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Monday, October 19, 2015

नफ़रत की संस्कृति का विरोध ज़िंदगी की पहचान है : लाल्टू






देश भर में तकरीबन पचीस साहित्यकारों ने अपने अर्जित पुरस्कार लौटाते हुए मौजूदा हालात पर अपनी चिंता दिखलाई है। जब सबसे पहले हिंदी के कथाकार उदय प्रकाश ने पुरस्कार लौटाया तो यह चर्चा शुरू हुई कि इसका क्या मतलब है। क्या एक लेखक महज सुर्खियों में रहने के लिए ऐसा कर रहा है। और दीगर पेशों की तरह अदब की दुनिया में भी तरह-तरह की स्पर्धा और ईर्ष्या हैं। इसलिए हर तरह के कयास सामने आ रहे थे। उस वक्त भी ऐसा लगता था कि अगर देश के सभी रचनाकार सामूहिक रूप से कोई वक्तव्य दें तो उसका कोई मतलब बन सकता है, पर अकेले एक लेखक के ऐसा करने का कोई खास तात्पर्य नहीं है। अब जब इतने लोगों ने पुरस्कार लौटाए हैं, यह चर्चा तो रुकी नहीं है कि सचमुच ऐसे विरोध से कुछ निकला है या नहीं, पर साहित्यकारों को अपने मकसद में इतनी कामयाबी तो मिली है कि केंद्रीय संस्कृति मंत्री सार्वजनिक रूप से अपनी बौखलाहट दिखला गए। तो क्या ये अदीब बस इतना भर चाहते थे या इसके पीछे कोई और भी बात है।

आम तौर से कई अच्छे रचनाकार सीधे-सीधे ऐसा कोई कदम लेने से कतराते हैं जिसमें सियासत की बू आती हो। खास तौर पर साहित्य अकादमी जैसी संस्था को जो स्वायत्तता मिली हुई है, उसे बनाए रखना और राजनीति से उसे दूर रखना ज़रूरी है। पर सियासत की जैसी समझ अदब की दुनिया के लोगों को होती है, वैसी आम लोगों में नहीं होती। सियासत में उतार-चढ़ाव से इंसानी रिश्तों में कैसे फेरबदल आते हैं, इसकी समझ किसी भी अच्छी साहित्यिक कृति को पढ़ने से मिल सकती है। यहाँ तक कि प्राचीन महाकाव्यों में भी यही खासीयत होती थी कि उनमें समकालीन सियासी दाँव-पेंच के बीच पिसते इंसानियत की तस्वीर होती थी। महाभारत को तो इसका आदर्श माना जा सकता है। इसलिए जब इतने सारे अदीब एक साथ ऐसा कदम ले रहे हैं तो वह महज सुर्खियों में रहने के लिए उठाया गया कदम नहीं है। जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने नाइट की उपाधि वापस कर दी थी तो वह एक ऐतिहासिक कदम था। कुछ ऐसा ही आज के साहित्यकार कर रहे हैं। कोई कह सकता है कि रवींद्र तो जालियाँवाला बाग हत्याकंड के विरोध में ऐसा कर रहे थे। क्या ऐसा कुछ हुआ है जिसे उस हत्याकांड के बराबर माना जा सकता है? यह वाजिब सवाल है और इसका जवाब यह है कि हाँ, आज ऐसा ही एक ऐतिहासिक समय है। मुजफ्फरनगर से लेकर दादरी तक हमारे सामने एक के बाद एक भयंकर घटनाएँ होती जा रही हैं। चुनावों में बुनियादी समस्याओं की जगह इस पर बात होती है कि आप का खान-पान क्या है। राजनैतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं में भाषा से लेकर व्यवहार के हर पहलू में हिंसा बढ़ती जा रही है। अदीब इस बात को समझ रहे हैं कि उनकी ऐतिहासिक भूमिका है कि वे इस देश को तबाह होने से बचाएँ।

एक सामान्य किसान या कामगार को भड़काना आसान होता है। देश, धर्म, जाति आदि कई हथियार हैं जिनसे एक आम आदमी को उसके शांत सामान्य जीवन से भटकाकर उसे हत्यारी संस्कृति में धकेल देना संभव है। ऐसा होता रहा है। जब तक यह सीमित स्तर तक होता है, उदारवादी लोग इसे दूर से देखते हैं और कुछ कह सुनकर बैठ जाते हैं। हमारे ज्यादातर लेखक कवि ऐसे ही हैं। पर जब बात यहाँ तक आ जाती है कि आस-पास समूची इंसानियत खतरे में दिखती हो तो यह लाजिम है कि साहित्यकारों को सोचना पड़े। सही है, 1984 में सब ने पुरस्कार नहीं लौटाए, 2002 में भी नहीं लौटाए। यह पुरस्कृत रचनाकारों की सीमा थी। शायद तब इतना साहस नहीं था जितना आज वे दिखला पा रहे हैं। यह भी है कि इनमें से अधिकतर को तब पुरस्कार मिले नहीं थे। वे इसे अलग-अलग तर्क देकर ठीक ठहराते होंगे। पर ये बातें कोई मायना नहीं रखतीं। आज सांप्रदायिक ताकतों का राक्षस हर अमनपसंद इंसान को निगलता आ रहा है। ऐसे में हमारे अदीब उठ खड़े हुए हैं और उन्होंने अपनी ऐतिहासिक भूमिका को समझा है, यह महत्वपूर्ण बात है।

जो लोग भाजपा के समर्थक हैं या जो संघ परिवार की गतिविधियों को देश के हित में मानते हैं, उन्हें तकलीफ होती है कि उनके विरोध में इतनी आवाजें उठ रही हैं। कल्पना करें कि अफ्रीका के किसी मुल्क में बिना किसी तख्तापलट के देश के गृह मंत्री को अल्पसंख्यकों का कत्लेआम करवाने के लिए सज़ा--मौत हो जाती है। ऊपर की अदालत इसे आजीवन कारावास में बदल देता है और देश की सरकार कुछ वक्त तक अपने ही मंत्री को मृत्युदंड देने के लिए अदालत में पैरवी करती है। इस सरकार के साथ काम कर रहे पुलिस प्रमुख और दीगर अधिकारियों को फर्जी मुठभेड़ों के लिए कई सालों की कैद होती है। हमारी नस्लवादी सोच के लोग यही कहेंगे कि अरे ये अफ्रीकी ऐसे ही होते हैं, साले मारकाट करते रहते हैं। यही बात जब आज़ादी के बाद पहली बार हमारे देश में एक राज्य की सरकार के साथ होता है, और हमें कुछ भी ग़लत नहीं लगता तो यह गहरी चिंता की बात है। उल्टे सांप्रदायिक नफ़रत की संस्कृति बढ़ती चली है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि देश की सारी समस्याएँ अल्पसंख्यकों की वजह से हैं, जो कुल जनसंख्या का पाँचवाँ हिस्सा हैं। विज्ञान और तर्कशीलता से दूर पोंगापंथी सोच को लगातार बढ़ाया जा रहा है। रचनाकारों का विरोध संघ परिवार के साथ जुड़े काडर को और आम लोगों को यह सोचने को मजबूर करेगा कि क्या वे सही रास्ते पर हैं।

