Wednesday, May 16, 2012

कार्टून विवादः एक मानवीय अवलोकन : लाल्टू


भारतीय समाज दलित और गैर-दलित दो तबकों में बँटा है। एक इंसान को औरों से अलग कर देखना मानव मूल्यों की दृष्टि से ग़लत है। पर सामाजिक गतिकी के स्रोत न्याय अन्याय के वांछित-अवांछित कारण हैं। इस आलेख में मुख्यतः गैर-दलितों से संवाद करने की कोशिश है। एक प्रताड़ित तबके के बारे में संवेदना की बात करना अहंकार हो सकता है। इसलिए एक सीमित परिप्रेक्ष्य में ही इस आलेख को पढ़ा जाना चाहिए। यहाँ जिन विद्वानों से असहमति प्रकट की गईं है, उनके प्रति हमारे मन में सम्मान है। वे जागरुक और सचेत हैं, समाज के लिए पथ-प्रदर्शक हैं, ऐसा हम मानते हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा जारी ग्यारहवीं कक्षा की इतिहास की पाठ्य-पुस्तक में संविधान पर चर्चा के साथ छपे नेहरू-अंबेदकर कार्टून पर जो विवाद छिड़ा है, उससे बुद्धिजीवियों में ध्रुवीकरण बढ़ा है। इसके पहले प्रेमचंद, गाँधी बनाम अंबेदकर, अंग्रेज़ी शासन के दौरान दलितों की स्थिति में बदलाव जैसे कई विषयों पर ऐसा ही विवाद काफी तीखे तेवरों के साथ हुआ है।

दलित चिंतकों ने इन बहसों में जो रुख अपनाया है, वह सही या ग़लत है, यह तो इतिहास तय करेगा, पर उनमें एक तरह की लामबंदी दिखती है। पर निरपेक्ष दृष्टि से देखा जाए तो गैर-दलित भी लामबंद दिखते हैं - साधारण संवेदनाहीन लोगों में दलित विरोधी मान्यताओं का होना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता, पर उदारवादी चिंतक जो आम तौर पर दलितों के साथ उनके संघर्षों में कंधा मिलाकर चलते हैं, वे भी इन मुद्दों पर एकतरफा और दलित चिंतकों से भिन्न राय ही रखते हैं और अक्सर अपनी असहमति पुरजोर आवाज़ में सामने रखते हैं।

कार्टून वाला मौजूदा मामला, प्रेमचंद पर हुई बहस से अलग है। सामाजिक विसंगतियों और दलितों के निपीड़न पर संवेदना जगाने में जिन साहित्यकारों की सबसे अहम भूमिका रही, उनमें प्रेमचंद अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं में से चुनी हुई पंक्तियों को प्रसंग से बाहर रख कर नहीं पढ़ा जाना चाहिए। कार्टून प्रसंग ऐसा नहीं है। नए नए आज़ाद हुए मुल्क का संविधान लिखे जाने में हो रही देर पर बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया के प्रतीक के रूप में शंकर का 1949 में बनाया कार्टून 2006 में पाठ्य-पुस्तक में डाला गया। पहले महाराष्ट्र और फिर राष्ट्रीय स्तर पर दलित चिंतकों ने आपत्ति जताई कि इस कार्टून में अंबेदकर का अपमान किया गया है। संसद में शोरगुल के बाद सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए इस कार्टून को हटाने का निर्णय लिया। दलित नेतृत्व की इस माँग को भी सरकार ने मान लिया कि जिस समिति के तत्वावधान में यह पुस्तक तैयार की गई थी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इसे अकादमिक समुदाय ने अपनी स्वायत्तता पर हस्तक्षेप मानते हुए हर तरह से विक्षोभ प्रकट किया है। जिस समिति के तत्वावधान में यह पुस्तक तैयार की गई थी, इसके दो सदस्यों, योगेंद्र यादव और सुहास पालसिकर ने समिति से इस्तीफा दे दिया है। पालसिकर ने इस बारे में संवाद और सहयोग की कोशिश की है, पर उनके साथ कुछ दलित युवकों ने हिंसात्मक व्यवहार किया है। योगेंद्र यादव ने संसद में हुई बहस का खुला विरोध करते हुए बयान दिए हैं। पत्र-पत्रिकाओं में, अंतर्जाल में गैर-दलित टिप्पणीकारों ने सरकार और दलित नेताओं की कट्टर आलोचना की है।

यहाँ कई मुद्दे हैं। क्या सरकार को अकादमिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए? क्या गैर-दलितों का एक कार्टून पर दलितों की असहमति पर इतना शोर मचाना ठीक है? क्या दलित समाज में अंबेदकर को एक मसीहे की तरह मानना, जिसपर कोई उँगली न उठा सके, यह ठीक है?

