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Friday, October 1, 2010

मीर बाक़ी ने बनवायी जो कोई वह मस्जिद ही न थी

हलफ़नामा

नहीं ऐसा कभी नहीं हुआ
मनुष्य और कबूतर ने एक दूसरे को नहीं देखा
औरतों ने शून्य को नहीं जाना
कोई द्रव यहाँ बहा नहीं
फर्श को रगड़ कर धोया नहीं गया

हल्के अँधेरे में उभरती है एक आकृति
चमकते हैं कुछ दाँत
कोई शै उठती है कील पर टंगी कीई चीज़
उतारती है चली जाती है

नहीं कोई बच्चा यहाँ सरकंडे की
तलवार लेकर मुर्गी के पीछे नहीं भागा

बंदरों के क़ाफ़िलों ने
कमान मुख्यालय पर डेरा नहीं डाला

मैंने सारे लालच सारे शोर सारे
सामाजिक अकेलेपन के बावजूद केबल कनेक्शन
नहीं लगवाया

चचा के मिसरों को दोहराना नहीं भूला
नहीं बहुत सी प्रजातियों को मैंने
नहीं जाना जो सुनना न चाहा
सुना नहीं, गोया बहुत कुछ मेरे लिए
नापैद था

नहीं पहिया कभी टेढ़ा नहीं हुआ

नहीं बराबरी की बात कभी हुई ही नहीं
(हो सकती भी न थी)

उर्दू कोई ज़बान ही न थी

अमीरख़ानी कोई चाल ही न थी

मीर बाक़ी ने बनवायी जो
कोई वह मस्जिद ही न थी

नहीं तुम्हारी आँखों में
कभी कोई फ़रेब न था।

असद ज़ैदी की यह कविता उनके कविता संग्रह `सामान की तलाश` से ली गई है।

Wednesday, February 6, 2008

असद ज़ैदी की कविता 'सामान की तलाश'

असद ज़ैदी हमारे वक़्त के महत्वपूर्ण कवि हैं। तीन दिन पहले ही परिकल्पना ने उनका नया संग्रह `सामान की तलाश' साया किया है। साथ ही उनका पहला संग्रह `बहनें और अन्य कवितायेँ' को भी इस प्रकाशन ने दोबारा छापा है। इन दिनों बहस का सबब (हिन्दी के बंद दिमाग अध्यापक-आलोचक समाज की नाराजगी का भी ) बनी उनकी कविता `1857 : सामान की तलाश' भी इस संग्रह में है।


1857 : सामान की तलाश


1857 की लड़ाइयां जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं
आज बहुत पास की लड़ाइयां हैं

ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब
हर गलती अपनी ही की हुई लगती है
सुनायी दे जाते हैं ग़दर के नगाडे और
एक ठेठ हिन्दुस्तानी शोरगुल
भयभीत दलालों और मुखबिरों की फुसफुसाहटेँ
पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलकदमी

हो सकता है यह कालांतर में लिखे उपन्यासों और
व्यावसायिक सिनेमा का असर हो

पर यह उन 150 करोड़ रुपयों के शोर नहीं
जो भारत सरकार ने `आजादी की पहली लड़ाई' के
150 साल बीत जाने का जश्न मनाने के लिए मंज़ूर किये हैं
उस प्रधानमंत्री के कलम से जो आजादी की हर लड़ाई पर
शर्मिंदा है और माफी मांगता है पूरी दुनिया में
जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए कुछ भी
कुर्बान करने को तैयार है

यह उस सत्तावन की याद है जिसे
पोंछ डाला है था एक अखिल भारतीय भद्रलोक ने
अपनी अपनी गद्दियों पर बैठे बन्किमों और अमीचंदों और हरिश्न्द्रों
और उनके वंशजों ने
जो खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे
जिस सत्तावन के लिए सिवा वितृष्णा या मौन के कुछ नहीं था
मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, इश्वरचंद्रों, सय्यद अहमदों,
प्रतापनारायणों, मैथिलिशरणों और रामचन्द्रों के मन में
और हिन्दी के भद्र साहित्य में जिसकी पहली याद
सत्तर अस्सी साल बाद सुभद्रा को ही आयी

यह उस सिलसिले की याद है जिसे
जिला रहे हैं अब 150 साल बाद आत्महत्या करते हुए
इस ज़मीन के किसान और बुनकर
जिन्हें बलवाई भी कहना मुश्किल है
और जो चले जा रहे हैं राष्ट्रीय विकास और
राष्ट्रीय भुखमरी के सूचकांकों की खुराक बनते हुए
विशेष आर्थिक क्षेत्रों से निकलकर
सामूहिक कब्रों और मरघटों की तरफ
एक उदास, मटमैले और अराजक जुलूस की तरह
किसने कर दिया है उन्हें इतना अकेला?

1857 में मैला-कुचैलापन
आम इंसान की शायद नियति थी, सभी को मान्य
आज वह भयंकर अपराध है

लड़ाइयां अधूरी रह जाती हैं अक्सर, बाद में पूरी होने के लिए
किसी और युग में किन्ही और हथियारों से
कई दफे तो वे मिले-कुचैले मुर्दे ही उठकर लड़ने लगते हैं फिर से
जीवितों को ललकारते हुए जो उनसे भी ज्यादा मृत हैं
पूछते हैं उनकी टुकड़ी और रिसाले और सरदार का नाम
या हमदर्द समझकर बताने लगते हैं अब मैं नज़फगढ़ की तरफ जाता हूँ
या ठिठककर पूछने लगते हैं बख्तावारपुर का रास्ता
1857 के मृतक कहते हैं भूल जाओ हमारे सामंती नेताओं को
कि किन जागीरों की वापसी के लिए वे लड़ते थे
और हम उनके लिए कैसे मरते थे

कुछ अपनी बताओ

क्या अब दुनिया में कहीं भी नहीं है अन्याय
या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय।