Saturday, January 17, 2026

शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता कवि

अदनान कफ़ील दरवेश की कविता पर शिवप्रसाद जोशी 

अदनान, शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता है- उसकी यह काव्य-पंक्ति उसका परिचय है।

अपने जीवन के तीसरे दशक में दाख़िल हो चुके अदनान कफ़ील दरवेश का यह तीसरा कविता संग्रह है। ठिठुरते लैम्प पोस्ट और नीली बयाज़ के बाद पाठकों आपको सामने लानत का प्याला है और ध्यान रहे कवि उस प्याले को खुद पर ही उड़ेल देने को तत्पर है। यह कर दिखाने की ताब हममें से बहुत ही कम लोगों को हासिल है। अदनान उन चुनिंदा व्यक्तियों में से है जिनके पास खुद को लानत भेजने का माद्दा है, खुद को फटकारने का साहस है, और खुद पर सवालों की तीखी बौछार गिराने का हौसला है। कविता में भीगा हुआ, डूबा हुआ, उससे तरबतर मनुष्य है- हिंदी की इस भाषा को समकालीन समय में नसीब हुआ कवि अदनान- जो सिर्फ़ अपने देस, अपने मुलुक और अपनी ज़बान का ही नहीं- वृहद वैश्विक मनुष्यता और व्यापक वैश्विक जनचेतना का पहरेदार कवि भी है। अपने संताप और अपने दुख और अपनी घुटन को अदनान ने इतना कसा, इतना भुगता, इतना तपाया है कि उस प्रक्रिया की निष्पत्ति में सिर्फ़ कविता ही पैदा हो सकती है, तभी वह कह पाता हैः भाषा की ठंडी पीठ पर मुझे जलानी ही होगी कविता की सुलगती आग।


कविता से पहले/अच्छी कविता/अमरूद/मुझे ये सब अच्छा लगता है…’  ये अदनान की कविता का जादू ही हो सकता है कि कविताओं क शीर्षक-क्रम भी मानो दूर तक खिंची चली आती एक लंबी कविता है या चार-पांच या पांच-छह लाइनों या दो तीन लाइनों या एक ही लाइन वाली कविता। शीर्षकों की फेहरिस्त में भी कविता का महीन धागा यहां से वहां गुज़रता हुआ, कांपता हुआ सा है, वे मानो धुनें हैं लिपटी हुई उलझी हुईं किसी बचपन की स्मृति से, कोई पेड़ या पलंग या छाता या लालटेन या रस्सी या दोस्त या हवा या पानी या मिट्टी या महक से गुंथी हुई। पानी में तैरती पत्तियां, हवा में लहराती कनातें, ज़मीन में धंसी जड़ें- जो न जाने कितनी तहों में कहीं कुलबुलाती रहती हैं, एक-दूसरे को पुकारती हैं, एक-दूसरे के पास जाती हैं और एक-दूसरे से बरसों की बिछड़ी की तरह लिपट जाती हैं। “Give me your hand from the deep zone of your disseminated pain (अपने फैले हुए दर्द के गहरे घेराव से अपना हाथ थमाओ मुझे) – पाब्लो नेरुदा अपनी एक प्रसिद्ध कविता में कहते हैं। हमारा कवि भी अपनी कविताओं के ज़रिए पीड़ित, पुकारती मनुष्यता से यही कहना चाहता है। क्या वापस कवि के लिए भी ऐसी करुणा और साहस भरी आश्वस्ति हम दे सकते हैं जिसकी कविताओं झाड़ियों सी जलती है रात।   


कुछेक वर्षों के अंतराल पर आए अदनान के कविता-संग्रहों का ओज बढ़ता ही जाता है, कविता नये नये चक्कर बनाती हुई लौटती है और उसकी धुरी में एक कवि-हृद्य की दीप्ति प्रखर होती जाती है। वहां प्रेम, शाम, मुलाकातों की मीठी सी यादें हैं लेकिन एक नागरिक के जीवन के तहस-नहस होने का ऐतिहासिक सिलसिला इस कदर एक बेकली और रुंधी हुई ख़ामोशी में दर्ज हुआ है कि पढ़ते हुए एक गहरी टूट, एक तीखी घुटन, एक शर्मिंदगी, एक अफ़सोस दिल पर धम-धम बजता हुआ उतरता जाता है। उसकी चोटें हमारी याददिहानी हैं। आने वाली पीढ़ियां पढ़कर जानेंगी कि उनका कवि सिर्फ़ कविता ही नहीं कर रहा था।


अदनान प्रकांडता और पांडित्य की धज से फूटने वाला कवि नहीं, सुदूर स्मृति के एक गांव से उसके ही पेड़ की किसी शाख की तरह झुका और टूटा-निकला एक बेकल नौजवान है जो अपने बचपन की स्मृतियों और आज के सपनों-विसंगतियों को एक साथ गूंथता हुआ, एक-दूसरे में उन्हें पिरोता हुआ, समकालीन यातना का एक असाधारण बिंब बना रहा है। जिसे मालूम है कि बहुत जोर की आंधियां चल रही हैं और नयी गर्जनाएं उसकी ओर बढ़ी चली आ रही हैं, वह कुछ कुछ वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉल्टियूड उपन्यास के आत्मनिर्वासित और अकेले, बूढ़े जिप्सी कीमियागर मेल्केदिएस जैसा है जिसे दुनिया के विकट यथार्थों जितना ही यक़ीन अपनी अपार, नाज़ुक कल्पनाओं पर है लेकिन वो अवश्यंभाविता के लिए नहीं एक मानवीय प्रयत्न और जिजीविषा की खातिर खड़ा है। अदनान को भी यक़ीनन कविता से किसी सर्वकालिक महानता का तोहफ़ा नहीं चाहिए, कवि के पास तो पहले से लानत का प्याला है! बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने कहा था कि सारी कलाएं एक महान कला की रचना करती हैं और वो है जीने की कला। मंगलेश डबराल की एक कविता  के हवाले से कहें तो अदनान की कविता इसीजीवन की एक आवाज़ है जो अनेक आवाज़ों में सुनाई देती है। ज़िंदगी की रोशनियां उनकी कविता में झिलमिलाती रहती हैं और वह दृश्य बचा रहता है जो चारों तरफ़ अदृश्य हुआ जाता है।



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