भारतीय राजनीति में मुख्यधारा की पार्टियों के नेतृत्व से जनता का विश्वास उठ चुका है। यहाँ हम मानकर चलेंगे कि सांसदों के हल्ले-गुल्ले को गंभीरता से लेने का कोई तुक नहीं है। कार्टून से संबंधित जो बड़े मुद्दे हैं, उनको और समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण को समझने की कोशिश हम करें। कार्टून में शंकर का जो उद्देश्य था और पाठ्य-पुस्तक समिति के सदस्यों ने उसे जैसे देखा, उससे अलग हटकर इसे देखने की कोशिश करें।

कार्टून में अंग्रेज़ी भाषा में प्रचलित मुहावरे 'स्नेल्स पेस (घोंघे की गति)' से चल रहे संविधान लेखन के काम पर कटाक्ष है। जनता अपेक्षारत है,संविधान लेखन समिति के अध्यक्ष अंबेदकर घोंघे पर सवार हैं और पीछे से नेहरू चाबुक चलाते हुए घोंघे को आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं। कल्पना कीजिए कि एक आम स्कूल में यह पाठ पढ़ाया जा रहा है। कक्षा में सवर्ण और दलित दोनों पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। अंबेदकर का घोंघे पर सवार होना किसी सवर्ण बच्चे को हास्यास्पद लग सकता है। वह इस कार्टून का इस्तेमाल किसी दलित बच्चे को तंग करने के लिए कर सकता है। अंबेदकर के ठीक पीछे नेहरू का चाबुक लिए खड़े होना कार्टून को और भी जटिल बना देता है। सही है कि काल्पनिक स्थितियों से घबराकर हमें निर्णय नहीं लेने चाहिए। पर किशोरों के लिए पाठ्य-पुस्तक तैयार करते हुए सचमुच इन सवालों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?सुविधासंपन्न लोग अपने बच्चों की पाठन सामग्री के बारे में आमतौर पर सचेत रहते हैं। ज़रा भी शक हो तो हम सवाल उठाते हैं। यहाँ कोई चूक तो नहीं हो गई है? 1949 में शंकर के सामने ये सवाल न थे, पर 2006 में समिति सदस्यों को, खास तौर को उनको जो दलितों की समस्याओं के बारे में हम सबको आगाह करते रहे हैं, यह खयाल नहीं आया कि इस कार्टून में समस्या है, यह हमें सोचने को मजबूर करता है। योगेंद्र और सुहास विद्वान हैं, वे प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता भी हैं। यह कार्टून पुस्तक में शामिल कैसे हुआ?

मान लें कि कार्टून को इस तरह से देखना ग़लत है, पर अगर किसी ने इसे ऐसे देखा और आपत्ति जताई तो इसे हटाने से कितना नुकसान होता है? यह कोई आस्था पर आधारित आपत्ति नहीं, संभव है ऐसा होता तो हम इसे सहानुभूति के साथ देखते, यह तो हजारों वर्षों से चल रही हिंसा और बहिष्कार के अनुभव पर आधारित प्रतिक्रिया है। गैर-दलित इस बात को नहीं समझ पाते तो गड़बड़ दलितों में नहीं, हम ही में है। अक्सर दलितों की प्रतिक्रिया सही नहीं होती है,  पर क्या यह आश्चर्य की बात है कि दलित बौखलाहट भरी प्रतिक्रियाएं भी देते हैं। निरंतर बहिष्कार की पीड़ा हमारी मानवता को हमसे छीन लेती है।

एक कार्टून वहीं तक सीमित होता है, जो दृश्य वह प्रस्तुत करता है। वह प्रेमचंद की कहानी नहीं होता, जिसे पूरी पढ़कर ही हम सामान्य निष्कर्षों तक पहुँच सकते हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि दलित बुद्धिजीवी आलोचना झेल नहीं सकते। उन्हें लगता है कि अंबेदकर को खुदा बनाने की कोशिश चल रही है। वे कहते हैं कि आखिर कार्टून तो गाँधी नेहरू पर भी बनते रहे हैं। प्रताड़ित जन की प्रतिक्रिया कैसी होती है, विश्व इतिहास में इसके बेशुमार उदाहरण हैँ। साठ के दशक में, जब अमेरिका में काले लोगों को बराबरी का नागरिक अधिकार देने का आंदोलन शिखर पर था, जिसमें कई गोरे लोग भी शामिल थे, प्रसिद्ध अफ्रो-अमेरिकी कवि इमामु अमीरी बराका (मूल ईसाई नामः लीरॉय जोन्स) ने लिखाः- 'ब्लैक डाडा निहिलिसमुस। रेप द ह्वाइट गर्ल्स। रेप देयर फादर्स। कट द मदर्स थ्रोट्स।' कोई भी इस हिंसक अभिव्यक्ति को सभ्य नहीं कहेगा। आर्थिक वर्ग आधारित निपीड़न भी हिंसक प्रतिक्रिया पैदा करता है। हाल तक कोलकाता शहर में दीवारों पर सुकांतो भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं - 'आदिम हिंस्र मानव से यदि मेरा कोई नाता है, स्वजन खोए श्मशानों में तुम्हारी चिता मैं जला कर रहूँगा।' बराका की कविता आज भी यू ट्यूब पर संगीत के साथ सुनी जा सकती है। गोरों ने इसका विरोध किया या नहीं. इसका कोई दस्तावेज नहीं है, पर अफ्रो-अमेरिकी स्त्रियों ने प्रतिवाद किया, यह इतिहास है। गोरों से आया विरोध निरर्थक है, पर अफ्रो-अमेरिकी समुदाय के अंदर से आया विरोध सार्थक हो गया। क्या भारतीय समाज में गैर दलितों को भी ऐसे ही धीरज रखना नहीं चाहिए?