आज़ादी के बाद पहली बार हम ऐसी स्थिति में हैं कि पाकिस्तान जैसे ग़लत माने जाने वाली विचारधारा के मुल्क के लोग खुद को हमारे नागरिकों से बेहतर मान सकते हैं। न केवल दानिशमंद अदीबों की हत्याएँ हुई हैं, महज इस अफवाह पर कि एक जानवर को मारा गया है, एक इंसान का कत्ल हुआ। बेशक गाय महज जानवर नहीं है, इसके साथ आस्थाएँ जुड़ी हुई हैं, पर जब भीड़ कानून को अपने हाथ ले लेती है और यह आम बात बनती जा रही है तो सोचना लाजिम है कि हम कहाँ जा रहे हैं। ऐसी घटनाओं पर जो भी कारवाई हो रही है, उस पर किसी को यकीन नहीं है। सरकार पर आम आदमी का कोई भरोसा नहीं रह गया है। ऐसे में अगर पढ़ने लिखने वाले लोग विरोध के तरीके न ढूँढें तो कोई उन्हें ज़िंदा कैसे कहे! सृजन बाद में आता है, पहले तो जीवन है। नफ़रत और हत्या की संस्कृति का विरोध ज़िंदगी की पहचान है। इसलिए हमारे अदीब विरोध में सामने आ रहे हैं। 1905 में बंगभंग के विरोध में रवींद्रनाथ साथी रचनाकारों के साथ सड़क पर उतर आए थे। बंगाल की अखंडता को लेकर तब उन्होंने कविताएँ और गीत लिखे थे जो आज तक पढ़े गाए जाते हैं। आज वक्त है कि हमारे कवि लेखकों को सड़क पर उतरना होगा। लोगों तक संवेदना के जरिए यह पैगाम ले जाना होगा कि इंसानियत को बचाए रखना है। विविधताओं भरी हमारी साझी विरासत को बचाए रखना है। तर्कशील तरक्कीपसंद भारत को बचाए रखना है।

कवि की यह तस्वीर सतीश कुमार ने रोहतक में क्लिक की थी।
(यह लेख दैनिक भास्कर के `रसरंग` में प्रकाशित हो चुका है।)

Sunday, October 5, 2014

रामचंद्र गुहा की प्रॉब्लम क्या है?


रामचंद्र गुहा के बेसिक्स में ही कोई प्रॉब्लम है या एक सधी हुई चतुरता। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के नागपुर भाषण को दूरदर्शन पर लाइव करने की आलोचना की। उन्होंने ट्वीट किया,`आरएसएस एक सांप्रदायिक हिंदू संगठन है। अगली बार मस्जिद के इमाम, चर्च के पादरी भी लाइव स्पीच दिखाने की बात करेंगे।'
गुहा पहली लाइन में जो बात बोल रहे हैं, अगली लाइन में उस बात को सिर के बल खड़ा कर देते हैं। आरएसएस एक साम्प्रदायिक हिंदू संगठन है, ठीक है। आगे इस लाइन का क्या मतलब है-`अगली बार मस्जिद के इमाम, चर्च के पादरी भी लाइव स्पीच दिखाने की बात करेंगे।` क्या गुहा मस्जिद और चर्च को साम्प्रदायिक संस्था मानते हैं या फिर आरएसएस को मंदिर? संघ तो खुद को किसी भी हिंदू धर्माचार्य या धार्मिक संस्था से ज्यादा आधिकारिक हिंदू घोषित करता ही है। उसने अपने धर्माचार्य औऱ धर्म संसद खड़ी की। साम्प्रदायिकता से असहमत धर्माचार्यों को खारिज किया। गुहा उसे इसी तरह मान्यता देते दिखाई देते हैं। गुहा जितना संघ पर हमला नहीं करते हैं, उससे ज्यादा मस्जिद, चर्च औऱ इमाम, पादरी को कठघरे में खड़ा कर संघ के एजेंडे पर मुहर लगाते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि गुहा धर्म और उसकी संस्थाओं को सिरे से खारिज करने वाले, उन्हें ही साम्प्रदायिकता की जड़ मानने वाले और नास्तिकता में विश्वास रखने वाले विद्वान हैं। ऐसा होता भी तो भी संघ पर बात करते हुए मस्जिद-चर्च पर कूद पड़ना हैरान ही करता। एक अजीब तरीका यह रहा है कि जब संघ की साम्प्रदायिकता की बात करो तो हर हाल में किसी मुस्लिम औऱ चाहो तो ईसाई कट्टर संगठन की भी निंदा जरूर करो। यहां गुहा इस परंपरा से कई कदम आगे बढ़ गए हैं और संघ की आलोचना में एक लाइन बोलकर सीधे मस्जिद के इमाम और चर्च के पादरी को घसीट लेते हैं। गुहा जी बेफिक्र रहिए, इमाम और पादरी ऐसी कोई मांग नहीं करने जा रहे हैं, होने दीजिए भागवत को दूरदर्शन पर लाइव!

