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Monday, October 12, 2015

एक बस अपील...लौटा दीजिए पुरस्कार : शिवप्रसाद जोशी



साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने चाहिए. जिनके पास जिन जिन वक़्तों के पुरस्कार हैं. वे सब आगे आएं और अपने पुरस्कार लौटा दें. इस फेर में न फंसे कि इसका कोई मूल्य नहीं, कि ये निजी शहादत है, कि इसका कोई हासिल नहीं, कि पैसा कैसे चुकाएंगें, कि साहित्य अकादमी तो सरकारी यूं भी नहीं हैं आदि आदि. और इधर तो एक जालसाज़ी ये भी हो रही है कि कह रह हैं कीर्ति भी लौटाओ. जैसे कीर्ति वहां से अर्जित हुई होगी. पूरा हिसाबकिताब ऐसे ढंग से पेश किया जा रहा है कि ख़बरदार अगर लौटाया तो ये हिसाब ध्यान रखना. ऐसी बेशर्मी, ऐसी ख़ुराफ़ात, ऐसा मज़ाक, ऐसी अपमान और ऐसा फ़ाशीवादी रवैया इस देश में आन पड़ा है तो क्या अचरज?

वरिष्ठो, आगे आइए और ये पुरस्कार लौटा दीजिए. इसके गहरे निहितार्थ होंगे. आप सब जानते हैं. दुनिया भर के लोगों में संदेश जाएगा. जा रहा है. प्रतिरोध आंदोलनों को मज़बूती मिलेगी. लोग और जुटेंगे. एक बड़ी अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का समर्थन होगा. एक चेन बनेगी. विश्व शक्तियों की नई धुरियों का नया जनतांत्रिक और अवाम केंद्रित विलोम तैयार होगा. आप पुकारे जाएंगें. आपको सलाम होगा. 

और हम, साथियो, हम लोग न ताकें न रुकें न चुप रहें. बोलें. भरसक. लिखें. आश्वासन और राहतें और छलावे और पेशकशें और ऑफ़र लौटा दें. सरकारों को ख़बरदार करें. आपने यूं ही जन्म नहीं लिया है. एक सार्थक जीवन की परिभाषा और उद्देश्य क्या होता है. ये बताने का पुरज़ोर समय है. हम लोग दलाली नहीं कर सकते हैं. हमारे वरिष्ठ दलाल नहीं हो सकते हैं. हम लोग मनुष्य हैं और हम लोगों का एक जीवन है जो सुंदर है जिसमें प्रेम है, परिवार है परिजन और दोस्त और संबंधी हैं, और ये सारी की सारी दुनिया है. हम लोग ख़ुशकिस्मत हैं फिर घेरा डाले हुए हमारे आसपास ये ताक़तें कौन हैं. ये हमारा अच्छा बुरा क्यों तय करेंगी, हम खुद क्यों नहीं? इन घेरों की जगह तो हमारी सदियों से बनाई हुई मनुष्यता के डेरे होने चाहिए.

लोग सवाल कर रहे हैं और इस विश्वव्यापी प्रायोजित जय-जय के बीच संदेह में हैं. कि आखिर ये जयगान उस देश से आ रहा है जहां मांस और इंसान के बीच जीवन और मौत का संघर्ष चल रहा है. पूंजीवादी व्यवस्थाएं जब फ़ाशीवाद से गठबंधन करती हैं तो ऐसा ही होता है. ऐसा इस देश की प्राचीनता में नहीं हुआ था. इतिहास की विकृति हावी है. और ये कहने वाले लोग कम होते जा रहे हैं कि भारत में ऐतिहासिक सच्चाई ये है कि यहां मांस खाया जाता था.
अब इस मांस भक्षण का विरोध इतना प्रबल है कि मनुष्य भक्षण पर आमादा ताक़तें फैल गई हैं और उन्होंने जैसे विचार पर ही क़ब्ज़ा कर लिया है. 

लोग या तो मांस के नाम पर मारे जा रहे हैं या महिमा न करने के अपराध में. अगर आप अनवरत जयजय में शामिल नहीं हैं तो आप समाज विरोधी, जाति विरोधी, धर्म विरोधी और देशद्रोही हैं.