दलित चिंतकों में यह समझ क्या हमसे कम है कि अंबेदकर को खुदा नहीं बनाना है? ऐसी कोई वजह तो है नहीं कि वे हमसे कम समझदार हों। यह तो उन्हें भी पता है कि गाँधी नेहरू पर भी कार्टून बनते रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम निजी अनुभवों से आहत होकर यह मानने लगे हों कि दलित चिंतक सही निर्णय ले ही नहीं सकते? उनके लिए सही निर्णय सिर्फ हम ही ले सकते हैं? निश्चित ही ऐसी संकीर्ण सोच के शिकार योगेंद्र या सुहास नहीं हैं। तो फिर हमें इन प्रक्रियाओं के मनोविज्ञान को सहानुभूति और संवेदना के साथ समझने की ज़रूरत है। गाँधी नेहरू को खुदा मानने वाले लोग भी हमारे समाज में हैं, पर अंबेदकर उन लोगों का खुदा है जिनके लिए और किसी मान्य खुदा के पास जाना हजारों वर्षों तक वर्जित था। 1949 में ही अफ्रो-अमेरिकी कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ ने लिखा - 'ह्वाट हैपेन्स टू अ ड्रीम डिफर्ड? दरकिनार किए गए सपने का क्या हश्र होता है? / क्या वह किसमिस के दाने की तरह धूप में सूख जाता है? / या वह घाव बन पकता रहता है? / क्या उसमें सड़े माँस जैसी बदबू आ जाती है?/ या वह मीठा कुरकुरा बन जाता है....? शायद उसमें गीलापन आ जाता है और वह भारी होता जाता है / या फिर वह विस्फोट बन फूटता है?'

इतना तो कहा ही जा सकता है कि निपीड़ितों का मनोविज्ञान जटिल है। इस जटिलता में हमारी भागीदारी कितनी है, हम यह समझ लें तो गैर-बराबरी की इस दुनिया में हम अपनी मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। और दूसरी ओर जो विस्फोट हैं, उनको झेलने की ताकत हममें हो, इसकी कोशिश हम कर सकते हैं। अपनी मुक्ति के बिना किसी और की मुक्ति का सपना कोई अर्थ नहीं रखता।

जहाँ तक संसद की बहस का सवाल है, वहाँ शोरगुल होता रहता है। उससे परेशान होकर योगेंद्र और सुहास समिति से निकल गए हैं, यह दुखदायी है। उनके खिलाफ जो हिंसक बयान आए हैं और पुणे में हुई घटना की निंदा हर सचेत व्यक्ति कर रहा है। उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है कि वे वापस अपना काम सँभालें और गंभीरता से हमारे बच्चों को सही पाठ सिखाने का काम करते रहें।

(लाल्टू जी का यह लेख जनसत्ता में `विवाद के बीच एक संवाद` शीर्षक से छपा है।)

Wednesday, May 9, 2012

याकोब का मुर्ग़ा


(अपने समय के विख्यात चेक बाल कथा लेखक मिलोश मात्सोउरेक (1926-2002) की 'प्राणिशास्त्र' नाम की बाल कथा सीरीज़ से कुछ कहानियों का अनुवाद असद ज़ैदी ने पैंतीस साल पहले किया था जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से निकलने वाली पत्रिका 'कथ्य' में छपा था। 'कथ्य' का एक ही अंक निकल सका। इसी लेखक की कुछ और बाल कहानियों के ताज़ा अनुवाद 'जलसा' के आगामी संकलन - 'जलसा - ३ - में आने जा रहे हैं। 'जलसा' के मुफ़्त इश्तिहार व अग्रिम झाँकी के बतौर एक कहानी यहाँ दी जा रही है।)

