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Wednesday, December 28, 2016

मनमोहन की मशहूर कविता ‘आ राजा का बाजा’


‘आ राजा का बाजा’ कविता के बारे में
-मनमोहन
पिछले दो-ढाई साल से इस कविता का एक अजीबोगरीब पाठ फेसबुक पर घूम रहा है और जो कभी भी, कहीं भी प्रकट हो जाता है, उसके बारे में मैंने कई बार स्पष्टीकरण दिया है कि यह कविता का मूल पाठ नहीं है। लेकिन यह फिर भी जारी है। अरसे तक मेरे लिए यह गुत्थी ही बनी रही कि कविता के इस पाठ का स्रोत क्या है? बहुत बाद में पता चला कि कविता-कोश में यह कविता इसी तरह दर्ज है और वहीं से लोग इसे उठाते हैं। मेरे कहने पर अनिल जनविजय ने इसे कविता-कोश से हटा दिया। लेकिन अभी भी कविता का यही पाठ सर्कुलेशन में है। इसमें यकीनन कुछ दोष मेरा भी है कि मैं इसके मूल पाठ को पेश न कर सका।
यह कविता आपात्काल की दहशत भरी परिस्थिति में लिखी गई थी और घोर आपात्काल के दिनों में ही ‘उत्तरार्ध’ के संभवतः ग्यारहवें फासीवाद विरोधी अंक में अन्य कुछ कविताओं के साथ प्रकाशित हुई थी। उन दिनों इसका अनेक ढंग से उपयोग हुआ। आपात्काल खत्म होने के बाद के वर्षों में जन नाट्य मंच ने ‘राजा का बाजा’ नाम से बेरोजगारी पर एक नाटक किया, जिसका शीर्षक के अलावा कविता से सिर्फ इतना लेना-देना था कि उसमें इस कविता की चंद पंक्तियों को अपने ढंग से बदलकर और एक आरती की धुन में ढालकर पैरोडी की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था। वही पंक्तियाँ शायद किसी विधि से कविता कोश वालों के हाथ लग गईं।
देश की मौजूदा परिस्थिति आपात्काल के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर और भयावह है। आपात्काल के तुरंत बाद के समय की मानसिकता से तो यह और भी उलट है। ऐसे में इस कविता के नाम पर चल रहा पैरोडी पाठ और उसकी उत्फुल्ल ‘जय जगदीश हरे’ धुन मुझे खासतौर पर परेशान कर रही थी।
‘उत्तरार्ध’ के अनेक पुराने अंक नापैद हो गए हैं। मैंने उन्हेें हासिल करने की कोशिश कई बार की लेकिन नाकामयाब रहा। अचानक करीब आठ-दस साल पहले अपनी ही पत्रिकाओं में आपात्काल के दौर का एक क्षत-विक्षत जर्जर अंक हाथ लगा, तभी यह और कुछ अन्य कविताएँ किसी तरह फोटोकाॅपी कराकर रख ली थीं। उन्हीं को ढूँढ़कर निकाला है और अब (रिकाॅर्ड ठीक करने के लिए) यह पोस्ट कर रहा हूँ।


आ  राजा  का  बाजा  बजा

ता ऽ थे ई  ता ऽ
ता ऽ  गा ऽ
रो टी  खा ... न  खा ...
गा ऽ
आ ...
आ  रा जा  का  बा जा  ब जा

स च  म त  क ह
चु प   र ह...  चु प  र ह ...
स ह  स ह  स ह

रा श न
न न ... न न ...
ईं ध न ...
न न ... न न ...
ब र त न   ठ न  ठ न
चु प... चु प...
श ठ   सु न...
सु न...  चा बु क  च म का र
ज न  ग न  म न
अ धि ना य क.... ना य क ...
उ न्ना य क...     प त वा र
जी व न   खे व न हा र

त न  म न  वे त न
स ब  अ र प न  क र
तु र त   तु र त
भ ज  उ त्पा द न ... पा द न...
के व ल

मू क  ब धि र  बन
व ध  ल ख
म त  क र
कु न मु न

झु ल स न  ठि ठु र न  स ब
म न  की  त न  की  पी...
पी... जी...

ल ब  रँ ग  चु न  ज प
अ नु शा स न
शा स न
के व ल

मु ड़  तु ड़  नि चु ड़  नि चु ड़
इ त   उ त  उ ड़  म त
लु ट  पि ट  बि क
धि क्  उ फ  म त  क र

जु त    च ल  उ ठ
झ ट प ट  क र
श्र म  से  न  ड र
श्र म  से  न  ड र
श्र म  से  न  ड र

ड ग  में  ड ग म ग  म त  क र
म ग में  म त  क र  ह र क त
ब क  ब क  ब स  क र
च ट  प ट  क र  क र त ल
सं भ ल  सं भ ल  च ल
आ ता  है  र थ
ल थ प थ  ज न प थ  प र

छ म...छ म...
ल क द क     स ज ध ज
आ ता  है  रा ज कुं व र  को म ल
ओ  रे  ख ल  ब न  ट म ट म

इ ठ  म त
ह ठ  त ज
च ल  उ ठ
झ ट प ट  क र

आ ... गा...
ता ... थे ई ...ता ...ऽ ऽ
आ ऽ

आ  रा जा  का  बा जा  ब जा।

Friday, September 16, 2016

सीपीआईएम की आंखों पर हिंदुत्व का परदा?

`लग्गी जे तेरे कालज़े हाल्ले छुरी नहीं
एह ना समझ शहर दी हालत बुरी नहीं`
(सुरजीत पात्तर की पंक्तियां)

 


`देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उसमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।` 

- प्रकाश करात


CPIM (माकपा) के अब चल बसे, रिटायर हो गए या कर दिए गए नेताओं की पीढ़ी की अगुआई के दौरान युवा नेता-कार्यकर्ता कहा करते थे कि प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे युवाओं (असल में तब अधेड़) के हाथ में बागडोर आएगी तो पार्टी अपने सच्चे इंक़लाबी ट्रैक पर दौड़ने लगेगी। इन दोनों में से भी करात को ही ज्यादा सिद्धांतवादी और टंच खरा माना जाता रहा था। पार्टी के सर्वोच्च पद पर करात के बाद येचुरी की बारी आई है। इस बीच फासिस्ट ताकतों के खिलाफ देशव्यापी संघर्ष का दम भरने वाली पार्टी अपना गढ़ कहे जाने वाले बंगाल में ही बद से बदतर स्थिति का शिकार होती गई है। देश के मौजूदा हालात के बीच किसी भी प्रगतिशील या सेक्युलर कही जाने वाली पार्टी को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ ही सकता है। लेकिन, निराशाजनक यह है कि ऐसी विकट परिस्थितियों में CPIM अपने दो सबसे दैदीप्यमान कहे गए सितारों के लगातार टकराव के लिए चर्चा में रही है। यहां तक कि पार्टी के सबसे पुराने नेताओं में शामिल अच्युतानंदन तक को सार्वजनिक अपमान का बार-बार सामना करना पड़ा। खुले में हो रही इन कारगुजारियों को पीत पत्रकारिता या सिनीसिज़्म कहकर टाल पाना भी तब मुमकिन न रहा जब करीब तीन महीने पहले CPIM की सेंट्रल कमेटी की बैठक में से गुस्से से बाहर निकलीं सेंट्रल कमिटी की मेंबर और एडवा की जनरल सेक्रेट्री जगमति सांगवान ने मीडिया के सामने पार्टी के सभी पदों और सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। जगमति को बंगाल चुनाव में करारी हार पर चर्चा के दौरान कांग्रेस से गठजोड़ को लेकर प्रस्ताव की भाषा पर ऐतराज था। उनके मुताबिक हल्के शब्द का इस्तेमाल कर बंगाल में हुई गलती को छुपाने की कोशिश हो रही थी। माना यह भी गया था कि जगमति करात केम्प से थीं और इसलिए इतनी आक्रामक हुई थीं। बहरहाल, पार्टी ने इस्तीफा दे देने वालों को भी निष्कासित करने की अपनी परंपरा जगमति के साथ भी दोहरा दी थी। इसके बाद भी कांग्रेस से गठजोड़ के इस मुद्दे के बहाने पार्टी की भीतरी कलह जारी रही थी। लेकिन, कांग्रेस से गठजोड़ के औचित्य-अनौचित्य की बहस के बीच करात ने अचानक बीजेपी और संघ परिवार को सर्टीफिकेट देते हुए कह दिया कि `देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`

स्वभाविक है कि हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता का यह बयान सकते में डालने वाला था। और यह अचानक `जुबान फिसलने वाला मसला नहीं था`, बाकायदा अखबार में लेख लिखकर छपवाया गया था। अाउटलुक के मुताबिक- इरफान हबीब ने माकपा पोलित ब्यूरो को एक कड़ी चिट्ठी लिखकर पार्टी की राजनीतिक-रणनीतिक लाइन को लेकर सवाल उठाया था। इरफान हबीब के अनुसार, `माकपा को भाजपा एवं संघ परिवार जैसे फासीवादी ताकतों को रोकने के उपाय सोचने चाहिए। न कि कांग्रेस को लेकर बेमतलब की बहस में उलझना चाहिए।` जवाब में प्रकाश कारात का मन्तव्य आया है कि `देश में अभी जो राजनीतिक हालात हैं, उनमें यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है। इन हालात में माकपा को किसी अन्य की जरूरत नहीं। माकपा की वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है।`

