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Saturday, June 18, 2011
नागार्जुन जन्मशती उत्सव
जनवादी लेखक संघ, सहमत, जनम और एक्ट-1 के तत्वावधान में 15 जून 2011 को दिल्ली में नागार्जुन जन्मशती उत्सव का आयोजन किया गया. इस मौके पर `नया पथ` के नागार्जुन विशेषांक का विमोचन भी हुआ. सहमत, जनम, एक्ट-1 , बिगुल और जनम, कुरुक्षेत्र ने नागार्जुन की कविताओं पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं.




Wednesday, June 15, 2011
नागार्जुन की कुछ कविताएं
बाबा नागार्जुन का जन्म आज ही के दिन ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ था. उनकी जन्मशती के मौके पर लेखक संगठनों ने कई कार्यक्रम किये हैं और उन पर कई अंक भी निकले हैं.
उनकी कुछ चर्चित और महत्वपूर्ण कविताएं -
उनकी कुछ चर्चित और महत्वपूर्ण कविताएं -
मंत्र कविता
ॐ शब्द ही ब्रह्म है..
ॐ शब्द्, और शब्द, और शब्द, और शब्द
ॐ प्रणव, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ वक्तव्य, ॐ उदगार्, ॐ घोषणाएं
ॐ भाषण...
ॐ प्रवचन...
ॐ हुंकार, ॐ फटकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुसफुस, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फालन, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे
ॐ सब कुछ, सब कुछ, सब कुछ
ॐ कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं
ॐ पत्थर पर की दूब, खरगोश के सींग
ॐ नमक-तेल-हल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, कनेर के पात
ॐ डायन की चीख, औघड़ की अटपट बात
ॐ कोयला-इस्पात-पेट्रोल
ॐ हमी हम ठोस, बाकी सब फूटे ढोल
ॐ इदमान्नं, इमा आपः इदमज्यं, इदं हविः
ॐ यजमान, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ कविः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः सर्वग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः सर्वग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः सर्वग्वं भ्रांतिः
ॐ बचाओ बचाओ बचाओ बचाओ
ॐ हटाओ हटाओ हटाओ हटाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ
ॐ दलों में एक दल अपना दल, ॐ
ॐ अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ॐ मुष्टीकरण, तुष्टिकरण, पुष्टीकरण
ॐ ऎतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ॐ गद्दी पर आजन्म वज्रासन
ॐ ट्रिब्यूनल, ॐ आश्वासन
ॐ गुटनिरपेक्ष, सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़
ॐ छल-छंद, ॐ मिथ्या, ॐ होड़महोड़
ॐ बकवास, ॐ उदघाटन
ॐ मारण मोहन उच्चाटन
ॐ काली काली काली महाकाली महकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अपनी खुशहाली
ॐ दुश्मनों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीशन के मुंड बने तेरे गले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ हम चबायेंगे तिलक और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोकरी का काजल
ॐ तुलसीदल, बिल्वपत्र, चन्दन, रोली, अक्षत, गंगाजल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून, मर्कट का फोता
ॐ हमेशा हमेशा राज करेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फट फिट फुट
ॐ शत्रुओं की छाती अर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ बजरंगबली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ॐ डॉलर, ॐ रूबल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड
ॐ ॐ ॐ
ॐ धरती, धरती, धरती, व्योम, व्योम, व्योम, व्योम
ॐ अष्टधातुओं के ईंटो के भट्टे
ॐ महामहिम, महमहो उल्लू के पट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्दर समा जाय सर्वहारा
हरिः ॐ तत्सत, हरिः ॐ तत्सत
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घिन तो नहीं आती है
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?
कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?
दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?
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चंदू, मैंने सपना देखा
चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू
मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर
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अकाल और उसके बाद
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।
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यह दंतुरित मुस्कान
तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूली-धूसर तुम्हारे ये गात...
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारी ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनिमेष!
थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर?
क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होगी आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय क्या रहा तम्हारा संपर्क
उँगलियाँ माँ की कराती रही मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जब कि आँखे चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुस्कान
लगती बड़ी ही छविमान!
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Saturday, June 26, 2010
कबीर और नागार्जुन
बनारस से वाचस्पति जी ने फोन पर बताया कि आज बाबा नागार्जुन की जन्मशती शुरु हो रही है। बाबा से उनका आत्मीय रिश्ता रहा है. इच्छा यही थी कि वे ही कोई टुकड़ा यहाँ लिख देते पर तत्काल यह संभव नहीं था. इसी बीच किसी ने कबीर जयंती की बात बताई जिसकी मैंने तस्दीक नहीं की लेकिन यूँ ही लगा कि कबीर और नागार्जुन के बीच गहरा और दिलचस्प रिश्ता है.