Wednesday, April 16, 2014

अमेरिका है साम्प्रदायिक-जनविरोधी ताकतों का संरक्षक : कमाल लोहानी




(बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार और मशहूर संस्कृतिकर्मी कमाल लोहानी वहां के प्रसिद्ध भाषा आंदोलन और मुक्ति संग्राम के बड़े नामों में से हैं। स्वाधीन बांग्ला बेतार केंद्र (बांग्लादेश रेडियो) के पहले निदेशक रहे लोहानी बांग्लादेश जर्नलिस्ट यूनियन, प्रेस इंस्टीट्यूट, शिल्पकला अकादमी आदि संस्थाओं का नेतृत्व भी कर चुके हैं। 80 बरस की उम्र में भी वे प्रगतिशील आंदोलन में सक्रिय हैं। वे `त्रिपुरा संस्कृति समन्वय केंद्र` के अधिवेशन (26-28 फरवरी, 2014) में शामिल होने के लिए अगरतला आए, तो उनसे यह संक्षिप्त बातचीत हुई।–धीरेश सैनी)

यह सही है कि बांग्लादेश के हालात फिलहाल बहुत बेहतर नहीं हैं। लेकिन यह मानकर चलना गलत होगा कि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति हर समय एक ही जैसी रही है। उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। रूढ़िवादी ताकतें सिर उठाती रही हैं, उन्होंने बवाल किए हैं लेकिन जनप्रतिरोध के सामने उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है। 1971 का मुक्ति संग्राम भी इन ताकतों के खिलाफ जनप्रतिरोध की जीत का गवाह रहा है। इन दिनों बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जमात-ए-इस्लामी जैसी ताकतें सियासत में ज्यादा से ज्यादा एकजुट हुई हैं और वे जनता के सामाजिक तानेबाने को तोड़ने पर आमादा हैं। दरअसल, इन कट्टरपंथी ताकतों के उभार के लिए अमेरिका और यूरोप के उसके मित्र देश जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ महीनों से बांग्लादेश में व्याप्त राजनीतिक अफरातफरी और उत्पात में अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों के प्रतिनिधियों की भूमिका बेहद आपत्तिजनक रही है। इन देशों के राजनयिक हमारे देश की सियासत और हमारे अंदरूनी मामलों में खुलेआम दखल देने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे देश को क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, ये सब वे सार्वजिनक रूप से फैसला सुनाने के अंदाज में बताना चाहते हैं। लेकिन, देश की जनता ऐसी हरकतों से खुश नहीं है। देश के राजनीतिक चेतना वाले लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का उभार और अमेरिका जैसे देशों की ये कारगुजारी कतई स्वीकार नहीं है।


हम 1971 में आज़ादी के लिए लड़े थे। इससे पहले 1952 का भाषा आंदोलन भी शानदार ढंग से लड़ा गया था। हमारा देश बहुत छोटा है पर इस लिहाज से हमारी जनसंख्या काफी ज्यादा है। 160 मिलियन की जनसंख्या वाले इस देश के मिजाज में नहीं है कि वह अमेरिका के संरक्षण में चल रहे कट्टरपंथी ताकतों के जनविरोधी आंदोलन को स्वीकार कर ले। हम नई पीढ़ी की तरफ उम्मीद के साथ देख रहे हैं। जो लोग सच्ची स्वाधीनता में विश्वास रखते हैं, वे खुद को और सेक्युलर संघर्षों की महान परंपरा को फिर से रिवाइव करना चाहते हैं। 2013 की 5 फरवरी को याद कीजिए। इंटरनेशल क्राइम ट्रिब्यूनल ने 400 से ज्यादा लोगों के हत्यारे युद्ध अपराधी क़ादिर मुल्ला को आजीवन कारवास का दंड़ सुनाया तो नवयुवकों ने ही जमात-ए-इस्लामी के इस पदाधिकारी के लिए फांसी की मांग को लेकर गण जागरण मंच बनाकर शहभाग से बड़े विरोध की पहल की। वे कभी आंदोलनों में शामिल नहीं रहे थे लेकिन उन्होंने सिद्ध किया कि वे देशभक्त हैं और जरूरत पड़ने पर चुप बैठने वाले नहीं हैं। इस समय भी सबसे बड़ी जरूरत सियासत और समाज को प्रभावित करने की कोशिशें कर रही इन दुष्ट साम्प्रदायिक शक्तियों को पराजित करना है।

हाल में हुए राष्ट्रीय चुनावों में बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी आदि 18 पार्टियों के गठबंधन ने भारी बवाल मचाया। हालांकि, देश की जनता पाकिस्तानी शासन के समय से ही एन्टी इस्टेबलिशमेन्ट प्रवृत्ति प्रदर्शित करती रही है। हो सकता था कि विपक्ष चुनाव में हिस्सा लेता तो बीएनपी-जमात गठबंधन जीत हासिल कर लेता। लेकिन, इस गठबंधन ने चुनाव आयोग पर झूठे आरोप लगाते हुए हिंसा का वातावरण पैदा कर दिया। उनके लोगों ने अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याएं कीं और उनकी दुकानें और घर फूंक दिए। अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों के प्रतिनिधि सरकार से साफ-सुथरा चुनाव सुनिश्चित करने की मांग तो करते रहे लेकिन उन्होंने विपक्ष के हिंसक रवैये को रोकने के लिए कोई दबाव बनाना जरूरी नहीं समझा। ऐसे में सत्तारूढ़ अवामी लीग और सहयोगी पार्टियों का गठबंधन बिना किसी `विरोध` के सत्ता में बरकरार रह गया। वर्कर्स पार्टी (सीपाआईएम समर्थित) के छह और जाति समाजतांत्रिक दल के भी पांच-छह उम्मीदवार जीते हैं। सरकार का 43 प्रतिशत मतदान का दावा ठीक नहीं है तो अमेरिका आदि देशों का मात्र 10-15 प्रतिशत वोटिंग का दावा भी सही नहीं है। हिंसा के चलते बहुत जगहों पर वोटर घरों से निकल नहीं सके लेकिन उन्हें जहां भी मौका मिला, वे उत्सव की तरह मतदान केंद्रों पर पहुंचे भी। निश्चय ही इस तरह के चुनाव लोकतंत्र की दृष्टि से बेहतर नहीं कहे जा सकते। समस्या वही है कि अमेरिका जनतंत्र विरोधी शक्तियों को संरक्षण देना बंद नहीं कर रहा है। साउथ एशियन इलाके में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए वह सच्ची लोकतांत्रिक सरकारों को हटाकर अपनी पिट्ठू जनविरोधी सरकारें स्थापित करना चाहता है। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों में लूट-खसोट और चीन की शक्ति को नियंत्रित रखने, दोनों ही उद्देश्यों से उसकी दखलंदाजी बढ़ती ही जाती है।