करात चाहते तो सिर्फ इतना कह सकते थे कि बंगाल के चुनावी गठजोड़ से लेकर यूपीए सरकार को समर्थन समेत तमाम पुराने अनुभवों और कांग्रेस की राजनातिक-आर्थिक नीतियों के मद्देनज़र अब आगे कांग्रेस से गठजोड़ का कोई तुक नहीं बनता है। माकपा को किसी अन्य की जरूरत नहीं है। वे पार्टी के पारंपरिक वाक्य को भी साथ में रख ही सकते थे कि माकपा की वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है। कांग्रेस से गठजोड़ के विरोध के लिए क्या इतना काफी नहीं था? पर शायद उन्हें बीजेपी-संघ को एक सर्टीफिकेट देने की ही जरूरत थी और यह मुमकिन नहीं है कि वे नहीं जानते थे कि पूरा फोकस इसी पर होना है और इसी पर विवाद खड़ा होना है। सवाल यह है कि इसके पीछे वजह क्या थी। क्या वे संघ के फासिस्ट हिंदुत्ववादी अभियानों के देशव्यापी व्यापक असर के बीच हिंदू जनता को कोई संदेश देना चाहते थे? आखिर, सभी सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियां मान ही चुकी हैं कि मुसलमानों पर जुल्मो सितम के मसले पर बहुत कड़े सैद्धांतिक स्टेंड पर रहने से बदली हुई परिस्थितियों में चुनावी राजनीति के लिहाज से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी CPIM ग़रीब मुसलमान जनता का विश्वास वापस हासिल करने में नाकाम रह चुकी थी। केरल में करात के विश्वसनीय माने जाने वाले पी. विजयन ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही अखबारों में जो विज्ञापन जारी किया था, उसमें भी केरल को A Truly God`s Own Country  में तब्दील करने की प्रतिबद्धता जताई थी। दक्षिण में संघ के बढ़ते असर से भी शायद विजयन एंड कंपनी को यह खतरा हो कि भविष्य में केरल में भी कांग्रेस के बजाय मुकाबला बीजेपी से ही हो सकता है। शायद यह अकारण नहीं है कि एक तरफ केरल की CPIM सरकार संघ की शाखाओं को लेकर कुछ कड़े फैसले ले रही हो और तभी केरल के ही पार्टी के सर्वाधिक प्रसार वाले मलयाली मुखपत्र में करात लिख रहे हों कि `यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`।

हर स्याह-सुफ़ेद के बावजूद सीपीआईएम से उम्मीद का रिश्ता बनाए रहे सेक्युलर कार्यकर्ताओं और पार्टी से बाहर रहकर भी उस पर यक़ीन रखने वालों पर क्या गुजरी होगी, यह सोचकर भी दिल परेशान हो उठता है। पार्टी की सेंट्रल कमेटी या उसके महासचिव तुरंत करात के कथन से पल्ला झाड़ सकते थे। लेकिन, सियासत के उस प्रचलित जुमले `यह उनकी निजी राय है, पार्टी इससे इत्तेफाक नहीं रखती है`, को भी कष्ट देना जरूरी नहीं समझा गया। कुछ लोगों का ख्याल था कि करात का बयान पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए चल रही उठापटक का हिस्सा है। लेकिन, इस बारे में जवाब देने के बजाय बंगाल इकाई भी चुप्पी ही साधे रही। तो क्या बंगाल इकाई और उसके संरक्षक कहे जा रहे सीताराम येचुरी को भी यह भय सताया कि करात के बयान का स्पष्ट विरोध जिस बहस को जन्म दे सकता है, वह बंगाल के हिंदू अभिजात्य और हिंदू मध्य वर्ग को और दूर छिटका सकती है? या फिर जो भी मजबूरी रही हो, पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने करात के कथन को (जो बकौल एक बुजुर्ग कॉमरेड, प्रकाश करात के चेहरे पर bad patch की तरह है) पार्टी के चेहरे पर नहीं चिपका दिया? क्या अब यह नहीं माना जाना चाहिए कि यही पार्टी लाइन है?  
`वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है`, में यूं भी पार्टी के प्राय: हर इलाके के नेतृत्व के लिए व्यापक अपील है। जब कि फासिस्ट झुंड़ कभी भी, कहीं भी, बिना किसी भी वजह के सामूहिक हत्याओं और रेप जैसी वारदातों को उत्सव की तरह अंजाम दे रहे हों, संवैधानिक संस्थाओं को बेमानी किया जा रहा हो, तब सिर्फ मज़दूर एकता ज़िंदाबाद जैसे नारे लगाकर आंखें मूंद लेना ही शायद ज्यादा सुविधाजनक हो। वरना क्या वजह थी कि पार्टी काडर भी अपने नेता के बयान पर खामोशी ओढ़कर बैठ जाए? आखिर एक कार्ड होल्डर का फर्ज़ प्रतिवाद भी होता होगा? लेकिन, एक बड़ा बुद्धिजीवी तबका जो लगातार खुद भी बता रहा था कि फासिस्ट घेरेबंदी हो चुकी है और यह कई मायनों में अभूतपूर्व है, कि यह घेरेबंदी लोकतंत्र को प्रहसन में तब्दील कर बिना किसी इमरजेंसी के ही कर दी गई है, कि फासिस्ट हमारी जनता की चेतना का अपहरण कर चुके हैं, कि मीडिया और देशी-विदेशी पूंजीवादी घराने, कितने ही डोमा उस्ताद और तमाम लुंपन समूह फासिस्टों के साथ खड़े हैं, कि देश को युद्धोन्माद पर रख दिया गया है, कि देश में कई राज्यों में जनता के खिलाफ ही युद्ध जैसी स्थितियां पैदा कर दी गई हैं, कि देश की गरिमा, तमाम संसाधन गिरवी रख दिए गए हैं, कि...। जी, एक बड़ा बुद्धिजीवी तबका जो हमें लगातार फासिस्टों से आगाह कर रहा था, उसे भी अचानक काठ मार गया। क्या उसे अपना लिखा-कहा अब एक पार्टी के नेता के बयान के बाद डिलीट करना था? उस कथन के पक्ष में तर्क जुटाने थे? या हमेशा की तरह हस्तिनापुर की गद्दी से बंधे होने की भीष्म पितामही घुटन में डूबकर मर जाना था? 
लेकिन, जब लंबी प्रैक्टिस बड़े नामों को खामोश रहने पर मजबूर कर दे, तब भी कोई बोल ही पड़ता है। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया बोले-  `एक वामपंथी बुजुर्ग नेता जो कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, ने कहा है कि मोदी सरकार निरंकुश है लेकिन फासिस्ट नहीं है. मेरा उन कामरेड से कहना है कि अगर वह और लड़ना नहीं चाहते हैं तो रिटायर हो जाएं और न्यूयॉर्क चले जाएं. हम अपनी लड़ाई खुद लड़ लेंगे.' दूसरी-तीसरी पंक्ति के लोगों से जवाब में जो कहलाया गया, उसमें बौखलाहट ज्यादा थी- 'कन्हैया कल का लड़का, पोस्टर बॉय, अति उत्साही, अचानक लाइम लाइट में आ गया हीरो, उसे सीमा में रहना चाहिए, फासीवाद फासीवाद...हुं...बुर्जुआ..' टाइप। लेकिन, कन्हैया खुद संघर्ष और यातनाओं से गुजर रहे हैं, उनका मजाक उड़ाना उलटा ही पड़ रहा था। इन्हीं कन्हैया को सीपीआईएम चुनाव प्रचार में ले जाने के लिए उतावली थी। बात तो यह है कि इस युवा का आने वाला कल पतनशील भी हो जाए तो भी न उसका आज का संघर्ष बेमानी होगा, न उसका सवाल। असल में, कन्हैया की नसीहत की चोट गहरी थी। एक सज्जन लिख रहे थे कि क्या कन्हैया के कहे से कांग्रेस और भ्रष्ट क्षेत्रीय दलों से समझौते कर लिए जाएं। कोई पूछ सकता था कि क्या आपकी पार्टी अभी तक लगातार यही नहीं करती आई थी। 
लेकिन, गौरतलब यह था कि कन्हैया को दिए जा रहे जवाब में साम्प्रदायिकता का जिक्र भी भेड़िया आया-भेड़िया आया जैसे जुमले से किया जा रहा था। 2 सितंबर की हड़ताल का हवाला देकर कहा जा रहा था कि मजदूरों की लड़ाई यानी वर्ग संघर्ष ही एक रास्ता है। मध्य वर्गीय मसलों को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है। यह दिमाग़ी पतन, गद्दारी और बेशर्मी का चरम था। क्या सामूहिक हत्याओं का शिकार बनाए गए लोग, बलात्कार का शिकार बनाई गई महिलाएं, जलती आग में फेंक दिए गए बच्चे - ये मध्य वर्ग के मसला थे? 
Jairus Banaji ने प्रकाश करात के जवाब में जो तीखा लेख लिखा, उस पर भी कई दिन गहरी चुप्पी रही। आख़िर अब Vijay Prashad ने उनका रिजोइंडर लिखा है पर वह भी मूल सवाल का जवाब देने के बजाय 2 सितंबर की हड़ताल, वर्ग संघर्ष और फासिज्म की परिभाषाएं ही देता है। आपको याद होगा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद के वर्षों में पहले बीजेपी की केंद्र में साझा सरकार बनने और फिर गुजरात हिंसा के बाद केंद्र में मोदी के बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का प्रधानमंत्री बनने तक कहा जाता था कि देश में इतनी विविधताएं हैं और उसका सेक्युलर ढांचा इतना मजबूत है कि बीजेपी मनमानी करने लायक बहुमत हासिल नहीं कर सकती है। यह भी नसीहत दी जाती थी कि मोदी का जिक्र करना ही मोदी को मजबूती देता है। करात और उनकी बुद्धिजीवी टीम अभी भी न सिर्फ लगभग वैसी ही बातें दोहरा रही है बल्कि नई हास्यास्पद बातें भी कर रही है-  
`There is no imminent crisis to the fractured and complex Indian bourgeoisie, nor is there any indication that the BJP government has the stomach to move against the Constitution or even towards an Emergency regime. The BJP pushes its right-wing agenda, but it is hampered by a host of political adversaries – not only political parties, but also pressure groups and mass sentiment that will not allow it to enact its complete agenda. The fact that one hundred and eighty million workers went on strike shows that there remains wide opposition to the BJP’s ‘labour reform’ agenda, one that is otherwise quite acceptable to large sections of the parliamentary opposition (including the Congress Party).`
हालांकि इस बात का जवाब ऊपर दिया जा चुका है और असल में तो जवाब देना ही गैरजरूरी है कि क्या बीजेपी के संविधान के खिलाफ जाने या इमेरजेंसी लाने की संभावनाएं हैं। और क्या यह सब करने के लिए इमरजेंसी की जरूरत है? क्या आपके नेताओं और बुद्धिजीवियों के पुराने कहे-लिखे और आपके अखबारों के पन्नों को ही आपके आगे नहीं कर दिया जाना चाहिए? क्षेत्रीय दलों और प्रेशर ग्रुप्स के हालात और नतीजों पर भी क्या अलग से रोशनी डालने की जरूरत है? और मास सेंटीमेंट? क्या सारा खेल मास सेंटीमेंट पर ही नहीं खेला जा रहा है? क्या मास सेंटीमेंट के नाम पर ही घरों में घुसकर हत्याएं नहीं की जा रही हैं? क्या आपको याद है कि फांसी के फैसले तक में The collective conscience of the society का हवाला दिया जा चुका है? 
आप अब एक खोज लाते हैं कि आरएसएस की विचारधारा फासिस्ट न होकर सेमी फासिस्ट है। क्योंकि `it can never hope to achieve hegemony over the popular imagination, but has to impose its fascistic ideology from above, through the institutions, by manipulation of the media, by deceit rather than by the creation of conviction.` काश इतना भी सही होता। संघ का यक़ीन मीडिया और तमाम संस्थाओं पर कब्जे से ज्यादा  popular imagination पर ही रहा है। या कहिए कि इसी रास्ते से वह इस स्थिति में पहुंची है कि पूंजीवादी ताकतें और अमेरिका उस पर यकीन कर सके कि उनके एजेंडे को निर्बाध ढंग से लागू करने की क्षमता कांग्रेस से ज्यादा बीजेपी में है। popular imagination पर असर डालकर या वहां पहले ही मौजूद कचरे से तालमेल कर वह तमाम संस्थाओं को कब्जाने और संचालन करने की स्थिति में पहुंचा है। हकीकत यह है कि इतनी विशाल पार्टी होने और संघर्षों का इतिहास होने के बावजूद CPIM और दूसरी सेक्युलर शक्तियां इस मोर्चे पर सबसे ज्यादा नाकाम रही हैं।  
``Fissures along caste and regional lines are too deep to allow the RSS to dig its roots into the Indian popular imagination. If it elevates Hindi, it will alienate Tamils. If it pushes the Ram Mandir, it does not speak as loudly to Bengalis as those who read Tulsidas. The BJP – the electoral arm of the Parivar – finds it hard to break into regions of India where the RSS is not as powerful. It makes alliances. These are opportunistic. These alliances strengthen the BJP in Delhi, but do not allow it to penetrate the popular consciousness elsewhere.`` क्या कोई भोलेपन से इन बातों पर यक़ीन कर सकता है? जाति और क्षेत्रवाद के गड्ढ़ों का सबसे ज्यादा फायदा संघ ने ही उठाया है. दलितों और पिछड़ों से घोषित घृणा के बावजूद, आरक्षण का सैद्धांतिक विरोध करने के बावजूद अपने अभियानों में इनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी करने की कुव्वत को संघ साबित करता रहा है। लगभग एक ही खित्ते में वह एक जगह एक जाति की घृणा का इस्तेमाल कर सकता है और लगभग उसी जगह में दूसरी जाति की घृणा का। हरियाणा और वेस्ट यूपी के दंगों का अध्ययन आपके काम का हो सकता है। बंगाल, नोर्थ ईस्ट, साउथ कहां उसकी ताकत नहीं है? दरअसल, कॉमन सेंस का जैसा निर्माण या इस्तेमाल संघ ने किया है और जिस तरह की सामग्री लगातार वॉट्सएप और सोशल मीडिया के दूसरे साधनों से लगातार प्रसारित होती है और उसका जैसा असर होता है, उसका कोई अनुमान आपको क्यों नहीं है? ऐसा नहीं है कि दूसरी संभावनाएं नहीं थीं या नहीं हैं, पर या तो इस मोर्चे पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया या फिर इसका हवाला देकर काम चलाया जाता रहा।

