और घमासान को देखिए जो हमेशा उनके बीच होता ही रहता है, हिन्दी के अध्यापकों से बात कीजिए, और मुज़फ़्फ़रनगर का ज़िक्र छेड़िये तो लगेगा मुज़फ़्फ़रनगर में शायद कोई मामूली वारदात हुई है जो होकर ख़त्म हो गई। जैसे किसी को मच्छर ने काट लिया हो! मुज़फ़्फ़रनगर की बग़ल में, दिल्ली में, बैठे हुए किसी को सुध नहीं कि पड़ोस में क्या हुआ था और हो रहा है, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल, पटना, चंडीगढ़ और शिमला का तो ज़िक्र ही क्या! इक्के दुक्के पत्रकारों, चंद कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों की को छोड़ दें तो किसी लेखक-कलाकार को वहाँ जाने की तौफ़ीक़ नहीं हुई। उनमें से एक शरणार्थी कैम्प तो दिल्ली की सीमा ही पर है। मात्र एक ज़िले में क़रीब एक लाख लोग अपने गाँवों और घरों से खदेड़ दिये गए, शायद अब कभी वहाँ लौट नहीं पाएँगे, उनके भविष्य में असुरक्षा और अंधकार के सिवा कुछ नहीं, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति साहित्य, कला, संस्कृति, पत्र-पत्रिका, अख़बार, सोशल मीडिया में सरसरी तौर से भी ठीक से दर्ज नहीं हो पा रही। ऐसे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और जो अब हो रहा है वो भी नहीं हो रहा!

मामला इतने पर ही नहीं रुकता। संघ परिवार, नरेन्द्र मोदी और भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह का इस प्रसंग से जैसे कोई वास्ता ही नहीं! मीडिया को उनका नामोल्लेख करना ग़ैर-जायज़ लगता है। मामले को ऐसे बयान किया गया कि यह सिर्फ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की चुनावी चाल थी जो उल्टी पड़ गई। अगर कोई कहता है कि कैसे मुज़फ़्फ़रनगर में गुजरात का प्रयोग विधिवत ढंग से दोहराया गया है, और इस वक़्त वहाँ की दबंग जातियाँ, पुलिस और काफ़ी हद तक प्रशासन मोदी-मय हो रहा है, और यह कि मुज़फ़्फ्ररनगर क्षेत्र में संघ परिवार बहुत दिन से ये कारनामा अंजाम देने की तैयारी कर रहा था, तो आम बौद्धिक कहने वाले की तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत दूर की कौड़ी लाया हो। हिन्दी इलाक़े के बौद्धिकों में -- जिनमें अपने को प्रगतिशील कहने वाले लोग भी कम नहीं हैं -- फ़ासिज़्म को इसी तरह देखा या अनदेखा किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के एक पुराने बुद्धिमान ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी पर ज़्यादा चर्चा से उसीका महत्व बढ़ता है; बेहतर हो कि हम मोदी को 'इगनोर' करना सीख लें। एक प्रकार से वह साहित्य की दुनिया में आज़माये फ़ार्मूले को राष्ट्रीय राजनीति पर लागू कर रहे थे। इतिहास में उन जैसे चिन्तकों ने पहले भी हिटलर और मुसोलिनी को 'इगनोर' करने की सलाह दी थी।