अच्छी बात यह है कि बांग्लादेश के लोगों में कला-संस्कृति के प्रति रुझान बरकरार है। अमेरिका और उसके मित्र देश बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसे और दूसरे प्रलोभनों के जरिए जिस तरह हमारे नेताओं को खरीदना चाहते हैं, हमारे कवियों-कलाकारों को भी खरीद लेना चाहते हैं। और इस तरह देश की नई पीढ़ी को भ्रष्ट करने का षड़यंत्र चल रहा है। बहुत से कवि-कलाकार भ्रमित हुए हैं पर सांस्कृतिक आंदोलन की धारा मजबूत है और इसकी बागडोर उदार-लोकतांत्रिक हाथों में है। `सम्मिलित सांस्कृतिक जुट` एक ऐसा ही बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन है। प्रगतिशील विचारधारा का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन `उदीची` है जिसकी देश भर में 303 शाखाएं हैं और लंदन, पेरिस, टोक्यो, न्यूयॉर्क आदि 10 विदेशों शहरों में भी इसकी इकाइयां हैं। वाम, प्रगतिशील, जनतांत्रिक और सुरुचिपूर्ण सारवस्तु के कार्यक्रम लेकर `उदीची` के कलाकार जनता के बीच लगातार सक्रिय हैं। कविता, थियेटर, लोकनृत्य और जात्रा जैसी परंपरागत विधाओं के जरिए नवजागरण में जुटे इस सांस्कृतिक आंदोलन के 10 कार्यकर्ता कट्टरवादी शक्तियों के हाथों शहीद हो चुके हैं। जासेर में संगठन के वार्षिक अधिवेशन में ग्रेनेड से हमला किया गया था। नेतरोकोना और दूसरी जगहों पर भी संगठन के कार्यक्रमों व प्रदर्शनों के दौरान हमले होते रहे हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि मुक्ति संग्राम को डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज़्म और सोशलिज़्म के जिन मूल्यों को आधार बनाकर लड़ा गया था, स्वाधीनता के बाद उन मूल्यों के सार को हम अपेक्षित रूप से संस्थाओं में परिवर्तित नहीं कर सके। स्वाधीनता के बाद जो संविधान प्रस्तुत किया गया, उसमें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के साथ बंगाली राष्ट्रवाद भी जोड़ दिया गया। भाषा आंदोलन और स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बंगाली राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा में हमारा विश्वास कभी नहीं था लेकिन स्वाधीनता के बाद इसे संविधान में एक स्तंभ की तरह खड़ा कर दिया गया। पहाड़ियों पर रहने वाले आदिवासियों ने दोनों आंदोलनों में भागीदारी की थी। बांग्ला को अकेली राष्ट्रभाषा नहीं होना था बल्कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को भी समान अधिकार दिया जाना था। लेकिन, 42 सालों बाद भी ऐसा नहीं हो सका।

यह ठीक है कि मुक्ति संग्राम का नेतृत्व सेक्युलर लोगों के हाथों में था और सेक्युलरिज़्म एजेंडे में प्रमुखता से शामिल था। लेकिन, यह कहना गलत होगा कि ऐसे सफल सेक्युलर संघर्ष के बाद अचानक धार्मिक कट्टरता का प्रश्न आकर खड़ा हो गया। उसके बीज हमेशा से वहीं पड़े हुए थे। सेक्युलरिज़्म का स्लोगन एक अलग बात है और हर किसी का उसे जीवन मूल्य की तरह स्वीकार करना अलग। यह संसदीय राजनीति की सीमाओं और उसे पूंजी व भावनात्मक प्रश्नों से प्रभावित कर लिए जाने की संभावनाओं का भी मसला है। पश्चिम बंगाल में भी वाम के लंबे शासन का अंत होते ही जिस तरह की चीजें हो रही हैं, उसका एक कारण यही है।


त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश का एक जीवंत सांस्कृतिक संबंध है और इस तरह यह दो पड़ोसी देशों के लिए बेहतर बात है। बांग्लादेश और इन दोनों भारतीय राज्यों के प्रगतिशील, डेमोक्रेटिक लोगों, कलाकारों व संस्कृतिकर्मियों की निरंतर आवाजाही का बड़ा महत्व है। यह रिश्ता कट्टरपंथी शक्तियों की आंखों में चुभता रहता है। हमें `हिंदुस्तान का दलाल` कहकर निशाने पर रखने की कोशिशें की जाती हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी थीं तो हमारे यहां कहा गया कि वे मित्रतापूर्ण रहेंगी लेकिन तीस्ता आदि मुद्दों पर उनकी राजनीति ऐसी नहीं रही। हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक शक्तियों का बढ़ता प्रभाव पूरे उपमहाद्वीप के सेक्युलर व जनतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए खतरे की घंटी की तरह है। नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं (जैसी हम उम्मीद नहीं करते हैं) तो निश्चय ही बांग्लादेश में सेक्युलर व डेमोक्रेटिक ताकतों के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी। जहां तक अमेरिकापरस्ती का सवाल है तो हिंदुस्तान की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भी आर्थिक मोर्चे पर उसके प्रभाव में है लेकिन बांग्लादेश से संबंधों को लेकर उसमें एक लोच बरकरार है जो मोदी के आने से (पीएम बनने से) नहीं रह पाएगी।
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(समयांतर के अप्रैल अंक से साभार)

Monday, March 17, 2014

अस्सी के काशीनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी


`धर्म और जाति को अबकी मुझे लगता है कि बनारस की जनता एक ठेंगा दिखाएगी और कहीं न कहीं मोदी के पक्ष में लोग जाएंगे।`-काशीनाथ सिंह