`When the BJP is on the RSS’s (and VHP’s) turf, then matters are different. The Gujarat pogrom of 2002 took place in a setting where the RSS and the VHP had prepared the terrain.`  ऐसी बातों पर क्या कहा जाए? बीजेपी कहां आरएसएस (हां VHP भी तो वही है) के टर्फ पर नहीं है? जहां बीजेपी आपको अकेली मजबूत नहीं दिखाई देती, वहां भी आरएसएस टर्फ बिछा रही होती है या बिछा चुका होता है। आप क्या नहीं जानते हैं कि नॉर्थ ईस्ट में भी, केरल में भी, बंगाल में भी? कई बार अपनी रणनीति के तहत उस टर्फ पर वह दूसरी पार्टियों को चलने दे रहा होता है। 
कांग्रेस के साथ गठजोड़ न करें, आप अकेले संघर्ष करें, इससे क्या एतराज हो सकता है? सवाल आपकी इसी लाइन से है- `यह कहना उचित नहीं कि फासीवाद आ गया है। भाजपा और संघ परिवार की जो कोशिश चल रही है, उसे अधिनायकवादी मानसिकता कहा जा सकता है।`। 
और इसके बचाव में आपके तर्कों से। `वर्गसंघर्ष की लाइन ही पर्याप्त है` कहते हुए आप अरसे तक दलितों और स्त्रियों के सवालों से मुंह मोड़ते रहे। आपके नेतृत्व से वे गायब रहे और फिर तमाम संघर्षों के बावजूद आप उन तबकों में विश्वसनीयता खोते रहे। एक सवाल आपसे लगातार और अब सच्चर आयोग का हवाला देकर पूछा ही जाता रहा है कि आखिर बंगाल में इतने बरसों के शासन में मुसलमान और दूसरे कमजोर तबकों की हालत इतनी दयनीय क्यों रही। यह भी कि आदिवासी क्षेत्रों में जब भयंकर दमन शुरु हुआ, तो आप कहां खड़े थे? सोनी सोरी तो नक्सलवादी नहीं थीं। यदि वे नक्सल या संघ की भी कार्यकर्ता होतीं तो भी एक स्त्री की योनि में पत्थर भर देने के कृत्य के इतना चर्चित हो जाने के बावजूद आप की महिला विंग तक खामोश क्यों बनी रहीं? क्या वजह है कि आपके पास बुद्धिजीवियों का बड़ा जखीरा होने के बावजूद मुश्किल मसलों पर खामोशी छा जाती थी और अरुंधति जैसे ऑथेंटिंक स्वर आप बर्दाश्त नहीं कर पाते थे? क्या आप जानते हैं कि लेफ्ट के लिए सरकार बना पाने से ज्यादा मूल्यवान अगर कुछ है तो विश्वसनीयता ही है? और क्या आप जानते हैं कि ताजा प्रकरण में आप वही खो रहे हैं?
जहां तक 2 सितंबर की हड़ताल का सवाल है, तो आपको सलाम। लेकिन अगर आप इसे और हड़ताल में शामिल `one hundred and eighty million` लोगों के शामिल होने को करात की लाइन (जो कि अब पार्टी लाइन ही लगती है), का कवच बनाएंगे तो हमें आपको बताना पड़ेगा कि इनमें एक हिस्सा उस मध्य वर्ग और सरकारी नौकरियों के पैसे से उच्च वर्ग में तब्दील हो चुके लोगों का भी था, जिसे प्राथमिकता न देने के नाम पर आपके लोग साम्प्रदायिकता के सवाल को भेडि़या-भेड़िया आया करार देने लगते हैं। और हड़ताल में शामिल होने व इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगा लेने के बावजूद इस तबके की प्राथमिकता में भी ये सब सवाल शामिल नहीं हैं। वेतन बढ़वाने के लिए इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाने वालों की बड़ी संख्या बीेजपी को वोट भी करती रही। यह बात किसी हद तक कमजोर तबके के मजदूरों के बारे में भी कही जा सकती है। यह बताने का मक़सद आंदोलन को प्रश्नांकित करना नहीं है बल्कि यह याद दिलाना है कि इसकी ओट में आप एक बुरे रास्ते पर चल पड़ने का बचाव नहीं कर सकते।