अगर यह नादानी या मासूमियत की दास्तान होती तो दूसरी बात होती। इसी तबक़े के लोगों ने यू आर अनंतमूर्ति प्रकरण में जिस मुस्तैदी और जोश से बहस में हिस्सा लिया वह कहाँ से आई? अनंतमूर्ति ने जब यह कहा कि वह ऐसे मुल्क में नहीं रहना चाहेंगे जहाँ मोदी जैसा आदमी प्रधानमंत्री हो, संघ परिवार द्वारा लोकतंत्र पर जैसी फ़ासीवादी चढ़ाई की तैयारी है, अगर वह सफल हो गई तो यह देश रहने लायक़ नहीं रह जाएगा, तो लगा जैसे क़हर बरपा हो गया! शायद ही वर्तमान या अतीत के किसी लोहियावादी को एक साथ संघ परिवार और हिन्दी के उदारमना मध्यममार्गी लोगों का ऐसा कोप झेलना पड़ा हो। अचानक साहित्य और पत्रकारिता के सारे देशभक्त जाग उठे और बुज़ुर्ग लेखक के 'देशद्रोह' की बेहूदा तरीक़े से निन्दा करने लगे। यह अनंतमूर्ति की वतनपरस्ती ही थी कि उन्होंने ऐसी बात कही। रंगे सियारों के मुँह से यह बात थोड़े ही निकलने वाली थी! कौन चाहेगा कि उसका वतन एक क़ातिल और मानवद्रोही के पंजे में आ जाए? क्या इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि हज़ारों, बल्कि लाखों बल्कि लोगों को, रोते और बिलबिलाते हुए, अपने वतन को अलविदा कहनी पड़ी? पिछली सदी में जर्मनी में और स्पेन में, और १९४७ के भारत में क्या हुआ था? हर तरह के फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक लोग क्या इसी को शुद्धिकरण और राष्ट्र-निर्माण का दर्जा नहीं देते थे? कुछ लोग तमाम जानकारी जुटा कर यह साबित करने पर तुल गए कि अनंतमूर्ति नाम का शख़्स कितना चतुर, अवसरवादी और चालबाज़ रहा है। मामला फ़ासिस्ट ख़तरे से फिसलकर एक असहमत आदमी के चरित्र विश्लेषण पर आ ठहरा। वे किसका पक्ष ले रहे थे? ऐसी ही दुर्भाग्पूर्ण ख़बरदारी वह थी जिसका निशाना मक़बूल फ़िदा हुसेन बने। कई बुद्धिजीवी और अख़बारों के सम्पादक हुसेन को देश से खदेड़े जाने और परदेस में भी उनको चैन न लेने देने के अभियान का हिस्सा बन गए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर पर ख़ामोशी और अनंतमूर्ति के मर्मभेदी बयान पर ऐसी वाचालता दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इससे यह पता चलता है कि ज़हर कितना अन्दर तक फैल चुका है। फ़ासिज्‍़म लोगों की भर्ती पैदल सैनिक के रूप में लुम्पेन तबक़े से ही नहीं, बीच और ऊपर के दर्जों से भी करता है। उसका एक छोटा दरवाज़ा बायें बाज़ू के इच्छुकों के लिए भी खुला होता है। कुछ साल के अन्तराल से आप किसी पुराने दोस्त और हमख़याल से मिलते हैं तो पता चलता है वह बस हमज़बान है, हमख़याल नहीं। आपका दिल टूटता है, ज़मीन आपके पैरों के नीचे से खिसकती लगती है, अपनी ही होशमन्दी पर शक होने लगता है। वैचारिक बदलाव ऐसे ही चुपके से आते हैं। बेशक इनके पीछे परिस्थितियों का दबाव भी होता है, पर यही दबाव प्रतिरोध के विकल्प को भी तो सामने कर सकता है। ऐसा नहीं होता नज़र आता इसकी वजह है बहुमत का डर और वाम-प्रतिरोध की परंपरा का क्षय। मेरी नज़र में जब लोग लोकतंत्र के मूल्यों की जगह बहुमतवाद के सिद्धान्त को ही सर्वोपरि मानने लगें, और राजनीति-समाज-दैनिक जीवन सब जगह उसी की संप्रभुता को स्वीकार कर लें, बहुमतवाद के पक्ष में न होकर भी उसके आतंक में रहने लगें, अपने को अल्पमत और अन्य को अचल बहुमत की तरह देखने लगें और ख़ुद अपने विचारों और प्रतिबद्धताओं के साथ नाइन्साफ़ी करने लगें तो अंत में यह नौबत आ जाती है कि बहुमत के लोग ही बहुमत से डरने लगते हैं। बहुमत ख़ुद से डरने लगता है।आज हिन्दुस्तान का लिबरल हिन्दू अपने ही से डरा हुआ है, उसे बाहर या भीतर के वास्तविक या काल्पनिक शत्रु की ज़रूरत नहीं रही। फ़ासिज़्म का रास्ता इसी तरह बना है, इसी से फ़ासीवादियों की ताक़त बढ़ी है। यह वह माहौल है जिसमें प्रगतिशील आदमी भी सच्ची बात कहने से घबराने लगता है, साफ़दिल लोग भी एक दूसरे से कन्नी काटने लगते हैं। बाक़ी अक़्लमंदों का तो कहना ही क्या, उनके भीतर छिपा सौदागर कमाई का मौक़ा भाँपकर सामने आ जाता है और अपनी प्रतिभा दिखाने लगता है। अक़लमंद लोग अपनी कायरता को भी फ़ायदे के यंत्र में बदल लेते हैं।