अब इस पंक्ति में कितना भी स्वच्छ और उदार हृदय लगाएं या कितना भी पवित्र या लंपट तर्क करें, क्या यह कहने की कोई गुंजाइश बचती है कि काशीनाथ जनता जैसा सोच रही है, वैसा बता रहे हैं? यहां तो वे सीधे कह रहे हैं कि अबकी बनारस की जनता धर्म और जाति को ठेंगा दिखाकर मोदी के पक्ष में जाएगी। याद रखिए कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि जनता धर्म के नाम पर बेवकूफ बनेगी, उसका ध्रुवीकरण होगा। यह पंक्ति तो उन्होंने यह कहते हुए ही कही कि पहले ओटों का ध्रुवीकरण होता था, अबकी मोदी के आने से जनता धर्म और जाति को ठेंगा दिखाएगी। तो मोदी के पक्ष में जाना धर्म के नाम पर हो रही साम्प्रदायिक सियासत को ठेंगा दिखाना हुआ?
बहरहाल, बहुत से साथी मैसेज इनबॉक्स में कह रहे हैं कि बीबीसी का लिंक सुनने में नहीं आ रहा है तो सभी की सुविधा के लिए बीबीसी और काशीनाथ की बातचीत को टाइप करके दे रहा हूं। पढ़िएगा-
बीबीसी- वाराणसी से नरेंद्र मोदी के प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश नज़र आ रहा है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वाराणसी का महत्व तो है ही, यह शहर एक खास अंदाज के लिए भी जाना जाता है। तो नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को लेकर एक आम बनारसी क्या सोचता है, इस बारे में मैंने बात की वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह से।
काशी- देखिए ऐसा है कि पंड़ित कमलापति त्रिपाठी के बाद जो कांग्रेस के थे, 1970 के बाद इस नगर को ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय प्रचार दे या इस नगर के प्रचार के लिए कुछ करे। ज्यादातर 1990 के बाद बीजेपी के सांसद रहे हैं और नगर का न तो विकास हो सका है और न इसकी कोई छवि बन सकी है बाहर, देश या विदेश में। जबकि मैंने स्वयं कहा है लिखा है कि यह बिहार और उत्तर प्रदेश का लाइन ऑफ कंट्रोल है, एक केंद्र है जहां से बिहार भी प्रभावित होता है और उत्तर प्रदेश भी प्रभावित होता है। तो इस नगर की एक छवि है वो छवि के नाम पर और राजनीति के लिए राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान के लिए एक छटपटाहट रही है इस नगर में। मोदी बाहरी जरूर हैं, आ रहे हैं लेकिन नगर में ज्यादातर लोगों का सोच ये है के इस बहाने इस नगर को, सिर्फ हिन्दुस्तान का क्या होगा, ये तो बाद की बात है, नगर का विकास होगा।
बीबीसी- जो एक खांटी बनारसी अंदाज जिसकी अक्सर चर्चा होती है, जिसके लिए बनारस जाना जाता है, वहां के लोग, बनारसी लोग क्या मोदी को आत्मसात कर पाएंगे और क्या मोदी खुद बनारस के लोगों से जुड़ पाएंगे, कितनी संभावना आप इसकी देख रहे हैं?
काशी- इसमें एक चीज़ है के बीजेपी का नेटवर्क सारी पार्टियों की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली है, काम करने वाले ज्यादातर, वो आरएसएस के लोग हैं और ये लोग हमारा ख्याल है कि उस स्थिति में मुझे याद आ रहा है बहुत पहले का इतिहास जब रुस्तम सेटिन लड़ते थे सीपीआई से और उनके समानांतर कोई होता था और जो चुनाव होता था, वो बहुत ही कांटे का हुआ करता था, पिछले चालीस वर्षों से ऐसी शख्सियत कोई आई ही नहीं जहां चुनाव कांटे का हो। केवल एक ध्रुवीकरण होता था और हिन्दू वोटों का होता था, मुस्लिम ओटों में से जो लोग लड़ते रहे हैं, वे ज्यादातर माफिया किसिम के लोग हैं, लड़ते रहे हैं, उधर झुकाव नहीं हो सका है, वे जीत नहीं सके। धर्म और जाति को अबकी मुझे लगता है कि बनारस की जनता एक ठेंगा दिखाएगी और कहीं न कहीं मोदी के पक्ष में लोग जाएंगे। गंगा जिस तरह से मैली होती हुई चली जा रही है, नगर जिस तरह से जाम में फंसा हुआ है, जो नगर का विकास ठप है और यहां लोगों के मन में चाह है कि किसी तरह से के इसी बहाने नगर का विकास तो होगा।
बीबीसी- आपने बात की ध्रुवीकरण की, नरेंद्र मोदी की वजह से तो ये आशंका जताई जा रही है, ये बातें हो रही हैं कि पूरे देश में एक तरह से वोटों का ध्रुवीकरण हो रहा है और उस ध्रुवीकरण का केंद्रबिंदु मोदी, वही बनारस से लड़ रहे हैं, तो क्या इस बार आपको नहीं लगता है कि वहां भी मतों का ध्रुवीकरण होगा और बड़े पैमाने पर होगा?
काशी-देखिए, मतों का ध्रुवीकरण तो होगा, इसमें दोराय नहीं है। लेकिन अगर ध्रुवीकरण होगा तो वहां क्योंकि इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर भाजपा ने मोदी को बनारस से भेजा है लड़ने के लिए। क्योंकि पूर्वांचल की स्थिति या पश्चिमी बिहार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है, यही सोचकर तो भेजा जा रहा है और मोदी हमारा ख्याल है कि इसमें बहुत कुछ इफेक्टिव हो सकते हैं, उनके काम के हो सकते हैं, सिद्ध हो सकते हैं।
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हालांकि, इसे सुनने में जो बात है, काशीनाथ और उनकी अपनी काशी, अपनी गंगा, अपनी जनता और अपने विकास के सपने के जो हिलोरें हैं, वे पढ़ने में वैसी कहां!
इस बीच एक शख्स विशाल विक्रम सिंह ने काशीनाथ सिंह से बातचीत करके फेसबुक पर एक पोस्ट लगाई है, उनके मुताबिक काशीनाथ ने कहा, " नरेंद्र मोदी के समर्थन का सवाल ही पैदा नहीं होता। नरेंद्र मोदी घनघोर हिंदुत्ववादी और हिंसक साम्प्रदायिक राजनीति के नायक हैं। वे फासीवादी हैं और तानाशाह भी। उन्होंने गुजरात में जो किया है, भारत उसे कभी भून नहीं सकता। वे भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। मैं किसी भी स्थिति में उनके या बीजेपी के समर्थन की कल्पना भी नहीं कर सकता। मुझसे पूछा गया था कि मोदी की उम्मीदवारी पर क्या जनप्रतिक्रिया है? इस प्रश्न के जवाब में मैंने कहा कि जनता यह सोच सकती है कि मोदी भले ही राष्ट्र के लिए खतरनाक हों परन्तु बनारस के विकास के लिए ठीक हो सकते हैं। यह मेरा मत नहीं है। संभावित जन-प्रतिक्रिया हो सकती है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने फासीवादी नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं किया है।"
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मेरा (धीरेश का) निवेदन- काशीनाथ सिंह, आपने अब मोदी को लेकर जो विचार जताए हैं, बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उसकी लेशमात्र परछाई तक नहीं पड़ने दी है। आपने जिस भाव-विह्वलता के साथ जो कुछ बोला है, वह बनारस की आपकी जनता और आपके अपने दिल-दिमाग का अच्छा सा ऐसा सम्मिश्रण है, जहां दोनों को अलग-अलग करना मुमकिन नहीं रह जाता। लेकिन, कोई संदेह की गुंजाइश न रह जाए, इसलिए आप ऐसे स्पष्ट वाक्य भी बोलते हैं, जिनमें तकनीकी रूप से सिर्फ और सिर्फ आपकी ही बात होती है, जनता वहां होती ही नहीं। और जहां आप जन-प्रतिक्रिया मात्र की बात कह रहे हैं, वहां आप एक भी शब्द ऐसा नहीं लगाते कि लगे कि जनता की ऐसी सोच पर आप दुखी हैं या आपको अफसोस है। आप कहीं कोई दुर्भाग्य से या साम्प्रदायिक चालों से जनता ऐसा सोचने लगी है, जैसी कोई बात नहीं करते। और जनता तो वह आपके लिए सिर्फ हिंन्दू संघ समर्थक जनता है। आप बनारस के मुसलमानों और कम ही सही दूसरी पार्टियों के मतदाताओं और बिल्कुल कम ही सही सेक्युलर लोगों को भी बनारस की अपनी मोदी समर्थक जनता में ही शामिल करके बोलते चले जाते हैं। और अंततः आप कह देते हैं कि पहले ध्रुवीरण होता था मगर इस बार धर्म और जाति को ठेंगा दिखाकर बनारस की जनता मोदी के पक्ष में जाएगी। यह महान वाक्य आपकी राय में क्या है?
और जहां तक मुस्लिम माफिया उम्मीदवारों का जिक्र आपने किया तो ज्यादा बहस किए बिना मेरा अनुरोध है कि यदि मुख्तार अंसारी के बजाय वहां से शबनम हाशमी या शबाना आजमी या कोई `भला-शरीफ` मुसलमान उम्मीदवार होता तो उसकी तरफ `आपका और जनता का` झुकाव होता और वे जीत जाते। और क्या कत्लोगारत करने और संविधान की धज्जियां उड़ाकर देश के लिए खतरा बने बीजेपी के लोग आपके तईं शरीफ-भले लोग होते हैं। मोदी किस श्रेणी में हैं, क्या उनका समर्थन उनकी शराफत और विकास के सपने की वजह से है या मुसलमानों को ठिकाने लगाने के उनके कारनामों की वजह से? आपने मोदी के जो गुण अब बताए हैं, बीबीसी से बातचीत में उनका जरा भी जिक्र करना आप भूल गए हैं। लेकिन, आपने अब उन्हेें फासीवादी, तानाशाह वगैरा जो कहा है, उसका मैं फिर भी स्वागत करता हूं और उम्मीद करता हूं कि आप लीपापोती के बजाय कहेंगे कि बीबीसी पर मैंने जो बोला, वह निंदनीय था, मैं गलती मानता हूं। आखिर मैं भी इसी जहरीली होती जा रही आबोहवा में सांस लेने वाला प्राणी हूं।
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https://archive.org/embed/KashinathSinghInFavourOfNarendraModi
So called leftist writer Kashinath Singh, who belongs to dominant upper caste, from Banaras speaking in favor of...
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Thursday, November 28, 2013