याकोब का मुर्ग़ा
मिलोश मात्सोउरेक की एक बाल कथा

मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही होता है, वह कैसा दिखता है तुम सब जानते हो, जानते हो न, तो फिर मुर्ग़े का चित्र बनाओ, अध्यापिका ने बच्चों से कहा, अौर सब बच्चे अपनी पेंसिल अौर क्रेयॉनों को चूसते हुए मुर्ग़े का चित्र बनाने में जुट गए, काले क्रेयॉन अौर भूरे क्रेयॉन से उनमें काला अौर भूरा रंग भरने लगे, लेकिन तुम तो जानते ही हो याकोब को, देखो ज़रा उसे, क्रेयॉन के बॉक्स में जितने रंगों के क्रेयॉन अाते हैं सब उसने इस्तेमाल कर लिए, फिर लॉरा से भी उधार लेकर कुछ अौर रंग भर डाले, इस प्रकार याकोब का जो मुर्ग़ा बना उसका सर नारंगी था, डैने नीले, जाँघें लाल, देखकर टीचर बोली अरे ये कैसा अजीबो-ग़रीब मुर्ग़ा है ज़रा देखो तो बच्चो, कक्षा के सारे बच्चे हँसी से लोटपोट हैं अौर टीचर कहे जा रही है कि यह सब लापरवाही का नतीजा है, कक्षा में याकोब का ध्यान कहीं अौर होता है, अौर सच तो यह है कि याकोब का मुर्ग़ा मुर्ग़ा नहीं पीरू या मुर्ग़ाबी की तरह नज़र अाता है, नहीं, बल्कि मोर की तरह, अाकार में बटेर के बराबर अौर अबाबील की तरह दुबला, मुर्ग़ा है कि अजूबा, याकोब को उसके प्रयास के लिए एफ़ मिलता है अौर उसके बनाए मुर्ग़े को दीवार पर टाँगने के बजाए टीचर की अल्मारी के ऊपर दूसरी रद्दी अौर बेमेल चीज़ों के बीच पटक दिया जाता है, बेचारे मुर्ग़े की भावनाअों को इससे बड़ी ठेस पहुँचती है, टीचर की अल्मारी के ऊपर धूल फाँकने के ख़याल से ही उसे घबराहट होती है, भला यह भी कोई ज़िन्दगी है, वह हिम्मत करके पर तौलता है अौर ज़ोर लगाकर खुली खिड़की के रास्ते उड़ जाता है।

लेकिन मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही हुअा न, वह ज़्यादा दूर तक उड़ नहीं सकता, लिहाज़ा उसकी उड़ान स्कूल के बग़ल में बने घर के बाग़ीचे में ख़त्म होती है, क्या ही शानदार ये बाग़ीचा है, चारों तरफ़ सफ़ेद चेरी के पेड़, नीले अंगूर की बेलें, बाग़बान की मेहनत अौर प्यार की गवाही देती जगह, अौर बाग़बान भी कोई ऐसे वैसे नहीं, प्रोफ़ेसर कापोन, जाने माने पक्षी-विज्ञानी जो पक्षियों पर सात ग्रंथों की रचना कर चुके हैं अौर अब अाठवीं किताब को पूरा करने में लगे हैं, वह उसका आख़िरी पैरा लिखना शुरू करते हैं कि अचानक उन्हें थकान घेर लेती है, अौर वह उठकर थोड़ी सी बाग़बानी अौर चहलक़दमी के लिए बाग़ीचे में अा जाते हैं, इससे उन्हें आराम मिलता है अौर चिड़ियों के बारे में सोचने का वक़्त भी, दुनिया में इतनी चििड़याँ हैं, बेशुमार, प्रोफ़ेसर कापोन अपने अाप से कहते हैं, लेकिन आह बदक़िस्मती कि एक भी चििड़या को खोजने का श्रेय मुझे नहीं जाता, वह उदास हो जाते हैं, फिर बेखुदी के अालम में सपना देखने लगते हैं कि अब तक अज्ञात रही एक चिड़िया को उन्होंने खोज निकाला है, तभी उनकी नज़र उस मुर्ग़े पर पड़ती है जो उनके दुलारे नीले अंगूरों को चुगे जा रहा है, उन दुर्लभ अंगूरों को, बताइये क्या ये अंगूर इसलिए लगाए गए थे कि मुर्ग़े-मुिर्ग़यों का दाना बनें, देखकर किसका ख़ून नहीं खौल उठेगा, प्रोफ़ेसर को ग़ुस्सा आ जाता है, ग़ुस्से में वह आपे से बाहर हो जाते हैं, उनकी इच्छा होती है कि पकड़कर मुर्ग़े की गरदन मरोड़ दें, पर अंत में वह उसे पकड़कर अहाते से बाहर फेंक देते हैं, मु्र्ग़ा घबराता हुआ उड़ जाता है, पर अरे यह क्या, प्रोफ़ेसर उसके पीछे पीछे भागने लगे हैं, अपने अहाते की दीवार फाँद जाते हैं, जैसे तैसे करके उसे फिर पकड़ने में सफल हो जाते हैं अौर प्यार से घर ले अाते हैं, काफ़ी अजीब सा यह मुर्ग़ा है, शर्त बद सकता हूँ आज तक किसी ने ऐसा मुर्ग़ा नहीं देखा होगा, नारंगी सर, नीले पंख अौर सुर्ख़ जाँघें, प्रोफ़ेसर यह सब काग़ज़ पर दर्ज कर रहे हैं, दिखने में कुछ पीरू या मुर्ग़ाबी जैसा, पर कुछ गौरैया की अौर कुछ मोर की याद दिलाता, बटेर की तरह गोल मटोल अौर अबाबील की तरह दुबला, अौर इस तरह अपनी अाठवीं किताब के लिए ये तफ़सील दर्ज करके प्रोफ़ेसर रोमांच से थरथराते हुए मुर्ग़े का नामकरण अपने नाम पर कर देते हैं अौर मुर्ग़े को ले जाकर काँपते हाथों से चििड़याघर में सौंप आते हैं।