१९८९ के बाद पंद्रह बीस साल ऐसे आए थे जब भारत का मुख्यधारा का वाम (संसदीय वामपंथ ) यह कहता पाया जाता था कि दुनिया भर में समाजवादी राज्य-व्यवस्थाएँ टूट रही हैं, कुछ बिल्कुल मिट चुकी हैं लेकिन हिन्दुस्तान में वाम की शक्ति घटी नहीं बल्कि इसी दौर में उत्तरोत्तर बढ़ी है। वाम संगठनों की सदस्यता में इज़ाफ़ा हुआ है और यह इसका प्रमाण है कि वाम दलों की नीतियाँ सही हैं, और यह कि हमारी वाम समझ ज़्यादा परिपक्व, ज़मीनी और पायेदार है। बूर्ज्वा पार्टियों का दिवालियापन अब ज़ाहिर होने लगा है। इस सूत्र को इसी दौर की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति से मिलाकर देखें तो पता चलता है कि वाम के एक हिस्से ने अपने लिए कितनी बड़ी मरीचिका रच ली थी, और यथार्थ के प्रतिकूल पक्ष की अनदेखी करना सीख लिया था। वाम दलों ने अपनी बनाई मरीचिका में फँसकर अपने ही हौसले पस्त कर लिए हैं। इसी दौर में संघ परिवार की ख़ूनी रथयात्राएँ और सामाजिक अभियान शुरू हुए जिनकी परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस और मुम्बई और सूरत के नरसंहारों में हुई। यह दौर हिन्दुत्व के राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय तथ्य बनने का है, पहले खाड़ी युद्ध के साथ पश्चिम एशिया पर अमरीकी साम्राज्य के हमलों का है, और भारत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के आत्मसमर्पण का है। इसी दौर में भारत स्वाधीन नीति छोड़कर अमरीका का मातहत और इज़राइल का दोस्त हुआ। इसी दौर में बंगाल की लम्बे अरसे से चली आ रही वाम मोर्चा सरकार ने अवाम के एक हिस्से का समर्थन खो दिया क्योंकि वाम सरकार और वाम पार्टियों के व्यवहार में वाम और ग़ैर-वाम का फ़र्क़ ही नज़र आना बंद हो गया था। यही दौर मोदी की देखरेख में गुजरात में सन २००२ का ऐतिहासिक नरसंहार सम्पन्न हुआ जिसमें राजसत्ता के सभी अंगों ने अभूतपूर्व तालमेल का परिचय दिया और भारत में भावी फ़ासिज़्म क्या शक्ल लेगा इसकी झाँकी दिखाई। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, निजीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण के तहत इसी हिन्दू फ़ासिस्ट मॉडल को विकास के अनुकरणीय आदर्श की तरह पेश किया जाता रहा है।

आज हिन्दुस्तान में संसाधनों की कारपोरेट लूट लूट नहीं राजकीय नीति के संरक्षण में क्रियान्वित की जाने वाली हथियारबंद व्यवस्था है। भारतीय राज्य का राष्ट्रवाद अवामी नहीं, दमनकारी पुलिसिया राष्ट्रवाद है, अर्धसैनिक और सैनिक ताक़त पर आश्रित राष्ट्रवाद है। यह अपनी ही जनता के विरुद्ध खड़ा राष्ट्रवाद है। वैसे तो सर्वत्र लेकिन उत्तरपूर्व, छत्तीसगढ़ और कश्मीर में सुबहो-शाम इसका असल रूप देखा जा सकता है। आर्थिक नीति, सैन्यीकृत राष्ट्रवाद और शासन-व्यवस्था के मामलों में कांग्रेस और भाजपा में कोई अन्तर नहीं है। फ़ासिज्‍़म के उभार में इमरजेम्सी के ज़माने से ही दोनों का साझा रहा है। हिन्दुस्तान में फ़ासिज़्म के उभार का पिछली सदी में उभरे योरोपीय फ़ासिज़्म से काफ़ी साम्य है। जर्मन नात्सीवाद के नक़्शे क़दम पर चल रहा है। वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा । बड़ा फ़र्क़ बस यह है कि भारतीय मीडिया और मध्यवर्ग इसी चीज़ को छिपाने में जी-जान से लगा है। फ़ासिज़्म फ़ासिज़्म न होकर कभी विकास हो जाता है कभी दंगा, गुजरात का नस्ली सफ़ाया गोधरा कांड की प्रतिक्रिया हो जाता है, मुज़फ़्फ़रनगर की व्यापक हिंसा जाट-मुस्लिम समुदायों की आपसी रंजिश का नतीजा या कवाल कांड की प्रतिक्रिया बन जाती है। हमारे बुद्धिजीवी विषयांतर में अपनी महारत दिखाकर इस फ़ासिज़्म को मज़बूत बनाए दे रहे हैं।