(मेरी अंग्रेजी कमजोर है और आपकी बातें अंग्रेजी में ही होती हैं। मेरी मूल चिंता को न भूलिएगा और अपने कदमों को उस रास्ते से वापस खींचिएगा तो आपका सबसे बड़ा अहसान लेफ्ट लीगेसी पर होगा।)
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प्रकाश करात का इलस्ट्रेशन Hindustan Times की साइट से साभार
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(आप यह पोस्ट KAFILA पर अंग्रेजी में भी पढ़ सकते हैं।)

Monday, March 3, 2014

नवउदारवाद और सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार : प्रभात पटनायक


जलेस के इलाहाबाद में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन के साझा संस्कृति संगम में प्रभात के आलेख का सम्पूर्ण पाठ


जनतंत्र की वैधता के लिए अवाम के बीच इस यक़ीन की जरूरत पड़ती है कि वे जनतांत्रिक प्रक्रिया में शिरकत करके अपनी जि़दगी में बेहतरी ला सकते हैं। यह यक़ीन झूठा भी साबित हो सकता है, यह केवल एक भ्रांति भी हो सकता है। जब यह भ्रांति नही रहती तो लोग न केवल जनतंत्र के बारे में सर्वनिषेधवादी होने लगते हैं, बल्कि उन्हें यह भी लगने लगता है कि वे अपने इन प्रयत्नों से अपनी जिंदगी में बेहतरी नहीं ला सकते। इस तरह की हताशा उन्हें किसी ‘उद्धारक’ या ‘अवतारी पुरुष’’ की खोज की ओर ले जाती है जिसमें उन्हें बेहतर ज़िंदगी दे पाने की अभूतपूर्व ताक़त की झलक दिखायी देती हो और जो उनको बदहाली से उबार सके। अवाम तब ‘तर्कबुद्धि के पक्ष में’ नहीं रह जाते, वे अतर्क की दुनिया में विचरण करने लगते हैं।

वित्तीय पूंजी के वर्चस्व के ज़माने में ऐसे ‘उद्धारकों’ और ‘अवतारी पुरुषों’ को अजीबोग़रीब तरीक़े से उस कारपोरेट क्षेत्र के द्वारा गढ़ा जाता है या उछाला जाता है, या ऐसे मामलों में जहां वे अपने कारनामों से उठने लगते हैं, कारपोरेट वित्तीय पूंजी अपने नियंत्रण वाले मीडिया का इसके लिए इस्तेमाल करती है, उनका निज़ाम कारपोरेट निज़ाम का समानार्थी हो जाता है। फ़ासीवाद का बीज-बिंदु यही है। (मुसोलिनी ने, जैसा कि हमें याद यहां याद आ रहा है, लिखा था कि फ़ासीवाद को वास्तविक अर्थो में कॉरपोरेटवाद कहना समीचीन होगा क्योंकि इसमें राजसत्ता कॉरपोरेट सत्ता में विलीन हो जाती है) इस तरह अवाम के, जनतंत्र के माध्यम से अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने की प्रक्रिया में यक़ीन के ख़ात्मे से वे हालात पैदा होते हैं जिनमें फासीवाद फलता फूलता है।


इसकी मिसाल जर्मनी के ‘वेइमार रिपब्लिक’ में देखी जा सकती है। अवाम की नज़रों में ‘वेइमार रिपब्लिक’ की वैधता ख़त्म हो चुकी थी क्योंकि वर्सीलीज़ संधि के फलस्वरूप मित्र शक्तियों ने हर्जाने का जो बोझ अवाम पर डाला था जिसकी वजह से अवाम की बढ़ती हुई बदहाली दूर कर पाने में एक के बाद एक चुनाव से बनी सरकार कामयाब न हो पायी थी। जनतंत्र की वैधता से यक़ीन उठ जाना ही वह विशेष कारण बना जिसने अवाम को नाज़ीवाद के आकर्षण के जाल में फंसा लिया। ‘वेइमार रिपब्लिक’ की असफलता को कम से कम उस शांति संधि में तलाश तो किया जा सकता है (जिसके खि़लाफ़ अर्थशास्त्री केंस ने आवाज़ उठायी थी)। मगर आज ‘ग्लोबलाइजे़शन’ के इस ज़माने में उसी तरह अवाम के बीच राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से बेहतर ज़िंदगी जी पाने में यक़ीन का ख़ात्मा हो गया है, साथ ही इस यक़ीन के ख़ात्मे की जड़ें इसी व्यवस्था के भीतर हैं। नव-उदारवाद के तहत यह प्रवृत्ति उभरती है कि जनतांत्रिक सस्थाओं की शक्ति पर से विश्वास उठ जाये और इसी से जुड़ा हुआ अतर्क बुद्धि का और फ़ासीवाद का विकसित होना है।

इसी तथ्य को दूसरे तरीक़े से समझा जा सकता है: नव-उदारवाद राजनीति के क्षेत्र को ‘अंत’ यानी ‘क्लोज़र’ की ओर धकेलता है जहां लोगों के सामने राजनीतिक विकल्पों में आर्थिक नीतियों पर एकरूपता दिखायी देती है, इससे अवाम की जिंदगी के हालात में उनके द्वारा चुने गये विकल्प से बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। यह ‘अंत’ या क्लोज़र केवल ‘नज़रिये’ का मामला नहीं है। दार्शनिक हेगेल ने इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को प्रशियाई राजसत्ता के गठन के साथ आये अंत के रूप में देखा था। दर्शनशास्त्र में हेगेलवाद के विकास के समांतर ही अर्थशास्त्र में जो नया सिद्धांत विकसित हुआ, उसने भी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के उभार के साथ इतिहास के अंत की बात की थी। मगर ये सिर्फ ‘नज़रिये’ ही थे। इसके विपरीत, नव-उदारवाद एक साथ दो स्थितियां पैदा करता है, एक ओर वह एक वास्तविक मोड़ ले आता है जहां अवाम के सामने सचमुच का राजनीतिक विकल्प लाने के बजाय राजनीति के अंत की दशा या विकल्पहीनता होती है, इसकी प्रवृत्ति विकल्पों को एक जैसा बना देने की होती है जिससे अवाम के माली हालात में कोई सुधार नहीं होता। और यही वजह है कि अवाम की हताशा उन्हें अतार्किकता व फ़ासीवाद की ओर धकेलती है। मगर सवाल उठता है कि नवउदारवाद, ‘अंत’ का यह रुझान, क्यों उत्पन्न करता है? आइए, इस सवाल पर ग़ौर करें।

इसका जो सबसे अहम कारण है, उसे ज़्यादातर लोग जानते हैं, इसलिए इस पर यहां ज़्यादा बात करना ज़रूरी नहीं। ‘ग्लोबलाइजे़शन’ के साथ जुड़ा यह तथ्य है कि यह मालों व सेवाओं की पूरी दुनिया में आवाजाही की आज़ादी देता है, इन सबसे ऊपर, पूंजी की आवाजाही की आज़ादी है जिसमें वित्तीय पूंजी भी शामिल है। इस युग में जहां पूंजी तो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेती है, देश उसी जगह राज्य-राष्ट्र बने रहते हैं। हर देश की आर्थिक नीतियां ‘निवेशकों का भरोसा’ बनाये रखने के विचार से नियंत्रित होती है, यानी भूमंडलीकृत पूंजी को फ़ायदा पहुंचना चाहिए, वरना वह पूंजी एकमुश्त उस देश को छोड़ कर कहीं और चली जायेगी, इस तरह वह देश बुरी तरह आर्थिक संकट की खंदक में जा गिरेगा। इस तरह के आर्थिक संकट में फंसने से बचने की ख़्वाहिश देश की तमाम राजनीतिक संरचनाओं को मजबूर करती है कि वे उसी एजेंडे को लागू करें जो भूमंडलीकृत पूंजी को मंजूर हो। यह तब तक चलता है जब तक कोई देश खुद ग्लोबलाइज़ेशन के दायरे में रहना जारी रखना चाहता है यानी वह पूंजी पर और व्यापार पर नियंत्रण लगाने की सोच कर भूमंडलीकरण की सीमा से बाहर जाने की कोशिश नहीं करता। इससे अवाम के सामने किसी सही विकल्प का चुनाव रह ही नहीं जाता। वे जिसे भी चुनें, जिस किसी की सरकार बने, वह घूम फिर कर उन्हीं ‘नवउदारवादी’ नीतियों पर चलती है।