अपने से डरा हुआ बहुमत : असद ज़ैदी



क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बन्दगी में मिरा भला न हुआ (ग़ालिब)

नमरूद बाइबिल और क़ुरआन में वर्णित एक अत्याचारी शासक था जिसने ख़ुदाई का दावा किया और राज्याज्ञा जारी की कि अब से उसके अलावा किसी की मूर्ति नहीं पूजी जाएगी। पालन न करने वालों को क़त्ल कर दिया जाता था। नरेन्द्र मोदी ने, जिनके नाम और कारनामे सहज ही नमरूद की याद दिलाते हैं, अब अपने आप को भारत का प्रधानमंत्री चुन लिया है। बस इतनी सी कसर है कि भारत के अवाम अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी भारतीय जनता पार्टी को अगर स्पष्ट बहुमत नहीं तो सबसे ज़्यादा सीट जीतने वाला दल बना दें। इसके बाद क्या होगा यह अभी से तय है। पूरी स्क्रिप्ट लिखी ही जा चुकी है। इस भविष्य को पाने के लिए ज़रूरी कार्रवाइयों की तैयारी एक अरसे से जारी है । मुज़फ़्फ़रनगर में मुस्लिम जनता पर बर्बर हमला, हत्याएँ, बलात्कार, असाधारण क्रूरता की नुमाइश और बड़े पैमाने पर विस्थापन इस स्क्रिप्ट का आरंभिक अध्याय है। यह उस दस-साला खूनी अभियान का भी हिस्सा है जिसके ज़रिए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ हिन्दुस्तानी राज्य और समाज पर अपने दावे और आधिपत्य को बढ़ाती जा रही हैं।

यह आधिपत्य कहाँ तक जा पहुँचा है इसकी प्रत्यक्ष मिसालें देना ज़रूरी नहीं है -- क्योंकि जो देखना चाहते हैं देख ही सकते हैं -- पर जो परोक्ष में है और भी चिंताजनक है। मसलन, लेखक कवियों और कलाकारों के बीच विमर्श को जाँचिए, उस स्पर्धा और घमासान को देखिए जो हमेशा उनके बीच होता ही रहता है, हिन्दी के अध्यापकों से बात कीजिए, और मुज़फ़्फ़रनगर का ज़िक्र छेड़िये तो लगेगा मुज़फ़्फ़रनगर में शायद कोई मामूली वारदात हुई है जो होकर ख़त्म हो गई। जैसे किसी को मच्छर ने काट लिया हो! मुज़फ़्फ़रनगर की बग़ल में, दिल्ली में, बैठे हुए किसी को सुध नहीं कि पड़ोस में क्या हुआ था और हो रहा है, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, भोपाल, पटना, चंडीगढ़ और शिमला का तो ज़िक्र ही क्या! इक्के दुक्के पत्रकारों, चंद कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों की को छोड़ दें तो किसी लेखक-कलाकार को वहाँ जाने की तौफ़ीक़ नहीं हुई। उनमें से एक शरणार्थी कैम्प तो दिल्ली की सीमा ही पर है। मात्र एक ज़िले में क़रीब एक लाख लोग अपने गाँवों और घरों से खदेड़ दिये गए, शायद अब कभी वहाँ लौट नहीं पाएँगे, उनके भविष्य में असुरक्षा और अंधकार के सिवा कुछ नहीं, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति साहित्य, कला, संस्कृति, पत्र-पत्रिका, अख़बार, सोशल मीडिया में सरसरी तौर से भी ठीक से दर्ज नहीं हो पा रही। ऐसे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। और जो अब हो रहा है वो भी नहीं हो रहा!