इस दुष्चक्र को तोड़ने का एक ही तरीक़ा है इन ताक़तों से सीधा सामना, हर स्तर पर सामना। और समय रहते हुए सामना। अपने रोज़मर्रा में हर जगह हस्तक्षेप के मूल्य को पहचानना। ऐसी सक्रिय नागरिकता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है आज व्यवस्था के सताये हुए अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई), दलित और आदिवासी के साथ मज़बूती से खड़े होने की। अगर वाम शक्तियाँ और ग़ैर-दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी वर्ग प्रतिबद्धता से यह कर सकें तो फ़ासिज़्म की इमारतें हिल जाएँगी और उनके आधे मन्सूबे धरे रह जाएँगे। इस समय ज़रूरत है फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ व्यापक वाम और अवामी एकता की -- अगर यह एकता राजनीतिक शऊर और ज़मीर से समझौते की माँग करे तो भी। बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी का काम इससे बाहर नहीं है।
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 `प्रभात खबर` दीवाली विशेषांक से साभार

Monday, November 18, 2013

मुज़फ़्फ़रनगर के ओमप्रकाश वाल्मीकि


ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ़्फ़रनगर जिले के थे और इस तरह एक चलन की तरह मैं कह सकता हूं कि यह मेरी निजी क्षति है। कहने को मुज़फ़्फ़रनगर की `साहित्यिक?` संस्थाएं भी ऐसे बयान अखबारों के लोकल पन्नों पर छपवा सकती हैं कि यह उनकी और मुज़फ़्फ़रनगर की `अपूर्णीय क्षति` है। लेकिन, सच यह है कि वे दिल्ली-देहरादून राजमार्ग पर मुज़फ़्फ़रनगर जिला मुख्यालय के पास ही स्थित बरला गांव में पले-बढ़े होने के बावजूद न मुज़फ़्फ़रनगर के ताकतवर सामाजिक-सांस्कृतिक मिजाज का प्रतिनिधित्व करते थे और न खुद को साहित्य-संस्कृति की संस्था कहने वाले स्थानीय सवर्ण नेतृत्व वाले जमावड़ों का। ऊपर से कोई कुछ भी कहे, इन संस्थाओं के हालचाल, इनकी नातियों, एजेंडों और इनकी किताबों को देखते ही पता चल जाएगा कि वाल्मीकि जी बचपन के प्राइमरी स्कूल के त्यागी मास्टर की तरह इनके लिए भी `अबे चूहडे के` ही बने रहे। जिन संस्थाओं ने कवि सम्मेलनों के मंच पर ज़िंदगी भर अश्लील-फूहड़ चुटकुलेबाजी करने वाले सत्यदेव शास्त्री भोंपू को हास्यारसावतार बताकर उसकी पालकी ढ़ोई हो और जहां कभी जाति, वर्ग और दूसरे यथार्थवादी सवालों पर बहस आते ही इस्तीफों और निष्कासन की नौबत आ जाती हो, जिन संस्थाओं की सालाना किताबें फूहड़ ब्राह्मणवादी, स्त्री विरोधी और उन्मादी और दक्षिणपंथी सामग्री से भरी रहती हों, वहां वाल्मीकि जी को आयकन होना भी नहीं चाहिए था।

लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि से परिचय से पहले स्कूली दिनों मैंने शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा `अक्करमाशी` के बारे में किसी अखबार के इतवारी पन्ने पर पढ़ा था और किसी तरह दिल्ली पहुंचकर यह किताब हासिल भी कर ली थी। इस किताब ने दिल-दिमाग में तूफान खड़ा कर दिया था। जूठन चूंकि अपने ही आसपास की `कहानी` थी, उसे पढ़ने पर बेचैनी और ज्यादा बढ़ जाना स्वाभाविक था। मैंने कई लोगों को बड़ी बेशर्मी से यह कहते भी सुना कि मेलोड़्रामा पैदा कर किताब बेचने का यह बढ़िया तरीका है। इनमें एक सज्जन गाहे-बगाहे दलितों के प्रति भावभीने उद्गार सुनाने में प्रवीण थे। मैंने कहा कि कौन नहीं जानता कि इसमें लिखा एक-एक शब्द सही है और गांव का नाम बदलने और मास्टर से पहले त्यागी की जगह जाट, राजपूत वगैरहा ऐसा कोई दूसरा `ताकतवर शब्द` जोड़ देने से भी उतना ही सही रहता है।

1992 के बाद के किसी साल वाल्मीकि जी मुज़फ़्फ़रनगर के लेखकों के पास रुके होंगे। मुझे अगले दिन `अमर उजाला` में पहुंची `वाणी` नाम की एक संस्था की प्रेस विज्ञप्ति से यह पता चला। उन्होंने गोष्ठी में क्या कहा, स्थानीय लेखकों से उनकी क्या बातचीत हुई, इस बारे में विज्ञप्ति में कोई शब्द नहीं था। मैंने उनके कार्यक्रम की कोई पूर्व सूचना न देने और विज्ञप्ति में उनकी कही बातों का जिक्र तक न होने पर नाराजगी जताई तो वाणी के एक जिम्मेदार पदाधिकारी ने बताया कि वे तो बस यूं ही आए थे, मुलाकात हुई, कुछ बातें हुईं। पिछले साल इसी संस्था की सालाना किताब के संपादन की जिम्मेदारी एक दलित युवक को दी गई थी जिसने `समन्वय` उनवान को सार्थक बनाने के लिए पूरा समर्पण कर रखा था। तो भी संस्था के सवर्ण संचालकों को जाने क्या नागवार गुजरा कि इस बरस शर्त बना दी गई कि रचनाएं शोधपरक न हों और सद्भाव बिगाड़ने वाली न हों। तो मुझे लगता है कि उस दिन बाल्मीकि जी की बातें `सद्भाव की हिफाजत` करने के लिहाज से ही जारी नहीं की गई होंगी।

मेरे लिए ओमप्रकाश वाल्मीकि की `जूठन` मेरे `घर` के यथार्थ को सामने रखने वाली किताब थी और वे इस जिले की उन हस्तियों की तरह मेरे लिए गौरव की वजह थे जिन्हें मुख्यधारा या तो भुलाए रखती है या याद भी करती है तो इस तरह कि उनकी ज़िंदगी और उनके कामों के जिक्र से कथित सद्भाव में कोई खलल न पड़े। वाल्मीकि जी ने कई उल्लेखनीय कविताएं और कहानियां लिखीं पर `जूठन` के साथ कुछ ऐसा रहा कि वह मेरे पास कभी नहीं रह सकी। मैं इस किताब को हमेशा किसी को पढ़ने के लिए देता रहा और मौका लगते ही फिर-फिर खरीदता रहा। `अमर उजाला` ने करनाल भेज दिया तो वहां रंगकर्मी युवक अमित नागपाल ने `जूठन` के कुछ हिस्सों की अनेक बार एकल प्रस्तुति दी। तरह-तरह के तर्क देकर इस मंचन को रोकने की कोशिशें बार-बार की गईं। युवा महोत्सव में यह तर्क दिया गया कि एक अकेले कलाकार की प्रस्तुति को सामूहिकता दर्शाने वाले कार्यक्रम में नहीं होना चाहिए। कॉलेजों के ऐसे जाहिल और धूर्त मास्टरों-`कला-संरक्षकों` को उनकी असल चिढ़ का कारण बताकर हम लोगों ने हमेशा चुप भी कराया।