हम यह अपने देश में भी देख रहे हैं। यूपीए सरकार और एनडीए सरकार और यहां तक कि ‘थर्ड फ्रंट’ की अल्पायु सरकार भी आर्थिक नीतियों के मामले में एक जैसी सरकारें ही रहीं। आज भी, जब चुनावी विकल्प के रूप में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का शोरशराबा हो रहा है, आर्थिक नीतियों के स्तर पर शायद ही कोई बुनियादी फ़र्क़ हो। सचाई तो यह है कि मोदी खुद इस बात पर ज़ोर देता है कि उसमें ‘शासन करने’ की यू.पी.ए. के मुक़ाबले बेहतर क्षमता है, आर्थिक नीतियों के मामले में कोई बुनियादी अंतर नहीं जिनसे अवाम की बदहाली दूर हो सके। इससे यही साबित होता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अवाम के सामने आर्थिक नीतियों के स्तर पर वास्तविक विकल्प मौजूद नहीं है। इस बुनियादी तथ्य के अलावा इस युग में देश के वर्गीय ढांचे में कुछ ऐसे बदलाव आये हैं जिनकी वजह से भी विकल्प की ओर बढ़ पाने में दुश्वारी आ रही है। इन तब्दीलियों में एक बुनियादी तब्दीली यह है कि मज़दूरों और किसानों की शक्ति में कमी आयी है। चूंकि राज्यसत्ता की रीतिनीति तो वित्तीय पूंजी को खुश करने की है, इससे उसकी भूमिका बड़ी पूंजी के हमले से छोटे कारोबार और उत्पादन की रक्षा करना या मदद करना नहीं रह जाती। इस असुरक्षा के माहौल में छोटे उत्पादक, मसलन किसान, दस्तकार, मछुआरे, शिल्पी आदि और छोटे व्यापारी भी शोषण की मार झेलने के लिए छोड़ दिये जाते हैं। यह शोषण दोहरे तरीक़े से होता है, एक तो प्रत्यक्ष तौर पर बड़ी पूंजी उनकी संपदा जैसे उनकी ज़मीन वग़ैरह को कौडि़यों के मोल ख़रीद कर, दूसरे, उनकी आमदनी में गिरावट पैदा करके। इससे लघु उत्पादन के माध्यम से उनकी जि़ंदा बने रहने की क्षमता कम रह जाती है। अपनी आजीविका के साधनों से वंचित ये लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, इससे बेरोज़गारों की पांत और बढ़ती जाती है।

इसके साथ ही नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में नये रोज़गार भी सीमित ही रहते हैं, भले ही आर्थिक विकास में तेज़ी दिखायी दे रही हो। उदाहरण के तौर पर, भारत में आर्थिक विकास की चरमावस्था में भी रोज़गार की विकास दर, 2004-5 और 2009-10 में नेशनल सेम्पल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक 0.8 प्रतिशत ही रही। जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही और इसे ही काम के लायक जनसंख्या की वास्तविक वृद्धि दर माना जा सकता है। इसमें उन लघु उत्पादकों को भी जोड़ लें जो अपनी आजीविका से वंचित हो जाते हैं और रोज़गार की तलाश में शहर आ जाते हैं तो बेरोज़गारी की विकास दर 1.5 प्रतिशत से ज़्यादा ही ठहरेगी। उसमें केवल 0.8 प्रतिशत को रोज़गार मिलता है। तो इसका मतलब यह है कि बेरोज़गारों की रिज़र्व फ़ौज की तादाद में भारी मात्रा में इज़ाफ़ा हो रहा है। इसका असर मज़दूर वर्ग की सौदेबाज़ी की ताक़त पर पड़ता है। वह ताक़त कम हो जाती है। इस तथ्य में एक सचाई और जुड़ जाती है, यानी बेरोज़गारों की सक्रिय फ़ौज और रिज़र्व फ़ौज के बीच की अंतर-रेखा का मिट जाना। हम अक्सर सक्रिय फ़ौज को पूरी तरह रोज़गारशुदा मान कर चलते हैं, रिज़र्व फ़ौज को पूरी तरह बेरोज़गार। मगर कल्पना करिए, 100 की कुल तादाद में से 90 को रोज़गारशुदा और 10 को बेरोज़गार मानने के बजाय, यह मानिए कि ये अपने समय के 9/10 वक़्त तक ही रोज़गार में हैं, इससे वह धुंधली अंतर-रेखा स्पष्ट हो जायेगी जिसे हम रोज़गार में ‘राशन-प्रणाली’’ या सीमित रोज़गार अवसर की प्रणाली के रूप में देख पायेंगे। दिहाड़ी मज़दूर की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, स्थायी और अस्थायी नौकरियों में लगे लोग, या खुद कभी कभी नये काम करने वाले लोग जो किसानों के पारंपरिक कामों से हट कर हैं, यही दर्शाते हैं कि रोज़गारों में सीमित अवसर ही उपलब्ध हैं। बेरोज़गारों की तादाद में बढ़ोतरी जहां मज़दूरों की स्थिति को कमज़ोर बनाती है। वहीं रोज़गारों के सीमित अवसर इन हालात को और अधिक जटिल बना रहे हैं।

‘रोज़गारों के सीमित होने के नियम’ में तब्दीली के अलावा रोज़गार पाने के नियम भी बदले हैं जिनके तहत स्थायी नौकरियों के बजाय ठेके पर काम कराने की प्रथा चल पड़ी है। हर जगह ‘आउटसोर्सिंग’ के माध्यम से बड़े ठेकदारों से काम लिया जाता है जो भाड़े पर वही काम कराते हैं जो पहले उस विभाग में स्थायी कर्मचारी करते थे ;रेल विभाग इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इससे भी मज़दूरों की सौदेबाज़ी की, यानी हड़ताल करने की क्षमता में कमी आयी है। दो अन्य तथ्य इसी दिशा का संकेत देते हैं। एक उद्योगों का निजीकरण जो कि भूमंडलीकरण के दौर में तीव्र गति हासिल कर रहा है। यूनियन सदस्यों के रूप में मज़दूरों का प्रतिशत पूरी पूंजीवादी दुनिया में प्राइवेट सेक्टर के मुक़ाबले पब्लिक सेक्टर में ज़्यादा है। अमेरिका में जहां प्राइवेट सेक्टर में केवल 8 प्रतिशत मज़दूर यूनियन सदस्य हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र में, जिसमें अध्यापक भी शामिल हैं, कुल संख्या का एक तिहाई यूनियन सदस्य है। सरकारी क्षेत्र का निजीकरण इस तरह यूनियन सदस्यता में कमी लाता है और इस तरह मज़दूरों की हड़ताल करने की क्षमता कम होती जाती है। फ्रांस में पिछले दिनों कई बड़ी हड़तालें हुईं हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि सारे विकसित पूंजीवादी देशों के पब्लिक सेक्टरों के यूनियनबद्ध मज़दूरों की संख्या के मुक़ाबले फ्रांस में उनकी तादाद अभी भी सबसे ज़्यादा है।

एक और कारक भी है, जिसे ‘रोज़गार बाज़ार में लचीलापन’ कहते हैं, जिसके द्वारा मज़दूरों के एक सीमित हिस्से को ;फै़क्टरी में एक ख़ास संख्या के मज़दूरों से ज़्यादा रोजगारशुदा होने पर श्रम कानूनों के तहत जो सुरक्षा मिली हुई है; जैसे मज़दूरों को निकालने के लिए तयशुदा समय का नोटिस देना, उसे भी ख़त्म करने की कोशिश चल रही है। यह अभी भारत में नहीं हो पाया है,, हालांकि इसे लागू करवाने का दबाव बहुत ज़्यादा है। ‘रोज़गार बाज़ार में लचीलापन’ का यह दबाव कम अहम लग सकता है क्योंकि इसका असर सीमित मज़दूरों की तादाद पर ही दिखायी दे सकता है, मगर इसका मक़सद उन मज़दूरों से हड़ताल करने की क्षमता छीन लेना है जो अहम सेक्टरों की बड़ी बड़ी इकाइयों में काम कर रहे हैं और जिनकी हड़ताल क्षमता सबसे ज़्यादा है। ये तमाम तब्दीलियां यानी मज़दूरों की संरचना में, सौदेबाज़ी की उनकी क्षमता में, क़ानून के तहत मिले उनके अधिकारों में आयी तब्दीलियां मज़दूर वर्ग की राजनीति की ताक़त को कमज़ोर बनाने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ट्रेड यूनियनों के कमज़ोर पड़ने का असर स्वतः ही मजदूर वर्ग के राजनीतिक दबाव के कमज़ोर होने में घटित होता है, एक वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक समाधान आगे बढ़ाने की उसकी क्षमता भी कमज़ोर होती है, और उसके इर्द-गिर्द अवाम को लामबंद करने में दुश्वारियां आती हैं।  इस तरह कारपोरेट-वित्तीय पूंजी भूमंडलीकृत पूंजी से गठजोड़ करके जितनी ताक़तवर होती जाती है, उतनी ही मज़दूर वर्ग, किसान जनता और लघु-उत्पादकों की राजनीतिक ताक़त में कमज़ोरी आती है, वे ग़रीबी और ज़हालत की ओर धकेल दिये जाते हैं। भूमंडलीकरण का युग इस तरीके़ से वर्ग-शक्तियों के संतुलन में एक निर्णायक मोड़ ले आया है।

इस परिवर्तन के दो अहम नतीजे ग़ौर करने लायक़ हैं। पहला, वर्गीय राजनीति में गिरावट के साथ ‘पहचान की राजनीति’ वजूद में आती है। दरअसल, ‘पहचान की राजनीति’ एक भ्रामक अवधारणा है क्योंकि इसमें अनेक असमान, यहां तक एक दूसरे के एकदम विपरीत तरह के आंदोलन समाहित हैं। यहां तीन तरह के अलग अलग संघटकों की पहचान की जा सकती है। एक, ‘पहचान से जुडे़ प्रतिरोध आंदोलन’ जैसे दलित आंदोलन या महिला आंदोलन, जिनकी अपनी अपनी विशेषताएं भी हैं; दूसरे, ‘सौदेबाज़ी वाले पहचान आंदोलन’ जैसे जाटों की आरक्षण की मांग जिसकी आड़ में वे अपनी स्थिति मज़बूत बना सकें; तीसरे, ‘पहचान की फ़ासीवादी राजनीति’; जिसकी स्पष्ट मिसाल सांप्रदायिक फासीवाद है, जो हालांकि एक ख़ास ‘पहचान समूह’ से जुड़ी हुई है और दूसरे ‘पहचान समूहों’ के खि़लाफ़ ज़हरीला प्रचार करके उन पर हमला बोलती है। इस राजनीति को कॉरपोरेट वित्तीय पूंजी पालती पोसती है और इसका वास्तविक मक़सद उसी कॉरपोरेट जगत को मज़बूती प्रदान करना होता है, न कि उस पहचान समूह के हितों के लिए कुछ करना जिनके नाम पर वह राजनीति संगठित होती है।