मामला इतने पर ही नहीं रुकता। संघ परिवार, नरेन्द्र मोदी और भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह का इस प्रसंग से जैसे कोई वास्ता ही नहीं! मीडिया को उनका नामोल्लेख करना ग़ैर-जायज़ लगता है। मामले को ऐसे बयान किया गया कि यह सिर्फ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की चुनावी चाल थी जो उल्टी पड़ गई। अगर कोई कहता है कि कैसे मुज़फ़्फ़रनगर में गुजरात का प्रयोग विधिवत ढंग से दोहराया गया है, और इस वक़्त वहाँ की दबंग जातियाँ, पुलिस और काफ़ी हद तक प्रशासन मोदी-मय हो रहा है, और यह कि मुज़फ़्फ्ररनगर क्षेत्र में संघ परिवार बहुत दिन से ये कारनामा अंजाम देने की तैयारी कर रहा था, तो आम बौद्धिक कहने वाले की तरफ़ ऐसे देखते हैं जैसे कोई बहुत दूर की कौड़ी लाया हो। हिन्दी इलाक़े के बौद्धिकों में -- जिनमें अपने को प्रगतिशील कहने वाले लोग भी कम नहीं हैं -- फ़ासिज़्म को इसी तरह देखा या अनदेखा किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले हिन्दी के एक पुराने बुद्धिमान ने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी पर ज़्यादा चर्चा से उसीका महत्व बढ़ता है; बेहतर हो कि हम मोदी को 'इगनोर' करना सीख लें। एक प्रकार से वह साहित्य की दुनिया में आज़माये फ़ार्मूले को राष्ट्रीय राजनीति पर लागू कर रहे थे। इतिहास में उन जैसे चिन्तकों ने पहले भी हिटलर और मुसोलिनी को 'इगनोर' करने की सलाह दी थी।

अगर यह नादानी या मासूमियत की दास्तान होती तो दूसरी बात होती। इसी तबक़े के लोगों ने यू आर अनंतमूर्ति प्रकरण में जिस मुस्तैदी और जोश से बहस में हिस्सा लिया वह कहाँ से आई? अनंतमूर्ति ने जब यह कहा कि वह ऐसे मुल्क में नहीं रहना चाहेंगे जहाँ मोदी जैसा आदमी प्रधानमंत्री हो, संघ परिवार द्वारा लोकतंत्र पर जैसी फ़ासीवादी चढ़ाई की तैयारी है, अगर वह सफल हो गई तो यह देश रहने लायक़ नहीं रह जाएगा, तो लगा जैसे क़हर बरपा हो गया! शायद ही वर्तमान या अतीत के किसी लोहियावादी को एक साथ संघ परिवार और हिन्दी के उदारमना मध्यममार्गी लोगों का ऐसा कोप झेलना पड़ा हो। अचानक साहित्य और पत्रकारिता के सारे देशभक्त जाग उठे और बुज़ुर्ग लेखक के 'देशद्रोह' की बेहूदा तरीक़े से निन्दा करने लगे। यह अनंतमूर्ति की वतनपरस्ती ही थी कि उन्होंने ऐसी बात कही। रंगे सियारों के मुँह से यह बात थोड़े ही निकलने वाली थी! कौन चाहेगा कि उसका वतन एक क़ातिल और मानवद्रोही के पंजे में आ जाए? क्या इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि हज़ारों, बल्कि लाखों बल्कि लोगों को, रोते और बिलबिलाते हुए, अपने वतन को अलविदा कहनी पड़ी? पिछली सदी में जर्मनी में और स्पेन में, और १९४७ के भारत में क्या हुआ था? हर तरह के फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक लोग क्या इसी को शुद्धिकरण और राष्ट्र-निर्माण का दर्जा नहीं देते थे? कुछ लोग तमाम जानकारी जुटा कर यह साबित करने पर तुल गए कि अनंतमूर्ति नाम का शख़्स कितना चतुर, अवसरवादी और चालबाज़ रहा है। मामला फ़ासिस्ट ख़तरे से फिसलकर एक असहमत आदमी के चरित्र विश्लेषण पर आ ठहरा। वे किसका पक्ष ले रहे थे? ऐसी ही दुर्भाग्पूर्ण ख़बरदारी वह थी जिसका निशाना मक़बूल फ़िदा हुसेन बने। कई बुद्धिजीवी और अख़बारों के सम्पादक हुसेन को देश से खदेड़े जाने और परदेस में भी उनको चैन न लेने देने के अभियान का हिस्सा बन गए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर पर ख़ामोशी और अनंतमूर्ति के मर्मभेदी बयान पर ऐसी वाचालता दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इससे यह पता चलता है कि ज़हर कितना अन्दर तक फैल चुका है। फ़ासिज्‍़म लोगों की भर्ती पैदल सैनिक के रूप में लुम्पेन तबक़े से ही नहीं, बीच और ऊपर के दर्जों से भी करता है। उसका एक छोटा दरवाज़ा बायें बाज़ू के इच्छुकों के लिए भी खुला होता है। कुछ साल के अन्तराल से आप किसी पुराने दोस्त और हमख़याल से मिलते हैं तो पता चलता है वह बस हमज़बान है, हमख़याल नहीं। आपका दिल टूटता है, ज़मीन आपके पैरों के नीचे से खिसकती लगती है, अपनी ही होशमन्दी पर शक होने लगता है। वैचारिक बदलाव ऐसे ही चुपके से आते हैं। बेशक इनके पीछे परिस्थितियों का दबाव भी होता है, पर यही दबाव प्रतिरोध के विकल्प को भी तो सामने कर सकता है। ऐसा नहीं होता नज़र आता इसकी वजह है बहुमत का डर और वाम-प्रतिरोध की परंपरा का क्षय। मेरी नज़र में जब लोग लोकतंत्र के मूल्यों की जगह बहुमतवाद के सिद्धान्त को ही सर्वोपरि मानने लगें, और राजनीति-समाज-दैनिक जीवन सब जगह उसी की संप्रभुता को स्वीकार कर लें, बहुमतवाद के पक्ष में न होकर भी उसके आतंक में रहने लगें, अपने को अल्पमत और अन्य को अचल बहुमत की तरह देखने लगें और ख़ुद अपने विचारों और प्रतिबद्धताओं के साथ नाइन्साफ़ी करने लगें तो अंत में यह नौबत आ जाती है कि बहुमत के लोग ही बहुमत से डरने लगते हैं। बहुमत ख़ुद से डरने लगता है।आज हिन्दुस्तान का लिबरल हिन्दू अपने ही से डरा हुआ है, उसे बाहर या भीतर के वास्तविक या काल्पनिक शत्रु की ज़रूरत नहीं रही। फ़ासिज़्म का रास्ता इसी तरह बना है, इसी से फ़ासीवादियों की ताक़त बढ़ी है। यह वह माहौल है जिसमें प्रगतिशील आदमी भी सच्ची बात कहने से घबराने लगता है, साफ़दिल लोग भी एक दूसरे से कन्नी काटने लगते हैं। बाक़ी अक़्लमंदों का तो कहना ही क्या, उनके भीतर छिपा सौदागर कमाई का मौक़ा भाँपकर सामने आ जाता है और अपनी प्रतिभा दिखाने लगता है। अक़लमंद लोग अपनी कायरता को भी फ़ायदे के यंत्र में बदल लेते हैं।