तो साथियो, जो किसी भी तरह की फ़ाशीवादी सुविधा के घेरे में हैं उन्हें छोड़ें, जिनके पास सरकार के दिए पुरस्कार हैं, उन्हें लौटा दें. भले ही वो किसी भी पार्टी या समूह या गठबंधन की सत्ता के दौरान के हों. या किसी और दौर के.
आज क्या कर सकते हैं और किस चीज़ का क्या अर्थ हो सकता है, इसे सोचें. लेकिन इसमें आगामी जीवन का मोलभाव न सोचें. आगामी सिर्फ़ मौत है या उससे कम कोई दयनीय हालत. आप हंसेंगे, दैनन्दिन काम निपटाएंगें, दावतों में जाएंगें, घरबार करेंगें लेकिन मौत आपके साथ ऐसे चलेगी जैसे आप उसकी गिरवी रखी हुई कोई चीज़ हों.
वरना तो मौत स्वाभाविक रूप से आती ही है. आकस्मिक भी आती है, और लड़कर भी.... लेकिन आप उस समय इंसान होते हैं- विवशता, इच्छा, लालच, किंकर्तव्यविमूढ़ता, फ़र्माबरदारी और जहालत से भरा हुआ कोई बोरा नहीं जिसे किसी ने जीवन के कगार से हमेशा हमेशा के लिए धकेल दिया हो.