जहां ये तीनों तरह की ‘पहचान राजनीतियां’ एक दूसरे से काफ़ी जुदा हैं, वर्गीय राजनीति में आयी कमज़ोरी का अहम असर उन सब पर है। इस तरह की राजनीति ऐसे किसी ख़ास पहचान समूह को ‘पहचान के नाम पर सौदेबा़जी की राजनीति’ के माध्यम से एक उछाल प्रदान करती है जो अपने वर्गीय संगठनों के तहत कोई असरदार काम नहीं कर सकते। इस राजनीति से ‘पहचान की फ़ासीवादी राजनीति’ को भी बल मिलता है क्योंकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजात का वर्चस्व इस तरह की राजनीति को बढ़ावा देता है। जहां तक ‘प्रतिरोध के पहचान आंदोलनों’ का सवाल है, वर्गीय राजनीति के चौतरफ़ा कमजोर पड़ने से उनमें भी प्रगतिशीलता का तत्व कमज़ोर हुआ है और इससे वे भी अधिक से अधिक ‘सौदेबाज़ी की पहचान राजनीति’ की ओर धकेल दिये गये हैं। कुल मिलाकर, वर्गीय राजनीति में गिरावट से ‘पहचान की राजनीति’ के ऐसे रूपों को मज़बूती हासिल हुई है जो व्यवस्था के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करते बल्कि उल्टे, अवाम के एक हिस्से को दूसरे के खि़लाफ़ खड़ा करके इस व्यवस्था के लिए किसी आसन्न ख़तरे की संभावना को कमज़ोर ही करते हैं। इससे उस नयी संरचना के विचार को आघात पहुंच रहा है जिसमें, देश के भीतर जाति आधारित सामंती व्यवस्था के तहत ‘पुरानी व्यवस्था’ को ढहा कर, उसकी जगह ‘नयी सामुदायिक व्यवस्था’ की स्थापना पर बल था, जो कि हमारे जनतंत्र की मांग है।

इस आघात का एक और पहलू है, जो इस समाज के लंपटीकरण से जुड़ा है। पूंजीवादी समाज की यह ख़ासियत है कि इसकी सामाजिक स्वीकार्यता इस व्यवस्था के तर्क से उद्भूत नहीं होती, बल्कि तर्क के बावजूद होती है। ऐसी दुनिया जिसमें मज़दूर अपनी तरह तरह की गुज़र बसर की जगहें छोड कर एक जगह ठूंस दिये जाते हैं, जहां वे अकेले अकेले पड़ जाते हैं, एक दूसरे के साथ बुरी तरह प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, जैसी कि पूंजीवाद के तर्क की मांग है, वह दुनिया सामाजिक रूप से असुरक्षा से घिरी दुनिया ही होगी ;जिसे शायद ही ‘समाज’ की संज्ञा दी जा सके। पूंजीवाद के तहत सामाजिक वजूद इसलिए संभव होता है क्योंकि इसके नियमों के विपरीत मज़दूर शुरू में एक दूसरे से अनजान होते हैं, बाद में वे अपने ‘समूह’ बना लेते हैं जो कि ट्रेड यूनियनों के माध्यम से वर्गीय संगठनों में विकसित हो जाते हैं। यही वह ‘नया सामुदायिक समाज’ हो सकता है जिसका अभी हमने जि़क्र किया है।

अतीत में पूंजीवाद के तहत इस तरह के समाज का विकास संभव हुआ था क्योंकि बड़े पैमाने पर आबादी के बड़े शहरों में आ जाने से और नयी अनुकूल श्वेत बस्तियों में बस जाने से स्थानीय कामगारों की फ़ौज के रूप में उनकी तादाद सीमित रही और ट्रेड यूनियनें शक्तिशाली हो गयीं। आज तीसरी दुनिया के मज़दूरों के लिए इस तरह की संभावनाएं मौजूद नहीं हैं, और नव-उदारवाद ने, जैसा कि हम देख रहे हैं, बेरोज़गारों की तादाद बढ़ा दी है, जबकि ट्रेड यूनियनों और मज़दूरवर्ग की सामूहिक संस्थाओं को कमज़ोर कर दिया है। अलग थलग पड़ जाने से लंपट सर्वहारावर्ग की वृद्धि हो रही है। आपसी सामाजिक रिश्तों में लगातार गिरावट या उनकी नामौजूदगी उन मेहनतकशों को, जो भिन्न प्रकार के रहन सहन के हालात से निकल कर आते हैं, लंपटीकरण की ओर धकेल देती है। यह एक सच्चाई है कि इस तरह का लंपटीकरण सारे पूंजीवादी समाजों में मौजूद है, मगर उन पर विकसित समाजों के मज़दूर वर्ग के सामूहिक संस्थानों का नियंत्रण रहता है, जो कि इधर नव-उदारवादी निज़ाम में ढीला भी हो रहा है, मगर तीसरी दुनिया के समाजों में तो उन संस्थानों का नियंत्रण बेअसर हो रहा है जो कि नव-उदारवाद की भयंकर चपेट में आ गये हैं। भारत में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में इधर जो बढ़ोतरी हो रही है, इस घटना विकास के बारे में मेरे नज़रिये से मेल खाती है।

नवउदारवाद के युग में मजदूर वर्ग को संगठित करने में आने वाली कठिनाइयों का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि मारुति फ़ैक्टरी में, जो कि दिल्ली राजधानी क्षेत्र के इलाके़ में ही क़ायम है, अगर कोई मज़दूर किसी ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता से बात करता हुआ या किसी पर्चे के साथ पकड़ा गया तो वह नौकरी से मुअत्तिल हो सकता है। नव-उदारवादी व्यवस्था का एक और बिंदु है जिसकी ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा। इसका संबंध ‘भ्रष्टाचार’ से है। इस तरह की अर्थव्यवस्था की ख़ासियत यह है कि इसमें बड़ी पूंजी में लघु उत्पादकों के शोषण का रुझान होता है। मगर लघु संपति उसका एकमात्र निशाना नहीं होती। उसकी प्रवृत्ति तो मुफ़्त में या कम क़ीमत पर आम संपत्ति हड़प लेने की होती है जिसमें सिर्फ़ लघु उत्पादकों की संपत्ति ही नहीं, आम संपत्ति, आदिवासियों की संपत्ति और राज्य की संपत्ति शामिल है। नव-उदारवाद का युग उस प्रक्रिया को घटित होते हुए देख रहा है जिसमें पूरी निर्ममता से ‘पूंजीसंचय की आदिम प्रक्रिया’ चल रही है जिसके लिए राज्य तंत्र की ओर से सहमति या साझेदारी ज़रूरी होती है। ऐसी सहमति प्राप्त कर ली जाती है जिसके लिए भूमंडलीकरण के ज़माने में हर राष्ट्र-राज्य पर नीतिगत मामलों का दबाव बना हुआ है, उस सहमति के लिए जो भी क़ीमत अदा करनी होती है, वह दे दी जाती है और उसी को हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं।

हम जिसे ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं, वह असल में एक तरह का टैक्स है जिसे राज्य तंत्र वसूल करता है जिसमें ‘राजनीतिक वर्ग’ भी सबसे बड़े हिस्से के रूप में शामिल होता है। यह टैक्स बड़ी पूंजी के द्वारा ‘पूंजीसंचय की आदिम प्रक्रिया’ से अर्जित लाभ पर वसूला जाता है। यह ग़ौरतलब है कि ‘भ्रष्टाचार’ के बड़े -बड़े मामले जो भारत में इधर प्रकाश में आये हैं, जैसे टू-जी स्पेक्ट्रम या कोयला ब्लाकों की औने पौने दामों पर आवंटन की प्रक्रिया आदि, उन्हें बेचने का फ़ैसला लेने वालों को बदले में जो धन मिला उसे हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं। इस तरह ‘पूंजी संचय की आदिम प्रक्रिया’ पर यह एक तरह का टैक्स है और इस प्रक्रिया में इधर जो तेज़ी दिखायी देती है, उसके मूल में नवउदारवादी दौर में पूंजी संचय की आदिम प्रक्रिया का बड़े पैमाने पर मौजूद होना ही है। ‘भ्रष्टाचार’ के रूप में इस तरह के टैक्स के स्वरूप को दो कारकों के संदर्भ से ख़ासतौर पर देखा जा सकता है। पहला कारक है, राजनीति का माल में तब्दील हो जाना। यह सच है कि भिन्न भिन्न राजनीतिक संरचनाएं जो नव-उदारवादी निज़ाम के तहत काम कर रही हैं, अलग अलग आर्थिक एजेंडा नहीं रख सकतीं, तो उनमें अवाम की सहमति किसी नये तरीके़ से लेने की होड़ रहती है। इसके लिए ख़ास कि़स्म से अपनी ‘मार्केटिंग’ के लिए, प्रचार करने वाली भाड़े की फ़र्मों का सहारा लेना पड़ता है और उन्हें मीडिया को ‘कैश दे कर ख़बर बनवाने’ का उपक्रम करना पड़ता है, हेलीकाप्टर भाड़े पर ले कर ज़्यादा से ज़्यादा जगहों की यात्रा करनी होती है जिससे अपनी सूरत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को नज़र आ सके, वगै़रह वगै़रह। ये सारे काम बहुत ज़्यादा ख़र्चीले हैं जिसकी वजह से राजनीति को संसाधन जुटाने का काम करना पड़ता है, राजनीतिक पार्टियां किसी भी तरह संसाधन जुटाती ही हैं।