मुर्ग़ा तो मुर्ग़ा ही होता है, अाप सोचते हैं किसे दिलचस्पी होगी एक मुर्ग़े से, पर इस मुर्ग़े ने तो पूरे चिड़ियाघर में तहलका मचा दिया है, ऐसी दुर्लभ चीज़ बीस-पच्चीस साल में एकाध बार प्रकट हो तो हो, चिड़ियाघर का डाइरेक्टर उत्तेजना में हाथ मल रहा है, कर्मचारी पिंजरा बनाने में लगे हैं, पेन्टर मसरूफ़ है अौर डाइरेक्टर कह रहा है पिंजरा शानदार होना चाहिए अौर बिस्तर ज़रा नर्म, अौर लीजिए यह नामपट्ट भी बनकर आ गया, कापोनी मुर्ग़ा -- गलीना कापोनी -- अच्छा नाम है न, कानों को भला लगने वाला, क्या ख़याल है अापका ... उधर मुर्ग़े की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं, ऐसा स्वागत ऐसा सत्कार देखकर उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं, उसे अब इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं, वह चिड़ियाघर का मुख्य आकर्षण है, सबकी आँखों का तारा, चिड़ियाघर में कभी इतने दर्शक नहीं आये, कैशियर कह रहा है, जनता उमड़ पड़ी है, टिकट खिड़की पर लाइन लम्बी होती चली जा रही है, अौर लीजिए हमारी वही अध्यापिका पूरी कक्षा के साथ पिंजरे के सामने हाज़िर है बच्चों को बताती हुई कि अभी अभी तुमने प्रेवाल्क्स्की अश्व को देखा था, अौर अब तुम्हारे सामने है एक अौर दुर्लभ जीव, गलीना कापोनी यानी कापोनी मुर्ग़ा जो देखने में कुछ पीरू या मुर्ग़ाबी जैसा लगता है, पर कुछ गौरैया अौर कुछ मोर से मिलता जुलता है, देखो यह कैसे बटेर की तरह गोल मटोल भी है अौर अबाबील की तरह दुबला भी, ज़रा देखो तो कैसा हसीन नारंगी सर है इसका, नीले पंख, लाल-सुर्ख़ जंघाएँ, बच्चे विस्मित हैं, ज़ोर से साँस छोड़ते हुए कहते हैं अाह कितना सुन्दर मुर्ग़ा है, है न टीचर, पर लॉरा को जैसे करंट लग गया हो, वह टीचर की आस्तीन खींचती है अौर कहती है, ये तो याकोब का मुर्ग़ा है, सच में टीचर ये वही मुर्ग़ा है, टीचर झल्लाती है ये बेवक़ूफ़ लड़की क्या बकबक कर रही है याकोब का मुर्ग़ा याकोब का ... अरे याद आया देखना ये याकोब कहाँ गया, उसका ध्यान फिर कहीं अौर है, देखो कहाँ पहुँच गया एंटईटर के पिंजरे के सामने, कापोनी मुर्ग़े को देखने के बजाय चींटीख़ोर पशु को देखता हुआ, याकोब, अपने फेफड़ों की पूरी ताक़त के साथ ऊँचे सुर में टीचर चीख़ती है, अगली बार से मैं तुम्हें घर वापस भेज दूँगी, तुम्हारा बरताव अब बरदाश्त के बाहर हो चुका है याकोब, सही बात है टीचर की, यह सब देखकर किसी भी ख़ून खौल सकता है। 
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मात्सोउरेक की एक अंग्रेज़ प्रशंसिका ने, जो निश्चय ही अध्यापिका रही होगी, इस कहानी के अपने अनुवाद के साथ बच्चों के लिए निम्नलिखित प्रश्नावली भी अपनी तरफ़ से जोड़ दी थी।


प्रश्न
१. याकोब के मुर्ग़े के जीवन को कम से कम चार चरणों में बाँटते हुए वर्णित कीजिए।
२. अपने बाग़ीचे में बेमेल पक्षी को देखकर पक्षी-विज्ञानी ने क्या किया अौर क्यों?
३. अगर आपके मुर्ग़े को चिड़ियाघर में रख दिया जाए तो आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी?
४. अध्यापिका ने मुर्ग़े को देखकर दो भिन्न अवसरों पर -- (क) क्लासरूम में (ख) चिड़ियाघर में -- जो भाव व्यक्त किए, उनका तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए।
५. चिड़ियाघर में अपने मुर्ग़े को देखकर याकोब की अंतिम प्रतिक्रिया क्या थी?
६. इस प्रसंग के आधार पर याकोब के भविष्य के बारे में अनुमान लगाइए।