१९८९ के बाद पंद्रह बीस साल ऐसे आए थे जब भारत का मुख्यधारा का वाम (संसदीय वामपंथ ) यह कहता पाया जाता था कि दुनिया भर में समाजवादी राज्य-व्यवस्थाएँ टूट रही हैं, कुछ बिल्कुल मिट चुकी हैं लेकिन हिन्दुस्तान में वाम की शक्ति घटी नहीं बल्कि इसी दौर में उत्तरोत्तर बढ़ी है। वाम संगठनों की सदस्यता में इज़ाफ़ा हुआ है और यह इसका प्रमाण है कि वाम दलों की नीतियाँ सही हैं, और यह कि हमारी वाम समझ ज़्यादा परिपक्व, ज़मीनी और पायेदार है। बूर्ज्वा पार्टियों का दिवालियापन अब ज़ाहिर होने लगा है। इस सूत्र को इसी दौर की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति से मिलाकर देखें तो पता चलता है कि वाम के एक हिस्से ने अपने लिए कितनी बड़ी मरीचिका रच ली थी, और यथार्थ के प्रतिकूल पक्ष की अनदेखी करना सीख लिया था। वाम दलों ने अपनी बनाई मरीचिका में फँसकर अपने ही हौसले पस्त कर लिए हैं। इसी दौर में संघ परिवार की ख़ूनी रथयात्राएँ और सामाजिक अभियान शुरू हुए जिनकी परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस और मुम्बई और सूरत के नरसंहारों में हुई। यह दौर हिन्दुत्व के राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्रीय तथ्य बनने का है, पहले खाड़ी युद्ध के साथ पश्चिम एशिया पर अमरीकी साम्राज्य के हमलों का है, और भारत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के आत्मसमर्पण का है। इसी दौर में भारत स्वाधीन नीति छोड़कर अमरीका का मातहत और इज़राइल का दोस्त हुआ। इसी दौर में बंगाल की लम्बे अरसे से चली आ रही वाम मोर्चा सरकार ने अवाम के एक हिस्से का समर्थन खो दिया क्योंकि वाम सरकार और वाम पार्टियों के व्यवहार में वाम और ग़ैर-वाम का फ़र्क़ ही नज़र आना बंद हो गया था। यही दौर मोदी की देखरेख में गुजरात में सन २००२ का ऐतिहासिक नरसंहार सम्पन्न हुआ जिसमें राजसत्ता के सभी अंगों ने अभूतपूर्व तालमेल का परिचय दिया और भारत में भावी फ़ासिज़्म क्या शक्ल लेगा इसकी झाँकी दिखाई। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार, निजीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण के तहत इसी हिन्दू फ़ासिस्ट मॉडल को विकास के अनुकरणीय आदर्श की तरह पेश किया जाता रहा है।

आज हिन्दुस्तान में संसाधनों की कारपोरेट लूट लूट नहीं राजकीय नीति के संरक्षण में क्रियान्वित की जाने वाली हथियारबंद व्यवस्था है। भारतीय राज्य का राष्ट्रवाद अवामी नहीं, दमनकारी पुलिसिया राष्ट्रवाद है, अर्धसैनिक और सैनिक ताक़त पर आश्रित राष्ट्रवाद है। यह अपनी ही जनता के विरुद्ध खड़ा राष्ट्रवाद है। वैसे तो सर्वत्र लेकिन उत्तरपूर्व, छत्तीसगढ़ और कश्मीर में सुबहो-शाम इसका असल रूप देखा जा सकता है। आर्थिक नीति, सैन्यीकृत राष्ट्रवाद और शासन-व्यवस्था के मामलों में कांग्रेस और भाजपा में कोई अन्तर नहीं है। फ़ासिज्‍़म के उभार में इमरजेम्सी के ज़माने से ही दोनों का साझा रहा है। हिन्दुस्तान में फ़ासिज़्म के उभार का पिछली सदी में उभरे योरोपीय फ़ासिज़्म से काफ़ी साम्य है। जर्मन नात्सीवाद के नक़्शे क़दम पर चल रहा है। वह अपने इरादे छिपा भी नहीं रहा । बड़ा फ़र्क़ बस यह है कि भारतीय मीडिया और मध्यवर्ग इसी चीज़ को छिपाने में जी-जान से लगा है। फ़ासिज़्म फ़ासिज़्म न होकर कभी विकास हो जाता है कभी दंगा, गुजरात का नस्ली सफ़ाया गोधरा कांड की प्रतिक्रिया हो जाता है, मुज़फ़्फ़रनगर की व्यापक हिंसा जाट-मुस्लिम समुदायों की आपसी रंजिश का नतीजा या कवाल कांड की प्रतिक्रिया बन जाती है। हमारे बुद्धिजीवी विषयांतर में अपनी महारत दिखाकर इस फ़ासिज़्म को मज़बूत बनाए दे रहे हैं।

इस दुष्चक्र को तोड़ने का एक ही तरीक़ा है इन ताक़तों से सीधा सामना, हर स्तर पर सामना। और समय रहते हुए सामना। अपने रोज़मर्रा में हर जगह हस्तक्षेप के मूल्य को पहचानना। ऐसी सक्रिय नागरिकता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी है आज व्यवस्था के सताये हुए अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई), दलित और आदिवासी के साथ मज़बूती से खड़े होने की। अगर वाम शक्तियाँ और ग़ैर-दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी वर्ग प्रतिबद्धता से यह कर सकें तो फ़ासिज़्म की इमारतें हिल जाएँगी और उनके आधे मन्सूबे धरे रह जाएँगे। इस समय ज़रूरत है फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ व्यापक वाम और अवामी एकता की -- अगर यह एकता राजनीतिक शऊर और ज़मीर से समझौते की माँग करे तो भी। बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी का काम इससे बाहर नहीं है।
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 `प्रभात खबर` दीवाली विशेषांक से साभार