संयोग से वाल्मीकि जी से एकमात्र मुलाकात कुछ बरस पहले रोहतक में एक सेमिनार में हुई थी। उनकी कई बातों से मैं सहमत नहीं था बल्कि कई बातों से हैरान था। सीपीआईएम से जुड़े लोगों और बहुजन समाजवादी पार्टी से जुड़े एक अध्यापक व उनके कार्यकर्ताओं के रवैये से सेमिनार में सवाल-जवाब का मौका भी नहीं मिल सका। मैं उनसे फिर कभी मिलकर विस्तार से बहुत सारी बातें करना चाहता था। उन्हें लम्बे समय से पसंद करने की अपनी वजहें एक आम कस्बाई पाठक की तरह बताना चाहता था और उनसे अपनी असहमतियों और सामने खड़े खतरों पर चर्चा करना चाहता था। इन दिनों जबकि मुज़फ़्फ़रनगर उन्हीं मनुवादी ताकतों की साम्प्रदायिक चालों का शिकार हो रहा हो, जिनके खिलाफ संघर्ष से उनका लेखन निकला था, ये बातें और भी ज्यादा जरूरी लग रही थीं। मुझे उम्मीद थी कि वे ठीक होकर फिर से सक्रिय होंगे।

`जनसंदेश टाइम्स` अखबार में आज 18 नवंबर को प्रकाशित।
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और मुज़फ़्फ़रनगर के ही रहने वाले कवि-मित्र परमेंद्र सिंह की फेसबुक पर इस पोस्ट पर आई टिपण्णी के बिना ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुज़फ़्फ़रनगर के साहित्यिक समाज के रिश्ते की यह गाथा अधूरी रह जाती। इसलिए वह टिपण्णी यहां भी साझा कर रहा हूं-`ओमप्रकाश वाल्मीकि का निधन एक बहुत बड़ी क्षति है पूरे हिंदी समाज के लिए. जहाँ तक मुज़फ्फरनगर से उनके सम्बन्ध का सवाल है, तो मुज़फ़्फ़रनगर की साहित्यिक संस्थाएं जिस तरह से अन्य मूर्धन्यों का नाम लेकर आत्मगौरव के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करती रही हैं, करती रहेंगी. ओमप्रकाश वाल्मीकि मुज़फ्फरनगर आये थे 'वाणी' संस्था के वार्षिक संकलन 'तारतम्य' (सम्पादक - नेमपाल प्रजापति) के विमोचन के लिए. समारोह में उनके वक्तव्य में प्रसाद, प्रेमचंद, पन्त पर की गयीं उनकी टिप्पणियों से अग्रिम पंक्ति में बैठे डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागों के अध्यक्ष, रीडर, प्रोफेसर वगैरह जिन्होंने साहित्यकार होने का सर्टिफिकेट देने का ठेका उठा रखा ही, कैसे उछल-उछल पड़े थे तिलमिलाकर, देखते ही बनता था. प्रोफेसर साहिबान के कुछ शिष्यों ने तो बाकायदा नारेबाजी तक की थी. हम कुछ लोगों ने मिलकर उन उपद्रवी शिष्यों पर बामुश्किल काबू पाया था. उक्त संकलन में शामिल किया गया 'दलित खंड' ही दरअसल में उन लोगों की आँख की किरकिरी बन गया था, और बना भी रहा... हमारा यह प्रतिरोध बना रहा और अंततः हम तीन मित्रों ने उस संस्था से किनारा कर लिया... खैर, उस गोष्ठी के बाद भाई Ashwani Khandelwal के घर पर 'प्रोफेसरों के साथ चाय पर भी बड़ी गरमा-गरम बहस हुई... एक प्रोफेसर ने अंत में कहा - दलितों को बराबरी का दर्जा देते हुए हमारे संस्कार आड़े आते हैं.`

Friday, November 15, 2013

ख्वाजादास के पद वाया मृत्युंजय



पिछले कुछ दिनों से वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी पर महाकवि ख्वाजादास की कृपा बनी हुई है। खुशी की बात यह है कि अब वे हमारे एक और बेहतरीन हिंदी कवि मृत्युंजय पर भी नाजिल हुए हैं। उन्होंने जो फरमाया, वह मृत्युंजय भाई की ही जुबानी-
 