मसलन दोनों का ही लोगों से बड़ा ही organic किस्म का जुड़ाव रहा या कहें कि दोनों ही जनता की organic अभिव्यक्ति हैं. दोनों प्रतिरोध के, हस्तक्षेप के कवि हैं. दोनों में गजब की लोकबुद्धि है, तीखापन है और दोनों ही व्यंग्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। जनशत्रुओं से दोनों की सीधी मुठभेड़ है और दोनों के लिए ही कविता कोई इलीट सी, शास्त्रीय सी, `पवित्र` सी चीज़ नहीं है.
कबीर के लिए अक्खड़-फक्कड़ जो भी विशेषण दी जाते हैं, वे नागार्जुन के लिए भी सटीक हैं। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी कही गयी है और घुमंतू नागार्जुन की भाषा भी पंजाबी, हरयाणवी, भोजपुरी जाने कहाँ-कहाँ ट्रेवल करती है. दोनों ही कविता से एक `जिहाद` लड़ते हैं, अपने समय के ताकतवर-उत्पीड़क के खिलाफ. कबीर के यहाँ तो ब्राह्मणवाद लड़ाई के केंद्र में ही रहा है. नागार्जुन के यहाँ भी इस बीमारी से मुसलसल मुठभेड़ है. दोनों ही अपने समय की प्रतिरोधी परम्परा से रिश्ता बनाते हैं, उससे ताकत पाते हैं और उसे मजबूत करते हैं. कबीर का रिश्ता नाथपंथियों से, सूफियों से बनता है और नागार्जुन का बुद्धिज़्म से, वामपंथ से.
यह भी दिलचस्प है कि शास्त्रीय परम्परा के विरोध के ये कवि शास्त्रीय आलोचना के लिए उपेक्षा करने लायक ही रहे गोकि दोनों ही लोगों की जुबान पर खूब चढ़े रहे। ब्राह्मणवादी आलोचना कबीर को कभी कवि मानने को तैयार नहीं हुई और उसने नागार्जुन को भी कभी महत्व नहीं दिया. उनकी कला आलोचकों के लिए कविता कहे जाने लायक नहीं थी और दोनों ही बहुत समय तक प्रचारक की तरह देखे जाते रहे. (अशोक वाजपेयी का यह कबूलनामा भी सिर्फ मजेदार है कि नागार्जुन को समझ न पाने की उनसे बड़ी भूल हुई.)
बहरहाल नागार्जुन की यह कविता -
शासन की बंदूक
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक
मसलन दोनों का ही लोगों से बड़ा ही organic किस्म का जुड़ाव रहा या कहें कि दोनों ही जनता की organic अभिव्यक्ति हैं. दोनों प्रतिरोध के, हस्तक्षेप के कवि हैं. दोनों में गजब की लोकबुद्धि है, तीखापन है और दोनों ही व्यंग्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। जनशत्रुओं से दोनों की सीधी मुठभेड़ है और दोनों के लिए ही कविता कोई इलीट सी, शास्त्रीय सी, `पवित्र` सी चीज़ नहीं है.
कबीर के लिए अक्खड़-फक्कड़ जो भी विशेषण दी जाते हैं, वे नागार्जुन के लिए भी सटीक हैं। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी कही गयी है और घुमंतू नागार्जुन की भाषा भी पंजाबी, हरयाणवी, भोजपुरी जाने कहाँ-कहाँ ट्रेवल करती है. दोनों ही कविता से एक `जिहाद` लड़ते हैं, अपने समय के ताकतवर-उत्पीड़क के खिलाफ. कबीर के यहाँ तो ब्राह्मणवाद लड़ाई के केंद्र में ही रहा है. नागार्जुन के यहाँ भी इस बीमारी से मुसलसल मुठभेड़ है. दोनों ही अपने समय की प्रतिरोधी परम्परा से रिश्ता बनाते हैं, उससे ताकत पाते हैं और उसे मजबूत करते हैं. कबीर का रिश्ता नाथपंथियों से, सूफियों से बनता है और नागार्जुन का बुद्धिज़्म से, वामपंथ से.
यह भी दिलचस्प है कि शास्त्रीय परम्परा के विरोध के ये कवि शास्त्रीय आलोचना के लिए उपेक्षा करने लायक ही रहे गोकि दोनों ही लोगों की जुबान पर खूब चढ़े रहे। ब्राह्मणवादी आलोचना कबीर को कभी कवि मानने को तैयार नहीं हुई और उसने नागार्जुन को भी कभी महत्व नहीं दिया. उनकी कला आलोचकों के लिए कविता कहे जाने लायक नहीं थी और दोनों ही बहुत समय तक प्रचारक की तरह देखे जाते रहे. (अशोक वाजपेयी का यह कबूलनामा भी सिर्फ मजेदार है कि नागार्जुन को समझ न पाने की उनसे बड़ी भूल हुई.)
बहरहाल नागार्जुन की यह कविता -
शासन की बंदूक
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक
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