इसके अलावा, ‘राजनीतिक वर्ग’ को काम चलाने के लिए संसाधन जुटाने पड़ते हैं, मगर फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका बहुत अहम नहीं रह जाती। विश्व बैंक और आइ एम एफ़ के अधिकारी रह चुके अफ़सर या बहुराष्ट्रीय बैंको और वित्तीय संस्थानों के आला अफ़सर अर्थव्यवस्था चलाने के लिए तेज़ी से नियुक्त किये जा रहे हैं, यानी ‘ग्लोबल वित्तीय समुदाय’ के लोग ही सरकारों के फ़ैसलाकुन पदों पर बिठाये जाते हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को पारंपरिक राजनीतिक वर्ग के हाथों में अर्थ नीति संबंधी फैसले लेने का दायित्व सौंपना सहन नहीं। पारंपरिक राजनीतिक वर्ग को इस पर गुस्सा आना स्वाभाविक है, मगर वह इससे कुछ हासिल कर लेता है तो उसे समझौता करने से कोई गुरेज भी नहीं। और यह ‘कुछ’ पूंजी के आदिम संचयन के लाभ में से मिलने वाले अंश या टैक्स के रूप में होता है जिसे हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं और उसकी ज़रूरत इसलिए भी पड़ती है क्योंकि राजनीति माल में तब्दील हो चुकी है।

‘भ्रष्टाचार’ इस तरह नव-उदारवादी ऩिजाम में बहुत सक्रिय भूमिका अदा करता है। यह ‘राजनीतिक वर्ग’ में अचानक आये ‘नैतिक’ पतन का परिणाम नहीं है, यह नव-उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था का अपरिहार्य हिस्सा है। ‘भ्रष्टाचार’ का जो असर नव-उदारवादी पूंजीवाद पैदा करता है, उससे कॉरपोरेट वित्तीय अभिजात को एक दूसरी वजह से फ़ायदा होता है। यह ‘राजनीतिक वर्ग’ को बदनाम करके छोड़ता है, वह संसद को और जनतंत्र के दूसरे प्रातिनिधिक संस्थानों को कलंकित करा देता है, और साथ ही, अपने नियंत्रण वाले संचारमाध्यमों के फ़ोकस द्वारा चालाकी से यह सुनिश्चित कर लेता है कि ‘भ्रष्टाचार’ के इन कारनामों से पैदा हुए नैतिक कलंक की कालिख उसके काम में बाधा न बने। ‘भ्रष्टाचार’ विमर्श इसके रास्ते में आने वाले रोड़ों को साफ़ करते हुए कॉरपोरेट निज़ाम के युग की शुरुआत आसान बना देता है।

बात दरअसल और आगे जाती है। हमने देखा है कि नव-उदारवाद का दौर बेरोज़गारी के सापेक्ष आकार को बढ़ाता है, जिसके चलते वह निरपेक्ष दरिद्रता की शिकार आबादी के सापेक्ष आकार में भी बढ़ोत्तरी करता है। छोटे उत्पादक- चाहे वे अपने पारंपरिक व्यवसाय में लगे रहें या रोज़गार के अवसर की तलाष में शहरी इलाक़ों, जहां ऐसे अवसर आवश्यकता से कम ही हैं, की ओर चले जाएं- उनका निरपेक्ष जीवन-स्तर और बदतर हो जाता है। कामगारों की तादाद में जो नया इज़ाफ़ा होता है, उसे बढ़ती बेरोज़गारी के कारण अपने पुरखों के मुक़ाबले व्यक्तिगत स्तर पर बदतर भौतिक जीवन-स्थितियां झेलनी पड़ती हैं। और वे कामगार भी, जो बाक़ायदा रोज़गार पा लेते हैं, श्रम की रिज़र्व फ़ौज के बढ़ते सापेक्ष आकार द्वारा थोपी गयी आपसी होड़ की वजह से उदारीकरण से पहले के दौर का वास्तविक वेतन-स्तर हासिल नहीं कर पाते। कामगार आबादी के न सिर्फ़ बड़े, बल्कि बढ़ते हुए हिस्से को प्रभावित करती भयावह ग़रीबी आम बात हो जाती है।

यह ऐसा नुक्ता  है जिसे उत्सा पटनायक लंबे समय से सामने लाती रही हैं। नेशनल सेंपल सर्वे के आंकड़ों पर आधारित उनके निष्कर्ष बताते हैं कि 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन (‘शहरी ग़रीबी’ के लिए आधिकारिक सीमा रेखा) से कम पाने वाली शहरी आबादी 1993-94 में जहां 57 फ़ीसद थी, वहीं 2004-5 में वह बढ़ कर 64.5 फ़ीसद हो गयी और 2009-10 में 73 फ़ीसद हो गयी। 2200 कैलारी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (‘ग्रामीण ग़रीबी’ के लिए आधिकारिक सीमा रेखा) से कम पाने वाली ग्रामीण आबादी इन्हीं वर्षों में क्रमशः 58.5, 69.5 और 76 फ़ीसद थी। यह ग़ौरतलब है कि उच्च जीडीपी बढ़ोत्तरी के दौर में, जिसके भीतर 2004-5 से 2009-10 तक के साल आते हैं, ग़रीबी में ज़बर्दस्त बढ़त हुई। संक्षेप में, नव-उदारवाद के तहत ग़रीबी में बढ़ोत्तरी एक ऐसी व्यवस्थागत परिघटना है जिसकी जड़ें इस तरह के अर्थतंत्र की फि़तरत का ही हिस्सा हैं; जी.डी.पी. की ऊंची बढ़ोत्तरी से ग़रीबी दूर हो, यह ज़रूरी नहीं।

लेकिन कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन और उसके द्वारा नियंत्रित मीडिया जिस विमर्श को बढ़ावा देता है, वह ‘भ्रष्टाचार’ को जनता की आर्थिक बदहाली का, और इसीलिए बढ़ती ग़रीबी का, कारण बताता है। इस तरह नवउदारवाद के व्यवस्थागत रुझान का दोश मुख्य किरदार निभाने वाले कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन के सर नहीं मढ़ा जाता, बल्कि ‘राजनीतिक वर्ग’ और संसद समेत उन तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं के मत्थे मढ़ दिया जाता है जहां यह राजनीतिक वर्ग मौजूद होता है। इस तरह जनता को मुसीबत में झोंकने का व्यवस्था का अंतर्निहित रुझान विडंबनापूर्ण तरीक़े से जनता की निगाह में व्यवस्था को एक सहारा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, उसी कॉरपोरेट पूंजी के शासन को वैधता देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो इस काम में मुख्य किरदार निभा रहा होता है।

यह बात संकट के ऐसे दौर में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जैसे दौर से इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था गुज़र रही है। ऊंची बढ़त का दौर निकल गया है, जो कि कतई हैरतअंगेज़ नहीं; हिंदुस्तान में ऊंची बढ़त का चरण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ‘बुलबुले’ के मेल पर क़ायम था। इस ‘बुलबुले’ को देर-सबेर फूटना ही था। पहला वाला 2008 में फूटा, और दूसरा कुछ साल बाद। इस संकट का मतलब है कि रोज़गार की वृद्धि दर में और कमी आ रही है, जिससे कि कामगार जनता जो बढ़त के समय भी पीसी जा रही थी, उसकी हालत तो और ख़राब हो ही रही है, वह शहरी मध्यवर्ग जो बढ़त का महत्वपूर्ण लाभार्थी था, उसकी भी हालत ख़राब हो रही है। लेकिन कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन की देखरेख में ‘राजनीतिक वर्ग’ के खि़लाफ़ खड़ा किया गया विमर्श न सिर्फ़ जनता के गुस्से को आर्थिक व्यवस्था और संसद समेत लोकतांत्रिक संस्थाओं के खि़लाफ़ जाने से रोकता है, बल्कि यह समझ भी बनाता है कि आज ज़रूरत एक अधिक ‘ताक़तवर’, अधिक निर्मम नव-उदारवाद की है। और यह चीज़ ‘भ्रष्टाचार’ में लिप्त ‘राजनीतिक वर्ग’ मुहैया नहीं करा सकता, जबकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन और ‘विकास पुरुष’ के रूप में पेश किए जा रहे नरेंद्र मोदी जैसे उसके भरोसेमंद राजनीतिक एजेंट करा सकते हैं। इस तरह कॉरपोरेट शासन यानी फ़ासीवाद के लिए राह हमवार की गई है। कहने की ज़रूरत नहीं कि फ़ासीवाद की ओर संक्रमण को किसी एकल कड़ी के रूप में, एक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो किसी विशेष व्यक्ति के सत्ता में आने से घटित होती है। इस मामले में हमें 1930 के दशक की सोच में नहीं फंसना चाहिए। आज के हिंदुस्तान में तो पहले से ही ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, मिसाल के लिए उत्तरप्रदेश, जहां ‘आतंकवादी’ होने के संदेह पर ही किसी मुसलमान युवक को गिरफ़्तार किया जा सकता है और बिना सुनवाई, बिना जमानत के सालों-साल जेल में रखा जा सकता है। उसे क़ानूनी मदद भी नहीं मिल सकती क्योंकि वक़ील आम तौर पर किसी ‘आतंकवादी’ की पैरवी करने से इंकार कर देते हैं; और वे वक़ील, जो क़ानूनी मदद पहुंचाने की हिम्मत रखते हैं, सांप्रदायिक-फ़ासीवादी ताक़तों के हाथों हिंसा झेलते हैं। अगर आरोपित की खुशकि़स्मत से एकाध दशक के बाद सुनवाई पूरी हो जाए और कि़स्मत ज़्यादा अच्छी हुई तो समुचित क़ानूनी बचाव के बग़ैर भी निर्दोष क़रार दिया जाए, तब भी जनता की निगाह में एक ‘आतंकवादी’ होने का कलंक उस पर लगा ही रहता है और उसे नौकरी नहीं मिलती; और जिन लोगों ने उसे गिरफ़्तार करके जेल में अपनी जि़ंदगी के बहुमूल्य वर्ष बिताने के लिए मजबूर किया, उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती।