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Wednesday, April 18, 2012

सेंडी याने संदीप राम - अच्युतानंद मिश्र




उदासी वहाँ दबे पांव

रोज आती

देर रात शराब की मद्धिम रौशनी में

वे उसे खाली ग्लास की तरह लुढ़का देते

और फफक पड़ते


उनकी सुबहें दोपहर के मुहाने पर होतीं

और तब दोपहर की तेज रौशनी में

वे अपने समाज को देखते

अक्सर दूध ब्रेड या अंडा लाते हुए

जहाँ बाल सुखाती औरतें

बच्चों के भविष्य के बारें में बात करतीं

भविष्य तार पर लटके कपडे की तरह

सूख रहा था जिसमे

कहीं अथाह रौशनी तो

कहीं बम विस्फोट के खंदकों सा

अंधकार था

कही तेज धुनों में डूबती शामे थी

तो कहीं इत्र की मादक गंध में

बेसुध पड़ी रात


वे अपने गांव से आये हुए लोग थे

गांव में उनके घर थे

घरों में दीवारें थी

जिनमे कैद थे मां बाप

भाई बहन

एक चूल्हा था जिसकी आग

महज़ खाना नहीं पकाती थी

पूरी की पूरी आत्मा को सुखा देती थी

उनमे से कइयों के पास मोटर बाइक थी

कईयों के पास घर

कईयों के पास पिता

वे एक एक की किस्त अदा करते

वे तेज तेज साँस लेते

चैटिंग करते हुए ग्लास भर

पानी पी जाते

और वहाँ अनुपस्थित किसी अनाम को

अंग्रेजी में थैंक्यू कहते


वे हिंदी की शर्म में डूबे अंग्रेजीदां बच्चे थे

वे अपने पिताओं की भी शर्म ढो रहे थे

जो उनसे कभी हिंदी में तो कभी

मगही मैथिली और भोजपुरी में बात करते

वे घंटो अंग्रेजी में हँसने का अभ्यास करते

और असफल होने पर

कॉल सेन्टर के नवें माले से छलांग लगा देते


छलांग लगाने से ठीक तीन मिनट पहले

जब वे अपनी प्रेमिका के साथ

हमबिस्तर हो रहे होते

वे कहते

आई विल मैरी यु सून

उनके ये शब्द

हवा में तब भी एकदम ताज़े होते

जब वे हवा और पृथ्वी को अलविदा कह चुके होते


पिज्जा हट में पिज्जा खाते हुए

वे अक्सर अपने पिता के बारे में सोचते

जो अक्सर कहते अगली फसल के बाद

मैं आऊंगा मिलने

वे हर बार मन्त्र की तरह इसे फोन पर दुहराते

पर वे कभी आ नहीं पाते


अब इस बिडम्बना का भी क्या करें

कि इधर देश में खूब काम हुआ है

लगातार बनती रही हैं सडकें

बिछती ही रही हैं रेल की पटरियां

और अभागे पिता छटपटाते ही रह गए

मिलने को अपने बेटों से


इन्टरनेट पर बैठे बैठे

कहीं किसी कोने अंतरे में दबी छुपी

किसानों की आत्महत्या की खबरों पर

अगर उनकी नज़र पड़ जाती

वे बेचैन हो उठते

वे अपने हाथों को रगड़ने लगते

पेट में एकदम से हुल सा उठता

उबकाई सी आती

पर मोबाइल पर जाते जाते

उनके हाथ रुक जाते

और फिर इन्टरनेट पर

वे अपने बैंक अकाउंट को देखते

उन्हें थोड़ी राहत होती


शाम को कैफे में बैठे

जब उनकी नज़र इस खबर पर पडती

की गांव में पिज्जा हट खुलने को है

तो और बढ़ जाती उनकी उदासी

और इससे पहले कि उनके हाथ

उनके चमकते मोबाइल पर जाते

मोबाइल एक अंग्रजी धुन बजाने लगता

उधर से अवाज आती

हलो

यु नो सेंडी जम्पड फ्रॉम नाइन्थ फ्लोर

व्हाट!

सेंडी याने संदीप राम ...............

***




बोकारो में जन्मे युवा कवि-आलोचक अच्युतानंद मिश्र दिल्ली में रहते हैं और जन संस्कृति मंच में सक्रिय हैं। उनकी एक आलोचना पुस्तक `नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता` प्रकाशित हो चुकी है। अच्युतानंद मिश्र, 227प्रथम तल, पॉकेट-1, सेक्टर-14, नई दिल्ली-75 फोन-9213166256


Tuesday, April 10, 2012

नरेन्द्र जैन की कविताएं और असद ज़ैदी की टिपण्णी

वरिष्ठ कवि नरेन्द्र जैन के नए कविता संग्रह `चौराहे पर लोहार` (आधार प्रकाशन) से कुछ कविताएं