पेंटिंग : Renato Guttuso, The Massacre 1943, Oil on canvas

Saturday, December 29, 2012

बलात्कार की संस्कृति और राजसत्ता



नई दिल्ली। बलात्कार की संस्कृति के खिलाफ व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलन चलाने की जरूरत है। दिल्ली की सड़कों पर उमड़े जनविरोध ने इस बलात्कारी संस्कृति और उसे मिले राजसत्ता के समर्थन पर हल्ला बोला है। ये विचार कल 28 जनवरी को जन संस्कृति मंच द्वारा-बलात्कार की संस्कृति और राजसत्ता- विषय पर आयोजित गोष्ठी में उभर कर सामने आए। गोष्ठी में देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाली यौन उत्पीड़न-बलात्कार की घटनाओं में हो रही बेतहाशा वृद्धि पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई और तुरंत कड़ी कार्रवाई की मांग की गई।  
इस गोष्ठी में बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और साहित्यकारों ने शिरकत की। अनहद संस्था की शबनम हाशमी ने याद दिलाया कि किस तरह से गुजरात में राज्य सरकार के प्रश्रय में महिलाओं के साथ बर्बरत यौन उत्पीड़न किया गया। शबनम ने बताया कि गुजरात जनसंहार के दौरान भी बलात्कार करने वालों ने राड और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था। औरतों के साथ गैंगरेप करके उन्हें पेट्रोल डालकर जला दिया था। बलात्कार के खिलाफ जब पूरे देश में आंदोलन चल रहा हैउस वक्त भी वहां बलात्कार हुए हैं। गुजरात में स्टेट ने बलात्कारियों का साथ दिया। इस सवाल पर पूरे मुल्क में प्रतिरोध जारी रखना होगा।
वरिष्ठ कवि नीलाभ ने सवाल उठाया  कि क्या यह सिर्फ कानून और व्यवस्था का सवाल हैबलात्कार पावर के साथ जुड़ा है। स्टेट इस मामले में अपनी जिम्मेवारी से बचता है। क्या स्वस्थ स्त्री पुरुष संबंधों के बिना बलात्कार से मुकित का उपाय ढूंढा जा सकता है?
वरिष्ठ पत्रकार और समाजिक कार्यकर्ता किरण शाहीन ने कहा कि बलात्कार की संस्कृति स्त्री को हेय समझने की प्रवृतित से जुड़ी हुर्इ है। हमें यह देखना होगा कि उपभोक्तवाद किस तरह विषमता को बढ़ा रहा है और किस तरह वर्किग क्लास का भी लुंपानाइजेशन हो रहा है। साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों को राजनीतिक होना पड़ेगा।
वरिष्ठ कवि सविता सिंह ने कहा कि हमारे देश की इकोनामी में भी रेप जैसी सिथति बनी हुर्इ है। लालचसेल्फ इंटरेस्ट और सिर्फ अपने बारे में सोचने की प्रवृत्ति के भीतर से ही बर्बरता पैदा होती है। इस इकोनामी में स्त्री के श्रम की मूल्यवत्ता घटी है। सित्रयों का बहुत ही गहरे स्तर पर शोषण हो रहा है। इस सिथति में क्रिएटिव रिस्पांस क्या होंगेइस बारे में सोचना होगा।
युवा कवि रजनी अनुरागी ने कहा कि भारतीय परंपरा में भी सित्रयों के प्रति भेदभाव मिलता है और यहां देवताओं द्वारा बलात्कार को जायज ठहराया जाता रहा है। आज यह हिंसा और फैल गई है और स्त्री के अस्तित्व पर ही संकट आ गया है। युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि चाहे हम कितने भी दुखद क्षण और शाक से गुजर रहे हैंपर उज्जवल पक्ष यह है कि इसके पहले यौन हिंसा के खिलाफ इस स्तर का प्रतिरोध नहीं दिखा था। यह स्त्री आंदोलन के लिए ऐतिहासिक दौर है। इस देश में विषमता और अन्याय तेजी से बढ़ रहा है। जहां भी बलात्कार हो रहे हैंउन सब जगहों पर प्रतिवाद करना होगा और स्त्री विरोधी परंपरा से भी भिड़ना होगा।
कवि व महिला कार्यकर्ता शोभा सिंह ने कहा कि आज बलात्कारी संस्कृति के खिलाफ जिस तरह नौजवान सामने आए हैंवह अच्छी बात है। जिस लड़की के प्रतिरोध के बाद यह आंदोलन उभरा हैउसकी जिजीविषा को सलाम। युवा कवि व शायर मुकुल सरल ने कहा कि सिर्फ पढ़े-लिखे होने से कोर्इ स्त्री के प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता। उसके लिए अच्छे संस्कार और साहित्य-संस्कृति से जुड़ाव जरूरी है। इंडिया गेट से लेकर इस गोष्ठी तक जसम ने इस आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का इजहार किया है। यह सिलसिला जारी रहेगा।
कथाकार अंजलि देशपांडे ने कहा कि इस देश में लक्ष्मणों से बचना होगा और शूर्पनखा के संघर्ष को जारी रखना होगा। आजादी के लिए अपनी सुरक्षा को दांव में लगाना होगा। आजादी के नाम पर जेल जैसी सुरक्षा को कबूल नहीं किया जा सकता। हमें राज्यसत्ता को ज्यादा ताकत देते वक्त हमेशा सावधान रहना होगाक्योंकि उसी ताकत के जरिए वह हमारा दमन भी करने लगती है।
वरिष्ठ साहित्यकार प्रेमलता वर्मा ने कहा कि ऐसा लगता है कि लोकतंत्र के नाम पर इस देश में आज भी राज्यतंत्र ही चल रहा है। इसलिए स्त्री इसके खिलाफ आवाज उठा रही है, सड़कों पर लड़ रही है। वरिष्ठ साहित्यकार और दलित चिंतक विमल थोराट ने सवाल उठाया कि क्यों बार-बार कमजोर ही बलात्कार का शिकार होते हैंजब किसी जाति या समूह को उसकी हैसियत बतानी होती हैतो यौन हिंसा की यह संस्कृति सित्रयों को ही अपना टारगेट बनाती है। गांवों में और दलित महिलाओं के साथ जो गैंगरेप हो रहे हैंउसे लेकर इतना आक्रोश क्यों नहीं उभरता?
वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि यह एक वीभत्स कांड है। जिसमें कहा जा रहा है दोषी कुंठा के शिकार थे। लेकिन अन्य दूसरों मामलों में किस तरह की कुंठा काम कर रही थी। जिस तरह इन लोगों ने भ्रष्टाचार को जायज बनाया हैउसी तरह बलात्कार भी इनकी निगाह में जायज है। हमें देखना होगा कि इस तरह के लोगों को कौन पार्टी उम्मीदवार बनाती हैहमें इन्हें वोट नहीं देना होगा। यह मुहिम जरूरी है।
ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने कहा कि 16 दिसंबर के बाद जो आंदोलन उभरावह वाकर्इ स्वत:स्फूर्त थाइसके लिए हमें नौजवान लड़के-लड़कियों को धन्यवाद देना होगा। प्रगतिशील जमात को इस तरह के आंदोलनों को संशय से देखने की प्रवृतित को छोड़ना होगा। इस आंदोलन ने महिलाओं की आजादी और बराबरी के सवाल को सामने लाया है। इसे जनता का भी जबर्दस्त समर्थन मिला। बाबा रामदेव जैसे लोग भी इस जनविक्षोभ को नेतृत्व देने आएलेकिन उन्हें बाहर होना पड़ाक्योंकि स्त्री की आजादी के सवाल पर उनकी कोर्इ विश्वसनीयता ही नहीं थी। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के जिस तरह के स्त्री विरोधी बयान आए हैंउसके मददेनजर इस देश की राजनीतिक संस्कृति में महिलाओं के लिए बुनियादी लोकतंत्र की मांग को इस आंदोलन ने केंद्र में ला दिया है। कविता ने कहा कि इस गैंगरेप के बाद जिस तरह प्रधानमंत्रीमुख्यमंत्री और कुछ कालमिस्टों द्वारा माइग्रेंट मजदूरों और स्लम में रहने वालों को निशाना बनाया जा रहा हैउसका जबर्दस्त विरोध होना चाहिए।
संचालन करते हुए जसम दिल्ली की सचिव भाषा सिंह ने कहा कि इस आंदोलन के जरिए देश के अलग-अलग कोनों में हुई बलात्कार की भीषण घटनाओं के खिलाफ एक व्यापक जागरूकता आई है और एक निर्णायक माहौल बना है। भाषा सिंह ने कहा कि जसम स्त्रियों की आजादी और गरिमा के लिए चल रहे इस आंदोलन के प्रति एकजुटता जाहिर करता है और महिला संगठनों की मांगों का समर्थन करता है। गोष्ठी में समाजिक कार्यकर्ता सहजो सिंह ने भी अपने विचार रखे।
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(जसम का प्रेस नोट)