[ख्वाजादास से असद जी ज़ैदी साहब ने तआररूफ़ करवाया था। असद जी की साखी पर मुझ नाचीज पर भी उनकी अहेतुक कृपा बरसी।]

[क]
सुबकत-अफनत ख्वाजादास !
नैहर-सासुर दोनों छूटा टूटी निर्गुनिये से आस
लतफत लोर हकासल चोला बीच करेजे अटकी फांस
गगने-पवने, माटी-पानी, अगिन काहु पर नहिं बिस्वास
थहकल गोड़ रीढ़ पर हमला जुद्धभूमि में उखड़ी  सांस  
सुन्न सिखर पर जख्म हरियरा फूलन लागे चहुंदिस बांस 
जेतने संगी सब मतिभंगी नुचड़ी-चिथड़ी दिखे उजास
बिरिछे बिरिछे टंगी चतुर्दिक फरहादो शीरीं की लाश

[ख]
ख्वाजादास पिया नहिं बहुरे !
नैनन नीर न जीव ठेकाने कथा फेरु नहिं कहु रे
यह रणभूमि नित्यप्रति खांडा गर्दन पे लपकहु रे 
ज़ोर जुलुम तन-मन-धन लूटत, जेठे कभु कभु लहुरे
कवन राहि तुम बिन अवगाहों खाय मरो अब महुरे
जहर तीर बेधत हैं तन-मन अगिन कांट करकहु रे
तुम्हरी आस फूल गूलर कै मन हरिना डरपहु रे
नाहिं कछू, हम कटि-लड़ि मरबों पाछे जनि आवहु रे

[ग]
ख्वाजा का पियवा रूठा रे !
भीतर धधकत मुंह नहिं खोलत दुबिधा परा अनूठा रे
आवहु सखि मिलि गेह सँभारो गुरु के छपरा टूटा रे
कोही कूर कुचाली कादर कुटिल कलंकी लूटा रे  
जप तप जोग समाधि हकीकी इश्क कोलाहल झूठा रे
पछिम दिसा से चक्रवात घट-पट-पनघट सब छूटा रे
मन महजिद पे मूसर धमकत राई-रत्ता कूटा रे   
सहमा-सिकुड़ा-डरा देस का पत्ता, बूटा-बूटा रे  

[घ]
ख्वाजा, संत बजार गये !
बधना असनी रेहल माला सब कुछ यहीं उतार गये
जतन से ओढ़ी धवल कामरी कचड़ा बीच लबार गये 
जनम करम की नासी सब गति करने को व्योपार गये
छोड़ि संग लकुटी-कामरि को हाथ लिये ज्योनार गये
नेम पेम जप जोग ज्ञान सब झोंकि आगि पतवार गये
हड़बड़ तड़बड़ लंगटा-लोटा बीच गली में डार गये
नये राज की नयी नीत के सिजदे को दरबार गये
 
[ङ]
ख्वाजा कहा होय अफनाये !
राजनीति बिष बेल लहालह धरम क दूध पियाये
देवल महजिद पण्य छापरी पंडित - मुल्ला छाये
सतचितसंवेदन पजारि के कुबुधि फसल उपजाये
देस पीर की झोरी - चादर साखा मृग नोचवाये
मन भीतर सौ-सौ तहखाना घृणा प्रपंच रचाये
दुरदिन दमन दुक्ख दरवाजे दंभिन राज बनाये
सांवर सखी संग हम रन में जो हो सो हो जाये

(ऊपर पेटिंग जाने-माने चित्रकार मनजीत बावा की है।)

Saturday, November 2, 2013

सुधीश पचौरी की उत्तर आधुनिक बेशर्मी



वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल कैंसर से जूझ रहे हैं, पूरी ज़िंदादिली के साथ। उनके दोस्तों और उन्हें चाहने वालों ने अपने इस प्यारे कवि को पिछले दिनों एक कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली बुलाया था। जाने क्यों यह बात सुधीश पचौरी को हज़म नहीं हुई और उन्होंने `हिन्दुस्तान` अख़बार में में वमन कर डाला। जनवाद के नाम पर मलाई चाटने के बाद वक़्त बदलते ही `आधुनिक-उत्तर आधुनिक` होकर वामपंथ को कोसने और हर बेशर्मी को जायज ठहराने के धंधे में जुटे शख्स की ऐसी घिनौनी हरकत पर हैरानी भी नहीं है। `समयांतर` के `दिल्ली मेल` स्तंभ में इस बारे में एक तीखी टिपण्णी छपी है जिसे यहां साझा किया जा रहा है। 


शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता
पहले यह टिप्पणी देख लीजिए:
''एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब 'फेस रीडिंग` है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर) हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं। लेकिन 'चमचई` में ऐसे सवाल पूछना मना है।``
यह टुकड़ा 'ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!` शीर्षक व्यंग्य का हिस्सा है जो दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को छपा था। इस व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति को निशाना बनाता है जो एक दुर्दांत बीमारी से लड़ रहा है। हिंदी के अधिकांश लोग जानते हैं कि वह कौन व्यक्ति है। दुनिया में शायद ही कोई लेखक हो जो बीमार पर व्यंग्य करने की इस तरह की निर्ममता, रुग्ण मानसिकता और कमीनापन दिखाने की हिम्मत कर सकता हो।
पर यह कुकर्म सुधीश पचौरी ने किया है जिसे अखबार 'हिंदी साहित्यकार` बतलाता है। हिंदीवाले जानते हैं यह व्यक्ति खुरचनिया व्यंग्यकार है जिसकी कॉलमिस्टी संबंधों और चाटुकारिता के बल पर चलती है।
इस व्यंग्य में उस गोष्ठी का संदर्भ है जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन जन कवि वीरेन डंगवाल को लेकर दिल्ली में अगस्त में हुई थी। वह निजी व्यवहार के कारण भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि कवि के रूप में। वीरेन उन साहसी लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी बीमारी के बारे में छिपाया नहीं है। वह कैंसर से पीडि़त हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। पिछले ही माह उनका आपरेशन भी हुआ है।
हम व्यंग्य के नाम पर इस तरह की अमानवीयता की भत्र्सना करते हैं और हिंदी समाज से भी अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की, जो आजीवन अध्यापक रहा हैनिंदा करने से चूके। यह सोचकर भी हमारी आत्मा कांपती है कि यह अपने छात्रों को क्या पढ़ाता होगा। हम उस अखबार यानी हिंदुस्तान और उसके संपादक की भी निंदा करते हैं जिसने यह व्यंग्य बिना सोचे-समझे छपने दिया। हम मांग करते हैं कि अखबार इस घटियापन के लिए तत्काल माफी मांगे और इस स्तंभ को बंद करे।
पर कवि वीरेन डंगवाल पर यह अक्टूबर में हुआ दूसरा हमला था। ऐन उसी दिन जनसत्ता में 'पुरस्कार लोलुप समय में` शीर्षक लेख छपा और उसमें अकारण वीरेन को घसीटा गया कि उन्हें किस गलत तरीके से साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। लेखक यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि वह इसके लायक नहीं थे। पर अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी जैसे अवसरवादियों को यह पुरस्कार क्यों और किस तरह मिला इस पर कोई बात नहीं की गई(क्योंकि वे अकादेमी के सदस्य हैं) पर सबसे विचित्र बात यह है कि इस लेख के लेखक ने यह नहीं बतलाया कि साहित्य अकादेमी के इतिहास में अब तक का सबसे भ्रष्ट पुरस्कार अगर किसी को मिला है तो वह उदय प्रकाश को मिला है जो तत्कालीन उपाध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कारण दिया गया। यह पुरस्कार यही नहीं कि रातों-रात एक खराब कहानी को उपन्यास बनाकर दिया गया बल्कि इसे लेने के लिए गोरखपुर के हिंदू फासिस्ट नेता आदित्यनाथ के दबाव का भी इस्तेमाल किया गया।
इस के दो कारण हो सकते हैं। पहला वामपंथियों पर किसी किसी बहाने आक्रमण करना और दूसरा लेखक ही नहीं बल्कि अखबार का संपादक भी अकादेमी के टुकड़ों से लाभान्वित होता रहता है और अगले चार वर्षों तक होता रहेगा।
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समयांतर के नवंबर, 2013 अंक से साभार


(इस बारे में HT media ltd की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को पत्र मेल कर भेजकर विरोेध भी जताया गया था।)