चौराहे पर लोहार

विदिशा का लोहाबाज़ार जहाँ से शुरू होता है
वहीं चौराहे पर सड़कें चारों दिशाओं की ओर
जाती हैं
एक बांसकुली की तरफ़
एक स्टेशन की तरफ़
एक बस अड्डे
और एक श्मशानघाट
वहीं सोमवार के हाट के दिन
सड़क के एक ओर लोहार बैठते हैं
हँसिये, कुल्हाड़ी, सरौते और
खुरपी लेकर
कुछ खरीदने के लिये हर आने-जाने वाले से
अनुनय करते रहते हैं वे
शाम गये तक बिक पाती हैं
बमुश्किल दो-चार चीज़ें
वहीं आगे बढ़कर
लोहे के व्यापारी
मोहसीन अली फख़रूद्दीन की दुकान पर
एक नया बोर्ड नुमायां है
`तेज़ धार और मज़बूती के लिये
ख़रीदिये टाटा के हँसिये`
यह वही हँसिया है टाटा का
जिसका शिल्प वामपंथी दलों के चुनावी
निशान
से मिलता जुलता है
टाटा के पास हँसिया है
हथौड़ा है, गेहूँ की बाली और नमक भी है
चौराहे पर बैठे लोहार के पास क्या है
एक मुकम्मिल भूख के सिवा?
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जोधपुर डायरी सीरीज से एक कविता

क़िले में अब
तोप, तमंचों, बंदूकों
तलवारों, गुप्तियों
बघनखों, लाठियों और
बल्लमों की भरमार है
महाराजा की शान में
पेश की गयी तलवार पर
अंकित है प्रशस्ति का वाक्य
और लिखा है नाम
उसे पेश करने वाले ग़ुलाम का
क़िले के झरोखों से उड़ता है
पक्षियों का गोलबंद झुंड
और तलवारों में कंपकंपी पैदा करता
क़िले के पार चला जाता है
क्यूरियो शॉप में
290 वर्ष पुरानी शराब की ख़ाली बोतल का दाम रुपये
दो हजार एक सौ ठहरा
लुभाने के लिए बहुत हैं अतीत के नाचते खण्डहर.
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अतियथार्थ

जैसे भागते-भागते किसी तेज़ गति के संग
किसी के हाथ से छूट जाता है
रेल का डिब्बा
या खाई से गिरते हुए नीचे
छूट जाता है रस्सी का अंतिम सिरा
या
विस्फोट के मुहाने तक
पहुँचते ही बुझ जाती है दियासलाई
हममे से
हर किसी के हाथ से
कुछ न कुछ छूट गया है
कहीं रखी होती है
ऐसी भी थाली
जिस पर रोटी का चित्र बना होता है
एक भूखे आदमी के हाथ का कौर
वहीं छूट जाता है हाथ से
इस काली सफ़ेद पुरानी तस्वीर में
यह शख़्स
ऐसा दिखलाई दे रहा
जैसे अभी-अभी भरपेट खाकर
थाली से उठा ही हो
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इधर

(विध्वंस : बाबरी मस्ज़िद)
कुछ कालिख
यहाँ वहाँ हाथों पर
चेहरे पर
शब्दों पर
कुछ कालिख
साज़ों पर बजती धुन पर
इधर सबसे ज़्यादा
आँखें चुरायी बच्चों से मैंने
हुआ तब्दील
शर्म के
जीते जागते जीवाश्म की शक्ल में
मार गया पाला
इधर आवाज़ को
इधर हुआ शर्मसार
दिवंगत् कवियों के समक्ष
इधर
और ज़्यादा
थक गया मैं
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विदिशा डायरी सीरीज से एक कविता

जिन घरों में बड़े भाई की कमीज़
छोटे भाई के काम आ जाती है
इसी तरह जूते, चप्पल और पतलून तक
साल-दर साल उपयोग में आते रहते हैं
वे कभी-कभार आते हैं बांसकुली
पतलून कमर से एक इंच छोटी करवाने
या घुटने पर फटे वस्त्र को रफू करवाने
अक्सर इन घरों में यदि पिता हुए तो
वे बीसियों बारिश झेल चुकी जैकिट पहनते हैं
और फ़लालैन की बदरंग कमीज़
जिन्हें सूत के बटन भी अब मयस्सर नहीं होते
रफ़ूगर की दुकान से
दस कदम आगे रईस अहमद
पुराने वाद्य-यंत्रों के बीच बैठे
क्लेरनेट पर बजाते रहते हैं कोई उदास धुन
यह धुन होती है कि
अपने चाक वक़्त को रफ़ू कर रहे होते हैं वे
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इससे पहले 2010 में आधार प्रकाशन से ही छपे नरेन्द्र जैन के कविता संग्रह `काला सफ़ेद में प्रविष्ट में होता है` की कविताएं और उस संग्रह पर छपी वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी की टिपण्णी भी याद आ रही हैं। इस पोस्ट के साथ वह टिपण्णी भी यहां दे रहा हूं। -