Saturday, December 22, 2012

राजेंद्र यादव के साथ बदसलूकी की निंदा

वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव के साथ बदसलूकी के विरोध में लेखकों का यह वक्तव्य आज  (22-12-2012)जनसत्ता में छपा है।

विभिन्न माध्यमों से पता चला है कि पिछले दिनों हिंदी के वयोवृद्ध लेखक राजेंद्र यादव के साथ उनके घर जाकर अजीत अंजुम नाम के व्यक्ति ने, जो टीवी का पत्रकार बतलाया जाता है, बदसलूकी और गाली-गलौज की।

यह अत्यनंत शर्मनाक और खेदजनक घटना है। हो सकता है, अजीत अंजुम की राजेंद्र यादव से कुछ शिकायतें  हों। हम उस मामले में कोई भी पक्ष नहीं ले रहे हैं। लेखक के रूप में हमारा मानना सिर्फ यह है कि जब विवाद लेखन को लेकर हो और दो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों के बीच हो तो उसे लोकतांत्रिक तरीके से हल किया जाना चाहिए।

हम इस तरह के व्यवहार की भर्त्सना करते हैं और अपेक्षा करते हैं कि अजीत अंजुम अपने इस व्यवहार के लिए अफसोस प्रकट करेंगे।

-नामवर सिंह          (मो.-  9868637566)

-केदारनाथ सिंह       (मो.- 9811210285)

-अशोक वाजपेयी      (मो.- 9811525653)

-आनंनदस्वरूप वर्मा  (मो.- 9810720714)

-मंगलेश डबराल        (मो.- 9910402459)

-मैत्रेयी पुष्पा              (मो.- 9910412680)

-पंकज बिष्ट              (मो.- 9868302298)

-प्रेमपाल शर्मा        (फोन- 011-22744596)

-भारत भारद्वाज        (मो.- 9313034049)