इसी तरह, दिल्ली के पास मारुति कारख़ाने के सौ से ज़्यादा मज़दूर महीनों से बिना किसी सुनवाई के, बिना ज़मानत या पैरोल के, जेल में बंद हैं। उन पर एक व्यक्ति की हत्या का संदेह है (जिसकी हत्या करने का कोई कारण सीधे-सीधे नज़र नहीं आता) और इसे लेकर कोई समुचित जांच अभी तक नहीं हुई है। यह स्थिति, जिसे मैं ‘मोज़ाइक फ़ासीवाद’ की स्थिति कहता हूं, इस मुल्क में पहले से मौजूद है। अगर कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन द्वारा समर्थित सांप्रदायिक-फ़ासीवादी तत्व अगले चुनाव के बाद सत्ता में आते हैं तो उन्हें लंपट तत्वों के बाहुबल पर फलते-फूलते स्थानीय सत्ता-केंद्रों की मदद पर निर्भर रहना होगा, जैसा कि अभी पश्चिम बंगाल में देखने को मिलता है। ये स्थानीय सत्ता-केंद्र कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन से सीधे-सीधे जुड़े नहीं हैं और इसीलिए सीधे-सीधे इन्हें फ़ासीवादी नहीं कहा जा सकता; पर वे शिखर पर एक फ़ासीवादी व्यवस्था को बनाये रखने में मददगार हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, देश  ‘मोज़ाइक फ़ासीवाद’ से ‘फ़ेडरेटेट फ़ासीवाद’ की ओर बढ़ सकता है और ज़रूरी नहीं कि एक एकल एपीसोड के रूप में एकीकृत फ़ासीवाद का तजुर्बा हो।

इनमें से कोई बात इस पर्चे की बुनियादी बात को बदलती नहीं है। वह बात यह कि नवउदारवाद से पैदा हुआ ‘राजनीति का अंत’ फ़ासीवाद की ओर संक्रमण की ज़मीन तैयार करता है और यह संक्रमण उस तरह के संकट के दौर में तेज़ी पकड़ लेता है जिस तरह के संकट से हम आज गुज़र रहे हैं। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन हालात में प्रगतिशील ताक़तें क्या कर सकती हैं? हेगेलीय दर्शन से उलट और इतिहास का अंत वाले अंग्रेजी राजनीतिक अर्थशास्त्र से उलट, मार्क्स ने सर्वहारा को बदलाव के एजेंट के रूप में देखा था जो सिर्फ़ इतिहास को आगे नहीं ले जाता बल्कि खुद ‘इतिहास के फंदे’ से मानव जाति के निकलने की सूरत भी बनाता है।

यह बुनियादी विश्लेषण आज भी वैध है, और हमारी गतिविधियों को इससे निर्देशित होना चाहिए, बावजूद इसके कि नवउदारवाद ने वर्गीय राजनीति को कमज़ोर किया है। लेकिन इस कमज़ोरी को देखते हुए ज़रूरत इस बात की है कि न सिर्फ़ मज़दूरों को संगठित करने के लिए नये क्षेत्रों की ओर बढ़ा जाये, मसलन अब तक असंगठित रहे मज़दूरों और घरेलू कामगारों को संगठित करना, बल्कि वर्गीय राजनीति के लिए नये कि़स्म के हस्तक्षेप भी किये जायें।


वर्गीय राजनीति को अधिक सोद्देश्य तरीक़े से ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ में हस्तक्षेप करना चाहिए, और उसे महज़ पहचान की राजनीति से ऊपर उठाना चाहिए। इसे अधिक सोद्देश्य विधि से दलितों, मुसलमानों, आदिवासी आबादी और महिलाओं के प्रतिरोध को संगठित करना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर एक पहचान समूह को किसी दूसरे की क़ीमत पर राहत मुहैया करायी गयी है तो दूसरे को भी बोझ की ऐसी सिरबदली के खि़लाफ़ प्रतिरोध के लिए संगठित किया जाए। वर्गीय राजनीति और ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ का अंतर, दूसरे शब्दों में, इस बात में निहित नहीं है कि इनके हस्तक्षेप के बिंदु अलग-अलग हैं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि वर्गीय राजनीति ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ के मुद्दों पर भी अपने हस्तक्षेप को स्वयं ‘पहचान समूह’ से परे ले जाती है। अलग तरह से कहें तो जातिसंबंधी या स्त्री के उत्पीड़न के मुद्दों पर हस्तक्षेप करने में विफलता स्वयं वर्गीय राजनीति की विफलता है, वर्गीय राजनीति का लक्षण नहीं।

इसी तरह, वर्गीय राजनीति को एक वैकल्पिक कार्यसूची के सवाल को खुद संबोधित करना चाहिए। इसे व्यवस्था के खि़लाफ़ संघर्ष में, एक ‘संक्रमणकालीन मांग’ के तौर पर, जनता के ‘अधिकार’ के रूप में बदहाली को रोकने वाले उपायों के सांस्थानीकरण पर ख़ास तौर से फ़ोकस करना चाहिए। मिसाल के लिए, इसे सार्वभौमिक अधिकारों के एक समूह- जैसे खाद्य अधिकार, रोज़गार का अधिकार, मुफ़्त स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार, एक ख़ास स्तर तक मुफ़्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, और एक सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए वृद्धावस्था पेंशन तथा विकलांगता मदद का अधिकार- के सांस्थानीकरण के लिए अभियान चलाना चाहिए और अवसर मिलने पर इन्हें अमल में लाना चाहिए।


यह सब पहली नज़र में महज़ एन.जी.ओ. की कार्यसूची जैसा लग सकता है जिसका वर्गीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। लेकिन वर्गीय राजनीति और पहचान की राजनीति या एन.जी.ओ. राजनीति के बीच बुनियादी अंतर मुद्दों को लेकर उतना नहीं है जितना इन मुद्दों को बरतने के पीछे निहित ज्ञानमीमांसा में है। वर्गीय राजनीति जब मुद्दों को उठाती है तो व्यवस्था के अतिक्रमण के ज़रिये ही उनके समाधान की संभावना को देखती है; और यह तथ्य उसे बाधित करने के बजाय ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर एन.जी.ओ. राजनीति सिर्फ़ ऐसे मुद्दों को उठाती है, या मुद्दों को उसी हद तक उठाती है, जहां वे व्यवस्था के भीतर हल होने के लायक़ हों। वस्तुतः इस पर्चे का मुख्य बल इसी रूप में वर्गीय राजनीति संबंधी नज़रिये को बदलने पर है।

यह तर्क, कि मुल्क के पास इन अधिकारों की मांग को पूरा करने के लिए संसाधन नहीं हैं, ठीक नहीं है। इनके लिए कुल घरेलू उत्पाद का लगभग 10 फ़ीसदी ही दरकार होगा; और भारत जैसे मुल्क में, जहां अमीरों से बहुत कम टैक्स वसूला जाता है, वहां इस काम के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। इसके मुमकिन होने में सबसे बड़ी बाधा नवउदारवादी शासन है, और ठीक इसी वजह से वामपंथ को बामक़सद इस मामले को उठाना चाहिए। जहां भी वाम ताक़तें सत्ता में आती हैं, उन्हें संसाधनों को जुटाने के लिए जिस हद तक जाना मुमकिन हो, जाना चाहिए।

सबसे अधिक जिस चीज़ की ज़रूरत है, वह है नवउदारवाद के वैचारिक वर्चस्व को स्वीकार न करना। लोकतंत्र पर नवउदारवाद के हमले को रोकने और लोकतंत्र की हिफ़ाज़त से आगे समाजवाद के संघर्ष तक जाने के लिए नवउदारवादी वर्चस्व को नकारना और नवउदारवादी विचारों के खि़लाफ़ प्रति-वर्चस्व गढ़ने का प्रयास करना एक शर्त है। विचारों के इस संघर्ष में लेखकों की भूमिका केंद्रीय है।

(हूबहू जैसा कहा ....... )

(प्राइमरी का मास्टर ब्लॉग से साभार)