`नरेन्द्र जैन की कविता को हम क़रीब 35 साल से जानते हैं. वक़्त के साथ इस जान-पहचान में पुख्तगी भी आई है. वह अपनी पीढ़ी के उन चंद खुशनसीब कवियों में हैं जिनकी कविता ने अपने समय की रचनाशीलता से एक ऐसा पायेदार रिश्ता बनाया है जिसमें कभी कोई अधीरता या बेजा आग्रह नहीं रहा : एक रचनात्मक तन्मयता, फ़िक्रमंदी लेकिन अपनी कविता के कैरियर से एक हद तक बेनियाज़ी नरेन्द्र का वह दुर्लभ गुण है जो उन्हें अपने समकालीनों के बीच आदर और प्यार का पात्र बनाता है।

नरेन्द्र जैन सहज ही अपने काव्य व्यक्तित्व और अनुभव-जगत की सम्पूर्णता के साथ अपनी कविता में मौजूद रहते हैं.हर नई कविता के लिए नुक्ता ढूँढ़ने और उसके इर्द-गिर्द अपनी काव्यकला को माँजने (या हथियार की तरह भाँजने) की ज़रूरत उन्हें कभी नहीं होती. एक आंतरिक संगीत, अक्षय रागदारी और नागरिक हयादारी की लौ उनकी कविताओं में हरदम मौजूद रहती है. अपने हमअस्रों के बीच उनकी शख्सियत इन्हीं चीज़ों की जुस्तजू से बनी है. वह अपनी गहन निजता और आन्तरिकता को भी अपने नागरिक और सामाजिक मन के माध्यम से ही पाने के हामी हैं. उनकी कविताएँअपने तग़ाफ़ुल में भी बहुत सी चीज़ों की ख़बर एक साथ रखती हैं – समाज, राजनीति, देश-विदेश, आसपास, कवि का अंतर्मन. यहाँ ऐसी सम्पूर्णता है जिसका सम्बन्ध लिखे जाने से कम, जिए जाने और घटित होने से ज़्यादा है.ज़िम्मेदारी और अकेलापन. दरअसल तनहाई की सच्ची गरिमा और अर्थवत्ता भी ऐसी ही कविता में रौशन होती है.

आज कविता एक भयावह सरलीकरण के दौर से गुज़र रही है और यह सरलीकरण मोटी समझ या ठसपन वाला सरलीकरण नहीं, एक नैतिक और राजनीतिक सरलीकरण है. चूंकि घुटन, पीड़ा, दुःख और क्रोध से, अन्याय और विषमता के प्रतिकार से, अंतर्विरोध की मार से बचकर कविता नहीं लिखी जा सकती, और लिखी जाए तो समकालीन कविता नहीं हो सकती, इसलिए यथास्थितिवादी रचनाकारों ने वास्तविक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की जगह काल्पनिक चुनौतियों और अंतर्विरोधों की भूलभुलैयाँ रचनी शुरू की है. बिना विद्रोह किए, बिना उस विद्रोह की क़ीमत चुकाने को तैयार हुए ये लोग विद्रोह और प्रतिरोध का एक रुग्ण रोमांटिक और उत्तर-आधुनिकतावादी संसार कलाओं में रच रहे हैं. अब मुठभेड़ और प्रतिरोध की जगह 'जेस्चर' और 'मेटाफर' ने ले ली है. देखते देखते आज ऐसे कवि काफ़ी तादाद में इकट्ठे हो गए हैं जो इस तरीक़े को ही असल 'तरीक़ा' और सच्चा 'सिलसिला' मानते हैं. इस परिदृश्य में नरेन्द्र जैन की कविता क्लैसिकल प्रतिरोध की बाख़बर कविता है, जहाँ अत्याचारी का चेहरा दिखाई देता है, और कवि जिन पीड़ितों की हिमायत कर रहा है उनके चहरे भी दिखाई देते हैं. उनकी कविता ने अपना पैना राजनीतिक फ़ोकस खोया नहीं है, बल्कि उसे मामूली जीवन की तरह जिया है.

नरेन्द्र की कविता एक राजनीतिक विभीषिका, विराट दुर्घटना, आपातकालीन परिस्थिति, अर्जेंट अपील या ख़तरे और चेतावनी के लिए जागने वाली कविता नहीं बल्कि दैनिक जीवन में राजनीतिक चेतना और व्यवहार के दाख़िल होने,जज़्ब होने और ज़ाहिर होने की कविता है. उनका सरोकार उस रोज़मर्रा से है जहाँ 'राजनीतिक' और 'ग़ैर-राजनीतिक' की कोई विभाजक रेखा नहीं होती, और जहाँ राजनीति अलग शख्सियत के साथ, मुखौटा लगाकर, खुद अपनी पैरोडी बनकर नहीं, मानवीय अनुभव के अनिवार्य पहलू की तरह आती है.

नरेन्द्र ने अपनी वामपक्षीय प्रतिबद्धता को बोझ की तरह नहीं ढोया; उसे अपने रचनात्मक और नैतिक जीवन में जज़्ब किया है और एक गहरी ज़िम्मेदारी से उसे बरता है. उनके पास मुक्तिबोध के उस मशहूर सवाल का जवाब है.` -असद ज़ैदी

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आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16 पंचकूला 134113 (हरियाणा)